| संगठनात्मक व्यवहार एवं अभिप्रेरण के प्रमुख सिद्धान्त (लोक प्रशासन) |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष लेख में लोक प्रशासन के अंतर्गत संगठनात्मक व्यवहार, अभिप्रेरण (Motivation) और प्रशासनिक संरचना के प्रमुख सिद्धान्तों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें मैस्लो, मैकग्रेगर, हर्जबर्ग और साइमन के निर्णयन सिद्धान्त के साथ-साथ संगठन के प्रमुख नियमों—जैसे संचार, पद-सोपान, नियन्त्रण का क्षेत्र, आदेश की एकता, प्रत्यायोजन और समन्वय को आसान भाषा में समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, मुख्य कार्यपालिका, स्टाफ व सूत्र अभिकरण तथा प्रशासन पर नियन्त्रण (विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक व आन्तरिक) का भी गहन विश्लेषण किया गया है। यह सम्पूर्ण हस्तलिखित नोट्स PGT, GIC और NET-JRF, UPSC, PCS परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। |
- 1. मैस्लो का आवश्यकता पद-सोपान का सिद्धान्त
- 2. डगलस मैकग्रेगर का X और Y सिद्धान्त
- 3. हर्जबर्ग का द्विघटक (Two-Factor) सिद्धान्त
- 4. आउची का Z सिद्धान्त एवं लिकर्ट की प्रबन्धकीय प्रणालियाँ
- 5. हर्बर्ट साइमन का निर्णयन सिद्धान्त (Decision Making Theory)
- 6. निर्णयन के लक्षण एवं प्रशासन में निर्णय लेने के चरण
- 7. साइमन की विचारधारा (शास्त्रीय बनाम आधुनिक)
- 8. संचार (Communication) सिद्धान्त: अर्थ एवं प्रकार
- 9. संचार का माध्यम एवं इसके प्रमुख तथ्य
- 10. संगठन में पद सोपान (Hierarchy) का सिद्धान्त
- 11. नियंत्रण की सीमा / क्षेत्र / विस्तार (Span of Control)
- 12. आदेश की एकता (Unity of Command) का सिद्धान्त
- 13. प्रत्यायोजन (Delegation) का अर्थ
- 14. समन्वय (Co-ordination) एवं केन्द्रीयकरण बनाम विकेन्द्रीकरण
- 15. मुख्य कार्यपालिका (Chief Executive): अर्थ एवं प्रकार
- 16. संगठन की संरचना: स्टाफ (Staff) अभिकरण
- 17. संगठन की संरचना: सूत्र (Line) एवं सहायक अभिकरण
- 18. प्रशासन पर नियन्त्रण: सत्ता एवं उत्तरदायित्व
- 19. प्रशासन पर नियन्त्रण के प्रकार (विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक आदि)
✦ 1. मैस्लो का आवश्यकता पद-सोपान का सिद्धान्त
अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) ने 1943 में अपने निबन्ध 'मानव अभिप्रेरण सिद्धान्त' (A Theory of Human Motivation) में इसका प्रतिपादन किया। मैस्लो ने संगठनों तथा व्यक्तियों के बीच मानव आवश्यकताओं की दृष्टि का विश्लेषण किया।
मैस्लो ने कहा कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संगठन का सदस्य बनता है। ये आवश्यकताएँ कई क्षेत्र में होती हैं और इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति ही उसे कार्य-निष्पादन के उच्च स्तर की ओर प्रेरित करती है।
मैस्लो का कथन:
"एक समय में व्यक्ति का लक्ष्य सिर्फ एक ही आवश्यकता की पूर्ति होता है और जब तक इन आवश्यकताएँ की पूर्ति नहीं होती हैं तब तक वह उसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही लगा रहता है।"
■ मैस्लो का पद-सोपान (Pyramid of Needs)
(सोचने की स्थिति बदलती रहती है)
(चाहत बढ़ती रहती है)
(समाज में अपनी पहचान)
(सुरक्षा की दृष्टि से)
(रोटी, कपड़ा, मकान)
(यह पद-सोपान नीचे से ऊपर की ओर चलता है।)
✦ 2. डगलस मैकग्रेगर का X और Y सिद्धान्त
मैकग्रेगर (Douglas McGregor) एक व्यवहारवादी व मनोवैज्ञानिक विद्वान थे। उन्होंने "उत्प्रेरण" या "अभिप्रेरण" (Motivation) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसे X और Y के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।
अभिप्रेरण (Motivation) क्या है? मानव शक्ति के व्यवहार को निर्देशित करने अथवा उसका सहयोग प्राप्त करने की कला को अभिप्रेरण कहते हैं। अंग्रेजी में इसे Motivation कहते हैं जो कि 'Motive' शब्द से बना है जिसका अर्थ है - 'इच्छा शक्ति को जागृत करना'। अर्थात् ऐसी शक्ति जो व्यक्तियों में काम करने की इच्छा जागृत करती है उसे अभिप्रेरण या उत्प्रेरण या प्रोत्साहन कहा जाता है।
यह नकारात्मक और सकारात्मक दो प्रकार का होता है। नकारात्मक का अर्थ है- डर या भय दिखाकर किसी के व्यवहार में परिवर्तन करना; जबकि सकारात्मक का अर्थ है- सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तरीके से उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करना।
■ मैकग्रेगर का X सिद्धान्त (परम्परागत सिद्धान्त)
मैकग्रेगर ने X सिद्धान्त के अन्तर्गत कहा कि— स्वभावतः प्रत्येक व्यक्ति काम से बचना चाहता है, अतः उसके लिए नकारात्मक अभिप्रेरण आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति को भय दिखाकर काम लिया जा सकता है।
X सिद्धान्त के अन्तर्गत कहा गया है कि— सामान्यतः व्यक्ति स्वेच्छा से काम नहीं करना चाहता है, क्योंकि ऐसा करने से उसे सुख या सन्तुष्टि की अनुभूति होती है। उसमें कार्य के प्रति अरुचि होती है, वह अति महत्वाकांक्षी होता है। संगठन के उद्देश्यों व आवश्यकताओं के प्रति उदासीन होता है। अतः उससे कार्य लेने के लिए नकारात्मक अभिप्रेरण (डराना, धमकाना आदि) आवश्यक है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति आलसी एवं कायर होते हैं जो काम से बचना चाहते हैं।
मैकग्रेगर कहते हैं कि— ऐसे व्यक्ति सुस्त, परिवर्तन विरोधी और कोई आकांक्षा न रखने वाले होते हैं। अतः प्रबन्ध ऐसे व्यक्तियों के प्रति दो नीतियां अपना सकता है: एक कठोर नीति, दूसरी लचीली नीति। ऐसे व्यक्ति के साथ यदि कठोर नीतियाँ अपनायी जाती हैं तो परिणाम संघर्षकारी या विनाशकारी होगा और यदि लचीली नीतियाँ अपनायी जाती हैं तो व्यक्ति संगठन को ही निगल जायेगा। आज के दौर में ये दोनों तरीके विफल हैं।
मैकग्रेगर के अनुसार: "X सिद्धान्त मानव में निहित उनकी क्षमताओं को पूर्णता में नहीं खोजता।"
■ मैकग्रेगर का Y सिद्धान्त (आधुनिक सिद्धान्त)
मैकग्रेगर ने अपने ही द्वारा दिये गये X सिद्धान्त (परम्परागत सिद्धान्त) की आलोचना करके Y सिद्धान्त (आधुनिक सिद्धान्त) का प्रतिपादन किया।
- सकारात्मक उत्प्रेरण (लचीली नीति): सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तरीके से।
- नकारात्मक उत्प्रेरण (कठोर नीति): भय या डरा कर व्यवहार में परिवर्तन।
एक व्यक्ति जब दूसरे व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, उसे सकारात्मक उत्प्रेरण कहते हैं। Y सिद्धान्त को X सिद्धान्त की कमियों को दूर करने के लिए लाया गया। इसे अभिप्रेरण का आधुनिक सिद्धान्त कहा गया।
इसका मानना है कि मनुष्य निष्क्रिय, अविश्वासी नहीं है। यदि उसे अभिप्रेरित किया जाय और उसे सामाजिक, मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेरित किया जाय तो वह स्वयं कार्य के प्रति निष्ठावान होकर श्रेष्ठ उत्पादन कर सकता है। इस सिद्धान्त का उद्देश्य व्यक्ति के लक्ष्यों और संगठन के लक्ष्यों के बीच समन्वय स्थापित करना है और यह सिद्धान्त अधिक अवसर पैदा करने, उसके मार्ग में आने वाली अड़चनों को दूर करने और व्यक्ति को उसकी उन्नति के लिए प्रेरित करने के लिए कार्य करता है।
✦ 3. हर्जबर्ग का द्विघटक सिद्धान्त (Two-Factor Theory)
इसे अभिप्रेरण की 'आरोग्य विचारधारा' (Hygiene Theory) के नाम से जाना जाता है। हर्जबर्ग ने 200 इंजीनियरों और लेखपालों के साक्षात्कार के आधार पर द्विघटक विचारधारा का विकास किया।
हर्जबर्ग का मानना है कि मानव व्यवहार को समझने के लिए उसके कार्यों या आदतों का अध्ययन किया जाना आवश्यक होता है। उन्होंने साक्षात्कार में हिस्सा लेने वाले व्यक्तियों से निम्नलिखित दो बातें पूछीं:
- किस प्रकार की बातें उन्हें कार्य करते हुए 'अप्रसन्न' बनाती हैं?
- किस प्रकार की बातें उन्हें कार्य करते हुए 'प्रसन्न' बनाती हैं?
हर्जबर्ग का मानना है कि व्यक्तियों की दो विभिन्न प्रकार की विचारधारा होती है जो एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हैं। ये मानव व्यवहार को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करती हैं:
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(I) आरोग्य घटक (Hygiene Factors) - नकारात्मक जब कोई व्यक्ति अपने कार्य से असन्तुष्टि महसूस करता है तो उसका ध्यान कार्य के प्रति कम और वातावरण की ओर अधिक होता है, जिसमें वह कार्य करता है। इसे 'आरोग्य घटक' कहा जाता है। (यह नकारात्मक है) |
(II) उत्प्रेरक घटक (Motivator Factors) - सकारात्मक जब किसी व्यक्ति को अपने कार्य से सन्तुष्टि महसूस होती है तो उसका ध्यान कार्य की तरफ अधिक होता है और वातावरण की तरफ कम। इससे उत्पादकता में वृद्धि होती है। इसे 'उत्प्रेरक घटक' कहा जाता है। (यह सकारात्मक है) |
✦ 4. आउची का Z सिद्धान्त एवं लिकर्ट की प्रणालियाँ
■ विलियम आउची का Z सिद्धान्त (Theory Z)
आउची ने जापान की बड़ी कम्पनियों की प्रबन्ध व्यवस्था का कई वर्षों तक अध्ययन किया। उनकी बहुचर्चित पुस्तक का नाम 'Theory Z' है। Z विचारधारा जापानी प्रबन्ध व्यवस्था का दूसरा नाम है।
Z विचारधारा का मूल आधार है- "कार्मिकों को संगठन में समाहित करना" और यही जापानी अर्थव्यवस्था की उत्पादकता की कुंजी है।
आउची का कथन है:
"जापानी प्रबन्ध का सार तत्व है- विश्वास, मर्मज्ञता (पारंगत) तथा आत्मीयता।" (यही बड़ी कम्पनियों के उत्पादकता का राज है।)
■ रेन्सिस लिकर्ट का प्रबन्धकीय सिद्धान्त
रेन्सिस लिकर्ट ने निम्न चार प्रकार की प्रबन्धकीय पद्धतियां बतायीं:
| ① स्वार्थी (Exploitative) | ➔ परम्परागत (वैज्ञानिक सिद्धान्त) |
| ② हितैषी (Benevolent) | ➔ X सिद्धान्त (सकारात्मक) |
| ③ परामर्शी (Consultative) | ➔ Y सिद्धान्त (सकारात्मक) |
| ④ सहयोगी (Participative) | ➔ लोकतान्त्रिक प्रणाली |
प्रथम प्रकार की प्रबन्ध पद्धति 'परम्परागत प्रणाली' पर आधारित है। यह शास्त्रीय सिद्धान्त या वैज्ञानिक सिद्धान्त है जो कि पूर्णतया 'तथ्यों' (Facts) पर बल देती है।
जबकि चौथा सिद्धान्त 'लोकतान्त्रिक प्रणाली' पर आधारित है- यह उत्पादक से अधिक कार्य लेने में सक्षम है, कार्मिकों एवं संगठन में समन्वय के माध्यम से अधिक परिणाम निकल सकता है। इसमें टीम का कार्य आपसी विश्वास एवं सहभागिता पर आधारित है।
जबकि दूसरी व तीसरी पद्धति इन दोनों के मध्य में स्थित हैं, जो कि X और Y के सिद्धान्त से मिलता-जुलता है।
✦ 5. हर्बर्ट साइमन का निर्णयन सिद्धान्त
हर्बर्ट साइमन (Herbert Simon) के सिद्धान्त को Decision Making Theory (प्रशासनिक मानव सिद्धान्त) भी कहा जाता है। हम जानते हैं कि एक प्रबन्धक या प्रशासक का महत्वपूर्ण कार्य 'निर्णय' लेना है।
- पीटर ड्रकर के अनुसार: "प्रबन्धक जो कुछ भी करता है, वह निर्णयों के द्वारा ही करता है।"
- टेरी के अनुसार: "प्रशासकों (प्रबन्धकों) का जीवन ही निर्णय लेना है।"
- हर्बर्ट साइमन के अनुसार: "हम इस बात से सहमत हों या न सहमत हों परन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि निर्णय ही प्रशासन का हृदय है।"
■ निर्णय करने की प्रक्रिया की विशेषताएँ
प्रशासन में निर्णय निश्चित प्रक्रिया का परिणाम है। निर्णय करने की प्रक्रिया की निम्न तीन विशेषताएँ हैं:
- निर्णय लक्ष्योन्मुखी होता है अर्थात् किसी लक्ष्य या प्रयोजन को प्राप्त करने के लिए निर्णय लिया जाता है।
- कोई भी निर्णय अकेला नहीं होता वह अपने पहले और बाद के निर्णयों को प्रभावित करता है।
- कोई भी निर्णय किसी विशेष पर्यावरण में ही लिया जाता है।
निर्णयन की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि— "किसी निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्पों का चुनाव करना ही निर्णयन है।" निर्णयन की प्रक्रिया का अंतिम परिणाम निर्णय है।
✦ 6. निर्णयन के लक्षण एवं निर्णय लेने के चरण
■ निर्णयन के लक्षण (Characteristics of Decision Making)
- यह विभिन्न विकल्पों में से एक विकल्प के चुनाव की प्रक्रिया है।
- उपलब्ध विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प चुनने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है, इसमें किसी बाहरी तत्व का हस्तक्षेप नहीं होता है।
- निर्णय एक मानवीय क्रिया है।
- निर्णय एक बौद्धिक क्रिया है, अर्थात् इसमें उन सभी कार्यों को सम्मानित किया जाता है, जो किसी निर्णय लेने के पूर्व जरूरी होते हैं।
- निर्णयों में उद्देश्यों का समावेश होता है अर्थात् निर्णय ऐसा हो जो समस्याओं का समाधान कर सके।
- निर्णय नकारात्मक भी हो सकता है, जैसे - किसी विषय पर निर्णय न लेने की इच्छा भी एक निर्णय है।
■ प्रशासन में निर्णय लेने के चरण (Steps in Decision Making)
| ① | उद्देश्यों का निर्धारण |
| ② | समस्याओं की व्याख्या करना |
| ③ | समस्याओं का विश्लेषण करना |
| ④ | वैकल्पिक समाधानों का विकास करना |
| ⑤ | विकल्पों की छंटनी करना |
| ⑥ | सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन |
| ⑦ | निर्णयों का क्रियान्वयन |
| ⑧ | निर्णय की तुष्टीकरण या नियन्त्रण करना |
नीति-निर्माण पहले है और निर्णय निर्माण बाद में है। क्योंकि जब संगठन या प्रशासन नीतियों का निर्धारण कर लेता है तो बाद में उसी नीति के अनुसार निर्णय लिया जाता है।
✦ 7. साइमन की विचारधारा (शास्त्रीय बनाम आधुनिक)
हर्बर्ट साइमन ने निर्णय सिद्धान्त के दो विचार दिए:
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① शास्त्रीय विचारधारा (परम्परागत विचारधारा)
यह विवेकपूर्ण ढंग (पूर्ण तार्किकता) से उस विकल्प का चयन करता है जो उसके लक्ष्य के प्रति अधिक सन्तोषप्रद होता है। यह पूर्ण तार्किकता या पूर्ण विवेक पर आधारित होता है। इसमें सर्वाधिक बल तथ्यों (Facts) पर दिया जाता है। -
② आधुनिक विचारधारा (उत्तर व्यवहारवाद)
इसे प्रशासनिक मानव विचार सम्बन्धी विचारधारा भी कहा जाता है। इसमें सीमित तार्किकता (Bounded Rationality) होती है। यह मूल्यों (Values) पर बल देता है।
"साइमन ने शास्त्रीय विचारधारा की आलोचना करते हुए उसे ठुकरा दिया।" और साइमन आधुनिक विचारधारा का समर्थन करते हुए कहा— इसमें तथ्यों एवं मूल्यों का योग होता है और वर्तमान में यही विचारधारा सर्वाधिक मान्य है।
हर्बर्ट साइमन का जन्म 1916 में अमेरिका के विसकोन्सिस (Wisconsin) नामक शहर में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक— Administrative Behavior है। उन्हें 1978 में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला।
उनका महत्वपूर्ण योगदान प्रबन्ध विज्ञान के क्षेत्र में है। साइमन ने प्रबन्ध को निर्णयन के समकक्ष माना। वे कहते हैं— "प्रबन्ध की समस्त कार्यवाही निर्णयन है।"
✦ 8. संचार (Communication) सिद्धान्त: अर्थ एवं प्रकार
संचार को प्रशासन का प्रथम सिद्धान्त माना जाता है। किसी भी संगठन को प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बनाने के लिए संचार का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
- मीलेट के अनुसार: "संचार को प्रशासकीय संगठन की रक्तधारा बताया।"
- फिफनर के अनुसार: "संचार प्रबन्ध का हृदय है।"
- चेस्टर बर्नार्ड के अनुसार: "जो संचार समझ में न आए उसकी कोई सत्ता नहीं होती।"
■ संचार का अर्थ
वर्तमान युग संचार का युग है। आज सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव ने विश्व को एक वैश्विक गाँव में बदल दिया है, आज व्यवहार, सरकार सबकुछ सूचना पर आधारित है।
संचार का शाब्दिक अर्थ है— सूचनाओं का प्रवाह। अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचनाओं का आना-जाना या विचारों का आदान-प्रदान करना।
ध्यान रहे कि: आज संचार का मूल अर्थ सूचना नहीं बल्कि समझ माना जाता है, अर्थात् एक स्थान से जब कोई बात कही जाती है, और अगले स्थान पर जब वह बात समझ ली जाती है, तब सही अर्थ में सही होता है।
■ संचार के प्रकार (Types of Communication)
संचार निम्न प्रकार के होते हैं:
- औपचारिक संचार
- अनौपचारिक संचार
- आन्तरिक संचार
- बाह्य संचार
- अन्तर्वैयक्तिक संचार
- ऊपर की ओर संचार
- नीचे की ओर संचार
- बहु-आयामी संचार (इधर-उधर का संचार)
✦ 9. संचार का माध्यम एवं इसके प्रमुख तथ्य
■ संचार का माध्यम (Mediums of Communication)
| ① श्रव्य माध्यम | रेडियो, टेलीफोन, सम्मेलन (वर्तमान में) आदि। |
| ② दृश्य माध्यम | प्रेस |
| ③ दृश्य-श्रव्य माध्यम | टी.वी., नाटक, नौटंकी आदि। |
| ④ सम्मेलन संचार | आजकल इसका सर्वाधिक महत्व है क्योंकि इसके माध्यम से लालफीताशाही, औपचारिकता, विलम्ब आदि से मुक्ति मिल जाती है। |
■ संचार के प्रमुख तथ्य (मिलेट के अनुसार)
मिलेट ने संचार के मुख्य सात तथ्य बताये हैं:
- स्पष्टता ➔ संचार समझ में आए।
- अनुरूपता ➔ भिन्न न हो।
- पर्याप्तता ➔ पर्याप्त हो।
- समसामयिकता ➔ करेंट से रिलेटिव हो (नवीनता)।
- एकरूपता ➔ एक ही बात हो।
- लोचशीलता
- स्वीकार्यता
■ संचार में विचारकों का योगदान
- ① हेनरी फेयोल: फेयोल प्रथम प्रशासनिक विचारक हैं जिन्होंने संगठन में संचार की समस्या का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया। और शीघ्र संचार व्यवस्था पर बल दिया। इसके लिए उन्होंने गैंग प्लांक (Gang Plank) का सुझाव दिया। इसमें विलम्ब को टालने के लिए सब स्तरीय या क्षैतिज संचार व्यवस्था का प्रतिपादन किया।
- ② चेस्टर बर्नार्ड: इन्होंने संगठन को एक सहकारी व्यवस्था बताया, इसमें संचार, 'मानवीय व्यवहार' और 'उद्देश्य की प्राप्ति' का एक महत्वपूर्ण तत्व है।
- ③ साइमन के अनुसार: "संचार एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा संगठन में निर्णय को एक सदस्य दूसरे सदस्य तक पहुंचाते हैं।"
- ④ लुई ए. एलन के अनुसार: "संचार एक व्यक्ति के मस्तिष्क को दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क से जोड़ने वाला पुल है।" इसके अन्तर्गत कहने-सुनने तथा समझने की एक व्यवस्थित या अनवरत प्रक्रिया सम्मिलित है।
✦ 10. संगठन में पद सोपान (Hierarchy) का सिद्धान्त
पद सोपान को स्केलर पद्धति (Scalar Principle) का सिद्धान्त भी कहा जाता है।
(शीर्ष)
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DGP - Director General of Police
IG - Inspector General of Police
DIG - Deputy Inspector General of Police
SSP - Senior Superintendent of Police
SP - Superintendent of Police
ASP - Assistant Superintendent of Police
DSP - Deputy Superintendent of Police
SHO - Station House Officer
SI - Sub-Inspector
ASI - Assistant Sub-Inspector
HC - Head Constable
PC - Police Constable
(आधार)
- कार्य कम हो जाता है।
- उत्तरदायित्व बढ़ता जाता है।
- आदेश ऊपर से नीचे की ओर आता है।
- परिपत्र, फाइल आदि नीचे से ऊपर की ओर जाता है।
■ पद सोपान का अर्थ एवं व्याख्या
इसका शाब्दिक अर्थ है— श्रेणीबद्ध प्रशासन। अर्थात् सत्ता की श्रेणियों की निम्नतम अवस्था से उच्चतम की एक व्यवस्था है जिसमें छोटे-छोटे पदों से क्रमशः व्यवस्थित ढंग से संयोजित करके एक शृंखला बनायी जाती है। इसलिए पदसोपान व्यवस्था पिरामिड की तरह दिखायी देता है।
इसमें जैसे-जैसे हम नीचे आते हैं वैसे-वैसे आधार और संख्या में वृद्धि होती जाती है और जैसे-जैसे नीचे से ऊपर की ओर जाते हैं, आधार सिकुड़ता है और संख्या में कमी हो जाती है और शीर्ष पर केवल एक ही सर्वोच्च अधिकारी होता है जो पूरे प्रशासन को नियन्त्रित करता है, और इसी के द्वारा दिये गये आदेश का सभी पालन करते हैं।
आदेश सदैव ऊपर से नीचे की ओर आता है और रिपोर्ट या प्रतिवेदन नीचे से ऊपर की ओर जाता है। इसके द्वारा सत्ता एवं उत्तरदायित्व को निश्चित कर दिया जाता है।
■ विचारकों के मत
- एल. डी. ह्वाइट के अनुसार: "'पद सोपान' ऊपर से नीचे तक उत्तरदायित्वों के कारण उत्पन्न वरिष्ठ अधीनस्थ का वह सम्बन्ध है, जो सभी जगह लागू होता है।"
- मीलेट के अनुसार: "'पद सोपान' एक ऐसी पद्धति है, जिसमें विभिन्न व्यक्तियों के प्रयासों को आपस में जोड़ दिया जाता है।"
- मूने एवं रेले के अनुसार (1): "पद सोपान व्यवस्था को सीढ़ीनुमा प्रक्रिया का नाम दिया जाता है।"
- मूने एवं रेले के अनुसार (2): "पद सोपान में उचित माध्यम से सिद्धान्त का पालन किया जाता है।"
■ फिफनर के 4 तरीके एवं फेयोल का गैंग प्लांक
फिफनर ने पद सोपान के निम्न 4 तरीके बताये:
- कार्य-आधारित पद सोपान
- रैंक आधारित पद सोपान
- वेतन आधारित पद सोपान
- कौशल आधारित पद सोपान (Skill)
हेनरी फेयोल के अनुसार: "इसमें प्रशासन में विलम्ब होता है, उस विलम्ब को दूर करने के लिए उन्होंने 'गैंग प्लांक' (Gang Plank) का सुझाव दिया जिसका अर्थ है - लेवल जम्पिंग (Level Jumping)।"
नोट: 'साइमन' ने प्रशासन या संगठन के सिद्धान्तों को "झूठी कहावतें" कहते हुए धज्जियां उड़ाई लेकिन पद सोपान को अत्यंत आवश्यक बताया।
✦ 11. नियन्त्रण की सीमा/क्षेत्र/विस्तार (Span of Control)
इसे प्रशासन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त माना जाता है। नियन्त्रण की सीमा का अर्थ है— 'उन अधीनस्थों या संगठन की इकाइयों की संख्या जिसका नियन्त्रण प्रशासक करता है।' अर्थात् कितने वरिष्ठ अधिकारी अपने कितने कनिष्ठ पर कितना नियन्त्रण रख सकता है।
यह अवधारणा ए.बी. ग्रेक्यूनास (A.B. Graicunas) द्वारा वर्णित 'ध्यान के विस्तार' (Span of Attention) के क्षेत्र से सम्बन्धित है। इसमें यह माना जाता है कि यदि निरीक्षण का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है, तो वरिष्ठ को अपने कनिष्ठ पर नियन्त्रण रखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि मानवीय क्षमता की एक सीमा होती है।
एक अधिकारी के अधीन कितने अधीनस्थ होने चाहिए इस पर कोई निश्चित राय नहीं है, किन्तु विस्तार क्षेत्र जितना छोटा होगा सम्पर्क और नियन्त्रण उतना ही प्रभावशाली होगा।
- कुछ विद्वानों ने— 3 से 4
- कुछ ने— 7
- और कुछ ने— 20 (बीस) व्यक्तियों का नियन्त्रण स्वीकार किया है।
अभी तक इसके बारे में कोई स्पष्ट राय सामने नहीं आयी है।
ए.बी. ग्रेक्यूनास ने इसके सन्दर्भ में एक सूत्र का प्रतिपादन किया जो निम्नलिखित है:
n [ (2n / 2) + (n - 1) ]
जहाँ n = नियन्त्रण करने वाले व्यक्तियों की संख्या है।
इस सूत्र के आधार पर हम कह सकते हैं कि एक व्यक्ति एक पर 2, आठ पर 6 पर और 3 व्यक्ति 18 पर आसानी के साथ नियन्त्रण कर सकते हैं।
✦ 12. आदेश की एकता (Unity of Command) का सिद्धान्त
इसका अर्थ है कि— "अधीनस्थ व्यक्ति को अपने कितने वरिष्ठ अधिकारी द्वारा संचालित होना चाहिए।"
- फेयोल के अनुसार: "किसी कर्मचारी को केवल एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ही आदेश दिया जाना चाहिए।"
- फिफनर के अनुसार: "आदेश की एकता की अवधारणा का तात्पर्य यह है कि— किसी संगठन के प्रत्येक सदस्य को 1 और केवल 1 ही नेता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।"
"इस नियम के उल्लंघन से सत्ता निर्बल हो जाती है, अनुशासन संकट में पड़ जाती है, व्यवस्था भंग हो जाती है और स्थायित्व को खतरा पैदा हो जाता है।"
एक ही व्यक्ति के ऊपर या विभाग के ऊपर जब दो अधिकारी सत्ता का उपभोग करते हैं, तो गड़बड़ी पैदा होने लगती है अर्थात् दोहरे नियन्त्रण के परिणाम स्वरूप दो अधिकारी में एक का लोप हो जाता है और संगठन छिन्न-भिन्न हो जाता है। यह संगठन विनाश की ओर अग्रसर होने लगता है। अर्थात् इसी संगठन की रचना दोहरे नियन्त्रण के अधीन नहीं (होनी चाहिए)।
✦ 13. प्रत्यायोजन (Delegation) का अर्थ
इसे प्रदत्त विधायन (Delegated Legislation) या हस्तांतरित विधायन भी कहा जाता है।
प्रत्यायोजन का शाब्दिक अर्थ है— किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अपने कनिष्ठ अधिकारियों को कार्य करने के लिए शक्ति या सत्ता का हस्तानान्तरण करना।
लेकिन ध्यान रहे कि अन्तिम शक्ति या सत्ता उसी वरिष्ठ अधिकारी के पास ही रहती है और जब वह चाहे तो हस्तानान्तरित की गई शक्ति वापस ले सकता है। अतः स्पष्ट है कि प्रत्यायोजन उत्तरदायित्व का परित्याग नहीं है और न ही अन्तिम, बल्कि वह उस पर पर्यवेक्षण, निरीक्षण तथा समीक्षा करने का अधिकार अपने पास रखता है और जब चाहे कनिष्ठ अधिकारी द्वारा दिये गये निर्णय को निरस्त कर सकता है।
प्रदत्त विधायन का अर्थ है— विधायिका द्वारा कार्यपालिका को हस्तानान्तरित की गई शक्ति और कार्यपालिक नौकरशाही के माध्यम से कानून का निर्माण करती है। अतः प्रदत्त विधायन से नौकरशाही की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।
✦ 14. समन्वय (Co-ordination) एवं केन्द्रीयकरण बनाम विकेन्द्रीकरण
■ समन्वय (Co-ordination)
समन्वय संगठन या प्रशासन का प्रथम सिद्धान्त है। इसे 'प्रबन्ध का भी प्रथम सिद्धान्त' माना जाता है। इसी अभिकरण की विभिन्न इकाइयों में विद्यमान समस्याओं को आसानी के साथ हल कर सकता है।
क्लास का टाइम टेबल (Time Table) समन्वय का एक उत्तम उदाहरण है।
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मेरी पार्कर फालेट ने समन्वय की परिभाषा करते हुए लिखा है:
"समन्वय किसी स्थिति में सभी तत्वों का पारस्परिक सम्बन्ध है।" -
टेरी के अनुसार:
"किसी सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक व्यक्ति का दूसरों के साथ सामूहिक कार्य है।"
नियोजन भी समन्वय का एक उदाहरण है। Class का Time Table भी समन्वय का एक उदाहरण माना जाता है। और सरकार के मन्त्रालयों में वित्त मन्त्रालय समन्वय स्थापित करने का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है।
■ केन्द्रीयकरण बनाम विकेन्द्रीकरण (Centralization vs Decentralization)
सरकार के समक्ष आज प्रमुख समस्या यह है कि केन्द्रीयकरण किया जाय या विकेन्द्रीकरण किया जाय।
एक ओर नियोजित अर्थव्यवस्था एवं सशक्त एवं प्रभावशाली प्रतिरक्षा तथा राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता के लिए केन्द्रीयकरण आवश्यक है, वहीं दूसरी तरफ जनता के सहयोग से स्थापित लोकतन्त्र एवं क्षेत्रीय स्वायत्तता की बढ़ती हुई माँग विकेन्द्रीकरण का समर्थन करती है।
अर्थात्: जब सत्ता नीचे से ऊपर की ओर जाती है तो उसे केन्द्रीयकरण कहा जाता है, और जब सत्ता ऊपर से नीचे की ओर आती है तो उसे विकेन्द्रीकरण कहा जाता है।
जहाँ केन्द्रीयकरण एकात्मक व्यवस्था का प्रतीक है, वहीं विकेन्द्रीकरण संघात्मक व्यवस्था का प्रतीक है।
✦ 15. मुख्य कार्यपालिका (Chief Executive): अर्थ एवं प्रकार
मुख्य कार्यपालिका वह होता है, जो सत्ता के शीर्ष पर बैठा होता है, राष्ट्रीय स्तर पर केवल एक ही ऐसा प्रमुख या सर्वोच्च अधिकारी होता है जो सम्पूर्ण कार्यों का निष्पादन करता है, दूसरे शब्दों में इसका तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जो किसी देश की प्रशासकीय व्यवस्था का अध्यक्ष होता है मुख्य कार्यपालक पिरामिड का शीर्ष होता है, केन्द्रीय राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका में राष्ट्रपति, इंग्लैण्ड में राजा या रानी, फ्रांस और भारत में राष्ट्रपति होता है।
■ कार्यपालिका के निम्नलिखित रूप होते हैं:
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① वंशानुगत कार्यपालिका:
ऐसी कार्यपालिका जिसमें सर्वोच्च पद पर निर्वाचित वंशानुक्रमानुसार, आनुवंशिक व्यक्ति पदासीन होता है जैसे इंग्लैण्ड में सम्राट। -
② निर्वाचित कार्यपालिका:
ऐसी कार्यपालिका जिसमें सर्वोच्च पद पर निर्वाचित व्यक्ति पदासीन होता है जैसे- अमेरिका व फ्रांस का राष्ट्रपति। -
③ नाममात्र की कार्यपालिका:
ऐसी कार्यपालिका जिसमें केवल सैद्धांतिक रूप से सम्पूर्ण शक्ति निहित होती है, लेकिन वह व्यावहारिक रूप से किसी भी शक्ति का प्रयोग स्वयं नहीं करता क्योंकि संविधान उसे विवेक का अधिकार नहीं देता जैसे- इंग्लैण्ड का सम्राट और भारत का राष्ट्रपति। -
④ वास्तविक कार्यपालिका:
ऐसी कार्यपालिका जो व्यावहारिक रूप से सम्पूर्ण शक्तियों का प्रयोग करती है, लेकिन नाममात्र की कार्यपालिका के नाम से कार्य करती है जैसे- भारत में मन्त्रिपरिषद् और इंग्लैण्ड में मन्त्रिमण्डल। -
⑤ एकल कार्यपालिका:
वह कार्यपालिका जिसमें एक ही व्यक्ति में सम्पूर्ण सत्ता निहित होती है और अन्तिम रूप से उसी का आदेश माना जाता है, जैसे - अमेरिका का राष्ट्रपति। -
⑥ बहुल कार्यपालिका:
ऐसी कार्यपालिका जिसमें सत्ता एक व्यक्ति में निहित न होकर व्यक्तियों के समूह में निहित होती है जैसे - स्विट्जरलैण्ड की कार्यपालिका जिसमें कुल 7 सदस्य होते हैं और वे बारी से 1-1 वर्ष के लिए सत्ता सँभालते हैं। -
⑦ संसदीय कार्यपालिका:
इसमें कार्यपालिका और विधायिका के बीच विलयन का सिद्धान्त पाया जाता है और कार्यपालिका अपने सभी कार्यों के लिये विधायिका के प्रति उत्तरदायी होता है इसमें- राष्ट्रपति या सम्राट नाममात्र की कार्यपालिका हैं और मन्त्रिपरिषद् वास्तविक कार्यपालिका है। दोनों एक ही होती है, या एक व्यक्ति में समाहित होती है। -
⑧ अध्यक्षीय कार्यपालिका:
इसमें कार्यपालिका व विधायिका के बीच शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त पाया जाता है और कार्यपालिका अपने किसी कार्य के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती इसमें नाममात्र की कार्यपालिका और वास्तविक कार्यपालिका दोनों एक ही होती है, या एक व्यक्ति में समाहित होती है। जैसे - अमेरिका।
✦ 16. संगठन की संरचना: स्टाफ (Staff) अभिकरण
मुख्य कार्यपालक के कार्य तथा अधिकरणों से स्पष्ट हैं कि वह बिना सहायता से अपने कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन नहीं कर सकता। मुख्यकार्यपालिका के संलग्न प्रशासनिक अधिकारियों को सामान्य स्टाफ कहते हैं। मुख्यकार्यपालिका के निर्णय विभागों तक सामान्य स्टाफ के जरिए ही पहुंचता है।
एल. डी. ह्वाइट: ने सामान्य स्टाफ एक कार्य को निर्धारित किया जैसे- मुख्यकार्यपालक के रूप में सहायता करना, योजनाओं को बनाने में सहायता करना, निर्णयों को अविलम्ब पहुंचाने में सहायता करना आदि।
■ स्टाफ अभिकरण (Staff Agency)
स्टाफ को मुख्य कार्यपालिका का विस्तार माना जाना चाहिए यदि मुख्य कार्यपालिका सक्षम होता तो सारा कार्य अकेले ही कर लेता लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता इसलिए उसकी सहायता के लिए स्टाफ की आवश्यकता होती है।
स्टाफ का शाब्दिक अर्थ है— सहारा देने वाली छड़ी
✦ 17. संगठन की संरचना: सूत्र (Line) एवं सहायक अभिकरण
■ सूत्र अभिकरण (Line Agency)
प्रत्येक प्रशासनिक व्यवस्था अभिकरणों तथा विभागों में विभक्त होती है, इन अभिकरणों का कार्य सरकार के प्राथमिक उद्देश्यों को पूरा करना है ये अभिकरण जनता से सीधे व्यवहार करते हैं, जनता को सेवायें उपलब्ध कराते हैं।
उनके आचरण का नियमन करते हैं व्यवस्थापिका द्वारा निर्धारित कार्यक्रम को पूरा करते हैं। नागरिक सूत्र अभिकरण के ही सम्पर्क में होते हैं ये अभिकरण ही प्रशासन के केन्द्रीय तत्व हैं। उदाहरण स्वरूप स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा, शिक्षा, वाणिज्य तथा उद्योग भारत सरकार के प्रधान सूत्र अभिकरण विभाग हैं।
■ सहायक अभिकरण (Auxiliary Agency)
इसके अन्तर्गत सहायक कार्य आते हैं। ये सूत्र अभिकरण की मदद करते हैं ताकि वे अपना निर्धारित कार्य कर सकें। गौण कार्य हैं कि जैसे- डाक, तार विभाग का प्राथमिक कार्य पत्रों एवं तारों का वितरण है, यह सूत्र अभिकरण का कार्य है लेकिन इन कार्यों का सम्पादन अनेक कार्यों के सम्पादन पर निर्भर हैं जैसे- कागज की खरीद, पोस्टकार्ड, लिफाफों की छपाई, तार, कार्यालयों का निर्माण तथा कर्मचारियों की भर्ती आदि।
✦ 18. प्रशासन पर नियन्त्रण: सत्ता एवं उत्तरदायित्व
सत्ता शब्द का प्रयोग किसी को आदेश देने या नियन्त्रित करने के लिए होती है। सत्ता केन्द्रीकृत या विकेन्द्रीकृत हो सकती है। जब सत्ता नीचे से ऊपर की ओर चलती है, तो केन्द्रीकृत कहलाती है, जब सत्ता ऊपर से नीचे की ओर चलती है, तो विकेन्द्रीकृत सत्ता कहलाती है।
प्रशासन में केन्द्रीकृत सत्ता का प्रयोग किया जाता है। जब शक्ति वैधता प्राप्त कर लेती है। वह सत्ता बन जाता है।
सत्ता = शक्ति + वैधता
उत्तरदायित्व शब्द का प्रचलन अंग्रेजी भाषा में 1785 में हुआ। उत्तरदायित्व का शाब्दिक अर्थ है— ऐसी जिम्मेदारी जिसमें किसी कार्य के प्रति हिसाब किताब मांगा जा सके। प्रशासन पर कई नियन्त्रण ऐसे होते हैं जिसके कारण वह अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है।
✦ 19. प्रशासन पर नियन्त्रण के प्रकार
प्रशासन पर कुछ नियन्त्रण निम्न हैं:
① विधायी नियन्त्रण (Legislative Control)
हम जानते हैं कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विधायिका कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था है। जहाँ अध्यक्षीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है, इसलिए विधायिका का विशेष नियन्त्रण नहीं होता। वहीं संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है इस प्रणाली में कार्यपालिका पर विधायिका नियन्त्रण बना रहता है।
प्रशासन पर विधायी नियन्त्रण निम्न रूप में देखा जा सकता है:
- संसद सदस्यों द्वारा सरकार से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछना जैसे— तारांकित प्रश्न, गैर तारांकित प्रश्न, अल्प सूचना प्रश्न, और आधे घण्टे की चर्चा आदि।
- सरकार के विरुद्ध विधायिका में विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव लाकर उनपर नियन्त्रण रखा जाता है जैसे- अविश्वास प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव तथा ध्यानाकर्षण आदि।
- बजटीय व्यवस्था द्वारा भी प्रशासन पर नियन्त्रण किया जाता है अर्थात् बजट के विभिन्न मुद्दे पर चर्चा करके और विभिन्न प्रकार की संसदीय समितियों द्वारा जैसे- लोक लेखा समिति, अनुमान समिति, सार्वजनिक उपक्रम समिति आदि।
उपर्युक्त के अतिरिक्त राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा, विभिन्न विधेयकों पर बहस, नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा लेखा परीक्षण करके विधायी नियन्त्रण रखा जाता है।
② प्रशासन पर कार्यपालिका का नियन्त्रण (Executive Control)
हम जानते हैं कि संसदीय लोकतन्त्र में सरकार नीतियाँ बनाती है, और नौकरशाही नीतियों का क्रियान्वयन करती है, अर्थात् कार्यपालिका दो भागों में बंटी होती है। जिसे अस्थायी या राजनीतिक कार्यपालिका कहा जाता है, इसके अन्तर्गत मन्त्रिपरिषद् आती है जबकि स्थायी कार्यपालिका में नौकरशाही आती है अतः प्रशासन पर कार्यपालिका का नियन्त्रण निम्न रूप में व्यक्त होता है:
- नीति निर्माण द्वारा नियन्त्रण
- अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति तथा स्थानान्तरण के द्वारा नियन्त्रण।
- बजट के द्वारा नियन्त्रण अर्थात् विभाग के अधिकारी जो भी खर्च करते हैं उनका हिसाब किताब कार्यपालिका रखती है।
- प्रदत्त विधायन द्वारा नियन्त्रण इसका अर्थ है कि— विधायिका द्वारा कार्यपालिका को कानून बनाने की शक्ति का हस्तानान्तरण।
कार्यपालिका को प्रशासन पर नियन्त्रण करने के लिए उपर्युक्त के अतिरिक्त विधि निर्माण या अध्यादेश का अधिकार, लोक सेवा आचार संहिता आदि नियन्त्रण का एक तरीका है।
③ प्रशासन पर न्यायपालिका का नियन्त्रण (Judicial Control)
- पद का दुरुपयोग करने पर प्रशासन के विरुद्ध न्यायपालिका जाने का अधिकार।
- प्रशासन द्वारा अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने पर न्यायालय द्वारा असंवैधानिक या घोषित करने का अधिकार।
- सरकार द्वारा संविधान का उल्लंघन करने पर विभिन्न प्रकार के न्यायिक आदेश।
- प्रशासनिक कार्यों और निर्णयों का न्यायिक पुनरावलोकन।
- कानूनी अपील।
उपर्युक्त के अतिरिक्त नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय द्वारा विभिन्न प्रकार के Ret (रिट- आदेश) जारी करना जैसे— बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा।
④ प्रशासन पर जन नियन्त्रण (Public Control)
- निर्वाचन के समय मतदान करके।
- प्रत्यक्ष लोकतन्त्र में जनमत संग्रह, प्रत्याह्वान और उपक्रम द्वारा।
- विभिन्न प्रकार की सत्ताकारी या संस्थाओं के द्वारा।
- दबाव-समूह या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा नियन्त्रण।
⑤ प्रशासन पर आन्तरिक नियन्त्रण (Internal Control)
इसका शाब्दिक अर्थ है कि— प्रशासन के अन्दर ही वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारियों पर नियन्त्रण रखते हैं। और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दिये गये आदेशों को कनिष्ठ अधिकारी मानते हैं। यह निम्न रूपों में व्यक्त होता है:
- प्रशासन पर राजनीतिक या मन्त्रीय नियन्त्रण
- बजट एवं लेखा परीक्षण द्वारा नियन्त्रण अर्थात् लेखा परीक्षण अनियमित या गलत खर्च को प्रकाश में लाता है इसके द्वारा उठायी गयी आपत्तियों पर अधिकारियों को जवाब देना पड़ता है।
- कार्मिक प्रबन्ध द्वारा नियन्त्रण— अर्थात् कर्मचारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, प्रशिक्षण आदि।
- वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अपने कनिष्ठ अधिकारियों का समय-समय पर निरीक्षण करना, उनकी सर्विस बुक का निरीक्षण करना और चरित्र पंजिका देखना आदि।
अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएं:
- लोकपाल
- लोकायुक्त
- केन्द्रीय सतर्कता आयोग
- केन्द्रीय सूचना आयोग
- विभिन्न प्रकार के आयोग और समितियाँ
✍️ 20. निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त विस्तृत अध्ययन से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि लोक प्रशासन केवल आदेश देने या कार्य करवाने की एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सिद्धान्तों, प्रशासनिक संरचनाओं और मानवीय व्यवहार का एक बेहद जटिल व व्यवस्थित ताना-बाना है।
संगठन को सुचारू और अनुशासित रूप से चलाने के लिए जहाँ एक ओर पद-सोपान (Hierarchy), आदेश की एकता और नियन्त्रण के क्षेत्र जैसे कठोर ढाँचागत सिद्धान्तों की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी ओर संचार (Communication) और समन्वय (Co-ordination) जैसे जीवनदायी तत्वों का होना भी नितांत आवश्यक है। जैसा कि विचारकों ने माना है— "बिना संचार और समन्वय के किसी भी प्रशासकीय संगठन की कोई सत्ता नहीं होती।"
किसी भी राष्ट्र या संगठन की सफलता उसकी मुख्य कार्यपालिका (Chief Executive) और उसकी सहायता करने वाले स्टाफ तथा सूत्र अभिकरणों (Staff & Line Agencies) के बेहतर तालमेल पर निर्भर करती है। जहाँ सूत्र अभिकरण सीधे जनता से जुड़कर सेवाएँ देते हैं, वहीं स्टाफ अभिकरण प्रशासक को नीतियाँ और योजनाएँ बनाने में मदद करता है।
अंततः, प्रशासन को निरंकुश व स्वेच्छाचारी होने से बचाने और उसे जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखने के लिए उस पर विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक और जन-नियन्त्रण का होना किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है। संक्षेप में कहें तो, एक सफल व कल्याणकारी प्रशासनिक व्यवस्था वही है जो इन सभी सिद्धान्तों और नियन्त्रणों के बीच उचित संतुलन (Balance) बनाए रखती है।
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