| तुलनात्मक राजनीति: अर्थ, प्रकृति, क्षेत्र, विकास एवं उपागम |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष लेख में तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें तुलनात्मक राजनीति का अर्थ, प्रकृति (क्षैतिज व लम्बात्मक), क्षेत्र, प्रथम व द्वितीय चरण में इसका ऐतिहासिक विकास (अरस्तू से लेकर आधुनिक काल तक), और प्रमुख परम्परागत व आधुनिक उपागमों (जैसे- डेविड ईस्टन का व्यवस्था सिद्धान्त, गैब्रियल आमण्ड का प्रकार्यात्मक मॉडल) को बहुत ही आसान भाषा में समझाया गया है। यह हस्तलिखित नोट्स PGT, TGT, GIC और NET-JRF, UPSC, PCS(राजनीति विज्ञान) परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। |
📚 विषय सूची (Table of Contents)
- 1. तुलनात्मक राजनीति: एक परिचय एवं प्रकृति
- 2. तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र (Scope)
- 3. तुलनात्मक राजनीति का विकास (प्रथम चरण)
- 4. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकास (द्वितीय चरण)
- 5. तुलनात्मक राजनीति के उद्देश्य एवं समस्याएँ
- 6. तुलनात्मक राजनीति के उपागम (Approaches)
- 7. निष्कर्ष एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
✦ 1. तुलनात्मक राजनीति: एक परिचय एवं प्रकृति
विभिन्न शताब्दियों में राजनीति के स्वरूप में बदलाव
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• संस्थाओं पर बल • मूल्यों पर बल • संकुचित राजनीति |
18वीं - 19वीं शताब्दी
(परम्परागत तुलनात्मक राजनीति) |
यूरोपीय राजनीति (U.S.A एवं यूरोपीय देश) |
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• मानव व्यवहार पर बल • तथ्यों पर बल • व्यापक राजनीति |
20वीं शताब्दी
(आधुनिक तुलनात्मक राजनीति) |
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति (U.S.A, यूरोपीय देश व तृतीय विश्व के देश) |
20वीं शताब्दी में राजनीति का स्वरूप यूरोपीय राजनीति, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बदल गया। अब अध्ययन का केन्द्र व्यक्ति नहीं बल्कि समूह अध्ययन का केन्द्र बिन्दु हो गया।
- The Process of Government: आर्थर बेन्टले
- Government of Process: डेविड ट्रूमैन
राबर्ट्सन ने स्वीकार किया तुलनात्मक राजनीति एवं तुलनात्मक सरकार में कोई अन्तर नहीं है।
■ तुलनात्मक राजनीति का अर्थ एवं प्रकृति
तुलनात्मक राजनीति का जन्म किसी न किसी रूप में राजनीति विज्ञान के जन्म के साथ हुआ। अरस्तू को न केवल राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है बल्कि उन्हें तुलनात्मक राजनीति विज्ञान का भी जनक माना जाता है। क्योंकि अरस्तू पहले विचारक थे जिसने 158 देशों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह बताने का प्रयास किया कौन-सी शासन प्रणाली श्रेष्ठ हो सकती है, साथ-साथ शासन प्रणाली के कितने रूप हो सकते हैं।
वैसे तो तुलनात्मक राजनीति का जन्म आधुनिक काल में हुआ लेकिन जिस रूप में आज हम तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन करते हैं, वह 20वीं शताब्दी की देन है और यह मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आयी। सन् 1908 में आर्थर बेन्टले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Process of Government' में समूह का विचार दिया।
तुलनात्मक शासन और राजनीति की मुख्य विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में प्रचलित राजनीतिक प्रणालियों की तुलना की जाती है, जहाँ एक से ढांचा पाये जाते हैं। कभी-कभी दूसरे देशों से भिन्न प्रणालियों पर भी अन्तर या समानता पर विचार किया जाता है। जैसे: भारत व U.S.A के संघीय व्यवस्था में समानता व अन्तर दोनों देख सकते हैं। भारत व इंग्लैण्ड की संसदीय प्रणाली में हम तुलनात्मक अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि संसदीय प्रणाली इंग्लैण्ड में अधिक सफल है भारत में क्यों नहीं।
■ प्रमुख विचारकों की परिभाषाएं
- एडवर्ड फ्रीमैन: "तुलनात्मक राजनीति, संस्थाओं एवं सरकारों के विविध प्रकारों का एक तुलनात्मक विवेचन एवं विश्लेषण है।"
- मैक्रिडिस: "हैरोडोटस तथा अरस्तू के समय से ही राजनीतिक मूल्यों, विश्वासों, संस्थाओं, सरकारों एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं में विविधताएं जीवन्त रही हैं। इन विविधताओं में समान तत्वों की छानबीन करने के लिये जिस पद्धति का विकास हुआ हो उसे तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण कहा जाना चाहिए।"
नोट: कुछ लोग तुलनात्मक राजनीति एवं तुलनात्मक शासन में अन्तर मानते हैं, तुलनात्मक शासन के अन्तर्गत शासन के विविध अंगों की तुलना करना चाहिए। लेकिन आज यह विचार पुराना पड़ गया है, आज इसे अलग-अलग न मानकर एक ही मान लिया गया है। इसलिये तुलनात्मक राजनीति, तुलनात्मक शासन के बजाय इसे तुलनात्मक शासन की राजनीति कहा जाने लगा है।
- जीन ब्लोण्डेल: "तुलनात्मक सरकार समकालीन विश्व में राष्ट्रीय सरकारों का प्रतिमानों का अध्ययन है।"
- जी. के. राबर्ट्स ने तुलनात्मक सरकार व तुलनात्मक राजनीति को अलग-अलग माना।
■ तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति (Nature)
तुलनात्मक राजनीति की प्रकृति समझने के लिये निम्न दो विचार धारा प्रचलित हैं:
लम्बात्मक या उर्ध्वाधर या उदग्र अध्ययन (Vertical)
(इसमें समानता कम, असमानता ज्यादा है)
क्षैतिज तुलना (Horizontal)
(वर्तमान में इसी प्रकृति को स्वीकार किया गया है, इसमें समानता होती है)
लम्बात्मक या उर्ध्वाधर या उदग्र अध्ययन: इसके अन्तर्गत तुलनात्मक राजनीति एक ही देश में स्थित विभिन्न स्तरों पर स्थापित सरकारों व उनको प्रभावित करने वाले राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन है। जैसे: भारत में संघीय व्यवस्था है जिसमें तीन स्तर की सरकार है - संघ, राज्य व स्थानीय, इनका अध्ययन किया जाता है। ध्यान रहे कि उर्ध्वाधर को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें समानता कम असमानता ज्यादा है और तुलनात्मक अध्ययन के लिये समानता एवं समता लगभग एक जैसी होनी चाहिए।
क्षैतिज तुलना (Horizontal): वर्तमान में तुलनात्मक राजनीति की इसी प्रकृति को स्वीकार किया गया है। इसके द्वारा एक देश में विविध कालों में प्रचलित सरकारों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है, जैसे- नेहरू, इंदिरा गांधी, मनमोहन के कार्य या विदेश नीति की तुलना कर सकते हैं। क्षैतिज तुलना द्वारा विभिन्न देशों या राष्ट्रों के बीच चल रही सरकारों का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
✦ 2. तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र (Scope)
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन के निम्नलिखित तीन पक्ष मिलता है (क्षेत्र):
- ① राजनीतिक क्रिया-कलाप (Political Activity)
- ② राजनीतिक प्रक्रिया (Political Process)
- ③ राजनीतिक सत्ता (Political Authority)
तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र निश्चित नहीं है क्योंकि समाज व व्यवस्था के बदलाव लगातार होने से क्षेत्र में परिवर्तन होता रहता है। इसलिये माना जाता है कि तुलनात्मक राजनीति अभी शैशवावस्था (अर्थात् निर्माण की अवस्था) में है इसका विषय क्षेत्र निश्चित नहीं हो पाया है।
हैरी एक्सस्टीन: "सबसे अधिक आधारभूत बात तुलनात्मक राजनीति के बारे में यह है कि आज यह ऐसा विषय क्षेत्र है जिसमें अत्यधिक विवाद है क्योंकि राष्ट्र संक्रमण की स्थिति में हैं। यह एक प्रकार के विश्लेषण शैली से दूसरे प्रकार के विश्लेषण शैली में प्रस्थान कर रहा है।"
■ क्षेत्र में विस्तार (आधुनिक दृष्टिकोण)
तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र व्यापक है और लगातार इसका विस्तार हो रहा है। जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के पहले केवल यूरोपीय राजनीति का बोलबाला था, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में राष्ट्र-राज्य का उदय हुआ और साथ-साथ साम्यवादी राज्यों का जन्म हुआ। इसलिये इसका क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया। आज इसके क्षेत्र को निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया जा सकता है:
- ① पश्चिमी तथा गैर पश्चिमी तथा साम्यवादी देशों का तुलनात्मक अध्ययन।
- ② राजनीतिक संरचनाओं के साथ-साथ गैर राजनीतिक संरचनाओं और उनके प्रभावों का अध्ययन।
- ③ मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन व बाह्य परिस्थितियों का अध्ययन।
- ④ राजनीतिक पद्धतियों के उपादानों, मान्यताओं व मूल्यों का अध्ययन जैसे- राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक आधुनिकीकरण, राजनीतिक समाजीकरण और राजनीतिक विकास का अध्ययन किये जाने लगा।
अतः स्पष्ट है कि अब तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि उसमें राजनीतिक व गैर राजनीतिक सभी विषयों का अध्ययन किया जाने लगा है।
✦ 3. तुलनात्मक राजनीति का विकास (प्रथम चरण)
तुलनात्मक राजनीति के विकास को दो चरणों में बाँटकर पढ़ा जा सकता है। पहला चरण द्वितीय विश्व युद्ध के पहले का विकास (परम्परागत) है, जिसे 3 युगों में बाँटा गया है:
तुलनात्मक राजनीति का विकास (प्रथम चरण)
(परम्परागत) ऐतिहासिक पद्धति (ऐतिहासिक युग)
(पुनर्जागरण काल)
(सांविधानिक अभियंत्रण)
[A] अरस्तू युग (Aristotle - Politics)
तुलनात्मक राजनीति का जन्म अरस्तू युग से माना जाता है। अरस्तू को तुलनात्मक राजनीति का जनक कहा जाता है। अरस्तू पहले व्यक्ति थे जिन्होंने राजनीतिक संस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया। अरस्तू आगमन पद्धति और ऐतिहासिक पद्धति में विश्वास करते हैं। अरस्तू ने 158 देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह बताने का प्रयास किया शासन प्रणाली अस्थिर क्यों होती है।
अरस्तू का मानना है किसी विषय के बारे में एक विश्वसनीय ज्ञान तब तक प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक उसको तुलना करके समझ नहीं लेते। अरस्तू ने माना कि शासन प्रणाली के तीन रूप होते हैं और प्रत्येक प्रणाली के दो रूप होते हैं। जब शासक किसी शासन प्रणाली का प्रयोग जनहित में करता है तो उत्कृष्ट होता है जब अपने हित में करता है तो निकृष्ट होता है।
| शासन का आधार | उत्कृष्ट रूप (जनहित में) | निकृष्ट/भ्रष्ट रूप (स्वार्थ में) |
|---|---|---|
| एक व्यक्ति का शासन | राजतंत्र | निरंकुश तंत्र |
| कुछ व्यक्तियों का शासन | कुलीन तंत्र | वर्ग तंत्र |
| बहुत से व्यक्तियों का शासन | मध्यवर्ग तंत्र (Polity) | भीड़तंत्र / लोकतंत्र |
(अरस्तू ने इसमें मध्यवर्ग तंत्र (Polity) को सर्वश्रेष्ठ बताया है। अरस्तू के अनुसार "शासन प्रणाली चक्राकार व नियम के अनुसार बदलता रहता है।" अरस्तू ने इसे 'शासन प्रणाली के चक्राकार नियम' कहा। इसे स्वर्णिम मध्यमान भी कहा जाता है।)
[B] मैकियावेली युग (पुनर्जागरण युग)
इसे पुनर्जागरण काल का युग कहा जाता है। पुनर्जागरण आन्दोलन का नारा है, "मानव ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है।" इस सिद्धान्त के आधार पर मैकियावेली ने तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया। मैकियावेली भी अरस्तू की तरह आगमन, ऐतिहासिक पद्धति पर बल देता है।
मैकियावेली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Discourses on Livy' में शासन प्रणाली का वर्गीकरण किया और वर्गीकरण करते समय उसने मनुष्य के चरित्र को विशेष रूप से ध्यान में रखा। मैकियावेली ने कहा कि:
- गणतंत्र (Republic): "जहाँ के लोग चरित्रवान् और अच्छे हों, वहाँ गणतंत्र सफल होगा।" (सामाजिक अभियंत्रण का सिद्धान्त - जहाँ के लोग ईमानदार तथा सभ्य होते हैं।)
- निरंकुश राजतंत्र: "जहाँ के लोग बेईमान व भ्रष्ट व चरित्रहीन हों, वहाँ निरंकुश राजतंत्र सफल होगा।"
इसी आधार पर मैकियावेली इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इटली में निरंकुश राजतंत्र सम्भव है क्योंकि "यहाँ के लोग चरित्रहीन, भ्रष्ट तथा बेईमान हैं।"
[C] माण्टेस्क्यू युग (बुद्धिवादी युग)
इसे बुद्धिवादी युग भी कहा जाता है। माण्टेस्क्यू ने अपनी पुस्तक 'The Spirit of Laws' में तुलनात्मक अध्ययन किया। माण्टेस्क्यू भी आगमन पद्धति का प्रयोग किया। जहाँ मैकियावेली ने अपने राजनीतिक विश्लेषण में 'सामाजिक अभियंत्रण' पर अधिक बल दिया, वही माण्टेस्क्यू ने 'सांविधानिक अभियंत्रण' पर अधिक बल दिया।
माण्टेस्क्यू ने शक्तियों के पृथक्करण पर बल दिया, जिसे सर्वप्रथम U.S.A के संविधान में अपनाया गया।
1. गणतंत्र (अभिजात तंत्र व प्रजातंत्र) 2. राजतंत्र 3. स्वेच्छातंत्र (अधिनायक)
माण्टेस्क्यू ने यह पता लगाने की कोशिश की कि किसी समाज में प्रचलित शासन प्रणाली उस समाज में रहने वाले व्यक्तियों के चरित्र के साथ निकट से जुड़ी होती है। माण्टेस्क्यू का विचार आधुनिक काल के पूर्व का संकेतक है।
✦ 4. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकास (द्वितीय चरण)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तुलनात्मक राजनीति इतनी विस्तृत हो गयी कि उसकी प्रकृति ही बदल गयी, क्योंकि यूरोपीय राजनीति समाप्त तथा अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का उदय हुआ। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीका में राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुयी, वहाँ नई-नई शासन प्रणालियों का उदय होने लगा। अतः अध्ययन के नये द्वार व क्षितिज खुलने लगे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसमें निम्नलिखित परिवर्तन हुए:
- राष्ट्रों की संख्या में भारी वृद्धि
- शक्ति में फैलाव
- साम्यवाद का उदय
आमण्ड और पॉवेल ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसके बारे में निम्नलिखित चार बातें कीं:
- ① यह संकीर्णता से निकलकर व्यापकता की ओर गयी।
- ② यथार्थवाद की खोज में संलग्न हुयी।
- ③ सुनिश्चितता की खोज में लगी हुयी है।
- ④ बौद्धिक व्यवस्था की खोज: जैसे नई-नई शब्दावली की खोज (राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक आधुनिकीकरण, राजनीतिक समाजीकरण, राजनीतिक विकास आदि)।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परम्परागत शब्दावली में भी बदलाव हो गया—
• राज्य ➡️ राजनीतिक व्यवस्था
• संस्था ➡️ संरचना
• कार्य ➡️ प्रकार्य
• लोकमत ➡️ राजनीतिक संस्कृति
इसलिये द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डेविड ईस्टन का व्यवस्था सिद्धान्त तथा गैब्रियल आमण्ड का संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक मॉडल आया।
✦ 5. तुलनात्मक राजनीति के उद्देश्य एवं समस्याएँ
■ प्रमुख विचारकों के कथन
- जी. के. रॉबर्ट्स (Comparative Politics Today): "तुलनात्मक राजनीति व्यापक क्षेत्र का संकेतक है।"
- जीन ब्लोण्डेल व डेविड ईस्टन: "तुलनात्मक सरकार (राजनीति) के अध्ययन में उन तरीकों का जिनसे समाज में मूल्यों का अधिकृत वितरण होता है और परीक्षण किया जाता है।"
■ तुलनात्मक राजनीति के उद्देश्य
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन के मुख्य रूप से चार उद्देश्य माने जाते हैं:
- ① दार्शनिक लक्ष्य
- ② वैज्ञानिक लक्ष्य
- ③ व्यवहारिक उपयोग के मंतव्य
- ④ शासन नीति के प्रयोग का लक्ष्य
■ तुलनात्मक राजनीति की समस्याएँ
तुलनात्मक अध्ययन करते समय मुख्य रूप से निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है:
- ① प्रत्ययों (Concepts) की रचना एवं परिभाषा की समस्या
- ② अमूर्तिकरण के स्तर का वर्गीकरण
- ③ तथ्य एकत्रीकरण की समस्या
- ④ मानको (आदर्श), संस्थाओं व व्यवहार में अन्तः सम्बन्ध की समस्या
✦ 6. तुलनात्मक राजनीति के उपागम (Approaches)
पद्धति (Method): अन्वेषण की वह तकनीक होती है, जिसके माध्यम से किसी के बारे में एक विश्वसनीय ज्ञान प्राप्त करते हैं। जबकि उपागम के अन्तर्गत किसी घटना के विस्तृत जानकारी के लिये न केवल उपयुक्त पद्धति का चयन किया जाता है, बल्कि अध्ययन के केन्द्रीय समस्या का भी निर्णय किया जाता है。
तुलनात्मक राजनीति के उपागम को हम निम्न दो भागों में बाँट सकते हैं:
① परम्परागत उपागम (18वीं-19वीं सदी)
- ऐतिहासिक उपागम
- दार्शनिक उपागम
- कानूनी उपागम (संविधान)
- संस्थात्मक उपागम (संसद- इंग्लैण्ड/भारत)
② आधुनिक उपागम (20वीं सदी)
- राजनीतिक-आर्थिक उपागम
- राजनीतिक-समाजशास्त्रीय उपागम
- व्यवस्थावादी व प्रकार्यात्मक उपागम
[A] परम्परागत उपागम (Traditional Approach)
इसके अन्तर्गत राजनीति एक स्वायत्त विषय नहीं बन पाया। अतः यह अपने सामग्री के लिये अन्य विषयों पर निर्भर रहता है। इसके अन्तर्गत ऐतिहासिक उपागम, कानून या औपचारिक उपागम एवं संस्थात्मक उपागम मुख्य रहे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परम्परागत उपागम में तमाम कमियाँ दिखाई देने लगीं। मैक्रिडिस ने इसमें निम्न चार कमियों की ओर संकेत किया:
- ① तुलनात्मक दृष्टिकोण का अभाव।
- ② यह वर्णनात्मक है, विश्लेषणात्मक नहीं।
- ③ इसका दृष्टिकोण संकुचित है।
- ④ गतिशील तत्व का अभाव।
[B] आधुनिक उपागम (Modern Approach)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आधुनिक उपागम का जन्म हुआ। इसके जन्म में आर्थर बेन्टले की प्रसिद्ध पुस्तक 'The Process of Government' और ग्राहम वालास की पुस्तक 'Human Nature in Politics' का विशेष योगदान है, जिसने राजनीति में क्रमशः समाज विज्ञान व मनोविज्ञान का महत्व दिया।
आधुनिक उपागम में मुख्य रूप से ब्लोण्डेल, एक्सस्टीन, आमण्ड, लासवेल, मैक्रिडिस, राबर्ट डाहल, डेविड ईस्टन आदि ने अपनी भूमिका निभायी।
1. यह वर्णनात्मक से विश्लेषणात्मक हो गयी।
2. संस्थाओं के स्थान पर मनुष्य के व्यवहार पर विशेष बल देने लगी।
3. विकसित देशों के साथ-साथ विकासशील देशों पर अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे।
4. इसका अध्ययन अन्तः अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) हो गया।
■ आधुनिक उपागम के प्रमुख सिद्धान्त / धारणाएं
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन के भिन्न धारणाएं प्रचलित हैं जिसमें पहली धारणा राजनीतिक प्रणाली के साथ जुडी है और दूसरी धारणा आर्थिक व सामाजिक धारणा के साथ जुडी है।
1. डेविड ईस्टन का व्यवस्था सिद्धान्त (Input-Output Model)
राजनीतिक प्रणाली के अन्तर्गत राजनीति को सामाजिक पर्यावरण का अंग मान लिया जाता है तथा उसमें आने वाले आगत तत्व (Input) तथा उसमें पैदा होने वाले तत्व (Output) का विश्लेषण किया जाता है।
डेविड ईस्टन का आगत-निर्गत व्यवस्था सिद्धान्त
समर्थन (Support)
(Political System)
लागू करना
2. गैब्रियल आमण्ड का संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक सिद्धान्त
यह व्यवस्था सिद्धान्त का विकसित रूप है। सभ्य समाज के अध्ययन के लिये ऐसा सैद्धांतिक ढाँचा तैयार करने के प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक टालकॉट पार्सन्स (Talcott Parsons) को जाना जाता है। राजनीति शास्त्र में गैब्रियल आमण्ड ने इसे विकसित किया।
■ राजनीतिक-आर्थिक उपागम
दूसरा उपागम राजनीतिक एवं आर्थिक श्रृंखला पर विशेष ध्यान केन्द्रित करता है। इसके अनुसार किसी राजनीतिक व्यवस्था को समझने व समझाने के लिये उसकी अर्थ व्यवस्था को समझना आवश्यक है। इस उपागम की विशेषता यह है कि आर्थिक पक्ष मानव पक्ष की एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक कारक होता है और यह आर्थिक कारक ही व्यवस्था के सफलता या असफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके दो विचार धाराएँ प्रचलित हैं:
- उदारवादी विश्लेषण: एडम स्मिथ को राजनीतिक अर्थशास्त्र के उदारवादी दृष्टिकोण का प्रमुख प्रवक्ता माना जाता है। एडम स्मिथ ने वाणिज्य एवं स्वतंत्रता को एक दूसरे के पूरक बताया। इस प्रकार अर्थशास्त्र एवं राजनीति शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं। (इसमें एंथनी डाउन्स, जी. बुकानन, जी. टालॉक की भूमिका रही)।
- मार्क्सवादी उपागम: मार्क्सवाद के अनुसार वर्तमान युग में मुक्त व्यापार व वाणिज्य मनुष्य की स्वतंत्रता को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि ऐसे वर्ग संरचना को जन्म देती है जिसमें पूंजीपतियों का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है और मनुष्य की स्वतंत्रता को वापस लाने के लिये पूंजीवादी संरचना को ध्वस्त करना आवश्यक है।
- पराश्रितता मॉडल या केन्द्र-परिधि मॉडल: इसमें बताया गया है कि किस प्रकार व्यापार की आड़ में विकसित देश 'तीसरी दुनिया' के देशों पर अपने प्रभुत्व को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
■ राजनीतिक-समाजशास्त्री उपागम
इसके नाम से स्वतः स्पष्ट है राजनीतिक क्रियाकलाप सामाजिक संरचना पर आधारित होते हैं, अर्थात् राजनीतिक शक्ति का आधार समाज होता है। आधार जितना सुदृढ़ होगा संरचना उतनी ही मजबूत होगी। हम जानते हैं कि शक्ति प्राप्ति व शक्ति प्रयोग में सामाजिक कारकों की विशेष भूमिका होती है। इसकी तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- राज्य की रचना में समाज के विभिन्न तत्वों की भूमिका होती है।
- राज्य शक्ति का प्रयोग किन हाथों में है किन प्रश्नों का उत्तर सामाजिक तत्वों के भागीदारी के फलस्वरूप समझा जा सकता है अर्थात् यदि हमे राजनीतिक शक्ति को समझना है या राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना है तो उसे सामाजिक दृष्टि से समझना होगा।
- राज्य के नीतियों व निर्णयों में भी सामाजिक पहलू स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
✍️ निष्कर्ष (Conclusion)
तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) का क्षेत्र केवल विभिन्न देशों की सरकारों की तुलना करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत व्यापक और गतिशील विषय है। अरस्तू के 158 देशों के संविधानों के अध्ययन से शुरू हुआ यह सफर, मैकियावेली और माण्टेस्क्यू से होता हुआ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक रूप ले चुका है। डेविड ईस्टन के 'आगत-निर्गत मॉडल' और आमण्ड के 'प्रकार्यात्मक मॉडल' ने इसे आधुनिकता प्रदान की है। स्पष्ट है कि आज तुलनात्मक राजनीति राज्य और संस्थाओं से आगे बढ़कर मानव व्यवहार, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और राजनीतिक संस्कृति के सूक्ष्म अध्ययन का विषय बन गया है。
