भाग 1 : संघ और उसका राज्यक्षेत्र (अनुच्छेद 1 - 4)
अनुच्छेद 1 - संघ का नाम और राज्यक्षेत्र :
इसमें कहा गया है कि भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का एक संघ (Union) होगा। कोई भी राज्य अपनी मर्जी से टूटकर अलग नहीं हो सकता।
अनुच्छेद 2 - नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना :
संसद को यह अधिकार है कि वह बाहरी क्षेत्रों या विदेशी राज्यों को भारत संघ में मिला सकती है (जैसे 1975 में सिक्किम को मिलाया गया)।
अनुच्छेद 3 - राज्यों के नाम, सीमा और निर्माण में परिवर्तन :
संसद भारत के किसी भी वर्तमान राज्य को तोड़कर नया राज्य बना सकती है, या उनके नाम और सीमाओं में बदलाव कर सकती है (जैसे बिहार से झारखंड अलग करना)।
अनुच्छेद 4 - अनुच्छेद 2 व 3 के लिए नियम :
अनुच्छेद 2 और 3 के तहत किए गए बदलाव अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन नहीं माने जाएंगे। इन्हें संसद केवल साधारण बहुमत से पास कर सकती है।
भाग 2 : नागरिकता (अनुच्छेद 5 - 11)
अनुच्छेद 5 - संविधान प्रारंभ होने पर नागरिकता :
26 जनवरी 1950 को जो लोग भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मे थे या जिनके माता-पिता भारतीय थे, उन्हें स्वतः नागरिकता दे दी गई।
अनुच्छेद 6 - पाकिस्तान से भारत आने वालों की नागरिकता :
विभाजन के समय जो लोग पाकिस्तान से भारत (Migration) आए, उन्हें नागरिकता देने का प्रावधान।
अनुच्छेद 7 - पाकिस्तान जाने वालों की नागरिकता :
जो लोग बंटवारे के समय भारत से पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन बाद में स्थायी रूप से लौटने के लिए वापस भारत आ गए, उनके नागरिकता अधिकार।
अनुच्छेद 8 - भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के लोग :
जो भारतीय मूल के व्यक्ति विदेशों में निवास कर रहे हैं, उन्हें नागरिकता देने के प्रावधान इसमें हैं।
अनुच्छेद 9 - विदेशी नागरिकता अपनाने पर :
यदि कोई भारतीय स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता ले लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता तुरंत समाप्त हो जाएगी (एकल नागरिकता का नियम)।
अनुच्छेद 10 - नागरिकता के अधिकारों का बना रहना :
किसी भी नागरिक की नागरिकता तब तक सुरक्षित बनी रहेगी, जब तक संसद कोई कानून बनाकर उसे समाप्त न कर दे।
अनुच्छेद 11 - संसद द्वारा नागरिकता पर कानून :
नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति के नियम तय करने का संपूर्ण अधिकार केवल संसद को दिया गया है (इसी के तहत 'नागरिकता अधिनियम 1955' बना)।
भाग 3 : मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12 - 35)
अनुच्छेद 12 - राज्य की परिभाषा :
मूल अधिकारों के संदर्भ में 'राज्य' का मतलब क्या होगा, यह बताया गया है। इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, संसद, विधानमंडल और स्थानीय प्राधिकारी शामिल हैं।
अनुच्छेद 13 - मूल अधिकारों से असंगत विधियां :
कोई भी ऐसा कानून जो मौलिक अधिकारों का हनन करता है, कोर्ट उसे उस मात्रा तक शून्य (अवैध) घोषित कर देगा। (यह न्यायिक पुनर्विलोकन की नींव है)।
▶ समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 - 18)
अनुच्छेद 14 - विधि के समक्ष समानता :
राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा (कानून सबके लिए बराबर है)।
अनुच्छेद 15 - भेदभाव का निषेध :
केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा।
अनुच्छेद 16 - लोक नियोजन में अवसर की समानता :
सरकारी नौकरियों (Public Employment) में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेंगे। (इसी के तहत पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाता है)।
अनुच्छेद 17 - अस्पृश्यता का अंत :
समाज से छुआछूत (Untouchability) को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। इसका आचरण एक दंडनीय अपराध है।
अनुच्छेद 18 - उपाधियों का अंत :
सेना और शिक्षा से जुड़े सम्मान (जैसे भारत रत्न, परमवीर चक्र, डॉक्टर) को छोड़कर राज्य कोई भी उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
▶ स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 - 22)
अनुच्छेद 19 - वाक्-स्वातंत्र्य आदि अधिकारों का संरक्षण :
इसे संविधान की रीढ़ कहा जाता है। इसमें बोलने की (प्रेस की), शांतिपूर्ण सम्मेलन करने, संगठन बनाने, पूरे देश में घूमने, बसने और व्यापार करने की 6 स्वतंत्रताएं दी गई हैं।
अनुच्छेद 20 - दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण :
किसी व्यक्ति को उसी कानून के तहत सज़ा मिलेगी जो अपराध के समय लागू था। उसे दोहरे दंड (Double Jeopardy) और खुद के खिलाफ गवाही देने से बचाया गया है।
अनुच्छेद 21 - प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण :
कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना किसी भी व्यक्ति की जान या निजी आज़ादी (Right to Life and Privacy) नहीं छीनी जा सकती।
अनुच्छेद 21(A) - शिक्षा का अधिकार :
86वें संशोधन (2002) द्वारा इसे जोड़ा गया, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उनका मौलिक अधिकार है।
अनुच्छेद 22 - कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण :
गिरफ्तार व्यक्ति को कारण जानने, अपना वकील रखने और 24 घंटे भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का पूरा अधिकार है।
▶ शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 - 24)
अनुच्छेद 23 - मानव दुर्व्यापार और बलातश्रम का प्रतिषेध :
इंसानों की खरीद-फरोख्त (Trafficking) और बेगार (बिना वेतन जबरन मजदूरी) पर सख्त रोक लगाई गई है।
अनुच्छेद 24 - कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध :
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खदानों या किसी भी खतरनाक काम में नहीं लगाया जा सकता (बालश्रम निषेध)।
▶ धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 - 28)
अनुच्छेद 25 - अंतःकरण और धर्म को अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता :
सभी व्यक्तियों को अपनी पसंद के धर्म को मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है।
अनुच्छेद 26 - धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता :
प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक संस्थानों की स्थापना, पोषण और प्रबंधन करने का सामूहिक अधिकार है।
अनुच्छेद 27 - विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों का संदाय :
राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसा कर (Tax) देने के लिए मजबूर नहीं करेगा, जिसका पैसा किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने के लिए खर्च होना हो।
अनुच्छेद 28 - शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा में उपस्थिति :
राज्य के पैसों (सरकारी निधि) से चलने वाले किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
▶ संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 - 30)
अनुच्छेद 29 - अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण :
भारत में रहने वाले किसी भी अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी विशेष भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का मौलिक अधिकार है।
अनुच्छेद 30 - शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन :
धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और उन्हें चलाने का अधिकार होगा।
▶ कुछ विधियों की व्यावृत्ति (अनुच्छेद 31A - 31D)
अनुच्छेद 31 - संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (निरस्त) :
यह अनुच्छेद 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया है। (संपत्ति का अधिकार अब भाग 12 के अनुच्छेद 300क में एक कानूनी अधिकार है)।
अनुच्छेद 31A (31क) - संपदाओं के अर्जन संबंधी विधियों की व्यावृत्ति :
यह अनुच्छेद राज्य द्वारा भूमि सुधार और संपदाओं के अधिग्रहण से जुड़े कानूनों को न्यायालय में चुनौती देने से बचाता है।
अनुच्छेद 31B (31ख) - कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण :
इसके तहत नौवीं अनुसूची (9th Schedule) में डाले गए किसी भी कानून को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से संरक्षण प्राप्त होता है।
अनुच्छेद 31C (31ग) - कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति :
यदि राज्य अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के नीति निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए कानून बनाता है, तो उसे अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 31D (31घ) - राष्ट्र-विरोधी क्रियाकलापों के संबंध में विधियों की व्यावृत्ति (निरस्त) :
इसे 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था, लेकिन 43वें संविधान संशोधन (1977) द्वारा इसे पूरी तरह से निरस्त (रद्द) कर दिया गया है।
▶ संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32 - 35)
अनुच्छेद 32 - संवैधानिक उपचारों का अधिकार :
इसे डॉ. अंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा' कहा है। अगर मूल अधिकारों का हनन होता है, तो व्यक्ति सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है, जो 5 प्रकार की रिट (Writs) जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 33 - सशस्त्र बलों के अधिकारों का उपांतरण :
संसद को शक्ति है कि वह अनुशासन बनाए रखने के लिए सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों पर पाबंदी लगा सकती है।
अनुच्छेद 34 - मार्शल लॉ लागू होने पर प्रतिबंध :
यदि भारत के किसी क्षेत्र में सैन्य शासन (Martial Law) लागू है, तो वहाँ संसद कानून बनाकर मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकती है।
अनुच्छेद 35 - इस भाग के लिए विधान :
मूल अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को होगी, किसी राज्य विधानमंडल को नहीं।
भाग 4 : राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) - अनुच्छेद 36 से 51
अनुच्छेद 36 - परिभाषा :
नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के लिए 'राज्य' शब्द की परिभाषा वही होगी जो अनुच्छेद 12 में दी गई है।
अनुच्छेद 37 - न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय :
नीति निदेशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं, लेकिन इन्हें जबरन लागू करवाने के लिए न्यायालय (Court) नहीं जाया जा सकता।
अनुच्छेद 38 - राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि करेगा :
राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिससे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित हो सके।
अनुच्छेद 39 - राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व :
स्त्री और पुरुष दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन, संसाधनों का उचित बंटवारा और बालकों के स्वास्थ्य की रक्षा राज्य की नीतियां होंगी।
अनुच्छेद 39A - समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता :
समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) उपलब्ध कराना राज्य का कर्त्तव्य है।
अनुच्छेद 40 - ग्राम पंचायतों का संगठन :
राज्य का यह कर्तव्य है कि वह ग्रामीण स्तर पर ग्राम पंचायतों का गठन करे (गांधीवादी दर्शन)।
अनुच्छेद 41 - कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता :
बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी और विकलांगता की स्थिति में लोक सहायता (Public Assistance) पाने का अधिकार।
अनुच्छेद 42 - काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाएं :
कार्यस्थल पर मानवीय परिस्थितियाँ और महिलाओं के लिए प्रसूति सहायता (Maternity Relief) सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 43 - कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी :
मजदूरों को निर्वाह मजदूरी दिलाना और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
अनुच्छेद 43A - उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी :
फैक्ट्रियों और उद्योगों के मैनेजमेंट में मजदूरों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 43B - सहकारी समितियों का संवर्धन :
राज्य सहकारी समितियों (Co-operative Societies) के स्वैच्छिक गठन और संचालन को बढ़ावा देगा।
अनुच्छेद 44 - समान नागरिक संहिता (UCC) :
भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे मामलों में एक समान नागरिक कानून बनाने का प्रयास किया जाएगा।
अनुच्छेद 45 - बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा :
राज्य 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 46 - SC, ST और दुर्बल वर्गों के हितों की अभिवृद्धि :
समाज के कमजोर वर्गों को शैक्षिक और आर्थिक रूप से मजबूत करना और शोषण से बचाना।
अनुच्छेद 47 - पोषाहार स्तर और लोक स्वास्थ्य में सुधार :
शराब और नशीली दवाओं (Intoxicating drinks) पर रोक लगाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना।
अनुच्छेद 48 - कृषि और पशुपालन का संगठन :
कृषि का आधुनिकीकरण करना और गाय, बछड़ों जैसे दुधारू पशुओं की हत्या पर रोक लगाना।
अनुच्छेद 48A - पर्यावरण का संरक्षण :
राज्य पर्यावरण, वन और वन्य जीवों की रक्षा करने और उन्हें सुधारने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 49 - राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों का संरक्षण :
कलात्मक और ऐतिहासिक स्मारकों, इमारतों और वस्तुओं को नष्ट होने से बचाना राज्य का कर्तव्य है।
अनुच्छेद 50 - कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण :
निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए सरकार के कामकाज (कार्यपालिका) को अदालतों (न्यायपालिका) से स्वतंत्र और अलग रखा जाएगा।
अनुच्छेद 51 - अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा :
भारत विश्व में अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और राष्ट्रों के बीच सम्मानपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास करेगा।
भाग 4A : मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)
अनुच्छेद 51A - नागरिकों के 11 मूल कर्तव्य :
42वें संशोधन द्वारा इन्हें जोड़ा गया। संविधान और राष्ट्रगान का सम्मान करना, देश की रक्षा करना, पर्यावरण बचाना और बच्चों को शिक्षा दिलाना नागरिकों के मूल कर्तव्य हैं।
भाग 5 : संघ (The Union) - अनुच्छेद 52 से 151
▶अध्याय 1 : कार्यपालिका - राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52 से 62)
अनुच्छेद 52 - भारत का राष्ट्रपति :
भारत का एक राष्ट्रपति (President) होगा, जो देश का प्रथम नागरिक माना जाएगा।
अनुच्छेद 53 - संघ की कार्यपालिका शक्ति :
केंद्र सरकार की सभी कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति में निहित होंगी और वह रक्षा बलों का सर्वोच्च कमांडर होगा।
अनुच्छेद 54 - राष्ट्रपति का निर्वाचन :
राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल करेगा, जिसमें संसद के दोनों सदनों और राज्यों की विधानसभाओं के केवल निर्वाचित सदस्य हिस्सा लेंगे।
अनुच्छेद 55 - राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति :
चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और 'एकल संक्रमणीय गुप्त मतदान' द्वारा होगा।
अनुच्छेद 56 - राष्ट्रपति की पदावधि :
राष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष का होगा। वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है।
अनुच्छेद 57 - पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता :
जो व्यक्ति राष्ट्रपति रह चुका है, वह इस पद के लिए दोबारा चुनाव लड़ने के योग्य होगा।
अनुच्छेद 58 - राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं :
उम्मीदवार भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, और लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
अनुच्छेद 59 - राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें :
राष्ट्रपति संसद या विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा और कोई लाभ का पद (Office of Profit) धारण नहीं करेगा।
अनुच्छेद 60 - राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान :
भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) राष्ट्रपति को संविधान के संरक्षण और रक्षा की शपथ दिलाएगा।
अनुच्छेद 61 - राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया :
संविधान का उल्लंघन करने पर संसद के किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव (2/3 बहुमत) लाकर राष्ट्रपति को हटाया जा सकता है।
अनुच्छेद 62 - राष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन का समय :
कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव अनिवार्य है। आकस्मिक रिक्ति के समय 6 माह के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
▶ कार्यपालिका - उपराष्ट्रपति (अनुच्छेद 63 से 73)
अनुच्छेद 63 - भारत का उपराष्ट्रपति :
भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
अनुच्छेद 64 - उपराष्ट्रपति का राज्यसभा का पदेन सभापति होना :
उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होगा।
अनुच्छेद 65 - उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना :
राष्ट्रपति की मृत्यु, इस्तीफ़ा या बीमारी के समय उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में काम करेगा।
अनुच्छेद 66 - उपराष्ट्रपति का निर्वाचन :
चुनाव संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों (निर्वाचित + मनोनीत) से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा होगा।
अनुच्छेद 67 - उपराष्ट्रपति की पदावधि :
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा। वह राष्ट्रपति को त्यागपत्र दे सकता है।
अनुच्छेद 68 - उपराष्ट्रपति के पद की रिक्ति भरने का समय :
कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व नए उपराष्ट्रपति का चुनाव संपन्न करा लिया जाएगा।
अनुच्छेद 69 - उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ :
उपराष्ट्रपति को पद की शपथ राष्ट्रपति दिलाता है।
अनुच्छेद 70 - अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन :
संविधान में वर्णित न होने वाली स्थिति में संसद कानून बनाकर राष्ट्रपति के कार्यों का प्रबंध कर सकती है।
अनुच्छेद 71 - राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद :
इनके चुनाव से जुड़े सभी विवादों का अंतिम फैसला सीधे सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया जाएगा।
अनुच्छेद 72 - क्षमा आदि की और दंडादेश के निलंबन की राष्ट्रपति की शक्ति :
राष्ट्रपति किसी भी सज़ा (कोर्ट मार्शल और फांसी सहित) को माफ़, कम, या निलंबित कर सकता है।
अनुच्छेद 73 - संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार :
जिन विषयों पर संसद कानून बना सकती है, उन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होगा।
▶ मंत्रिपरिषद (अनुच्छेद 74 - 75)
अनुच्छेद 74 - राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद :
राष्ट्रपति को उसके कार्यों में सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।
अनुच्छेद 75 - मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध :
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। पूरी मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी।
▶ भारत का महान्यायवादी (अनुच्छेद 76)
अनुच्छेद 76 - भारत का महान्यायवादी (Attorney General) :
यह भारत सरकार का प्रथम विधि अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
▶ सरकारी कार्य का संचालन (अनुच्छेद 77 - 78)
अनुच्छेद 77 - भारत सरकार के कार्य का संचालन :
केंद्र सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयां औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम से की हुई मानी जाएंगी।
अनुच्छेद 78 - राष्ट्रपति को जानकारी देने के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य :
प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह प्रशासन और कानूनों की जानकारी राष्ट्रपति तक पहुंचाए।
▶ अध्याय 2 : संसद - साधारण (अनुच्छेद 79 - 88)
अनुच्छेद 79 - संसद का गठन :
भारत की संसद तीन अंगों- राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनेगी।
अनुच्छेद 80 - राज्यसभा की संरचना :
राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्य होंगे। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करेगा।
अनुच्छेद 81 - लोकसभा की संरचना :
लोकसभा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव से चुने गए प्रतिनिधियों से बनेगी।
अनुच्छेद 82 - प्रत्येक जनगणना के पश्चात पुनः समायोजन :
हर जनगणना के बाद चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण (Delimitation) किया जाएगा।
अनुच्छेद 83 - संसद के सदनों की अवधि :
राज्यसभा स्थायी सदन है। लोकसभा का कार्यकाल अपनी पहली बैठक से 5 वर्ष का होगा।
अनुच्छेद 84 - संसद की सदस्यता के लिए अर्हता :
उम्मीदवार भारत का नागरिक हो। लोकसभा के लिए न्यूनतम 25 वर्ष और राज्यसभा के लिए 30 वर्ष की आयु हो।
अनुच्छेद 85 - संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन :
राष्ट्रपति सत्र बुलाता है, सत्रावसान करता है और लोकसभा को भंग कर सकता है।
अनुच्छेद 86 - सदनों में अभिभाषण का और संदेश भेजने का राष्ट्रपति का अधिकार :
राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन में भाषण दे सकता है या संदेश भेज सकता है।
अनुच्छेद 87 - राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण :
आम चुनाव के बाद और हर साल के पहले सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति दोनों सदनों को एक साथ संबोधित करता है।
अनुच्छेद 88 - सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार :
मंत्री और महान्यायवादी संसद के किसी भी सदन में बोल सकते हैं, लेकिन महान्यायवादी मतदान नहीं कर सकता।
▶ संसद के अधिकारी (अनुच्छेद 89 - 98)
अनुच्छेद 89 - राज्यसभा का सभापति और उपसभापति :
उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होगा। राज्यसभा अपना उपसभापति चुनेगी।
अनुच्छेद 90 - उपसभापति का पद रिक्त होना या हटाया जाना :
वह सभापति को इस्तीफ़ा दे सकता है और राज्यसभा के बहुमत से हटाया जा सकता है।
अनुच्छेद 91 - उपसभापति की सभापति के रूप में कार्य करने की शक्ति :
सभापति का पद रिक्त होने पर उपसभापति सभापति के दायित्व निभाएगा।
अनुच्छेद 92 - हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने पर पीठासीन न होना :
सभापति या उपसभापति को हटाने का प्रस्ताव होने पर वे पीठासीन अधिकारी नहीं होंगे।
अनुच्छेद 93 - लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष :
लोकसभा अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष (Speaker) और एक उपाध्यक्ष चुनेगी।
अनुच्छेद 94 - अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना :
ये एक-दूसरे को त्यागपत्र दे सकते हैं और लोकसभा के बहुमत से हटाए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 95 - उपाध्यक्ष की अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की शक्ति :
अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग करेगा।
अनुच्छेद 96 - हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने पर पीठासीन न होना :
हटाने का प्रस्ताव सदन में होने पर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे।
अनुच्छेद 97 - सभापति, अध्यक्ष आदि के वेतन-भत्ते :
इन पीठासीन अधिकारियों के वेतन संसद द्वारा कानून बनाकर तय किए जाएंगे।
अनुच्छेद 98 - संसद का सचिवालय :
संसद के दोनों सदनों का अपना एक अलग सचिवालयी स्टाफ होगा।
▶ कार्य संचालन (अनुच्छेद 99 - 100)
अनुच्छेद 99 - संसद सदस्यों की शपथ :
प्रत्येक सदस्य सदन में बैठने से पहले राष्ट्रपति के समक्ष शपथ लेगा।
अनुच्छेद 100 - मतदान, रिक्तियां होने पर कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति :
बैठक के लिए 1/10 भाग (कोरम) उपस्थित होना अनिवार्य है। अध्यक्ष केवल 'टाई' होने पर वोट करेगा।
▶ सदस्यों की निरर्हताएं (अनुच्छेद 101 - 104)
अनुच्छेद 101 - स्थानों का रिक्त होना :
बिना अनुमति के 60 दिन तक गायब रहने पर सदन सीट खाली घोषित कर सकता है।
अनुच्छेद 102 - सदस्यता के लिए निरर्हताएं :
लाभ का पद, मानसिक विकृति, दिवालियापन या दलबदल (10वीं अनुसूची) के तहत अयोग्य पाए जाने पर सदस्यता रद्द होगी।
अनुच्छेद 103 - सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय :
दलबदल को छोड़कर सांसद की अयोग्यता पर अंतिम फैसला राष्ट्रपति (चुनाव आयोग की सलाह पर) करेगा।
अनुच्छेद 104 - शपथ से पहले बैठने या मतदान करने पर शास्ति :
बिना शपथ लिए बैठने पर 500 रुपये प्रतिदिन का जुर्माना लगेगा।
▶ संसद और उसके सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105 - 106)
अनुच्छेद 105 - संसद और उसके सदस्यों की शक्तियां व विशेषाधिकार :
सांसदों को सदन में कही गई बात या दिए गए वोट के लिए न्यायालय में पेश नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 106 - संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते :
सांसदों का वेतन संसद कानून बनाकर निर्धारित करेगी।
▶ विधायी प्रक्रिया (अनुच्छेद 107 - 111)
अनुच्छेद 107 - विधेयकों का पुरःस्थापन और पारित किया जाना :
धन विधेयक को छोड़कर साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।
अनुच्छेद 108 - संसद की संयुक्त बैठक :
साधारण बिल पर गतिरोध होने पर राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है (अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करेगा)।
अनुच्छेद 109 - धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया :
धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जाएगा। राज्यसभा इसे सिर्फ 14 दिन रोक सकती है।
अनुच्छेद 110 - धन विधेयक (Money Bill) की परिभाषा :
टैक्स लगाना या हटाना, भारत की संचित निधि से पैसे निकालना धन विधेयक माना जाएगा।
अनुच्छेद 111 - विधेयकों पर राष्ट्रपति की अनुमति :
राष्ट्रपति विधेयक पर हस्ताक्षर कर सकता है, रोक सकता है, या पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है।
▶ वित्तीय विषयों के संबंध में प्रक्रिया (अनुच्छेद 112 - 117)
अनुच्छेद 112 - वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) :
राष्ट्रपति हर वित्तीय वर्ष में सरकार की अनुमानित आय-व्यय का ब्योरा संसद में रखवाएगा, जिसे बजट कहते हैं।
अनुच्छेद 113 - संसद में प्राक्कलनों की प्रक्रिया :
खर्च का जो हिस्सा संचित निधि पर भारित है उस पर वोटिंग नहीं होगी। अन्य खर्चों के लिए अनुदान की मांग पर वोटिंग होती है।
अनुच्छेद 114 - विनियोग विधेयक :
भारत की संचित निधि से पैसा निकालने के लिए विनियोग विधेयक पास कराना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 115 - अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान :
बजट का पैसा कम पड़ने पर सरकार संसद में अनुपूरक अनुदान की मांग लाती है।
अनुच्छेद 116 - लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान :
बजट पास होने तक खर्च चलाने के लिए अग्रिम पैसा लेखानुदान (Vote on Account) के जरिए निकाला जाता है।
अनुच्छेद 117 - वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध :
अन्य राजस्व मामलों से जुड़े वित्तीय बिलों को पेश और पास कराने के नियम।
▶ साधारणतया प्रक्रिया (अनुच्छेद 118 - 122)
अनुच्छेद 118 - प्रक्रिया के नियम :
संसद का प्रत्येक सदन अपनी कार्यवाही चलाने के लिए नियम खुद बना सकता है।
अनुच्छेद 119 - संसद में वित्तीय कार्यों की प्रक्रिया का विनियमन :
वित्तीय कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए संसद कानून द्वारा प्रक्रिया तय कर सकती है।
अनुच्छेद 120 - संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा :
संसद का काम हिंदी या अंग्रेजी में किया जाएगा।
अनुच्छेद 121 - संसद में चर्चा पर निर्बंधन :
सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों के आधिकारिक आचरण पर संसद में चर्चा नहीं की जाएगी।
अनुच्छेद 122 - न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना :
संसद के भीतर की कार्यवाही पर कोई भी न्यायालय सवाल नहीं उठा सकता।
▶ अध्याय 3 : राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां (अनुच्छेद 123)
अनुच्छेद 123 - संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति :
संसद का सत्र न चलने पर राष्ट्रपति अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है। यह संसद सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह तक मान्य रहता है।
संघ की न्यायपालिका (Supreme Court) - अनुच्छेद 124 से 147
अनुच्छेद 124 - उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन :
भारत का एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) होगा। इसके जजों को केवल साबित कदाचार और असमर्थता के आधार पर संसद द्वारा ही हटाया जा सकता है।
अनुच्छेद 124A (124क) - राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग :
इसे 99वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर रद्द कर दिया है।
अनुच्छेद 124B (124ख) - आयोग के कृत्य (निरस्त) :
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्यों का वर्णन था, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद निष्प्रभावी कर दिया गया है।
अनुच्छेद 124C (124ग) - संसद की कानून बनाने की शक्ति (निरस्त) :
न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर संसद की कानून बनाने की शक्ति थी, जो अब समाप्त हो चुकी है।
अनुच्छेद 125 - न्यायाधीशों के वेतन आदि :
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को मिलने वाले वेतन, भत्ते और पेंशन संसद द्वारा कानून बनाकर तय किए जाएंगे।
अनुच्छेद 126 - कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति :
मुख्य न्यायाधीश (CJI) का पद खाली होने पर राष्ट्रपति किसी अन्य जज को कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (Acting CJI) नियुक्त कर सकता है।
अनुच्छेद 127 - तदर्थ (Ad-hoc) न्यायाधीशों की नियुक्ति :
सुप्रीम कोर्ट की बैठक के लिए कोरम पूरा न होने पर CJI राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से हाई कोर्ट के योग्य जजों को तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है।
अनुच्छेद 128 - सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति :
CJI राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों से सुप्रीम कोर्ट की बैठकों में काम करने का अनुरोध कर सकता है।
अनुच्छेद 129 - उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना :
सुप्रीम कोर्ट एक अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होगा। इसके फैसले सुरक्षित रखे जाएंगे और इसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति होगी।
अनुच्छेद 130 - उच्चतम न्यायालय का स्थान :
सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में स्थित होगा, लेकिन CJI राष्ट्रपति की मंजूरी से इसे किसी अन्य स्थान पर भी स्थापित कर सकता है।
अनुच्छेद 131 - उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता :
केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपसी कानूनी विवादों की सीधी सुनवाई (Original Jurisdiction) केवल सुप्रीम कोर्ट में ही होगी।
अनुच्छेद 131A (131क) - केंद्रीय विधियों की वैधता (निरस्त) :
इस अनुच्छेद को 43वें संविधान संशोधन (1977) द्वारा पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 132 - कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपीलों में अधिकारिता :
यदि किसी मामले में संविधान की व्याख्या का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न छिपा है, तो हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
अनुच्छेद 133 - सिविल मामलों में अपीलीय अधिकारिता :
हाई कोर्ट के किसी भी महत्वपूर्ण दीवानी (Civil) मामले के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार।
अनुच्छेद 134 - दांडिक (Criminal) मामलों में अपीलीय अधिकारिता :
यदि हाई कोर्ट ने किसी आरोपी को बरी करने का आदेश पलटकर मृत्युदंड (फांसी) दी हो, तो सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
अनुच्छेद 134A (134क) - अपील के लिए प्रमाण पत्र :
हाई कोर्ट अपने फैसले के बाद यह प्रमाण पत्र (Certificate) जारी करता है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के योग्य है या नहीं।
अनुच्छेद 135 - फेडरल कोर्ट की शक्तियों का प्रयोग :
संविधान लागू होने से पहले के फेडरल कोर्ट की सभी शक्तियां और अधिकार अब सुप्रीम कोर्ट के पास होंगे।
अनुच्छेद 136 - अपील के लिए विशेष इजाजत (SLP) :
सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति है कि वह देश की किसी भी अदालत (सैन्य अदालत छोड़कर) के फैसले के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) स्वीकार कर ले।
अनुच्छेद 137 - निर्णयों या आदेशों का पुनर्विलोकन :
सुप्रीम कोर्ट को अपने ही द्वारा दिए गए किसी भी फैसले या आदेश की समीक्षा (Judicial Review) करने का पूरा अधिकार है।
अनुच्छेद 138 - उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार :
संसद कानून बनाकर संघ सूची के विषयों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बढ़ा सकती है।
अनुच्छेद 139 - कुछ रिट जारी करने की शक्तियों का दिया जाना :
संसद कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट को मूल अधिकारों के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिट (Writs) जारी करने की शक्ति दे सकती है।
अनुच्छेद 139A (139क) - कुछ मामलों का अंतरण (Transfer of Cases) :
एक ही जैसे केस अगर अलग-अलग हाई कोर्ट्स में चल रहे हों, तो सुप्रीम कोर्ट उन्हें अपने पास मँगा सकता है या किसी अन्य हाई कोर्ट को सौंप सकता है।
अनुच्छेद 140 - उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियां :
संसद सुप्रीम कोर्ट को ऐसी पूरक शक्तियां (Ancillary Powers) दे सकती है जो उसे प्रभावी रूप से काम करने में मदद करें।
अनुच्छेद 141 - सुप्रीम कोर्ट का आदेश सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होना :
सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित किया गया कोई भी कानून भारत की सभी अदालतों पर अनिवार्य रूप से लागू होगा।
अनुच्छेद 142 - डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन (पूर्ण न्याय) :
सुप्रीम कोर्ट किसी लंबित मामले में पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने के लिए कोई भी आवश्यक आदेश जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 143 - सुप्रीम कोर्ट से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति :
सार्वजनिक महत्व के कानूनी प्रश्न पर राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकता है (राष्ट्रपति इस सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है)।
अनुच्छेद 144 - सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा सहायता :
देश के सभी दीवानी और न्यायिक अधिकारी सुप्रीम कोर्ट की सहायता में कार्य करेंगे।
अनुच्छेद 144A (144क) - विधियों की वैधता पर विशेष प्रावधान (निरस्त) :
इस अनुच्छेद को 43वें संविधान संशोधन (1977) द्वारा पूरी तरह हटा दिया गया है।
अनुच्छेद 145 - न्यायालय के नियम :
सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति की मंजूरी से अपने कामकाज और प्रक्रिया को चलाने के लिए नियम बना सकता है।
अनुच्छेद 146 - उच्चतम न्यायालय के अधिकारी, सेवक तथा व्यय :
सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारियों की नियुक्ति CJI करेगा और कोर्ट का सारा प्रशासनिक खर्च भारत की संचित निधि पर भारित होगा।
अनुच्छेद 147 - निर्वचन (Interpretation) :
इस अध्याय में संविधान की व्याख्या से संबंधित तकनीकी शब्दों को स्पष्ट किया गया है।
▶ अध्याय 5 : भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) - अनुच्छेद 148 से 151
अनुच्छेद 148 - भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक :
भारत का एक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) होगा, जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करेगा। रिटायरमेंट के बाद यह सरकार के अधीन कोई अन्य पद नहीं ले सकता।
अनुच्छेद 149 - नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कर्तव्य और शक्तियां :
यह अधिकारी केंद्र और राज्यों के सभी खर्चों (Accounts) की ऑडिटिंग (जांच) करेगा।
अनुच्छेद 150 - संघ और राज्यों के लेखाओं का प्ररूप :
केंद्र और राज्यों के खाते किस फॉर्मेट में रखे जाएंगे, इसका निर्धारण राष्ट्रपति CAG की सलाह पर करेगा।
अनुच्छेद 151 - संपरीक्षा प्रतिवेदन (Audit Reports) :
CAG अपनी ऑडिट रिपोर्ट राष्ट्रपति को (केंद्र के लिए) और राज्यपाल को (राज्यों के लिए) सौंपेगा, जो उसे संसद/विधानमंडल में रखवाएंगे।
भाग 6 : राज्य (The States) - अनुच्छेद 152 से 237
▶ अध्याय 1 : साधारण (अनुच्छेद 152)
अनुच्छेद 152 - परिभाषा :
इस भाग के प्रयोजनों के लिए 'राज्य' शब्द की प्रशासनिक परिभाषा दी गई है।
▶ अध्याय 2 : कार्यपालिका - राज्यपाल (अनुच्छेद 153 से 162)
अनुच्छेद 153 - राज्यों के राज्यपाल :
प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल (Governor) होगा। एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी बनाया जा सकता है।
अनुच्छेद 154 - राज्य की कार्यपालिका शक्ति :
राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी।
अनुच्छेद 155 - राज्यपाल की नियुक्ति :
राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
अनुच्छेद 156 - राज्यपाल की पदावधि :
राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of President) पद धारण करेगा। सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
अनुच्छेद 157 - राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अर्हताएं :
वह भारत का नागरिक हो और न्यूनतम आयु 35 वर्ष पूरी कर चुका हो।
अनुच्छेद 158 - राज्यपाल के पद के लिए शर्तें :
वह संसद या विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा और कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करेगा।
अनुच्छेद 159 - राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान :
राज्यपाल को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाएगा।
अनुच्छेद 160 - कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन :
संविधान में उल्लेखित न होने वाली स्थिति में राष्ट्रपति राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के नियम बना सकता है।
अनुच्छेद 161 - राज्यपाल की क्षमादान शक्ति :
राज्यपाल को राज्य के कानून के तहत सज़ा माफ़ करने की शक्ति है, परंतु वह मृत्युदंड और कोर्ट मार्शल की सज़ा को पूर्णतः माफ़ नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 162 - राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार :
राज्य की शक्ति वहां तक विस्तृत होगी जहां तक राज्य विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार है।
▶ मंत्रिपरिषद (अनुच्छेद 163 से 164)
अनुच्छेद 163 - राज्यपाल को सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद :
राज्यपाल को सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
अनुच्छेद 164 - मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध :
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा। मंत्री विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होंगे।
▶ राज्य का महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165 से 166)
अनुच्छेद 165 - राज्य का महाधिवक्ता (Advocate-General) :
यह राज्य सरकार का प्रथम विधि अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करता है।
अनुच्छेद 166 - राज्य की सरकार के कार्य का संचालन :
राज्य सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयां राज्यपाल के नाम से की हुई मानी जाएंगी।
अनुच्छेद 167 - मुख्यमंत्री के कर्तव्य :
मुख्यमंत्री प्रशासन और विधायी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को सूचित करेगा।
▶ अध्याय 3 : राज्य विधानमंडल - साधारण (अनुच्छेद 168 से 177)
अनुच्छेद 168 - राज्यों के विधान-मंडलों का गठन :
प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा जो राज्यपाल और एक या दो सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) से बनेगा।
अनुच्छेद 169 - राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन :
संसद कानून बनाकर किसी राज्य में विधान परिषद का निर्माण या समाप्ति कर सकती है।
अनुच्छेद 170 - विधान सभाओं की संरचना :
विधानसभा में अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 सदस्य हो सकते हैं।
अनुच्छेद 171 - विधान परिषदों की संरचना :
विधान परिषद के सदस्यों की संख्या विधानसभा की 1/3 से अधिक नहीं होगी और 40 से कम नहीं होगी।
अनुच्छेद 172 - राज्यों के विधान-मंडलों की अवधि :
विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है। विधान परिषद स्थायी सदन है।
अनुच्छेद 173 - विधान-मंडल की सदस्यता के लिए अर्हता :
विधानसभा के लिए 25 वर्ष और विधान परिषद के लिए 30 वर्ष न्यूनतम आयु होनी चाहिए।
अनुच्छेद 174 - सत्र, सत्रावसान और विघटन :
राज्यपाल सत्र बुलाता है, सत्रावसान करता है और विधानसभा को भंग कर सकता है।
अनुच्छेद 175 - सदन में अभिभाषण और संदेश भेजने का अधिकार :
राज्यपाल विधानमंडल के किसी भी सदन में भाषण दे सकता है।
अनुच्छेद 176 - राज्यपाल का विशेष अभिभाषण :
आम चुनाव के बाद और हर साल के पहले सत्र की शुरुआत में राज्यपाल विशेष रूप से संबोधित करता है।
अनुच्छेद 177 - मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार :
मंत्री और महाधिवक्ता कार्यवाही में बोल सकते हैं, लेकिन महाधिवक्ता मतदान नहीं कर सकता।
▶ राज्य विधानमंडल के अधिकारी (अनुच्छेद 178 - 187)
अनुच्छेद 178 - विधान सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष :
विधानसभा अपने सदस्यों में से ही एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी।
अनुच्छेद 179 - अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना :
ये एक-दूसरे को इस्तीफा दे सकते हैं, या बहुमत से हटाए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 180 - उपाध्यक्ष की अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की शक्ति :
अध्यक्ष का पद खाली होने पर उपाध्यक्ष अध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग करेगा।
अनुच्छेद 181 - हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने पर पीठासीन न होना :
अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव के दौरान वे पीठासीन अधिकारी नहीं होंगे।
अनुच्छेद 182 - विधान परिषद का सभापति और उपसभापति :
विधान परिषद अपने सदस्यों में से ही एक सभापति और उपसभापति चुनेगी।
अनुच्छेद 183 - सभापति/उपसभापति का पद रिक्त होना :
वे इस्तीफ़ा दे सकते हैं या बहुमत से हटाए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 184 - उपसभापति की सभापति के रूप में कार्य करने की शक्ति :
सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति सभापति का कार्य करेगा।
अनुच्छेद 185 - हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने पर पीठासीन न होना :
सभापति/उपसभापति निष्कासन प्रस्ताव के दौरान अध्यक्षता नहीं करेंगे।
अनुच्छेद 186 - पीठासीन अधिकारियों के वेतन-भत्ते :
इन अधिकारियों के वेतन राज्य विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर तय होंगे।
अनुच्छेद 187 - राज्य विधान-मंडल का सचिवालय :
विधानमंडल का एक स्वतंत्र सचिवालयी स्टाफ होगा।
▶ कार्य का संचालन (अनुच्छेद 188 - 189)
अनुच्छेद 188 - सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान :
प्रत्येक सदस्य राज्यपाल के समक्ष शपथ ग्रहण करेगा।
अनुच्छेद 189 - मतदान और गणपूर्ति (Quorum) :
बैठक के लिए 1/10 भाग या 10 सदस्य उपस्थित होना अनिवार्य है।
▶सदस्यों की निरर्हताएं (अनुच्छेद 190 - 193)
अनुच्छेद 190 - स्थानों का रिक्त होना :
कोई सदस्य बिना अनुमति 60 दिन तक अनुपस्थित रहे तो सीट खाली मानी जाएगी।
अनुच्छेद 191 - सदस्यता के लिए निरर्हताएं :
लाभ का पद, दिवालियापन या दलबदल के आधार पर सदस्यता रद्द होगी।
अनुच्छेद 192 - अयोग्यता पर प्रश्नों का विनिश्चय :
अयोग्यता पर अंतिम फैसला राज्यपाल (चुनाव आयोग की सलाह पर) करेगा।
अनुच्छेद 193 - शपथ से पहले बैठने पर जुर्माना :
बिना शपथ कार्यवाही में भाग लेने पर 500 रुपये प्रतिदिन का जुर्माना लगेगा।
▶ विधान-मंडलों और सदस्यों की शक्तियां व विशेषाधिकार (अनुच्छेद 194 - 195)
अनुच्छेद 194 - विशेषाधिकार :
सदन में कही गई बात के लिए विधायक को न्यायालय में पेश नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 195 - सदस्यों के वेतन और भत्ते :
विधायकों के वेतन विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर तय किए जाएंगे।
▶ विधायी प्रक्रिया (अनुच्छेद 196 - 201)
अनुच्छेद 196 - विधेयकों का पुरःस्थापन :
धन विधेयक को छोड़कर साधारण बिल किसी भी सदन में पेश किया जा सकता।
अनुच्छेद 197 - विधान परिषद की शक्तियों पर निर्बंधन :
विधान परिषद किसी साधारण बिल को अधिकतम 4 महीने (3+1) तक ही रोक सकती है।
अनुच्छेद 198 - धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया :
धन विधेयक विधान परिषद में पेश नहीं होगा। वह इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है।
अनुच्छेद 199 - धन विधेयक की परिभाषा :
राज्यों के लिए धन विधेयक की परिभाषा इसमें है (अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष का)।
अनुच्छेद 200 - विधेयकों पर अनुमति :
राज्यपाल बिल पर हस्ताक्षर कर सकता है, रोक सकता है, या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकता है।
अनुच्छेद 201 - विचार के लिए आरक्षित विधेयक :
राज्यपाल द्वारा भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति अनुमति दे सकता है या रोक सकता है।
▶ वित्तीय विषयों के संबंध में प्रक्रिया (अनुच्छेद 202 - 207)
अनुच्छेद 202 - वार्षिक वित्तीय विवरण (State Budget) :
राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष में राज्य के आय-व्यय का विवरण (बजट) विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा।
अनुच्छेद 203 - विधान-मंडल में प्राक्कलनों की प्रक्रिया :
राज्य की संचित निधि पर 'भारित खर्च' पर वोटिंग नहीं होगी। अन्य खर्चों के लिए अनुदान की मांग पर वोटिंग होगी।
अनुच्छेद 204 - विनियोग विधेयक :
राज्य की संचित निधि से पैसे निकालने के लिए विनियोग विधेयक पास कराना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 205 - अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान :
बजट का पैसा कम पड़ने पर सरकार अनुपूरक अनुदान मांग सकती है।
अनुच्छेद 206 - लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान :
बजट पास होने से पहले खर्च चलाने के लिए लेखानुदान (Vote on Account) पेश किया जाता है।
अनुच्छेद 207 - वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध :
धन विधेयक के अलावा अन्य वित्तीय विधेयकों की प्रक्रिया इसमें दी गई है।
▶ साधारणतया प्रक्रिया (अनुच्छेद 208 - 212)
अनुच्छेद 208 - प्रक्रिया के नियम :
विधानमंडल का सदन अपनी कार्यवाही चलाने के लिए नियम बना सकता है।
अनुच्छेद 209 - वित्तीय कार्यों का विनियमन :
विधानमंडल वित्तीय कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए प्रक्रिया तय कर सकता है।
अनुच्छेद 210 - विधान-मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा :
कामकाज राज्य की राजभाषा, हिंदी या अंग्रेजी में किया जाएगा।
अनुच्छेद 211 - विधान-मंडल में चर्चा पर निर्बंधन :
सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों के आचरण पर राज्य विधानमंडल में चर्चा नहीं हो सकती।
अनुच्छेद 212 - न्यायालयों का हस्तक्षेप नहीं :
राज्य विधानमंडल की कार्यवाही की वैधता की जांच कोई भी न्यायालय नहीं कर सकता।
▶ अध्याय 4 : राज्यपाल की विधायी शक्तियां (अनुच्छेद 213)
अनुच्छेद 213 - राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति :
विधानमंडल का सत्र न चलने पर राज्यपाल अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है। इसका प्रभाव कानून के समान होता है और सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह तक मान्य रहता है।
▶ अध्याय 5 : राज्यों के उच्च न्यायालय (High Courts) - अनुच्छेद 214 से 232
अनुच्छेद 214 - राज्यों के लिए उच्च न्यायालय :
इसमें स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया गया है कि भारत के प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय (High Court) होगा।
अनुच्छेद 215 - उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना :
सुप्रीम कोर्ट की तरह प्रत्येक हाई कोर्ट भी एक अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होगा, जिसके निर्णयों को सुरक्षित रखा जाएगा और इसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति होगी।
अनुच्छेद 216 - उच्च न्यायालयों का गठन :
प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और ऐसे अन्य न्यायाधीश होंगे जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
अनुच्छेद 217 - न्यायाधीश की नियुक्ति और पद की शर्तें :
हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा CJI और संबंधित राज्यपाल के परामर्श से होगी। इनकी सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष होती है।
अनुच्छेद 218 - उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ उपबंधों का उच्च न्यायालयों को लागू होना :
सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने (महाभियोग) की प्रक्रिया उच्च न्यायालयों के जजों पर भी समान रूप से लागू होती है।
अनुच्छेद 219 - न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान :
हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद ग्रहण करने से पहले उस राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेंगे।
अनुच्छेद 220 - स्थायी न्यायाधीश होने के पश्चात विधि-व्यवसाय पर निर्बंधन :
हाई कोर्ट का रिटायर्ड स्थायी जज, सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाई कोर्ट को छोड़कर भारत की किसी अन्य निचली अदालत में वकालत नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 221 - न्यायाधीशों के वेतन आदि :
उच्च न्यायालय के जजों के वेतन, भत्ते और पेंशन संसद द्वारा कानून बनाकर तय किए जाएंगे और इन्हें कार्यकाल के दौरान कम नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 222 - एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में अंतरण :
राष्ट्रपति CJI से परामर्श करने के पश्चात किसी जज का एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर (Transfer) कर सकता है।
अनुच्छेद 223 - कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति :
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त होने पर राष्ट्रपति अन्य जजों में से किसी को कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (Acting CJI) नियुक्त कर सकता है।
अनुच्छेद 224 - अपर और कार्यकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति :
काम का बोझ अधिक होने पर राष्ट्रपति अधिकतम दो वर्ष के लिए अपर (Additional) न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सकता है।
अनुच्छेद 224A (224क) - बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति :
हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की सहमति से रिटायर्ड जज से काम करने का अनुरोध कर सकता है।
अनुच्छेद 225 - विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता :
संविधान के लागू होने से पहले से काम कर रहे उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र वैसा ही बना रहेगा।
अनुच्छेद 226 - कुछ रिट निकालने की उच्च न्यायालय की शक्ति :
मौलिक अधिकारों या अन्य कानूनी अधिकारों के हनन पर हाई कोर्ट को 5 प्रकार की रिट जारी करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है (यह शक्ति सुप्रीम कोर्ट से भी अधिक विस्तृत है)।
अनुच्छेद 226A (226क) - केंद्रीय विधियों की संवैधानिक वैधता पर विचार (निरस्त) :
इस अनुच्छेद को 43वें संविधान संशोधन (1977) द्वारा पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 227 - सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति :
प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के सभी अधीनस्थ न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति होगी।
अनुच्छेद 228 - कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण :
यदि हाई कोर्ट को लगे कि निचली अदालत के केस में संविधान की व्याख्या का प्रश्न शामिल है, तो वह उसे अपने पास ट्रांसफर कर सकता है।
अनुच्छेद 228A (228क) - राज्य विधियों की वैधता (निरस्त) :
इसे भी 43वें संविधान संशोधन (1977) द्वारा हटा दिया गया है।
अनुच्छेद 229 - अधिकारी और सेवक तथा व्यय :
हाई कोर्ट के कर्मचारियों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश करेगा और खर्च राज्य की संचित निधि पर भारित होगा।
अनुच्छेद 230 - अधिकारिता का संघ राज्यक्षेत्रों पर विस्तार :
संसद कानून बनाकर किसी हाई कोर्ट का अधिकार क्षेत्र किसी केंद्र शासित प्रदेश (UT) पर बढ़ा या घटा सकती है।
अनुच्छेद 231 - दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय :
संसद कानून बनाकर दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है (जैसे- पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट)।
अनुच्छेद 232 - व्याख्या (निरस्त) :
इसे 7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
▶ अध्याय 6 : अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts) - अनुच्छेद 233 से 237
अनुच्छेद 233 - जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति :
जिला न्यायाधीशों (District Judges) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा हाई कोर्ट के परामर्श से की जाएगी।
अनुच्छेद 233A (233क) - जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों का विधिमान्यकरण :
कुछ विशेष परिस्थितियों में पहले की गई जिला जजों की नियुक्तियों को वैध (Validate) ठहराने का प्रावधान।
अनुच्छेद 234 - न्यायिक सेवा में अन्य व्यक्तियों की भर्ती :
जिला जज के नीचे के पदों पर नियुक्तियां राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) और हाई कोर्ट की सलाह पर की जाएंगी।
अनुच्छेद 235 - अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण :
जिला और निचली अदालतों के जजों की पदस्थापना और छुट्टी पर पूरा नियंत्रण हाई कोर्ट के पास होगा।
अनुच्छेद 236 - निर्वचन (Interpretation) :
इसमें 'जिला न्यायाधीश' और 'न्यायिक सेवा' जैसे शब्दों की परिभाषा दी गई है।
अनुच्छेद 237 - मजिस्ट्रेटों पर लागू होना :
राज्यपाल अधिसूचना द्वारा इन नियमों को राज्य के किसी भी मजिस्ट्रेट वर्ग पर लागू कर सकता है।
भाग 7 : पहली अनुसूची के भाग ख के राज्य (निरस्त)
अनुच्छेद 238 - भाग ख के राज्यों पर नियमों का लागू होना (निरस्त) :
देशी रियासतों से बने राज्यों से संबंधित इस भाग को 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) द्वारा पूरी तरह से निरस्त (रद्द) कर दिया गया है।
भाग 8 : संघ राज्यक्षेत्र (Union Territories) - अनुच्छेद 239 से 242
अनुच्छेद 239 - संघ राज्यक्षेत्रों का प्रशासन :
प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश (UT) का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा (प्रशासक या उपराज्यपाल के माध्यम से) चलाया जाएगा।
अनुच्छेद 239A (239क) - स्थानीय विधान-मंडलों या मंत्रि-परिषदों का सृजन :
संसद कानून बनाकर पुडुचेरी आदि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए विधानसभा या मंत्रिपरिषद बना सकती है।
अनुच्छेद 239AA (239कक) - दिल्ली के संबंध में विशेष उपबंध :
69वें संशोधन द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) का दर्जा दिया गया और वहां विधानसभा व मुख्यमंत्री पद बनाया गया।
अनुच्छेद 239AB (239कख) - संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध :
दिल्ली में प्रशासन विफल होने पर राष्ट्रपति वहां की विधानसभा निलंबित कर प्रशासन अपने हाथ में (राष्ट्रपति शासन) ले सकता है।
अनुच्छेद 239B (239ख) - विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की प्रशासक की शक्ति :
जिन UT में विधानसभा है, वहां का प्रशासक सत्र न चलने पर राष्ट्रपति की मंजूरी से अध्यादेश जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 240 - विनियम बनाने की राष्ट्रपति की शक्ति :
राष्ट्रपति को अंडमान, लक्षद्वीप, लद्दाख आदि UTs में सुशासन के लिए नियम (Regulations) बनाने की विशेष शक्ति प्राप्त है।
अनुच्छेद 241 - संघ राज्यक्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय :
संसद कानून बनाकर किसी UT के लिए एक अलग हाई कोर्ट स्थापित कर सकती है (जैसे दिल्ली का अपना हाई कोर्ट है)।
अनुच्छेद 242 - कुर्ग राज्य (निरस्त) :
पुराने 'कुर्ग' क्षेत्र से संबंधित इस प्रावधान को 7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा समाप्त कर दिया गया है।
भाग 9 : पंचायतें (The Panchayats) - अनुच्छेद 243 से 243O
▶ पंचायत व्यवस्था (अनुच्छेद 243 से 243 A से O तक)
अनुच्छेद 243 - परिभाषाएं :
इस भाग के तहत 'ग्राम सभा', 'पंचायत', 'जिला', और 'जनसंख्या' जैसे शब्दों की स्पष्ट परिभाषाएं दी गई हैं।
अनुच्छेद 243A (243क) - ग्राम सभा :
ग्राम स्तर पर पंचायत क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत सभी मतदाताओं से मिलकर एक ग्राम सभा बनेगी।
अनुच्छेद 243B (243ख) - पंचायतों का गठन :
प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर त्रि-स्तरीय पंचायतों का गठन किया जाएगा (20 लाख से कम आबादी वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर अनिवार्य नहीं)।
अनुच्छेद 243C (243ग) - पंचायतों की संरचना :
तीनों स्तर की पंचायतों के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से किया जाएगा।
अनुच्छेद 243D (243घ) - स्थानों का आरक्षण :
पंचायतों में अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) के लिए जनसंख्या के अनुपात में तथा महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) आरक्षण अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243E (243ङ) - पंचायतों की अवधि :
पंचायतों का कार्यकाल अपनी प्रथम बैठक से 5 वर्ष का होगा। भंग होने पर 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243F (243च) - सदस्यता के लिए निरर्हताएं :
पंचायत चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।
अनुच्छेद 243G (243छ) - पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व :
राज्य विधानमंडल पंचायतों को 11वीं अनुसूची के 29 विषयों पर आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाने की शक्ति देगा।
अनुच्छेद 243H (243ज) - कर अधिरोपित करने की शक्तियां और निधियां :
राज्य विधानमंडल कानून बनाकर पंचायतों को टैक्स, शुल्क और पथकर (Tolls) लगाने और वसूलने का अधिकार दे सकता है।
अनुच्छेद 243I (243झ) - वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग :
राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा।
अनुच्छेद 243J (243ञ) - पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा :
राज्य विधानमंडल पंचायतों के खातों के रखरखाव और उनके ऑडिट (जांच) के लिए नियम बनाएगा।
अनुच्छेद 243K (243ट) - पंचायतों के लिए निर्वाचन :
पंचायतों के चुनाव का संचालन, निर्देशन और नियंत्रण एक स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) करेगा।
अनुच्छेद 243L (243ठ) - संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना :
राष्ट्रपति तय करेगा कि पंचायतों के ये नियम किसी केंद्र शासित प्रदेश (UT) पर किन अपवादों के साथ लागू होंगे।
अनुच्छेद 243M (243ड) - इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना :
यह भाग नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और संविधान की छठी अनुसूची वाले जनजातीय क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है।
अनुच्छेद 243N (243ढ) - विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना :
73वें संशोधन के लागू होने से पूर्व के पंचायत कानून अधिकतम 1 वर्ष तक लागू रह सकेंगे।
अनुच्छेद 243O (243ण) - निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन :
पंचायत चुनाव के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या सीटों के आवंटन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
▶ भाग 9A (9क) : नगरपालिकाएं (The Municipalities) - अनुच्छेद 243P से 243ZG
अनुच्छेद 243P (243त) - परिभाषाएं :
इस भाग के तहत 'महानगर क्षेत्र', 'नगरपालिका' और 'वार्ड समिति' शब्दों को परिभाषित किया गया है।
अनुच्छेद 243Q (243थ) - नगरपालिकाओं का गठन :
प्रत्येक राज्य में नगर पंचायत (संक्रमणकालीन क्षेत्र), नगर पालिका परिषद (छोटे शहर) और नगर निगम (बड़े शहर) का गठन होगा।
अनुच्छेद 243R (243द) - नगरपालिकाओं की संरचना :
नगरपालिका के सभी सदस्य उस क्षेत्र के वार्डों से सीधे चुनाव द्वारा चुने जाएंगे।
अनुच्छेद 243S (243ध) - वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना :
3 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में वार्ड समितियां बनाई जाएंगी।
अनुच्छेद 243T (243न) - स्थानों का आरक्षण :
नगरपालिकाओं में SC/ST के लिए जनसंख्या के अनुपात में और महिलाओं के लिए 1/3 सीटों का आरक्षण अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243U (243प) - नगरपालिकाओं की अवधि :
इनका कार्यकाल 5 वर्ष का होगा, और समय-पूर्व विघटन होने पर 6 माह में नए चुनाव होंगे।
अनुच्छेद 243V (243फ) - सदस्यता के लिए निरर्हताएं :
नगरपालिका का चुनाव लड़ने के लिए भी न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है।
अनुच्छेद 243W (243ब) - नगरपालिकाओं की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व :
राज्य विधानमंडल इन्हें 12वीं अनुसूची के 18 विषयों पर स्वशासन की शक्तियां सौंपेगा।
अनुच्छेद 243X (243भ) - कर अधिरोपित करने की शक्तियां :
नगरपालिकाओं को टैक्स और शुल्क लगाने, वसूलने और खर्च करने का अधिकार दिया जाएगा।
अनुच्छेद 243Y (243म) - वित्त आयोग :
अनुच्छेद 243I के तहत बना राज्य वित्त आयोग ही नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा।
अनुच्छेद 243Z (243य) - नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा :
इनके खातों के ऑडिट की व्यवस्था राज्य विधानमंडल करेगा।
अनुच्छेद 243ZA (243यक) - नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन :
राज्य निर्वाचन आयोग ही नगरपालिकाओं के सभी चुनाव का नियंत्रण करेगा।
अनुच्छेद 243ZB (243यख) - संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना :
राष्ट्रपति तय करेगा कि ये नियम किसी केंद्र शासित प्रदेश पर किस तरह लागू होंगे।
अनुच्छेद 243ZC (243यग) - कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना :
यह भाग अनुसूचित/जनजातीय क्षेत्रों तथा दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद क्षेत्र पर लागू नहीं होगा।
अनुच्छेद 243ZD (243यघ) - जिला योजना के लिए समिति :
प्रत्येक जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं की योजनाओं को मिलाने के लिए एक जिला योजना समिति (DPC) बनेगी।
अनुच्छेद 243ZE (243यङ) - महानगर योजना के लिए समिति :
10 लाख या उससे अधिक आबादी वाले महानगर क्षेत्र में एक महानगर योजना समिति (MPC) का गठन किया जाएगा।
अनुच्छेद 243ZF (243यच) - विद्यमान विधियों और नगरपालिकाओं का बना रहना :
संशोधन से पूर्व के कानून अधिकतम 1 वर्ष तक लागू रह सकेंगे।
अनुच्छेद 243ZG (243यछ) - निर्वाचन मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन :
नगरपालिका चुनाव और वार्ड परिसीमन के मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर पूर्ण रोक है।
▶ भाग 9B (9ख) : सहकारी समितियां (Co-operative Societies) - अनुच्छेद 243ZH से 243ZT
अनुच्छेद 243ZH - परिभाषाएं :
इस भाग में सहकारी समिति, बोर्ड और पदाधिकारियों की परिभाषा दी गई है (इसे 97वें संशोधन, 2011 द्वारा जोड़ा गया)।
अनुच्छेद 243ZI - सहकारी समितियों का निगमन :
राज्य विधानमंडल स्वैच्छिक गठन और लोकतांत्रिक नियंत्रण के आधार पर सहकारी समितियों के निगमन के लिए कानून बनाएगा।
अनुच्छेद 243ZJ - बोर्ड के सदस्यों की संख्या और शर्तें :
सहकारी समिति के बोर्ड में निदेशकों की अधिकतम संख्या 21 होगी। SC/ST के लिए 1 सीट और महिलाओं के लिए 2 सीटें आरक्षित होंगी।
अनुच्छेद 243ZK - बोर्ड के सदस्यों का निर्वाचन :
सहकारी समिति के बोर्ड का कार्यकाल 5 वर्ष होगा और चुनाव का संचालन राज्य विधानमंडल द्वारा तय प्राधिकारी करेगा।
अनुच्छेद 243ZL - बोर्ड का अधिक्रमण और निलंबन :
कुछ विशेष परिस्थितियों में बोर्ड को अधिकतम 6 महीने के लिए (बैंकों के मामले में 1 वर्ष) निलंबित किया जा सकता है।
अनुच्छेद 243ZM - सहकारी समितियों के लेखाओं की संपरीक्षा :
प्रत्येक सहकारी समिति के खातों का प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम से कम एक बार ऑडिट (Audit) कराना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243ZN - साधारण सभा की बैठक बुलाना :
वित्तीय वर्ष समाप्त होने के 6 महीने के भीतर वार्षिक साधारण सभा की बैठक बुलाना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243ZO - सूचना जानने का सदस्य का अधिकार :
समिति के सदस्यों को उसके कामकाज और खातों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 243ZP - विवरणियां (Returns) :
प्रत्येक सहकारी समिति वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 6 माह के भीतर राज्य सरकार को अपनी वार्षिक रिपोर्ट (Return) दाखिल करेगी।
अनुच्छेद 243ZQ - अपराध और शास्तियां (Penalties) :
समिति के चुनाव या ऑडिट में धोखाधड़ी करने वालों के लिए विधानमंडल दंड का प्रावधान करेगा।
अनुच्छेद 243ZR - बहु-राज्य सहकारी समितियों को लागू होना :
इस भाग के प्रावधान मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटीज़ पर भी लागू होंगे, जहाँ 'राज्य विधानमंडल' का अर्थ 'संसद' होगा।
अनुच्छेद 243ZS - संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना :
राष्ट्रपति तय कर सकता है कि यह भाग किसी केंद्र शासित प्रदेश पर लागू होगा या नहीं।
अनुच्छेद 243ZT - विद्यमान विधियों का बना रहना :
संशोधन से पहले के कानून अधिकतम 1 वर्ष तक लागू रह सकेंगे।
भाग 10 : अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र (अनुच्छेद 244 - 244A)
अनुच्छेद 244 - अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन :
5वीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन और 6वीं अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा व मिजोरम के जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन होगा।
अनुच्छेद 244A (244क) - असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को मिलाकर स्वशासी राज्य बनाना :
संसद कानून बनाकर असम के कुछ आदिवासी इलाकों को मिलाकर एक स्वायत्त (Autonomous) राज्य बना सकती है।
भाग 11 : संघ और राज्यों के बीच संबंध (अनुच्छेद 245 - 263)
▶ अध्याय 1 : विधायी संबंध (Legislative Relations) - अनुच्छेद 245 से 255
अनुच्छेद 245 - विधियों का विस्तार :
संसद पूरे भारत के लिए कानून बना सकती है, जबकि राज्य विधानमंडल केवल अपने राज्य के लिए कानून बना सकता है।
अनुच्छेद 246 - विधियों की विषय-वस्तु (सातवीं अनुसूची) :
संघ सूची पर संसद, राज्य सूची पर राज्य विधानमंडल और समवर्ती सूची पर दोनों कानून बना सकते हैं।
अनुच्छेद 246A (246क) - माल और सेवा कर (GST) के संबंध में विशेष उपबंध :
101वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया यह अनुच्छेद संसद और राज्य दोनों को GST पर कानून बनाने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 247 - कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना :
संसद अपने कानूनों को बेहतर लागू कराने के लिए अतिरिक्त अदालतें स्थापित कर सकती है।
अनुच्छेद 248 - अवशिष्ट विधायी शक्तियां (Residuary Powers) :
जो विषय तीनों सूचियों में नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास होगी।
अनुच्छेद 249 - राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून :
यदि राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करे, तो संसद राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के विषय पर 1 साल के लिए कानून बना सकती है।
अनुच्छेद 250 - आपातकाल में राज्य सूची पर कानून :
राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के किसी भी विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है।
अनुच्छेद 251 - अनुच्छेद 249 और 250 के कानूनों में असंगति :
संसद द्वारा 249/250 के तहत बनाए गए कानून और राज्य के कानून में टकराव होने पर संसद का कानून हावी होगा।
अनुच्छेद 252 - राज्यों की सहमति से कानून बनाना :
यदि दो या अधिक राज्य सहमत हों, तो संसद उनके लिए राज्य सूची के विषयों पर संयुक्त कानून बना सकती है।
अनुच्छेद 253 - अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान :
अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
अनुच्छेद 254 - विधियों में असंगति :
समवर्ती सूची पर बने संसद और राज्य के कानून में टकराव होने पर संसद का कानून ही मान्य होगा।
अनुच्छेद 255 - सिफारिशों का केवल प्रक्रिया का विषय होना :
राष्ट्रपति/राज्यपाल की पूर्व मंजूरी न लेने जैसी प्रक्रियात्मक भूलों के कारण कोई कानून अवैध नहीं होगा।
▶ अध्याय 2 : प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations) - अनुच्छेद 256 से 263
अनुच्छेद 256 - राज्यों की और संघ की बाध्यता :
प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा कि संसदीय कानूनों का पालन सुनिश्चित हो।
अनुच्छेद 257 - कुछ दशाओं में राज्यों पर संघ का नियंत्रण :
केंद्र सरकार राज्यों को रेलवे और राष्ट्रीय महत्व के संचार साधनों की रक्षा के लिए निर्देश दे सकती है।
अनुच्छेद 258 - राज्यों को शक्ति प्रदान करने की संघ की शक्ति :
राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से संघ के कुछ कार्य राज्य सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकता है।
अनुच्छेद 258A (258क) - संघ को कृत्य सौंपने की राज्यों की शक्ति :
राज्य का राज्यपाल केंद्र सरकार की सहमति से राज्य के कुछ कार्य भारत सरकार को सौंप सकता है।
अनुच्छेद 259 - भाग ख राज्यों के सशस्त्र बल (निरस्त) :
इस अनुच्छेद को 7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा पूर्णतः निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 260 - भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता :
भारत सरकार किसी समझौते के तहत विदेशी क्षेत्र में भी अपने विधायी और प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग कर सकती है।
अनुच्छेद 261 - सार्वजनिक कार्य, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियां :
संघ और राज्यों के सभी सार्वजनिक दस्तावेजों और अदालती फैसलों को पूरे देश में पूरी मान्यता (Full Faith and Credit) दी जाएगी।
अनुच्छेद 262 - अंतरराज्यिक नदियों के जल विवादों का न्यायनिर्णयन :
संसद दो या अधिक राज्यों के बीच बहने वाली नदी के जल बंटवारे के विवादों को सुलझाने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बना सकती है।
अनुच्छेद 263 - अंतरराज्यिक परिषद के संबंध में उपबंध :
केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति एक अंतरराज्यीय परिषद (Inter-State Council) का गठन कर सकता है।
भाग 12 : वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद (Finance, Property, Contracts and Suits) - अनुच्छेद 264 से 300A
▶ अध्याय 1 : वित्त (Finance) - साधारण (अनुच्छेद 264 से 267)
अनुच्छेद 264 - निर्वचन :
इस भाग में प्रयोग किए गए 'वित्त आयोग' जैसे शब्दों की व्याख्या (Interpretation) दी गई है।
अनुच्छेद 265 - विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना :
कोई भी कर (Tax) कानून के अधिकार के बिना न तो लगाया जाएगा और न ही वसूला जाएगा।
अनुच्छेद 266 - भारत और राज्यों की संचित निधियां और लोक लेखे :
सरकार को मिलने वाला सारा राजस्व संचित निधि (Consolidated Fund) में जमा होगा। बिना संसद/विधानमंडल की अनुमति के इससे पैसा नहीं निकाला जा सकता।
अनुच्छेद 267 - आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) :
अचानक आने वाले खर्चों (जैसे आपदा) से निपटने के लिए संसद केंद्र में और विधानमंडल राज्यों में आकस्मिकता निधि स्थापित करेगा, जो राष्ट्रपति/राज्यपाल के अधिकार में होगी।
▶ संघ और राज्यों के बीच राजस्वों का वितरण (अनुच्छेद 268 से 281)
अनुच्छेद 268 - संघ द्वारा लगाए जाने वाले परंतु राज्यों द्वारा संग्रहित और विनियोजित किए जाने वाले शुल्क :
स्टाम्प शुल्क आदि केंद्र द्वारा लगाए जाते हैं, लेकिन राज्य इन्हें वसूलते और इस्तेमाल करते हैं।
अनुच्छेद 268A (268क) - सेवा कर (निरस्त) :
सेवा कर (Service Tax) से संबंधित इस अनुच्छेद को 101वें संविधान संशोधन (GST लागू होने पर) द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 269 - संघ द्वारा लगाए और संग्रहित किए जाने वाले किंतु राज्यों को सौंपे जाने वाले कर :
अंतरराज्यीय व्यापार के दौरान वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर टैक्स केंद्र लगाता है और वसूलता है, लेकिन इसे राज्यों को सौंप दिया जाता है।
अनुच्छेद 269A (269क) - अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान GST की उगाही और विभाजन :
101वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया। दो राज्यों के बीच व्यापार पर IGST (Integrated GST) केंद्र लगाएगा और वसूलेगा, तथा इसे केंद्र और राज्यों में बाँटा जाएगा।
अनुच्छेद 270 - लगाए गए करों का संघ और राज्यों के बीच वितरण :
आयकर (Income Tax) जैसे कर जो केंद्र लगाता है, उनका राजस्व केंद्र और राज्यों के बीच वित्त आयोग की सलाह पर बांटा जाएगा।
अनुच्छेद 271 - संघ के प्रयोजनों के लिए कुछ शुल्कों और करों पर अधिभार (Surcharge) :
संसद कुछ करों पर अधिभार लगा सकती है, और यह सारा अधिभार केवल केंद्र सरकार के पास रहेगा (राज्यों को हिस्सा नहीं मिलेगा)।
अनुच्छेद 272 - कर जो संघ द्वारा लगाए/संग्रहित किए जाते हैं (निरस्त) :
80वें संविधान संशोधन (2000) द्वारा इसे निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 273 - जूट और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के स्थान पर अनुदान :
जूट उत्पादक राज्यों (असम, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल) को इसके निर्यात शुल्क के बदले केंद्र से सहायता अनुदान मिलेगा।
अनुच्छेद 274 - कराधान पर प्रभाव डालने वाले विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश :
ऐसा कोई भी बिल जिससे राज्यों के हित जुड़े हों, संसद में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश से ही पेश किया जा सकता है।
अनुच्छेद 275 - कुछ राज्यों को संघ से अनुदान (Grants) :
संसद कानून बनाकर जरूरतमंद राज्यों को केंद्र की संचित निधि से सहायता अनुदान (Grants-in-aid) दे सकती है।
अनुच्छेद 276 - वृत्तियों, व्यापारों, आजीविकाओं और रोजगारों पर कर :
राज्य सरकारें या स्थानीय निकाय व्यापार और रोजगार पर टैक्स लगा सकते हैं, लेकिन यह 2,500 रुपये प्रति वर्ष से अधिक नहीं होगा।
अनुच्छेद 277 - व्यावृत्ति (Savings) :
संविधान लागू होने से पहले जो कर राज्य या स्थानीय निकाय वसूल रहे थे, वे तब तक वैध रहेंगे जब तक संसद कोई नया कानून न बनाए।
अनुच्छेद 278 - वित्तीय समझौतों के बारे में प्रावधान (निरस्त) :
7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा इसे पूर्णतः निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 279 - "शुद्ध आगम" (Net Proceeds) की गणना :
किसी कर का शुद्ध आगम (वसूलने के खर्च को घटाकर) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा प्रमाणित किया जाएगा।
अनुच्छेद 279A (279क) - माल और सेवा कर परिषद (GST Council) :
101वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया। राष्ट्रपति एक GST परिषद का गठन करेगा, जिसका अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होगा। यह GST से जुड़े सभी निर्णय लेगी।
अनुच्छेद 280 - वित्त आयोग (Finance Commission) :
राष्ट्रपति हर 5 वर्ष में एक वित्त आयोग का गठन करेगा, जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे की सिफारिश करेगा।
अनुच्छेद 281 - वित्त आयोग की सिफारिशें :
राष्ट्रपति वित्त आयोग की सिफारिशों और उन पर की गई कार्यवाही के ज्ञापन को संसद के दोनों सदनों में रखवाएगा।
▶ प्रकीर्ण वित्तीय उपबंध (अनुच्छेद 282 से 291)
अनुच्छेद 282 - संघ या राज्य द्वारा अपने राजस्व से किए जाने वाले व्यय :
केंद्र और राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए कोई भी अनुदान दे सकते हैं, भले ही वह विषय उनकी विधायी शक्ति (सूचियों) के बाहर हो।
अनुच्छेद 283 - संचित निधियों, आकस्मिकता निधियों और लोक लेखाओं में जमा धनराशियों की अभिरक्षा :
इन निधियों में पैसे जमा करने और निकालने के नियम और प्रक्रियाएं संसद/विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर तय होंगी।
अनुच्छेद 284 - लोक सेवकों और न्यायालयों द्वारा प्राप्त वादियों की जमा राशियों की अभिरक्षा :
सरकारी अधिकारियों या न्यायालयों को मिलने वाली जमानत राशि या डिपॉजिट सार्वजनिक खाते (Public Account) में जमा होंगे।
अनुच्छेद 285 - संघ की संपत्ति को राज्य के कराधान से छूट :
केंद्र सरकार (संघ) की संपत्ति पर राज्य सरकारें कोई टैक्स नहीं लगा सकतीं, जब तक कि संसद इसकी अनुमति न दे।
अनुच्छेद 286 - माल के क्रय या विक्रय पर कर लगाने पर निर्बंधन :
राज्य सरकारें किसी वस्तु के आयात-निर्यात या अंतरराज्यीय व्यापार पर बिक्री कर (Sales Tax) नहीं लगा सकतीं।
अनुच्छेद 287 - विद्युत (Electricity) पर करों से छूट :
केंद्र सरकार या रेलवे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बिजली पर राज्य टैक्स नहीं लगा सकता।
अनुच्छेद 288 - जल या विद्युत के संबंध में राज्यों द्वारा कराधान से कुछ दशाओं में छूट :
यदि संसद कोई प्राधिकरण (जैसे DVC) नदी घाटी के विकास के लिए बनाए, तो राज्य उसके पानी या बिजली पर टैक्स (राष्ट्रपति की अनुमति के बिना) नहीं लगा सकता।
अनुच्छेद 289 - राज्यों की संपत्ति और आय को संघ के कराधान से छूट :
राज्य सरकारों की संपत्ति और आय पर केंद्र सरकार टैक्स नहीं लगा सकती (व्यावसायिक आय को छोड़कर)।
अनुच्छेद 290 - कुछ व्ययों और पेंशनों के संबंध में समायोजन :
संविधान लागू होने के बाद कुछ न्यायालयों या आयोगों की पेंशन के खर्च का केंद्र और राज्यों के बीच बंटवारा।
अनुच्छेद 290A (290क) - कुछ देवस्वम निधियों को वार्षिक संदाय :
केरल और तमिलनाडु की संचित निधियों से त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड आदि को धार्मिक संस्थानों के लिए वार्षिक भुगतान किया जाएगा।
अनुच्छेद 291 - शासकों की प्रिवी पर्स की राशि (निरस्त) :
देशी रियासतों के राजाओं को मिलने वाले विशेषाधिकार (Privy Purse) को 26वें संशोधन (1971) द्वारा समाप्त (निरस्त) कर दिया गया।
▶ अध्याय 2 : उधार लेना (Borrowing) - अनुच्छेद 292 से 293
अनुच्छेद 292 - भारत सरकार द्वारा उधार लेना :
भारत सरकार भारत की संचित निधि की गारंटी पर देश के भीतर या विदेशों से ऋण (Loan) ले सकती है, जिसकी सीमा संसद तय करेगी।
अनुच्छेद 293 - राज्यों द्वारा उधार लेना :
राज्य सरकारें केवल देश के भीतर (भारत से ही) ऋण ले सकती हैं। केंद्र का पुराना कर्ज बकाया होने पर राज्य को नया कर्ज लेने के लिए केंद्र की अनुमति लेनी होगी।
▶ अध्याय 3 : संपत्ति, संविदाएं, अधिकार, दायित्व, बाध्यताएं और वाद (अनुच्छेद 294 से 300)
अनुच्छेद 294 और 295 - संपत्ति, अधिकारों और दायित्वों का उत्तराधिकार :
संविधान लागू होने से पहले ब्रिटिश सरकार या देशी रियासतों की संपत्ति और कर्ज स्वतः ही भारत सरकार या राज्य सरकारों को मिल गए।
अनुच्छेद 296 - राजगामी या व्यपगत या स्वामीविहीन होने से प्रोद्भूत संपत्ति :
यदि किसी संपत्ति का कोई कानूनी वारिस नहीं है (लावारिस संपत्ति), तो वह संपत्ति राज्य सरकार या केंद्र सरकार की हो जाएगी।
अनुच्छेद 297 - राज्यक्षेत्रीय सागर-खंड और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की संपत्ति :
भारत की समुद्री सीमा (Territorial Waters) और महाद्वीपीय मग्नतट में मौजूद सभी मूल्यवान चीजें (जैसे पेट्रोलियम) केंद्र सरकार (संघ) की संपत्ति होंगी।
अनुच्छेद 298 - व्यापार करने आदि की शक्ति :
केंद्र और राज्य सरकारों को कोई भी व्यापार (Business) करने और संपत्ति खरीदने-बेचने का अधिकार है।
अनुच्छेद 299 - संविदाएं (Contracts) :
केंद्र और राज्यों द्वारा किए गए सभी कॉन्ट्रैक्ट क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम से किए जाएंगे। (इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं होंगे)।
अनुच्छेद 300 - वाद और कार्यवाहियां (Suits and proceedings) :
भारत सरकार 'भारत संघ' के नाम से और राज्य सरकारें अपने राज्य के नाम से किसी पर मुकदमा कर सकती हैं और उन पर भी मुकदमा किया जा सकता है।
▶ अध्याय 4 : संपत्ति का अधिकार (Right to Property) - अनुच्छेद 300A
अनुच्छेद 300A (300क) - विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना :
44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 31) से हटाकर यहाँ एक विधिक (कानूनी) अधिकार बना दिया गया है। इसके अनुसार कानून बनाए बिना कोई किसी की संपत्ति नहीं छीन सकता।
भाग 13 : भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम (अनुच्छेद 301 से 307)
अनुच्छेद 301 - व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता :
भारत के पूरे राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार और वाणिज्य बिना किसी बाधा के स्वतंत्र (Free Trade) होगा। (यह ऑस्ट्रेलिया के संविधान से प्रेरित है)।
अनुच्छेद 302 - संसद की निर्बंधन लगाने की शक्ति :
सार्वजनिक हित (Public Interest) को देखते हुए संसद एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच व्यापार पर पाबंदी लगा सकती है।
अनुच्छेद 303 - विधायी शक्तियों पर निर्बंधन :
संसद या राज्य विधानमंडल कोई ऐसा कानून नहीं बनाएंगे जो व्यापार के मामले में एक राज्य को दूसरे राज्य पर प्राथमिकता (भेदभाव) देता हो।
अनुच्छेद 304 - राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बंधन :
राज्य विधानमंडल बाहर से आने वाले माल पर समान कर (Tax) लगा सकते हैं, लेकिन भेदभावपूर्ण टैक्स नहीं। जनहित में उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं (राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से)।
अनुच्छेद 305 - विद्यमान विधियों और एकाधिकार की व्यावृत्ति :
संविधान लागू होने से पहले के व्यापार कानून और सरकार के एकाधिकार (Monopoly) वाले कानून (जैसे रेलवे) मान्य रहेंगे।
अनुच्छेद 306 - भाग ख के राज्यों की कर लगाने की शक्ति (निरस्त) :
यह अनुच्छेद 7वें संविधान संशोधन (1956) द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 307 - प्राधिकारी की नियुक्ति :
व्यापार और वाणिज्य के नियमों को लागू कराने के लिए संसद एक विशेष प्राधिकारी (Authority) नियुक्त कर सकती है।
भाग 14 : संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं (Services Under the Union and the States) - अनुच्छेद 308 से 323
▶ अध्याय 1 : सेवाएं (Services) - अनुच्छेद 308 से 314
अनुच्छेद 308 - निर्वचन (Interpretation) :
इस भाग के प्रयोजन के लिए 'राज्य' शब्द की व्याख्या दी गई है (पहले जम्मू-कश्मीर इसका अपवाद था, लेकिन अब यह सभी राज्यों पर लागू है)।
अनुच्छेद 309 - संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तें :
संसद और राज्य विधानमंडल अपने-अपने सरकारी कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तों (Service Rules) को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाएंगे।
अनुच्छेद 310 - संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि (प्रसाद का सिद्धांत) :
केंद्र के कर्मचारी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत और राज्य के कर्मचारी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (Pleasure Doctrine) अपने पद पर बने रहते हैं।
अनुच्छेद 311 - पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पदावनत किया जाना :
सरकारी कर्मचारियों को संरक्षण प्राप्त है कि उन्हें नियुक्त करने वाले अधिकारी से नीचे के स्तर के अधिकारी द्वारा नौकरी से नहीं हटाया जाएगा, और सुनवाई का मौका (Reasonable opportunity) दिया जाएगा।
अनुच्छेद 312 - अखिल भारतीय सेवाएं (All-India Services) :
यदि राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित करे, तो संसद कानून बनाकर नई अखिल भारतीय सेवाओं (जैसे IAS, IPS, IFS) का सृजन कर सकती है।
अनुच्छेद 312A (312क) - कुछ सेवाओं के अधिकारियों की सेवा की शर्तों में परिवर्तन (निरस्त प्रावधान) :
इसे 28वें संशोधन (1972) द्वारा जोड़ा गया था जो कि ICS (Indian Civil Service) जैसे ब्रिटिशकालीन अधिकारियों के विशेषाधिकार समाप्त करने से संबंधित था।
अनुच्छेद 313 - संक्रमणकालीन उपबंध :
संविधान लागू होने से पहले के जो लोक सेवा कानून थे, वे तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद नया कानून न बना ले।
अनुच्छेद 314 - कुछ सेवाओं के पुराने अधिकारियों के लिए संरक्षण (निरस्त) :
इसे 28वें संविधान संशोधन (1972) द्वारा पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है।
▶ अध्याय 2 : लोक सेवा आयोग (Public Service Commissions) - अनुच्छेद 315 से 323
अनुच्छेद 315 - संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग :
केंद्र के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) होगा। दो या अधिक राज्य चाहें तो एक 'संयुक्त' आयोग भी बना सकते हैं।
अनुच्छेद 316 - सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि :
UPSC के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति और SPSC के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करेगा। इनका कार्यकाल 6 वर्ष (या UPSC के लिए 65 वर्ष आयु और SPSC के लिए 62 वर्ष आयु) तक होगा।
अनुच्छेद 317 - लोक सेवा आयोग के सदस्य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना :
आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को केवल साबित कदाचार (Misbehavior) के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद राष्ट्रपति द्वारा ही हटाया जा सकता है (राज्यपाल नहीं हटा सकता)।
अनुच्छेद 318 - आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा की शर्तें :
आयोग के सदस्यों की संख्या और सेवा शर्तें राष्ट्रपति (या राज्यपाल) तय करेगा, जिन्हें नियुक्ति के बाद उनके लिए अलाभकारी नहीं बनाया जा सकता।
अनुच्छेद 319 - आयोग के सदस्य न रहने पर पद धारण करने पर रोक :
UPSC का अध्यक्ष रिटायरमेंट के बाद भारत या राज्य सरकार के अधीन कोई नौकरी नहीं कर सकता, ताकि वह निष्पक्ष होकर काम कर सके।
अनुच्छेद 320 - लोक सेवा आयोगों के कृत्य (Functions) :
आयोग का काम संघ और राज्यों की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का संचालन करना और भर्ती के तरीकों पर सरकार को सलाह देना है।
अनुच्छेद 321 - लोक सेवा आयोगों के कृत्यों का विस्तार :
संसद या राज्य विधानमंडल कानून बनाकर इन आयोगों को अतिरिक्त कार्य और शक्तियां सौंप सकते हैं।
अनुच्छेद 322 - लोक सेवा आयोगों के व्यय :
UPSC का सारा खर्च भारत की संचित निधि पर और SPSC का खर्च राज्य की संचित निधि पर भारित होगा।
अनुच्छेद 323 - लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन (Reports) :
UPSC अपनी वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपेगा (जो संसद में रखवाई जाएगी), और SPSC अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपेगा।
भाग 14A (14क) : अधिकरण (Tribunals) - अनुच्छेद 323A व 323B
अनुच्छेद 323A (323क) - प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals) :
42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया। संसद कानून बनाकर सरकारी कर्मचारियों के भर्ती और सेवा संबंधी विवादों को सुलझाने के लिए कैट (CAT) जैसे अधिकरण स्थापित कर सकती है।
अनुच्छेद 323B (323ख) - अन्य विषयों के लिए अधिकरण :
संसद और राज्य विधानमंडल अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में टैक्स, भूमि सुधार, विदेशी मुद्रा आदि के विवादों के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बना सकते हैं।
भाग 15 : निर्वाचन (Elections) - अनुच्छेद 324 से 329A
अनुच्छेद 324 - निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित होना :
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनाव कराने और मतदाता सूची तैयार करने के लिए एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग (Election Commission) का गठन किया जाएगा।
अनुच्छेद 325 - धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर अयोग्यता नहीं :
किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची (Electoral Roll) में शामिल होने से रोका नहीं जा सकता (कोई पृथक निर्वाचक मंडल नहीं होगा)।
अनुच्छेद 326 - लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन का वयस्क मताधिकार के आधार पर होना :
भारत का वह नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष पूरी हो चुकी है (61वें संशोधन से पहले यह 21 वर्ष थी), उसे वोट देने का संवैधानिक अधिकार है।
अनुच्छेद 327 - विधान-मंडलों के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की संसद की शक्ति :
संसद को चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित कानून बनाने की सर्वोच्च शक्ति प्राप्त है (जैसे- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम)।
अनुच्छेद 328 - राज्य विधान-मंडल की निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की शक्ति :
संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन रहते हुए, राज्य विधानमंडल भी अपने राज्य के चुनावों के लिए नियम बना सकता है।
अनुच्छेद 329 - निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन :
परिसीमन और चुनाव क्षेत्रों के आवंटन को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। किसी भी चुनाव को केवल निर्वाचन याचिका (Election Petition) द्वारा ही चुनौती दी जा सकती है।
अनुच्छेद 329A (329क) - प्रधानमंत्री तथा लोकसभा अध्यक्ष के मामले में विशेष प्रावधान (निरस्त) :
इसे 39वें संशोधन (1975) द्वारा जोड़ा गया था, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा इसे निरस्त कर दिया गया है।
भाग 16 : कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध (अनुच्छेद 330 से 342A)
अनुच्छेद 330 - लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण :
लोकसभा में SC और ST के लिए राज्यों की जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण होगा।
अनुच्छेद 331 - लोकसभा में आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय का प्रतिनिधित्व :
राष्ट्रपति को लोकसभा में 2 एंग्लो-इंडियन सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार था। (नोट: 104वें संविधान संशोधन द्वारा इस आरक्षण को आगे नहीं बढ़ाया गया है, अतः अब यह निष्प्रभावी है)।
अनुच्छेद 332 - राज्यों की विधानसभाओं में SC और ST के लिए स्थानों का आरक्षण :
राज्यों की विधानसभाओं में भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित रहेंगी।
अनुच्छेद 333 - राज्यों की विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व :
राज्यपाल विधानसभा में 1 एंग्लो-इंडियन को मनोनीत कर सकता था। (यह प्रावधान भी 104वें संशोधन से समाप्त हो गया है)।
अनुच्छेद 334 - स्थानों के आरक्षण का कुछ अवधि के पश्चात समाप्त होना :
SC/ST के राजनीतिक आरक्षण की समय सीमा इसी अनुच्छेद में तय होती है। 104वें संशोधन द्वारा इसे संविधान लागू होने से 80 वर्ष (यानी 2030 तक) के लिए बढ़ा दिया गया है।
अनुच्छेद 335 - सेवाओं और पदों के लिए SC और ST के दावे :
सरकारी नौकरियों की नियुक्तियों में प्रशासन की दक्षता बनाए रखते हुए, SC और ST के दावों (आरक्षण) का ध्यान रखा जाएगा।
अनुच्छेद 336 - कुछ सेवाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए विशेष उपबंध :
आजादी के तुरंत बाद रेलवे और डाक जैसे विभागों में एंग्लो-इंडियन को आरक्षण देने का अस्थायी प्रावधान था (अब समाप्त)।
अनुच्छेद 337 - आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए शैक्षिक अनुदान :
उनके स्कूलों के लिए मिलने वाले सरकारी अनुदानों से संबंधित अस्थायी प्रावधान (अब समाप्त)।
अनुच्छेद 338 - राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for SCs) :
SC के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और शिकायतों की जांच के लिए एक संवैधानिक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग होगा।
अनुच्छेद 338A (338क) - राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for STs) :
89वें संशोधन (2003) द्वारा ST के लिए एक अलग संवैधानिक आयोग का गठन किया गया है।
अनुच्छेद 338B (338ख) - राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) :
102वें संविधान संशोधन (2018) द्वारा OBC के लिए गठित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
अनुच्छेद 339 - अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर संघ का नियंत्रण :
राष्ट्रपति ST के कल्याण पर रिपोर्ट देने के लिए एक आयोग नियुक्त कर सकता है और केंद्र राज्यों को ST कल्याण के लिए निर्देश दे सकता है।
अनुच्छेद 340 - पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति :
राष्ट्रपति सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की स्थिति की जांच के लिए आयोग (जैसे- काका कालेलकर और मंडल आयोग) का गठन कर सकता है।
अनुच्छेद 341 - अनुसूचित जातियां (Scheduled Castes) :
राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल से परामर्श कर अधिसूचना जारी करके बता सकता है कि कौन सी जातियां SC की सूची में शामिल होंगी (संसद इसमें बदलाव कर सकती है)।
अनुच्छेद 342 - अनुसूचित जनजातियां (Scheduled Tribes) :
राष्ट्रपति इसी प्रकार अधिसूचना जारी कर जनजातियों (ST) की सूची निर्धारित करता है, और इसमें संशोधन केवल संसद कर सकती है।
अनुच्छेद 342A (342क) - सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग (SEBC) :
102वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया। इसके तहत राष्ट्रपति को केंद्र के उद्देश्यों के लिए पिछड़े वर्गों (OBC) की सूची को अधिसूचित करने का अधिकार है।
भाग 17 : राजभाषा (Official Language) - अनुच्छेद 343 से 351
▶ अध्याय 1 : संघ की भाषा (अनुच्छेद 343 - 344)
अनुच्छेद 343 - संघ की राजभाषा :
संघ (केंद्र) की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
अनुच्छेद 344 - राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति :
राष्ट्रपति हिंदी भाषा के विकास और अंग्रेजी के प्रयोग को सीमित करने के लिए प्रत्येक 5 और 10 वर्ष की समाप्ति पर एक राजभाषा आयोग का गठन करेगा (प्रथम आयोग: बी.जी. खेर)।
▶ अध्याय 2 : प्रादेशिक भाषाएं (Regional Languages) - अनुच्छेद 345 से 347
अनुच्छेद 345 - राज्य की राजभाषा या राजभाषाएं :
प्रत्येक राज्य का विधानमंडल कानून बनाकर उस राज्य में बोली जाने वाली एक या अधिक भाषाओं को राज्य की राजभाषा का दर्जा दे सकता है।
अनुच्छेद 346 - राज्यों और संघ के बीच पत्राचार की राजभाषा :
एक राज्य से दूसरे राज्य या केंद्र के साथ पत्राचार के लिए वही भाषा इस्तेमाल होगी जो संघ की राजभाषा (हिंदी या अंग्रेजी) है, जब तक कि राज्य आपस में कोई अन्य समझौता न कर लें।
अनुच्छेद 347 - किसी राज्य की जनसंख्या के एक भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा :
यदि किसी राज्य की पर्याप्त जनसंख्या मांग करे, तो राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है कि उनकी भाषा को भी उस राज्य में आधिकारिक मान्यता दी जाए।
▶ अध्याय 3 : उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों आदि की भाषा (अनुच्छेद 348 - 349)
अनुच्छेद 348 - उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा :
जब तक संसद कानून बनाकर अन्यथा व्यवस्था न करे, सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट की कार्यवाही केवल अंग्रेजी भाषा में होगी।
अनुच्छेद 349 - भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया :
संविधान लागू होने के 15 वर्ष के भीतर भाषा से जुड़ा कोई भी कानून संसद में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से ही पेश किया जाएगा।
▶ अध्याय 4 : विशेष निदेश (Special Directives) - अनुच्छेद 350 से 351
अनुच्छेद 350 - व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा :
कोई भी व्यक्ति अपनी शिकायत के निवारण के लिए केंद्र या राज्य के किसी भी अधिकारी को अपनी मातृभाषा या किसी भी आधिकारिक भाषा में प्रार्थना पत्र दे सकता है।
अनुच्छेद 350A (350क) - प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं :
राज्य का प्रयास होगा कि भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा उनकी मातृभाषा में उपलब्ध कराई जाए।
अनुच्छेद 350B (350ख) - भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी :
भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रपति एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करेगा।
अनुच्छेद 351 - हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश :
संघ (केंद्र) का यह कर्त्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे ताकि यह भारत की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
भाग 18 : आपात उपबंध (Emergency Provisions) - अनुच्छेद 352 से 360
अनुच्छेद 352 - आपात की उद्घोषणा (National Emergency) :
यदि युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत की सुरक्षा खतरे में हो, तो मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है।
अनुच्छेद 353 - आपात की उद्घोषणा का प्रभाव :
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार की कार्यपालिका और विधायी शक्तियां राज्य सरकारों के ऊपर हावी हो जाती हैं।
अनुच्छेद 354 - राजस्वों के वितरण संबंधी उपबंधों का लागू होना :
आपातकाल के समय राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व (Taxes) के बंटवारे से संबंधित नियमों में बदलाव कर सकता है।
अनुच्छेद 355 - बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्य की संरक्षा :
यह केंद्र (संघ) का संवैधानिक कर्त्तव्य है कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे।
अनुच्छेद 356 - राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध (President's Rule) :
यदि राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य तरीके से राष्ट्रपति को लगे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा है, तो वह वहां राष्ट्रपति शासन (राज्य आपातकाल) लागू कर सकता है।
अनुच्छेद 357 - अनुच्छेद 356 के अधीन विधायी शक्तियों का प्रयोग :
राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य विधानमंडल की कानून बनाने की शक्ति संसद के पास आ जाती है।
अनुच्छेद 358 - आपात के दौरान अनुच्छेद 19 के उपबंधों का निलंबन :
युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल लगने पर अनुच्छेद 19 की 6 स्वतंत्रताएं स्वतः निलंबित हो जाती हैं (सशस्त्र विद्रोह में नहीं)।
अनुच्छेद 359 - आपात के दौरान भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निलंबन :
राष्ट्रपति आदेश जारी करके मूल अधिकारों को लागू कराने के लिए कोर्ट जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है, लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 359A (359क) - पंजाब में लागू होने के संबंध में (निरस्त) :
यह पंजाब समस्या के दौरान जोड़ा गया था, जिसे 63वें संविधान संशोधन (1989) द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 360 - वित्तीय आपात के बारे में उपबंध (Financial Emergency) :
यदि भारत की वित्तीय साख खतरे में हो, तो राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल लगा सकता है। (भारत में आज तक कभी भी वित्तीय आपातकाल नहीं लगा है)।
भाग 19 : प्रकीर्ण (Miscellaneous) - अनुच्छेद 361 से 367
अनुच्छेद 361 - राष्ट्रपति और राज्यपालों का संरक्षण :
अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल किसी भी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे और उन पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 361A (361क) - संसद और राज्यों के विधान-मंडलों की कार्यवाहियों के प्रकाशन का संरक्षण :
सदन की सत्य कार्यवाही को प्रकाशित करने के लिए किसी भी व्यक्ति (प्रेस) पर दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा।
अनुच्छेद 361B (361ख) - लाभप्रद राजनीतिक पद पर नियुक्ति के लिए निरर्हता :
दल-बदल (10वीं अनुसूची) के आधार पर अयोग्य घोषित सदस्य मंत्री या किसी अन्य लाभप्रद राजनीतिक पद के लिए भी अयोग्य होगा।
अनुच्छेद 362 - देशी राज्यों के शासकों के अधिकार और विशेषाधिकार (निरस्त) :
इसे 27वें संविधान संशोधन (1971) द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 363 - कुछ संधियों, करारों आदि से उत्पन्न विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन :
आजादी से पहले देशी रियासतों के साथ की गई संधियों के विवादों में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अनुच्छेद 363A (363क) - देशी राज्यों के शासकों को दी गई मान्यता की समाप्ति और प्रिवी पर्स का अंत :
26वें संशोधन (1971) द्वारा राजा-महाराजाओं की उपाधियां और प्रिवी पर्स (पेंशन) पूर्णतः समाप्त कर दिए गए।
अनुच्छेद 364 - महापत्तन और विमानक्षेत्रों के बारे में विशेष उपबंध :
राष्ट्रपति किसी प्रमुख बंदरगाह (Port) या हवाई अड्डे के संबंध में विशेष नियम लागू कर सकता है।
अनुच्छेद 365 - संघ द्वारा दिए गए निदेशों का अनुपालन करने में विफलता का प्रभाव :
यदि कोई राज्य केंद्र के संवैधानिक निर्देशों को मानने से इनकार करता है, तो माना जाएगा कि राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है (और वहां अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है)।
अनुच्छेद 366 - परिभाषाएं :
इस अनुच्छेद में संविधान में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दों जैसे कृषि आय, एंग्लो-इंडियन, निगम कर, ऋण आदि की परिभाषाएं दी गई हैं।
अनुच्छेद 367 - निर्वचन (Interpretation) :
संविधान की व्याख्या के लिए जनरल क्लॉजेज एक्ट 1897 का उपयोग किया जाएगा।
भाग 20 : संविधान का संशोधन (Amendment of the Constitution) - अनुच्छेद 368
अनुच्छेद 368 - संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया :
दक्षिण अफ्रीका से ली गई इस प्रक्रिया के तहत संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है (बशर्ते 'मूल ढांचा' नष्ट न हो)। संशोधन प्रक्रिया केवल संसद (लोकसभा/राज्यसभा) में ही शुरू की जा सकती है।
भाग 21 : अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध - अनुच्छेद 369 से 392
अनुच्छेद 369 - राज्य सूची के कुछ विषयों के संबंध में संसद की अस्थायी शक्ति :
संविधान लागू होने के पहले 5 वर्षों के लिए संसद को राज्य सूची के कुछ विषयों पर कानून बनाने की अस्थायी शक्ति दी गई थी।
अनुच्छेद 370 - जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध :
यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था, जिसे अगस्त 2019 में भारत सरकार द्वारा काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया गया है।
अनुच्छेद 371 - महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों के संबंध में विशेष उपबंध :
इन राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों (विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ) के समान विकास के लिए विकास बोर्ड का गठन।
अनुच्छेद 371A (371क) - नागालैंड राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
नागाओं की धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं को संसदीय कानूनों से संरक्षण।
अनुच्छेद 371B (371ख) - असम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
असम विधान सभा में जनजातीय क्षेत्रों से चुने गए सदस्यों की एक समिति का गठन।
अनुच्छेद 371C (371ग) - मणिपुर राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए समिति का प्रावधान।
अनुच्छेद 371D (371घ) - आंध्र प्रदेश या तेलंगाना राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
इन राज्यों के लोगों को शिक्षा और रोजगार में समान अवसर (Equitable opportunities) प्रदान करने की व्यवस्था।
अनुच्छेद 371E (371ङ) - आंध्र प्रदेश में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना :
संसद को केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का अधिकार।
अनुच्छेद 371F (371च) - सिक्किम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
सिक्किम के भारत में विलय (36वें संशोधन) के बाद वहाँ की विधानसभा और अधिकारों का संरक्षण।
अनुच्छेद 371G (371छ) - मिजोरम राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
मिजो लोगों के प्रथागत कानून और भूमि स्वामित्व को संरक्षण।
अनुच्छेद 371H (371ज) - अरुणाचल प्रदेश राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
वहां की कानून-व्यवस्था के लिए राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्व।
अनुच्छेद 371I (371झ) - गोवा राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
गोवा की विधान सभा में कम से कम 30 सदस्य होने की गारंटी।
अनुच्छेद 371J (371ञ) - कर्नाटक राज्य के संबंध में विशेष उपबंध :
हैदराबाद-कर्नाटक (कल्याण-कर्नाटक) क्षेत्र के विकास के लिए विशेष विकास बोर्ड।
अनुच्छेद 372 - विद्यमान विधियों का प्रवृत्त बने रहना :
संविधान लागू होने से पहले जो कानून भारत में लागू थे, वे तब तक लागू रहेंगे जब तक उन्हें बदल न दिया जाए।
अनुच्छेद 372A (372क) - विधियों का अनुकूलन करने की राष्ट्रपति की शक्ति :
पुराने कानूनों को संविधान के अनुरूप बनाने के लिए संशोधन करने की शक्ति।
अनुच्छेद 373 - निवारक निरोध में रखे गए व्यक्तियों के संबंध में राष्ट्रपति की शक्ति :
जब तक संसद कानून न बनाए, राष्ट्रपति निवारक निरोध (Preventive Detention) के संबंध में आदेश दे सकता है।
▶ संक्रमणकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 374 से 392)
अनुच्छेद 374 से 378A - न्यायाधीशों और लोक सेवा आयोगों का संक्रमण :
संविधान लागू होने पर पुराने फेडरल कोर्ट के जज 'सुप्रीम कोर्ट के जज' (374), हाई कोर्ट के जज (376), CAG (377), और पुराने लोक सेवा आयोग के सदस्य 'UPSC/SPSC के सदस्य' (378) बन गए।
अनुच्छेद 379 से 391 - अस्थायी संसद आदि (निरस्त) :
अंतरिम संसद, राष्ट्रपति और राज्यपालों के संबंध में इन पुराने अनुच्छेदों को 7वें संविधान संशोधन द्वारा पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 392 - कठिनाइयों को दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति :
संविधान लागू होने के शुरुआती दौर की कठिनाइयों को दूर करने के लिए राष्ट्रपति को आदेश जारी करने की शक्ति दी गई थी।
भाग 22 : संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, प्राधिकृत पाठ और निरसन (अनुच्छेद 393 से 395)
अनुच्छेद 393 - संक्षिप्त नाम (Short Title) :
इसमें कहा गया है कि इस संविधान का संक्षिप्त नाम 'भारत का संविधान' (Constitution of India) होगा।
अनुच्छेद 394 - प्रारंभ (Commencement) :
यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि कुछ अनुच्छेद 26 नवंबर 1949 को ही लागू हो गए थे, जबकि शेष पूरा संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू होगा।
अनुच्छेद 394A (394क) - हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ (Authoritative text in Hindi) :
58वें संशोधन (1987) द्वारा जोड़ा गया यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह संविधान का आधिकारिक हिंदी अनुवाद प्रकाशित करवाए।
अनुच्छेद 395 - निरसन (Repeals) :
संविधान के अंतिम अनुच्छेद 395 के द्वारा 'भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947' और 'भारत शासन अधिनियम 1935' को पूरी तरह से निरस्त (रद्द) कर दिया गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. भारतीय संविधान में कुल कितने भाग और अनुच्छेद हैं?
मूल संविधान में 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में गणना की दृष्टि से लगभग 25 भाग, 470 से अधिक अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं, लेकिन मूल संख्या आज भी 395 ही है।
Q2. मौलिक अधिकार संविधान के किस भाग में हैं?
मौलिक अधिकार संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12 से 35) में दिए गए हैं। इसे भारत का 'मैग्ना कार्टा' भी कहा जाता है।
Q3. राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment) किस अनुच्छेद के तहत लगाया जाता है?
संविधान के अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति पर संविधान का उल्लंघन करने के आरोप में महाभियोग लगाया जा सकता है।
Q4. संविधान संशोधन की प्रक्रिया किस देश से ली गई है और इसका अनुच्छेद क्या है?
संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका से ली गई है और इसका वर्णन भाग 20 के अनुच्छेद 368 में किया गया है।
Q5. धन विधेयक (Money Bill) की परिभाषा किस अनुच्छेद में है?
धन विधेयक की परिभाषा संविधान के अनुच्छेद 110 में दी गई है। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करता है।
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