| भारत के संवैधानिक विकास का इतिहास (Historical Development of Constitution of India) |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष 'मेगा-लेख' में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकासक्रम और राष्ट्रीय आन्दोलन (1773 से 1917 तक) का अत्यंत विस्तृत व तथ्यपूर्ण विश्लेषण किया गया है। इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर एक्ट्स (1773-1853), ब्रिटिश सम्राट के अधीन शासन (1858, 1861, 1892 एक्ट्स), 1909 का मार्ले-मिण्टो सुधार, बंगाल विभाजन, कांग्रेस की स्थापना व इसके विभिन्न चरण, और महात्मा गाँधी के प्रारंभिक सत्याग्रहों से लेकर होमरूल लीग व लखनऊ अधिवेशन (1916) तक की सम्पूर्ण यात्रा को शानदार फ्लोचार्ट्स के माध्यम से समझाया गया है। यह लेख TGT, PGT, LT, GIC और NET-JRF, UPSC, PCS, RO/ARO के लिए क्लासरूम हस्तलिखित नोट्स का सर्वश्रेष्ठ डिजिटल रूप है। |
- 1. संवैधानिक विकास: एक परिचय (यूरोपीय vs भारतीय राजनीतिक व्यवस्था)
- 2. भारत के संवैधानिक विकास के 2 चरण
- 3. महत्वपूर्ण शब्दावली एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (द्वैध शासन, चार्टर)
- 4. 1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट (विस्तृत विश्लेषण व फ्लोचार्ट)
- 5. 1784 का पिट्स इण्डिया एक्ट
- 6. 1813 का चार्टर एक्ट
- 7. 1833 का चार्टर एक्ट (एकात्मक शासन की शुरुआत)
- 8. 1853 का चार्टर एक्ट
- 9. भारत शासन अधिनियम 1858 (Crown Rule Begins)
- 10. भारत शासन अधिनियम 1861 (विभागीय प्रणाली एवं अध्यादेश)
- 11. 1861 के बाद की प्रमुख घटनाएँ (लॉर्ड लिटन और रिपन)
- 12. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) और इसके विभिन्न चरण
- 13. भारत शासन अधिनियम 1892 (अप्रत्यक्ष निर्वाचन की नींव)
- 14. बंगाल विभाजन (1905), मुस्लिम लीग एवं सूरत अधिवेशन (1907)
- 15. भारत शासन अधिनियम 1909 (मार्ले-मिण्टो सुधार एवं साम्प्रदायिकता)
- 16. दिल्ली दरबार (1911) एवं प्रथम विश्व युद्ध (1914) का प्रभाव
- 17. महात्मा गाँधी का भारतीय राजनीति में प्रवेश एवं प्रारम्भिक आन्दोलन
- 18. लखनऊ अधिवेशन (1916) एवं होमरूल लीग आन्दोलन
✦ 1. संवैधानिक विकास: एक परिचय
हम जानते हैं कि यूरोपीय राजनीतिक व्यवस्था किसी न किसी राजनीतिक क्रान्ति का परिणाम है, लेकिन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था किसी राजनीतिक क्रान्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि जनता के मान्य प्रतिनिधियों के आपसी विचार-विमर्श एवं बहस का परिणाम है।
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के उदय का एक छोटा सा इतिहास है, जिसे भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास के रूप में देखा जा सकता है।
✦ 2. भारत के संवैधानिक विकास के 2 चरण
भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास को निम्नलिखित 2 चरणों में बांटकर पढ़ा जा सकता है:
1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट से लेकर 1853 के चार्टर एक्ट तक ब्रिटिश संसद ने जो अधिनियम पारित किया वह भारत की जनता पर शासन करने के लिये नहीं था बल्कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर नियन्त्रण और निरीक्षण करने के लिए था। कम्पनी जनता पर शासन अपने द्वारा बनाये गये कानूनों के माध्यम से करती थी।
1857 की क्रान्ति ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारतीय सत्ता से बेदखल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत शासन अधिनियम 1858 के एक्ट ने कम्पनी के शासन का अन्त कर दिया और भारत की जनता पर सम्राट का प्रत्यक्ष नियन्त्रण हो गया। भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इसी एक्ट से प्रारंभ होती है। इस एक्ट से भारत में विधि के शासन की शुरुआत हुई, अर्थात लोकतंत्र की नींव पड़ी।
भारत शासन अधिनियम 1861 के एक्ट से लेकर भारत शासन अधिनियम 1935 के एक्ट तक ब्रिटिश सरकार ने भारत में विभिन्न प्रकार की वैधानिक संस्थाओं का निर्माण किया और राजनीतिक व्यवस्थाओं को जन्म दिया और जब देश आजाद हुआ तो भारत ने इन राजनीतिक व्यवस्थाओं को अपने संविधान का आधार बनाया।
✦ 3. महत्वपूर्ण शब्दावली एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 1764 के बक्सर युद्ध के बाद अंग्रेजों का भारत पर प्रभुत्व स्थापित हो गया।
- 1765 से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने धीरे-धीरे वैधानिक तरीके से सत्ता अपने हाथ में लेना शुरू किया।
■ 1765 - 1772 : द्वैध शासन
- वास्तविक सत्ता: कम्पनी के शासकों के हाथ में।
- सत्ता (नाममात्र): मुगलों के हाथ में।
- 1780 में दुनिया की पहली औद्योगिक क्रान्ति इंग्लैण्ड में हुयी।
- 54 देशों सहित 2/3 दुनिया इंग्लैण्ड का उपनिवेश था जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा को मिलाकर एक देश था।
■ चार्टर एवं अधिनियम में अन्तर
- चार्टर (Charter): जब सरकार किसी संस्था के लिये नियम/संविधान बनाती है तो उसे चार्टर कहते हैं। जब ब्रिटिश सरकार कम्पनी के द्वारा भारत पर शासन करती थी तो उसे चार्टर कहा जाता था।
- भारत शासन अधिनियम: जब सरकार का भारत पर सीधा नियन्त्रण हो गया तो उसे भारत शासन अधिनियम कहा जाने लगा।
- 1858 के भारत शासन अधिनियम से ब्रिटिश सरकार का शासन प्रत्यक्ष रूप से भारत पर हो गया।
✦ 4. 1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट (Regulating Act)
1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट ब्रिटिश सरकार ने पारित किया। 1773-1857 तक यही व्यवस्था रही। रेग्यूलेटिंग शब्द रेगुलेट से बना है जिसका अर्थ नियन्त्रण करना होता है।
इस एक्ट से भारत में विधि के शासन की शुरुआत हुई अर्थात लोकतंत्र की नींव पड़ी और भारतीयों को अधिकार देकर या उनकी सहमति से उन पर सरकार ने शासन का निर्णय लिया।
■ 1773 के एक्ट के पूर्व की स्थिति
इस एक्ट के पूर्व - भारत में 3 अलग-अलग प्रेसीडेन्सी थी जो स्वाधीनता का सूचक थी:
■ 1773 के एक्ट के आने के बाद
इस एक्ट द्वारा कम्पनी पर पहली बार नियंत्रण स्थापित किया गया। इसके पारित होने के पूर्व कम्पनी का बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसीडेन्सी पर शासन था और एक-एक गवर्नर के माध्यम से यह शासन किया जाता था। इस एक्ट के द्वारा पहली बार एक सुनिश्चित शासन की नींव पड़ी अर्थात बंगाल के लिए एक गवर्नर जनरल की नियुक्ति की गयी और मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेन्सी को बंगाल के अधीन कर दिया गया।
कार्यों में सहायता हेतु कार्यकारिणी का गठन
➔ 3 सदस्य
➔ निर्णय बहुमत द्वारा
- गवर्नर जनरल के कार्यों में सहायता करने के लिए 4 सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति गठित की गयी। निर्णय बहुमत से होता था।
- इस एक्ट द्वारा एक 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' का गठन किया गया जो कम्पनी की सभी गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था और इस पर नियंत्रण ब्रिटिश सरकार रखती थी।
■ 1774 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना
1774 में सर्वप्रथम एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना कलकत्ता (बंगाल) में की गयी जो अन्तिम अपीलीय न्यायालय नहीं था। इसके विरुद्ध अपील इंग्लैण्ड स्थित 'प्रिवी कौंसिल' में होती थी।
✦ 5. 1784 का पिट्स इण्डिया एक्ट (Pitt's India Act)
1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट के बाद ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी के अधिकारों को दो भागों में बाँट दिया तथा कम्पनी की गतिविधियों पर ब्रिटिश सरकार का नियन्त्रण हो गया। इसके द्वारा कम्पनी के भारतीय मामलों में पहली बार ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण स्थापित हुआ अर्थात कम्पनी के व्यापारिक व राजनीतिक कार्यों को अलग कर दिया गया।
कार्य
कन्ट्रोल
(6 सदस्य)
कार्य
बना रहा
व्यापारिक कार्य कम्पनी के हाथ में रहने दिया गया और राजनीतिक कार्यों पर नियंत्रण व निरीक्षण करने के लिए एक बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल का गठन किया गया इसके सदस्यों को केवल सम्राट ही हटा सकता था।
✦ 6. 1813 का चार्टर एक्ट
इस एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया किन्तु चाय और चीन के व्यापारिक मामले में एकाधिकार बना रहा।
- इंग्लैण्ड के सभी निवासियों को सरकार से लाइसेंस लेकर भारत में व्यापार करने की छूट मिल गयी इसलिए यह माना जाता है कि इस एक्ट के पारित होने के बाद भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों चौपट हो गयी। गांधी जी ने इसका विरोध किया था।
- ईसाई मिशनरियों को भी भारत आने की छूट मिली। उनके रुकने के लिये धर्म-सराय बनाये गये। उनके प्रचार-प्रसार और खान-पान में जो खर्च आता था वह सब भारत से लिया जाता था अर्थात भारत के पैसे से भारत को ईसाई बनाया गया।
- इसी एक्ट के द्वारा 1 लाख रुपये वार्षिक शिक्षा पर खर्च करने का निर्णय लिया गया।
- 20 साल तक कम्पनी को भारत में और रहने का लाइसेंस दिया गया।
✦ 7. 1833 का चार्टर एक्ट
इसके द्वारा भारत में एकात्मक शासन की शुरुआत हुयी। बंगाल के गवर्नर जनरल का पद समाप्त करके उसे सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल घोषित कर दिया गया।
बंगाल के अन्तिम गवर्नर जनरल - लार्ड विलियम बैंटिक ➔ भारत का प्रथम गवर्नर जनरल।
लार्ड विलियम बैंटिक बंगाल के अन्तिम तथा भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने। इन्हें उपयोगितावादी (बेंथमवादी) गवर्नर जनरल कहा जाता है।
लार्ड विलियम बैंटिक
लार्ड विलियम बैंटिक
➔ आचार संहिता: बिखरे नैतिक मूल्यों को एकत्र करना।
➔ संहिता: अर्थ संग्रह।
भारत के लिये विधि संहिता बनायी
- इस एक्ट द्वारा कम्पनी का पूर्ण व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो गया अर्थात चाय और चीन के व्यापारिक मामले भी कम्पनी के हाथ में नहीं रहे।
- इस एक्ट के द्वारा गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में एक चौथा सदस्य या अतिरिक्त सदस्य या कानूनी सदस्य की नियुक्ति हुयी जो कि लार्ड मैकाले था।
- मैकाले की अध्यक्षता में भारत का प्रथम विधि आयोग गठित हुआ जिसने भारत के लिए विधि संहिता बनायी।
- 1843 में दास-प्रथा का पूर्णतः उन्मूलन कर दिया गया और 20 साल तक कम्पनी को भारत में और रहने का लाइसेंस दे दिया गया।
✦ 8. 1853 का चार्टर एक्ट
यह कम्पनी पर नियन्त्रण रखने वाला अन्तिम अधिनियम था कम्पनी को और कोई समय सीमा नहीं दी गयी।
- इसके द्वारा गवर्नर जनरल की केन्द्रीय कार्यपालिका में एक विधि सदस्य की नियुक्ति की गयी।
- इसके माध्यम से कार्यपालिका व विधायिका का पृथक्करण करने का भी प्रयास किया गया और सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन भारत में भी होने का प्रावधान किया गया।
✦ 9. भारत शासन अधिनियम 1858 (सम्राट के अधीन शासन)
1857 की महान क्रान्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन को समाप्त कर दिया। इस एक्ट के द्वारा भारत में एक नयी व्यवस्था की शुरुआत हुयी और भारत की जनता पर ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम से सीधा शासन शुरू हुआ।
■ 1858 अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ:
- 1773 में स्थापित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और 1784 में स्थापित बोर्ड ऑफ कंट्रोल को समाप्त कर दिया गया।
- इनके स्थान पर भारत सचिव (Secretary of State for India) की नियुक्ति हुयी। अब सारी सत्ता भारत सचिव में संकलित हो गयी।
- गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वायसराय (Viceroy) कर दिया गया। लॉर्ड कैनिंग कम्पनी के अन्तिम गवर्नर जनरल और भारत के पहले वायसराय बने।
■ भारत सचिव और उसकी परिषद् का ढाँचा:
(भारत के सन्दर्भ में जब कोई प्रश्न होता था तो वही उसका उत्तर भी देता था)
(Board of Directors) द्वारा नियुक्त
भारत सचिव के कार्य में सहायता करने के लिए 15 सदस्यों की एक 'भारतीय परिषद्' (India Council) गठित की गयी जिसमें 8 सदस्य सम्राट तथा 7 सदस्य निदेशक बोर्ड नियुक्त करता था। भारत सचिव और भारतीय परिषद् के सदस्यों को वेतन भारतीय कोष से दिया जाता था।
✦ 10. भारत शासन अधिनियम 1861
इस एक्ट द्वारा सर्वप्रथम विधि निर्माण के क्षेत्र में भारतीयों की भागीदारी शुरू करने के लिए इसे पारित किया गया।
■ 1861 अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ:
- गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति: वायसराय की कार्यकारिणी में गैर-सरकारी (Non-official) सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। इसमें कुछ अंग्रेजों को शामिल कर लिया गया लेकिन कोई भी भारतीय शामिल नहीं हो सका। (गैर सरकारी सदस्यों में भारतीयों की नियुक्ति का वास्तविक अधिकार भारत शासन अधिनियम 1909 से मिला)।
- विभागीय प्रणाली (Portfolio System): वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्यों को एक-एक विभाग सौंप दिया गया अर्थात सर्वप्रथम विभागीय प्रणाली या पोर्टफोलियो प्रणाली के गठन का प्रावधान हुआ।
- संसदीय शासन की नींव: वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य अपने विभागीय कार्यों के प्रति कार्यकारिणी के प्रति उत्तरदायी थे। अतः यहीं से मन्त्रिमण्डलात्मक शासन, उत्तरदायी सरकार या संसदीय शासन प्रणाली की नींव पड़ी।
- इस एक्ट द्वारा प्रतिनिधि संस्थाओं का उदय हुआ (जैसे- आज की लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम, ग्राम पंचायत इत्यादि)।
- इसके द्वारा वायसराय को सर्वप्रथम अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार मिला।
- वायसराय को सर्वप्रथम नये प्रान्तों का निर्माण करने, प्रान्तों में गवर्नरों की नियुक्ति करने आदि का अधिकार मिला।
सरकारी सदस्य + गैर-सरकारी सदस्य (प्रारंभ में केवल अंग्रेज)
1862: मद्रास, बम्बई और कलकत्ता में स्थापना।
1866: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का गठन।
IPC (Indian Penal Code), CPC तथा CRPC का गठन इसी दौर में हुआ।
वायसराय लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल में ही 1857 के विद्रोह के दमन का खर्च वसूलने हेतु भारत में पहली बार आयकर (Income Tax) लगाया गया था।
✦ 11. 1861 के बाद की प्रमुख घटनाएँ (लॉर्ड लिटन और रिपन)
1861 के अधिनियम के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में दो महत्वपूर्ण वायसरायों का कार्यकाल आता है, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की दिशा तय की:
- लॉर्ड लिटन (1876-1880): 1870 के दशक में लॉर्ड लिटन ने प्रेस और मीडिया पर सेन्सरशिप लगाया (Vernacular Press Act)। इसने भारतीय जनता पर अत्याचार किया और इसी के फलस्वरूप भारतीय जनता में राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत हुयी। यह सबसे अलोकप्रिय वायसराय था।
- लॉर्ड रिपन (1880-1884): 1880 में अलोकप्रिय लिटन को हटाकर सबसे लोकप्रिय वायसराय लार्ड रिपन को लाया गया।
- 1881 में लार्ड रिपन ने भारत की पहली बार व्यवस्थित जनगणना (Systematic Census) करवायी।
- लार्ड रिपन ने भारत में स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) की नींव डाली।
✦ 12. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) और इसके विभिन्न चरण
■ कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि (A.O. Hume)
लार्ड रिपन की बढ़ती लोकप्रियता के कारण उन्हें हटा दिया गया और लार्ड डफरिन (1884-1888) को लाया गया जिसके साथ ए. ओ. ह्यूम (A.O. Hume) आया। ए. ओ. ह्यूम को भारत में रहने का व्यापक अनुभव प्राप्त था (वह एक रिटायर्ड सिविल सचिव था)। ह्यूम भारतीय धर्म और ज्योतिष से बहुत प्रभावित थे।
लार्ड डफरिन ने ह्यूम से सलाह-मशविरा किया कि भारत में आन्दोलन चल रहा है कैसे क्या किया जाये, तो ह्यूम ने समझाया कि जो भारत के कुछ आन्दोलनकारी हैं उनको बुलाइए और बुलाकर एक संगठन (Organization) का दीजिये और इनको अच्छी-अच्छी बात बताकर अपने गिरफ्त में लेते रहिये। फिर ये घूम-घूम कर भारत में कहेंगे कि अंग्रेज कितने अच्छे हैं। क्योंकि अगर हम (अंग्रेज) कहेंगे कि हम अच्छे हैं तो विश्वास नहीं होगा लेकिन अगर वे (भारतीय) कहेंगे तो लोगों को विश्वास होगा। इसीलिये भारतीयों को समझाओ, इनको खुश रखो, फिर ये घूम-घूमकर भारत में प्रचार करेंगे कि अंग्रेज कितने अच्छे हैं (इसे Safety Valve Theory भी कहा जाता है)।
इसी प्रकार के कुछ भारतीयों को मिलाकर उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) का गठन कर दिया (डफरिन के समय)। यह एक दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में बना था। यह जनता के हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाता था इसलिये इसे दबाव समूह कहा गया। इसने राजनीतिक दल का रूप 1920 के नागपुर अधिवेशन में धारण किया। 1920 में कांग्रेस ने अपना संविधान बनाया और 1920 में ही यह एक राजनीतिक दल (Political party) बना।
जब 1885 में कांग्रेस का गठन हो गया तो इसका हर साल दिसम्बर में अधिवेशन होने लगा। प्रत्येक अधिवेशन अलग-अलग जगह पर होता था ताकि इसका प्रचार-प्रसार हो जाय। हर साल कांग्रेस का जनाधार बढ़ रहा था।
■ कांग्रेस के तीन प्रमुख चरण (Phases of Congress):
(1885 - 1905)
- कांग्रेस में प्रारम्भ में उदारवादी गुट का प्रभुत्व था।
- इनकी मुख्य मांग 'स्वशासन' (Self-rule) थी।
- स्वशासन का अर्थ है: "अंग्रेज मुख्य धारा (केन्द्र) में रहें लेकिन प्रान्तों का शासन भारतीयों (कांग्रेस) को दे दें।"
(1905 - 1919)
- प्रमुख समर्थक: लाल, बाल, पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल) तथा अरविन्द घोष।
- इनकी मुख्य मांग 'स्वराज्य' (Swaraj) थी।
- स्वराज्य का अर्थ पूर्ण आजादी है।
- उदारवादियों को राजनीतिक भिक्षावृत्ति की संज्ञा देते थे।
(1920 - 1931)
- 1917 में रूसी क्रान्ति (Russian Revolution) के दौरान अस्तित्व में आया (लेनिन ने जारशाही का तख्ता पलट किया)। इसका प्रभाव भारत पर पड़ा।
- यह गुट भगत सिंह की फांसी के साथ समाप्त हुआ।
- इस गुट के नेताओं को अंग्रेज 'आतंकवादी' कहते थे।
Note: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उपर्युक्त तीनों गुट प्रभावी रहे। जब आन्दोलन नियन्त्रित नहीं हुआ तो अंग्रेजों ने 1861 के एक्ट में सुधार करते हुए 1892 का एक्ट पारित किया।
✦ 13. भारत शासन अधिनियम 1892
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारत की जनता के जनमत के दबाव में आकर ब्रिटिश संसद ने इस एक्ट को पारित किया। "यह कांग्रेस के प्रयत्नों का पहला परिणाम था।"
ब्रिटिश संसद ने 1861 के एक्ट में सुधार करते हुए कुछ अधिकारों में वृद्धि किया जो निम्नलिखित हैं:
■ 1892 एक्ट की प्रमुख विशेषताएँ एवं संरचना:
कार्यकारिणी
के गैर-सदस्य
- प्रान्तीय विधानमण्डल के कुछ सदस्य नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों और व्यापार मंडलों से मनोनीत होकर आयेंगे। अर्थात अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की नींव पड़ी। वायसराय की कार्यकारिणी में गैर सरकारी सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई।
- इस एक्ट के द्वारा सर्वप्रथम भारत में प्रतिनिधि सरकार की नींव पड़ी।
✦ 14. बंगाल विभाजन (1905), मुस्लिम लीग एवं सूरत अधिवेशन (1907)
1900 के आस-पास लार्ड कर्जन (खूंखार शासक) को वायसराय बनाकर भेजा गया जिसने सरकारीकरण और केन्द्रीकरण की नीति में विश्वास किया।
- बंगाल विभाजन (1905): 1905 में कलकत्ता के टाउन हाल में बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवाद को कमजोर करना और हिन्दुओं तथा मुसलमानों में मतभेद पैदा करना था।
- स्वदेशी आन्दोलन: 1905 में ही बंगाल के विभाजन के विरोध में स्वदेशी आन्दोलन छिड़ गया। इसी आन्दोलन के दौरान हिन्दुओं और मुसलमानों में सबसे बड़ी एकता देखने को मिली। तिलक तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने स्वदेशी आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया, जो राष्ट्रीय स्तर पर न होकर क्षेत्रीय स्तर तक रह गया।
- मुस्लिम लीग की स्थापना (1906): इसके बाद लार्ड मिण्टो वायसराय बने। इसने हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालने की कोशिश की। 1906 में आगा खाँ के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की स्थापना हुयी जिसका पहला सम्मेलन ढाका में सलीमुल्लाह की अध्यक्षता में हुआ।
■ 1907 में कांग्रेस का सूरत अधिवेशन (सूरत की फूट):
इस अधिवेशन में कांग्रेस में उदारवादी (स्वशासन की माँग) और उग्रवादी (पूर्ण स्वराज्य की माँग) दोनों गुट हावी हो गये।
उग्रवादियों ने इस अधिवेशन का अध्यक्ष तिलक को बनाने की माँग की। उदारवादी असहमत हो गये, फलस्वरूप उग्रवादियों ने तय किया कि उदारवादियों में से भी कोई अध्यक्ष नहीं होगा। अन्ततः रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बना दिया गया जो कि राजनीति में निष्क्रिय व्यक्ति थे। इस अधिवेशन के दौरान पार्लियामेण्ट (पंडाल) में मारपीट हुयी इसे 'सूरत की फूट' कहा जाता है।
✦ 15. भारत शासन अधिनियम 1909 (मार्ले-मिण्टो सुधार)
इसे मार्ले-मिण्टो सुधार भी कहा जाता है। (लॉर्ड मार्ले - भारत सचिव, इंग्लैण्ड में; लॉर्ड मिण्टो - भारत के वायसराय)।
इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को धर्म के आधार पर आरक्षण देना था अर्थात पृथक निर्वाचन प्रणाली का निर्माण करना था।
पृथक निर्वाचन प्रणाली का निर्माण
पड़ी भारत में।
पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार
(इंग्लैण्ड में)
- इसके द्वारा साम्प्रदायिकता की नींव भारत में पड़ी जिसका अन्तिम परिणाम भारत के बँटवारे के रूप में देखा जा सकता है।
- वायसराय की कार्यकारिणी में गैर सरकारी सदस्यों की संख्या में और वृद्धि की गयी तथा सर्वप्रथम एक भारतीय सदस्य को शामिल किया गया जिसका नाम सत्येन्द्रनाथ सिन्हा था।
- वार्षिक बजट पर बहस के साथ-साथ पूरक प्रश्न भी पूछने का अधिकार मिला लेकिन मतदान करने का अधिकार अब भी इन्हें प्राप्त नहीं था।
- प्रान्तीय विधानमण्डलों में कुछ सदस्य नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों और विश्वविद्यालयों के सदस्यों द्वारा चुनकर आने लगे अर्थात अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत हुयी।
Note: यह एक्ट लार्ड कर्जन की 'फूट डालो और राज करो' की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिये पारित किया गया था।
✦ 16. दिल्ली दरबार (1911) एवं प्रथम विश्व युद्ध (1914) का प्रभाव
- दिल्ली दरबार (1911-12): किंग जार्ज पंचम भारत दौरे पर आये। बंगाल विभाजन का विरोध करने वाले लोगों ने प्रदर्शन किया। जार्ज पंचम ने बंगाल विभाजन रद्द होने की घोषणा कर दी तथा बंगाल विभाजन रद्द हो गया।
- राजधानी परिवर्तन: 31 Dec 1911 को बैठक शुरू हुयी और 1 Jan 1912 तक चली और निर्णय लिया गया कि भारत की राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर दिया जाय। 6 Feb 1931 को पुरानी दिल्ली के स्थान पर नयी दिल्ली को राजधानी बनाया गया।
- किंग जार्ज पंचम के स्वागत हेतु जयपुर नरेश ने पूरे शहर को गुलाबी रंग से पुतवाया था तभी से जयपुर को 'पिंक सिटी' के नाम से जाना जाने लगा।
- 1913 में मुस्लिम लीग का अधिवेशन अलग से लखनऊ में हुआ इसमें स्वशासन की माँग की गयी।
■ प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918):
1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया जो 1918 तक चला। अंग्रेजों ने भारतीयों को इंग्लैंड की तरफ से लड़ने को कहा और वादा किया कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद हम भारत को डोमिनियन स्टेट (Dominion State) बना देंगे।
✦ 17. महात्मा गाँधी का भारतीय राजनीति में प्रवेश एवं प्रारम्भिक आन्दोलन
- गाँधी जी की वापसी: 1915 में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से आये। 1893 में दादा अब्दुल्ला की दक्षिण अफ्रीका स्थित फैक्ट्री का मुकदमा देखने गये थे। 22 साल तक वहीं रहे (1893-1915)।
- वहाँ अश्वेत बँधुआ मजदूर थे जिनके पास नागरिकता नहीं थी। गाँधी जी ने सत्याग्रह करके इन लोगों (अश्वेत) को दक्षिण अफ्रीका की नागरिकता दिलायी।
- गाँधी जी ने 15 दिवसीय (पाक्षिक) पत्रिका Indian Opinion निकाली।
■ राजनीतिक गुरु (गोपाल कृष्ण गोखले)
गाँधी जी की लंदन में सर्वप्रथम गोपाल कृष्ण गोखले से मुलाकात हुयी (जिन्हें 'विपक्ष का नेता' और 'चांदी की वाणी' कहा जाता था)। 1915 में गोखले की तबीयत खराब होने पर उनसे मिलने गये। गोखले ने गाँधी जी को पहले भारत भ्रमण करके उसकी सही स्थिति जानने को कहा फिर जनकल्याण में लगने की बात कही। गाँधी जी ने गोखले को अपने राजनीतिक गुरु की संज्ञा दी।
गु + रु = गुरु
अंधकार + प्रकाश ➔ अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला
(नोट: गोखले के गुरु महादेव गोविन्द रानाडे थे। रानाडे को 'महाराष्ट्र का सुकरात' कहा जाता है।)
■ चम्पारण सत्याग्रह (1917)
1917 में चम्पारण में नील आन्दोलन हुआ तो मजदूरों के तत्कालीन नेता राजकुमार शुक्ल ने गाँधी जी को निमंत्रण दिया।
- गाँधी जी, राजेन्द्र प्रसाद और मजहरुल हक़ के साथ चम्पारण पहुँचे और पहला सत्याग्रह (1917) किया। (सत्याग्रह = सत्य + अहिंसा)। फलस्वरूप किसानों को उनका हक़ मिल गया।
- "भारत की आज़ादी और अहिंसा में से मुझे किसी एक को चुनना पड़े तो मैं आज़ादी छोड़ दूँगा" - M.K. Gandhi
- चम्पारण में रवीन्द्रनाथ टैगोर (1913 में गीतांजलि पर नोबेल पुरस्कार) 65 वर्ष की आयु में गाँधी जी से मिले। यहीं पर टैगोर ने गाँधी जी को 'महात्मा' की उपाधि दिया था। गाँधी जी ने टैगोर को 'गुरुदेव' कहा था।
दूसरा सत्याग्रह अहमदाबाद में मिल मजदूरों के लिये 1918 में किया। तीसरा सत्याग्रह - रौलट एक्ट के विरुद्ध।
✦ 18. लखनऊ अधिवेशन (1916) एवं होमरूल लीग आन्दोलन
■ होमरूल लीग (Home Rule League)
1915 में एनी बेसेंट जो कि आयरलैण्ड की स्वतन्त्रता के लिये अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थीं वो भी भारत आ गयीं। तिलक और एनी बेसेंट ने होमरूल लीग की स्थापना की।
- तिलक का होमरूल लीग स्थानीय था तथा पूना में किया था।
- उसी के 6 महीने के बाद मद्रास के अड्यार में एनी बेसेंट ने All India Home Rule League आन्दोलन की स्थापना की और थियोसोफिकल सोसायटी भी बनाया। इसके सचिव बी.पी. वाडिया बने।
"हे अंग्रेजों! भारत के बेटों की लाश और बहुओं के सिन्दूर के बदले मुझे आज़ादी नहीं चाहिए। मैं आज़ादी इसलिये मांग रही हूँ क्योंकि आज़ादी मेरा हक़ है और हक कभी सौदेबाजी नहीं होती है। हक अधिकार होता है और अधिकार किसी सौदे के बदले नहीं लिया जाता।"
■ लखनऊ पैक्ट (1916)
मुस्लिम लीग का अलग गठन हो गया था, उदारवादी और उग्रवादी अलग हो चुके थे, आन्दोलन रुक चुका था। अब तिलक और एनी बेसेंट के प्रयासों से ये तय हुआ कि हम सबको इकट्ठा करें क्योंकि अलग-अलग रहकर हम सफलता हासिल नहीं कर सकते। उदारवादी, उग्रवादी तथा मुस्लिम लीग को इकट्ठा किया गया 1916 के लखनऊ अधिवेशन में।
- मुस्लिम लीग इस जिद पर अड़ी थी कि हम धर्म के आधार पर अलग होंगे, अलग से आरक्षण लेंगे और कांग्रेस चाहती थी कि धर्म के आधार पर न मिले नहीं तो इससे साम्प्रदायिकता बढ़ेगी।
- लखनऊ अधिवेशन में मुस्लिम लीग की जो अलग से धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग थी उसे कांग्रेस ने मान लिया।
- इस बात से नाराज होकर मदन मोहन मालवीय ने कांग्रेस छोड़ दिया और हिन्दू महासभा की स्थापना किया।
- मुस्लिम लीग ने कहा कि हम आज़ादी की लड़ाई में आपका (कांग्रेस) साथ देंगे लेकिन भारत की आज़ादी की मांग हम तभी कर सकते हैं जब आप हमारी मांगों को पूरा करें। अंग्रेज लड़ाने में कामयाब हो चुके थे।
✦ निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त ऐतिहासिक विकासक्रम का गहराई से विश्लेषण करने पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि स्वतंत्र भारत का संविधान किसी एक दिन का चमत्कार नहीं है, बल्कि यह डेढ़ सदी (1773 से 1947) से अधिक के संघर्ष, ब्रिटिश नीतियों और भारतीय जनमानस की प्रतिक्रियाओं का एक क्रमिक परिणाम (Evolution) है।
जहाँ एक ओर 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने पहली बार लिखित कानून और केंद्रीकरण की नींव रखी, वहीं 1853 के चार्टर एक्ट ने संसदीय व्यवस्था की प्रारंभिक रूपरेखा तैयार की। 1857 की महान क्रांति के पश्चात् 1858 के अधिनियम ने सत्ता ब्रिटिश सम्राट को सौंप दी और 1861 से लेकर 1892 के अधिनियमों ने धीरे-धीरे, किन्तु अनमने ढंग से, भारतीयों को अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व (Representative Government) देना शुरू किया।
इसके समानांतर, ब्रिटिश राज की 'फूट डालो और राज करो' की नीतियों (जैसे 1905 का बंगाल विभाजन और 1909 में पृथक निर्वाचन प्रणाली) ने भारत में साम्प्रदायिकता के बीज बोए, जिसका दुःखद अंत अंततः देश के विभाजन के रूप में हुआ। किन्तु इन्हीं दमनकारी नीतियों ने भारतीय राष्ट्रवाद को भी तीव्र किया। 1885 में कांग्रेस की स्थापना से शुरू हुआ यह राजनीतिक सफर उदारवादियों, उग्रवादियों और क्रांतिकारियों के संघर्षों से होता हुआ, महात्मा गांधी के आगमन (1915) और चंपारण सत्याग्रह (1917) के साथ जन-आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
अंततः, इन्हीं वैधानिक सुधारों (Constitutional Reforms) की सीढ़ियों और राष्ट्रीय आन्दोलन की भट्टी में तपकर ही भारत के उन लोकतांत्रिक और संस्थागत मूल्यों का निर्माण हुआ, जिन्हें बाद में 1950 में लागू हुए हमारे महान भारतीय संविधान का मुख्य आधार बनाया गया।
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