| नव उपनिवेशवाद, नव साम्राज्यवाद एवं राष्ट्रीय शक्ति (National Power) |
|---|
| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में नव उपनिवेशवाद और नव साम्राज्यवाद की अवधारणाओं तथा राष्ट्रीय शक्ति (National Power) के तत्वों का विश्लेषण किया गया है। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विषयों— शक्ति संतुलन (Balance of Power), सामूहिक सुरक्षा (Collective Security), और शीत युद्ध (Cold War) के विभिन्न चरणों, कारणों, 'क्यूबा संकट' एवं विश्व राजनीति पर इसके प्रभावों को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर स्पष्ट किया गया है। यह राजनीति विज्ञान की परीक्षाओं (UPSC, PGT, NET-JRF) के लिए एक सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री है। |
- 1. नव उपनिवेशवाद और नव साम्राज्यवाद: एक परिचय
- 2. साम्राज्यवाद के विकास के कारण एवं उद्देश्य
- 3. नव उपनिवेशवाद के उदय के कारण व प्रमुख साधन
- 4. राष्ट्रीय शक्ति (National Power): अर्थ एवं प्रमुख परिभाषाएँ
- 5. शक्ति, प्रभाव और बल में अन्तर एवं शक्ति के स्रोत
- 6. राष्ट्रीय शक्ति के प्रकार एवं राष्ट्रों का विभाजन
- 7. शक्ति शून्यता (Power Vacuum) एवं शक्ति के प्रमुख तत्व
- 8. शक्ति संतुलन (Balance of Power): अर्थ एवं रूप
- 9. शक्ति संतुलन की प्रमुख विशेषताएँ एवं लाभ
- 10. शक्ति संतुलन स्थापित करने के साधन व पतन के कारण
- 11. सामूहिक सुरक्षा (Collective Security): अर्थ एवं मान्यताएँ
- 12. सामूहिक सुरक्षा के विचार का विकास एवं मोर्चाबन्दी
- 13. शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा में समानताएँ
- 14. शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा में अन्तर (असमानताएँ)
- 15. शीत युद्ध (Cold War): अर्थ, उदय एवं प्रमुख परिभाषाएँ
- 16. शीत युद्ध के दौरान अपनाये गए 7 प्रमुख साधन
- 17. शीत युद्ध के विभिन्न चरण: पहला चरण (1946-1952)
- 18. द्वितीय चरण (1953-1958): सैन्य गठबंधनों का युग
- 19. तृतीय चरण (1959-1962): यू-2 विमान व क्यूबा संकट
- 20. चौथा चरण (देतांत / तनाव शैथिल्य): प्रमुख सन्धियाँ
- 21. नव शीत युद्ध (1980-1989) एवं 'स्टार वार्स'
- 22. सोवियत संघ का विघटन एवं शीत युद्ध का अंत
- 23. विश्व राजनीति पर शीत युद्ध का प्रभाव
- 24. सम्पूर्ण निष्कर्ष
✦ 1. नव उपनिवेशवाद और नव साम्राज्यवाद: एक परिचय
नव उपनिवेशवाद और नव साम्राज्यवाद समझने से पूर्व हमें उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है।
उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद के पूर्व की अवधारणा है जिसका अर्थ होता है — किसी देश को अपने अधीन करना। जबकि साम्राज्यवाद उसके बाद की अवधारणा है जिसका उद्देश्य है — उस देश में अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित करना और अपने राज्य का विस्तार करना। जहाँ साम्राज्यवाद का स्वरूप केवल राजनीतिक है, वहीं उपनिवेशवाद सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक सभी रूप में अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करता है।
■ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व एवं पश्चात्)
साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद का बोलबाला द्वितीय विश्व युद्ध के पहले था और इसे यूरोपीय नीति का उपकरण माना जाता था क्योंकि वे अपने राष्ट्रीय हितों को प्राप्त करने के लिए इसी उपकरण का प्रयोग करते थे। इन साधनों का प्रयोग करके उन्होंने अपनी राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया ताकि अपने भूक्षेत्र के बाहर अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकें।
प्रारम्भ में इसे वैध या नैतिक उपकरण माना गया क्योंकि यूरोपीय देशों ने यह तर्क दिया कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद पिछड़े लोगों की भलाई के लिए है। इसका उद्देश्य लोगों को सभ्य एवं शिक्षित बनाना है, गरीब लोगों के स्तर को ऊँचा उठाना है और उन्हें मानवीय जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है। लेकिन बाद में इसकी कार्य-प्रणाली को देखकर लोगों के मन में यह दुःख, घृणा, कष्ट और नफरत का प्रतीक बन गया।
साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का बोलबाला द्वितीय विश्व युद्ध के पहले विद्यमान था लेकिन जब एशिया व अफ्रीका के देश स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य के रूप में अस्तित्व में आये तो यह एशिया से अन्तर्धान हो गया। आज हम इसे परम्परागत साम्राज्यवाद और परम्परागत उपनिवेशवाद के नाम से भी जानते हैं क्योंकि अब यह अपने मूल रूप में समाप्त हो चुका है।
✦ 2. साम्राज्यवाद के विकास के कारण एवं उद्देश्य
| साम्राज्यवाद के विकास के कारण | साम्राज्यवाद के प्रमुख उद्देश्य |
|---|---|
|
|
■ आधुनिक परिवेश में नव साम्राज्यवाद/उपनिवेशवाद
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया व अफ्रीकी देशों से साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद अलविदा हो गया। लेकिन अपने आधुनिक परिवेश में अर्थात् नव साम्राज्यवाद और नव उपनिवेशवाद के रूप में वह आज भी विद्यमान है।
जहाँ यह कार्य द्वितीय विश्व युद्ध के पहले इंग्लैण्ड और यूरोपीय शक्तियाँ करती थीं, आज वही कार्य विशेष रूप से अमेरिका जैसी महाशक्ति कर रही है। आज भी विकासशील देशों की नीतियों को ये मनमानी ढंग से चलाने का प्रयास कर रहे हैं। आज विकासशील देशों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक नीतियों को वे अब भी प्रभावित कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि पहले इनका स्वरूप राजनीतिक था अब इनका स्वरूप आर्थिक व सांस्कृतिक हो गया है।
इसके लिए ये विभिन्न प्रकार की नीतियाँ अपना रहे हैं। अमेरिका व अन्य विकसित देश शस्त्र-दौर को बढ़ावा देकर, शस्त्र आपूर्ति (सप्लाई) के द्वारा, विदेशी सहायता के माध्यम से, परोक्ष युद्ध नीति आदि के माध्यम से विकासशील देशों पर नियन्त्रण करते हैं। इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में कूटनीति के माध्यम से और अन्य दबाव साधनों जैसे— मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर, परमाणु निशस्त्रीकरण व उदारीकरण के माध्यम से अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहे हैं।
विकसित देश समुद्र तथा विदेशी भूभागों पर सैनिक अड्डे बनाकर, तकनीकी पर एकाधिकार प्राप्त करके, बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों (MNCs) द्वारा वित्तीय तथा तकनीकी एकाधिकार के माध्यम से विकासशील देशों पर नियन्त्रण स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
इस प्रकार विकासशील देश आज आर्थिक व सांस्कृतिक रूप से पराधीन हैं। आज ऐसा माना जा रहा है कि विकसित देशों की स्थिति विश्व में केन्द्र जैसी हो गयी हो और विकासशील देश परिधियों पर हैं। जब तक नवसाम्राज्यवाद और नवउपनिवेशवाद की समाप्ति नहीं हो जाती तब तक इन्हें राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापित करना मुश्किल है।
✦ 3. नव उपनिवेशवाद के उदय के कारण व प्रमुख साधन
■ नव उपनिवेशवाद के उदय के कारण
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय शक्ति का कम होना।
- साम्राज्यवाद के विरुद्ध चेतना की उत्पत्ति।
- विकसित राज्यों की विकासशील राज्यों के संसाधनों पर नियन्त्रण की आवश्यकता।
- नये राज्यों की विकसित राज्यों पर निर्भरता।
- शीत युद्ध की शक्ति का राजनीति पर प्रभाव।
- अमेरिका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ की नीतियाँ।
■ नव उपनिवेशवाद के साधन
- 1. विकासशील राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप।
- 2. शस्त्र आपूर्ति (Arms Supply) द्वारा।
- 3. विदेशी सहायता तथा ऋण का प्रयोग।
- 4. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे— विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व व्यापार संगठन (WTO) आदि के द्वारा नियन्त्रण।
- 5. बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों (MNCs) द्वारा नियन्त्रता।
- 6. आर्थिक रूप से आश्रित बनाकर शोषण।
- 7. अनुषंगी (अधीनस्थ / Satellite) बनाकर नियन्त्रण।
✦ 4. राष्ट्रीय शक्ति (National Power): अर्थ एवं प्रमुख परिभाषाएँ
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय (Chicago School) में व्यवहारवादी या शक्तिवादी राजनीति विज्ञान का जन्म हुआ, इसे वैज्ञानिक राजनीति भी कहा जाता है। क्योंकि शक्ति विज्ञान का दूसरा नाम है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सम्प्रभुता का स्थान शक्ति, सत्ता एवं प्रभाव ने ले लिया। सत्ता एवं प्रभाव ही शक्ति का एक रूप है। शक्ति आधुनिक राजनीति की केन्द्रीय अवधारणा है। आज राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक ही उद्देश्य है शक्ति प्राप्त करना। शक्ति बनाये रखना और शक्ति को बढ़ाना।
■ विद्वानों के प्रमुख कथन / परिभाषाएँ
बेकर (Becker):
"राजनीति को शक्ति से अपृथक्करणीय माना।"
कैटलिन और लॉसवेल (Catlin & Lasswell):
"राजनीति विज्ञान को शक्ति का विज्ञान बताया।"
मार्गेन्थाऊ (Hans Morgenthau):
"शक्ति प्राप्ति करने के लिए राष्ट्रों के मध्य होने वाला संघर्ष ही अंतर्राष्ट्रीय राजनीति है।"
(मार्गेन्थाऊ ने राष्ट्रीय और शक्ति दोनों को एक ही रूप देखा)
राबर्ट बायर्सटेड (Robert Bierstedt):
"शक्ति बल प्रयोग की योग्यता है न कि उसका वास्तविक प्रयोग।"
मैकाइवर (MacIver):
"शक्ति व्यक्तियों तथा व्यवहार को नियन्त्रित करने, विनियमित करने तथा निर्देशित करने की क्षमता है।"
✦ 5. शक्ति, प्रभाव और बल में अन्तर एवं शक्ति के स्रोत
शक्ति में बल प्रयोग, दण्ड एवं हिंसा तीनों निहित हैं और शक्ति से जब इन तीनों को माइनस (Minus) कर देते हैं तो प्रभाव शेष रह जाता है। अतः स्पष्ट है कि प्रभाव भी शक्ति का एक रूप है। प्रभाव द्विपक्षीय होता है और प्रभाव अदृश्य होता है।
शक्ति जब वैधता (Legitimacy) प्राप्त कर लेती है तो वह सत्ता (Authority) बन जाती है। शक्ति अमूर्त है और जब यह बाह्य रूप से व्यक्त होती है तो बल प्रयोग (Force) बन जाती है।
शक्ति कभी भी निरपेक्ष नहीं हो सकती यह सदैव सापेक्ष (Relative) होती है और इसका मापन सम्भव नहीं है। ऐसा इसलिए कि शक्ति विभिन्न तत्वों से मिलकर बनी होती है और इन तत्वों के स्वरूप में लगातार परिवर्तन होता रहता है इसलिए शक्ति के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है।
शक्ति के स्रोत (Sources of Power): किसी राष्ट्र की शक्ति का स्रोत धन सम्पदा, प्राकृतिक संसाधन, मानव शक्ति और अस्त्र-शस्त्र मुख्य रूप से राष्ट्र की शक्ति का स्रोत हैं।
■ शक्ति को प्रयोग में लाने की पद्धति (Methods of using Power)
- समझाना-बुझाना: (वैचारिक शक्ति) विचार के द्वारा समझाना।
- प्रलोभन या आर्थिक सहायता: (दे देकर) लालच देकर।
- धमकाना या दण्ड देना: भय दिखाकर।
- बल प्रयोग या युद्ध: सैन्य कार्यवाही।
✦ 6. राष्ट्रीय शक्ति के प्रकार एवं राष्ट्रों का विभाजन
■ राष्ट्रीय शक्ति के प्रकार
किसी भी राष्ट्र की शक्ति निम्न तीन प्रकार की होती है:
-
शारीरिक शक्ति / राजनीतिक शक्ति (शक्ति प्रदर्शन):
इसके अन्तर्गत किसी राष्ट्र की सेना व अस्त्र-शस्त्र को शामिल किया जाता है। यह किसी राष्ट्र को अधिक सुरक्षित और ताकतवर बनाता है और अन्य राष्ट्र जल्दी से ऐसे राष्ट्रों से टकराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। -
आर्थिक शक्ति:
यह किसी राष्ट्र के भौतिक व प्राकृतिक संसाधन को व्यक्त करता है। जिस देश में ये संसाधन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं, वह देश आर्थिक रूप से शक्तिशाली होता है और यह उस राष्ट्र की शक्ति को व्यक्त करता है। -
वैचारिक शक्ति:
यह किसी राष्ट्र की विचारधारा को व्यक्त करता है, कि वह राष्ट्र लोकतान्त्रिक, साम्यवादी, फाँसीवादी या सैनिक तानाशाही किस प्रकार का विचार रखता है। जो देश तानाशाही या अन्य प्रकार की निरंकुश विचारधारा से ओत-प्रोत होता है, वह अधिक शक्तिशाली नहीं माना जाता है।
■ शक्ति के आधार पर राष्ट्रों का विभाजन
- 1. प्रबलतम शक्ति वाला राष्ट्र (Superpower): अमेरिका (पहले सोवियत संघ था)।
- 2. महाशक्ति वाले राष्ट्र (Great Powers): भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान आदि।
- 3. मध्यम शक्ति वाला राष्ट्र (Middle Powers)
- 4. लघु शक्ति वाला राष्ट्र (Small Powers)
- 5. उपनिवेश (Colonies): जो किसी के अधीन हों।
✦ 7. शक्ति शून्यता (Power Vacuum) एवं शक्ति के प्रमुख तत्व
■ शक्ति शून्यता (Power Vacuum)
जब किसी क्षेत्र से कोई महाशक्ति चली जाती है, तो उस क्षेत्र में शक्ति शून्य की स्थिति पैदा हो जाती है और उस शून्यता को भरने के लिए बाहरी शक्तियाँ भी आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं और क्षेत्रीय शक्तियाँ भी (जो शक्ति भारी पड़ती है वह उस शून्यता को भर देती है)।
उदाहरण: एशिया व अफ्रीका से यूरोपीय शक्तियों के जाने के बाद उस शून्यता को भरने के लिए अमेरिका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा हुई।
■ राष्ट्रीय शक्ति के प्रमुख तत्व (Elements of National Power)
किसी राष्ट्र की शक्ति कई तत्वों से मिलकर बनी होती है। इन्हीं तत्वों के स्वरूप में परिवर्तन होने से राष्ट्रीय शक्ति के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। इसलिए राष्ट्रीय शक्ति सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नहीं। हम जानते हैं कि शक्ति साधन भी है और साध्य भी।
राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्व निम्न हैं:
| 1 | भूगोल (Geography): भूगोल किसी राष्ट्र की शक्ति को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका तय करता है। किसी राष्ट्र के भूगोल के अन्तर्गत उसका क्षेत्रफल, जलवायु, स्थलाकृति, अवस्थिति आदि आता है और ये सब मिलकर किसी राष्ट्र के भूगोल को तय करते हैं। |
| 2 | प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources): यह किसी राष्ट्र का ऐसा संसाधन है जिसके आधार पर उस राष्ट्र का विकास निर्भर होता है। इसमें खाद्य सामग्री और कच्चा माल आता है। |
| 3 | जनसंख्या (Population): यह राष्ट्र की शक्ति को निर्धारित करता है। जिस राष्ट्र की जनसंख्या बहुत कम होगी वह राष्ट्र अधिक शक्तिशाली नहीं हो सकता। अधिक जनसंख्या का अर्थ केवल उसकी संख्या से नहीं होता बल्कि उसकी गुणवत्ता से होता है। वह पढ़ी-लिखी, समझदार, स्वस्थ और रोजगारपरक हो। |
| 4 | तकनीकी (Technology): राष्ट्र की वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि उच्च Technology से लागत कम आती है और वस्तु की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। |
| 5 | विचारधारा (Ideology): अर्थात् राष्ट्र किस विचारधारा से ओत-प्रोत है। लोकतान्त्रिक, फाँसीवादी या सैनिक तानाशाही। |
इसके अतिरिक्त (6) राष्ट्रीय चरित्र (National Character), (7) राष्ट्रीय मनोबल (National Morale), (8) नेतृत्व (Leadership), (9) कूटनीति (Diplomacy), (10) औद्योगिक क्षमता (Industrial Capacity), और (11) सैनिक तैयारी (Military Preparedness) भी किसी राष्ट्र की शक्ति के अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व माने जाते हैं।
✦ 8. शक्ति संतुलन (Balance of Power): अर्थ एवं रूप
शक्ति संतुलन का शाब्दिक अर्थ है कि— "विभिन्न राष्ट्र इस प्रकार समूह में बँटे जाते हैं कि कोई एक राष्ट्र या राष्ट्र समूह इतना ताकतवर न हो कि वह दूसरे पर हावी हो सके।" क्योंकि उसकी शक्ति दूसरे विरोधी समूह की शक्ति से संतुलित हो जाती है।
■ शक्ति संतुलन के दो रूप
-
सरल संतुलन (Simple Balance):
सरल संतुलन का आशय है कि समान शक्ति वाले दो राष्ट्र या राष्ट्रों का समूह एक-दूसरे की शक्ति को संतुलित कर देता है। -
बहुमुखी संतुलन (Multiple Balance):
जबकि बहुमुखी संतुलन में बहुत से राष्ट्र या राष्ट्र समूह एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। जैसे: बड़ा राष्ट्र बड़े राष्ट्र को और बड़े राष्ट्र से लगे हुए छोटे-छोटे राष्ट्र एक-दूसरे को संतुलित करते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य: शांति काल में भले ही विभिन्न प्रकार के संतुलन दिखायी पड़ते हों लेकिन युद्ध काल में या संकटकाल में केवल सरल संतुलन ही दिखायी पड़ता है।
शक्ति संतुलन पिछली चार शताब्दियों से (16वीं शताब्दी) यूरोपीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। शक्ति संतुलन में यह माना जाता है कि विभिन्न राज्यों की शक्ति दो पक्षों में समान रूप से बँटी रहे कोई भी राष्ट्र अन्य राष्ट्रों पर हावी न होने पाये और कोई भी राष्ट्र इतना शक्तिशाली न हो कि वह दूसरे पर हमला कर सके या उसे दबाने या हराने में समर्थ हो।
जिस प्रकार एक तराजू के दो पलड़े समान भार होने पर संतुलित बने रहते हैं, उसी प्रकार विभिन्न राज्यों में संधियों द्वारा शक्ति संतुलन बना रहता है।
✦ 9. शक्ति संतुलन की प्रमुख विशेषताएँ एवं लाभ
शक्ति संतुलन की कोई निश्चित परिभाषा कर पाना कठिन है।
क्लाउड जूनियर के अनुसार: "शक्ति संतुलन की कठिनाई यह नहीं है कि इसका अर्थ नहीं है परन्तु यह है कि इसके बहुत से अर्थ हैं।"
मार्टिन राइट के अनुसार: "शक्ति संतुलन की धारणा भयंकर रूप से उलझनों से भरपूर है।"
■ शक्ति संतुलन की प्रमुख विशेषताएँ
- संतुलन: शक्ति संतुलन का अर्थ है— संतुलन। जो विश्व के बदलते परिवेश में लगातार बदलता रहता है फिर भी इसमें असंतुलन निहित रहता है।
- अस्थायी व्यवस्था: शक्ति संतुलन अस्थायी और अस्थिर व्यवस्था है— संतुलन केवल कुछ ही समय के लिए होता है हरदम के लिए नहीं।
- शक्ति संतुलन मानवीय प्रयत्नों के द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है।
- शक्ति संतुलन की वास्तविक कसौटी युद्ध भी होता है अतः वास्तविक संतुलन कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है।
- इतिहासकार शक्ति संतुलन के वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण के समर्थक हैं, जबकि राजनीतिज्ञ शक्ति संतुलन का व्यक्तिनिष्ठ दृष्टिकोण रखते हैं।
- शक्ति संतुलन कभी भी शांति का उपकरण नहीं हो सकता यह युद्ध को संतुलित तो कर सकता है, लेकिन युद्ध रोकना मुश्किल होता है।
- बड़ी शक्तियाँ शक्ति संतुलन की मुख्य कार्यकर्ता हैं।
- राष्ट्रहित इसका आधार है।
■ शक्ति संतुलन का सुनहरा युग (1815-1914)
1815 से लेकर 1914 तक शक्ति संतुलन का सुनहरा युग था। 1648 की 'वेस्टफेलिया की सन्धि' द्वारा राष्ट्र राज्य व्यवस्था सुदृढ़ रूप से स्थापित हुई थी।
वूलफे तथा कोलम्बिस के अनुसार: 1648 से 1789 के मध्य शक्ति संतुलन का सुनहरा युग विद्यमान था। 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध हुआ तो शक्ति संतुलन की स्थिति बिगड़ गई। आज शक्ति संतुलन की स्थापना को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है।
■ शक्ति संतुलन से लाभ
- अंतर्राष्ट्रीय शान्ति का पोषण।
- छोटे राष्ट्रों की स्वाधीनता की सुरक्षा।
- अंतर्राष्ट्रीय कानून को कायम रखना।
✦ 10. शक्ति संतुलन स्थापित करने के साधन व पतन के कारण
■ शक्ति सन्तुलन स्थापित करने के 7 साधन
- 1. क्षतिपूर्ति (चुकाना)
- 2. हस्तक्षेप तथा अहस्तक्षेप द्वारा
- 3. मध्यवर्ती राज्य (Buffer State)
- 4. शस्त्रीकरण तथा निशस्त्रीकरण
- 5. विभाजन तथा शासन (Divide and Rule)
- 6. मैत्री सन्धियाँ
- 7. गठबन्धन
■ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शक्ति संतुलन का पतन
आज ऐसा माना जाता है कि पहले की तरह अब शक्ति सन्तुलन नहीं रह गया है बल्कि शक्ति सन्तुलन का सिद्धान्त अप्रचलित हो गया है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- यूरोपीय राजनीति का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में परिवर्तन।
- यूरोपीय शक्तियों का ह्रास।
- अमेरिका और सोवियत संघ जैसी दो महाशक्तियों के उदय के कारण विश्व द्विध्रुवीय हो गया।
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध का उदय और इसमें प्रचार-मनोवैज्ञानिक, युद्ध तथा राजनीतिक युद्ध का महत्व।
- मुख्य शक्तियों की संख्या में कमी।
- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का लुप्त होना।
- संतुलन का लुप्त होना।
- युद्ध की धारणा में परिवर्तन।
- अंतर्राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का उदय।
- परमाणु बमों का उदय।
अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में इन सभी परिवर्तनों के कारण शक्ति संतुलन सिद्धान्त का पतन हो गया। शक्ति संतुलन के स्थान पर विश्व में आतंक का संतुलन बन गया। समकालीन विश्व में एक बड़ा परिवर्तन हुआ 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व एक ध्रुवीय हो गया और शक्ति संतुलन के सिद्धान्त की धारणा लगभग समाप्त हो गयी।
आज परमाणु बमों के बढ़ते प्रभाव ने विश्व को एक ऐसे स्थान पर ला खड़ा किया है जहाँ पूरा विश्व आतंक के संतुलन में बदल गया है। ध्यान रहे कि परिस्थिति कुछ भी हो शक्ति संतुलन पूर्णतया कभी मृत नहीं होता आज भी बहुत से राज्यों के विदेश नीति के निर्माण तथा संचालन में उपदेश देता है।
आज शक्ति संतुलन केवल विश्व स्तर पर स्थापित नहीं है बल्कि आज शक्ति संतुलन की चर्चा विभिन्न क्षेत्रों में भी किया जाता है जैसे- एशिया, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप।
✦ 11. सामूहिक सुरक्षा (Collective Security): अर्थ एवं मान्यताएँ
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति स्थापित करने और आक्रमण का निवारण करने की एक युक्ति (प्रक्रिया) के रूप में सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का विशेष महत्व है। सामूहिक सुरक्षा किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन के द्वारा लागू की जाती है, और यह निशस्त्रीकरण के साथ निकट जुड़ी है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रों को सुरक्षा प्रदान करने वाली अवधारणा को सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा कहा जाता है। यह शान्ति को कायम करने तथा युद्ध का प्रतिकार करने का एक तरीका है।
सामूहिक सुरक्षा शब्द के वैसे तो अनेक अर्थ निकलते हैं, लेकिन मुख्य बात यह है कि, इस व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न राष्ट्र सामूहिक रूप से मिलकर किसी सम्भावित आक्रमण का विरोध करने के लिए कृतसंकल्प हो जाते हैं। किसी राष्ट्र के ऊपर होने वाला आक्रमण सभी राष्ट्रों पर किया गया आक्रमण समझा जायेगा और सामूहिक रूप से सभी राष्ट्र संगठित होकर उस आक्रमण का विरोध करेंगे।
सामूहिक सुरक्षा का मूलमंत्र है — "एक सबके लिए और सब एक के लिए" (One for all and all for one)।
जॉर्ज स्वार्जन बर्गर के अनुसार:
"एक सुप्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के आधार पर हमले को रोकने के लिए यह विभिन्न राज्यों द्वारा सम्पादित कार्यवाही करने का एक साधन है।"
संक्षेप में सामूहिक सुरक्षा से निम्नलिखित अर्थ निकलता है:
- किसी एक राज्य पर किया गया हमला सब राज्यों पर हमला माना जाएगा।
- किसी राष्ट्र विशेष की सुरक्षा अकेले उसी राष्ट्र के विषय के चिंता का विषय नहीं बल्कि सारे अंतरराष्ट्रीय समाज की चिंता का विषय है।
- यदि एक राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा पैदा करता है तो खतरा ग्रस्त राष्ट्र की तरफ से बाकी सब राष्ट्र कार्य करेंगे।
- आक्रमणकारी के अलावा और राष्ट्रों के बीच सहयोग सामूहिक सुरक्षा का सार तत्व है।
निष्कर्ष: हो सकता है कि इस सहयोग के डर से आक्रमणकारी आक्रमण का विचार ही बंद कर दें।
■ सामूहिक सुरक्षा की 6 सैद्धान्तिक मान्यताएँ
मार्गेन्थाऊ, आर्गेन्स्की, डा. नायडू तथा आईनिस क्लाड की मान्यताओं का विश्लेषण करने पर सामूहिक सुरक्षा के सम्बन्ध में निम्न मान्यताएँ उभरती हैं:
- सभी राष्ट्र आक्रमणकारी को पहचानते हैं।
- आक्रमण को रोकने में सभी की समान रुचि होती है।
- सभी राष्ट्रों में आक्रमण का प्रतिकार करने की क्षमता होती है।
- आक्रमणकारी राज्य की अपेक्षा श्रेष्ठ समग्र राष्ट्रों की शक्ति अधिक होती है।
- विश्व शांति शक्ति की अधिकता पर आधारित है।
- राष्ट्रों को आपसी मतभेद भुलाकर आक्रमणकारी के विरुद्ध सदैव तत्पर रहना चाहिए।
✦ 12. सामूहिक सुरक्षा के विचार का विकास एवं मोर्चाबन्दी
सामूहिक सुरक्षा का विचार सर्वप्रथम 17वीं शताब्दी में ओसनाब्रुक (Osnabrück) की सन्धि से माना जाता है। विलियम पेन ने सर्वप्रथम यूरोप में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिए इस प्रकार की व्यवस्था का सुझाव दिया था लेकिन वास्तविक रूप से इस पद्धति का विकास 20वीं शताब्दी में हुआ।
1910 में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कहा था— "जो महाशक्तियाँ शांति में विश्वास करती हैं उन्हें एक शान्ति संगठन बना लेना चाहिए ताकि उनके मध्य शान्ति बनी रहे और किसी राष्ट्र द्वारा इसे भंग किया जाता है तो वे सामूहिक रूप से मिलकर उसके विरुद्ध बल का प्रयोग करें।"
इस विचार को वूडरो विल्सन ने लोकप्रिय बनाया और उनके प्रयासों से 1920 में राष्ट्र संघ (League of Nations) बना। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने पर यह असफल हो गया। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना हुई जो सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त पर आधारित है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अध्याय 7 तथा महासभा के 'शान्ति के लिए एकता' प्रस्ताव द्वारा सामूहिक सुरक्षा पद्धति का विकास किया गया।
इसी विचार के आधार पर सोवियत संघ की समाजवादी पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री ब्रेझनेव ने सन् 1969 में एशियाई सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
■ सामूहिक सुरक्षा एवं सामूहिक मोर्चाबन्दी में अन्तर
सामूहिक मोर्चाबन्दी सिद्धान्त के अन्तर्गत थोड़े राज्यों को ही आपसी सहयोग अस्थायी एवं तदर्थ (Temporary) रूप में देखा जाता है जबकि सामूहिक सुरक्षा सिद्धान्त के अन्तर्गत सभी राष्ट्र एकजुट होकर आक्रमणकारी का विरोध करते हैं और विश्व शान्ति की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
- सामूहिक मोर्चाबन्दी: इसके अन्तर्गत नाटो (NATO), सीटो (SEATO), सेन्टो (CENTO), वारसा पैक्ट (Warsaw Pact) जैसे संगठन बने और इसका निर्माण दुश्मन को ध्यान में रखकर किया जाता है।
- सामूहिक सुरक्षा: का सिद्धान्त किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन के माध्यम से लागू किया जाता है और इसमें शत्रु को ध्यान में नहीं रखा जाता है।
दोनों में मात्र समानता इतना ही है कि दोनों आक्रमणकारी पर सामूहिक कार्यवाही करते हैं और प्रतिरोध (बदला) की प्रतिबद्धता दोनों में नजर आती है।
✦ 13. शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा में समानताएँ
सामूहिक सुरक्षा व शक्ति संतुलन दोनों ही शक्ति प्रबन्ध के दो लोकप्रिय साधन हैं, जिनमें कुछ समानता तथा कुछ असमानताएँ भी हैं।
क्विंसी राइट के शब्दों में:
"शक्ति संतुलन का सामूहिक सुरक्षा से सम्बन्ध पूरक तथा विरोधी दोनों ही है।"
■ समानताएँ (Similarities)
- दोनों सुरक्षात्मक प्रकृति के हैं अर्थात् दोनों का उद्देश्य व्यवस्था में शामिल राज्यों की सुरक्षा करना है।
- दोनों के साधनों में समानता है अर्थात्— दोनों शक्ति का आधिपत्य बनाते हैं ताकि युद्ध को रोका जाय।
- दोनों युद्ध को एक साधन के रूप में स्वीकार करते हैं।
- दोनों यह मानते हैं कि जो राज्य आक्रमण में शामिल नहीं होते वे भी शान्ति एवं सुरक्षा के लिए युद्ध में शामिल होने के लिए तैयार होते हैं।
- दोनों शक्ति के बड़े केन्द्रीकरण को खतरा मानते हैं क्योंकि इससे शान्ति स्थापित करने में मुश्किल होगी।
- दोनों आक्रमण की समाप्ति के लिए सैनिक सहयोग में विश्वास करते हैं।
✦ 14. शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा में अन्तर (असमानताएँ)
| शक्ति संतुलन (Balance of Power) | सामूहिक सुरक्षा (Collective Security) |
|---|---|
|
|
- नोट 1: सामूहिक सुरक्षा और निशस्त्रीकरण एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं क्योंकि दोनों का उद्देश्य शान्ति की स्थापना करना है और ये दोनों विचारधारा U.N.O. के चार्टर 7 में निहित शान्ति के लिए एकता का प्रस्ताव के अनुकूल हैं।
- नोट 2: संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त को लागू किया जा सकता है— कोरिया संकट (1950), इराक संकट (1990-91), स्वेज नहर संकट, अफगानिस्तान संकट आदि जैसे मामले सामूहिक सुरक्षा के उदाहरण हैं लेकिन यह प्रक्रिया तभी अपनायी जा सकती है जब सुरक्षा परिषद् के पाँचों सदस्य अपनी सहमति दे दें।
✦ 15. शीत युद्ध (Cold War): अर्थ, उदय एवं प्रमुख परिभाषाएँ
शीत युद्ध एक ऐसा युद्ध है, जो विचारों से लड़ा जाता है हथियारों से नहीं। इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे— वैचारिक युद्ध, मनोवैज्ञानिक युद्ध, राजनीतिक युद्ध, स्नायु युद्ध (Nerve War), वाक युद्ध (War of words)।
शीत युद्ध का उदय द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ जब यूरोपीय शक्तियों का ह्रास हुआ और विश्व में अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) जैसी दो महाशक्तियों का उदय हुआ। ये दोनों महाशक्तियाँ शक्ति में लगभग बराबर थीं लेकिन विचारधारा में एक-दूसरे के विपरीत थीं। अतः दोनों महाशक्तियों के आपसी वैचारिक टकराव को ही शीत युद्ध का नाम दिया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ और अमेरिकी सम्बन्धों में कटुता, तनाव, वैमनस्य आदि की वृद्धि होती गयी। यह युद्ध एक-दूसरे के विरुद्ध पत्र-पत्रिकाओं, जासूसी आदि के द्वारा लड़ा गया।
K.P.S. मेनन के अनुसार:
"यह दो महाशक्तियों, दो विचारधाराओं, दो पद्धतियों और दो व्यक्तियों के बीच आपसी टकराव था।
• ये महाशक्तियाँ थीं — अमेरिका व सोवियत संघ
• विचारधारा थी — पूँजीवाद और साम्यवाद
• पद्धतियाँ थीं — उदारवादी लोकतंत्र और जनवादी लोकतंत्र
• तथा व्यक्ति थे — डगलस, फॉलेस और स्टालिन (Stalin)।"
यह एक राजनीतिक या कूटनीतिक युग था जिसमें शत्रु को अकेला करने और मित्रों की खोज करने की चतुराई भी प्रारम्भ हुई। दोनों महाशक्तियों ने तृतीय विश्व के नवोदित राष्ट्रों को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए हर सम्भव तरीका अपनाया।
✦ 16. शीत युद्ध के दौरान अपनाये गए 7 प्रमुख साधन
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों ने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए निम्न साधन अपनाए:
- 1. सांस्कृतिक घुसपैठ।
- 2. विचारधारा का प्रचार।
- 3. आर्थिक सहायता की आड़ में प्रभाव।
- 4. सैनिक संगठनों की स्थापना।
- 5. सैनिक अड्डों की स्थापना।
- 6. खुफिया संगठनों के षड्यन्त्र।
- 7. वैज्ञानिक घुसपैठ।
✦ 17. शीत युद्ध के विभिन्न चरण: पहला चरण (1946-1952)
शीत युद्ध कई चरणों से होकर गुजरा। इस शीत युद्ध के दौरान कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जो शीत युद्ध को बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा कीं।
■ पहला चरण (1946 से 1952 तक)
इस दौरान निम्नलिखित 9 प्रमुख घटनाएँ घटीं:
-
चर्चिल का फुल्टन में भाषण (5 मार्च 1946):
अमेरिका के 'फुल्टन' नामक स्थान पर भाषण देते हुए चर्चिल ने साम्यवाद को फाँसीवाद से अधिक खतरनाक बताया, जिसे सोवियत खेमे ने अपने विरुद्ध माना। -
ट्रूमैन सिद्धान्त (12 मार्च 1947):
अमेरिका की तरफ से कहा गया कि संसार में जहाँ कहीं भी शान्ति को भंग करने वाला परोक्ष या अपरोक्ष आक्रामक कार्य होगा, वहाँ अमेरिका सुरक्षा संकट समझेगा और उसे रोकने का हरसम्भव प्रयास करेगा। -
मार्शल योजना (5 जून 1947):
विश्व को साम्यवादी क्रान्ति के खतरे से बचाने के लिए अमेरिका ने मार्शल योजना की घोषणा की। अमेरिकी विदेश सचिव मार्शल ने कहा कि— "इस समय यदि अमेरिका ने पुनरुत्थान का प्रयास नहीं किया गया तो वह (यूरोप) साम्यवादी हो जायेगा।" -
कोमकोन (COMECON) योजना (अक्टूबर 1947):
मार्शल योजना का जवाब देने के लिए सोवियत संघ ने इसका गठन कर दिया। इसका उद्देश्य फ्रांस और इटली सहित यूरोप के साम्यवादी दलों को संगठित करना था। इससे अमेरिका तथा पश्चिम यूरोप के देश इसके खिलाफ हो गये। -
नाटो (NATO) का गठन (4 अप्रैल 1949):
अमेरिका के नेतृत्व में कनाडा और पश्चिमी यूरोप के 10 देशों को मिलाकर नाटो नामक सैन्य संगठन का गठन किया गया। इसमें यह तय हुआ कि यदि नाटो के किसी एक देश पर हमला होगा तो अमेरिका उसका मुँहतोड़ जवाब देगा। -
बर्लिन की घेराबन्दी (1 मार्च 1948):
रूस ने स्थानीय मुद्रा विषयक झगड़े का बहाना बनाकर पश्चिमी बर्लिन के स्थल और जलमार्ग सभी की घेराबन्दी कर दी। हालाँकि यह बाद में समाप्त कर दिया गया, फिर भी जर्मनी दोनों महाशक्तियों के युद्ध का क्रीड़ा स्थल बन गया। -
चीनी क्रान्ति (1949):
1949 में चीनी क्रान्ति हुई और चीन में साम्यवाद की स्थापना हो गई, जिससे अमेरिका की चुनौती बढ़ गयी। -
कोरिया संकट (1950):
1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया, दोनों महाशक्तियाँ इस संकट को लेकर आमने-सामने खड़ी हो गयीं। -
अमेरिका-जापान सन्धि (1951):
1951 में अमेरिका, जापान सन्धि हुई जिसे सोवियत संघ ने अपने विरुद्ध माना।
✦ 18. द्वितीय चरण (1953-1958): सैन्य गठबंधनों का युग
इस चरण में शीत युद्ध का विस्तार हुआ और पूरे विश्व में अशान्ति का वातावरण फैल गया:
- 1953 में सोवियत संघ ने भी परमाणु परीक्षण कर लिया। अतः अब दोनों शक्तियाँ परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बन गये।
- 1953 में हिंद, चीन देशों में दोनों महाशक्तियाँ अपनी-अपनी सरकारें स्थापित करने का प्रयास करने लगीं।
- 1954 में तीसरी दुनिया के देशों में साम्यवाद का प्रसार रोकने के लिए अमेरिका ने अन्य देशों के साथ मिलकर सीटो (SEATO) और सेन्टो (CENTO) नामक सैनिक संगठन का गठन किया।
-
वारसा पैक्ट (Warsaw Pact):
सोवियत संघ ने 14 मई 1955 को पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ मिलकर वारसा पैक्ट संगठन बनाया। यह एक प्रकार से नाटो का जवाब था। (जुलाई 1991 में सोवियत संघ का विघटन होने के बाद वारसा पैक्ट समाप्त हो गया लेकिन नाटो अब भी बना हुआ है।) -
आइजनहावर सिद्धान्त (जून 1957):
अमेरिका की काँग्रेस ने राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया कि पश्चिम एशिया के किसी भी देश में यदि कोई साम्यवादी आक्रमण होता है तो राष्ट्रपति अपने विवेक से सेना भेज सकता है। इससे पश्चिम एशिया में शीत युद्ध की गर्मी बढ़ गई। -
स्वेज नहर संकट (1956):
1956 में मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके जवाब में ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र पर हमला किया, जिसकी सोवियत संघ ने कटु आलोचना की।
✦ 19. तृतीय चरण (1959-1962): यू-2 विमान व क्यूबा संकट
इस चरण में सम्बन्धों में सुधार के प्रयास हुए लेकिन अंततः तनाव अपने चरम पर पहुँच गया:
- सोवियत संघ में सत्ता परिवर्तन हुआ और 1958 में ख्रुश्चेव (Khrushchev) ने सत्ता सम्भाला। 1959 में ख्रुश्चेव ने अमेरिका की यात्रा की। अंतर्राष्ट्रीय तनाव को दूर करने के लिए आइजनहावर के साथ 'कैम्प डेविड' में समझौता हुआ। 1960 में पेरिस शिखर सम्मेलन तय हुआ।
- 1960 में अमेरिका का U-2 विमान सोवियत संघ में जासूसी करते हुए पकड़ा गया, जिससे सोवियत संघ काफी नाराज हुआ।
- 1960 में जब पेरिस शिखर सम्मेलन हुआ तो उसकी असफलता हाथ लगी। यहाँ तक कि ख्रुश्चेव ने आइजनहावर से हाथ मिलाने से इन्कार कर दिया।
- 1961 में कैनेडी (Kennedy) अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। दोनों नेताओं ने शीत युद्ध में कमी की आशा जताई।
🚨 क्यूबा मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis - 1962)
क्यूबा अमेरिका के निकट एक टापू है। 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में वहाँ साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई, जिससे अमेरिका की चिन्ता बढ़ गयी।
1962 में सोवियत संघ ने वहाँ एक सैनिक अड्डा स्थापित कर दिया और एक मिसाइल लगाकर उसका मुँह अमेरिका की तरफ कर दिया। अमेरिका ने धमकी दिया कि- यदि सैनिक अड्डा तत्काल नहीं हटा दिया जाता है तो अमेरिका आक्रमण करके क्यूबा को नष्ट कर देगा।
अंततः सोवियत संघ ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सैनिक अड्डा हटा लिया। यह संकट शीत युद्ध की पराकाष्ठा था और तीसरा विश्व युद्ध होते-होते टल गया। इसलिए क्यूबा संकट को शीत युद्ध की चरम-सीमा (Climax) माना जाता है।
✦ 20. चौथा चरण (देतांत / तनाव शैथिल्य): प्रमुख सन्धियाँ
इसे देतांत (Detente) या तनाव शैथिल्य का काल कहा जाता है। इस दौरान दोनों महाशक्तियों ने कुछ ऐसा कार्य किया जिससे शीत युद्ध में नरमी लाने का संकेत मिलता है। इस दौरान निम्नलिखित घटनाएँ घटीं:
-
हॉट लाइन समझौता (1963):
वाशिंगटन और क्रेमलिन के बीच हॉट लाइन (Hotline) की व्यवस्था हुई। अर्थात् दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष फोन पर आपस में बातचीत करके तनाव कम करने का प्रयास करेंगे। -
पी.टी.बी.टी. (PTBT - 25 जुलाई 1963):
आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि मास्को में अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के बीच हुई। यह तय हुआ कि स्थल को छोड़कर अन्य कहीं परमाणु परीक्षण नहीं किया जायेगा। भारत ने इसका समर्थन किया। फ्रांस इसमें शामिल नहीं हुआ और चीन ने इसका विरोध किया। -
एन.पी.टी. (NPT - 1968):
पाँच परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों (अमेरिका, सोवियत संघ, इंग्लैण्ड, फ्रांस व चीन) ने परमाणु अप्रसार सन्धि पर समझौता किया। इसमें कहा गया कि— जल, थल, वायु कहीं भी परमाणु परीक्षण नहीं किया जायेगा। इन पाँचों को छोड़कर अन्य कोई देश परीक्षण नहीं करेंगे और जबकि ये पांच देश अपनी प्रयोगशाला में परमाणु परीक्षण कर सकते हैं और ये देश अपना टेक्नोलॉजी अन्य किसी को नहीं देंगे। -
बर्लिन समझौता (1971):
इसमें तय हुआ कि पूर्वी बर्लिन के लोग पश्चिमी बर्लिन और पश्चिमी बर्लिन के लोग पूर्वी बर्लिन जा सकते हैं।
तनाव पुनः प्रकटन: उपर्युक्त कारण तनाव शैथिल्य के रहे लेकिन इसी दौरान कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी बनीं कि तनाव पुनः प्रकट होने लगा। जैसे— 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में सोवियत संघ ने भारत का और अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया। 1971 में ही 'भारत-सोवियत संघ 20 वर्षीय मैत्री सन्धि' हुई। 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार की स्थापना कर दी और उसका समर्थन भारत ने भी किया। 1779 मे अमेरिका ने हिन्द महासागर के डियागो गार्सिया में सैनिक अड्डा स्थापित कर दिया।
✦ 21. नव शीत युद्ध (1980-1989) एवं 'स्टार वार्स'
अतः दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव पुनः बढ़ गया और शीत युद्ध नये सिरे से प्रारम्भ हो गया जिसे नव शीत युद्ध (New Cold War) कहा गया।
जहाँ परम्परागत शीत युद्ध जमीन पर लड़ा गया, वहीं नव शीत युद्ध का केन्द्र अन्तरिक्ष रहा। इसे 'नक्षत्र युद्ध' (Star Wars) के नाम से भी जाना जाता है। इस शीत युद्ध की शुरुआत अमेरिका में राष्ट्रपति रीगन (Reagan) के सत्ता में आने से हुई। राष्ट्रपति रीगन ने अमेरिका को पुनः शस्त्रीकरण करने, अस्त्र उद्योगों को बढ़ावा देने, मित्र राष्ट्रों का शस्त्रीकरण करने और सोवियत संघ के प्रति कठोर नीति अपनाने पर जोर दिया।
- 1983 में दक्षिण कोरिया के विमान को सोवियत संघ द्वारा मार गिराया गया।
- 1986 में अमेरिकी 'स्टार वार' कार्यक्रम के विरुद्ध सोवियत संघ ने भी जवाबी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी।
- 1987 में अमेरिका को चुनौती दिया कि यदि वह परमाणु परीक्षण बंद नहीं किया तो वह भी प्रारम्भ कर देगा।
- 1988 में राष्ट्रपति रीगन ने अमेरिकी काँग्रेस में एक प्रस्ताव पेश करके स्पष्ट किया कि सोवियत संघ के प्रति अभी भी अविश्वास की नीति बनी हुई है।
✦ 22. सोवियत संघ का विघटन एवं शीत युद्ध का अंत
1989 में बर्लिन की दीवार गिरा दी गयी और जर्मनी का एकीकरण हो गया। चूँकि जर्मनी ही शीत युद्ध की क्रीड़ा स्थली था, एकीकरण से शीत युद्ध समाप्त हो गया।
1987 में मिखाइल गोर्बाच्योव (Gorbachev) सोवियत संघ की सत्ता में आये और उन्होंने देखा कि सोवियत संघ की आर्थिक हालत काफी खराब हो चुकी है, अतः सभी को साथ लेकर चलना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने दो प्रमुख नीतियाँ प्रस्तुत कीं:
- 1. पेरेस्त्रोइका (Perestroika): पुनर्निर्माण / सुधार
- 2. ग्लासनोस्त (Glasnost): खुलापन / अलगाव
जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जुलाई 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। 15 राष्ट्र अलग हो गये, अब केवल 'रूस' बचा। अतः एक महाशक्ति का अंत हो गया। इसी के साथ वारसा पैक्ट भी समाप्त हो गया (लेकिन नाटो अब भी बना हुआ है)।
विश्व द्विध्रुवीय से एक ध्रुवीय (Unipolar) हो गया और शीत युद्ध का अंत हो गया।
भले ही शीत युद्ध का अंत हो गया हो, लेकिन आज परमाणु बम के उदय ने तथा अस्त्र-शस्त्र के विकास ने शक्ति संतुलन को आतंक के संतुलन में बदल दिया है। आज भी दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप में भी शीत युद्ध विद्यमान है। आज इसका स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय न होकर क्षेत्रीय हो गया है।
✦ 23. विश्व राजनीति पर शीत युद्ध का प्रभाव
■ शीत युद्ध का विश्व राजनीति पर प्रभाव
- विश्व का दो गुटों में विभाजित होना।
- आतंक और अविश्वास के दायरे का विस्तार।
- आणविक युद्ध (Nuclear War) की सम्भावना का भय।
- सैनिक संधियों एवं सैनिक गठबन्धनों का बाहुल्य।
- अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सैनिक दृष्टिकोण का पोषण।
- संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का पंगु (कमज़ोर) होना।
✦ 24. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
भाग 1 से लेकर भाग 23 तक के इस विस्तृत अध्ययन से हम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप, शक्ति संघर्ष की प्रवृत्तियों और विश्व व्यवस्था के ऐतिहासिक घटनाक्रम का एक समग्र मूल्यांकन कर सकते हैं। इस पूरी अध्ययन सामग्री का निचोड़ निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है:
-
नव-उपनिवेशवाद और राष्ट्रीय शक्ति (भाग 1 से 7):
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पारंपरिक साम्राज्यवाद का पतन हो गया, परंतु विकसित देशों (विशेषकर अमेरिका) ने आर्थिक सहायता, बहु-राष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) और तकनीकी एकाधिकार के जरिए 'नव-उपनिवेशवाद' को जन्म दिया। इसके केंद्र में 'राष्ट्रीय शक्ति' (National Power) की अवधारणा रही। मार्गेन्थाऊ और मैकाइवर जैसे विद्वानों ने स्पष्ट किया कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का मूल उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना और उसे बनाए रखना है। भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, तकनीक और विचारधारा किसी भी राष्ट्र की शक्ति के प्रमुख तत्व होते हैं। -
शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा (भाग 8 से 14):
विश्व शांति बनाए रखने के लिए राष्ट्रों ने 'शक्ति संतुलन' (Balance of Power) का सहारा लिया, जहाँ शस्त्रीकरण, संधियों और गठबंधनों के जरिए विरोधी की शक्ति को संतुलित किया जाता था। परंतु इसके अस्थिर और प्रतियोगी स्वभाव के कारण इसका पतन हुआ। इसके विकल्प के रूप में 'सामूहिक सुरक्षा' (Collective Security) की अवधारणा विकसित हुई, जिसका मूलमंत्र था— "एक सबके लिए और सब एक के लिए"। राष्ट्र संघ (League of Nations) और बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का निर्माण इसी शांतिपूर्ण और सहयोगी विश्वपरक व्यवस्था की दिशा में उठाया गया कदम था। -
शीत युद्ध का उद्भव और विकास (भाग 15 से 21):
सामूहिक सुरक्षा के बावजूद द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद दुनिया पूंजीवाद (अमेरिका) और साम्यवाद (सोवियत संघ) के बीच एक वैचारिक 'शीत युद्ध' में फँस गई। ट्रूमैन सिद्धांत, मार्शल योजना, और नाटो बनाम वारसा पैक्ट जैसे सैन्य गठबंधनों ने विश्व को दो गुटों में बाँट दिया। 1962 के 'क्यूबा मिसाइल संकट' ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया। हालांकि 'देतांत' (Hotline, PTBT, NPT) के जरिए तनाव कुछ कम हुआ, लेकिन 1980 के दशक में 'नक्षत्र युद्ध' (Star Wars) के साथ 'नव-शीत युद्ध' ने अंतरिक्ष तक अपनी पहुँच बना ली। -
सोवियत विघटन और विश्व राजनीति पर प्रभाव (भाग 22 से 23):
अंततः 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और मिखाइल गोर्बाच्योव की सुधारवादी नीतियों (पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त) के कारण 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसी के साथ द्विध्रुवीय विश्व समाप्त होकर एकध्रुवीय (Unipolar) अमेरिकी वर्चस्व में बदल गया। शीत युद्ध ने भले ही दुनिया को अविश्वास, हथियारों की अंधी होड़ और आतंक के संतुलन (Balance of Terror) में धकेल दिया हो, लेकिन इसने नवोदित राष्ट्रों को 'गुटनिरपेक्षता' का मार्ग चुनने का अवसर भी दिया।
🎯 अंतिम सार (Final Word)
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की यह पूरी यात्रा यह सिद्ध करती है कि विश्व पटल पर राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। साधन चाहे आर्थिक दबाव के हों (नव-उपनिवेशवाद), संधियों के हों (शक्ति संतुलन), या वैचारिक टकराव के हों (शीत युद्ध)—मूल लक्ष्य हमेशा राष्ट्रीय शक्ति का विस्तार और संवर्धन ही रहा है। यद्यपि शीत युद्ध का अंत हो चुका है, किंतु परमाणु हथियारों की होड़ और महाशक्तियों की कूटनीति के रूप में शक्ति संघर्ष का यथार्थ आज भी कायम है।
📝 अपनी तैयारी परखें!
अगर आपने शीत युद्ध (Cold War) के कारण, चरण और प्रभावों को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रेक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।
👉 Political Science MCQs प्रैक्टिस सेट हल करें
