| शस्त्रीकरण, निःशस्त्रीकरण, राष्ट्रीय हित एवं विदेश नीति |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में अंतरराष्ट्रीय शांति के परिप्रेक्ष्य में शस्त्रीकरण व निःशस्त्रीकरण, प्रमुख परमाणु संधियों (PTBT, NPT, CTBT) और भारत-अमेरिका 123 समझौते का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। साथ ही, राष्ट्रीय हित (National Interest), विदेश नीति एवं कूटनीति (Diplomacy) के निर्धारक तत्वों व प्रविधियों को समझाया गया है। अंत में, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM) के सिद्धान्त, विकास और समकालीन प्रासंगिकता को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर स्पष्ट किया गया है, जो UPSC, PGT और NET-JRF के लिए अत्यंत उपयोगी है। |
- 1. शस्त्रीकरण तथा निःशस्त्रीकरण: अर्थ एवं अवधारणा
- 2. निःशस्त्रीकरण के विभिन्न 6 रूप (प्रकार)
- 3. निःशस्त्रीकरण के लाभ एवं इसके मार्ग में बाधाएँ
- 4. निःशस्त्रीकरण की दिशा में प्रयास: प्रमुख परमाणु संधियाँ
- 5. भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (123 Agreement)
- 6. राष्ट्रीय हित (National Interest): अर्थ एवं प्रमुख परिभाषाएँ
- 7. थॉमस रॉबिन्सन के अनुसार राष्ट्रीय हित के 6 प्रकार
- 8. राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि के साधन एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण
- 9. विदेश नीति एवं कूटनीति (राजनय): अर्थ व परिभाषाएँ
- 10. विदेश नीति के निर्धारक तत्व, लक्ष्य एवं प्रमुख उपकरण
- 11. कूटनीति (Diplomacy): अर्थ, परिभाषाएँ व महत्व
- 12. कूटनीति और विदेश नीति में सम्बन्ध
- 13. विदेश नीति के 6 प्रमुख लक्ष्य
- 14. कूटनीति के 6 प्रमुख दाँव-पेंच या प्रविधियाँ
- 15. कूटनीति का विकास: परम्परागत से नई कूटनीति तक
- 16. परम्परागत एवं नई कूटनीति में 7 प्रमुख अन्तर
- 17. नई कूटनीति के 8 प्रमुख प्रकार एवं कूटनीति का ह्रास
- 18. अंतरराष्ट्रीय संगठन: गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM)
- 19. NAM के सिद्धान्त एवं निर्गुट आन्दोलन अपनाने के कारण
- 20. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता (Relevance of NAM)
- 21. NAM के वर्तमान उद्देश्य एवं सम्पूर्ण निष्कर्ष
- 22. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
✦ 1. शस्त्रीकरण तथा निःशस्त्रीकरण: अर्थ एवं अवधारणा
सामूहिक सुरक्षा और निःशस्त्रीकरण दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं, क्योंकि दोनों शांति के लिए एकता के प्रस्ताव के अनुकूल हैं। निःशस्त्रीकरण शस्त्रीकरण का विलोम है।
जहाँ शस्त्रीकरण अस्त्र-शस्त्र को बढ़ाने की बात करता है, वहीं निःशस्त्रीकरण अस्त्र-शस्त्र को कम करने की बात करता है। निःशस्त्रीकरण की प्रक्रिया को शांति की प्रक्रिया के साथ जोड़ा जा सकता है। निःशस्त्रीकरण का अर्थ शस्त्र की समाप्ति नहीं है बल्कि शस्त्र में कटौती है। पूर्ण निःशस्त्रीकरण का शाब्दिक अर्थ है— अस्त्र-शस्त्र में पूर्ण कटौती, यहाँ तक कि रक्षा मन्त्रालय, हथियार और सेना तक को समाप्त करने की बात करता है।
अर्थात् सभी मानवीय विनाश के भौतिक हथियारों को समाप्त कर दिया जाय लेकिन यह सम्भव नहीं है क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र के अपने हित में और राष्ट्रीय सुरक्षा में कायम करना उनका अपना अधिकार है।
✦ 2. निःशस्त्रीकरण के विभिन्न 6 रूप (प्रकार)
निःशस्त्रीकरण के विभिन्न रूप निम्न हैं:
| 1 | अनिवार्य निःशस्त्रीकरण: यह युद्ध के बाद विजयी राष्ट्रों पर लागू होता है (हारे हुए राष्ट्रों पर थोपा जाता है)। |
| 2 | ऐच्छिक निःशस्त्रीकरण: इसमें राष्ट्र स्वेच्छा से शामिल होते हैं। |
| 3 | स्थानीय निःशस्त्रीकरण: इसमें स्थानीय राष्ट्र शामिल होते हैं। |
| 4 | सामान्य / व्यापक निःशस्त्रीकरण: इसमें सभी राष्ट्र भाग लेते हैं। |
| 5 | गुणात्मक निःशस्त्रीकरण: इसमें विशेष प्रकार के हथियारों में कटौती की जाती है। |
| 6 | मात्रात्मक निःशस्त्रीकरण: इसमें सभी प्रकार के हथियारों में एक निश्चित प्रकार की कटौती होती है। |
✦ 3. निःशस्त्रीकरण के लाभ एवं इसके मार्ग में बाधाएँ
निःशस्त्रीकरण शस्त्रीकरण का विलोम है। अतः शस्त्रीकरण से जो हानियाँ हैं, वही निःशस्त्रीकरण से लाभ हैं जो कि निम्न हैं:
- शस्त्रीकरण से युद्ध की सम्भावना प्रबल होती है, और निःशस्त्रीकरण से इसकी सम्भावनाएँ कम होती हैं।
- शस्त्रीकरण से अंतरराष्ट्रीय तनाव पैदा होता है, निःशस्त्रीकरण इसे कम करने में सहायक है।
- शस्त्रीकरण से विकास का मार्ग अवरुद्ध होता है, निःशस्त्रीकरण इसका मार्ग प्रशस्त करता है।
- निःशस्त्रीकरण मृत्यु का पैगाम लाता है, निःशस्त्रीकरण इसे रोकता है।
- शस्त्रीकरण लोक कल्याणकारी राज्यों की उपेक्षा करता है और निःशस्त्रीकरण से इस कार्य को बढ़ावा मिलता है।
- शस्त्रीकरण से साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद को बढ़ावा मिलता है, निःशस्त्रीकरण इसे रोकता है।
■ निःशस्त्रीकरण के मार्ग में बाधाएँ
- 1. प्राथमिकता का प्रश्न: अर्थात् पहले राष्ट्रों के बीच विवाद सुलझाया जाय या निःशस्त्रीकरण किया जाय। यह एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि राष्ट्रों के बीच जब तक विवाद विद्यमान रहेगा कोई भी राष्ट्र शस्त्र कटौती करने को तैयार नहीं होगा।
- 2. अनुपात की समस्या: किस अनुपात में निःशस्त्रीकरण किया जाय यह एक बड़ा प्रश्न है, और इसे कौन तय करेगा।
- 3. सम्प्रभुता और राष्ट्रवाद: प्रत्येक राष्ट्र की अपनी सम्प्रभुता है और वे अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर स्वयं प्रत्येक व्यवस्था को तय करते हैं।
- 4. राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न: अर्थात् सभी अपनी सुरक्षा का हवाला देकर अस्त्र-शस्त्र को कम करने के बजाय उसे बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं।
- 5. आर्थिक हित: इसे विकसित राष्ट्र बनाकर बेचते हैं और पर्याप्त मात्रा में धन कमाते हैं।
✦ 4. निःशस्त्रीकरण की दिशा में प्रयास: प्रमुख परमाणु संधियाँ
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निःशस्त्रीकरण की दिशा में अनेक प्रयास हुए। 70 के दशक में शस्त्र परिसीमन सन्धि (SALT) जैसे समझौते हुए। लेकिन परमाणु बमों के उदय ने विश्व को आतंक के संतुलन में बदल दिया था। इसलिए परमाणुओं से समझौते प्रमुख रहे जो कि निम्न हैं:
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PTBT (Partial Test Ban Treaty - 1963):
25 जुलाई सन् 1963 को मास्को में आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि हुई। -
NPT (Non-Proliferation Treaty - 1968):
1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि हुई। -
CTBT (Comprehensive Test Ban Treaty - 1996):
1996 में व्यापक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि (CTBT) हुई। इसके लिए जेनेवा में एक सम्मेलन हुआ। यह परमाणु अप्रसार सन्धि का ही विकसित रूप था। इसमें कहा गया कि जिन पाँच देशों ने परमाणु शक्ति सम्पन्न होने का दर्जा प्राप्त कर लिया है वे अपनी प्रयोगशाला में उसकी गुणवत्ता को टेस्ट कर सकते हैं। लेकिन अन्य देश परमाणु परीक्षण कहीं नहीं करेंगे।
भारत ने इसे भेदभावमूलक बताकर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया जिसके कारण यह अस्तित्व में नहीं आ सका। 1999 में अमेरिकी सीनेट ने इसकी पुष्टि करने से इन्कार कर दी थी, जिससे अस्तित्व में नहीं आ सका।
✦ 5. भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (123 Agreement)
भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता 2008 में हुआ। इसका उद्देश्य असैनिक क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का प्रयोग करना था। इस समझौते के पूर्व अमेरिका में एक Hyde Act (हाइड कानून) बना जिसके द्वारा भारत से प्रतिबन्ध हटाया गया।
अतः अमेरिका परमाणु ऊर्जा एक्ट 1954 के अन्तर्गत धारा 123 के अन्तर्गत हुआ— इसके अन्तर्गत भारत के 65% (22 में 14) परमाणु रिएक्टर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा (IAEA) की निगरानी में हुए।
यह समझौता 40 वर्ष के लिए होगा पुनः 10-10 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। एक वर्ष पूर्व सूचना देकर कोई भी समझौता तोड़ सकता है। इस सन्धि के अनुसार भारत CTBT पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य नहीं है और परमाणु परीक्षण का अधिकार उसे बना रहेगा। लेकिन परमाणु परीक्षण करने पर अमेरिका भी अपनी तकनीकि वापस लेने का अधिकारी होगा।
✦ 6. राष्ट्रीय हित (National Interest): अर्थ एवं प्रमुख परिभाषाएँ
राष्ट्रीय हित विदेश नीति का प्राण है। किसी राष्ट्र की विदेश नीति की सफलता या असफलता का मूल्यांकन राष्ट्रीय हितों की परिप्रेक्ष्य में ही प्राप्त किया जा सकता है। मार्गेन्थाऊ के राजनीतिक दर्शन का मुख्य तत्व राष्ट्रीय हित की प्रधानता है।
मार्गेन्थाऊ ने राष्ट्रीय हित को शक्ति कहकर पुकारा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भाग लेने वाले राष्ट्र अपने कार्यों का संचालन जिस नीति और सिद्धान्त के आधार पर करते हैं उसे राष्ट्रीय हित कहा जाता है।
पं. जवाहर लाल नेहरू (दिसम्बर 1947 में लोक सभा में भाषण):
"किसी भी देश की विदेश नीति का ध्येय उसके राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा है।"
प्रत्येक राष्ट्र का राष्ट्रीय हित अलग-अलग होता है और यह उसके भौगोलिक, ऐतिहासिक परम्पराओं से निर्धारित होता है। राष्ट्रीय हित की कोई निश्चित परिभाषा करना कठिन कार्य है।
रेमों आरो (Raymond Aron) के अनुसार:
"राष्ट्रीय हित की अवधारणा इतनी अस्पष्ट और अर्थहीन है कि अधिक से अधिक इसे हम एक दिखावे की अवधारणा कह सकते हैं।"
राष्ट्रीय हित प्रत्येक सम्प्रभु राष्ट्र की अभिलाषा (चाहत, जरूरत) होती है, जिसे वे प्राप्त करने के लिए हर सम्भव प्रयास करते हैं। यह एक विवादास्पद प्रश्न है कि क्या राष्ट्रीय हित विदेश नीति का उद्देश्य है या मूल्य। जो लोग उद्देश्य मानते हैं वे इसे शक्ति से जोड़कर देखते हैं और जो केवल मूल्य मानते हैं वे नैतिकता से जोड़कर देखते हैं।
जोसेफ फ्रैंकल (Joseph Frankel) ने अपनी पुस्तक National Interest में राष्ट्रीय हित की व्याख्या, राष्ट्रों की आकांक्षाओं, विदेश नीति के निर्धारक, व्याख्यात्मक तथा विवादों का निरूपण करने वाले तत्व के रूप में किया जाता है।
✦ 7. थॉमस रॉबिन्सन के अनुसार राष्ट्रीय हित के 6 प्रकार
थॉमस रॉबिन्सन (Thomas Robinson) ने राष्ट्रीय हित को निम्न 6 प्रकार का बताया है:
| 1 | प्रथम कोटि का हित (Primary Interest): इसके लिए प्रत्येक राष्ट्र बड़ा से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहता है। जैसे— राष्ट्रीय सुरक्षा। |
| 2 | गौण हित (Secondary Interest): यह प्राथमिक तत्व से कम महत्वपूर्ण है। फिर भी राज्य की सत्ता बनाये रखने के लिए आवश्यक होता है। जैसे— विदेशों में बसे नागरिकों की सुरक्षा। |
| 3 | स्थायी हित (Permanent Interest): ये राज्य के दीर्घकालिक हित से सम्बन्धित होते हैं। जैसे— ग्रेट ब्रिटेन द्वारा अपने उपनिवेशों को बनाये रखने के लिए तथा विदेशी व्यापार की रक्षा के लिए समुद्र में नव चालन की स्वतन्त्रता। |
| 4 | परिवर्तनशील हित (Variable Interest): वे हित जो किसी विशेष परिस्थिति में राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक होता है। जैसे— जनमत। |
| 5 | सामान्य हित (General Interest): सामान्य हित के अन्तर्गत आर्थिक, व्यापारिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में लाभ पहुँचाने वाली परिस्थितियाँ आती हैं। जैसे— ग्रेट ब्रिटेन में शक्ति सन्तुलन बनाये रखना इसी का हिस्सा था। |
| 6 | विशिष्ट हित (Specific Interest): इसका सम्बन्ध सामान्य हित से होता है। जैसे— यूरोप में शक्ति सन्तुलन बनाये रखना, ब्रिटेन का सामान्य हित था। किन्तु ब्रिटिश द्वीप के सामने इंग्लिश चैनल के उस पार बेल्जियम और हॉलैण्ड के प्रदेशों में यूरोप की किसी महाशक्ति का अधिकार न हो ये उसका विशिष्ट हित था। |
रॉबिन्सन ने उपर्युक्त 6 प्रकार के अतिरिक्त तीन प्रकार के और अंतरराष्ट्रीय हित बताए हैं: (i) समान हित (Identical), (ii) पूरक हित (Complementary), (iii) परस्पर विरोधी हित (Conflicting)।
✦ 8. राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि के साधन एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण
■ राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि का साधन
- कूटनीति (Diplomacy)
- प्रचार और राजनीतिक युद्ध
- आर्थिक साधन
- साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद
- युद्ध (War)
जहाँ यथार्थवादी राष्ट्रीय हित के कट्टर समर्थक हैं, वहीं आदर्शवादी अंतरराष्ट्रीय हितों में विश्वास करते हैं, वे राष्ट्रीय हित के विरोधी हैं।
लार्ड पामर्स्टन (Lord Palmerston) का प्रसिद्ध कथन:
"अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थायी मित्र है न कोई स्थायी शत्रु। मित्र या शत्रु होते हैं उसके हित, जो मित्र में बदल जाते हैं।"
✦ 9. विदेश नीति एवं कूटनीति (राजनय): अर्थ व परिभाषाएँ
विदेश नीति एवं राजनय (कूटनीति) ऐसे दो चक्र हैं जिनसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रक्रम (Process - प्रक्रिया) चलता है। सभी राज्यों की किसी न किसी प्रकार की विदेश नीति अपनानी पड़ती है और इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए राजनय (Diplomacy) का सहारा लेना पड़ता है। एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ व्यवहार का अध्ययन ही विदेश नीति की सामग्री है। प्रत्येक राज्य अन्य राज्यों के कार्यों के प्रतिकूल प्रभाव को न्यूनतम करने और अनुकूल प्रभाव को अधिकतम करने का प्रयास करता है।
जॉर्ज मोडेल्सकी (George Modelski) के अनुसार:
"विदेश नीति उन क्रिया-कलापों का समुच्चय है, जो किसी समुदाय में अन्य राज्यों का व्यवहार बदलने के लिए और अपने क्रिया-कलापों को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ समायोजित करने के लिए विकसित किया है।"
अतः एक राष्ट्र जब दूसरे राष्ट्र के साथ कोई सम्बन्ध रखे या निर्णय रखता है तो उसे विदेश नीति कहते हैं।
फेलिक्स ग्रास (Feliks Gross) का मत है:
"जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के साथ कोई सम्बन्ध न रखने का निर्णय लेता है, तो उसे भी विदेश नीति कहते हैं।"
प्रत्येक राष्ट्र को यह सुनिश्चित करना होता है कि दूसरे राष्ट्र के साथ कितना सम्बन्ध रखने से उसके हित की गारण्टी व सुरक्षा हो सकती है। विदेश नीति सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार की हो सकती है। जब विदेश नीति का उद्देश्य अन्य राज्यों के व्यवहार में परिवर्तन करके अपने हितों को समायोजित करना हो तो सकारात्मक और जब समायोजित व्यवहार में किये बिना हो तो वह नकारात्मक है। विदेश नीति गृहनीति (Domestic Policy) का प्रतिबिम्ब होता है जब प्रत्येक राष्ट्र अपने घरेलू परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी विदेश नीति का संचालन करता है।
फेलिक्स ग्रास का यह भी मानना था कि "अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन वास्तव में विदेश नीति के अध्ययन के अतिरिक्त कुछ नहीं है।" लेकिन यह परिभाषा ठीक नहीं है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अन्य विषयों का भी अध्ययन होता है। यह बात दूसरी है कि उसे विदेश नीतियों के माध्यम से ही प्राप्त किया जाता है।
विदेश नीतियों के निर्धारण में सरकारी और गैर-सरकारी दोनों उपकरण भाग लेते हैं। सरकारी अभिकरण में कार्यपालिका व विधायिका को शामिल किया जाता है, जबकि गैर-सरकारी अभिकरणों में राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत, विभिन्न प्रकार के सिविल सोसाइटी (NGO, Trust) आदि को शामिल किया जाता है।
✦ 10. विदेश नीति के निर्धारक तत्व, लक्ष्य एवं प्रमुख उपकरण
■ विदेश नीति के निर्धारक तत्व
- जनसंख्या
- भौगोलिक स्थिति
- प्राकृतिक सम्पदा
- सैनिक शक्ति
- धर्म, भाषा, नस्ल और संस्कृति
- विचारधारा
- जनमत
- नीति-निर्माता
- विश्व संगठन एवं विश्व जनमत
- सम्बद्ध देशों की प्रतिक्रिया
■ विदेश नीति का लक्ष्य
- राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति, पूर्ति एवं रक्षा।
- राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा।
- विश्व शान्ति एवं सुरक्षा की स्थापना।
- आर्थिक उद्देश्य।
- वैचारिक उद्देश्य।
■ विदेश नीति के उपकरण
- सन्धि (Treaty)
- शान्ति वार्ता
- क्षेत्रीय सुरक्षा सन्धि
- दांत कूटनीति (Deterrence / भय दोहन)
- नयी सरकारों को मान्यता देना
- विश्व संगठन का उपयोग
✦ 11. कूटनीति (Diplomacy): अर्थ, परिभाषाएँ व महत्व
कूटनीति के द्वारा ही एक राष्ट्र अपनी इच्छाओं, उद्देश्यों तथा मूल्यों को दूसरे राष्ट्र तक सम्प्रेषित करता है।
मार्गेन्थाऊ मानते हैं कि— कूटनीति अंतरराष्ट्रीय शक्ति का उपयोग करने का एक साधन है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति कूटनीति के कंधों पर ही यात्रा करती है तथा दूसरे राष्ट्रों में कार्यान्वित होती है। कूटनीति, राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय शक्ति, प्रबन्ध तथा विदेश नीति का एक तत्व है। यह दूसरे राष्ट्रों पर शक्ति प्रयोग करने का एक साधन है। यह राष्ट्रीय हित का बेहतरीन उपकरण है।
कूटनीति की कोई निश्चित परिभाषा कर पाना निश्चित नहीं है। इसका शाब्दिक अर्थ है— "अपनी नीतियों को कूट-कूट कर ऐसा पिलाया जाय या समझाया जाय कि आपके हितों की पूर्ति हो जाय।" यानी हर कीमत पर अपने हितों की प्राप्ति ही कूटनीति है।
नकारात्मक दृष्टिकोण: कभी-कभी इसका प्रयोग राष्ट्र की ओर से झूठ बोलने की कला के रूप में किया जाता है और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में धोखा तथा छल-कपट उपकरण के रूप में देखा जा सकता है।
■ विद्वानों की प्रमुख परिभाषाएँ
जोसेफ स्टालिन के अनुसार (कूटनीति के खण्डों का उल्लेख करते हुए):
"एक कूटनीतिज्ञ के शब्दों का उसके कार्यों से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, नहीं तो यह कैसी कूटनीति हुई। अच्छे शब्द बुरे कामों को छुपाने का यह एक मुखौटा है, निष्कपट कूटनीति सूखे पानी, लकड़ी के लोहे की तरह सम्भव नहीं है।"
एक अन्य राजनेता के अनुसार:
"जब कूटनीतिज्ञ कहता है, 'हाँ' तो उसका अर्थ होता है 'शायद'। जब वह 'शायद' कहता है तो उसका अर्थ होता है 'नहीं' और जब कहता है 'नहीं' तो वह कूटनीतिज्ञ नहीं होता।"
चेम्बर डिक्शनरी के अनुसार: "कूटनीति वार्तालाप की एक कला है।"
भारतीय विद्वान के. एम. पणिक्कर के अनुसार: "कूटनीति अपने हितों को दूसरे देश से आगे रखने की एक कला है।"
निष्कर्ष: ध्यान रहे कि कूटनीति को धोखा, छल-कपट के रूप में देखना ठीक नहीं है। बल्कि इसे वार्तालाप, कला के रूप में देखना चाहिए जिसमें प्रत्येक परिस्थितियों में कूटनीतिज्ञ अपने हितों को रखने का प्रयास करता है।
✦ 12. कूटनीति और विदेश नीति में सम्बन्ध
हम जानते हैं कि कूटनीति और विदेश नीति एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं, क्योंकि कूटनीति के कंधों पर सवार होकर ही विदेश नीति चलती है।
सर बेक्टर बैल्सली के अनुसार:
"कूटनीति विदेश नीति नहीं है परन्तु यह विदेश नीति को लागू करने का एक उपकरण है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि एक के अभाव में दूसरा कार्य नहीं कर सकता। कूटनीति का विदेश नीति से अलग अपना कोई अस्तित्व नहीं है।"
डा. महेन्द्र कुमार के अनुसार:
"अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीति और विदेश नीति एक गाड़ी के दो पहिए हैं।"
✦ 13. विदेश नीति के 6 प्रमुख लक्ष्य
विदेश नीति के निम्नलिखित प्रमुख लक्ष्य होते हैं:
- राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा।
- राज्य की अखण्डता की रक्षा करना।
- मित्रों से सम्बन्ध बढ़ाना और शत्रुओं को तटस्थ करना।
- विरोधी शक्तियों के गठबन्धनों को तोड़ना।
- आर्थिक एवं व्यावसायिक लक्ष्य प्राप्त करना।
- सद्भावना की स्थापना।
✦ 14. कूटनीति के 6 प्रमुख दाँव-पेंच या प्रविधियाँ
कूटनीति (राजनय) में अपने हितों को साधने के लिए निम्नलिखित प्रविधियों (Tactics) का प्रयोग किया जाता है:
- I. समझाना या अनुनय-विनय
- II. आर्थिक सहायता
- III. सुविधाओं का वादा
- IV. बल प्रयोग की धमकी
- V. अहिंसात्मक सजा
- VI. दबाव का प्रयोग
✦ 15. कूटनीति का विकास: परम्परागत से नई कूटनीति तक
कूटनीति आधुनिक काल की देन है, और इसका उदय 16वीं शताब्दी में हुआ। लेकिन 16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक यूरोपीय राजनीति का बोलबाला था क्योंकि एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिकी स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य के रूप में उदित नहीं हुए थे और अमेरिका तथा सोवियत संघ अपने पुनर्निर्माण में लगे हुए थे।
लेकिन 20वीं शताब्दी में विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय शक्ति का ह्रास हो गया। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापित हो गए। फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या विश्व परकीय कूटनीति का उदय हो गया।
जहाँ 16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक की कूटनीति को परम्परागत कूटनीति के नाम से जाना गया, वहीं 20वीं शताब्दी में आधुनिक या नव कूटनीति का उदय हो गया।
■ परम्परागत कूटनीति की विशेषताएँ
- यूरोपीय कूटनीति।
- सीमित कूटनीति।
- कुलीन तन्त्रात्मक कूटनीति।
- गुणों पर विशेष बल।
- गोपनीयता (गुप्त) कूटनीति।
- राजदूतों के लिए कार्य करने की स्वतन्त्रता।
■ नई कूटनीति का प्रादुर्भाव
K.W. थॉमपसन के अनुसार:
"अब कूटनीति का नयी क्रान्तिकारी तथा विश्व व्यापक संस्थागतकरण हो चुका है। बहुपक्षीय समझौता, वार्ताओं की संसदीय कूटनीति (UNO), सम्मेलन कूटनीति, व्यक्तिगत कूटनीति, खुली कूटनीति तथा सम्झौता वार्ताओं से जुड़े क्षेत्रों में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक रूप का शामिल होना। इन सब के प्रादुर्भाव ने एक नया आयाम दिया है।"
इसलिए आधुनिक कूटनीति को 'नयी कूटनीति' का नाम दिया जाता है।
✦ 16. परम्परागत एवं नई कूटनीति में 7 प्रमुख अन्तर
| नयी कूटनीति (New Diplomacy) | पुरानी/परम्परागत कूटनीति (Old Diplomacy) |
|---|---|
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✦ 17. नई कूटनीति के 8 प्रमुख प्रकार एवं कूटनीति का ह्रास
■ नई कूटनीति के 8 प्रकार
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शिखर कूटनीति (Summit Diplomacy):
जब किसी राष्ट्र के मुखिया किसी मुद्दे के समाधान के लिए आपस में वार्तालाप करते हैं तो उसे शिखर कूटनीति कहते हैं। -
व्यक्तिगत कूटनीति:
जब किसी राष्ट्र का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति (विदेश मन्त्री) अपने हितों के प्रश्न करने के लिए अन्य राष्ट्र के महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ कोई बातचीत करता है, तो उसे व्यक्तिगत कूटनीति कहते हैं। -
संसदीय कूटनीति:
जब किसी संस्था (UNO) के माध्यम से कोई राष्ट्र अपने पक्ष को मजबूती के साथ रखता है और अपने हितों को प्राप्त करता है तो उसे संसदीय कूटनीति कहते हैं। -
खुली कूटनीति:
जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर राष्ट्र आपस में साथ बैठकर कोई वार्तालाप करते हैं तो उसे खुली कूटनीति कहते हैं। -
वाणिज्यिक कूटनीति:
इसका सम्बन्ध व्यापारिक वार्तालाप से है। -
सम्मेलन कूटनीति:
जब किसी सम्मेलन में कोई राष्ट्र अपने हितों को प्राप्त करने का प्रयास करता है तो उसे सम्मेलन कूटनीति कहते हैं। -
संगुट्टीय कूटनीति:
जब कोई राष्ट्र कोई गुट बनाकर अपने हितों को प्राप्त करने का प्रयास करता है। -
लोकतान्त्रिक कूटनीति:
जब वार्तालाप के द्वारा अपने हित को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, तो उसे लोकतान्त्रिक कूटनीति कहते हैं।
■ कूटनीति का ह्रास (Decline of Diplomacy) के कारण
- यूरोपीय राजनीति का अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बदलना।
- नवागन्तुक (नये देश, नई समस्याएँ)।
- यातायात एवं संचार के विकास (जिससे राजदूतों पर निर्भरता घटी)।
- परमाणु बमों का उदय।
- राष्ट्र-राज्य की संख्या में वृद्धि।
✦ 18. अंतरराष्ट्रीय संगठन: गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM)
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (Non-Aligned Movement - NAM) को निर्गुट आन्दोलन भी कहा जाता है। यह तृतीय विश्व के देशों का एक संगठन है जो मुख्य रूप से 5D के सिद्धान्त पर आधारित है:
- D₁ – Development (विकास)
- D₂ – Detente (तनाव शैथिल्य)
- D₃ – Disarmament (निःशस्त्रीकरण)
- D₄ – Decolonisation (वि-उपनिवेशीकरण)
- D₅ – Democratisation (लोकतान्त्रीकरण)
■ गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय शक्ति का ह्रास हो गया और एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका राष्ट्र-राज्य के रूप में अस्तित्व में आये। जब यूरोपीय शक्तियों का ह्रास हुआ तो विश्व में अमेरिका और सोवियत संघ जैसी दो महाशक्तियों का उदय हो गया। जहाँ अमेरिका की विचारधारा उदारवादी थी वहीं सोवियत संघ की विचारधारा साम्यवादी थी। दोनों महाशक्तियाँ शक्ति में लगभग समान थीं लेकिन विचारधारा में एक-दूसरे के विपरीत थीं। अतः दोनों के बीच वैचारिक युद्ध छिड़ गया जिसे शीतयुद्ध (Cold War) कहा गया। इसके कारण विश्व में तनाव और भय का वातावरण फैल गया।
इन दोनों महाशक्तियों ने नवोदित राष्ट्रों (एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका) को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए हर सम्भव कोशिश करने लगे जिससे इन नवोदित राष्ट्रों को संकट पैदा हो गया। भारत के पं. जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के नासिर, और युगोस्लाविया के टीटो ने किसी भी महाशक्तियों के साथ न जाने का निर्णय लिया और अलग से एक संगठन बनाने का निर्णय लिया जिसे आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM) का नाम दिया गया।
■ NAM के शिखर सम्मेलन
- अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन हुआ जिसमें NAM के गठन का निर्णय ले लिया गया।
- इसका व्यावहारिक रूप 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन में दिया गया। बेलग्रेड में तृतीय विश्व के 25 राष्ट्रों का सम्मेलन हुआ और इसी में NAM के सिद्धान्त और उद्देश्यों को तय किया गया।
इस सम्मेलन में तय हुआ कि इसका प्रत्येक 3 वर्ष तक सदस्य राष्ट्रों के यहाँ सम्मेलन होगा और जिस राष्ट्र में सम्मेलन होगा उस राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष 3 वर्ष के लिए इसका अध्यक्ष बनेगा। तब से लेकर अब तक इसके कई शिखर सम्मेलन हो चुके हैं और लगातार इसकी संख्या में वृद्धि हुई है। 2012 में जब ईरान के तेहरान में इसका शिखर सम्मेलन हुआ तो उसमें दो राष्ट्र और भी शामिल हुए जिनका नाम— अजरबैजान, फिजी है। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्यों की संख्या कुल 120 हो गयी है।
इसका 17वाँ शिखर सम्मेलन 2015 में प्रस्तावित था लेकिन कुछ कारणों से सितम्बर 2016 में वेनेजुएला के मारग्रेटा नामक द्वीप के पोरलम शहर में हुई जिसमें 120 देशों ने भाग लिया। भारत का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति— हामिद अंसारी ने किया। इस सम्मेलन में आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन को मानवता के लिए घातक बताया गया तथा विकसित देशों की संरक्षणवादी नीतियों की आलोचना हुई।
✦ 19. NAM के सिद्धान्त एवं निर्गुट आन्दोलन अपनाने के कारण
■ NAM के सिद्धान्त
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के बारे में यह तय किया गया कि इसके कुछ अपने सिद्धान्त हैं जो निम्नलिखित हैं:
- सदस्य राष्ट्र स्वतन्त्र विदेश नीतियों का अनुसरण करने की अभिलाषा रखता है।
- सदस्य राष्ट्र का महाशक्तियों से कोई द्विपक्षीय समझौता न हुआ हो (सोवियत संघ, अमेरिका से)।
- सदस्य राष्ट्र किसी महाशक्तियों को अपने यहाँ सैनिक अड्डा स्थापित करने की इजाजत न दिया हो।
- सदस्य राष्ट्र किसी सैनिक गुट का सदस्य न हो।
- सदस्य राष्ट्र साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोधी हो।
■ निर्गुट आन्दोलन अपनाने का कारण
- 1. शीत युद्ध
- 2. मनोवैज्ञानिक विवशता
- 3. स्वतन्त्र विदेश नीति की इच्छा
- 4. तृतीय विश्व के विकास का प्रश्न
- 5. विश्व शान्ति स्थापित करना
गुट निरपेक्ष आन्दोलन शब्द का पहली बार प्रयोग कृष्ण मेनन ने 1953-54 में संयुक्त राष्ट्र संघ में किया था। पं. जवाहर लाल नेहरू ने अमेरिकी कांग्रेस में बोलते हुए कहा कि "हम कोई गुट नहीं हैं और किसी गुट के विरोध में भी नहीं बने हैं इसलिए हमने आप को निर्गुट कहा है।" हमारा मूल उद्देश्य अपने लोगों का विकास करना है और उनकी तत्कालीन समस्याओं का निराकरण करना है।
पं. नेहरू के अनुसार गुटनिरपेक्षता का अर्थ:
"गुटनिरपेक्षता का अर्थ न तो तटस्थतावाद है और न ही अलगाववाद। हमारी भी भूमिका विश्व में बनी रहेगी। हम न तो किसी गुट के साथ हैं और न ही किसी के विरोध में। जो सही करेगा उसका समर्थन करेंगे और जो गलत है उसका विरोध करेंगे।"
पं. नेहरू ने स्पष्ट कर दिया कि गुटनिरपेक्षता हमारी विदेश नीति का आधार है, यह एक परिवर्तनशील और गत्यात्मक अवधारणा है, इसलिए समय और परिस्थितियों के अनुसार इसमें परिवर्तन से कोई परहेज नहीं करना चाहिए। 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय जब भारत ने अमेरिका से सहायता लिया और 1971 में भारत-सोवियत संघ के बीच 20 वर्षीय मैत्री सन्धि हुई तो भारत की आलोचना भी हुई लेकिन भारत ने इसे अपनी विदेश नीतियों के अनुरूप बताया। 1977 में जनता पार्टी सरकार ने कांग्रेस की गुटनिरपेक्षता की नीति को एक तरफ झुका हुआ बताकर अपने घोषणा पत्र में उसकी असली गुटनिरपेक्षता (Genuine Non-Alignment) की नीति शब्द का प्रयोग किया।
✦ 20. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता (Relevance of NAM)
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह सवाल उठने लगा है कि NAM की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है। क्योंकि गुट ही नहीं रहे तो निरपेक्षता कैसी। इसके अतिरिक्त NAM के देशों के बीच आपसी एकजुटता का अभाव है, और NAM के सदस्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महाशक्तियों के साथ सम्बन्ध रखे हुए हैं। इसलिए इसे समाप्त हो जाना चाहिए।
उपर्युक्त आलोचनाओं के विरोध में यह कहा जाता है कि पहली चीज NAM का जन्म किसी गुट के विरोध में नहीं हुआ था इसलिए इसका नाम निर्गुट रखा गया है। यह तृतीय विश्व के देशों का एक संगठन है जो कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अस्तित्व में आया है। यह मुख्य रूप से तृतीय विश्व के देशों का विकास और स्वतन्त्र विदेश नीतियों के अनुसरण के लिए बना है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या निर्गुट आन्दोलन अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सका या पहले की अपेक्षा चुनौतियाँ और बढ़ीं। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि NAM को अभी निम्न उद्देश्यों को पूरा करना है।
✦ 21. NAM के वर्तमान उद्देश्य एवं सम्पूर्ण निष्कर्ष
■ NAM के वर्तमान 5 प्रमुख उद्देश्य (चुनौतियाँ)
- नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) को व्यावहारिक रूप से लागू कराना।
- नव साम्राज्यवाद और नव उपनिवेशवाद को समाप्त करने के लिए कार्य करना।
- संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की सुरक्षा परिषद् के विस्तार के लिए कार्य करना।
- उत्तर-दक्षिण संवाद को तेज करना।
- निःशस्त्रीकरण व शस्त्र नियन्त्रण में प्रयास करना।
■ समकालीन चुनौतियाँ
उपर्युक्त के अतिरिक्त तत्कालीन विश्व में ऐसी अनेकानेक समस्यायें पैदा हो गयी हैं जिनका दुष्परिणाम तृतीय विश्व के देशों को ही भोगना पड़ रहा है। आज आतंकवाद एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है और इसका सर्वाधिक नुकसान तृतीय विश्व के देशों को ही भोगना पड़ रहा है।
उदारीकरण (Liberalization) का चेहरा कैसे मानवीय बनाया जाय और इसका लाभ विकासशील देशों को कैसे पहुँचाया जाय यह एक बड़ी चुनौती है। इसके अतिरिक्त परमाणु बमों के उदय ने विश्व को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ विनाश निकट दिखाई पड़ रहा है।
विकसित देशों की कार्य-प्रणालियों ने विकासशील की स्वतन्त्र नीतियों को प्रभावित किया है। इन सभी उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अभी तृतीय विश्व के देशों को संघर्ष करना है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद NAM ष सबसे बड़ा है जिसमें 120 देश हैं और लगातार इसकी संख्या में वृद्धि हो रही है और इससे सिद्ध होता है कि इस बड़े मंच की प्रासंगिकता और इसके समक्ष चुनौती पहले से अधिक बढ़ी है।
✦ 22. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion: भाग 1 से 21 तक का निचोड़)
भाग 1 से लेकर भाग 21 तक के इस विस्तृत अध्ययन से हम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न महत्वपूर्ण आयामों का एक समग्र मूल्यांकन कर सकते हैं। इस पूरी अध्ययन सामग्री का मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है:
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शस्त्रीकरण और निःशस्त्रीकरण (भाग 1 से 5):
विश्व शांति के लिए शस्त्रीकरण सबसे बड़ा खतरा है, जिसके समाधान के रूप में निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता महसूस की गई। इसके लिए वैश्विक स्तर पर PTBT, NPT और CTBT जैसी महत्वपूर्ण परमाणु संधियाँ अस्तित्व में आईं। इसी दिशा में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (123 Agreement) एक ऐतिहासिक कदम रहा, जिसने भारत को बिना CTBT पर हस्ताक्षर किए परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। -
राष्ट्रीय हित (National Interest) (भाग 6 से 8):
मार्गेन्थाऊ और अन्य यथार्थवादियों के अनुसार, राष्ट्रीय हित ही विदेश नीति का प्राण है। कोई भी राष्ट्र अपने हितों (प्राथमिक, गौण, स्थायी आदि) से समझौता नहीं कर सकता। 'लार्ड पामर्स्टन' का यह कथन सिद्ध करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थायी मित्र है और न ही शत्रु, बल्कि केवल राष्ट्र के हित स्थायी होते हैं। -
विदेश नीति और कूटनीति (भाग 9 से 17):
राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के लिए विदेश नीति का निर्माण होता है और इसे कूटनीति (Diplomacy) रूपी वाहन पर सवार होकर लागू किया जाता है। परम्परागत कुलीन और गुप्त कूटनीति से निकलकर आज दुनिया 'नई कूटनीति' (खुली, लोकतान्त्रिक, और संसदीय कूटनीति) में प्रवेश कर चुकी है। यद्यपि परमाणु हथियारों और यातायात के विकास से कूटनीतिज्ञों की व्यक्तिगत भूमिका घटी है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसका महत्व बरकरार है। -
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM) (भाग 18 से 21):
शीत युद्ध के दौरान तृतीय विश्व के नवोदित राष्ट्रों ने दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) की गुटबाजी से खुद को अलग रखने के लिए NAM (निर्गुट आन्दोलन) का गठन किया। 5D सिद्धान्तों पर आधारित यह संगठन आज 120 सदस्यों वाला संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद दूसरा सबसे बड़ा मंच है। यद्यपि 1991 में सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध समाप्त हो गया, लेकिन आज नव-उपनिवेशवाद, आतंकवाद, उदारीकरण की विसंगतियों और नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) जैसी समकालीन चुनौतियों का सामना करने के लिए NAM की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।
🎯 अंतिम सार (Final Word)
समग्र रूप से, अंतरराष्ट्रीय राजनीति राष्ट्रों के शक्ति और हितों का संघर्ष है। शस्त्रीकरण इस संघर्ष को बढ़ाता है, जबकि निःशस्त्रीकरण, कूटनीति और NAM जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच इसे नियंत्रित कर विश्व शांति एवं सह-अस्तित्व की दिशा में आगे ले जाने का प्रयास करते हैं।
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अगर आपने निःशस्त्रीकरण, राष्ट्रीय हित, कूटनीति एवं गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM) को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रेक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।
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