| UNO, WTO, वैश्वीकरण एवं प्रमुख क्षेत्रीय संगठन - सम्पूर्ण नोट्स |
|---|
| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में अंतरराष्ट्रीय राजनीति व अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तम्भों का विस्तृत और प्रामाणिक विश्लेषण किया गया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के अंग व कार्यप्रणाली, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के उद्देश्य, और उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण (LPG) के प्रभावों को गहराई से समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक राजनीति में प्रमुख क्षेत्रीय संगठनों (SAARC, ASEAN, OPEC, EU, BIMSTEC, IORA, BRICS) की भूमिका और भारत के साथ उनके कूटनीतिक सम्बन्धों को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। |
- 1. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्थापना
- 2. UNO की संरचना: सदस्य, भाषाएँ, बजट एवं 5 सिद्धान्त
- 3. संयुक्त राष्ट्र महासभा (विश्व संसद) एवं कार्यप्रणाली
- 4. सुरक्षा परिषद् (Security Council) एवं वीटो पावर (Veto)
- 5. UNO के अन्य अंग: ECOSOC, ICJ, न्यास परिषद् व सचिवालय
- 6. GATT से विश्व व्यापार संगठन (WTO) तक का सफर
- 7. WTO के कार्य, कार्यप्रणाली एवं 6 प्रमुख उद्देश्य
- 8. उदारीकरण (Liberalization): अर्थ एवं लाइसेंस मुक्त व्यवस्था
- 9. निजीकरण (Privatization) एवं वैश्वीकरण (Globalization)
- 10. वैश्वीकरण का प्रभाव: विकसित एवं विकासशील देशों पर
- 11. क्षेत्रीय संगठन: अर्थ, विशेषताएँ एवं 6 प्रमुख उद्देश्य
- 12. सार्क (SAARC / दक्षेस): स्थापना, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली
- 13. आसियान (ASEAN): स्थापना, उद्देश्य एवं भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी'
- 14. ओपेक (OPEC): पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन
- 15. यूरोपीय यूनियन (EU): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशेषताएँ व यूरो मुद्रा
- 16. बिम्सटेक (BIMSTEC): स्थापना, कार्यक्षेत्र एवं रोहिंग्या समस्या
- 17. हिन्द महासागर तटवर्ती क्षेत्रीय संगठन (IORA): सिद्धान्त व उद्देश्य
- 18. ब्रिक्स (BRICS): स्थापना, उद्देश्य एवं न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)
- 19. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
✦ 1. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्थापना
प्रत्येक युद्ध के बाद व्यवस्था में परिवर्तन होता है और विश्व युद्ध के बाद विश्व व्यवस्था में परिवर्तन होता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के प्रयासों से 1919 में राष्ट्र संघ (League of Nations) की स्थापना हुई। यद्यपि अमेरिकी सीनेट का अनुमोदन न मिलने से अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बन सका। राष्ट्र संघ एक आदर्शवादी या कानूनी संस्था था जिसका उद्देश्य राष्ट्रों के बीच विवादों को कानूनी तरीके से हल करना था। लेकिन 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने से राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लग गया।
■ UNO की स्थापना की ओर कदम
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक नयी अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना पर विचार होने लगा:
- एटलान्टिक चार्टर (14 Aug 1941): रूजवेल्ट और चर्चिल के बीच।
- याल्टा सम्मेलन (4 Feb 1945): रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन के बीच।
- सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन (25 Apr - 26 Jun 1945): अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में 50 राष्ट्रों का एक सम्मेलन हुआ और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का निर्णय लिया गया। इन 50 राष्ट्रों ने घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किया।
- 51वें सदस्य के रूप में 'पोलैण्ड' ने इस पर हस्ताक्षर किया। इन 51 देशों को प्रारम्भिक सदस्य राष्ट्र माना गया। भारत भी इनमें एक था (भारत की ओर से रामास्वामी मुदालियर, कृष्णामाचारी, फिरोज खाँ नून ने भाग लिया)।
24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया। 10 Feb 1946 को लंदन के वेस्टमिंस्टर हाल में इसकी आम सभा की पहली बैठक हुई। 25 Apr 1946 को एक प्रस्ताव पारित करके राष्ट्र संघ के अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर UNO अस्तित्व में आ गया।
✦ 2. UNO की संरचना: सदस्य, भाषाएँ, बजट एवं 5 सिद्धान्त
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संस्था है, जो विश्व शान्ति और सामूहिक सुरक्षा के लिए कार्य करती है। यहाँ 'राजनीतिक संस्था' का अर्थ है— किसी प्रस्ताव पर पहले महासभा में बहस होती है, उसके बाद जब वह 2/3 बहुमत से पारित हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना एक संविधान है जिसे उसका चार्टर (Charter) कहते हैं। इसमें 19 अध्याय और 111 अनुच्छेद हैं।
| पूरा नाम | United Nations Organisation (UNO) |
| मुख्यालय | न्यूयार्क (अमेरिका) |
| कुल सदस्य (वर्तमान) | 193 राष्ट्र (सबसे अंतिम देश: दक्षिणी सूडान) |
| मान्यता प्राप्त 6 भाषाएँ | अंग्रेजी व फ्रेंच (मुख्य), चीनी, स्पेनिश, अरबी और रसियन |
| महासचिव | प्रथम: त्रिग्वेली। वर्तमान: एन्टोनियो गुटेरेस (1 Jan 2017 से) |
| बजट अनुदान | सर्वाधिक: जापान (26%), भारत का हिस्सा 1% से कम (0.36%) |
संयुक्त राष्ट्र संघ का एक प्रतीक है जिसकी पृष्ठभूमि हल्की नीली है। उसके ऊपर श्वेत रंग का एक चित्र बना हुआ है जिसके ऊपर दो जैतून की टहनियाँ बनी हुई हैं और उस पर विश्व मानचित्र अंकित है, अर्थात् विश्व में शांति इसका प्रतीक है। सदस्य राष्ट्रों द्वारा उपलब्ध करायी गयी सेना शान्ति सेना (Peacekeeping Force) कहलाती है।
■ UNO के 5 प्रमुख सिद्धान्त
- सदस्य राष्ट्र स्वतन्त्र एवं सम्प्रभु होंगे।
- सदस्य राष्ट्रों के बीच परस्पर स्वतन्त्रता व समानता होगी (किसी का महत्व कम या अधिक नहीं)।
- सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का पालन करेंगे।
- प्रत्येक राष्ट्र की यह जिम्मेदारी होगी कि वह शान्ति सुरक्षा बनाये रखने में मदद करे।
- ऐसे राष्ट्र जो इसके सदस्य नहीं भी हैं वे भी इसका पालन करेंगे।
सामूहिक सुरक्षा का शाब्दिक अर्थ है: एक सबके लिए और सब एक के लिए। यदि किसी राष्ट्र पर आक्रमण होता है तो उसे सामूहिक आक्रमण मानते हुए सभी राष्ट्र मिलकर आक्रमणकारी के विरुद्ध कार्य करेंगे।
✦ 3. संयुक्त राष्ट्र महासभा (विश्व संसद) एवं कार्यप्रणाली
संयुक्त राष्ट्र संघ के कुल 6 अंग हैं।
[1] महासभा (General Assembly): इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था या विश्व संसद कहा जाता है। विश्व के जो भी देश सदस्य बनते हैं वे अपना सदस्य महासभा में ही भेजते हैं। प्रत्येक देश से 5 सदस्य और 5 वैकल्पिक सदस्य जाते हैं, लेकिन प्रत्येक देश का वोट एक ही होता है। सारे निर्णय किसी मुद्दे पर बहस के बाद 2/3 बहुमत से लिए जाते हैं।
- अधिवेशन: प्रत्येक वर्ष 1 अधिवेशन होता है जो कि सितम्बर के तीसरे मंगलवार से लेकर दिसम्बर के मध्य तक चलता है।
- अध्यक्ष: प्रत्येक अधिवेशन के लिए 1 अध्यक्ष एवं 21 उपाध्यक्ष चुने जाते हैं। महासभा के प्रथम अध्यक्ष पॉल हेनरी स्पॉक (बेल्जियम) थे।
- विजय लक्ष्मी पण्डित: 1952 में 8वें अधिवेशन में भारत की विजय लक्ष्मी पण्डित अध्यक्षा चुनी गईं, जो अब तक की एक मात्र (प्रथम) महिला अध्यक्षा हैं।
महासभा ही महासचिव का चुनाव करती है। सामाजिक-आर्थिक परिषद्, न्यास परिषद् और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के सदस्यों का चुनाव करती है। किसी भी देश को सदस्यता प्रदान करना, निलम्बित करना, चार्टर में संशोधन करना, बजट पास करना आदि महासभा ही करती है। महासभा में विभिन्न समितियां (राजनीति व सुरक्षा समिति, आर्थिक समिति आदि) होती हैं जो कार्यों में सहायता करती हैं।
✦ 4. सुरक्षा परिषद् (Security Council) एवं वीटो पावर (Veto)
[2] सुरक्षा परिषद्: इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की कुंजी (Key) माना जाता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ में कोई भी कार्य सुरक्षा परिषद् के अनुमोदन के बिना सम्भव नहीं है। कुछ लोग इसे अंतरराष्ट्रीय पुलिसमैन (Policeman) के रूप में देखते हैं।
- कुल सदस्य: 15 सदस्य होते हैं (5 स्थायी और 10 अस्थायी)।
- स्थायी सदस्य (P5 Club): इनका कार्यकाल अनिश्चित है। ये पाँचों परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र हैं— चीन, फ्रांस, UK, USA, रूस।
- अस्थायी सदस्य: इनका कार्यकाल 2 वर्ष है और ये विभिन्न महाद्वीपों से आते हैं।
- सुरक्षा परिषद् का भी एक अध्यक्ष चुना जाता है जिसका कार्यकाल 1 माह होता है। बैठक प्रत्येक 15 दिन में होती है।
वीटो पावर (Veto Power): सुरक्षा परिषद् में सारा निर्णय 2/3 बहुमत से होता है। अर्थात् 15 में से 9 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है, जिसमें 5 स्थायी सदस्यों का शामिल होना आवश्यक है। यदि किसी मुद्दे पर एक भी स्थायी सदस्य अपनी असहमति व्यक्त करता है तो उसे 'वीटो' मान लिया जाता है। पहली बार सोवियत संघ ने फरवरी 1946 में लेबनान व सीरिया से सेना हटाने के मुद्दे पर अमेरिकी प्रस्ताव पर वीटो किया था।
सुरक्षा परिषद का भी एक अध्यक्ष चुना जाता है जिसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है। सुरक्षा परिषद की बैठक प्रत्येक 15 दिन में होती है। सुरक्षा परिषद् ने सन् 1952 में 'विशस्त्रीकरण आयोग' का गठन किया था जिसका उद्देश्य ऐसे प्रस्ताव प्रस्तुत करना था जिससे शस्त्रों में कटौती की जा सके।
सुरक्षा परिषद के अस्तित्व को कम करके नहीं देखा जा सकता है। इसी के प्रयासों से इंडोनेशिया, कांगो, साइप्रस, स्वेज नहर संकट, खाड़ी संकट जैसे कई मामलों को सुलझाया गया है।
✦ 5. UNO के अन्य अंग: ECOSOC, ICJ, न्यास परिषद् व सचिवालय
[3] सामाजिक आर्थिक परिषद् (ECOSOC)
यह परिषद् विश्व में गरीबी, भुखमरी, दरिद्रता आदि समस्याओं का उन्मूलन करने के लिए बनी है। यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों का अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपती है और संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों के अनुसार अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुला सकती है। इसमें कुल 54 सदस्य होते हैं जो महासभा से चुनकर आयेंगे। इसके 1/3 सदस्य हर 2 वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
[4] न्यास परिषद् (Trusteeship Council)
न्यास परिषद् अब 1994 से कार्य करना बंद कर दिया है। यह ऐसे देशों में रहने वाले नागरिकों के मानवाधिकारों की जाँच करती थी जो किसी बड़े राष्ट्र के अधीन हैं। यदि अधीन बनाए गए राष्ट्रों में रहने वाले नागरिकों के मानवाधिकार का उल्लंघन होता है या उन्हें प्रताड़ित किया जाता है तो यह परिषद उसकी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ को देती थी। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क, अमेरिका में था। बैठक वर्ष में दो बार होता था।
[5] अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
- मुख्यालय: हेग (नीदरलैण्ड)। इसकी स्थापना 3 अप्रैल 1946 को हुई। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का आधार अंतरराष्ट्रीय कानून है। यह राष्ट्रों के बीच आपसी विवादों का निपटारा करता है
- इसके कुल न्यायाधीशों की संख्या 15 होती है। 15 में से 9 न्यायाधीशों की उपस्थिति (कोरम) आवश्यक है। इन न्यायाधीशों का चुनाव महासभा करती है यह सारा निर्णय दो तिहाई बहुमत से होता है। न्यायाधीश पुनः निर्वाचन के लिए भी पात्र होते हैं इनका चुनाव योग्यता के आधार पर होता है और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय महासभा द्वारा सौंप गए विवादों का निपटारा करता है और महासभा तथा सुरक्षा परिषद द्वारा मांगे गए परामर्श को भी देता है।
- न्यायालय का अध्यक्ष 3 वर्ष के लिए होता है। न्यायाधीशों का कार्यकाल 9 वर्ष होता है।
- भारत के प्रथम अंतरराष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश नागेन्द्र सिंह (डूंगरपुर) थे।
[6] सचिवालय (Secretariat)
यह UNO का प्रशासनिक अंग है, जिसका मुख्यालय न्यूयार्क में स्थित है। इसका मुखिया महासचिव होता है, जिसका चुनाव सुरक्षा परिषद के अनुमोदन से महासभा दो तिहाई बहुमत से करती है महासचिव पुनः निर्वाचित होने का पात्र है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष है। सचिवालय में महासचिव के अतिरिक्त सैकड़ो सचिव और हजारों कर्मचारी कार्य करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों और अभिकरणों के कार्यों को इसी सचिवालय में ही निपटाया जाता है। यदि संयुक्त राष्ट्र संघ कोई प्रस्ताव पारित करता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह तभी लागू होता है जब महासचिव उस पर हस्ताक्षर करता है।
भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी: संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के विस्तार को लेकर भारत लम्बे समय से अपनी माँग उठाता रहा है कि बदलते विश्व परिवेश में अब केवल पाँच सदस्य ही विश्व की नीतियों को तय नहीं कर सकते।
✦ 6. GATT से विश्व व्यापार संगठन (WTO) तक का सफर
1929 से लेकर 1932 तक विश्व में भयंकर आर्थिक मन्दी देखने को मिली। जिसकी वजह से विश्व अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई। उसे समय यह प्रावधान था कि जब कोई देश अपने उत्पादित वस्तु को दूसरे देश के बाजार में लेकर जाता था तो उस पर मनमानी शुल्क लगाया जाता था और उस देश की शर्तों पर ही व्यापार संभव था। इससे उबरने और व्यापार को सुलभ बनाने के लिए 1948 में 23 देशों ने जेनेवा में GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) की स्थापना की। भारत इसका संस्थापक सदस्य था।
GATT कोई संगठन नहीं था बल्कि यह एक अस्थायी समझौता था। इसका मुख्य उद्देश्य था कि दूसरे देश में कोई व्यापार किया जाय तो कम से कम प्रशुल्क (Tariff) लगाया जाय।
■ उरुग्वे वार्ता एवं डंकेल प्रस्ताव (Dunkel Draft)
आगे चलकर विकसित देशों की यह चिंता सताने लगी कि व्यापार के साथ-साथ सेवाओं और बौद्धिक सम्पदा के सम्बन्ध में भी कोई नियम तय किया जाय।
- 1986 में उरुग्वे सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके महानिदेशक आर्थर डंकेल थे (इसे 'डंकेल प्रस्ताव' भी कहा जाता है)।
- विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, 1994 में मराकेश सम्मेलन (मोरक्को) में WTO की स्थापना का अन्तिम निर्णय हुआ।
- 1 Jan 1995 को एक स्थायी संस्था के रूप में विश्व व्यापार संगठन (WTO) अस्तित्व में आया।
✦ 7. WTO के कार्य, कार्यप्रणाली एवं 6 प्रमुख उद्देश्य
विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय जेनेवा में है। इसके वर्तमान महानिदेशक राबर्ट अजेवेडो (2013-2017) थे (नोट: वर्तमान में नगोजी ओकोंजो-इवेला हैं)। वर्तमान में इसके 164 सदस्य देश हैं (164वाँ सदस्य अफगानिस्तान है) और 22 पर्यवेक्षक हैं।
■ WTO के कार्य व कार्यप्रणाली
- कार्य: व्यापारिक वार्तालाप द्वारा व्यापार सुलभ बनाना, व्यापारिक विवादों का निपटारा करना, कार्यान्वयन एवं निगरानी (Look after) करना। व्यापार को सही ढंग से संचालित करने के लिए IMF व विश्व बैंक से सहायता दिलवाना।
- कार्य-प्रणाली: मन्त्रिस्तरीय सम्मेलन 2 वर्ष में एक बार होता है। प्रत्येक सदस्य देश का एक वोट होता है।
- 11वाँ मन्त्रिस्तरीय सम्मेलन अर्जेन्टीना (ब्यूनस आयर्स) Oct 2017 में हुआ था।
जब कोई देश WTO का सदस्य हो जाता है तो उसे अपनी बाज़ार विश्व के लिए खोलना पड़ता है। उसकी Domestic Market भी International Market में बदल जाती है।
■ WTO के 6 प्रमुख उद्देश्य
- सभी राष्ट्रों के जीवन स्तर में सुधार लाना।
- पूर्ण रोजगार सुलभ हो।
- वस्तुओं और सेवाओं में वृद्धि।
- सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को स्वीकार करना।
- विश्व संसाधन का अनुकूलतम उपयोग।
- पर्यावरण का संरक्षण या संवर्धन करना।
✦ 8. उदारीकरण (Liberalization): अर्थ एवं लाइसेंस मुक्त व्यवस्था
उदारीकरण एक सिद्धान्त है, जबकि निजीकरण एक प्रक्रिया है और वैश्वीकरण उसका एक व्यावहारिक रूप। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही उदारीकरण का जन्म हुआ।
उदारवाद का विकासक्रम: नकारात्मक उदारवाद (एडम स्मिथ - 'Wealth of Nations') ➡ सकारात्मक उदारवाद (लोक कल्याणकारी राज्य) ➡ नव उदारवाद (उदारीकरण/वैश्वीकरण)।
■ उदारीकरण का स्वरूप
उदारीकरण नकारात्मक उदारवाद को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। यह 'लोक कल्याणकारी राज्य' के विरुद्ध है। इसका मानना है कि राज्य का हस्तक्षेप समाप्त कर देना चाहिए और व्यक्ति को खुला छोड़ देना चाहिए। उदारीकरण सरकारीकरण का विरोधी है और इसका उद्देश्य मण्डी को मुक्त प्रतिस्पर्धा की ओर ले जाना है।
लाइसेंस मुक्त व्यवस्था: उदारीकरण लाइसेंस मुक्त व्यवस्था का ही दूसरा नाम है। इसके अन्तर्गत आयात की खुली छूट दी जाती है, सीमा शुल्क में कटौती की जाती है और विदेशी पूँजी (FDI) के मुक्त प्रवाह की इजाजत दी जाती है (विशेषकर बैंकिंग, बीमा, जहाजरानी में)। रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया जाता है। आर्थिक क्षेत्र में इसे 'कोटा पद्धति' या 'इंस्पेक्टर राज' का अंत कहा जाता है।
✦ 9. निजीकरण (Privatization) एवं वैश्वीकरण (Globalization)
■ निजीकरण (Privatization)
निजीकरण का अर्थ ऐसी नीति से है जिसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से को सरकारी क्षेत्र व नियन्त्रण से हटाकर निजी या गैर-सरकारी क्षेत्र के स्वामित्व व नियन्त्रण में रख दिया जाता है। इसका उद्देश्य कार्य कुशलता बढ़ाना और अधिकतम लाभ प्राप्त करना है। अर्थात् "सरकारी क्षेत्र का विनिवेशीकरण ही निजीकरण है।"
■ वैश्वीकरण (Globalization)
वैश्वीकरण की लोकप्रियता 1980 के दशक में मार्गरेट थैचर (ब्रिटेन) के प्रयासों से बढ़ी। भारत में 1991 में तत्कालीन वित्तमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे आगे बढ़ाया।
वैश्वीकरण उदारीकरण का व्यावहारिक रूप है। इसके अंतर्गत सम्पूर्ण विश्व को एक बाजार में बदल दिया जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण हो जाता है, सब्सिडी में धीरे-धीरे कटौती की जाती है और उद्योग संरक्षण की नीति का परित्याग किया जाता है।
वैश्विक ग्राम (Global Village): वैश्वीकरण में हर देश की अर्थव्यवस्था विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ जाती है। विश्व में आर्थिक मन्दी या उछाल का असर हर देश पर दिखाई पड़ता है। अर्थात् पूरा विश्व एक गाँव में बदल जाता है, इसे ही 'वैश्विक ग्राम' की अवधारणा कहा जाता है।
✦ 10. वैश्वीकरण का प्रभाव: विकसित एवं विकासशील देशों पर
| विकसित देश (Developed Countries) | विकासशील देश (Developing Countries) |
|---|---|
|
|
नोबेल पुरस्कार विजेता डा. अमर्त्य सेन का मानना है:
"विकासशील देशों को उदारीकरण/वैश्वीकरण से तब तक फायदा नहीं हो सकता जब तक वे अपनी आधारभूत संस्थाओं जैसे— सड़क, बिजली, संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार नहीं कर लेते।"
✦ 11. क्षेत्रीय संगठन: अर्थ, विशेषताएँ एवं 6 प्रमुख उद्देश्य
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ क्षेत्रीय संगठनों (Regional Organizations) का जन्म होने लगा। क्षेत्रीय संगठन केवल एक विशेष क्षेत्र (Region) स्तर पर कार्य करता है। उस क्षेत्र का कोई भी राष्ट्र उसका सदस्य बन सकता है, परन्तु बाहरी राष्ट्र केवल पर्यवेक्षक बन सकते हैं, सदस्य नहीं।
■ क्षेत्रीय संगठन बनाने के 6 प्रमुख उद्देश्य
- क्षेत्र के राष्ट्रों के बीच सहयोग विकसित करना (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक, तकनीकि आदि)।
- क्षेत्र को मजबूत बनाना ताकि बाहरी शक्तियाँ उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित न कर सकें।
- क्षेत्र में रहने वाले गरीब राष्ट्रों को भी मजबूत करना।
- बाहरी देशों पर निर्भरता कम हो सके और आंतरिक स्थिति मजबूत हो।
- क्षेत्र के मजबूत होने पर क्षेत्र की बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ध्यान से सुनी जायेगी।
- क्षेत्र के मजबूत होने पर बाहरी देश हमारे साथ सम्बन्ध बनाने के लिए उत्सुक रहेंगे।
मुख्य क्षेत्रीय संगठनों में— SAARC, ASEAN, OPEC, EU, BIMSTEC, IORA, BRICS आदि शामिल हैं।
✦ 12. सार्क (SAARC / दक्षेस): स्थापना, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली
दक्षेस (SAARC - South Asian Association for Regional Cooperation) दक्षिण एशियाई देशों का संगठन है। इसमें वर्तमान में कुल 8 सदस्य हैं: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव, और अफगानिस्तान। अफगानिस्तान 2007 (14वें दिल्ली शिखर सम्मेलन) में शामिल हुआ। इसका मुख्यालय काठमाण्डू (नेपाल) में है।
सार्क विश्व की 22% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन GDP लगभग 2% है और व्यापार 1% से भी कम। दक्षिण एशिया में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, जनसंख्या विस्फोट एक बड़ी समस्या है।
- स्थापना: बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान (जियाउर्रहमान की पहल) के प्रयासों से। 1981 में कोलम्बो बैठक, 1983 में दिल्ली बैठक और पहला शिखर सम्मेलन 7-8 Dec 1985 को ढाका में हुआ। इसलिए 8 Dec को सार्क दिवस मनाया जाता है।
- चार्टर: कुल 10 अनुच्छेद हैं।
- प्रमुख उद्देश्य: क्षेत्र के लोगों के जीवन स्तर में सुधार, सामूहिक आत्मनिर्भरता, आपसी विश्वास, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझा सहयोग।
■ सम्मेलन एवं वर्तमान चुनौतियाँ
शिखर सम्मेलन प्रतिवर्ष होता है (मन्त्रिपरिषद् 6 महीने में)। ध्यान रहे कि यह एक क्षेत्रीय मंच है, यहाँ कोई द्विपक्षीय मुद्दा (Bilateral Issue) या बहुपक्षीय मुद्दा नहीं उठाया जायेगा।
वर्तमान स्थिति: सार्क एक सफल मंच बन सकता था, लेकिन पाकिस्तान के आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले रवैये और भारत-पाक विवादों के कारण कई बार शिखर सम्मेलन तक स्थगित करना पड़ता है। अतः क्षेत्रीय संगठनों में यह सबसे कमजोर संगठन माना जाने लगा है।
✦ 13. आसियान (ASEAN): स्थापना, उद्देश्य एवं भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी'
दक्षिण पूर्व एशियाई संगठन आसियान (ASEAN) कहलाता है। ये देश भारत के पूर्व और चीन के दक्षिण में स्थित हैं (इन्हें हिन्द-चीन का देश भी कहा जाता है)। यहाँ बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण भारत के सांस्कृतिक रिश्ते गहरे हैं।
- स्थापना: 8 Aug 1967 को बैंकॉक (थाईलैंड) में 5 देशों (इण्डोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैण्ड) द्वारा। इसे 'आसियान घोषणा पत्र' कहा गया।
- वर्तमान सदस्य: 10 देश (ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार, कम्बोडिया बाद में शामिल हुए)।
- उद्देश्य: 1976 इण्डोनेशिया सम्मेलन में इसे साझा बाजार (Common Market) के रूप में विकसित करने और बाहरी आयात कम कर क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने का निर्णय लिया गया। 2007 से इनका सम्मेलन वर्ष में दो बार होता है।
आसियान देशों का क्षेत्रफल 44 लाख वर्ग किमी है, और यह 2.8 लाख करोड़ डॉलर GDP के साथ विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। आसियान ने ARF (आसियान रीजनल फोरम) का भी गठन किया है जिसमें 8 पर्यवेक्षक (आस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, रूस, अमेरिका आदि) हैं। 2005 में पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन शुरू हुआ।
■ भारत और आसियान
1991 में भारत ने 'लुक ईस्ट पालिसी' (Look East Policy) अपनायी। 2014 में 12वें शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 'एक्ट ईस्ट पालिसी' (Act East Policy) का नाम दिया। भारत 1996 में आसियान का संवादी सदस्य बना। AIFTA (व्यापार मुक्त क्षेत्र) के गठन से व्यापार बढ़ा (2016-17 में 71 अरब डॉलर व्यापार)। 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस पर 10 आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निमंत्रण मिला था। दक्षिणी चीन सागर में चीन को रोकने के लिए आसियान भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है。
✦ 14. ओपेक (OPEC): पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन
ओपेक (OPEC - Organization of the Petroleum Exporting Countries) मुख्य रूप से मध्य-पूर्व (Middle East) के पेट्रोलियम उत्पादक/निर्यातक देशों का संगठन है। तेल ही इनकी अर्थव्यवस्था का आधार है।
- स्थापना: 1960 में बगदाद में 5 देशों— ईरान, इराक, कुवैत, सउदी अरब, वेनेजुएला द्वारा। 1961 से कार्य प्रारम्भ। बाद में अल्जीरिया, अंगोला, UAE आदि जुड़े।
- मुख्यालय: वियना (Vienna)।
- उद्देश्य: खनिज तेल के उत्पादन व उसकी कीमतों को नियन्त्रित करना, स्थिरता लाना तथा पेट्रोलियम निर्यातक राष्ट्रों के हितों की सुरक्षा करना।
यदि संगठन का कोई सदस्य देश तेल का निर्यात बन्द कर दे अथवा आयात करने लगे, तो उसकी सदस्यता स्वैच्छिक रूप से समाप्त हो जाती है। हाल ही में इण्डोनेशिया के साथ ऐसा ही हुआ, जिससे ओपेक में 13 की जगह 12 ही बचे हैं।
✦ 15. यूरोपीय यूनियन (EU): ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशेषताएँ व यूरो मुद्रा
यूरोपीय यूनियन (EU) क्षेत्रीय संगठनों में सबसे पुराना और सबसे अधिक देशों वाला संगठन है।
■ ऐतिहासिक सफर एवं ब्रेक्जिट
- 1951 में 'यूरोपीय कोयला एवं स्टील समुदाय' और 1957 में रोम सन्धि (ECM)।
- 1991 में मास्ट्रिच सन्धि (नीदरलैण्ड) जो 1993 में अस्तित्व में आयी और नाम यूरोपीय यूनियन (EU) हो गया। मुख्यालय: ब्रुसेल्स (लक्जमबर्ग)।
- ब्रेक्जिट (Brexit): 20 Feb 2016 को ब्रिटेन के प्र.म. डेविड कैमरून ने जनमत संग्रह कराया। 23 जून 2017 के परिणाम के बाद लिस्बन सन्धि के तहत 2 वर्ष की प्रक्रिया में अलग होने का निर्णय लिया। इसके बाद 27 देश बचेंगे।
■ EU की अनूठी विशेषताएँ एवं यूरो मुद्रा
यह ऐसा संगठन है जहाँ एक साझा बाजार, साझी व्यापारिक/कृषि नीति, साझी सुरक्षा और साझी विदेश नीति है। सदस्य देशों में बिना वीजा आवाजाही की छूट है। इनका एक साझा बैंक, साझी संसद (5 वर्ष के लिए) और अपना न्यायालय (Court of Justice) है। इन्होंने एक साझा संविधान का भी निर्माण किया था जो फ्रांस और नीदरलैण्ड की असहमति से लागू नहीं हो सका। इसके सदस्य देश 6-6 महीने के लिए इसकी अध्यक्षता करते हैं।
यूरो मुद्रा: 1 Jan 1999 को यूरो मुद्रा अपनायी गयी (वर्तमान 19 देश)। इसका उद्देश्य अमेरिकी डॉलर को टक्कर देना था।
भारत से सम्बन्ध: भारत का क्षेत्रीय संगठनों में यूरोपीय यूनियन सबसे बड़ा भागीदार है। भारत का 1/4 व्यापार EU के साथ होता है (2016-17 में 88 बिलियन डॉलर व्यापार, 6 Oct 2017 को नई दिल्ली शिखर बैठक)।
✦ 16. बिम्सटेक (BIMSTEC): स्थापना, कार्यक्षेत्र एवं रोहिंग्या समस्या
BIMSTEC (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनामिक को-आपरेशन) बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती देशों का संगठन है।
- स्थापना: 1997 में 4 देशों (बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, थाईलैंड) द्वारा। बाद में म्यांमार, और 2004 में नेपाल और भूटान के शामिल होने से 7 सदस्य हो गए।
- कार्यालय: ढाका में है।
- कार्यक्षेत्र: प्रारम्भ में 6 क्षेत्र (व्यापार, ऊर्जा, पर्यटन, परिवहन आदि) थे, बाद में कृषि, गरीबी उन्मूलन, आतंकवाद, पर्यावरण आदि को भी शामिल किया गया।
सार्क की असफलता (पाकिस्तान के नकारात्मक रवैये) के कारण भारत का झुकाव बिम्सटेक की ओर बढ़ा। इससे भारत की 'एक्ट ईस्ट पालिसी' पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और पूर्वोत्तर राज्यों को फायदा मिलेगा। हाल में म्यांमार से पलायन किये रोहिंग्या मुसलमान इस क्षेत्र की एक समस्या बने हुए हैं। (अक्टूबर 2016 गोवा में ब्रिक्स-बिम्सटेक संयुक्त बैठक हुई थी)।
✦ 17. हिन्द महासागर तटवर्ती क्षेत्रीय संगठन (IORA): सिद्धान्त व उद्देश्य
इसे हिम तक्षेस (IORA - Indian Ocean Rim Association) कहते हैं। यह एशिया, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया महाद्वीप को जोड़ने वाला अन्तर्महाद्वीपीय संगठन है।
1995 में नेल्सन मंडेला की भारत यात्रा के बाद इसकी आकांक्षा जगी और 1997 में स्थापना हुई। वर्तमान में इसमें 21 देश हैं (भारत, आस्ट्रेलिया, ईरान, केन्या, दक्षिण अफ्रीका आदि)। इसका मुख्यालय मॉरीशस में है। इसके 6 वार्ताकार राष्ट्र भी हैं (मिस्र, जापान, चीन, इंग्लैण्ड, फ्रांस, अमेरिका)।
■ हिम तक्षेस (IORA) के प्रमुख सिद्धान्त
इसका निर्देशक सिद्धान्त 'खुला क्षेत्रवाद' (Open Regionalism) है। सभी निर्णय आपसी सहमति से होते हैं, द्विपक्षीय विवादों को संगठन से बाहर रखा जाता है। मुख्य उद्देश्य हिन्द महासागर क्षेत्र में टिकाऊ व संतुलित विकास और उदारीकरण को प्रोत्साहित करना है ताकि व्यापार को बढ़ावा मिल सके।
✦ 18. ब्रिक्स (BRICS): स्थापना, उद्देश्य एवं न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)
ब्रिक्स शब्द का पहली बार प्रयोग 2001 में जिम ओ नील (गोल्डमैन सैक्स) ने किया था। यह विकासशील देशों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का शक्तिशाली संगठन है।
- स्थापना: 2009 में 'BRIC' के रूप में (ब्राजील, रूस, भारत, चीन)।
- 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने से इसका नाम 'BRICS' हो गया।
- उद्देश्य: विकसित देशों के शोषण और वर्तमान विश्व आर्थिक संस्थाओं के मनमानेपन से विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बचाना। ब्रिक्स इसके मनमाने पर अंकुश लगाएगा।
■ न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) / ब्रिक्स बैंक
ब्रिक्स देशों ने अपना केन्द्रीय बैंक (NDB) स्थापित किया है। प्रारम्भिक राशि 100 बिलियन डॉलर रखी गई (चीन 41, भारत/रूस/ब्राजील 18-18, द. अफ्रीका 5)। इसका मुख्यालय शंघाई (चीन) में है। प्रारम्भ में भारत इसके अध्यक्ष (K.V. कामथ) बने। सितम्बर 2017 का नौवाँ शिखर सम्मेलन चीन के शियामेन (Xiamen) में हुआ जिसका लक्ष्य "ब्रिक्स एक उज्ज्वल भविष्य के लिए मजबूत जिम्मेदारी भागीदारी" था।
✦ 19. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
इस संपूर्ण अध्ययन (शस्त्रीकरण से लेकर BRICS तक) का निचोड़ यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से विश्व व्यवस्था लगातार बदल रही है। शांति और सामूहिक सुरक्षा के लिए स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) आज भी प्रासंगिक है, लेकिन भारत जैसे देशों द्वारा इसमें लोकतांत्रिक सुधार (Veto Power विस्तार) की माँग जायज़ है। आर्थिक मोर्चे पर WTO और उदारीकरण/वैश्वीकरण ने 'वैश्विक ग्राम' तो बना दिया, परंतु इसका असली लाभ आज भी विकसित पूँजीवादी देश ही उठा रहे हैं। इसी 'मुक्त बाज़ार' के नकारात्मक प्रभावों और विकसित देशों की दादागिरी से बचने के लिए क्षेत्रीय संगठनों (SAARC, ASEAN, EU, BIMSTEC, BRICS) का उदय हुआ। जहाँ EU एक साझी मुद्रा (Euro) और साझा बाज़ार के साथ महाशक्ति बन चुका है, वहीं ASEAN और BRICS बहुध्रुवीय विश्व में विकासशील देशों की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। यद्यपि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और द्विपक्षीय विवादों के कारण SAARC कमज़ोर पड़ा है (जिससे भारत का झुकाव BIMSTEC की ओर बढ़ा है), फिर भी एक सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध विश्व व्यवस्था के लिए इन अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मंचों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
📝 अपनी तैयारी परखें!
अगर आपने UNO, WTO, वैश्वीकरण एवं सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों के इस सम्पूर्ण नोट्स को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रेक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।
👉 Political Science MCQs प्रैक्टिस सेट हल करें
