| संगठन (Organization): अर्थ, प्रकार, सिद्धान्त एवं विचारधाराएं |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष लेख में लोक प्रशासन के अंतर्गत संगठन (Organization) का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें संगठन का अर्थ, इसके प्रकार (औपचारिक व अनौपचारिक), और प्रमुख विचारधाराओं को शामिल किया गया है। विशेष रूप से शास्त्रीय सिद्धान्त (फेयोल व गुलिक), वैज्ञानिक प्रबन्ध सिद्धान्त (F.W. टेलर), नौकरशाही सिद्धान्त (मैक्स वेबर), मानवीय सम्बन्धात्मक सिद्धान्त (एल्टन मेयो - हाथोर्न प्रयोग) और व्यवहारवादी उपागम (चेस्टर बर्नार्ड) को आसान भाषा में समझाया गया है। यह सम्पूर्ण हस्तलिखित नोट्स UPSC, PCS, PGT, TGT, GIC और NET-JRF (राजनीति विज्ञान/लोक प्रशासन) परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। |
📚 विषय सूची (Table of Contents)
- 1. संगठन (Organization): अर्थ एवं आधार
- 2. संगठन के प्रकार (औपचारिक एवं अनौपचारिक)
- 3. संगठन के प्रमुख सिद्धान्त (एक दृष्टि में)
- 4. शास्त्रीय सिद्धान्त (Classical Theory) एवं इसकी विशेषताएं
- 5. वैज्ञानिक प्रबन्ध का सिद्धान्त (F.W. Taylor)
- 6. टेलर का मानसिक क्रांति (Mental Revolution) का विचार
- 7. मैक्स वेबर (Max Weber) का नौकरशाही सिद्धान्त
- 8. नौकरशाही की आलोचना एवं प्रमुख विचारकों के मत
- 9. एल्टन मेयो का मानवीय सम्बन्धात्मक सिद्धान्त (हाथोर्न प्रयोग)
- 10. शास्त्रीय सिद्धान्त और मानवीय सिद्धान्त में प्रमुख अन्तर
- 11. व्यवहारवादी उपागम एवं चेस्टर बर्नार्ड का सिद्धान्त
✦ 1. संगठन (Organization): अर्थ एवं आधार
संगठन समस्त प्रशासन के पूर्व की प्रक्रिया है। किसी कार्य की सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संगठन सुव्यवस्थित है या नहीं। सामान्य बोलचाल की भाषा में— "किसी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से करना ही संगठन कहलाता है।"
हमारा शरीर भी एक संगठन है। संगठन को ढांचा (Structure) भी कहते हैं।
(अतः संगठन में मुख्य रूप से उपर्युक्त तीन तत्व निहित होते हैं।)
- यह कार्य किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है।
- यह अनेक व्यक्तियों के द्वारा मिलकर बना होता है।
- व्यक्तियों के बीच आपस में सहयोग की भावना होती है।
"संगठन सत्ता का औपचारिक ढांचा है जिसके द्वारा किसी निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्यों को विभाजित, निर्धारित व उसमें समन्वय किया जाता है।"
✦ 2. संगठन के प्रकार (Types of Organization)
संगठन मुख्य रूप से दो प्रकार के हो सकते हैं:
① औपचारिक संगठन (Formal Organization)
यह वैधानिक एवं सैद्धांतिक होता है। यह एक प्रोटोकॉल (वरीयता) के तहत और यन्त्रवत कार्य करता है। इसका उदाहरण यांत्रिक या इंजीनियरिंग संगठन है। औपचारिक संगठन उन संगठनों में है जिनके प्रत्येक स्तर पर स्थिति, अधिकार एवं उत्तरदायित्व को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर दिया जाता है।
इस प्रकार के संगठनों में अधिकार उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर प्रत्यायोजित (Delegated) होते हैं और संगठन के सभी सदस्य सामूहिक प्रयास के द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
② अनौपचारिक संगठन (Informal Organization)
इसे सामाजिक आर्गनाइजेशन भी कहते हैं। अनौपचारिक संगठन वह होता है जिसमें किसी नियम, कानून के तहत कठोरता के साथ कोई बंधा हुआ नहीं होता। इसमें व्यक्तिगत व सामाजिक दोनों सम्बन्ध बनते हैं। इसमें नैतिकता व मूल्यों को महत्व दिया जाता है। इसे एक प्रकार से मानवीय सिद्धान्त कहा जाता है।
यह विधि-विधान के अंतर्गत नहीं बना होता है, बल्कि यह मानवीय, नैतिक और तात्कालिक परिस्थितियों पर आधारित होता है।
✦ 3. संगठन के प्रमुख सिद्धान्त (एक दृष्टि में)
संगठन के प्रकार एवं उनके अंतर्गत आने वाले सिद्धान्त
| औपचारिक संगठन (Formal) | अनौपचारिक संगठन (Informal) | ||
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एल्टन मेयो के अनौपचारिक संगठन (मानवीय सिद्धान्त) के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:
- सामाजिकता
- अनौपचारिकता
- साझेदारी (Co-operation)
✦ 4. शास्त्रीय सिद्धान्त (Classical Theory) एवं विशेषताएं
शास्त्रीय सिद्धान्त को प्रबंधकीय प्रशासनिक सिद्धान्त भी कहा जाता है। इसके समर्थकों में हेनरी फेयोल, लिंडल उर्विक, लूथर गुलिक तथा मूने तथा रेले ने इसे विकसित किया है।
विश्व आर्थिक मन्दी के बाद यह महसूस किया जाने लगा कि यदि आर्थिक मन्दी को दूर करना है, तो संगठन को कुशल एवं मजबूत बनाना होगा। संगठनों को कुशल बनाने के लिए कुछ सार्वभौमिक या 'वैज्ञानिक सिद्धान्तों' का निर्माण किया गया जिसे शास्त्रीय सिद्धान्त कहा जाता है।
■ हेनरी फेयोल का योगदान (POCCC)
हेनरी फेयोल ने अपनी पुस्तक 'General and Industrial Management' में संगठन के 14 सिद्धान्त बताये जिसमें POCCC प्रमुख है:
| P | Planning | योजना बनाना |
| O | Organization | संगठन बनाना |
| C | Command | आदेश (निर्देश देना) |
| C | Co-ordination | समन्वय |
| C | Control | नियंत्रण करना |
■ लूथर गुलिक का योगदान (4P's)
लूथर गुलिक ने संगठन के 10 सिद्धान्त बताए जिसमें 4P's (4P) प्रमुख है:
- P - Purpose (उद्देश्य)
- P - Process (प्रक्रिया)
- P - Place (स्थान)
- P - Person (व्यक्ति)
■ गुलिक और उर्विक का POSDCORB सिद्धान्त
लिंडल उर्विक और लूथर गुलिक ने प्रशासन के कार्यों को स्पष्ट करने के लिए POSDCORB सिद्धान्त का प्रतिपादन किया:
| P | Planning | योजना बनाना |
| O | Organization | संगठन बनाना |
| S | Staffing | कर्मचारी |
| D | Direction | निर्देश देना |
| CO | Co-ordination | समन्वय |
| R | Reporting | प्रतिवेदन तैयार करना |
| B | Budgeting | बजट तैयार करना |
■ शास्त्रीय सिद्धान्त से सम्बन्धित प्रमुख तत्व या विशेषताएं
- इसने लोक प्रशासन के सिद्धान्तों को सार्वभौमिक बनाया।
- इसने लोक प्रशासन को एक विज्ञान के रूप में माना और उसे वैज्ञानिक दर्जा प्रदान किया।
- इसने लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के बीच कोई भेदभाव नहीं किया।
- इसने राजनीति-प्रशासन विभाजन के सिद्धान्त पर बल दिया।
- इसमें कार्य-कुशलता और मितव्ययता की स्थापना पर बल दिया।
- इसने तथ्यों पर अधिक बल दिया।
- इसने औपचारिक संगठन की संरचना पर बल दिया।
- इसने मनुष्य को 'आर्थिक मानव' (Economic Man) के रूप में देखा और लिखित कानून पर बल दिया।
- शास्त्रीय विचारकों ने संगठन को बंद प्रणाली (Closed System) के रूप में देखा।
निष्कर्ष: इस सिद्धान्त की आगे चलकर कड़ी आलोचना हुई लेकिन फिर भी हम कह सकते हैं कि इस सिद्धान्त ने आर्थिक मंदी दूर करने में मदद किया।
कार्य-कुशलता एवं मितव्ययता पर बल दिया जो आज भी महत्वपूर्ण है। इसने लोक प्रशासन का विकास किया और उसे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दिलायी।
✦ 5. वैज्ञानिक प्रबन्ध का सिद्धान्त (F.W. Taylor)
वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त का विकास एफ. डब्ल्यू. टेलर (F.W. Taylor) ने किया और इसके वे 'जनक' (Father) के रूप में देखे जाते हैं। टेलर ने 1878 में अमेरिकी मिडवेल स्टील कम्पनी में एक लेबर की हैसियत से कार्य करना प्रारम्भ किया, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे वहाँ मुख्य इंजीनियर के पद पर पहुँच गये।
टेलर का वैज्ञानिक प्रबन्ध का सिद्धान्त के विकास में उनका योगदान निम्नलिखित शोध प्रबंधों में दर्ज है:
- A Piece Rate System
- Shop Management
- On The Art of Cutting Metals
- The Principles of Scientific Management (सबसे प्रमुख)
टेलर का प्रसिद्ध कथन है:
"प्रबन्ध एक सच्चा विज्ञान है।" (Management is a real science.)
■ प्रबन्धन की कमियां (टेलर के अनुसार)
टेलर ने मिडवेल स्टील कम्पनी में रहते हुए कई फैक्ट्रियों का गम्भीर अध्ययन किया। अध्ययन करने के बाद उन्होंने माना कि प्रबन्धन में निम्नलिखित कमियां हैं:
- प्रबन्धकों को श्रमिक प्रबन्धन की जिम्मेदारियों का स्पष्ट ज्ञान नहीं था।
- कार्य के प्रभावी मानकों का अभाव था।
- अच्छी सोल्डरिंग के कारण उत्पादकता सीमित थी।
- नियोक्ता एवं कर्मचारी के बीच अच्छे सम्बन्धों का अभाव था।
- प्रबन्ध तन्त्र के ज्यादातर निर्णय अवैज्ञानिक थे, एवं काम के बंटवारे का ज्यादा ज्ञान नहीं था।
टेलर ने देखा कि श्रमिक प्रबन्ध के झगड़े, विशेषकर फोरमैन (Foreman) एवं कामगारों के बीच उत्पादन को लेकर अक्सर झगड़ा था। टेलर ने समय और गति का अध्ययन (Time and Motion Study) किया एवं इस बात का विश्लेषण किया कि श्रमिक मशीनों, औजारों एवं उपकरणों को किस प्रकार से प्रयोग में लाते हैं। इस तरह से टेलर ने वैज्ञानिक प्रबन्ध का विकास किया।
टेलर के प्रबन्ध सम्बन्धी अवधारणा का मूल अर्थ है कि— नियोक्ता, श्रमिक एवं ग्राहकों के हितों के बीच टकराव नहीं होना चाहिए। उच्च उत्पादकता सब के हित में है। इससे कर्मचारियों को अधिक वेतन मिलेगा, नियोक्ता का फायदा मिलेगा और ग्राहक को कम कीमत पर माल प्राप्त करना होगा।
■ टेलर का वैज्ञानिक प्रबन्ध सिद्धान्त (प्रमुख बातें)
टेलर ने वै. प्रबन्ध सिद्धान्त के अंतर्गत निम्न 4 बातों का ध्यान दिया:
- [1] कार्य के एक वास्तविक विज्ञान का विकास: प्रबन्धकों को यह जानना जरूरी है कि एक दिन का समुचित काम क्या-क्या है। यह दोनों के हित में है। इससे कामगार बॉस की आलोचनाओं से बचेगा और प्रबन्ध भी कामगारों से अधिक लाभ मिल जाता है। इस प्रकार ज्यादा उत्पादन ऊँचा वेतन और कम्पनी के लिए वृद्धि लाभ हाँसिल करना सम्भव होता है।
- [2] कामगारों का वैज्ञानिक चयन एवं प्रगामी विकास: अर्थात् कामगारों का चुनाव करते समय उनके स्वभाव, कार्य, निष्पादकता की क्षमता, कार्य के प्रति बुद्धि का ध्यान रखा जाए। योग्यवान व विवेकवान श्रमिक मशीनों के साथ स्वेच्छा से तालमेल बना लेते हैं।
- [3] वैज्ञानिक ढंग से प्रशिक्षित व चयनित कामगारों तथा कार्य के विज्ञान को एक साथ लाना: अर्थात् कामगार अपनी पुरानी पद्धति की ओर न लौटे वह नई तकनीकी से कार्य करे। टेलर मानते हैं कि प्रबन्ध की यह जिम्मेदारी है कि कामगार के प्रति वह सहयोगी रवैया अपनाए। प्रयास यह होना चाहिए कि दोनों पक्षों सामंजस्य बने ताकि मानसिक क्रान्ति को बढ़ावा दिया जा सके।
- [4] प्रबन्ध एवं श्रमिकों के बीच कार्य एवं उत्तरदायित्व का विभाजन: दोनों अपने-अपने कार्य के प्रति उत्सुक रहते हैं और कार्य-विभाजन दोनों में एक दूसरे के प्रति समझदारी विकसित करता है एवं पारस्परिक निर्भरता को बढ़ाना देता है।
टेलर ने पद सोपान एवं आदेश की एकता जिसमें एक व्यक्ति का वास होता है, को नकारते हुए कहा कि इसके स्थान पर प्रकार्यात्मक फोरमैन शिप (Functional Foremanship) की व्यवस्था की जा सकती है। जिसमें श्रमिकों के आंशिक रूप से आठ पर्यवेक्षकों से आदेश प्राप्त होता है, इसमें चार को योजना बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी और चार को योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी।
प्रकार्यात्मक फोरमैन शिप के अलावा टेलर ने कुछ और विधियाँ विकसित की जिसमें समय और गति का ध्यान (Time and Motion Study) और औजार एवं पद्धतियाँ, कामगारों के लिए अनुदेश पत्र, आधुनिक प्रणाली आदि शामिल हैं।
✦ 6. टेलर का मानसिक क्रांति (Mental Revolution) का विचार
मानसिक शब्द का शाब्दिक अर्थ है, श्रमिक एवं प्रबन्ध दोनों पक्षों की 'मानसिक मनोवृत्तियों' में आमूल-चूल परिवर्तन लाना। अर्थात् परम्परागत श्रोतों से बाहर निकल कर वैज्ञानिक सोच विकसित करना। इससे कार्य-कुशलता, मितव्ययता के बीच समन्वय स्थापित होता है।
इससे श्रमिक एवं प्रबन्ध संरचना या अतिरिक्त के बंटवारे को छोड़कर उसकी उत्पादकता पर और जोर देता है। इससे मजदूर के वेतन में उच्च वृद्धि हो जाती है, और प्रबन्ध को अधिक फायदा मिल जाता है, और ग्राहकों को अधिक सन्तुष्टि मिल जाती है। इससे श्रमिक व प्रबन्ध के बीच भाई-चारा विकसित हो जाता है। आत्मिक सहयोग पैदा हो जाता है और आपसी झगड़े समाप्त हो जाते हैं तथा शान्ति प्रिय माहौल, भाई-चारे का विकास हो जाता है।
■ आलोचना एवं निष्कर्ष
आलोचना के रूप में हम कह सकते हैं कि टेलर ने औपचारिक संगठन पर अधिक बल देकर व्यवस्था को यन्त्रवत (Mechanistic) बना दिया जिसमें मानवता, संवेदनशीलता और नैतिकता का कोई स्थान नहीं है। उत्पादन पर अधिक जोर देकर मानव को एक उत्पादन करने वाली वस्तु के रूप में देखा जा सकता है।
इस प्रकार टेलर ने 'आर्थिक मानव' (Economic Man) का विचार या संकल्पना प्रस्तुत की।
✦ 7. मैक्स वेबर (Max Weber) का नौकरशाही सिद्धान्त
मैक्स वेबर के नौकरशाही के सिद्धान्त को 'वेबेरियन मॉडल के सिद्धान्त' (Weberian Model) के नाम से भी जाना जाता है। यह परम्परागत सिद्धान्त का एक हिस्सा है और औपचारिक संगठन पर बल देता है। यद्यपि नौकरशाही का सिद्धान्त काफी सीमित है लेकिन आधुनिक काल में मैक्स वेबर ने इसका जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रचलित किया वह पहले विद्यमान नहीं था इसलिए नौकरशाही का सिद्धान्त आज मैक्स वेबर के नाम के साथ जुड़ गया है।
मैक्स वेबर के अनुसार:
"नौकरशाही का आशय नियुक्ति अधिकारियों के प्रशासनिक अभिप्राय से है।"
- नौकरशाही के अन्तर्गत मैक्स वेबर ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल नहीं किया है।
- मैक्स वेबर ने शान्ति और सत्ता (Power and Authority) में अन्तर करते हुए कहा कि— यदि शक्ति को वैधता (Legitimacy) प्राप्त हो जाय या कानूनी स्वीकृत मिल जाय तो वह सत्ता के रूप में प्रकट होती है।
■ सत्ता के तीन प्रकार (मैक्स वेबर के अनुसार)
मैक्स वेबर ने नौकरशाही को 'सत्ता' कहकर पुकारा और मैक्स वेबर ने सत्ता के निम्न तीन प्रकार बताया:
| ① पारम्परिक सत्ता (Traditional Authority) | ऐसी सत्ता जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आती है और समाज उसे स्वयमेव मान्यता दे देता है, पारम्परिक सत्ता कहलाती है। यह प्रायः राजतन्त्रात्मक व्यवस्था में पाया जाता है जहाँ राजा का बड़ा लड़का उसकी अनुपस्थिति में स्वयमेव राजा बन जाता है और समाज उसे स्वयमेव मान्यता प्रदान कर देता है। यहाँ व्यक्तित्व योग्यता का कोई महत्व नहीं है। |
| ② करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority) | इसे 'चमत्कारिक सत्ता' भी कहा जाता है। इसमें कोई व्यक्ति अपने करिश्मा या चमत्कार के बल पर किसी पद का निर्माण करता है या विचारधारा को जन्म देता है एवं उसकी अनुपस्थिति में भी वह पद या विचारधारा उसी रूप में बना रहता है। जैसे: साईं का पद, लामा का पद, शंकराचार्य का पद, बौद्धमत, जैनमत, गाँधीवाद, मार्क्सवाद। इस प्रकार का प्रभाव— सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में विद्यमान है। |
| ③ कानूनी-तर्क संगत सत्ता (Legal-Rational Authority) | इस प्रकार की सत्ता में व्यक्ति का नहीं बल्कि 'पद' का महत्व होता है। जिसमें कोई व्यक्ति राज्य के नियमों व कानूनों के अन्तर्गत अपनी योग्यता के आधार पर किसी पद को प्राप्त करता है और व्यक्ति का महत्व तभी तक है जब तक वह उस पद पर बना हुआ है। यह एक प्रकार से अवैयक्तिकता (Impersonality) को व्यक्त करता है। |
मैक्स वेबर उपर्युक्त तीनों में से कानूनी तर्क संगत सत्ता को सर्वाधिक महत्व देते हैं। मैक्स वेबर ने उपर्युक्त के आधार पर नौकरशाही को दो भागों में बांटा है:
- संरक्षक नौकरशाही: यह नौकरशाही पहली और दूसरी सत्ता पर आधारित है।
- आदर्श नौकरशाही: यह नौकरशाही तीसरी सत्ता (कानूनी) पर आधारित है। इसे 'योग्यता आधारित नौकरशाही' कहा जाता है।
■ आदर्श नौकरशाही के लक्षण या विशेषताएँ
- इसमें कार्य विभाजन होता है जिसमें विशेषीकरण आता है और इसके परिणाम स्वरूप कुशलता आती है।
- इसमें सत्ता पद-सोपान (Hierarchy) पर आधारित होती है अर्थात् ऊपर से लेकर नीचे तक पिरामिडनुमा आकार में अधिकारी व कर्मचारी बंधे होते हैं जिसमें आदेश की एकता की भावना निहित होती है।
- इसमें लिखित नियम व कानून होते हैं।
- इसमें अवैयक्तिकता (Impersonality) पाया जाता है अर्थात् सत्ता व्यक्ति में नहीं बल्कि 'पद' में निहित होती है।
- इसमें तटस्थता (Neutrality) की भावना होती है अर्थात् सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है। किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं होता।
- नौकरशाही में भर्ती योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। खुली प्रतियोगी परीक्षा होनी चाहिए।
- पदोन्नति योग्यता व वरिष्ठता दोनों पर आधारित होनी चाहिए।
- इसमें नकद वेतन की व्यवस्था होती है।
- इसमें अनुशासन व नियन्त्रण होता है।
- इसमें निजी व्यापार नहीं हो सकता, जीवन-यापन केवल वेतन पर आधारित होनी चाहिए।
✦ 8. नौकरशाही की आलोचना एवं प्रमुख विचारकों के मत
मैक्स वेबर की नौकरशाही की कड़ी आलोचना हुई। इसे पूर्णता सैद्धांतिक, अमानवीय एवं यन्त्रवत बताया गया। कठोर नियन्त्रण मनोवैज्ञानिक पहलू के लिए हानिकारक है। एक प्रकार से यह नौकरशाही को केवल औपचारिक कानूनों तक सीमित करके उसे यन्त्रवत बना दिया गया, यह संवेदनहीन और अमानवीय है।
■ नौकरशाही से सम्बन्धित अन्य बातें
नौकरशाही को अंग्रेजी में 'ब्यूरोक्रेसी' (Bureaucracy) कहते हैं जो कि फ्रांसीसी शब्द 'ब्यूरो' (Bureau) से बना है जिसका अर्थ है— डेस्क या मेज। मेज पर बिछे हुए कपड़े को ब्यूरल कहा जाता है अतः फाइनर (Finer) ने ब्यूरोक्रेसी को "मेज या डेस्क का शासन" कहकर पुकारा है।
नौकरशाही शब्द का पहली बार प्रयोग फ्रांसीसी अर्थशास्त्री वीसेन्ट डी गोर्ने (Vincent de Gournay) ने 1754 में किया।
गोर्ने के अनुसार:
"फ्रांस में एक बीमारी है जिसे 'ब्यूरोमेनिया' की संज्ञा दी जाती है।"
यद्यपि नौकरशाही एक प्राचीन कला है, लेकिन जिस रूप में आज इसका अध्ययन किया जाता है वह आधुनिक काल की देन है और 20वीं शताब्दी में इसका वैज्ञानिक प्रतिपादन मैक्स वेबर ने किया था। इसलिए मैक्स वेबर का नाम नौकरशाही के साथ जुड़ गया है।
■ प्रमुख विचारकों की टिप्पणियाँ
• इंग्लैण्ड में नौकरशाही के प्रमुख आलोचकों में रैम्जे म्योर और लार्ड हेवार्ट का नाम आता है।
• रैम्जे म्योर के अनुसार: "नौकरशाही मन्त्रिमण्डलीय उत्तरदायित्व की आड़ में पनपती है।"
• लार्ड हेवार्ट: ने नौकरशाही को 'नवीन निरंकुशता या स्वेच्छाचारिता' का नाम दिया।
• हर्बर्ट मॉरीसन के अनुसार: "नौकरशाही संसदीय प्रजातन्त्र का मूल्य है।"
• पार्किन्स के अनुसार: "नौकरशाही में अधिकारियों के कार्यों का बंटवारा किया जाता है।"
• कार्ल मार्क्स के अनुसार: "नौकरशाही पूँजीपतियों एवं राज्य के हाँथ में एक यन्त्र है जिसका प्रयोग गरीबों के शोषण के लिए किया जाता है।" (रॉबर्ट मिचेल ने इसे अल्पतन्त्र के लौह नियम की नौकरशाही माना।)
■ फ्रीत्ज़ मोरस्टीन (F.M.) मार्क्स के अनुसार नौकरशाही के 4 प्रकार
नौकरशाही के प्रमुख विचारकों में फ्रीत्ज़ मोरस्टीन F.M. मार्क्स, रॉबर्ट मिचेल, मोस्का, मार्टन और कार्ल मार्क्स का नाम आता है। फ्रीत्ज़ मोरस्टीन (F.M.) मार्क्स के अनुसार नौकरशाही निम्नलिखित चार प्रकार की होती है:
| ① जाति पर आधारित नौकरशाही | यह रोमन साम्राज्य में पायी जाती है। |
| ② अभिभावक नौकरशाही | यह चीन व प्रसा (Prussia) में पायी जाती है। |
| ③ संरक्षक नौकरशाही | यह अमेरिका में पायी जाती है। इसे 'लूट शासन प्रणाली' (Spoils System) के नाम से जाना जाता है। |
| ④ योग्यता आधारित नौकरशाही | यह वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पायी जाती है। इसमें खुली प्रतियोगिता होती है। इसका जन्म इंग्लैण्ड में हुआ। |
(Hierarchy)
(आदेश की एकता)
✦ 9. एल्टन मेयो का मानवीय सम्बन्धात्मक सिद्धान्त
एफ. डब्ल्यू. टेलर (F.W. Taylor) के वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त की प्रतिक्रिया स्वरूप एल्टन मेयो (Elton Mayo) का मानवीय सम्बन्धात्मक सिद्धान्त का जन्म हुआ। यह सिद्धान्त 1930 में अस्तित्व में आया।
जहाँ शास्त्रीय या वैज्ञानिक सिद्धान्त ने औपचारिक संगठन तथा यांत्रिक पक्ष पर अधिक बल दिया और सामाजिक मनोवैज्ञानिक की उपेक्षा की। एल्टन मेयो ने इसी कमी को दूर करने के लिए मानव सम्बन्ध सिद्धान्त को जन्म दिया जो अनौपचारिक संगठन पर आधारित है। इसके समर्थकों में रोथ्लिस बर्जर (Roethlisberger) और मैरी पार्कर फॉलेट (Mary Parker Follett) का नाम आता है।
इस सिद्धान्त की मुख्य परिकल्पना यह है कि व्यक्ति के तौर पर श्रमिक और उसके कार्य समूह के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक पक्षों को महत्व देना चाहिए। जहाँ शास्त्रीय सिद्धान्त औपचारिक संगठन, यांत्रिकता और 'आर्थिक मानव' पर बल देता है, वहीं पर मानवीय सिद्धान्त अनौपचारिक संगठन, व्यवहारिकता, एवं 'सामाजिक मानव' पर बल देता है।
■ हाथोर्न प्रयोग (Hawthorne Experiments)
एल्टन मेयो ने हाथोर्न प्रयोग से वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त को हिलाकर रख दिया और मानवीय सिद्धान्त के महत्व को स्थापित किया। यह प्रयोग मानवीय सिद्धान्त का आधार है।
हाथोर्न प्रयोग अमेरिका के शिकागो नगर के समीप वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कम्पनी (Western Electric Company) के हाथोर्न नामक स्थान पर स्थित विशाल संयन्त्र में किये गये हैं। यह प्रयोग मुख्य रूप से निम्न 4 चरणों में हुआ:
- महान प्रकाश व्यवस्था (Great Illumination Experiment): यह प्रयोग फैक्ट्री में कारगर श्रमिकों के समूहों के कार्य निष्पादन पर प्रकाश (Light) का प्रभाव जानने के लिए किया गया। लेकिन इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
- रिले असेम्बली टेस्ट रूम प्रयोग (Relay Assembly Test Room): यह प्रयोग श्रमिकों की कार्य स्थितियों में परिवर्तन करके यह जानना था कि श्रमिकों के मनोबल एवं उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ता है, लेकिन इसका भी कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया।
- मानवीय प्रवृत्तियों तथा भावनाओं पर साक्षात्कार (Interview Program): अध्ययन दल ने इस शोध में व्यक्तियों से बातचीत द्वारा मानवीय व्यवहार और उनकी भावनाओं को जानने का प्रयास किया।
- सामाजिक संगठन या बैंक वायरिंग प्रयोग (Bank Wiring Observation Room): यह अन्तिम प्रयोग था जो समूह के व्यवहार के विश्लेषण पर आधारित है। अध्ययन दल ने समूह के व्यवहार को जाँचा।
इस प्रयोग का विस्तृत विवरण रोथ्लिस बर्जर तथा विलियम जे. डिक्सन द्वारा रचित पुस्तक 'Management and the Worker' में उपलब्ध है।
■ हाथोर्न प्रयोग के निष्कर्ष एवं आलोचना
एल्टन मेयो के उपर्युक्त प्रयोग से निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आया:
- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे मशीन के समान नहीं समझा जाना चाहिए।
- सामाजिक व मनोवैज्ञानिक तत्व श्रमिकों के कार्य, मनोबल आदि उत्पादन को प्रभावित करते हैं न कि भौतिक पक्ष।
- कार्य विभाजन, विशेषीकरण सहयोग प्राप्त करने के लिए कुशल दृष्टिकोण नहीं हैं बल्कि सामाजिक कौशल महत्वपूर्ण है।
- औपचारिक संगठन के स्थान पर अनौपचारिक संगठन को विकसित किया जाना चाहिए।
- श्रमिकों के व्यवहार, सन्तुष्टि, उत्पादन में नेतृत्व, निरीक्षण की विधि, संचार एवं सहयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इन्हीं सब बातों ने मानव सम्बन्ध सिद्धान्त को जन्म दिया। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि इसने निम्न तीन बातों पर बल दिया: (1) व्यक्ति का महत्व और उसकी सामाजिकता, (2) अनौपचारिक संगठन, (3) साझेदारी प्रबन्धन (Participative Management)।
आलोचना: इस सिद्धान्त में सैद्धांतिकता या तत्वों की पूर्णता उपेक्षा हुई। इसके प्रमुख आलोचकों में बैन्डिक्स, फिशर और डेनियल बेल हैं। इन्होंने हाथोर्न प्रयोग और मानव सम्बन्धात्मक सिद्धांत की आलोचना की।
✦ 10. शास्त्रीय सिद्धान्त और मानवीय सिद्धान्त में अन्तर
शास्त्रीय (परम्परागत) सिद्धान्त और मानवीय सम्बन्धात्मक सिद्धान्त के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| शास्त्रीय सिद्धान्त (Classical Theory) | मानवीय सिद्धान्त (Human Relations Theory) |
|---|---|
| यह औपचारिक संगठन पर बल देता है। | यह अनौपचारिक संगठन पर बल देता है। |
| यह संगठन को तार्किक तथा व्यवस्थित संस्था मानता है। | यह संगठन को भावनात्मक एवं सामाजिक व्यवस्था मानता है। |
| यह मनुष्य को 'आर्थिक मानव' (Economic Man) के रूप में देखता है। | यह मनुष्य को 'सामाजिक मानव' (Social Man) के रूप में देखता है। |
| यह संगठन के मशीनी तथा क्रिया-प्रणाली पर अधिक जोर देता है। | यह सामाजिक मनोवैज्ञानिक पक्ष पर अधिक बल देता है। |
| यह संगठन को पूर्णतः नियमों, कानूनों के अन्तर्गत संचालित करने का प्रयास करता है। | यह भावनाओं, अभिवृत्तियों तथा इच्छाओं को संगठनात्मक व्यवहार का आधार मानता है। |
| यह कार्मिकों को एकरूपी (Uniform) मानता है। | यह कार्मिकों को विविधता से परिपूर्ण मानता है। |
| यह भौतिक पर्यावरण पर बल देता है। | यह सामाजिक पर्यावरण पर बल देता है। |
| यह मनुष्य को आणविक (Atomic) रूप में देखता है। | यह मनुष्य को सामाजिक मानव के रूप में देखता है। |
✦ 11. व्यवहारवादी उपागम एवं चेस्टर बर्नार्ड का सिद्धान्त
व्यवहारवाद के प्रमुख विचारकों में चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard), हर्बर्ट साइमन, मैस्लो, हर्जबर्ग आदि का नाम आता है।
व्यवहारवाद के आगमन से पहले शास्त्रीय विचारकों ने औपचारिक संगठन, आर्थिक प्रेरणा, भौतिक यांत्रिक कारकों, तथ्यों तथा तार्किकता आदि पर बल दिया। जबकि मानव सम्बन्ध के विचारकों ने अनौपचारिक संगठन की रचना, सामाजिक मनोवैज्ञानिक कारकों, मूल्यों तथा गैर-तार्किकता पर अधिक बल दिया।
व्यवहारवादी उपागम के अनुसार— उपर्युक्त दोनों सिद्धान्त अपने-आप में अपूर्ण हैं और दोनों का समन्वय (Synthesis) होना चाहिए। एक प्रकार से, शास्त्रीय उपागम 'वाद' (Thesis) है तो मानवीय उपागम 'प्रतिवाद' (Antithesis) है और व्यवहारवादी उपागम 'संवाद' (Synthesis) है।
संक्षेप में व्यवहारवादी उपागम की विशेषताएं निम्न हैं:
- यह मानव सम्बन्धात्मक सिद्धान्त का विकसित रूप है।
- व्यवहारवाद शक्ति के गत्यात्मक पहलू (Dynamic Aspect) से सम्बन्धित है।
- यह तथ्य एवं मूल्य (Facts & Values) दोनों पहलुओं पर बल देता है।
- यह लोक प्रशासन के अध्ययन में अन्तर्विषयक उपागम (Interdisciplinary Approach) को विकसित किया अर्थात् मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के अध्ययन पर भी बल दिया।
निष्कर्ष: व्यवहारवाद वास्तविक व्यवहार पर बल देता है। यह मानवीय व्यवहार का वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित विश्लेषण करता है।
■ चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard) का योगदान
बर्नार्ड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Functions of the Executive' में अपना विचार व्यक्त किया। बर्नार्ड ने संगठन के प्रकार, साम्यावस्था और सत्ता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
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① संगठन के प्रकार: बर्नार्ड ने संगठन के दो प्रकार बताये:
(a) औपचारिक संगठन: इस प्रकार के संगठन जान-बूझकर बनाये जाते हैं, और ये चार्ट या डायग्राम के द्वारा व्यक्त होते हैं। इनका स्वरूप प्रायः कानूनी होता है।
(b) अनौपचारिक संगठन: ये संगठन अंजाने में ही विकसित होते हैं, ये चार्ट एवं डायग्राम के द्वारा प्रदर्शित नहीं किये जाते हैं। - ② साम्यावस्था का सिद्धान्त (Equilibrium Theory): चेस्टर बर्नार्ड का मानना है कि संगठन के हित और व्यक्ति के हित में साम्य (Balance) होना चाहिए।
- ③ सत्ता का सिद्धान्त (Theory of Authority): बर्नार्ड ने शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार परिभाषित सत्ता को नकारते हुए कहा कि— "सत्ता अधीनस्थों के द्वारा स्वीकृत होनी चाहिए" और उच्च अधिकारी द्वारा निम्न अधिकारी को दिया गया आदेश निम्न तीन प्रकार का होता है: (i) अधीनस्थों द्वारा पूर्ण रूप से अस्वीकार किया जा सकता है। (ii) पूर्ण रूप से स्वीकार किया जा सकता है। (iii) स्वीकार या अस्वीकार दोनों किया जा सकता है।
बर्नार्ड ने कहा कि आदेशों की पूर्ण रूप से स्वीकारता के लिए निम्न चार शर्तें होनी चाहिए:
- आदेश संगठन के हित में हो।
- आदेश व्यक्ति के हित में हो।
- आदेश को पूर्ण रूप से समझा जाय।
- आदेश पालन हेतु अधीनस्थ शारीरिक रूप से तैयार हो।
✍️ निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त समग्र विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि लोक प्रशासन में संगठन (Organization) का सिद्धान्त समय के साथ अत्यधिक विकसित हुआ है। प्रारम्भिक शास्त्रीय सिद्धान्त ने जहाँ कार्य की कुशलता और ढाँचे पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं बाद के मानवीय एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोणों ने संगठन में कार्यरत 'मानव' के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों को महत्वपूर्ण बनाया।
आज के दौर में, संगठन न तो केवल एक 'मशीन' है और न ही केवल 'मानवीय भावनाओं' का समूह। यह औपचारिक संरचना और अनौपचारिक मानवीय संबंधों का एक अनूठा संगम है। चाहे वह टेलर का वैज्ञानिक प्रबन्धन हो, वेबर की नौकरशाही हो, या एल्टन मेयो और बर्नार्ड के मानवीय दृष्टिकोण—प्रत्येक ने लोक प्रशासन को आधुनिक और अधिक प्रभावी बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। अतः, एक सफल प्रशासनिक व्यवस्था हेतु हमें इन सभी सिद्धान्तों के उचित समन्वय की आवश्यकता है।
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