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📢 "Polity Study Adda पर आपका स्वागत है! 📜 राजव्यवस्था रटना छोड़ दो, अब समझने की बारी है! 📜 यहाँ आपको TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET/JRF और UPSC, State PCS, SSC व अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए Political Science के प्रमाणित नोट्स और महत्वपूर्ण MCQs मिलेंगे। 📜"
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Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

Polity Study Adda पर TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET, UPSC, SSC सहित सभी One-Day प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजनीति विज्ञान और भारतीय राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण MCQs और नोट्स पढ़ें। 'राजव्यवस्था रटने का नहीं, समझने का विषय है' — इसी मूल विचार के साथ, यह सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक बेहतरीन मंच है।

यहाँ हम संपूर्ण राजनीति विज्ञान से संबंधित उच्च-स्तरीय MCQs, विस्तृत नोट्स और तथ्यपूर्ण आर्टिकल्स नियमित रूप से अपलोड करते हैं। संविधान के अनुच्छेदों, शासन व्यवस्था और जटिल राजनीतिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाना ही हमारा लक्ष्य है।

यह एक निजी एजुकेशनल (शैक्षिक) पोर्टल है जिसे विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) विषय के साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी सफलता का परचम लहराना चाहते हैं।

Polity Study Adda की मुख्य विशेषताएँ

  • विषयवार विस्तृत आर्टिकल्स: भारतीय राजव्यवस्था, राजनीतिक चिंतक, सिद्धांत, लोक प्रशासन और IR की संपूर्ण सामग्री।
  • उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs): हर टॉपिक पर आधारित अति महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective Questions) और Mock Tests।
  • परीक्षा-उपयोगी शॉर्ट नोट्स: त्वरित रिवीजन (Quick Revision) के लिए टू-द-पॉइंट (To-the-point) आर्टिकल्स।
  • सरल और स्पष्ट भाषा: कठिन से कठिन विषय को भी आसान शब्दों में समझाने का प्रयास।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग क्यों करना चाहिए?

राजनीति विज्ञान अक्सर छात्रों को केवल अनुच्छेदों (Articles) और अधिनियमों को याद रखने वाला विषय लगता है। इस भ्रांति को दूर करने के लिए आपको इसका उपयोग करना चाहिए क्योंकि:

  • यहाँ रटने के बजाय देश की व्यवस्था समझने पर जोर दिया जाता है।
  • यह TGT/PGT/LT और UGC NET के विस्तृत सिलेबस को कवर करता है, जिससे One-Day परीक्षाएँ स्वतः ही आसान हो जाती हैं।
  • परीक्षा के बदलते पैटर्न के अनुसार नवीनतम सामग्री लगातार अपडेट होती है।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग हम कैसे कर सकते हैं?

  • कैटेगरी चुनें: होमपेज पर Indian Polity, Political Thinker या Theory के सेक्शन में जाएं।
  • सर्च करें: किसी विशेष विषय (जैसे- मूल अधिकार, प्लेटो) के लिए सर्च बॉक्स का उपयोग करें।
  • रिवीजन और प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के बाद उसी विषय के MCQs और Mock Tests को हल करें।

प्रतियोगी परीक्षाओं में 'राजनीति विज्ञान' विषय का क्या महत्व है?

भारत में सिविल सेवा और शिक्षक भर्ती (Teaching Exams) जैसे क्षेत्रों में राजव्यवस्था की भूमिका निर्णायक होती है:

  • सामान्य अध्ययन (GS) का आधार: UPSC और State PCS में राजव्यवस्था (Polity) से संविधान और गवर्नेंस पर कई प्रश्न पूछे जाते हैं।
  • स्कोरिंग विषय: यदि कॉन्सेप्ट क्लियर हों, तो राजनीति विज्ञान में पूरे अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • सामाजिक और कानूनी समझ: यह विषय हमें हमारे अधिकारों, कर्तव्यों और देश की कानूनी प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।

हम परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान में अच्छे अंक कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

  • क्रमबद्ध अध्ययन: अनुच्छेदों को रटने के बजाय भागों और संबंधित अवधारणाओं के साथ पढ़ें।
  • मानक स्रोत: केवल प्रामाणिक पुस्तकों और Polity Study Adda जैसे सटीक प्लेटफॉर्म्स पर अध्ययन करें।
  • MCQs की प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के तुरंत बाद उससे जुड़े अधिक से अधिक बहुविकल्पीय प्रश्न हल करें।
  • शॉर्ट नोट्स: एग्जाम के अंतिम दिनों के लिए खुद के की-वर्ड्स (Keywords) वाले नोट्स बनाएं।

भारत में सरकारी नौकरियां लोगों को क्यों पसंद हैं?

हमारे देश में सरकारी नौकरी (Government Job) को लेकर युवाओं में एक अलग ही जुनून देखने को मिलता है। इसे केवल एक रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता माना जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • करियर और जॉब सिक्योरिटी: प्राइवेट सेक्टर की अनिश्चितता के उलट, सरकारी सेवा में नौकरी जाने का डर न के बराबर होता है।
  • शानदार वेतन और सुविधाएं: आकर्षक सैलरी के साथ-साथ महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया (HRA) और मेडिकल जैसी बेहतरीन सुविधाएं मिलती हैं।
  • समाज में प्रतिष्ठा: सरकारी अफसर या शिक्षक बनने पर समाज और रिश्तेदारों के बीच सम्मान और रुतबा बढ़ता है।
  • तनावमुक्त पारिवारिक जीवन: फिक्स वर्किंग आवर्स और सरकारी छुट्टियों के कारण आप अपने परिवार को क्वालिटी टाइम दे पाते हैं।

सरकारी नौकरी हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

सरकारी नौकरी पाना रातों-रात का चमत्कार नहीं है; इसके लिए सही दिशा, अटूट धैर्य और स्मार्ट स्टडी की जरूरत होती है:

  • अपना फोकस साफ रखें: सबसे पहले तय करें कि आपको टीचिंग फील्ड (TGT, PGT, NET) में जाना है या प्रशासनिक सेवा (UPSC, PCS) में।
  • पाठ्यक्रम (Syllabus) से चिपके रहें: ऑफिशियल सिलेबस का प्रिंटआउट लें और पिछले 5-10 सालों के प्रश्न-पत्रों (Previous Year Papers) का बारीकी से अध्ययन करें।
  • प्रामाणिक अध्ययन सामग्री: 10 अलग-अलग किताबें पढ़ने से बेहतर है कि 1 अच्छी किताब को 10 बार पढ़ें। पॉलिटी के लिए Polity Study Adda के सटीक नोट्स फॉलो करें।
  • रोज़ाना प्रैक्टिस: सिर्फ थ्योरी पढ़ने से काम नहीं चलेगा। जो टॉपिक पढ़ें, तुरंत उसके MCQs हल करें और मॉक टेस्ट देकर अपनी गलतियों को सुधारें।

Polity Study Adda आपकी कैसे मदद कर सकता है?

  • सिलेबस-आधारित सामग्री: TGT, PGT, UPSC, NET/JRF के लेटेस्ट सिलेबस के अनुसार कंटेंट।
  • समय की बचत: आपको कई किताबें छानने की जरूरत नहीं, सभी प्रामाणिक स्रोतों का निचोड़ मिलता है।
  • मार्गदर्शन: किस परीक्षा के लिए क्या और कितना पढ़ना है, इसका सही मार्गदर्शन।

Polity Study Adda पर हमें भरोसा क्यों करना चाहिए?

  • तथ्यों की प्रामाणिकता: हमारा कंटेंट मानक राजनीतिक पुस्तकों और प्रामाणिक स्रोतों से अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता है।
  • छात्र-हित सर्वोपरि: हमारा उद्देश्य भ्रामक जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्र की सफलता को सुनिश्चित करना है।
  • लगातार अपडेट्स: हम पुरानी सामग्री पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि नए परीक्षा पैटर्न के अनुसार कंटेंट को अपडेट करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

उत्तर: यह एक निजी शैक्षिक (Educational) पोर्टल है जो विशेष रूप से 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) और 'भारतीय राजव्यवस्था' (Indian Polity) विषय की तैयारी कर रहे छात्रों (TGT, PGT, UPSC, NET आदि) के लिए बनाया गया है।

Q2. क्या यह एक सरकारी वेबसाइट है?

उत्तर: नहीं, यह एक निजी (Private) प्लेटफॉर्म है जो छात्रों को मुफ्त एवं उच्च गुणवत्ता वाली अध्ययन सामग्री प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।

Q3. यह वेबसाइट किन परीक्षाओं के लिए उपयोगी है?

उत्तर: मुख्य रूप से Teaching Exams (TGT, PGT, LT Grade, UGC NET) और Civil Services (UPSC, State PCS, SSC, Railway) के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।

Q4. क्या यहाँ मुझे लोक प्रशासन (Public Administration) के नोट्स मिलेंगे?

उत्तर: हाँ, भारतीय राजव्यवस्था और राजनीतिक विचारकों के साथ-साथ आपको लोक प्रशासन और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध (IR) के भी विस्तृत नोट्स और MCQs यहाँ प्राप्त होंगे।

Q5. क्या वेबसाइट पर केवल थ्योरी (Theory) पढ़ाई जाती है?

उत्तर: नहीं, थ्योरी के साथ-साथ आपकी प्रैक्टिस के लिए उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective MCQs) और मॉक टेस्ट भी उपलब्ध है।

Q6. क्या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी प्रामाणिक है?

उत्तर: बिल्कुल, यहाँ उपलब्ध कराई गई सभी अध्ययन सामग्री मानक और प्रामाणिक राजनीतिक पुस्तकों के गहन अध्ययन के बाद ही तैयार की जाती है।

Q7. मैं इस वेबसाइट पर किसी विशेष टॉपिक की मांग कैसे कर सकता हूँ?

उत्तर: आप 'Contact Us' पेज पर जाकर या सीधे PolityStudyAdda@gmail.com पर ईमेल के माध्यम से हमें अपने सुझाव और डिमांड भेज सकते हैं।

Q8. क्या पॉलिटी स्टडी अड्डा का कोई यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया ग्रुप है?

उत्तर: हाँ, आप वेबसाइट के फुटर (सबसे नीचे) में दिए गए लिंक के माध्यम से हमारे Telegram, WhatsApp और YouTube चैनल आदि से जुड़ सकते हैं।

Q9. भारत में सरकारी नौकरी (Government Job) की इतनी मांग क्यों है?

उत्तर: जॉब सिक्योरिटी, बेहतर वेतन, भत्ते और समाज में उच्च सम्मान के कारण सरकारी नौकरी युवाओं की पहली पसंद होती है।

Q10. मैं शिक्षक या सिविल सेवा परीक्षा में सफलता कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

उत्तर: सिलेबस के अनुसार रणनीति बनाकर पढ़ने, प्रामाणिक स्रोतों (जैसे Polity Study Adda) का उपयोग करने और नियमित MCQs की प्रैक्टिस करने से सफलता निश्चित है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

'Polity Study Adda' पर प्रकाशित सभी अध्ययन सामग्री, नोट्स, बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) और अन्य सूचनाएं केवल छात्रों की परीक्षा की तैयारी और उनके त्वरित मार्गदर्शन के लिए प्रदान की गई हैं। इन्हें कानूनी दस्तावेज़ या अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि हमारी टीम ने सभी तथ्यों और उत्तरों को मानक पुस्तकों के आधार पर पूरी तरह से सटीक और प्रामाणिक रखने का हर संभव प्रयास किया है, लेकिन हम अनजाने में हुई किसी भी मानवीय त्रुटि, टाइपिंग की गलती या चूक के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

प्रश्नों के उत्तर और आयोग (Commissions) के संबंध में विशेष सूचना —
राजनीति विज्ञान जैसे विस्तृत विषय और प्रतियोगी परीक्षाओं के संदर्भ में अक्सर यह देखा जाता है कि अलग-अलग भर्ती आयोग (Commissions) कभी-कभी एक ही प्रश्न के अलग-अलग उत्तरों को सही मान लेते हैं, या विवाद की स्थिति में एक से अधिक विकल्पों को सही ठहरा देते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी प्रश्न का उत्तर एक आयोग के अनुसार कुछ और होता है, जबकि दूसरे आयोग के अनुसार कुछ और। आधिकारिक 'उत्तर कुंजी' (Official Answer Key) और हमारे द्वारा दिए गए उत्तरों में भिन्नता होने की स्थिति में 'Polity Study Adda' किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा।

छात्रों को स्पष्ट रूप से सलाह दी जाती है कि किसी भी उत्तर या तथ्य की अंतिम पुष्टि के लिए वे संबंधित विभाग/आयोग की आधिकारिक वेबसाइट, उनकी उत्तर कुंजी और मान्यता प्राप्त मानक पुस्तकों (Standard Books) का ही संदर्भ लें। यह वेबसाइट किसी भी सरकारी संगठन या आयोग से संबद्ध नहीं है; यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र और निजी शैक्षिक मंच है।

समाजवाद, मार्क्सवाद, अराजकतावाद और फासीवाद: प्रमुख सिद्धान्त एवं विचारक

समाजवाद एवं मार्क्सवाद: प्रमुख विचार, सिद्धान्त एवं विचारक (Socialism & Marxism)
Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में राजनीति विज्ञान के 4 प्रमुख विषयों— समाजवाद, मार्क्सवाद, अराजकतावाद और फासीवाद का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें लोकतांत्रिक समाजवाद, विकासात्मक समाजवाद, श्रमिक संघवाद और श्रेणी समाजवाद के साथ-साथ कार्ल मार्क्स के 4 प्रमुख सिद्धान्तोंनव-मार्क्सवाद (ग्राम्शी, फ्रैंकफर्ट स्कूल) का गहन विश्लेषण है। इसके अतिरिक्त लेनिन, माओ, अराजकतावाद की प्रमुख शाखाओं (व्यक्तिवादी, साम्यवादी, दार्शनिक) और मुसोलिनी व हिटलर के सर्वाधिकारवाद (फासीवाद/नाजीवाद) को भी आसान भाषा में हस्तलिखित नोट्स के आधार पर समझाया गया है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

1. समाजवाद एवं प्रमुख भारतीय विचारक

समाजवाद के सन्दर्भ में विभिन्न भारतीय विचारकों ने अपने अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं, जो निम्नलिखित हैं:

  • नेहरू का समाजवाद: लोकतांत्रिक समाजवाद
  • लोहिया का समाजवाद: गरीबों का समाजवाद
  • जयप्रकाश नारायण: सम्पूर्ण क्रांति का नारा
  • दीनदयाल उपाध्याय: अंत्योदय
  • अंबेडकर का समाजवाद: सामाजिक न्याय

महत्वपूर्ण तथ्य: Two Nation Theory (द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त) का जनक मोहम्मद अली जिन्ना को माना जाता है।

2. समाजवाद के प्रकार (विभिन्न शाखाएँ)

समाजवाद (Socialism)
क्रांतिकारी समाजवाद
(मार्क्सवाद)
विकासात्मक समाजवाद
संशोधनवाद
एडवर्ड बर्नस्टीन
जर्मन सामाजिक लोकतंत्र
फर्डीनेंड लासाल
फेबियनवाद (इंग्लैंड)
लेबर पार्टी / सिडनी वेब
लोकतांत्रिक समाजवाद
(भारत)

नोट (फेबियन सोसायटी): 'फेबियन सोसायटी' का नाम पोडमोर ने सुझाया था। ये लोग बेंथम और मिल के विचार से प्रभावित थे। रोम के सेनापति (Fabius) के नाम पर इस सोसायटी का नाम रखा गया।

3. समाजवाद का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकृति

समाजवाद से श्रमिक वर्ग या गरीब का बोध होता है। समाजवाद का शाब्दिक अर्थ है— राष्ट्रीयकरण या सरकारीकरण

समाजवाद व्यक्तिवाद का विलोम है। जहाँ व्यक्तिवाद राज्य को साधन और व्यक्ति को साध्य मानता है, वहीं समाजवाद राज्य को साध्य और व्यक्ति को एक साधन के रूप में देखता है और यह मानता है कि व्यक्ति का हित राज्य या समाज के साथ है अर्थात् राज्य या सरकार अपनी सरकारी योजनाओं के द्वारा सामाजिक हितों (गरीब का हित) को ध्यान में रखकर कार्य करेगी।

■ समाजवाद की प्रकृति एवं परिभाषाएँ

समाजवाद कोई निश्चित सिद्धांत ना होकर एक विचारधारा है और यह विचारधारा श्रमिकों या गरीबों के कल्याण से सम्बंधित है। चूँकि गरीबों के कल्याण का कोई निश्चित तरीका नहीं है इसलिए समाजवाद का भी कोई निश्चित रूप नहीं है।

सी.ई.एम. जोड (C.E.M. Joad) के अनुसार:
"समाजवाद एक ऐसे टोप (Hat) की तरह है जिसे हर कोई आसानी के साथ पहन लेता है।"
रेमजे म्योर (Ramsay Muir) के अनुसार:
"समाजवाद एक ऐसे गिरगिट की भांति है जो अपना रंग बदलता रहता है।"

निष्कर्ष: अतः स्पष्ट है कि समाजवाद को किसी निश्चित सूत्र में बांधना सम्भव नहीं है। इसलिए समाजवाद के अनेक रूप समय-समय पर विश्व के समक्ष आते रहे और सभी ने गरीबों और श्रमिकों के कल्याण का दावा किया। यद्यपि सभी का लक्ष्य एक है लेकिन उसे प्राप्त करने का तरीका अलग-अलग है।

4. पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया: दो विचारधाराएँ

समाजवाद, पूँजीवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया जिसका मुख्य उद्देश्य पूँजीवाद को समाप्त करके समानता लाना है। और इसके लिए निम्नलिखित दो विचारधाराएँ अस्तित्व में आयीं:

  1. ① क्रांतिकारी समाजवाद:
    इसे मार्क्सवाद के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी और हिंसक तरीके से पूँजीवाद को समाप्त करके समाजवाद लाना है और यह कार्य यकायक (अचानक) होना चाहिए।
  2. ② विकासात्मक समाजवाद:
    यह क्रांतिकारी समाजवाद के विरोध में आया। इसने पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए क्रांतिकारी व हिंसक तरीके का विरोध किया। इसके अनुसार पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए संवैधानिक, शांतिपूर्ण तथा लोकतांत्रिक तरीके से शनै:-शनै: (धीरे-धीरे) आया जाए। विकासात्मक समाजवाद कई रूपों में विकसित हुआ जिसे— संशोधनवाद, जर्मन सामाजिक लोकतंत्र, फेबियनवाद और लोकतांत्रिक समाजवाद के नाम से जाना गया।

महत्वपूर्ण तुलना:

  • मार्क्सवाद: यह श्रमिक वर्ग / मजदूर / सर्वहारा का दर्शन है। (प्रगतिवादी दर्शन, इतिहास पर आधारित)।
  • उदारवाद: यह मध्यवर्ग (बुर्जुआ) का दर्शन है।

5. कार्ल मार्क्स के 4 प्रमुख सिद्धान्त

मार्क्सवाद ने उत्पादन के साधन (निजी सम्पत्ति) को अपना आधार बनाया। उनका मानना है कि जब से दो वर्ग बने, तो राज्य का निर्माण हो गया। कार्ल मार्क्स ने राजनीतिक दर्शन को पूर्णतः विज्ञान पर आधारित किया।

जड़ वस्तुओं की पूजा का सिद्धांत मार्क्सवाद से सम्बंधित है। मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद के अंतर्गत निम्नलिखित 4 सिद्धान्त आते हैं:

1 द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)
यह मार्क्स का दार्शनिक सिद्धान्त है। यह सम्पूर्ण दर्शन का मूलाधार (अमूर्त) है। हीगल को आधार बनाकर उसने इन विचारों की व्याख्या किया है।
2 ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism)
इसे इतिहास की आर्थिक व्याख्या या आर्थिक नियतिवाद कहा जाता है। यह द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर इतिहास की आर्थिक व्याख्या है।
3 वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त (Class Struggle)
यह ऐतिहासिक भौतिकवाद का व्यावहारिक रूप है।
4 अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त (Surplus Value)
मजदूरों के शोषण से जुड़ा आर्थिक सिद्धान्त।

हीगल (Hegel) का 'द्वन्द' (Dialectic): हीगल के अनुसार द्वन्द का अर्थ है— दो विपरीत विचारधाराओं के बीच कश्मकश (तर्क वितर्क करके सत्य को जानने का प्रयास किया जाता है)। इसमें वाद (Thesis) जो पूर्णतः सत्य नहीं होता, उसका विरोध प्रतिवाद (Antithesis) से होता है।

6. क्रांतिकारी समाजवाद (मार्क्सवाद) का मूल आधार

मार्क्सवाद, उदारवाद (पूँजीवाद) का प्रतिवाद (विलोम) है। जहाँ उदारवाद मध्यवर्ग या पूँजीवाद के दर्शन के नाम से जाना जाता है, वहीं मार्क्सवाद मजदूरों, गरीबों या सर्वहारा के दर्शन के नाम से जाना जाता है।

उदारवाद की मान्यता है कि राज्य सभी के साथ समान व्यवहार करता है और लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली एक संस्था है (राज्य बिना किसी भेदभाव के सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है)। वहीं मार्क्सवाद की मान्यता है कि राज्य पूँजीपतियों की संस्था है और यह केवल पूँजीपतियों के हित में कार्य करता है और पूँजीपतियों ने राज्य को एक वैधानिक संस्था के रूप में बनाया है ताकि शोषण को वैधानिक बनाया जा सके।

मार्क्सवाद के अनुसार: "राज्य एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का उपकरण है।"

मार्क्सवाद के अनुसार: "जब से उत्पादन के साधन (निजी संपत्ति) का उदय हुआ तब से समाज दो वर्गों में बंटा।" जैसे समाज दो वर्गों में बटा वैसे ही राज्य का उदय हो गया।

  • एक वर्ग जो उत्पादन के साधन का मालिक बना वह अमीर (बुर्जुआ) कहलाया।
  • दूसरा वर्ग जो उत्पादन के साधन से विहीन था वह गरीब (सर्वहारा) कहलाया।

अतः मार्क्सवाद राज्य की उत्पत्ति का आधार उत्पादन का साधन या निजी सम्पत्ति मानता है। एक वर्ग जो उत्पादन के साधन का मालिक बना वह अमीर कहलाया और दूसरा वर्ग जो उत्पादन के साधन से विहीन था वह गरीब कहलाया। राज्य इसी अमीर की रचना है और राज्य के माध्यम से अमीर गरीब का शोषण करता है। इसलिए जबतक राज्य बना रहेगा वर्ग भी बना रहेगा और एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता रहेगा। अतः राज्य के लुप्त होते ही वर्ग समाप्त हो जायेगा और उत्पादन के साधन पर सम्पूर्ण समाज का नियंत्रण स्थापित हो जायेगा। समाज राज्यविहीन व वर्गविहीन हो जायेगा। यही साम्यवाद होगा, यहाँ लोग अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करेंगे और आवश्यकता के अनुसार वेतन पायेंगे।

मार्क्सवाद ऐतिहासिक पद्धति पर आधारित है। यह द्वन्द्वात्मक पद्धति और विकासवादी सिद्धान्त में विश्वास करता है। मार्क्सवाद यह मानता है कि समाज में एक ही वर्ग होगा जिसे मजदूर या सर्वहारा कहा जायेगा और साम्यवादी व्यवस्था में ही सामाजिक न्याय की स्थापना हो सकती है। यद्यपि सामाजिक न्याय 20वीं शताब्दी की अवधारणा है और मार्क्सवाद हिंसा पर आधारित है इसलिए हम उसे सामाजिक न्याय की संज्ञा नहीं दे सकते। यहीं मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है-

"क्रांति सामाजिक परिवर्तन का अनिवार्य माध्यम है।"

मार्क्सवाद एक प्रगतिवादी दर्शन है, यह अपने आपको मुख्यतः इतिहास पर आधारित करता है।

7. काल्पनिक समाजवाद बनाम वैज्ञानिक समाजवाद

मार्क्स से पहले इंग्लैण्ड में काल्पनिक समाजवाद (Utopian Socialism) का बोलबाला था।

  • जनक: राबर्ट ओवन (Robert Owen)
  • समर्थक: सेंट साइमन, चार्ल्स फूरियर, और टामस मूर।

काल्पनिक समाजवादियों ने गरीबों की दुर्दशा का कारण पूँजीवाद को तो बताया लेकिन पूँजीवाद को समाप्त करके समाजवाद कैसे लाया जाय, वह यह नहीं बता सके।

वेपर (Wayper) का कथन:
"उन्होंने सुंदर गुलाब के फूलों की रचना तो किया लेकिन उसके वृक्षों के लिए कोई धरती तैयार नहीं किया।"

मार्क्स ने काल्पनिक समाजवाद को वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) में बदल दिया। उन्होंने गरीबों की दुर्दशा का कारण केवल पूँजीवाद को ही नहीं बताया बल्कि पूँजीवाद को समाप्त करके समाजवाद कैसे लाया जाय इसका विस्तृत ब्यौरा दिया। अतः कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक माना जाता है। मार्क्स अपने समाजवाद को वैज्ञानिक इसलिए कहता है क्योंकि यह इतिहास पर आधारित है।

मार्क्सवाद के वैज्ञानिक समाजवाद के अंतर्गत निम्नलिखित चार सिद्धांत आते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद: यह मार्क्स का दार्शनिक सिद्धांत है। इसी को आधार बनाकर उसने अन्य विचारो की व्याख्या की है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद: इसे इतिहास की आर्थिक व्याख्या या आर्थिक नियतिवाद कहा जाता है। यह द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर इतिहास की आर्थिक व्याख्या करता है।

8. वर्ग संघर्ष एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त

■ वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त (Class Struggle)

यह ऐतिहासिक भौतिकवाद का व्यावहारिक रूप है। मार्क्स ने कहा कि— "मैंने वर्ग संघर्ष पैदा करने की कोशिश नहीं किया बल्कि मैंने तो इतिहास की आर्थिक व्याख्या करके यह बताने का प्रयास किया कि सदियों से वर्ग संघर्ष कैसे चला आ रहा है।"

■ अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त (Theory of Surplus Value)

इसके माध्यम से मार्क्स ने यह बताया कि किस प्रकार से मजदूरों के खून पसीने की गाढ़ी कमाई खाकर अमीर मोटा होता जा रहा है। मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त रिकार्ड़ो के मजदूरी के लौह नियम (Iron Law of Wages) पर आधारित है।

सूत्र:
अतिरिक्त मूल्य = विनिमय मूल्य (बाजार मूल्य) - कुल लागत (मजदूरी)
(उदाहरण: 350 - 250 = 100)

■ आधार (Base) और अधिसंरचना (Superstructure)

मार्क्सवाद ने इतिहास की व्याख्या करने के लिए आधार और अधिसंरचना का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि उत्पादन का साधन 'आधार' है और सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक परिस्थितियां 'अधिसंरचना' हैं। इसी आधार के चारों ओर अधिसंरचना विकसित होती है और आधार के बदलने के साथ अधिसंरचना भी बदल जाती है। यदि आधार एक वर्ग के हाथ में है तो सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक व्यवस्था का निर्धारण वही वर्ग करता है। मार्क्सवाद की मान्यता है कि उत्पादन का साधन संपूर्ण समाज के हाथ में आ जाए ताकि सभी परिस्थितियों का निर्धारण सभी लोग मिलजुल कर करें ताकि कोई किसी का शोषण न कर सके।

मार्क्स का प्रसिद्ध कथन:
"आर्थिक परिस्थितियाँ ही सामाजिक परिस्थितियों का निर्धारण करती हैं।"
"इतिहास अब तक एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता है।" (अर्थात् अब तक का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है)।

कार्ल मार्क्स लिखता है कि आर्थिक बल पर एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता है। मार्क्स ने राज्य का विरोध किया और उसने माना कि राज्य अंततः समाज में बदल जाएगा। मार्क्स राजनीतिशाली कम और समाजशास्त्री अधिक है क्योंकि उसने राजनीति का नहीं समाज का विश्लेषण किया। मार्क्स जड़ वस्तुओं की पूजा के सिद्धांत में विश्वास करता है।

9. लेनिनवाद: मार्क्सवाद का व्यावहारिक रूप

मार्क्सवाद की विचारधारा को कुछ संशोधित रूप में आगे बढ़ाने का कार्य लेनिन (Lenin) ने किया। लेनिन ने 1917 की क्रांति (बोलशेविक क्रांति) के बाद रूस में मार्क्सवाद लागू किया। लेनिन ने मार्क्सवाद की मान्यताओं में निम्नलिखित परिवर्तन किया:

  1. क्रांति की भूमिका: क्रांतिकारी की भूमिका में सैनिक, किसान और मजदूर तीनों को शामिल किया। लेनिन ने कहा कि यह क्रांति निरंकुश शासन, जमींदार और पूँजीपतियों के विरुद्ध होगी।
  2. क्रांति का नेतृत्व: लेनिन के अनुसार क्रांति का नेतृत्व एक बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग संभालेगा और यह साम्यवादी दल होगा। यही लेनिन का बोलशेविक दल (Party) था जिसका मुखिया स्वयं लेनिन था।
  3. विचारधारा का उपयोग: लेनिन ने सर्वहारा या शोषित वर्ग की विचारधारा की आवश्यकता को महसूस करते हुए दल (Party) व्यवस्था को मजबूत बनाया।

विचारधारा वर्ग हित की उपज है। लेनिन ने बुर्जुआ मतवाद और समाजवादी मतवाद की बात की और कहा कि बुर्जुआ मतवाद से टक्कर लेने के लिए समाजवादियों को अपनी विचारधारा को मजबूत बनाना चाहिए।

लेनिन का मानना है कि वर्ग कभी समाप्त नहीं हो सकता इसलिए राज्य किसी न किसी रूप में बना रहेगा। लेनिन ने अपनी पुस्तक 'State and Revolution' में लिखा है- "राज्य वर्ग संघर्ष की असाध्य अभिव्यक्ति है।"

लेनिन ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का प्रतिनिधित्व करता है। अतः विकासशील देशों को सर्वहारा की भूमिका निभाकर साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रांति करनी चाहिए।

  • लेनिन का प्रसिद्ध कथन: "साम्राज्यवाद पूँजीवाद की उन्नत (उच्चतम) अवस्था है।"
  • सेबाइन (Sebine) का कथन: "मार्क्स के सूत्र लेनिन के सूत्र रहे किन्तु लेनिनवाद का अर्थ मार्क्सवाद से बहुत भिन्न हो गया।"

लेनिन को मार्क्सवाद का व्यावहारिक पिता कहा जाता है क्योंकि 1917 में रूसी क्रांति के माध्यम से लेनिन ने मार्क्सवाद को व्यावहारिक रूप दिया। लास्की (Laski) ने लेनिन को आधुनिक इतिहास का महानतम व्यावहारिक क्रांतिकारी कहा।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी पोलिश (यूनानी) महिला रोजा लक्जमबर्ग ने लेनिन के राष्ट्रवाद, व्यक्तिपूजा और नौकरशाही की आलोचना करते हुए कहा कि— "उन्होंने मार्क्सवादी नीतियों को कुचल दिया है।"

10. स्टालिन का 'एक देश में समाजवाद' और माओवाद

लेनिन का मानना था कि पहले रूस में साम्यवाद की स्थापना हो फिर रूस प्रकाश पुंज के रूप में कार्य करते हुए अन्य देशों में साम्यवाद की स्थापना करेगा।

■ स्टालिन (Stalin)

लेनिन के उत्तराधिकारी के रूप में स्टालिन और ट्रॉटस्की का नाम आता है। स्टालिन ने ट्रॉटस्की को मैदान से खदेड़ते हुए कहा कि "जो हमारे साथ नहीं वह हमारे विरुद्ध है।" स्टालिन ने रूस की सत्ता सम्भालते ही 'एक देश में समाजवाद' (Socialism in One Country) का नारा बुलंद किया।

स्टालिन का प्रसिद्ध कथन:
"लेनिनवाद साम्राज्यवाद तथा श्रमजीवी क्रांति के युग का मार्क्सवाद है।"
  • लेनिन का कथन: "One Step Backward, Two Steps Forward"
  • कार्ल पापर (Karl Popper): ने मार्क्सवाद को अवैध एवं विद्रोही संतान कहा।
  • लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) के अनुसार: "मार्क्सवाद अपने युग का भ्रम था।"

■ माओवाद (Maoism)

जहाँ लेनिन ने रूसी क्रांति के माध्यम से यूरोपियन समाजवाद का निर्माण किया वहीं माओ (Mao Zedong) ने चीनी क्रांति के माध्यम से एशियाई समाजवाद का निर्माण किया।

  • ट्रॉटस्की और माओ दोनों ने निरंतर क्रांति (Permanent Revolution) के सिद्धांत में विश्वास व्यक्त किया।
  • माओ ने साम्राज्यवाद को कागजी शेर (Paper Tiger) बताया।
  • माओ का प्रसिद्ध कथन: "शक्ति बन्दूक की नली से निकलती है।" (Power grows out of the barrel of a gun).
  • माओ ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद में विश्वास व्यक्त किया।
  • माओ ने आर्थिक शक्ति के स्थान पर राजनीतिक शक्ति को महत्त्वपूर्ण बताया।

11. ग्राम्शी और नव मार्क्सवाद (Neo-Marxism)

एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) इटली में पैदा हुए थे। ग्राम्शी इटली के फासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के कड़े आलोचक थे, जिसके कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया था। शरीर से विकृत परंतु बुद्धि से परिपक्व ग्राम्शी ने जेल में रहते हुए ही 'प्रिजन नोटबुक्स' (Prison Notebooks) लिखीं।

■ ग्राम्शी का आधिपत्य या प्रभुत्व (Hegemony) का सिद्धान्त

नव मार्क्सवादी विचारकों में ग्राम्शी का नाम सबसे ऊपर आता है। ग्राम्शी ने मार्क्सवाद की मूल मान्यता में कुछ संशोधन किया इसलिए उन्हें 'मार्क्सवादी संशोधनवादी' के नाम से भी जाना जाता है।

  • जहाँ मार्क्स ने 'आधार' (Base - आर्थिक ढाँचा) पर बल दिया, वहीं ग्राम्शी ने 'अधिसंरचना' (Superstructure) पर सर्वाधिक बल दिया।
  • मार्क्स का मानना था कि केवल आर्थिक बल पर एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन करता है, जबकि ग्राम्शी ने समाज में 'प्रभुत्व या आधिपत्य की संरचनाओं' का पता लगाया।
  • ग्राम्शी ने बताया कि शासन केवल आर्थिक बल पर नहीं होता, बल्कि इस शासन या प्रभुत्व के पीछे विचारधारा, बुद्धि, और चरित्र का भी बड़ा हाथ होता है।
समाज (Society)
आधार (Base)
(उत्पादन के साधन)
अधिसंरचना (Superstructure)
1. बल प्रयोग मूलक संस्था
(सेना, पुलिस)
2. वैधानिक/कानूनी संस्था
(स्कूल, चर्च, क्लब)

ग्राम्शी ने अधिसंरचना को उपर्युक्त दो भागों में बाँटा:

  1. बल प्रयोग मूलक संस्था: इसके अंतर्गत सेना व पुलिस आती है। यह आधार से दूर होती है और इसके बल पर आधिपत्य (Hegemony) स्थापित नहीं किया जा सकता।
  2. वैधानिक मूलक संस्थाएं: इसके अंतर्गत चर्च, स्कूल, क्लब व अन्य संस्थाएं आती हैं। यह आधार के अधिक निकट है। ग्राम्शी ने इसी को सर्वाधिक महत्व दिया है और यह बताने का प्रयास किया है कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर अपने आधिपत्य को स्थापित करता है, वह यही संस्थाएं हैं।

अतः उपर्युक्त विवरण से स्वतः स्पष्ट होता है कि ग्राम्सी ने उत्पादन के साधन या आर्थिक स्थिति को उतना अधिक महत्व नहीं दिया जितना कि विचारधारा, बुद्धि व चरित्र को महत्व दिया।

12. पराएपन / अलगाव का सिद्धान्त (Theory of Alienation)

20वीं शताब्दी में पराएपन या अलगाव का सिद्धांत जॉर्ज ल्यूकाच (György Lukács) ने दिया, लेकिन ऐसा माना जाता है कि मार्क्स की पांडुलिपि 'Economic and Philosophic Manuscripts' (1844) में पहले से यह विचार विद्यमान था।

इस सिद्धान्त के अंतर्गत पूँजीवाद के अमानवीय या पराएपन के सिद्धान्त का विश्लेषण किया गया है। यह बताया गया है कि किस प्रकार से पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है और वह पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ उठता है।

■ अलगाव के 4 प्रमुख स्तर

1 उत्पादन प्रक्रिया से अलगाव
श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया से पूर्णतः कट जाता है। उत्पादन कैसे होगा, इस प्रक्रिया के आधार पर उसे तय करने का अधिकार नहीं होता, बल्कि यह सब पूँजीपति तय करता है।
2 प्रकृति से अलगाव
श्रमिक प्रकृति से कट जाता है क्योंकि वह मशीनों के साथ कार्य करते-करते पूरी तरह 'यंत्र मानव' (मशीन) हो जाता है। अतः प्राकृतिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है और वह पूर्णतः अमानवीय (संवेदनहीन) हो जाता है।
3 समाज (सहकर्मियों) से अलगाव
व्यक्ति समाज से कट जाता है क्योंकि मशीनों के उदय से रोजगार कम होने लगता है। एक मजदूर जो बेरोजगार है, उसके मन में यह भावना होती है कि यदि दूसरे का कार्य छूट जाए तो यह मुझे मिल जाए। अर्थात् मजदूरों के बीच ही काम की प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है और वे आपस के दुश्मन बन जाते हैं। अतः व्यक्ति सामाजिक प्राणी की जगह असामाजिक प्राणी बन जाता है।
4 स्वयं (अपने आप) और परिवार से अलगाव
व्यक्ति परिवार और अपने आप से कट जाता है। काम का बोझ बढ़ जाने के कारण वह परिवार को समय नहीं दे पाता है और साथ-ही-साथ कला, संस्कृति और साहित्य से भी कट जाता है।

निष्कर्ष: इस सिद्धान्त के अंतर्गत मार्क्स ने बहुत पहले ही पूँजीवाद के अमानवीय स्वरूप का प्रतिपादन कर दिया था। यह बताने का प्रयास किया गया कि साम्यवाद में ही मानववाद का उच्चतम विकास हो सकता है और मनुष्य विवशता लोक से निकलकर स्वतंत्रता लोक में पहुँच सकता है।

13. फ्रैंकफर्ट स्कूल (नव मार्क्सवाद)

फ्रैंकफर्ट स्कूल (Frankfurt School) का विकास जर्मनी में हुआ। यह नव-मार्क्सवादियों की एक प्रमुख विचारधारा है। नव मार्क्सवाद, मार्क्सवाद की बुनियादी मान्यताओं के आधार पर समकालीन विश्व की जटिल परिस्थितियों की समीक्षा करता है।

  • मुख्य प्रवर्तक: मैक्स होर्खीमर (Max Horkheimer)
  • प्रमुख समर्थक: थियोडोर एडोर्नो (Theodor Adorno), हर्बर्ट मार्क्यूज (Herbert Marcuse), जुर्गेन हैबरमास (Jürgen Habermas), एरिक फ्रॉम (Erich Fromm)।
  • प्रेरणास्रोत: ये लोग विशेष रूप से प्रकृतिवादी हैं और इनका प्रेरणास्रोत 'रूसो' (Rousseau) है।

■ प्रौद्योगिकी (Technology) का विरोध

नव मार्क्सवादी केवल पूँजीवाद का ही विरोध नहीं करते, बल्कि वे Technology या प्रौद्योगिकी के आधिपत्य के भी विरोधी हैं।

इनका मानना है कि टेक्नोलॉजी के विकास ने मानव जीवन को काफी नुकसान पहुँचाया है। चिमनियों के धुएँ ने आज शहर में रहने वाले लोगों को घुटन भरे वातावरण में रहने को मजबूर कर दिया है, जिससे मानव जीवन कृत्रिम हो गया है।

एडोर्नो (Adorno) की चेतावनी:
"आज हम लोग एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जहाँ Technology ने सभी को अपने जाल में जकड़ रखा है और व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। अतः व्यक्तिगत स्वतंत्रता नष्ट हो रही है।"

अतः केवल चिंतन मनन से ही कार्य नहीं होगा बल्कि उसके लिए आलोचनात्मक प्रयास जरूरी है और व्यक्ति के मन में स्वाधीनता की जागृति उत्पन्न करके इसे समाप्त किया जा सकता है।

अतः स्पष्ट है कि नव-मार्क्सवादी मानव स्वतंत्रता के लिए केवल पूँजीवाद का ही अंत नहीं चाहते, बल्कि वह टेक्नोलॉजी को भी अमानवीयकरण का स्रोत मानते हैं। वह प्रकृति के रमणीय आवरण की शरण में जाने की बात करते हैं (प्रकृति की ओर लौटो)।

महत्वपूर्ण नोट: पूर्वी यूरोप में साम्यवाद तो अपनाया गया, लेकिन उसने लिए लोकतांत्रिक तरीके का उपयोग किया गया।

14. विकासात्मक समाजवाद (Evolutionary Socialism)

क्रांतिकारी मार्क्सवाद के प्रतिक्रिया स्वरूप विकासात्मक समाजवाद अस्तित्व में आया। इसने पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए हिंसात्मक और क्रांतिकारी तरीके को अस्वीकार कर दिया, तथा संसदीय/लोकतांत्रिक तरीके को अधिक महत्व दिया। विकासात्मक समाजवाद के अंतर्गत मुख्यतः दो धाराएँ आती हैं:

① विकासात्मक समाजवाद/संशोधनवाद (Revisionism)

विकासात्मक समाजवाद/संशोधनवाद के जनक जर्मनी के एडवर्ड बर्नस्टीन (Eduard Bernstein) माने जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'Evolutionary Socialism' है।

बर्नस्टीन ने मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त, अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त, और सामाजिक क्रांति पर विचार को अस्वीकार कर दिया। बर्नस्टीन ने कहा कि पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए क्रांतिकारी और हिंसात्मक तरीका ठीक नहीं है, बल्कि शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से शनै:-शनै: (धीरे-धीरे) समाजवाद लाना चाहिए।

② जर्मन सामाजिक लोकतंत्र

इसके जनक फर्डीनेंड लासाल (Ferdinand Lassalle) हैं। यह भी पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए क्रांतिकारी और हिंसात्मक तरीके को नकारता है तथा संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से व्यवस्था में परिवर्तन का समर्थन करता है। इसके अनुसार मजदूरों को एक राजनीतिक दल के रूप में संगठित होकर चुनाव लड़ना चाहिए तथा सत्ता प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए।

15. फेबियनवाद (समष्टिवाद / Fabianism)

फेबियनवाद का जन्म इंग्लैण्ड में हुआ। इसके जनक सिडनी वेब (Sidney Webb) माने जाते हैं।

  • अन्य समर्थक: जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (George Bernard Shaw), एच.जी. वेल्स (H.G. Wells), एनी बेसेंट (Annie Besant), क्लीमेंट एटली (Clement Attlee), ग्राहम वाल्स।

फेबियनवाद की शुरुआत लंदन में एक बुद्धिजीवी गुट के द्वारा हुई। यह सोसायटी एक विशिष्ट वर्गीय संस्था थी। सोसायटी का मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक मध्यवर्ग को समाजवाद के प्रति सचेत करना था। यह लोग बेंथम और जे.एस. मिल के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।

फेबियन नाम की उत्पत्ति: 'फेबियन' शब्द सोसायटी के एक सदस्य पोडमोर (Podmore) ने सुझाया था। यह रोम के सेनापति फेबियस (Fabius) के नाम के साथ जुड़ा था। फेबियस का मानना था कि— "हमें उचित समय का इंतजार करना चाहिए, लेकिन जब उचित समय आवे तो लक्ष्य पर यकायक (अचानक) प्रहार करना चाहिए ताकि लक्ष्य आसानी के साथ मिल जाए।"

■ फेबियन सोसायटी की विचारधारा

फेबियन सोसाइटी समाजवादियों की संस्था थी व इनका मुख्य उद्देश्य जमीन और औद्योगिक पूँजी को व्यक्तिगत हक़ से हटाकर समाज का हक़ स्थापित करना था। यह संस्था ज़मीन को भी निजी संपत्ति मानती है, इसलिए इसे समाप्त करना चाहती है। फेबियनवाद धन को समाज की संपत्ति मानता है, इसलिए उस पर समाज का स्वामित्व स्थापित करना चाहता है। अतः स्पष्ट है कि यह उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करना चाहता है, अतः फेबियनवाद राज्य के महत्व को विस्तार करता है। यह लोक कल्याणकारी राज्य और मिश्रित अर्थव्यवस्था का पक्षधर है। फेबियनवाद राज्य को सहकारी कॉमनवेल्थ की स्थायी प्रशासन का मुख्य भाग बनाना चाहता है।

फेबियनवाद मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद और वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त को अस्वीकार करता है, लेकिन इसने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त में अपनी आस्था व्यक्त की। फेबियनवाद सीमांत उत्पादकता और म्युनिसिपल शासन का समर्थन करता है।

फेबियनवाद ने पूँजीवाद से समाजवाद लाने के लिए शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके का समर्थन करते हुए कहा कि इसे शनै:-शनै: लाया जाना चाहिए। इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी (Labor Party) जिसके समय भारत को स्वतंत्रता मिली, वह फेबियनवाद के बहुत करीब थी। भारतीय संविधान का नीति-निर्देशक तत्व भी ब्रिटिश फेबियन समाजवाद से प्रभावित है।

16. लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism)

फेबियनवाद की तर्ज़ पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत में लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना किया। इसका अर्थ है- लोकतंत्र समाजवादी हो, और समाजवाद को लोकतांत्रिक तरीके से लाया जाए।

नेहरू का इस तरफ झुकाव मुख्यतः दो कारणों से हुआ:

  1. भारत की बहुसंख्यक पिसती हुई गरीबी।
  2. पूर्व सोवियत संघ की यात्रा।

जहाँ लोकतंत्र 'उदारवाद' की देन है, वहीं लोकतांत्रिक समाजवाद उदारवाद व समाजवाद का मिश्रण है (इसे 'समाजवादी ढांचा' भी कहा जाता है)। 1955 में तमिलनाडु के अवाडी (Avadi) अधिवेशन में कांग्रेस ने 'समाजवादी ढांचा' शब्द का प्रयोग किया।

लोकतांत्रिक समाजवाद, लोक कल्याणकारी राज्य और मिश्रित अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है। लोकतांत्रिक समाजवाद का शाब्दिक अर्थ है— लोकतंत्र समाजवादी हो और समाजवाद को लोकतांत्रिक तरीके से लाया जाए अर्थात गरीबों का कल्याण करते समय भी उन्हें स्वतंत्रता व समानता को बनाये रखा जाए।

भारत में समाजवाद के कदम: फेबियनवाद की तरह शांतिपूर्ण एवं वैधानिक तरीके से भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन, जमींदारी उन्मूलन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, और प्रिवी पर्स (भूतपूर्व देशी रियासत के शासकों को मिलने वाली सुविधा) की समाप्ति आदि लोकतांत्रिक समाजवाद की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है।

17. श्रमिक संघवाद (सिंडीकालिज्म / Syndicalism)

श्रमिक संघवाद को 'सिंडीकालिज्म' कहा जाता है। यह फ्रांसीसी शब्द 'सिंडीकेट' (Syndicate) से बना है जिसका अर्थ है - श्रमिक संघ (Trade Union)। इसका जन्म फ्रांस में हुआ।

  • जनक: जार्ज सोरेल (Georges Sorel)

श्रमिक संघवाद मार्क्स की विचारधारा से बहुत प्रभावित है। यह भी पूँजीवाद का विरोधी है और राज्य को एक बुराई मानता है। यह भी मार्क्सवाद की भांति क्रांति व हिंसात्मक तरीके से पूँजीवाद को समाप्त करके एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहता है, जिसमें सम्पूर्ण सामाजिक जीवन का संचालन श्रमिक संघों के द्वारा होगा। (यह संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण तरीकों को निरर्थक मानता है)।

■ श्रमिक संघवाद के मूल सिद्धान्त

  1. राज्य का विरोध
  2. पूँजीवाद का विरोध
  3. वर्ग संघर्ष में विश्वास
  4. श्रमिक वर्गों का प्रभुत्व
  5. संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण तरीका निरर्थक है
  6. क्रांतिकारी और हिंसात्मक तरीके में विश्वास (हड़ताल, तोड़फोड़)
  7. लोकतंत्र में अविश्वास
  8. राजनीतिक दलों में अविश्वास

■ श्रमिक संघ के प्रमुख साधन

फ्रांस में श्रम संघवादियों ने व्यवस्था चलाने के लिए एक केन्द्रीय संगठन बनाया, इसे C.G.T (General Confederation of Labour) कहा गया। यह संगठन पूँजीवाद का विनाश करके औद्योगिक तथा राजनैतिक जीवन में मजदूर वर्ग के प्रभुत्व के स्थापना का पक्षधर है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इसने हड़ताल (Strike), तोड़फोड़ (Sabotage) और गलत लेबल (Boycott) जैसे हिंसक तरीकों का समर्थन किया।

18. श्रेणी समाजवाद (Guild Socialism)

श्रमिक संघवाद (Syndicalism) के प्रमुख साधन व सूत्र:

  • हड़ताल (प्रमुख साधन)
  • तोड़फोड़ (Sabotage)
  • लेबल एवं बहिष्कार (Boycott)

कभी-कभी श्रमिक संघवाद को 'संगठित अराजकतावाद' भी कहा जाता है।

जॉर्ज सोरेल के प्रमुख कथन:

"आम हड़ताल श्रमिकों को संगठित तथा शिक्षित करने की सबसे बड़ी शान्ति है।"
"समाजवाद का सम्पूर्ण भविष्य श्रमिक संघों के स्वायत्त विकास पर अवलम्बित है।"

बुर्जुआ और सिंडिकेट में मुख्य अंतर: बुर्जुआ (Bourgeois) एक पूंजीपति और शोषक वर्ग है, जिसका उत्पादन के साधनों (कारखानों, जमीन, संपत्ति) पर मालिकाना हक होता है और इसका मुख्य उद्देश्य मजदूरों का शोषण करके अपना मुनाफा कमाना है। इसके ठीक विपरीत, सिंडिकेट (Syndicate) शोषित मजदूरों और कामगारों का एक संगठित संघ (Union) है, जिसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक शक्ति के माध्यम से बुर्जुआ वर्ग का मुकाबला करना और उद्योगों पर अपना अधिकार स्थापित करना है।

सूत्र: सार्वजनिक वस्तु + श्रम = निजी सम्पत्ति

■ श्रेणी समाजवाद (Guild Socialism) का उदय

फ्रांसीसी श्रमिक संघवाद के समानान्तर इंग्लैण्ड में एक अंग्रेजी विचारधारा का जन्म हुआ जिसे श्रेणी समाजवाद कहा जाता है। फ्रांसीसी शब्द 'सिंडिकेट' के स्थान पर अंग्रेजी का 'गिल्ड' (Guild - श्रेणी) शब्द प्रयोग किया गया।

  • जनक: जी.डी.एच. कोल (G.D.H. Cole)
  • अन्य समर्थक: ऑरेंज, हाबसन, आर्थर जोसेफ पेंटी (पुस्तक:
  • श्रेणी समाजवाद का विचार आर्थर जोसेफ पेंटी की पुस्तक रेस्टोरेशन ऑफ गिल्ड सोशलिज्म में मिलता है, वह एक फेबियन था। वह मध्यकालीन व्यवस्था में विश्वास करता था और आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था से घृणा करता था। उसने देखा कि श्रमिकों को कारखानों में जिन स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, उससे उनका जीवन बड़ा नीरस होता जा रहा है। वह मध्यकाल में प्रचलित श्रेणियों की व्यवस्था को पुनर्जीवित करना चाहता था।

  • जी.डी.एच. कोल की प्रसिद्ध पुस्तक: "उद्योगों में स्वशासन" (Self Government and Industry)

■ श्रेणी समाजवाद की विशेषताएँ

जी.डी.एच. कोल का कहना है कि श्रेणी समाजवाद फ्रांसीसी श्रमिक संघवाद के समानांतर एक अंग्रेजी विचारधारा है। श्रेणी समाजवाद की मुख्य विशेषता यह है कि वह अन्य समाजवादियों की भांति केवल यह नहीं चाहता है कि उत्पादन के साधन पर समाज का आधिपत्य हो, बल्कि वह उद्योगों में भी श्रेणियों (Guilds) का नियंत्रण चाहता है, ताकि वह स्वतंत्र रूप से कार्य करें। अर्थात् यह 'औद्योगिक प्रजातंत्र' (Industrial Democracy) को महत्व देता है।

फेबियनवाद केवल उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर उत्पादन प्रणाली का निर्माण करता है, जबकि श्रमिक संघवाद केवल उत्पादकों को ध्यान में रखता है। लेकिन श्रेणी समाजवाद उपभोक्ताओं तथा उत्पादकों दोनों के हितों का समन्वय करता है। श्रेणी समाजवाद फेबियनवाद की तरह राज्य को न तो अधिक शक्तिशाली बनाता है और न ही श्रमिक संघवाद की तरह राज्य का अंत करना चाहता है, बल्कि वह राज्य को सीमित करना चाहता है। इस प्रकार वह बहुलवादी विचारधारा का समर्थन करता है।

जी.डी.एच. कोल 'व्यावसायिक प्रतिनिधित्व' में विश्वास करते हैं और वे दो संसद (Two Parliaments) के पक्षधर हैं:

  1. राजनीतिक संसद (Political Parliament)
  2. आर्थिक संसद (Economic Parliament)
जी.डी.एच. कोल का प्रसिद्ध कथन:
"श्रेणी समाजवाद, फेबियनवाद (समष्टिवाद) तथा श्रमिक संघवाद का समन्वय (Synthesis) है।"

19. अराजकतावाद (Anarchism / शासन विहीनता)

अराजकतावाद का शाब्दिक अर्थ है— शासन विहीनता अथवा राज्यविहीनता। जहाँ व्यक्तिवादी राज्य को 'एक आवश्यक बुराई' मानते हैं, वहीं अराजकतावादियों के अनुसार "राज्य एक अनावश्यक बुराई है"

मार्क्सवाद, श्रमिक संघवाद और अराजकतावाद तीनों विचारधाराएँ राज्य का अंत करना चाहती हैं। लेकिन इन तीनों में राज्य का सबसे बड़ा विरोधी 'अराजकतावाद' है। मार्क्सवाद और श्रमिक संघवाद तो राज्य की आलोचना करते हुए उसके अंत की चर्चा करते हैं, लेकिन अराजकतावाद राज्य का नाम लेना भी पसंद नहीं करता।

■ अराजकतावाद के प्रकार (Classification)

अराजकतावादी (Anarchists)
1. व्यक्तिवादी अराजकतावादी

विलियम गॉडविन, प्रोधों
(राज्य, निजी सम्पत्ति, धर्म तीनों का विरोध)
प्रोधों: "सम्पत्ति चोरी है"
2. साम्यवादी अराजकतावादी

क्रोपोटकिन (जनक), बाकुनिन
(राज्य एक अनावश्यक बुराई है)
बाकुनिन: "राज्य धर्म का छोटा भाई है"
3. दार्शनिक अराजकतावादी

टॉलस्टॉय, गाँधी
(राज्य व निजी सम्पत्ति का विरोध, धर्म का नहीं)
TRUSTISHIP (न्यास का सिद्धान्त)

अराजकतावाद राज्य को पूंजीपतियों का पोषक मानता है और उनके हाथ में निर्धनों का शोषण करने का एक साधन। अतः आदर्श समाज में राज्य जैसी अन्यायपूर्ण तथा असमानता जैसी संस्था का कोई स्थान नहीं है। अराजकतावादी मानते हैं कि राज्य एक बुराई इसलिए है क्योंकि वह दमन एवं शोषण का यंत्र है। यह समस्त सामाजिक एवं नैतिक बुराइयों का मूल है। अतः राज्य को समाप्त करके उसके स्थान पर एक स्वतंत्र समाज की स्थापना करना चाहिए। अराजकतावादी मानते हैं कि मनुष्य स्वभाव से अच्छा है लेकिन राज्य रूपी संस्थाएं उसे भ्रष्ट बना देती हैं। अराजकतावादी सभी प्रकार की सत्ताओं के विरोधी हैं। वह राज्य, निजी संपत्ति और चर्च या धर्म तीनों का अंत करना चाहते हैं।

■ अराजकतावाद की 3 मुख्य शाखाओं का विवरण

1. व्यक्तिवादी अराजकतावाद:

अराजकतावाद का सर्वप्रथम प्रतिपादक विलियम गॉडविन को माना जाता है। वह राज्य को व्यक्तिगत संपत्ति का रक्षक मानता है, अतः राज्य और निजी संपत्ति दोनों का विरोध करता है। क्योंकि वह मानता है कि जो कुछ निजी है उसे संपूर्ण समाज को समर्पित कर देना चाहिए। प्रोधों (Proudhon) पहला विचारक है जिसने सर्वप्रथम अपने आपको अराजकतावादी कहकर पुकारा। प्रोधों ने अपनी पुस्तक 'व्हाट इज प्रॉपर्टी' (What is Property) में लिखा है कि "संपत्ति चोरी है"। प्रोधों ने राज्य, निजी संपत्ति और धर्म तीनों का विरोध किया। प्रोधों का प्रसिद्ध कथन है- "धर्म, विज्ञान और प्रगति दोनों का शत्रु है।"

2. साम्यवादी अराजकतावाद: बाकुनिन और क्रोपाटकिन को इसका प्रमुख समर्थक माना जाता है। क्रोपाटकिन ने अराजकतावाद की विचारधारा को चरम सीमा पर पहुँचाया इसलिए अराजकतावाद उन्हीं के नाम के साथ जुड़ गया। राज्य एक अनावश्यक बुराई है इसको सभी अराजकतावादी मानते है लेकिन यह कथन क्रोपाटकिन के नाम के साथ जुड़ गया है। यह साम्यवादी विचारधारा से सम्बन्ध रखने के कारण राज्य को समाप्त करने के लिए क्रांतिकारी तरीका अपनाते है। बाकुनिन का विश्वास था कि राज्य, निजी सम्पत्ति और धर्म इन तीनों संस्थाओं का अंत होना चाहिए। बाकुनिन का कथन है- "राज्य धर्म का छोटा भाई है और इन दोनों के जन्म लेने का कारण एक है इसलिए दोनों का विनाश साथ-साथ होना चाहिए।" क्रोपाटकिन का प्रसिद्ध कथन है- "राज्य अनावश्यक बुराई है।" क्रोपाटकिन की योजना में कोई वेतन पद्धति नहीं होगी और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार मिलेगा

3. दार्शनिक अराजकतावाद: इसमें टालस्टाय और गाँधी का नाम आता है। गाँधी की विचारधारा को मुख्य रूप से दार्शनिक अराजकतावाद के साथ जोड़कर देखा जाता है। गाँधी ने टालस्टाय से ही अहिंसा तथा रोटी के लिए श्रम का सिद्धान्त लिया। यह लोग राज्य और निजी सम्पत्ति के विरोधी है लेकिन धर्म के विरोधी नहीं है। ये लोग राज्य का विरोध इसलिए करते है क्योंकि राज्य में सेना व पुलिस होती है जो कि बल का प्रयोग करती है और इससे हिंसा होती है। गाँधी जी निजी सम्पत्ति के लिए TRUSTEESHIP (ट्रस्टीशिप) का सिद्धान्त देते है और कहते है कि सम्पत्ति पर वैयक्तिक स्वामित्व होना चाहिए लेकिन उसका सार्वजनिक उपभोग होना चाहिए।

20. फासीवाद / नाजीवाद (Fascism & Nazism)

फासीवाद एक सर्वाधिकारवाद, अधिनायकवाद या कट्टर विचारधारा है। इसमें "राज्य सर्वोपरि है और व्यक्ति गौण (कुछ नहीं) है।"

विशेषता फासीवाद (Fascism) नाजीवाद (Nazism)
उत्पत्ति इटालियन शब्द 'फैसियो' (Fascio) से (अर्थ: लकड़ियों का गठ्ठर/एकता) जर्मन शब्द 'नाजियों' से (अर्थ: जातीय या नस्लीय एकता)
तानाशाह / नेता मुसोलिनी (Mussolini) - इटली (1922) हिटलर (Hitler) - जर्मनी (1933)
नेता की उपाधि ड्यूस (Duce) फ्यूहरर (Führer)

फाँसीवाद / सर्वाधिकारवाद / अधिनायकवाद

फाँसीवाद में फाँसी का अर्थ है- कट्टर और वाद का अर्थ है विचारधारा। इस प्रकार फाँसीवाद को एक ऐसी कट्टर विचारधारा के रूप में देखा जाता है जिसमें राज्य को एक सर्वशक्तिमान और निरंकुश संस्था माना जाता है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता को कोई महत्व नहीं दिया जाता और व्यक्ति को राज्य में विलीन कर दिया जाता है अर्थात् राज्य के परे और राज्य के विरुद्ध व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। इसी को सर्वाधिकारवादी विचारधारा कहा जाता है जिसका अर्थ है सब कुछ राज्य में समाहित कर देना। फाँसीवाद का प्रेरणा स्रोत आदर्शवाद है और हिटलर का प्रेरणा स्रोत हीगल माना जाता है जो कार्य आदर्शवाद ने सैद्धांतिक रूप से कहीं वही बात फाँसीवाद ने व्यावहारिक रूप से किया।

फाँसीवाद को तानाशाही का सबसे घिनौना, मानवता विरोधी व कट्टर रूप माना जाता है यह धोखाधड़ी, फरेब, अंधविश्वास, अंधराष्ट्रवाद, जातिवाद आदि के आधार पर तैयार किया गया एक ऐसा सिद्धांत था जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध की आग भड़काई।

फाँसीवाद की स्थापना 1922 में इटली में मुसोलिनी ने किया और नाजीवाद की स्थापना 1933 में जर्मनी में हिटलर ने किया। फाँसीवाद को अंग्रेजी में फैसीज्म (Fascism) कहते है जो कि इटालियन शब्द फैशियो (Fascio) से निकला है जिसका अर्थ है - लकड़ियों का गट्ठर या अनुशासन एवं एकता। वास्तव में फाँसीवाद का अर्थ उस तानाशाहीपूर्ण व्यवस्था से लिया जाता है जिसे मुसोलिनी ने इटली एवं हिटलर जर्मनी में स्थापित किया था। फाँसीवादी नेता को ड्यूस कहा जाता था जबकि जर्मनी में फाँसीवाद की जो स्थापना हिटलर ने किया उसे नाजीवाद के नाम से जाना गया। नाजीवाद को अंग्रेजी में नाजिज्म (Nazism) कहते है जो कि जर्मन शब्द नाज़ियों से निकला है जिसका अर्थ है जातीय या नस्लीय एकता

हिटलर बहुत बड़ा जातिवादी था उसका प्रसिद्ध कथन है-
"जहाँ-जहाँ जर्मन है, वहाँ-वहाँ जर्मनी है।"

हिटलर ने 1 लाख यहूदियों का नरसंहार करा दिया। 1 सितम्बर 1939 को हिटलर ने पोलैण्ड पर आक्रमण करके द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरूआत किया था। हिटलर ने अमीरों से नोट और गरीबो से वोट लेकर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ा। चुनाव के दौरान उसका नारा था-

"हर पेट को खाना, हर तन को कपड़ा, हर हाथ को काम तथा हर परिवार को मकान।"

जब हिटलर सत्ता में आया तो उसने लोकतंत्र को कुचल कर तानाशाही स्थापित कर दिया जहाँ इटली में नेता को 'ड्यूस' वहीं जर्मनी में नेता को 'फ्यूरर' कहा गया।

फाँसीवाद के बारे में मुसोलिनी का कथन है -
"फाँसीवाद पहले से ही तैयार किये गये सिद्धान्त का स्तनपान करने वाला बच्चा न था उसका जन्म कर्म की आवश्यकता से हुआ है।"

फाँसीवाद की व्याख्या साल्वाटारेली, पारसन्स, लिपसेट ने किया। रोक्को ने फाँसीवाद को जर्मन आत्मा की बीमारी कहा। नव हीगलवादी दार्शनिक बेनेदेतो क्रोचे ने फाँसीवाद को एक बौद्धिक एवं नैतिक रोग बताया। नवमार्क्सवादी विचारक डिवीक्रोव ने फाँसीवाद तथा पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बीच गहरा सम्बन्ध माना।

मुसोलिनी का प्रसिद्ध कथन है - "हम किसी पूर्वनिश्चित सिद्धान्त में विश्वास नहीं करते।"

फाँसीवाद वास्तविकता पर आधारित है हमारा उद्देश्य कर्म करना है बोलना नहीं। हम देश काल परिस्थिति के अनुसार कुलीनतंत्रीय, जनतंत्रीय, रुढ़िवादी, प्रतिक्रियावादी, क्रांतिकारी, कानूनी और गैर कानूनी हो सकते है।

हिटलर ने अपनी पुस्तक माइन काम्फ (Mein Kampf) में लिखा है- विश्व व्यापी सिद्धान्त के विरूद्ध बलपूर्वक लड़ने का प्रत्येक प्रयास अंत में तब तक असफल रहता है जब तक कि संघर्ष नये बौद्धिक विचार के लिए आक्रमण का रूप धारण करने में नाकाम रहता है।

हिटलर और मुसोलिनी के प्रमुख कथन:

हिटलर का प्रसिद्ध कथन है - "युद्ध सदाबहार तथा विश्व व्यापी है, युद्ध जिन्दगी है, हर संघर्ष युद्ध है, हर चीज की उत्पत्ति युद्ध से हुई है।"

हिटलर का कथन है - "जिसे जीना है उसे युद्ध करना होगा।"

मुसोलिनी का कथन है - "युद्ध पुरुषों के लिए वैसा ही है जैसा कि स्त्रियों के लिए मातृत्व।"

मुसोलिनी का कथन है - "इटली या तो अपना विस्तार करे या तो नष्ट हो जाये।"

मुसोलिनी का कथन है - "सब कुछ राज्य के अधीन है राज्य के बाहर कुछ नहीं। (फाँसीवाद)"

महत्त्वपूर्ण तथ्य (NOTE)

  1. फाँसीवाद का नारा है - एक राष्ट्र, एक दल, एक नेता।
  2. फाँसीवाद का नारा है - आयात कुछ नहीं निर्यात कुछ नहीं।
  3. फाँसीवाद निगमनात्मक राज्य में विश्वास करता है (सहकारी निगम)।
  4. फाँसीवाद सावयवी सिद्धान्त में विश्वास करता है।

फाँसीवाद के प्रमुख सिद्धान्त

  1. सिद्धान्तहीनता पर आधारित / विचारधारा का अभाव
  2. एक निरंकुश एवं सर्वशक्तिमान राज्य में विश्वास
  3. व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व नहीं।
  4. पूँजीवाद और साम्यवाद का विरोध
  5. अंधराष्ट्रवाद
  6. युद्धप्रेमी
  7. महामानव पूजा या विशिष्ट वर्ग में विश्वास
  8. लोकतंत्र विरोधी
  9. क्रांति और हिंसा को महत्व
  10. कानून की अवमानना

21. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)

उपर्युक्त विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 19वीं और 20वीं शताब्दी में राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को लेकर मुख्य रूप से चार प्रमुख विचारधाराएँ उभरीं, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया:

  1. समाजवाद और मार्क्सवाद (समानता की खोज): ये दोनों विचारधाराएँ पूँजीवाद के शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मीं। जहाँ विकासात्मक समाजवाद (फेबियनवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद) ने शांतिपूर्ण, संवैधानिक और क्रमिक सुधारों के माध्यम से लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर बल दिया; वहीं मार्क्सवाद (क्रांतिकारी समाजवाद) ने वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति के माध्यम से पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने तथा अंततः एक राज्यविहीन व वर्गविहीन समाज (साम्यवाद) स्थापित करने की वकालत की।
  2. अराजकतावाद (राज्य का पूर्ण निषेध): अराजकतावाद ने राज्य के विरोध को चरम सीमा तक पहुँचा दिया। यह राज्य को एक 'अनावश्यक बुराई' और दमन का सबसे बड़ा यंत्र मानता है। अराजकतावादियों का स्पष्ट मानना है कि मनुष्य स्वभाव से अच्छा है, लेकिन राज्य और निजी सम्पत्ति जैसी संस्थाओं ने उसे भ्रष्ट कर दिया है। अतः वे राज्य के तुरंत और पूर्ण खात्मे के पक्षधर हैं।
  3. फासीवाद और नाजीवाद (राज्य की सर्वोच्चता): यह मार्क्सवाद, लोकतंत्र और अराजकतावाद के ठीक विपरीत दिशा में खड़ी एक सर्वाधिकारवादी विचारधारा है। इसमें राज्य ही साध्य है और व्यक्ति केवल साधन। मुसोलिनी और हिटलर के नेतृत्व में इन विचारधाराओं ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया और उग्र राष्ट्रवाद, युद्धप्रेम तथा निरंकुश तानाशाही के बल पर द्वितीय विश्वयुद्ध जैसी विभीषिका को जन्म दिया।

सार-संक्षेप (Final Word): राजनीतिक दर्शन के इतिहास में ये सभी विचारधाराएँ राज्य और व्यक्ति के संबंधों की अलग-अलग व्याख्या करती हैं। फासीवाद राज्य को सर्वशक्तिमान मानता है, लोकतांत्रिक समाजवाद राज्य को जन-कल्याण का एक साधन मानता है, मार्क्सवाद राज्य को पूँजीपतियों के शोषण का यंत्र मानकर उसे अंततः समाप्त करना चाहता है, और अराजकतावाद राज्य को सिरे से खारिज करते हुए उसके तत्काल विनाश की मांग करता है। इन सभी सिद्धान्तों का तुलनात्मक अध्ययन हमें तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों की जटिलताओं को समझने में मदद करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. श्रेणी समाजवाद (Guild Socialism) के जनक कौन हैं?
श्रेणी समाजवाद के जनक जी.डी.एच. कोल (G.D.H. Cole) माने जाते हैं, जिन्होंने 'उद्योगों में स्वशासन' का विचार दिया।
Q2. 'सम्पत्ति चोरी है' (Property is theft) यह प्रसिद्ध कथन किसका है?
यह प्रसिद्ध कथन व्यक्तिवादी अराजकतावादी विचारक प्रोधों (Proudhon) का है, जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक 'What is Property' में लिखा था।
Q3. दार्शनिक अराजकतावाद (Philosophical Anarchism) के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
दार्शनिक अराजकतावाद के प्रमुख समर्थकों में टॉलस्टॉय (Tolstoy) और महात्मा गाँधी का नाम आता है। इन्होंने राज्य को हिंसा का प्रतीक मानकर उसका विरोध किया।
Q4. फासीवाद (Fascism) और नाजीवाद (Nazism) के जनक कौन हैं?
इटली में फासीवाद के जनक मुसोलिनी (Mussolini) थे (1922), जबकि जर्मनी में नाजीवाद की स्थापना हिटलर (Hitler) ने की थी (1933)। ये दोनों कट्टर व सर्वाधिकारवादी विचारधाराएँ हैं।
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