न्याय : अर्थ, परिभाषा, विविध पक्ष एवं जॉन रॉल्स का सिद्धांत

न्याय: अर्थ, परिभाषा, विविध पक्ष एवं जॉन रॉल्स का सिद्धांत नोट्स
न्याय (Justice): अर्थ, प्रकार, विचारकों के कथन एवं जॉन रॉल्स का सिद्धांत
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस प्रीमियम लेख में 'न्याय' (Justice) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विभिन्न विचारकों के महत्वपूर्ण कथन, न्याय के विविध पक्ष (कानूनी, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व प्रक्रियात्मक) और जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत (A Theory of Justice) का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। आगामी परीक्षाओं के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।

✦ 1. न्याय: प्रस्तावना, ऐतिहासिक विकास एवं शब्दोत्पत्ति

न्याय (Justice) सभ्य समाज की पहचान है। न्याय के अभाव में हम सभ्य समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते। जिस प्रकार यह माना जाता है कि बिना कार्यपालिका व विधायिका के किसी देश का शासन चलाया जा सकता है, लेकिन बिना न्यायपालिका के हम उस देश में शासन की कल्पना भी नहीं कर सकते।

"जिस राज्य में न्याय व्यवस्था नहीं पायी जाती है, वह राज्य डाकुओं का झुण्ड बन जाता है।" — संत अगस्टाइन (St. Augustine)

न्याय राजनीतिक जीवन का सर्वोत्तम उद्देश्य है। अन्याय को परिभाषित करना जितना सरल है, उतना ही न्याय को परिभाषित करना कठिन है। इसीलिए अक्सर राजनीतिक चर्चाओं का विषय न्याय ही होता है। न्याय किसी भी समाज की अंतिम निर्णायक अवधारणा होती है जिसके आगे सभी अवधारणाएँ अपना शीश झुकाती हैं। न्याय - अधिकार, स्वतंत्रता, समानता व संपत्ति में समन्वय स्थापित करता है। इसलिए आज न्याय और स्वतंत्रता, न्याय और समानता, न्याय और संपत्ति एक दूसरे के पूरक हैं।

न्याय का ऐतिहासिक विकास (विभिन्न कालों में):

न्याय की विकास यात्रा
प्राचीन/मध्यकाल
  • नैतिक न्याय
  • (व्यक्तियों के चरित्र व नैतिकता पर आधारित)
16वीं - 19वीं शताब्दी
  • कानूनी न्याय
  • (कानून के समक्ष सभी समान)
20वीं शताब्दी
  • नैतिक न्याय + कानूनी न्याय = सामाजिक न्याय
  • (समाज के गरीब/वंचित वर्ग पर प्रभाव)

प्राचीन काल और मध्य काल में नैतिक न्याय का बोलबाला था। इसका सम्बन्ध व्यक्तियों के चरित्र से था और प्राकृतिक आधार पर किसी विषय को उचित या अनुचित ठहराने का प्रयास किया जाता था। वहीं आधुनिक काल में कानूनी न्याय का जन्म हुआ, जिसमें कानून के समक्ष बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को बराबर माना गया। लेकिन 20वीं शताब्दी में समाज का स्वरूप बदला, अतः न्याय की अवधारणा में भी परिवर्तन हुआ और सामाजिक न्याय का बोलबाला हुआ।

अर्थात् कानून का प्रयोग करते समय जब नैतिकता को भी ध्यान में रखा जाय, तब वह न्याय सामाजिक न्याय के रूप में व्यक्त होता है। आज मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी के रूप में देखा जाता है, इसलिए कानून के समान न्याय करते हुए भी इस बात को भी ध्यान में रखा जाता है कि उसका समाज में गरीब पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

वर्तमान में न्यायपालिका भी इसी सामाजिक न्याय के सिद्धान्त पर आधारित है इसलिए न्यायपालिका जब कोई निर्णय देती है तो सदैव इस बात को ध्यान में रखती है कि भारत के संवैधानिक ढांचा, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर कोई प्रभाव न पड़े।

Note: बजट राजनीतिक होता है।

न्याय की शब्दोत्पत्ति (Etymology):

न्याय को अंग्रेजी में 'JUSTICE' कहते हैं। Encyclopaedia of Britannica के अनुसार, यह लैटिन भाषा के शब्द 'Jus' (या Juticia) से निकला है, जिसका अर्थ है 'समाज को जोड़ना'। अर्थात् आज न्याय का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना है।

स्थान / देश भाषा
इंग्लैण्ड (England)आंग्ल (Anglo)
यूनान (Greece)ग्रीक (Greek)
यूरोप (Europe)लैटिन (Latin)
फ्रांस (France)फ्रेंच (French)

नोट: न्याय अधिकार, स्वतंत्रता, समानता व सम्पत्ति में समन्वय स्थापित करता है। ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं।

✦ 2. न्याय पर आधारित प्रमुख विचारकों के कथन

राजनीति विज्ञान में न्याय की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न विचारकों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं। परीक्षा की दृष्टि से ये कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

सिसरो (Cicero): "न्याय समस्त सद्गुणों का मुकुट मणि (उत्तम आचरण) है।"
प्लेटो (Plato): "राज्य में रहने वाले प्रत्येक वर्ग के द्वारा अपने-अपने निर्धारित कार्यों को करते हुए एक दूसरे में सामंजस्य स्थापित करना ही न्याय है।"
थ्रेसीमेकस (Thrasymachus): "न्याय शक्तिशाली का हित है।"
अरस्तू (Aristotle): "प्रत्येक को उसका उचित भाग मिल जाना ही न्याय है।" (इसे अरस्तू ने समानुपातिक न्याय भी कहा है)।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर: "यदि कहीं भी अन्याय होता है, तो वह न्याय के लिए सब जगह खतरा पैदा कर देता है।"
पास्कल (Pascal): "शक्ति के बिना न्याय पंगु है और न्याय के बिना शक्ति अत्याचार का साधन है।"
ऑस्कर वाइल्ड (Oscar Wilde): "एक ही बात ऐसी है जो अन्याय से भी बुरी है वह यह कि न्याय की देवी के हाथ में तलवार न होना।"
जोसेफ (Joseph): "न्याय अपने और पराये को नहीं पहचानता, मित्र और शत्रु में अंतर नहीं करता, यही कारण है कि उसे सब जगह अंधा दिखाया जाता है।"
बार्कर (Barker):
1. "न्याय अंतिम मूल्य है जो स्वतंत्रता और समानता में समन्वय स्थापित करता है।"
2. "राजसत्ता (सम्प्रभुता) कानून को वैधता प्रदान करती है और न्याय उसे मूल्य प्रदान करता है। कानून का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि वह उपयोगी है और मनुष्यों की अंतरात्मा उसे स्वीकार करती है, यह उसे सुविधाएं प्रदान करती है और इसमें न्याय के गुण भी मौजूद हैं।"

✦ 3. न्याय के विविध पक्ष: कानूनी और राजनीतिक न्याय

न्याय को उसके प्रयोग और क्षेत्र के आधार पर कई भागों में विभाजित किया गया है:

① कानूनी न्याय (Legal Justice):

न्याय की अभिव्यक्ति जब कानून के माध्यम से होती है तो उसे कानूनी न्याय कहा जाता है। राज्य (विधानमण्डल) कानूनों का निर्माण करता है, लेकिन ऐसे कानूनों को कैसे लागू किया जाए, उनका पालन कैसे कराया जाए—यही बात न्याय के कानूनी पक्ष को महत्व देती है। अर्थात् कानून प्रणाली ही कानूनी न्याय है।

  • भारत की न्यायपालिका कृत्रिम न्याय (लिखे हुए कानून) पर आधारित है।
  • USA की न्यायपालिका प्राकृतिक न्याय (विवेक पर / Natural Justice) पर भी आधारित है।
  • कानूनी न्याय की अभिव्यक्ति दो प्रकार से होती है— कृत्रिम न्याय (जो संविधान में लिखा है) और प्राकृतिक न्याय (जो अलिखित होता है और निर्णय का आधार न्यायाधीश का विवेक होता है)।

② राजनीतिक न्याय (Political Justice):

इसका सम्बन्ध उदारवाद से है। इसे लोकतंत्र का आधार स्तम्भ माना जाता है। इसमें यह माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के अपने देश की शासन व्यवस्था व राजनीतिक व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार होना चाहिए।

  • जाति, धर्म, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव किये बिना सभी को मत देने का अधिकार (Universal Franchise) होना चाहिए।
  • लोकतंत्र में सरकार जनता की सहमति पर आधारित होती है, यही राजनीतिक न्याय का मूल है।

✦ 4. सामाजिक, आर्थिक एवं प्रक्रियात्मक न्याय

③ सामाजिक न्याय (Social Justice):

यह 20वीं शताब्दी की देन है। आज की न्यायपालिका भी सामाजिक न्याय के सिद्धान्त पर आधारित है। सामाजिक न्याय का शाब्दिक अर्थ है— एक ऐसे समाज की स्थापना करना जो जाति, धर्म, भाषा, लिंग और विशेषाधिकारों पर आधारित न हो।

  • आज सामाजिक न्याय को लोक कल्याणकारी राज्य की आधारशिला माना जाता है।
  • इसका उद्देश्य गरीब का हित करना और मानव द्वारा मानव का शोषण समाप्त करना है।
  • प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे अवसर प्राप्त होने चाहिए जिससे वह अपनी योग्यताओं का अधिकतम विकास कर सके।
  • सामाजिक न्याय निर्बल और निर्धन पक्ष को विशेष सहायता और संरक्षण प्रदान करने की मांग करता है।

④ आर्थिक न्याय (Economic Justice):

यह मुख्य रूप से मार्क्सवाद के साथ सम्बद्ध है। यह समाजवादी आन्दोलन का परिणाम है। आर्थिक न्याय का उद्देश्य आर्थिक विषमता को गिराना और लोगों के बीच आर्थिक समानता लाना है।

  • वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्ल मार्क्स ने तो आर्थिक न्याय को ही 'सम्पूर्ण न्याय' का आधार बताया।
  • मार्क्स का मानना है कि आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन होने से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में अपने आप परिवर्तन हो जायेगा।
  • मार्क्सवादी मानते हैं कि उत्पादन के साधन पर सम्पूर्ण समाज का नियंत्रण होना चाहिए ताकि सभी समान हो जायें और कोई किसी का शोषण न कर सके।

⑤ प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice):

प्रक्रियात्मक न्याय को बाजार आधारित न्याय भी कहा जाता है। इस न्याय के समर्थक यह मानते हैं कि मूल्यवान वस्तुओं, सेवाओं, लाभों इत्यादि के आवंटन की प्रक्रिया या विधि न्यायपूर्ण होनी चाहिए।

प्रक्रियात्मक न्याय की अवधारणा उदारवाद के साथ निकट से जुड़ी हुई है। यह योग्यता आधारित प्रणाली (Merit-based system) को न्यायपूर्ण मानता है। इसका विलोम 'तात्विक न्याय' (Substantive Justice) है जो नैतिकता व विषय के औचित्य पर आधारित होता है।

"आदर्शवाद का दूसरा नाम प्रत्ययवाद भी है और प्रत्ययवाद समूहवाद है।"

✦ 5. जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत (John Rawls)

जॉन रॉल्स (John Rawls - 1921-2002) को समकालीन उदारवादी चिंतन के अंतर्गत रखा जाता है। इनका जन्म 1921 में मृत्यु 2002 में हुई। रॉल्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Theory of Justice' (1971) में अपने न्याय सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

वितरण न्याय (Distributive Justice) का सिद्धांत भी जॉन रॉल्स के नाम के साथ जुड़ा हुआ है। रॉल्स ने हॉब्स और लॉक द्वारा प्रतिपादित 'सामाजिक समझौते के सिद्धांत' (Social Contract) को न्याय के क्षेत्र में पुनर्जीवित किया।

"समाज में अनेक सद्गुण अपेक्षित हैं, उसमें न्याय का स्थान सर्वप्रथम है। न्याय उत्तम समाज की आवश्यक शर्त है परंतु यह पर्याप्त नहीं है इसके अलावा उत्तम समाज में नैतिकता का भी समावेश हो सकता है।" — जॉन रॉल्स

रॉल्स के अनुसार प्राथमिक वस्तुएं (Primary Goods):

रॉल्स के अनुसार न्याय की समस्या 'प्राथमिक वस्तुओं के न्यायपूर्ण वितरण की समस्या' है। ये प्राथमिक वस्तुएं हैं:

  1. अधिकार और स्वतंत्रताएं (Rights and Liberties)
  2. शक्तियाँ और अवसर (Powers and Opportunities)
  3. आय और सम्पदा (Income and Wealth)
  4. आत्म-सम्मान के साधन (Means of Self-respect)

रॉल्स का मानना है कि इसे सभी को समान रूप से मिलना चाहिए। रॉल्स ने अपने न्याय को "शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय" (Pure Procedural Justice) की संज्ञा दी, लेकिन आगे चलकर उन्होंने इसे 'सामाजिक न्याय' के साथ जोड़ दिया।

✦ 6. रॉल्स के न्याय सिद्धांत की प्राथमिकता एवं निष्कर्ष

व्यक्ति की गरिमा रॉल्स की न्याय प्रणाली का केन्द्र बिन्दु है। रॉल्स ने उपयोगितावाद (Utilitarianism) का खण्डन करते हुए लिखा है कि— "सुखी लोगों के सुख को कितना भी क्यों न बढ़ा दिया जाय, उससे दुखी व्यक्तियों का दुख कम नहीं हो जाता।"

रॉल्स ने स्वतंत्रता के साथ आर्थिक समानता को जोड़कर न्याय को साकार करने का प्रयास किया है। रॉल्स का न्याय सिद्धांत समुदायवादी है। मैकफरसन ने रॉल्स को 'उदारलोकतांत्रिक, पूँजीवादी, लोककल्याणकारी राज्य का अधिवक्ता' कहकर पुकारा।

रॉल्स के न्याय के दो सिद्धांत (Two Principles of Justice):

रॉल्स ने हॉब्स और लॉक की तरह एक प्राकृतिक अवस्था (मूल अवस्था / Original Position) की कल्पना की जहाँ अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance) है, रॉल्स ने माना कि अपनी मूल अवस्था में हर व्यक्ति बराबर है। अतः उसे किसी समाज में प्रवेश करते समय दो सिद्धांत तय करने चाहिए:

  1. सभी की समान स्वतंत्रता बनी रहे (Equal Liberty)।
  2. सामाजिक-आर्थिक विषमता निम्नलिखित प्रकार से व्यवस्थित की जाय:
    • (क) भेद-मूलक सिद्धांत (Difference Principle): न्यूनतम सुविधा प्राप्त व्यक्ति को अधिकतम लाभ मिले।
    • (ख) अवसर की समानता (Fair Equality of Opportunity): सभी के लिए अवसर खुले हों।

सिद्धांतों की प्राथमिकता (Lexical Priority):

रॉल्स कहते हैं कि सिद्धांत 1 को सिद्धांत 2 पर प्राथमिकता मिले, और सिद्धांत 2(ख) को 2(क) पर प्राथमिकता मिले। अर्थात्:
स्वतंत्रता > अवसर की समानता > भेद-मूलक सिद्धांत

रॉल्स समाज को एक श्रृंखला (Chain) के रूप में देखते हैं और उनका मानना है कि समाज की सबसे कमजोर कड़ी को भी अधिक मजबूत बनाया जाय। रॉल्स का न्याय सिद्धांत आदर्शवादी/काल्पनिक है, अतः यह प्रत्ययवादी है।

■ विस्तृत निष्कर्ष (Conclusion)

समग्र रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'न्याय' (Justice) राजनीति विज्ञान की सबसे केन्द्रीय, संवेदनशील और गतिशील अवधारणा है। समय के साथ इसके स्वरूप में निरंतर परिवर्तन हुआ है। प्राचीन और मध्यकाल में जहाँ न्याय पूरी तरह से नैतिकता और चरित्र पर आधारित था, वहीं आधुनिक काल में इसने कानूनी और प्रक्रियात्मक रूप धारण कर लिया।

20वीं शताब्दी में लोक कल्याणकारी राज्य के उदय के साथ न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह 'सामाजिक और आर्थिक न्याय' में परिवर्तित हो गया, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज के वंचित और शोषित वर्गों का उत्थान करना है।

इसी परिप्रेक्ष्य में जॉन रॉल्स (John Rawls) का न्याय सिद्धांत सबसे उत्कृष्ट और प्रासंगिक प्रतीत होता है। रॉल्स का 'अज्ञानता का पर्दा' (Veil of Ignorance) और उनका 'भेद-मूलक सिद्धांत' इस बात की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं कि एक आदर्श समाज की स्थापना कैसे की जा सकती है—जहाँ स्वतंत्रता और समानता के बीच एक तार्किक संतुलन हो, और जहाँ समाज के सबसे कमज़ोर (न्यूनतम सुविधा प्राप्त) व्यक्ति को भी विकास का अधिकतम अवसर मिले।

अंततः, जैसा कि बार्कर ने स्पष्ट किया है, न्याय ही वह अंतिम मूल्य है जो स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों को एक सूत्र में पिरोता है। बिना न्याय के किसी भी सभ्य समाज या लोकतांत्रिक राष्ट्र की कल्पना करना असंभव है।

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📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 'Justice' शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
'Justice' शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द 'Jus' या 'Juticia' से हुई है, जिसका अर्थ है 'जोड़ना' (समाज को जोड़ना)।
2. "जिस राज्य में न्याय व्यवस्था नहीं पायी जाती है, वह राज्य डाकुओं का झुण्ड बन जाता है"— यह कथन किसका है?
यह प्रसिद्ध कथन संत अगस्टाइन (St. Augustine) का है।
3. प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice) और तात्विक न्याय में क्या अंतर है?
प्रक्रियात्मक न्याय बाजार आधारित और योग्यता (Merit) पर बल देता है (उदारवाद से जुड़ा है), जबकि तात्विक न्याय नैतिकता और विषय के औचित्य पर आधारित होता है।
4. जॉन रॉल्स ने अपनी न्याय थ्योरी में 'प्राथमिक वस्तुएं' किसे माना है?
रॉल्स ने अधिकार, स्वतंत्रता, शक्तियां, अवसर, आय, सम्पदा और आत्म-सम्मान के साधनों को प्राथमिक वस्तुएं (Primary Goods) माना है।
5. आर्थिक न्याय का प्रमुख समर्थक किसे माना जाता है?
आर्थिक न्याय मुख्य रूप से मार्क्सवाद (कार्ल मार्क्स) से जुड़ा है, जो समाज में आर्थिक विषमता को समाप्त कर साधनों पर सम्पूर्ण समाज के नियंत्रण की वकालत करता है।
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