विधि और दण्ड का सिद्धान्त | Political Science Notes

विधि और दंड का सिद्धांत: अर्थ, परिभाषा एवं विभिन्न विचारकों के सिद्धांत के नोट्स
विधि और दण्ड का सिद्धान्त: अर्थ, कानून के प्रकार एवं दण्ड के 4 सिद्धान्त
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस प्रीमियम लेख में 'विधि (Law)' और 'दण्ड (Punishment)' के सिद्धान्त का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इसमें कानून की परिभाषाएं (ऑस्टिन, मैकाइवर, बेंथम), कानून के तत्व, स्रोत, 10 प्रमुख प्रकार और सामण्ड द्वारा बताए गए दण्ड के 4 प्रमुख सिद्धान्तों का समावेश है।

✦ 1. विधि (कानून): प्रस्तावना, नागरिक समाज एवं परिभाषा

नागरिक समाज (Civil Society): नागरिक समाज सभ्य समाज है, समाज सभ्यता का प्रतीक है। समाज छोटे-छोटे समूहों में बंटा होता है। इसे सफल बनाने के लिए कानून आवश्यक है। कानून किसी सम्प्रभु के द्वारा बना होना चाहिए।

कानून नागरिकों के जीवन को संचालित करने के लिए आवश्यक होता है। इसलिए राज्य कानूनों का निर्माण करता है जिसका पालन करना व्यक्ति के लिए आवश्यक होता है। कानून का पालन न करने पर व्यक्ति दण्ड का भागीदार होता है। इसकी सामान्य परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है—

"राज्य द्वारा निर्मित और लागू किये जाने वाले नियमों को कानून कहते हैं।"

ब्रिटिश ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में कानून की परिभाषा करते हुए कहा गया है— "सत्ता द्वारा आरोपित आचार व्यवहार के नियम को कानून कहते हैं।"

कानून के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के कथन:

ऑस्टिन (Austin) के अनुसार: "कानून संप्रभु का आदेश है।"
मैकाइवर (MacIver) के अनुसार: "राज्य कानून का शिशु एवं जनक दोनों है।"
प्रोफेसर सालमण्ड (Salmond) के अनुसार: "कानून नियमों का वह समूह है जिसे राज्य मान्यता देता है और न्याय व्यवस्था के प्रशासन में लागू करता है।"
बेंथम (Bentham) के अनुसार: "विधि एक ऐसा आदेश है जिसमें दण्ड की भावना निहित होती है।"

उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट है कि राज्य जिन कानूनों का निर्माण करता है और उसे स्वीकृत करता है उसका पालन न किये जाने पर राज्य दण्ड देता है।

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✦ 2. कानून के प्रमुख तत्व और कानून के स्रोत

कानून के तत्व:

  1. कानून के लिए नागरिक समाज का अस्तित्व आवश्यक है।
  2. कानून के निर्माण और क्रियान्वयन के लिए संप्रभुसत्ता आवश्यक है।
  3. कानून का सम्बन्ध व्यक्ति के बाहरी आचरण से है।
  4. कानून का पालन नागरिकों के लिए अनिवार्य है पालन न करने पर दण्ड दिया जाता है।
  5. कानून का पालन दण्ड के भय से नहीं बल्कि सामाजिक हित की भावना से किया जाना चाहिए।

कानून के प्रमुख स्रोत:

किसी भी राज्य में कानून के निर्माण के कई स्रोत होते हैं, जो निम्नलिखित हैं:

क्रम स्रोत का नाम
1 विधायिका (सबसे उत्कृष्ट स्रोत)
2 परम्परा व रीतिरिवाज
3 धर्म
4 न्यायपालिका
5 कानूनी टीकाएं
6 औचित्य या साम्य की नीतियाँ

✦ 3. अच्छे कानून के लक्षण एवं प्रकार (भाग-1)

अच्छे कानून के लक्षण:

क्रम एक अच्छे कानून के 6 प्रमुख लक्षण
1 सरलता और स्पष्टता
2 स्थायित्व
3 व्यापकता
4 व्यवहारिकता
5 निष्पक्षता
6 नागरिक अधिकारों का संरक्षक

कानून के प्रकार (Types of Law):

  • ① व्यक्तिगत कानून: यह कानून व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों को निश्चित करते हैं जैसे- ऋण सम्बन्धी कानून, सम्पत्ति के खरीद व बिक्री सम्बन्धी कानून।
  • ② सार्वजनिक कानून: यह व्यक्ति व राज्य के मध्य सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है। जैसे - चोरी हत्या डकैती आदि करने पर राज्य व्यक्ति को दण्ड देता है।
  • ③ संवैधानिक कानून: वह कानून जो राज्य या सरकार के ढांचे को तय करता है अर्थात कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका को कार्य करने की शक्ति देता है और उनके बीच पारस्परिक सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है। यह कानून नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों को भी सुनिश्चित करता है।

✦ 4. कानून के प्रमुख प्रकार (भाग-2)

  • ④ सामान्य कानून: यह कानून विधायिका के द्वारा निर्मित किया जाता है। इसका आधार संवैधानिक कानून होता है। यह राज्य में रहने वाले नागरिकों के दैनिक आचरण को अनुशासित करता है। सामान्य कानून ही 'विधि का शासन' है। यह देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होगा वह चाहे कितने बड़े पदों पर ही क्यों न बैठा हो सभी एक सामान्य कानून के अधीन होंगे।
  • ⑤ प्रशासकीय कानून: यह अधिकारियों एवं कर्मचारियों के अधिकार एवं कर्तव्यों को बताता है तथा उनके आचरण को भी अनुशासित करता है। फ्रांस में विधि का शासन नहीं है बल्कि उसके स्थान पर प्रशासकीय विधि का बोलबाला है।
  • ⑥ अध्यादेश: विशेष परिस्थितियों में उत्पन्न संकटों का सामना करने के लिए कार्यपालिका अध्यक्ष द्वारा इसे जारी किया जाता है। यह एक अस्थायी कानून है जब विधायिका का सत्र चलता है तो इसे कानून बनाने के लिए रख दिया जाता है। विश्व में केवल भारत का राष्ट्रपति ही अध्यादेश जारी करने की शक्ति रखता है।
  • ⑦ कृत्रिम कानून: इसका सम्बन्ध संविधान के लिखित हिस्से से होता है। यह कानून सीमित है।
  • ⑧ प्राकृतिक कानून: इस प्रकार के कानून का सम्बन्ध संविधान के अलिखित हिस्से से होता है। यह असीमित होता है और इसका आधार विवेक है।
  • ⑨ राष्ट्रीय कानून: वह कानून जो राष्ट्र के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है। यह राज्य सम्प्रभु की देन है इसलिए यह अंतर्राष्ट्रीय कानून से भी शक्तिशाली है।
  • ⑩ अंतर्राष्ट्रीय कानून: यह विश्व के स्वतंत्र राष्ट्रों के बीच पारस्परिक सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है। यह अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा लागू किया जाता है। यह कानून बाध्यकारी नहीं है अर्थात यह कमजोर होता है।

✦ 5. दण्ड के सिद्धान्त (Theory of Punishment): अर्थ एवं रूपरेखा

हम जानते हैं कि दण्ड कानून में निहित होता है और जब किसी व्यक्ति के द्वारा कानून या विधि को भंग किया जाता है तो उसे राज्य के द्वारा दण्ड दिया जाता है।

प्रसिद्ध न्यायविद् सामण्ड (Salmond) ने दण्ड के निम्नलिखित 4 प्रकार बताये हैं। इन चारों प्रकारों को हम आगे विस्तृत रूप से समझेंगे, लेकिन उससे पहले एक संक्षिप्त तालिका के माध्यम से इनकी रूपरेखा को समझते हैं:

दण्ड का प्रकार संक्षिप्त अर्थ / उद्देश्य
1. निवृत्तात्मक दण्ड कठोर (ऐसा दण्ड दिया जाय जिससे समाज सीख ले)
2. निरोधात्मक दण्ड घटना के घटने से पहले ही ऐसी दण्ड लागू किया जाय जो घटना घट न पाये
3. प्रतिशोधात्मक दण्ड जैसे को तैसा (आँख के बदले आँख)
4. सुधारात्मक दण्ड प्रतिपादक बेंथम। दण्ड का उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र में सुधार।

✦ 6. दण्ड के 4 प्रमुख सिद्धान्त (विस्तृत अध्ययन)

① निवृत्तात्मक दण्ड सिद्धान्त (Deterrent Theory):
इस प्रकार के दण्ड का उद्देश्य अपराधी को ऐसा दण्ड दिया जाय कि वह समाज के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करे कि उसी प्रकार का अपराध करने वाले अन्य व्यक्ति अपराध करने का विचार छोड़ दें। दूसरे शब्दों में अपराधी के मस्तिष्क में भय का संचार करके उसे अपराध करने से रोकना।
② निरोधात्मक दण्ड सिद्धान्त (Preventive Theory):
यदि कोई व्यक्ति बार-बार किसी अपराध को दोहराता है तो अपराधी को ऐसी सजा दिया जाय कि वह अपराध करने के लायक न रह जाय। जैसे - कोई व्यक्ति बार-बार चोरी करता है तो उसे आजीवन कारावास दे दिया जाय।
③ प्रतिफलात्मक दण्ड सिद्धान्त (Retributive Theory):
यह दण्ड बदले के सिद्धान्त पर आधारित है इसका अर्थ है जैसी करनी वैसी भरनी। अर्थात अपराधी जिस प्रकार का अपराध करता है ठीक उसी प्रकार की सजा उसे दिया जाय जैसे आँख के बदले आँख और प्राण के बदले प्राण का सिद्धान्त!
④ सुधारात्मक दण्ड सिद्धान्त (Reformative Theory):
इसका प्रतिपादन बेंथम ने किया है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही सिद्धान्त सर्वमान्य है। दण्ड का प्रतिफलात्मक सिद्धान्त तो अलोकतांत्रिक है। सुधारात्मक दण्ड सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य अपराधी को सजा अपराध की मात्रा के अनुसार दिया जाना चाहिए क्योंकि दण्ड का उद्देश्य बदले की भावना नहीं बल्कि अपराधी के चरित्र में सुधार है।

आज न्यायालय में न्याय की देवी हाथ में तराजू लिए खड़ी है यह बेंथम की देन है जो यह बताता है कि अपराध और दण्ड में समानुपात होना चाहिए। प्राचीन काल में भारतीय चिंतक कौटिल्य ने भी सुधारात्मक दण्ड की बात कहा है।

■ विस्तृत निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विवेचन का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि 'विधि (कानून)' और 'दण्ड' किसी भी सभ्य नागरिक समाज और राज्य के दो सबसे महत्वपूर्ण और अविभाज्य अंग हैं। जहाँ एक ओर कानून समाज में व्यवस्था, शांति और समानता स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर दण्ड उस व्यवस्था को बनाए रखने का एक आवश्यक एवं बाध्यकारी साधन है।

कानून के अभाव में समाज में अराजकता (मत्स्य न्याय) फैल सकती है, और दण्ड की व्यवस्था के बिना कानूनों का पालन सुनिश्चित करना अत्यंत कठिन है। यद्यपि ऑस्टिन जैसे विचारकों ने कानून को 'संप्रभु का आदेश' मात्र माना है, परन्तु वास्तव में एक आदर्श कानून वही है जिसका पालन जनता केवल दण्ड के भय से नहीं, बल्कि सामाजिक हित और अंतरात्मा की आवाज़ से करे।

वहीं दण्ड के सिद्धांतों की बात करें तो, प्राचीन काल में जहाँ प्रतिफलात्मक (आँख के बदले आँख) और निवृत्तात्मक सिद्धांतों का बोलबाला था, किन्तु वर्तमान प्रगतिशील और लोकतांत्रिक युग में बेंथम द्वारा प्रतिपादित 'सुधारात्मक दण्ड सिद्धान्त' (Reformative Theory) ही सर्वमान्य और सबसे प्रासंगिक है।

अतः निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि दण्ड का अंतिम उद्देश्य अपराधी से बदला लेना या उसे अमानवीय पीड़ा देना नहीं है, बल्कि उसके चरित्र में मनोवैज्ञानिक सुधार लाकर उसे पुनः समाज की मुख्यधारा में एक अच्छे नागरिक के रूप में स्थापित करना है। एक आदर्श लोक-कल्याणकारी राज्य की पहचान उसके निष्पक्ष कानूनों और सुधारवादी न्याय-प्रणाली से ही होती है।

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📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. "कानून संप्रभु का आदेश है" - यह कथन किसका है?
यह प्रसिद्ध कथन राजनीति विज्ञान के विद्वान ऑस्टिन (Austin) का है।
2. कानून निर्माण का सबसे उत्कृष्ट स्रोत किसे माना जाता है?
कानून निर्माण का सबसे उत्कृष्ट और प्रमुख स्रोत विधायिका (Legislature) को माना जाता है।
3. प्रशासकीय कानून (Administrative Law) का बोलबाला किस देश में है?
प्रशासकीय कानून का सबसे अधिक बोलबाला फ्रांस में है। वहाँ सामान्य विधि के शासन के स्थान पर प्रशासकीय विधि का प्रयोग किया जाता है।
4. सामण्ड (Salmond) ने दण्ड के कितने प्रकार बताए हैं?
सामण्ड ने दण्ड के 4 प्रमुख प्रकार (सिद्धान्त) बताए हैं: 1. निवृत्तात्मक 2. निरोधात्मक 3. प्रतिफलात्मक और 4. सुधारात्मक।
5. वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में दण्ड का कौन-सा सिद्धान्त सर्वमान्य है?
वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधारात्मक दण्ड सिद्धान्त (Reformative Theory) सर्वमान्य है, जिसका प्रतिपादन बेंथम ने किया था। इसका उद्देश्य अपराधी के चरित्र में सुधार करना है।
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