संविधान, संवैधानिक सरकार और संविधानवाद: अर्थ, प्रकार एवं अवधारणा

भारतीय संविधान, संवैधानिक सरकार और संविधानवाद के अर्थ और अवधारणा को समझाते हुए Polity के नोट्स
संविधान, संवैधानिक सरकार और संविधानवाद
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष लेख में संविधान, संवैधानिक सरकार (Constitutional Government) और संविधानवाद (Constitutionalism) का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें संविधान के प्रकार, विचारकों के प्रमुख कथन (जैसे- अरस्तू, फाइनर, ब्राइस), सीमित सरकार के तत्व, और विशेष रूप से विकासशील देशों में संविधानवाद की चुनौतियों को आसान भाषा में समझाया गया है। यह हस्तलिखित नोट्स PGT, TGT, GIC और NET-JRF, UPSC, PCS (राजनीति विज्ञान) परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

✦ 1. संविधान (Constitution): एक परिचय एवं प्रकार

संविधान शब्द 'सम' (समान) और 'विधान' (कानून या नियम) से मिलकर बना है। राज्य के लिए संविधान एक विशेष प्रकार का विधान (विशेषण) होता है, जिसके माध्यम से राज्य की शासन व्यवस्था का संचालन किया जाता है।

सरकार के तीन प्रमुख अंग

सरकार (Government)
व्यवस्थापिका
(कानून बनाना)
कार्यपालिका
(कानून लागू करना)
न्यायपालिका
(न्याय करना)

व्यवस्थापिका जो भी कानून बनाती है, वह सामान्य कानून होता है (जैसे- दहेज अधिनियम, पोटा, टाडा, यूएपीए आदि), लेकिन संविधान देश का सर्वोच्च और मौलिक कानून होता है।

■ राज्य के रूप (अरस्तू का वर्गीकरण)

प्रसिद्ध यूनानी विचारक अरस्तू ने राज्य के रूपों को उनके उत्कृष्ट (जनहित) और विकृत (स्वार्थ) रूपों में इस प्रकार बाँटा है:

राज्य के रूप (Forms of State)
राजतंत्र
⬇
निरंकुश तंत्र
(विकृत रूप)
कुलीन तंत्र
⬇
धनिक/गुट तंत्र
(विकृत रूप)
लोकतंत्र (Polity)
⬇
भीड़ तंत्र
(विकृत रूप)

■ संविधान के प्रकार (Types of Constitution)

(क) उत्पत्ति के आधार पर विकसित संविधान (Evolutionary) और निर्मित संविधान (Enacted)
(ख) लिखावट के आधार पर अलिखित संविधान (Unwritten) और लिखित संविधान (Written)
(ग) परिवर्तनशीलता के आधार पर लचीला संविधान (Flexible) और कठोर संविधान (Rigid)
महत्वपूर्ण तुलनात्मक तथ्य (Extra Facts):
• ब्रिटेन का संविधान: यह एक विकसित, अलिखित तथा लचीला संविधान है (परम्पराओं पर आधारित)।
• U.S.A का संविधान: यह एक निर्मित, लिखित तथा अत्यंत कठोर संविधान का उदाहरण है (विश्व का प्रथम लिखित संविधान - 1789)।
• भारत का संविधान: भारत का संविधान लचीला तथा कठोर का एक अद्भुत समन्वय (Mixture) है। यह निर्मित और विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। कठोर संविधान से अभिप्राय यह है कि इसमें सामान्य रूप से (आसानी से) संशोधन नहीं किया जा सकता।

✦ 2. संविधान पर आधारित प्रमुख विचारकों के कथन

विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने संविधान के महत्व को निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट किया है:

  • 1. जेलिनेक (Jellinek) के अनुसार: "संविधान विहीन राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। संविधान के अभाव में राज्य, राज्य न होकर एक प्रकार की अराजकता होगी।"
  • 2. गार्नर (Garner) के अनुसार: "लिखित तथा अलिखित संविधान में अन्तर केवल मात्रा का है, प्रकार का नहीं।"
  • 3. सी. एफ. स्ट्रॉन्ग (C.F. Strong) के अनुसार: "संविधान उन सिद्धान्तों का संग्रह है जिसके द्वारा सरकार की शक्तियों, शासितों के अधिकार तथा शासक तथा शासितों के पारस्परिक सम्बन्धों का नियमन होता है।"
  • 4. अरस्तू (Aristotle) के अनुसार: "संविधान उस (जीवन) पद्धति का प्रतीक होता है जो किसी राज्य द्वारा अपने लिये अपनायी जाती है।"
  • 5. डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार: "संविधान उन समस्त नियमों का संग्रह है जिसका राज्य का प्रभुत्व सत्ता के प्रयोग अथवा वितरण पर प्रभाव पड़ता है।"
  • 6. फाइनर (H. Finer) के अनुसार: "संविधान शक्ति सम्बन्धों की आत्मकथा है।"
  • 7. हेनरी मेन (Henry Maine) के अनुसार: "संविधान निर्मित नहीं होते हैं, अपितु विकसित होते हैं।" (यह विशेष रूप से ब्रिटिश संविधान के सन्दर्भ में है)।
  • 8. डी. टॉकविले (De Tocqueville) के अनुसार: "ब्रिटिश संविधान का कोई अस्तित्व नहीं है।"
  • 9. डी. लोल्मे (De Lolme) के अनुसार: "ब्रिटिश संसद इतनी शक्तिशाली है कि वह स्त्री को पुरुष, और पुरुष को स्त्री बनाने के अतिरिक्त सब कुछ में परिवर्तन कर सकती है।"

✦ 3. संवैधानिक सरकार (Constitutional Government)

संविधान एक विशेष प्रकार का विधान होता है जो राज्य या सरकार के लिये होता है। राज्य का स्वरूप कुछ भी हो, लेकिन प्रत्येक राज्य का एक संविधान अवश्य होता है (चाहे वह लिखित हो या अलिखित)। संविधान में इस बात का वर्णन होता है कि राज्य या सरकार का आचरण कैसा होना चाहिए। अतः संविधान की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि संविधान राजकीय विधान का वह आचरण जिसमें व्यक्ति व राज्य तथा व्यक्ति व व्यक्ति के बीच संबंधों को व्यक्त किया जाता है तथा इसमें सबसे बढ़कर सरकार के विविध अंगों कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका के बीच के संबंधों को सुनिश्चित किए जाते हैं।

संवैधानिक सरकार से आशय 'सीमित सरकार' (Limited Government) से होता है। संवैधानिक सरकार वह सरकार होती है जो संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार संगठित, सीमित एवं नियंत्रित हो, तथा व्यक्ति विशेष की इच्छाओं के स्थान पर विधि (कानून) के अनुरूप ही संचालित हो।

■ संवैधानिक सरकार के 4 प्रमुख तत्व

  1. सीमित सरकार (सरकार की शक्तियों पर अंकुश)
  2. संविधान के अनुसार संचालित शासन
  3. विधि का शासन (Rule of Law)
  4. नागरिक अधिकारों का समावेश एवं शक्तियों का विभाजन

यद्यपि संवैधानिक सरकार के अंतर्गत उपर्युक्त चार बातें शामिल हैं, लेकिन सीमित सरकार की अवधारणा इनकी केंद्रीय अवधारणा है।

संविधान और संवैधानिक सरकार में मुख्य अंतर:
प्रत्येक राज्य में किसी न किसी प्रकार का संविधान अवश्य होता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि वहाँ 'संवैधानिक सरकार' भी हो।
उदाहरण के लिए- हिटलर (जर्मनी) व स्टालिन (रूस) के समय भी संविधान तो था, लेकिन उनकी सरकारें संवैधानिक नहीं थीं (क्योंकि वे निरंकुश थीं)। इसके विपरीत, इंग्लैण्ड में कोई लिखित संविधान नहीं है, फिर भी वहाँ 'संवैधानिक सरकार' मौजूद है क्योंकि वहाँ विधि का शासन और जन-अधिकारों की रक्षा होती है। इंग्लैंड में संविधान को संसद तय करती है और संसद समय-समय पर जो कानून बनाती है, वही संविधान का हिस्सा बन जाता है।

✦ 4. संविधानवाद (Constitutionalism): अर्थ एवं लक्षण

संविधानवाद दो शब्दों 'संविधान' + 'वाद' से मिलकर बना है। 'वाद' का अर्थ होता है- आस्था, विश्वास या विचारधारा। अर्थात् यह संविधान पर आधारित एक ऐसी विचारधारा है जो उस देश की जनता के आदर्शों, आस्थाओं, विश्वासों और मूल्यों पर आधारित होती है।

"संविधानवाद एक ऐसी विचारधारा को व्यक्त करता है जो जनता के आदर्शों, मूल्यों व विश्वासों पर बना हो और व्यवहार में वैसा ही दिखाई देता हो।"
तानाशाह का उदाहरण: यदि कोई तानाशाह जबरदस्ती कोई संविधान बना ले और शासन करने लगे, तो उसे हम 'संविधानवाद' नहीं कह सकते। क्योंकि भले ही वहाँ संविधान हो, लेकिन उसमें जनता की आस्था, मूल्य व विश्वास नहीं जुड़ा होता है।
संविधानवाद = संविधान + संवैधानिक सरकार

■ संविधान और संविधानवाद में मुख्य सम्बन्ध

  • साध्य और साधन: संविधानवाद एक साध्य (End) है, जबकि संविधान उसे प्राप्त करने का साधन (Means) है।
  • आदर्श अवधारणा: संविधानवाद एक अत्यंत आदर्शवादी अवधारणा है, जिसका व्यवहार में पूर्णतः प्रकटीकरण सम्भव नहीं हो पाता।
  • सार्वभौमिकता: किन्हीं दो देशों के संविधान एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनका 'संविधानवाद' एक हो सकता है (जैसे- भारत और अमेरिका का संविधान अलग है, लेकिन दोनों का संविधानवाद 'लोकतंत्र व जनहित' पर आधारित है)।
  • पूर्व-शर्त (Prerequisites): संविधानवाद के लिए 'संविधान' और 'संवैधानिक सरकार' का होना अनिवार्य पूर्व-शर्त है। इनके बिना संविधानवाद की कल्पना भी सम्भव नहीं है।

■ संविधानवाद के प्रमुख लक्षण

  • संविधानवाद- संविधान जन्य (Constitution-born) अवधारणा है (इसका जन्म संविधान से होता है)।
  • संविधानवाद- मूल्य सम्बद्ध (Value-bound) अवधारणा है।
  • संविधानवाद- संस्कृति सम्बद्ध (Culture-bound) अवधारणा है (उस देश की संस्कृति से गहराई से जुड़ा होता है)।
  • संविधानवाद- प्रधानता साध्य-मूलक (End-oriented) अवधारणा है।
  • संविधानवाद- एक गत्यात्मक (Dynamic) अवधारणा है (जो समय और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है)।
  • संविधानवाद- एक सहभागी (Participatory) अवधारणा है (जिसका अर्थ है- सब लोगों को साथ लेकर चलना)।
विचारकों के कथन:

• कार्ल जे. फ्रेडरिक: "व्यवस्थित परिवर्तन की जटिल प्रकार्यात्मक व्यवस्था ही संविधानवाद है।"

• सी. एफ. स्ट्रॉन्ग: "संविधान एवं संविधानवाद में कोई अन्तर नहीं है।"

✦ 5. संविधानवाद का विकास एवं उदारवादी अवधारणा

यद्यपि संविधानवाद का जन्म प्राचीन काल से हुआ, लेकिन जिस रूप में आज हम संविधानवाद का अध्ययन करते हैं, वह आधुनिक काल की देन है। इसके विकास में यूनान, रोम, ब्रिटेन, फ्रांस, और संयुक्त राज्य अमेरिका आदि का विशेष हाथ रहा है।

  • ब्रिटेन: 'विधि के शासन' का विचार दिया।
  • फ्रांस: 'स्वतंत्रता, समानता व बन्धुता' की अवधारणा दी।
  • U.S.A: 'लिखित संविधान' तथा 'शक्तियों का पृथक्करण' का विचार दिया।
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ (League of Nations) के रूप में अंतरराष्ट्रीयवाद (Internationalism) का विकास हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे सशक्त बनाने के लिए UNO का जन्म हुआ।

■ पाश्चात्य / उदारवादी अवधारणा

संविधानवाद की तीन प्रमुख अवधारणाएं प्रचलित हैं: (1) उदारवादी, (2) साम्यवादी, (3) विकासशील देशों की अवधारणा। इनमें वर्तमान में केवल उदारवादी (पाश्चात्य) अवधारणा ही सर्वाधिक मान्य है। पाश्चात्य अवधारणा दो मुख्य स्तंभों पर खड़ी है:

[A] सीमित सरकार (Limited Govt.) के तत्व

  • विधि का शासन
  • मौलिक अधिकारों का समावेश
  • शक्तियों का विकेन्द्रीकरण
  • शक्तियों का पृथक्करण
  • स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका
[B] राजनीतिक उत्तरदायित्व के तत्व

  • राजनीतिक दलों का अस्तित्व
  • समय-समय पर निष्पक्ष चुनाव
  • प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता
  • सुदृढ़ एवं प्रभावी जनमत
  • स्वस्थ परम्पराएँ एवं सामाजिक बहुलवाद

(राजनीतिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि सरकार के प्रत्येक अंग जनता के प्रति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्तरदायी हों।)

✦ 6. विकासशील देशों में संविधानवाद की अवधारणा

विकासशील देशों में संविधानवाद अभी विकसित नहीं हो पाया है क्योंकि इन देशों की समस्याएँ भिन्न-भिन्न हैं। विकासशील देशों में कहीं साम्यवादी व्यवस्था, कहीं उदारवादी व्यवस्था तो कहीं सैनिक शासन स्थापित है।

■ विकासशील देशों की कुछ सामान्य समस्याएं निम्नलिखित हैं—

  1. राजनीति स्थायित्व की समस्या
  2. आर्थिक विकास की समस्या
  3. सुरक्षा की समस्या
  4. राजनीतिक संरचना और विकल्पों की समस्या
  5. राजनीतिक सत्ता की वैधता (Legitimacy) की समस्या
  6. आधुनिकीकरण की समस्या
  7. राजनीतिक, सांस्कृतिक साम्य की समस्या / सामाजिक समस्या

■ विकासशील देशों के संविधानवाद को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है—

  • ① संविधानवाद मिश्रित प्रकृति का है।
  • ② यह संक्रमण कालीन स्थिति में है।
  • ③ यह निर्माण एवं प्रवाह के दौर में है।
  • ④ यह दिशा रहित है।
विचारकों के कथन:

• फ्रेड रिग्स: "राज्य नये हैं और राजनीतिक खेल के नियम प्रवाह में हैं इसलिये संविधानवाद अभी तक स्थिर नहीं हो सका है।"

• कार्ल लोवेन्स्टीन: "विकासशील देशों के संविधान नाममात्र के संविधान हैं।"

निष्कर्ष (Note):

हम जानते हैं संविधानवाद की पाश्चात्य या उदारवादी अवधारणा वर्तमान में मान्य है क्योंकि विकासशील देशों में न कोई संविधान विकसित ही हो पाया और साम्यवादी देशों में संविधानवाद की प्रासंगिकता नहीं है क्योंकि संविधान के लिखे नियम और उनकी व्यवहारिकता में कोई समानता नहीं होती है।


★ अतिरिक्त विश्लेषणात्मक जानकारी (विस्तार):

1. विकासशील देशों की विडंबना: अधिकांश विकासशील देश (एशिया व अफ्रीका) औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद इनका मुख्य लक्ष्य 'राष्ट्र-निर्माण' (Nation Building) और 'गरीबी उन्मूलन' रहा। इन विशाल लक्ष्यों की त्वरित प्राप्ति के लिए सरकारों (कार्यपालिका) ने शक्तियों का केन्द्रीकरण कर लिया, जिससे 'सीमित सरकार' (जो संविधानवाद का मूल है) का पतन हुआ और कई जगह सैनिक तानाशाहियां पनप गईं।

2. साम्यवादी देशों में संविधानवाद का अभाव: साम्यवादी देशों (जैसे- पूर्व सोवियत संघ या वर्तमान चीन) में संविधान तो होता है, लेकिन वहाँ 'कम्युनिस्ट पार्टी' संविधान से ऊपर होती है। संविधानवाद 'विधि के शासन' की माँग करता है, जबकि साम्यवाद 'पार्टी के शासन' पर बल देता है। इसलिए वहाँ का संविधान केवल दिखावा (Facade) मात्र रह जाता है।

3. उदारवादी अवधारणा की सफलता का कारण: पाश्चात्य या उदारवादी अवधारणा इसलिए सफल रही क्योंकि इसने शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers), स्वतंत्र न्यायपालिका, और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा को व्यावहारिक रूप से लागू किया।

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★ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. संविधानवाद (Constitutionalism) का मूल अर्थ क्या है?
संविधानवाद का अर्थ है शासन की वह व्यवस्था जो जनता के आदर्शों, मूल्यों और विश्वासों पर आधारित हो। यह 'सीमित सरकार' और 'विधि के शासन' की वकालत करता है।
Q2. क्या हर उस देश में जहाँ संविधान है, वहाँ संवैधानिक सरकार भी होती है?
नहीं! हिटलर और स्टालिन के पास भी संविधान था, लेकिन उनकी सरकार निरंकुश थी। संवैधानिक सरकार होने के लिए सरकार का संविधान के अनुसार संचालित होना और नागरिक अधिकारों का सुरक्षित होना अनिवार्य है।
Q3. संविधानवाद की कौन-सी अवधारणा वर्तमान में सर्वाधिक मान्य है?
वर्तमान में पाश्चात्य या उदारवादी अवधारणा ही सर्वाधिक मान्य है, क्योंकि यह विधि के शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका और राजनीतिक उत्तरदायित्व (स्वतंत्र प्रेस, चुनाव आदि) पर आधारित है।
Q4. "संविधान शक्ति सम्बन्धों की आत्मकथा है" - यह किसका कथन है?
यह प्रसिद्ध कथन राजनीतिशास्त्री फाइनर (H. Finer) का है।
Q5. विकासशील देशों में संविधानवाद की क्या स्थिति है?
विकासशील देशों में संविधानवाद अभी संक्रमणकालीन, मिश्रित और दिशा रहित स्थिति में है। फ्रेड रिग्स के अनुसार, यहाँ "राजनीतिक खेल के नियम अभी प्रवाह में हैं और स्थिर नहीं हो सके हैं।"
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