UNO, WTO, वैश्वीकरण एवं प्रमुख क्षेत्रीय संगठन (SAARC, ASEAN, BRICS): सम्पूर्ण नोट्स

PGT और NET/JRF राजनीति विज्ञान की परीक्षाओं के लिए UNO, WTO, वैश्वीकरण (Globalization) और प्रमुख क्षेत्रीय संगठनों (SAARC, ASEAN, BRICS) पर आधारित सम्पूर्ण स्टडी नोट्स
UNO, WTO, वैश्वीकरण एवं प्रमुख क्षेत्रीय संगठन - सम्पूर्ण नोट्स
Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में अंतरराष्ट्रीय राजनीति व अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तम्भों का विस्तृत और प्रामाणिक विश्लेषण किया गया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के अंग व कार्यप्रणाली, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के उद्देश्य, और उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण (LPG) के प्रभावों को गहराई से समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक राजनीति में प्रमुख क्षेत्रीय संगठनों (SAARC, ASEAN, OPEC, EU, BIMSTEC, IORA, BRICS) की भूमिका और भारत के साथ उनके कूटनीतिक सम्बन्धों को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

✦ 1. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्थापना

प्रत्येक युद्ध के बाद व्यवस्था में परिवर्तन होता है और विश्व युद्ध के बाद विश्व व्यवस्था में परिवर्तन होता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के प्रयासों से 1919 में राष्ट्र संघ (League of Nations) की स्थापना हुई। यद्यपि अमेरिकी सीनेट का अनुमोदन न मिलने से अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बन सका। राष्ट्र संघ एक आदर्शवादी या कानूनी संस्था था जिसका उद्देश्य राष्ट्रों के बीच विवादों को कानूनी तरीके से हल करना था। लेकिन 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने से राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लग गया।

■ UNO की स्थापना की ओर कदम

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक नयी अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना पर विचार होने लगा:

  • एटलान्टिक चार्टर (14 Aug 1941): रूजवेल्ट और चर्चिल के बीच।
  • याल्टा सम्मेलन (4 Feb 1945): रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन के बीच।
  • सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन (25 Apr - 26 Jun 1945): अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में 50 राष्ट्रों का एक सम्मेलन हुआ और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का निर्णय लिया गया। इन 50 राष्ट्रों ने घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किया।
  • 51वें सदस्य के रूप में 'पोलैण्ड' ने इस पर हस्ताक्षर किया। इन 51 देशों को प्रारम्भिक सदस्य राष्ट्र माना गया। भारत भी इनमें एक था (भारत की ओर से रामास्वामी मुदालियर, कृष्णामाचारी, फिरोज खाँ नून ने भाग लिया)।

24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया। 10 Feb 1946 को लंदन के वेस्टमिंस्टर हाल में इसकी आम सभा की पहली बैठक हुई। 25 Apr 1946 को एक प्रस्ताव पारित करके राष्ट्र संघ के अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर UNO अस्तित्व में आ गया।

✦ 2. UNO की संरचना: सदस्य, भाषाएँ, बजट एवं 5 सिद्धान्त

संयुक्त राष्ट्र संघ एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संस्था है, जो विश्व शान्ति और सामूहिक सुरक्षा के लिए कार्य करती है। यहाँ 'राजनीतिक संस्था' का अर्थ है— किसी प्रस्ताव पर पहले महासभा में बहस होती है, उसके बाद जब वह 2/3 बहुमत से पारित हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना एक संविधान है जिसे उसका चार्टर (Charter) कहते हैं। इसमें 19 अध्याय और 111 अनुच्छेद हैं।

पूरा नामUnited Nations Organisation (UNO)
मुख्यालयन्यूयार्क (अमेरिका)
कुल सदस्य (वर्तमान)193 राष्ट्र (सबसे अंतिम देश: दक्षिणी सूडान)
मान्यता प्राप्त 6 भाषाएँअंग्रेजी व फ्रेंच (मुख्य), चीनी, स्पेनिश, अरबी और रसियन
महासचिवप्रथम: त्रिग्वेली। वर्तमान: एन्टोनियो गुटेरेस (1 Jan 2017 से)
बजट अनुदानसर्वाधिक: जापान (26%), भारत का हिस्सा 1% से कम (0.36%)

संयुक्त राष्ट्र संघ का एक प्रतीक है जिसकी पृष्ठभूमि हल्की नीली है। उसके ऊपर श्वेत रंग का एक चित्र बना हुआ है जिसके ऊपर दो जैतून की टहनियाँ बनी हुई हैं और उस पर विश्व मानचित्र अंकित है, अर्थात् विश्व में शांति इसका प्रतीक है। सदस्य राष्ट्रों द्वारा उपलब्ध करायी गयी सेना शान्ति सेना (Peacekeeping Force) कहलाती है।

■ UNO के 5 प्रमुख सिद्धान्त

  1. सदस्य राष्ट्र स्वतन्त्र एवं सम्प्रभु होंगे।
  2. सदस्य राष्ट्रों के बीच परस्पर स्वतन्त्रता व समानता होगी (किसी का महत्व कम या अधिक नहीं)।
  3. सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का पालन करेंगे।
  4. प्रत्येक राष्ट्र की यह जिम्मेदारी होगी कि वह शान्ति सुरक्षा बनाये रखने में मदद करे।
  5. ऐसे राष्ट्र जो इसके सदस्य नहीं भी हैं वे भी इसका पालन करेंगे।

सामूहिक सुरक्षा का शाब्दिक अर्थ है: एक सबके लिए और सब एक के लिए। यदि किसी राष्ट्र पर आक्रमण होता है तो उसे सामूहिक आक्रमण मानते हुए सभी राष्ट्र मिलकर आक्रमणकारी के विरुद्ध कार्य करेंगे।

✦ 3. संयुक्त राष्ट्र महासभा (विश्व संसद) एवं कार्यप्रणाली

संयुक्त राष्ट्र संघ के कुल 6 अंग हैं।

[1] महासभा (General Assembly): इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था या विश्व संसद कहा जाता है। विश्व के जो भी देश सदस्य बनते हैं वे अपना सदस्य महासभा में ही भेजते हैं। प्रत्येक देश से 5 सदस्य और 5 वैकल्पिक सदस्य जाते हैं, लेकिन प्रत्येक देश का वोट एक ही होता है। सारे निर्णय किसी मुद्दे पर बहस के बाद 2/3 बहुमत से लिए जाते हैं।

  • अधिवेशन: प्रत्येक वर्ष 1 अधिवेशन होता है जो कि सितम्बर के तीसरे मंगलवार से लेकर दिसम्बर के मध्य तक चलता है।
  • अध्यक्ष: प्रत्येक अधिवेशन के लिए 1 अध्यक्ष एवं 21 उपाध्यक्ष चुने जाते हैं। महासभा के प्रथम अध्यक्ष पॉल हेनरी स्पॉक (बेल्जियम) थे।
  • विजय लक्ष्मी पण्डित: 1952 में 8वें अधिवेशन में भारत की विजय लक्ष्मी पण्डित अध्यक्षा चुनी गईं, जो अब तक की एक मात्र (प्रथम) महिला अध्यक्षा हैं।

महासभा ही महासचिव का चुनाव करती है। सामाजिक-आर्थिक परिषद्, न्यास परिषद् और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के सदस्यों का चुनाव करती है। किसी भी देश को सदस्यता प्रदान करना, निलम्बित करना, चार्टर में संशोधन करना, बजट पास करना आदि महासभा ही करती है। महासभा में विभिन्न समितियां (राजनीति व सुरक्षा समिति, आर्थिक समिति आदि) होती हैं जो कार्यों में सहायता करती हैं।

✦ 4. सुरक्षा परिषद् (Security Council) एवं वीटो पावर (Veto)

[2] सुरक्षा परिषद्: इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की कुंजी (Key) माना जाता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ में कोई भी कार्य सुरक्षा परिषद् के अनुमोदन के बिना सम्भव नहीं है। कुछ लोग इसे अंतरराष्ट्रीय पुलिसमैन (Policeman) के रूप में देखते हैं।

  • कुल सदस्य: 15 सदस्य होते हैं (5 स्थायी और 10 अस्थायी)।
  • स्थायी सदस्य (P5 Club): इनका कार्यकाल अनिश्चित है। ये पाँचों परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र हैं— चीन, फ्रांस, UK, USA, रूस।
  • अस्थायी सदस्य: इनका कार्यकाल 2 वर्ष है और ये विभिन्न महाद्वीपों से आते हैं।
  • सुरक्षा परिषद् का भी एक अध्यक्ष चुना जाता है जिसका कार्यकाल 1 माह होता है। बैठक प्रत्येक 15 दिन में होती है।

वीटो पावर (Veto Power): सुरक्षा परिषद् में सारा निर्णय 2/3 बहुमत से होता है। अर्थात् 15 में से 9 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है, जिसमें 5 स्थायी सदस्यों का शामिल होना आवश्यक है। यदि किसी मुद्दे पर एक भी स्थायी सदस्य अपनी असहमति व्यक्त करता है तो उसे 'वीटो' मान लिया जाता है। पहली बार सोवियत संघ ने फरवरी 1946 में लेबनान व सीरिया से सेना हटाने के मुद्दे पर अमेरिकी प्रस्ताव पर वीटो किया था।

सुरक्षा परिषद का भी एक अध्यक्ष चुना जाता है जिसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है। सुरक्षा परिषद की बैठक प्रत्येक 15 दिन में होती है। सुरक्षा परिषद् ने सन् 1952 में 'विशस्त्रीकरण आयोग' का गठन किया था जिसका उद्देश्य ऐसे प्रस्ताव प्रस्तुत करना था जिससे शस्त्रों में कटौती की जा सके।

सुरक्षा परिषद के अस्तित्व को कम करके नहीं देखा जा सकता है। इसी के प्रयासों से इंडोनेशिया, कांगो, साइप्रस, स्वेज नहर संकट, खाड़ी संकट जैसे कई मामलों को सुलझाया गया है।

✦ 5. UNO के अन्य अंग: ECOSOC, ICJ, न्यास परिषद् व सचिवालय

[3] सामाजिक आर्थिक परिषद् (ECOSOC)

यह परिषद् विश्व में गरीबी, भुखमरी, दरिद्रता आदि समस्याओं का उन्मूलन करने के लिए बनी है। यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों का अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपती है और संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों के अनुसार अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुला सकती है। इसमें कुल 54 सदस्य होते हैं जो महासभा से चुनकर आयेंगे। इसके 1/3 सदस्य हर 2 वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

[4] न्यास परिषद् (Trusteeship Council)

न्यास परिषद् अब 1994 से कार्य करना बंद कर दिया है। यह ऐसे देशों में रहने वाले नागरिकों के मानवाधिकारों की जाँच करती थी जो किसी बड़े राष्ट्र के अधीन हैं। यदि अधीन बनाए गए राष्ट्रों में रहने वाले नागरिकों के मानवाधिकार का उल्लंघन होता है या उन्हें प्रताड़ित किया जाता है तो यह परिषद उसकी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ को देती थी। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क, अमेरिका में था। बैठक वर्ष में दो बार होता था।

[5] अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)

  • मुख्यालय: हेग (नीदरलैण्ड)। इसकी स्थापना 3 अप्रैल 1946 को हुई। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का आधार अंतरराष्ट्रीय कानून है। यह राष्ट्रों के बीच आपसी विवादों का निपटारा करता है
  • इसके कुल न्यायाधीशों की संख्या 15 होती है। 15 में से 9 न्यायाधीशों की उपस्थिति (कोरम) आवश्यक है। इन न्यायाधीशों का चुनाव महासभा करती है यह सारा निर्णय दो तिहाई बहुमत से होता है। न्यायाधीश पुनः निर्वाचन के लिए भी पात्र होते हैं इनका चुनाव योग्यता के आधार पर होता है और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय महासभा द्वारा सौंप गए विवादों का निपटारा करता है और महासभा तथा सुरक्षा परिषद द्वारा मांगे गए परामर्श को भी देता है।
  • न्यायालय का अध्यक्ष 3 वर्ष के लिए होता है। न्यायाधीशों का कार्यकाल 9 वर्ष होता है।
  • भारत के प्रथम अंतरराष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश नागेन्द्र सिंह (डूंगरपुर) थे।

[6] सचिवालय (Secretariat)

यह UNO का प्रशासनिक अंग है, जिसका मुख्यालय न्यूयार्क में स्थित है। इसका मुखिया महासचिव होता है, जिसका चुनाव सुरक्षा परिषद के अनुमोदन से महासभा दो तिहाई बहुमत से करती है महासचिव पुनः निर्वाचित होने का पात्र है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष है। सचिवालय में महासचिव के अतिरिक्त सैकड़ो सचिव और हजारों कर्मचारी कार्य करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों और अभिकरणों के कार्यों को इसी सचिवालय में ही निपटाया जाता है। यदि संयुक्त राष्ट्र संघ कोई प्रस्ताव पारित करता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह तभी लागू होता है जब महासचिव उस पर हस्ताक्षर करता है।

भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी: संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के विस्तार को लेकर भारत लम्बे समय से अपनी माँग उठाता रहा है कि बदलते विश्व परिवेश में अब केवल पाँच सदस्य ही विश्व की नीतियों को तय नहीं कर सकते।

✦ 6. GATT से विश्व व्यापार संगठन (WTO) तक का सफर

हम जानते हैं कि 19वीं शताब्दी में यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रांति हुई, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में बेतहाशा वृद्धि हुई और धीरे-धीरे यह उत्पादन बढ़ता ही गया, जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि विश्व आर्थिक मंदी का जन्म हो गया।

1929 से लेकर 1932 तक विश्व में भयंकर आर्थिक मन्दी देखने को मिली। जिसकी वजह से विश्व अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई। उसे समय यह प्रावधान था कि जब कोई देश अपने उत्पादित वस्तु को दूसरे देश के बाजार में लेकर जाता था तो उस पर मनमानी शुल्क लगाया जाता था और उस देश की शर्तों पर ही व्यापार संभव था। इससे उबरने और व्यापार को सुलभ बनाने के लिए 1948 में 23 देशों ने जेनेवा में GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) की स्थापना की। भारत इसका संस्थापक सदस्य था।

GATT कोई संगठन नहीं था बल्कि यह एक अस्थायी समझौता था। इसका मुख्य उद्देश्य था कि दूसरे देश में कोई व्यापार किया जाय तो कम से कम प्रशुल्क (Tariff) लगाया जाय।

■ उरुग्वे वार्ता एवं डंकेल प्रस्ताव (Dunkel Draft)

GATT की समय-समय पर बैठक होती रही और निर्णय भी लिया जाता रहा लेकिन आगे चलकर विकसित देशों की यह चिंता सताने लगी कि व्यापार के साथ-साथ सेवाओं और बौद्धिक सम्पदा के सम्बन्ध में भी कोई नियम तय किया जाय।

  • 1986 में उरुग्वे सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके महानिदेशक आर्थर डंकेल थे (इसे 'डंकेल प्रस्ताव' भी कहा जाता है)।
  • आगे चलकर कई दौर की वार्ता हुई जिसमें विकासशील देशों ने खाद्य सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता व्यक्त किया तो इसी के परिणाम स्वरूप आगे चलकर 1994 में मराकेश सम्मेलन (मोरक्को) में WTO की स्थापना का अन्तिम निर्णय हुआ।
  • 1 Jan 1995 को एक स्थायी संस्था के रूप में विश्व व्यापार संगठन (WTO) अस्तित्व में आया और यह तय हुआ कि प्रत्येक 2 वर्ष पर सदस्य देशों के वाणिज्य मंत्रियों का एक सम्मेलन होगा।

✦ 7. WTO के कार्य, कार्यप्रणाली एवं 6 प्रमुख उद्देश्य

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय जेनेवा में है। इसके वर्तमान महानिदेशक राबर्ट अजेवेडो (2013-2017) थे (नोट: वर्तमान में नगोजी ओकोंजो-इवेला हैं)। वर्तमान में इसके 164 सदस्य देश हैं (164वाँ सदस्य अफगानिस्तान है) और 22 पर्यवेक्षक हैं।

■ WTO के कार्य व कार्यप्रणाली

  • कार्य: व्यापारिक वार्तालाप द्वारा व्यापार सुलभ बनाना, व्यापारिक विवादों का निपटारा करना, कार्यान्वयन एवं निगरानी (Look after) करना। व्यापार को सही ढंग से संचालित करने के लिए IMF व विश्व बैंक से सहायता दिलवाना।
  • कार्य-प्रणाली: मन्त्रिस्तरीय सम्मेलन 2 वर्ष में एक बार होता है। प्रत्येक सदस्य देश का एक वोट होता है।
  • 11वाँ मन्त्रिस्तरीय सम्मेलन अर्जेन्टीना (ब्यूनस आयर्स) Oct 2017 में हुआ था।

जब कोई देश WTO का सदस्य हो जाता है तो उसे अपनी बाज़ार विश्व के लिए खोलना पड़ता है। उसकी Domestic Market भी International Market में बदल जाती है।

■ WTO के 6 प्रमुख उद्देश्य

  1. सभी राष्ट्रों के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना।
  2. पूर्ण रोजगार सुलभ हो।
  3. वस्तुओं और सेवाओं में वृद्धि।
  4. सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को स्वीकार करना।
  5. विश्व संसाधन का अनुकूलतम उपयोग।
  6. पर्यावरण का संरक्षण या संवर्धन करना।

WTO के सिद्धान्त निम्न हैं:

  1. विश्व व्यापार समझौता का कार्यान्वयन, संचालन तथा उन्हें सुविधाएँ प्रदान करना।
  2. व्यापार शुल्क से सम्बन्धित किसी भी भावी मसले पर आपस में विचार विमर्श करना।
  3. व्यापार से सम्बन्धित विवादों का निपटारा करना।
  4. व्यापार को सही ढंग से संचालित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष व 'विश्व बैंक' से सहायता दिलवाना।

जब कोई देश WTO का सदस्य हो जाता है तो उसे अपनी बाज़ार विश्व के लिए खोलना पड़ता है और अपनी बाज़ार में उसके साथ वही व्यवहार करना पड़ता है जो अपनी कम्पनियों के साथ करना पड़ता है। इस प्रकार से उसकी Market भी अंतरराष्ट्रीय Market में बदल जाती है।

  • वर्तमान में इसमें 164 देश हैं जिसमें अंतिम सदस्य देश अफगानिस्तान है। सदस्य बनने के पूर्व वह इसका पर्यवेक्षक राष्ट्र होता है।
  • 11वाँ मन्त्रिस्तरीय सम्मेलन Oct 2017 में अर्जेन्टीना के ब्यूनस आयर्स में हुआ जिसमें खाद्य सुरक्षा को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच व्यापक मतभेद रहा और भारत तथा विकासशील देशों की चिन्ताओं के लिए इस मामले को आगे स्थगित रखा गया।
  • विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत— व्यापार, सेवाओं और बौद्धिक सम्पदा सभी को शामिल किया जाता है।

✦ 8. उदारीकरण (Liberalization): अर्थ एवं लाइसेंस मुक्त व्यवस्था

उदारीकरण एक सिद्धान्त है, जबकि निजीकरण एक प्रक्रिया है और वैश्वीकरण उसका एक व्यावहारिक रूप। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही उदारीकरण का जन्म हुआ। उदारीकरण का संचालन वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से संचालित हो रहा है।

उदारवाद का विकासक्रम: नकारात्मक उदारवाद (एडम स्मिथ - 'Wealth of Nations') ➡ सकारात्मक उदारवाद (लोक कल्याणकारी राज्य) ➡ नव उदारवाद (उदारीकरण/वैश्वीकरण)।

■ उदारीकरण का स्वरूप

उदारीकरण नकारात्मक उदारवाद को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। यह लोक कल्याणकारी राज्य के विरुद्ध एक प्रक्रिया है। इसका मानना है कि राज्य को लोक कल्याणकारी कार्य बंद कर देना चाहिए और उसे सुरक्षा, शांति व्यवस्था व न्याय तक सीमित रहना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त कर देना चाहिए और व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए खुला छोड़ देना चाहिए।

उदारीकरण सरकारीकरण का विरोधी है, इसका उद्देश्य मण्डी को मुक्त प्रतिस्पर्धा की ओर ले जाना है।

उदारीकरण के अन्तर्गत यह माना जाता है कि राज्य की लोक कल्याणकारी नीतियों के चलते व्यक्ति स्वयं परिस्थितियों के विरुद्ध हो जाता है, जिससे राज्य के संसाधनों पर जरुरत से अधिक बोझ पड़ता है। अतः सभी लोगों को परिश्रम की ओर प्रेरित करने के लिए राज्य की लोक कल्याणकारी नीतियों को कम करना होगा।

लाइसेंस मुक्त व्यवस्था: उदारीकरण लाइसेंस मुक्त व्यवस्था का दूसरा नाम है। इसके अन्तर्गत सभी वस्तुओं के आयात की विभिन्न चरणों में खुली छूट दी जाती है। सीमा शुल्क में कटौती की जाती है और विदेशी पूँजी के मुक्त प्रवाह की इजाजत दिया जाता है। सेवा क्षेत्र विशेषकर बैंकिंग, बीमा, जहाजरानी आदि में विदेशी पूँजी निवेश की छूट दी जाती है। रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया जाता है।

यह लाइसेंस मुक्त व्यवस्था सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सभी क्षेत्रों में देखने को मिलता है। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि— आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण कोटा पद्धति या इंस्पेक्टर राज या लाइसेंस मुक्त व्यवस्था का दूसरा नाम है।

✦ 9. निजीकरण (Privatization) एवं वैश्वीकरण (Globalization)

■ निजीकरण (Privatization)

निजीकरण का अर्थ ऐसी नीति से है जिसके अन्तर्गत अर्थव्यवस्था के किसी महत्वपूर्ण हिस्से को सरकारी क्षेत्र व नियन्त्रण से हटाकर निजी या गैर सरकारी क्षेत्र के स्वामित्व व नियन्त्रण में रख दिया जाता है, ताकि उसकी कार्य कुशलता को बढ़ाया जा सके। वित्तीय हानि को रोका जा सके और अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए लोगों को अधिकतम परिश्रम की ओर प्रेरित की जा सके, राष्ट्र की समृद्धि बढ़ायी जा सके।

अर्थात्, "सरकारी क्षेत्र का विनिवेशीकरण ही निजीकरण है।" अधिकतम शेयर जिसके पास होगा उस पर उसी का मालिकाना हक होगा।

■ वैश्वीकरण (Globalization)

वैश्वीकरण की लोकप्रियता 1980 के दशक में मिली जब इंग्लैण्ड की तत्कालीन प्रधानमन्त्री मार्गरेट थैचर ने वहाँ औद्योगीकरण की प्रक्रिया को तेज किया। और 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्वीकरण की प्रक्रिया में तेजी आयी। भारत में भी 1991 से तत्कालीन वित्तमन्त्री डा० मनमोहन सिंह के प्रयासो से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

वैश्वीकरण उदारीकरण का व्यावहारिक रूप है और यह तब अस्तित्व में आता है, जब निजीकरण की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण विश्व को एक बाजार में बदल दिया जाता है तथा राज्यों के आपसी सम्बन्ध बाजार व अर्थव्यवस्था के आधार पर निर्धारित होते हैं सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण हो जाता है। सब्सिडी में धीरे-धीरे कटौती की जाती है। उद्योग संरक्षण की नीति का परित्याग किया जाता है इस प्रकार समूचा विश्व एक बाजार में बदल जाता है और विश्व व्यवस्थाओं में काफी समानताएं दिखाई पड़ने लगती हैं।

वैश्विक ग्राम की अवधारणा (Global Village): हर देश की अर्थव्यवस्था विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ जाती है। विश्व में आर्थिक मन्दी या उछाल आता है तो हर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है और एक देश की अर्थव्यवस्था में भी उछाल या मन्दी आती है तो उसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई पड़ता है। किसी एक देश की अर्थव्यवस्था का अध्ययन करके पूरे विश्व व्यापार का रूख निर्धारित किया जा सकता है। अर्थात् पूरा विश्व एक गाँव में बदल जाता है, इसी को 'वैश्विक ग्राम' की अवधारणा कहा जाता है!

✦ 10. वैश्वीकरण का प्रभाव: विकसित एवं विकासशील देशों पर

विकसित देश एवं वैश्वीकरण विकासशील देश एवं वैश्वीकरण
  • विकसित पूँजीवादी देशों के लिए वैश्वीकरण एक लाभ की प्रक्रिया है यह विकसित देशों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक व्यवस्थाओं के अनुकूल है।
  • इसके द्वारा विकसित देश अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करते हैं और विश्व बाजार की अवधारणा उपलब्ध होने से उनकी पूँजी का खुला प्रवाह होता है।
  • विकसित देशों की टेक्नोलॉजी का भी बड़ा लाभ मिलता है वे विकासशील देशों में पूँजीनिवेश व आर्थिक लाभ कहकर उनके प्राकृतिक संसाधनों का बड़ी निर्ममता के साथ दोहन करते हैं। जिससे पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  • वे अपनी पुरानी तकनीकि को विकासशील देशों को बेच देते हैं और उच्च ब्याज पर उन्हें ऋण उपलब्ध कराते हैं। अतः उपर्युक्त से स्पष्ट होता है कि वैश्वीकरण का लाभ विकसित देश पूरी तरह से उठाते हैं।
  • विकासशील देशों के लिए वैश्वीकरण उतना फायदेमंद नहीं है जितना कि विकसित देशों के लिए यद्यपि उन्हें तत्काल लाभ पहुँच जाता है क्योंकि पर्याप्त मात्रा में पूँजीनिवेश के कारण यहाँ औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से उनकी आय बढ़ जाती है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नाम पर उन्हें कुछ पिछड़ी टेक्नोलॉजी मिल जाती है, जिससे स्वदेशी के उत्पादन में कम लागत आती है अतः स्पष्ट है कि तत्काल विकासशील देशों को फायदा हो जाता है। उनकी तत्कालीन समस्या हल हो जाती है।
  • लेकिन आगे चलकर उन्हें इतना बड़ा फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि मुक्त प्रतिस्पर्धा में वे बहुत पिछड़ जाते हैं।
  • भारत में भी जब 1991 में उदारीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई तो भारत ने रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया और अपनी मुद्रा का अवमूल्यन भी कर दिया। फलस्वरूप पूँजीनिवेश तेजी के साथ बढ़ा और भारत को तत्काल फायदा मिल गया लेकिन आज भी भारत 24-25 वर्ष बाद उदारीकरण में प्रतियोगिता के लायक नहीं बन सका।
जैसा कि अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले डा० अमर्त्य सेन का मानना है -
"विकासशील देशों को उदारीकरण में तब तक फायदा नहीं हो सकता जब तक वे अपनी आधारभूत संस्थाओं जैसे - सड़क, बिजली, संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार नहीं कर लेते।"

✦ 11. क्षेत्रीय संगठन: अर्थ, विशेषताएँ एवं 6 प्रमुख उद्देश्य

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तिवादी राजनीति के स्थान पर समन्वयवादी राजनीति का जन्म हुआ और न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न प्रकार के संगठनों का जन्म होने लगा।

अंतरराष्ट्रीय संगठन समूचे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करता है और विश्व का कोई भी राष्ट्र उसका सदस्य बन सकता है उसी प्रकार से क्षेत्रीय संगठन केवल क्षेत्रीय स्तर पर कार्य करता है और उस क्षेत्र का कोई भी राष्ट्र उसका सदस्य बन सकता है। बाहरी राष्ट्र पर्यवेक्षक बन सकते हैं लेकिन सदस्य नहीं बन सकता है।

■ क्षेत्रीय संगठन बनाने का मुख्य उद्देश्य निम्न है:

  1. क्षेत्र के राष्ट्रों के बीच सहयोग विकसित करना और यह सहयोग प्रायः हर क्षेत्र में विकसित किया जाय - सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, पर्यटन, व्यापार, तकनीकि आदि।
  2. संगठन का उद्देश्य- क्षेत्र को मजबूत बनाना ताकि बाहरी शक्तियाँ उस क्षेत्र में अपने प्रभुत्व को स्थापित न कर सके।
  3. क्षेत्र में रहने वाले गरीब राष्ट्रों को भी मजबूत करना ताकि क्षेत्र की मजबूती में वह भी अपना योगदान दे सके।
  4. क्षेत्रीय संगठन बनाने का अर्थ यह है कि बाहरी देशों पर निर्भरता कम हो सके और आंतरिक स्थिति को मजबूत किया जा सके।
  5. क्षेत्र के मजबूत होने पर क्षेत्र की बात अंतरराष्ट्रीय मंचो पर ध्यान से सुनी जायेगी।
  6. क्षेत्र के मजबूत होने पर बाहरी देश हमारे साथ सम्बन्ध बनाने के लिए उत्सुक होंगे।

प्रायः सभी क्षेत्रीय संगठन राजनीतिक और आर्थिक रूप में जाने जाते हैं। मुख्य क्षेत्रीय संगठनों में - सार्क, आसियान, ओपेक और यूरोपीय यूनियन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य संगठन हैं - हिम तक्षेस, बंग तक्षेस, शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स और एपेक आदि।

✦ 12. सार्क (SAARC / तक्षेस): स्थापना, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली

तक्षेस में वर्तमान में कुल 8 सदस्य राष्ट्र हैं जिसमे - भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव, अफगानिस्तान है।

प्रारम्भ में 7 सदस्य राष्ट्र थे लेकिन 2007 में जब दिल्ली में 14 वाँ शिखर सम्मेलन हुआ तो इसमें अफगानिस्तान को शामिल कर लिया गया। अतः अब 8 सदस्य राष्ट्र हैं इसका मुख्यालय नेपाल के काठमाण्डू में है इसमें एक महासचिव होता है जो 2-2 वर्षों के लिए राष्ट्रों से चुनकर आता है और यही सम्मेलन का संचालन करता है।

  • सार्क या दक्षिण एशिया के राष्ट्र सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं इनकी कुल जनसंख्या विश्व की लगभग 22% है।
  • इनका कुल घरेलू उत्पाद विश्व का लगभग 2% है।
  • जबकि विश्व व्यापार में हिस्सेदारी 1% से भी कम है।
  • दक्षिण एशिया में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और जनसंख्या विस्फोट एक बड़ी समस्या है।

■ SAARC की स्थापना का सफर

दक्षिण एशियाई देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग की स्थापना करने के लिए बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान ने बड़ी भूमिका निभाई उन्होने 1977 से 1980 के बीच दक्षिण एशियाई की यात्रा किया और एक संगठन बनाने की पहल किया।

  • इसी परिप्रेक्ष्य में सभी राष्ट्राध्यक्ष 1981 में कोलम्बो में मिले।
  • 1983 में नई दिल्ली में विदेश स्तर पर यह निर्णय लिया गया।
  • इसका पहला शिखर सम्मेलन 7-8 Dec 1985 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुआ। इसलिए 8 Dec को सार्क दिवस भी मनाया जाता है।

सार्क के सदस्य देश आपस में मिलकर एक अंशदान देते हैं जिससे उसका बजट बनता है। सार्क का संविधान भी है जिसे उसका चार्टर भी कहा जाता है इसमें कुल 10 अनुच्छेद है इसमें SAARC के सदस्य और उसकी बैठकों का वर्णन किया गया है।

■ सार्क के प्रमुख देश उद्देश्य निम्न हैं:

  1. क्षेत्र में रहने वाले लोगो के जीवन स्तर में सुधार करना और उनके कल्याण को बढ़ावा देना।
  2. क्षेत्र में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास में तेजी लाना और क्षेत्र में रहने वाले लोगो के स्वाभिमान की रक्षा करना तथा उनकी क्षमता के विकास को अवसर प्रदान करना।
  3. क्षेत्र में सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और उन्हे मजबूती प्रदान करना।
  4. आपसी विश्वास को बढ़ाना और एक-दूसरे की समस्याओं को समझना।
  5. दक्षिण एशिया में रहने वाले देशो के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकि, सामाजिक और वैज्ञानिक क्षेत्रो में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  6. अन्य विकासशील देशो के साथ सहयोग को मजबूत करना।
  7. आपस में साझा हित के मामले पर अंतरराष्ट्रीय मंचो पर आपसी सहयोग को मजबूती प्रदान करना।

■ सार्क के कुछ प्रमुख सम्मेलन निम्न है:

  • (1) शिखर सम्मेलन - यह प्रायः प्रतिवर्ष होता है इसमें सदस्य राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष भाग लेते है।
  • (2) मन्त्रिपरिषद् स्तरीय सम्मेलन - यह 6-6 महीने पर होता है इसमें प्रायः सदस्य राष्ट्र के विदेश मन्त्री स्तर के लोग भाग लेते है। इसका कार्य होता है - ऐसे मुद्दो को रखना जो शिखर सम्मेलन में उठाये जाये।
  • (3) सचिव स्तरीय सम्मेलन - यह वर्ष में एक बार होता है इसमें विवादित मुद्दो को हल करने का प्रयास किया जाता है।
  • (4) तकनीकि समिति - इसका मुख्य कार्य सार्क द्वारा लिये गये निर्णयों को क्रियान्वित करना है।

महत्वपूर्ण नियम: ध्यान रहे कि यह क्षेत्रीय मंच है यहाँ जो भी मुद्दे उठाए जायेंगे वे क्षेत्रीय मुद्दे होंगे। यहाँ पर द्विपक्षीय मुद्दा या बहुपक्षीय मुद्दा नहीं उठाया जायेगा।

यद्यपि सार्क एक क्षेत्रीय संगठन के रूप में सफल बन गया है लेकिन सदस्य राष्ट्रों के बीच इतना अधिक मतभेद है कि सम्मेलन तक स्थगित करना पड़ता है इस संगठन में पाकिस्तान सबसे अधिक बाधक देश है क्योंकि वह आतंकवाद का पनाहगार है और दक्षिण एशिया गरीबी, बीमारी, भुखमरी से ज्यादा आतंकवाद से पीड़ित है इस संगठन में भारत-पाकिस्तान दो बड़े देश है और दोनो के बीच उग्र टकराव का आँकड़ा है। अतः क्षेत्रीय संगठनों में यह सबसे कमजोर संगठन है।

लेकिन आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में सदस्य राष्ट्र वस्तु-स्थिति को समझेंगे और इस संगठन को न केवल नष्ट होने से बचायेंगे अपितु आगे भी बढ़ायेंगे।

✦ 13. आसियान (ASEAN): स्थापना, उद्देश्य एवं भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी'

दक्षिण पूर्व एशियाई संगठन - इसे संक्षेप में आसियान के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत के पूर्व और चीन के दक्षिण में स्थित है, दक्षिण पूर्वी देशों को हिन्द चीन का देश भी कहा जाता है। यहाँ बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ था इसलिए यहाँ से भारत के सांस्कृतिक रिश्ते काफी गहरे हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब ये देश स्वतन्त्र हुए तो अपने क्षेत्र को समृद्ध बनाने के लिए एक संगठन बनाने का निर्णय लिया। अतः आसियान एक आर्थिक एवं राजनीतिक संगठन के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में यह 10 राष्ट्रों का मुख्य संगठन है (विदित हो कि तिमोर-लेस्ते को 11वें सदस्य के रूप में सैद्धांतिक स्वीकृति मिल चुकी है)।

8 Aug सन् 1967 को मुख्य रूप से पाँच देशों ने इण्डोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर व थाईलैण्ड ने मिलकर बैंकॉक में एक घोषणा पत्र तैयार किया था जिसे आसियान घोषणा पत्र कहा गया। बाद में इसमें ब्रुनेई, वियतनाम, लाओंस, म्यामार व कम्बोडिया शामिल हुए। 1976 में इण्डोनेशिया में जब इसका पहला शिखर सम्मेलन हुआ तो उसमें निम्न तीन बिन्दुओं पर आम सहमति व्यक्त किया गया-

  1. बाहरी आयात कम करके सदस्य राष्ट्रों के बीच व्यापार को महत्व दिया जाय।
  2. खाद्य एवं ऊर्जा शक्ति वाले इन क्षेत्रों में अभाव से पीड़ित आसियान देशों की मदद करना।
  3. आसियान के देश व्यापार को अधिकाधिक क्षेत्रीय बनाने का प्रयास करेंगे।

आसियान घोषणा पत्र में स्पष्ट किया गया कि इस क्षेत्र को एक साझा बाजार के रूप में विकसित किया जाय और साथ-साथ सदस्य राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व्यापारिक, वैज्ञानिक, तकनीकि, प्रशासनिक आदि क्षेत्रों में परस्पर सहायता करना और सामूहिक सहयोग द्वारा क्षेत्र की समस्याओं को हल करना है। इसके अतिरिक्त हवाई सेवाओं के व्यापारिक अधिकारों की रक्षा तथा जहाजों को सहायता पहुँचाने से सम्बन्धित मुद्दे पर भी हस्ताक्षर हुआ।

वर्ष 2007 से यह तय किया गया कि वर्ष में इनका सम्मेलन दो बार होगा।

  • आसियान देशों का कुल क्षेत्रफल 44 लाख वर्ग किलो. मीटर (पृथ्वी के क्षेत्रफल का 3%) और इन देशों की कुल जनसंख्या लगभग 67 करोड़ से अधिक है। अर्थात् विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 8.5% है।
  • हालिया आँकड़ों के अनुसार इन देशों की कुल GDP लगभग 3.8 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर तक पहुँच गई है, इस हिसाब से यह अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान के बाद विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

आसियान ने आसियान रीजनल फोरम (ARF) का भी गठन किया है जिसमे बाहरी देशों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके आठ पर्यवेक्षक देश हैं जिसमे - आस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैण्ड, रूस, दक्षिण कोरिया और अमेरिका है। आसियान के साथ विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ते हुए पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की शुरूआत 2005 में हुई।

आसियान का 47वाँ शिखर सम्मेलन 26 से 28 अक्टूबर 2025 के बीच कुआलालंपुर (मलेशिया) में सम्पन्न हुआ। इसी के साथ 22वाँ भारत-आसियान शिखर सम्मेलन और 20वाँ पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन भी आयोजित किया गया था, जिसमें वर्ष 2026 को 'आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष' घोषित किया गया। इसके पश्चात्, हाल ही में आसियान का 48वाँ शिखर सम्मेलन 6 से 8 मई 2026 के बीच फिलीपींस के सेबू (Cebu) शहर में सम्पन्न हुआ है। अब इसका आगामी 49वाँ शिखर सम्मेलन 10 से 12 नवम्बर 2026 के बीच फिलीपींस की राजधानी मेट्रो मनीला (Metro Manila) में प्रस्तावित है।

■ भारत और आसियान

  • भारत ने जब 1991 में उदारीकरण की नीति अपनायी तो भारत ने उसी समय से आसियान को महत्व देना प्रारम्भ कर दिया और भारत ने 'लुक ईस्ट पालिसी' अर्थात् पूर्व की ओर देखो की नीति अपनायी।
  • 2014 में 12वें भारत-आसियान शिखर सम्मेलन व 9वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में जब प्रधानमंत्री मोदी ने भाग लिया तो उन्होने इसे 'एक्ट ईस्ट पालिसी' (Act East Policy) के रूप में उन्नत (Upgrade) किया।
  • भारत 1996 में आसियान का संवादी सदस्य (Dialogue Partner) बना और आसियान + 1 (आसियान और भारत) का गठन हुआ।
  • 2004 में भारत-आसियान ट्रेड निगोशिएशन (AITG) का गठन हुआ।
  • भारत और आसियान के बीच व्यापारिक रिश्तों को बढ़ावा देने के लिए भारत आसियान व्यापार मुक्त क्षेत्र (AIFTA) का गठन हुआ। तब से भारत और आसियान का व्यापार लगातार बढ़ रहा है; वर्तमान आँकड़ों (2022-23) के अनुसार द्विपक्षीय व्यापार 131.5 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गया है, जो कि भारत के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 11% है।
  • दक्षिणी चीन सागर में चीन के आधिपत्य को संतुलित करने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भारत के लिए आसियान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

✦ 14. ओपेक (OPEC): पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन

पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन - OPEC

ओपेक के देशों को मध्य पूर्व का देश भी कहा जाता है। इसे अरब देशों के संगठन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें प्रायः वे देश आते हैं जो प्रचुर मात्रा में तेल का न केवल उत्पादन करते हैं बल्कि उसका निर्यात भी करते हैं। यहाँ तेल ही इनकी अर्थव्यवस्था का आधार होता है।

यदि संगठन का कोई सदस्य देश तेल का निर्यात बन्द कर दे अथवा निर्यात के बदले आयात शुरू कर दे, तो स्वैच्छिक रूप से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पूर्व में इण्डोनेशिया के साथ ऐसा ही हुआ था। नवीनतम अपडेट: हाल ही में कतर, इक्वाडोर और जनवरी 2024 में अंगोला (Angola) ने भी ओपेक छोड़ दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान में ओपेक के सदस्य देशों की संख्या घटकर 12 ही रह गई है।

ओपेक पेट्रोलियम उत्पादक देशों का संगठन है, इसकी स्थापना प्रारम्भ में पाँच देशों - (1) ईरान (2) इराक (3) कुवैत (4) सउदी अरब और (5) वेनेजुएला ने मिलकर 1960 में बगदाद में किया था। बाद में इसमें अल्जीरिया, अंगोला (अब बाहर), इक्वाडोर (अब बाहर), नाइजीरिया, कतर (अब बाहर), सं० अरब अमीरात (UAE) आदि को भी सदस्यता प्रदान किया गया।

1961 से यह संगठन कार्य करना प्रारम्भ किया, इसका मुख्यालय वियना (ऑस्ट्रिया) में है। यहाँ समय-समय पर सदस्य राष्ट्रों के तेल मन्त्रियों की बैठक होती है जिसमें महत्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं।

यह संगठन विश्व के अधिकांश तेल निर्यातक देशों को एकजुट करता है और यह पेट्रोलियम निर्यातक देशों की नीतियों में समन्वय स्थापित करता है तथा उन्हें आर्थिक एवं तकनीकि सहायता प्रदान करता है। ओपेक का मुख्य उद्देश्य खनिज तेल के उत्पादन व उसकी कीमतों को नियन्त्रित करना तथा पेट्रोलियम निर्यात करने वाले राष्ट्रों के हितों की सुरक्षा करना है।

✦ 15. यूरोपीय यूनियन (EU): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशेषताएँ व यूरो मुद्रा

यूरोपीय यूनियन - यह क्षेत्रीय संगठनों में सबसे पुराना और सबसे अधिक देशों वाला संगठन है।

  • इसका गठन सर्वप्रथम 1951 में यूरोपीय कोयला एवं स्टील समुदाय के नाम से हुआ।
  • 1957 में रोम सन्धि के द्वारा इसका नाम बदलकर यूरोपीय आर्थिक समुदाय (अर्थात् ECM) कर दिया गया, चूँकि इसका मुख्य उद्देश्य इसे एक साझा बाजार के रूप में विकसित करना था।
  • 1991 में मास्ट्रिच (नीदरलैण्ड) में एक सन्धि हुई और यह मास्ट्रिच सन्धि 1993 में अस्तित्व में आयी। इसी के साथ इसका नाम बदलकर यूरोपीय यूनियन (EU) कर दिया गया।

यूरोपीय यूनियन का राजनीतिक केन्द्र बेल्जियम के ब्रुसेल्स में है। यह मुख्यत: यूरोप के देशों का एक राजनीतिक एवं आर्थिक मंच है।

  • 20 फरवरी 2016 को ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री डेविड कैमरून ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने या बने रहने के लिए एक जनमत संग्रह कराया।
  • 23 जून 2016 को जब इसका परिणाम आया तो ब्रिटेन ने अलग होने का निर्णय ले लिया।
  • ब्रेक्जिट (Brexit) अपडेट: लिस्बन सन्धि के नियमों के अनुसार 31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन आधिकारिक रूप से EU से अलग हो गया। वर्तमान में यूरोपीय यूनियन में कुल 27 देश शेष हैं।

यूरोपीय यूनियन के प्रमुख देशों में - ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, साइप्रस, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैण्ड, फ्रांस, लक्जमबर्ग, नीदरलैण्ड, इटली, यूनान, पोलैण्ड, पुर्तगाल आदि हैं।

यूरोपीय संघ के देशों ने यूरोपीय यूनियन समूह 8 भी बनाया है और यह समूह संयुक्त राष्ट्र संघ और WTO में यूरोपीय यूनियन का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देश नाटो (NATO) के भी सदस्य हैं।

■ यूरो मुद्रा (Euro Currency)

यूरोपीय यूनियन के देशों ने 1 Jan 1999 को यूरो मुद्रा को अपनाया। प्रारम्भ में इसमें 11 राष्ट्र सदस्य थे लेकिन वर्तमान (नवीनतम अपडेट) में 20 देशों ने इसे अपना लिया है (क्रोएशिया 2023 में यूरो अपनाने वाला 20वाँ देश बना)। यूरोपीय यूनियन के कई देशों ने यूरो मुद्रा को नहीं अपनाया है। यूरो मुद्रा का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी डॉलर को टक्कर देना था। यूरोपीय यूनियन में यूरो क्षेत्र की मौद्रिक नीति का प्रबन्ध यूरोपीय केन्द्रीय बैंक तथा यूरो प्रणाली करती है। यूरो क्षेत्र के सारे राजनीतिक निर्णय यूरो समूह द्वारा लिए जाते हैं।

■ यूरोपीय यूनियन की अद्वितीय विशेषताएँ

यूरोपीय यूनियन एक ऐसा संगठन है जहाँ सदस्य राष्ट्रों के बीच न केवल आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यटन, तकनीकि व व्यापारिक चर्चा होती है बल्कि यह इससे भी आगे जा चुका है। यहाँ पर एक साझा बाजार है, साझी व्यापारिक नीति, साझी कृषि नीति, साझी मत्स्य नीति, साझी सुरक्षा और साझी विदेश नीति भी है। यूरोपीय यूनियन के देशों में कॉमन मुद्रा का राज चलता है। सदस्य देश एक-दूसरे के यहाँ बिना किसी रोक-टोक के आ जा सकते हैं, वीजा की कोई आवश्यकता नहीं है (शेंगेन क्षेत्र), वे कहीं भी बस सकते हैं, कहीं भी सम्पत्ति खरीद सकते हैं। उनका एक साझा बैंक है, साझी संसद है जहाँ सदस्य देश के नागरिकों द्वारा 5 वर्ष के लिए सदस्य चुनकर आते हैं।

यूरोपीय यूनियन का अपना एक न्यायालय है। यहाँ Court of Justice और Court of Auditors भी है। यूरोपीय यूनियन के देशों ने एक साझा संविधान का निर्माण भी किया था लेकिन फ्रांस और नीदरलैण्ड की असहमति के कारण यह लागू नहीं हो सका। इसके सदस्य देश 6-6 महीनों के लिए इसकी अध्यक्षता करते हैं।

भारत का क्षेत्रीय संगठनों में यूरोपीय यूनियन सबसे बड़ा भागीदार है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार भारत और EU के बीच व्यापार बढ़कर लगभग 130 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को पार कर गया है, जो भारत के कुल विदेशी व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।

✦ 16. बिम्सटेक (BIMSTEC): स्थापना, कार्यक्षेत्र एवं रोहिंग्या समस्या

इसे 'बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन' के नाम से भी जाना जाता है।

इसकी स्थापना सन् 1997 में चार देशों— बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, थाईलैण्ड ने मिलकर किया था और म्यांमार को पर्यवेक्षक के रूप में रखा गया था। अब इसमें म्यांमार को भी शामिल किये जाने से इसका नाम बिस्टेक से बदलकर बिम्सटेक कर दिया गया है। 2004 में इसमें नेपाल और भूटान को भी शामिल किये जाने से इनकी संख्या बढ़कर 7 हो गई है। संगठन का स्थाई कार्यालय (सचिवालय) ढाका (बांग्लादेश) में है। नवीनतम अपडेट: वर्ष 2024 में बिम्सटेक चार्टर पूर्ण रूप से लागू हो गया है, जिससे यह अब एक संप्रभु अंतर्राष्ट्रीय संगठन बन गया है।

मूल रूप से यह बंगाल की खाड़ी के देशों का तटवर्ती क्षेत्रीय संगठन है। यह आपस में सहयोग करने के लिए संगठन बना है। इसमें सदस्य राष्ट्रों के बीच— व्यापार, ऊर्जा, पर्यटन, मत्स्य पालन, टेक्नोलॉजी और परिवहन आदि 6 क्षेत्रों की पहचान की गई थी। लेकिन आगे चलकर कृषि, गरीबी उन्मूलन, आतंकवाद, संस्कृति, जन-सम्पर्क, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।

बिम्सटेक की तरफ भारत का झुकाव सार्क और साफ्टा की असफलता के कारण बढ़ा है। चूँकि पाकिस्तान के नकारात्मक रवैये के कारण भारत सार्क में अपने हितों को नहीं देख पा रहा था, अतः भारत की बिम्सटेक में सक्रिय भागीदारी से भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी' (Act East Policy) पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को फायदा मिलेगा। यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच सन्तुलन का कार्य करेगा और भारत के व्यापार को बढ़ावा देगा।

लेकिन मुख्य समस्या यह है कि मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अभी भी कोई ठोस आम सहमति नहीं बन पाई है और साथ ही शरणार्थियों की समस्या भी एक मुख्य मुद्दा है। म्यांमार से पलायन किये रोहिंग्या मुसलमान इस क्षेत्र की एक गम्भीर समस्या बने हुए हैं। हाल के वर्षों में इसका 5वाँ शिखर सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका) में आयोजित हुआ और वर्तमान में इसकी अध्यक्षता थाईलैंड के पास है।

✦ 17. हिन्द महासागर तटवर्ती क्षेत्रीय संगठन (IORA): सिद्धान्त व उद्देश्य

यह हिन्द महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें हिन्द महासागर के तट पर बसे हुए देश सदस्य हैं। इसे अन्तर्महाद्वीपीय संगठन भी कहते हैं क्योंकि यह एशिया, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया महाद्वीप को जोड़ता है।

हिम तक्षेस (IORA) की स्थापना 1997 में हिन्द महासागर के तट पर स्थित देशों को मिलाकर हुई। नवीनतम अपडेट: वर्तमान में इसमें कुल 23 देश सदस्य हैं (वर्ष 2020 में फ्रांस भी रीयूनियन द्वीप के आधार पर इसका 23वाँ सदस्य बन गया है)। इसके कुछ प्रमुख देशों में भारत, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, इण्डोनेशिया, ईरान, केन्या, मारीशस, मोजाम्बिक, ओमान, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, थाईलैण्ड, सं० अरब अमीरात तथा यमन शामिल हैं।

1995 में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मण्डेला ने अपनी भारत यात्रा के दौरान हिन्द महासागर के तटीय देशों की इस आकांक्षा को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था कि, इस क्षेत्र में रहने वाले देशों के बीच व्यापारिक, आर्थिक तथा अन्य सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाना चाहिए।

IORA के देशों ने एक संविधान स्वीकार किया है जिसे उसका चार्टर कहा जाता है। इस संगठन का निर्देशक सिद्धान्त है— खुला क्षेत्रवाद (Open Regionalism)। इसका मुख्यालय एबेने (मॉरीशस) में है। इसके 11 वार्ताकार राष्ट्र (Dialogue Partners) भी हैं जिनमें चीन, जापान, अमेरिका, यूके, जर्मनी आदि प्रमुख हैं।

■ IORA के प्रमुख सिद्धान्त

  1. सभी मामलों में प्रत्येक निर्णय आपसी सहमति से लिये जायेंगे।
  2. द्विपक्षीय विवादों को संगठन के मंच से पूर्णतः बाहर रखा जायेगा।
  3. सभी सदस्य राष्ट्र IORA के उद्देश्यों की पूर्ति करने का भरसक प्रयास करेंगे।
  4. इस संगठन की योजनाएं एवं कार्यक्रम सदस्य राष्ट्रों के स्वैच्छिक क्रियान्वयन द्वारा संचालित किये जायेंगे।

■ IORA के प्रमुख उद्देश्य

  • सदस्य राष्ट्रों द्वारा हिन्द महासागर क्षेत्र में टिकाऊ (सतत) विकास तथा संतुलित विकास करना और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना।
  • सदस्य राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाना तथा व्यापार व निवेश के लिए एक साझा मंच तैयार करना।
  • हिन्द महासागर क्षेत्र में उदारीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना ताकि व्यापार को निर्बाध गति से बढ़ावा मिल सके।
  • विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियों को इस क्षेत्र के अनुकूल बनाने का प्रयास करना।

ध्यान रहे कि "खुले व्यापार" का अर्थ है कि सदस्य राष्ट्रों के बीच मुक्त व्यापार होगा और इसके साथ-साथ यदि कोई गैर-सदस्य राष्ट्र चाहे, तो वह भी सहयोग कर सकता है या इसका सदस्य बन सकता है।

✦ 18. ब्रिक्स (BRICS): स्थापना, उद्देश्य एवं न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)

ब्रिक्स शब्द का पहली बार प्रयोग 2001 में निवेश बैंक गोल्डमैन के एक विश्लेषक - जिम ओ नील ने किया था। उनके अनुसार ब्रिक (BRIC) देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था 2050 तक विकसित देशों को भी पीछे छोड़ देगी।

2009 में 'ब्रिक' का गठन हुआ, इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन प्रारम्भ में शामिल थे, लेकिन 2010 में इसमें दक्षिण अफ्रीका (South Africa) के शामिल होने से कुल पाँच देश हो गए और इसका नाम 'ब्रिक्स' (BRICS) कर दिया गया। वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया गया है। यह मुख्य रूप से विकासशील देशों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक अत्यंत शक्तिशाली संगठन है।

नवीनतम ऐतिहासिक विस्तार (BRICS+): 1 जनवरी 2024 से ब्रिक्स का आधिकारिक विस्तार हुआ है, जिसमें मिस्र (Egypt), इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) नए स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हो गए हैं। इस प्रकार अब यह 9 देशों का एक बड़ा समूह (BRICS+) बन गया है, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मजबूत पैरवी कर रहा है।

■ ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य

ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य विकसित देशों के आर्थिक शोषण से विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बचाना है। चूँकि वर्तमान विश्व आर्थिक संस्थाओं (जैसे- World Bank, IMF) के माध्यम से विकसित देश विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नियन्त्रित करने का प्रयास करते हैं, ब्रिक्स उनके इस मनमानेपन पर अंकुश लगाने का कार्य करता है।

■ न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) / ब्रिक्स बैंक

  • ब्रिक्स के सदस्य देशों ने अपने लिए एक केन्द्रीय बैंक (New Development Bank) स्थापित करने का निर्णय लिया।
  • जिसमें प्रारम्भिक पूँजी 100 बिलियन डॉलर रखी गई।
  • जिसमें अंशदान के रूप में प्रारम्भ में चीन ने 41, भारत, रूस, ब्राजील ने 18-18 और दक्षिण अफ्रीका ने 5 बिलियन डॉलर दिया।
  • इस विकास बैंक का मुख्यालय चीन के शंघाई में स्थित है।
  • प्रारम्भ में भारत के K.V. कामथ को इसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया था (वर्तमान में ब्राजील की पूर्व राष्ट्रपति 'डिल्मा रूसेफ' इसकी अध्यक्ष हैं)।

ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित किए जाते हैं। 2017 में इसका नौवाँ शिखर सम्मेलन चीन के शियामेन शहर में हुआ था। नवीनतम शिखर सम्मेलन: हाल ही में इसका 15वाँ शिखर सम्मेलन (2023) जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में हुआ जहाँ नए सदस्यों को जोड़ने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। वर्ष 2024 में 16वाँ शिखर सम्मेलन रूस के कज़ान (Kazan) शहर में सम्पन्न हुआ। ब्रिक्स का मुख्य लक्ष्य है— "एक उज्ज्वल भविष्य के लिए मजबूत और जिम्मेदार भागीदारी।"

✦ 19. सम्पूर्ण निष्कर्ष एवं भारत की भूमिका (Comprehensive Conclusion)

इस संपूर्ण अध्ययन का विस्तृत निचोड़ यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर आज के वैश्वीकरण के युग तक, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और अर्थशास्त्र में अभूतपूर्व बदलाव आए हैं। विश्व शांति और सामूहिक सुरक्षा के लिए स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) आज भी एक अनिवार्य संस्था है। हालांकि, भारत जैसे उभरते हुए शक्तिशाली राष्ट्रों का स्पष्ट मानना है कि समकालीन विश्व की वास्तविकताओं को देखते हुए इसमें लोकतांत्रिक सुधार (विशेषकर सुरक्षा परिषद् और 'वीटो पावर' का विस्तार) नितांत आवश्यक है, जहाँ भारत स्थायी सदस्यता का एक प्रबल और वैध दावेदार है।

आर्थिक मोर्चे पर, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने सम्पूर्ण विश्व को एक 'वैश्विक ग्राम' (Global Village) में तो तब्दील कर दिया है, परन्तु इसका सर्वाधिक लाभ विकसित पूँजीवादी देशों ने ही उठाया है। विकासशील देशों के समक्ष आज भी मुक्त प्रतिस्पर्धा, खाद्य सुरक्षा और बौद्धिक सम्पदा जैसी बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिन्हें हल करने के लिए भारत लगातार विकासशील देशों की आवाज़ विश्व पटल पर उठा रहा है।

विकसित देशों के इसी आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए ही वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व में क्षेत्रीय संगठनों (SAARC, ASEAN, BIMSTEC, IORA, BRICS, EU आदि) का उभार हुआ। जहाँ एक ओर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और नकारात्मक रवैये के कारण सार्क (SAARC) लगभग निष्क्रिय और कमज़ोर हो चुका है, वहीं भारत ने कूटनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए 'बिम्सटेक' (BIMSTEC) और 'हिम तक्षेस' (IORA) की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है ताकि क्षेत्रीय विकास बाधित न हो।

अंततः, भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी' (Act East Policy) ने जहाँ आसियान (ASEAN) देशों के साथ व्यापारिक व सामरिक रिश्तों को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाकर चीन के प्रभुत्व को चुनौती दी है, वहीं ब्रिक्स (BRICS) जैसे शक्तिशाली मंचों के माध्यम से भारत पश्चिमी देशों के मनमानेपन पर अंकुश लगाने और विश्व में एक सुरक्षित, संतुलित व न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति (Global Power) की भूमिका निभा रहा है।

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★ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (Security Council) में किन देशों को 'वीटो पावर' प्राप्त है?
सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों (P5 Club)— अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम (UK), फ्रांस और चीन— को वीटो पावर प्राप्त है। सुरक्षा परिषद् का निर्णय 2/3 बहुमत से होता है लेकिन इसमें इन 5 स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है।
Q2. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना किस समझौते के तहत हुई?
WTO की स्थापना 1994 में हुए 'मराकेश समझौते (मोरक्को)' के तहत 1 जनवरी 1995 को हुई, जिसने पुराने GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) और डंकेल प्रस्ताव का स्थान लिया।
Q3. भारत का 'बिम्सटेक' (BIMSTEC) की ओर झुकाव क्यों बढ़ा?
सार्क (SAARC) में पाकिस्तान के नकारात्मक रवैये और आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण सार्क की सफलता बाधित हुई। इसके विकल्प के रूप में और अपनी 'एक्ट ईस्ट पालिसी' को मजबूत करने के लिए भारत ने बिम्सटेक की ओर अपना झुकाव बढ़ाया।
Q4. ब्रिक्स (BRICS) में 'S' किस देश को दर्शाता है और यह कब शामिल हुआ?
ब्रिक्स में 'S' दक्षिण अफ्रीका (South Africa) को दर्शाता है। 2009 में केवल 4 देश (BRIC) थे, लेकिन 2010 में दक्षिण अफ्रीका के इस संगठन में शामिल होने के बाद इसका नाम 'BRICS' हो गया।
Q5. 'ब्रेक्जिट' (Brexit) क्या है और यह किस संगठन से जुड़ा है?
ब्रेक्जिट का अर्थ ब्रिटेन (UK) के 'यूरोपीय यूनियन' (EU) से अलग होने की घटना है। 2016 के जनमत संग्रह के बाद लिस्बन सन्धि के नियमों के अनुसार ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हो गया।
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