| अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध (International Politics & Relations) |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष लेख में अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें राजनीति का मूल अर्थ (शक्ति संघर्ष), अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति एवं इसके तीन प्रमुख तत्व (राष्ट्रीय हित, विवाद, शक्ति), और अंतरराष्ट्रीय राजनीति व संबंधों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है। इसके अलावा, समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले कारकों का भी गहराई से विश्लेषण किया गया है। यह हस्तलिखित नोट्स PGT, TGT, GIC और NET-JRF,UPSC, PCS (राजनीति विज्ञान) परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। |
📚 विषय सूची (Table of Contents)
- 1. अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध: एक परिचय
- 2. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति एवं 3 प्रमुख तत्व
- 3. अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नामकरण एवं विवाद
- 4. अंतरराष्ट्रीय राजनीति बनाम अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध (अंतर)
- 5. समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले तत्व
- 6. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विकास के 4 चरण
- 7. प्रथम महान बहस: आदर्शवाद V/S यथार्थवाद
- 8. द्वितीय महान बहस: परम्परावाद V/S विज्ञानवाद
- 9. हंस मार्गेन्थाऊ का यथार्थवादी सिद्धान्त एवं आलोचना
- 10. नव-यथार्थवाद (Neo-Realism) एवं केनेथ वाल्ट्ज़
✦ 1. अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध: एक परिचय
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अर्थ समझने के लिए राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ समझना आवश्यक है। राजनीति को आज शक्ति अर्जन के रूप में जाना जाता है, इसलिए आज राजनीति में संघर्ष होता है। अतः राजनीति को 'पावर स्ट्रगल' (Power Struggle) के रूप में देखा जा सकता है।
राजनीति की उत्पत्ति मानवीय आवश्यकताओं के चलते होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी इच्छाये व आवश्यकताएं होती हैं। इसी के चलते व्यक्ति एक-दूसरे के सम्पर्क में आता है और इससे विभिन्न समूहों या गुटों का जन्म होता है। विभिन्न समूहों की इच्छाये व आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं, इसलिए उनके बीच टकराव होता है, इसी को विवाद या संघर्ष (Dispute/Conflict) कहा जाता है। प्रत्येक समूह अपने हितों को अधिकतम मात्रा में प्राप्त करने के लिए शक्ति का प्रयोग करता है।
"राजनीति एक ऐसी कला है जिसके द्वारा प्रत्येक समूह दूसरे समूह पर किसी न किसी प्रकार का नियंत्रण रखकर अपने हितों को निरन्तर आगे बढ़ाने का प्रयत्न करता है।"
उपर्युक्त से स्पष्ट है कि राजनीति के लिए निम्नलिखित तीन तत्वों का होना आवश्यक है:
- समूहों का अस्तित्व (राजनीतिक दल के रूप में)
- उनके बीच मतभेद / विवाद / संघर्ष
- दूसरे के कार्य को नियंत्रित करने का प्रयत्न
राष्ट्रीय राजनीति की परिभाषा करते हुए यह कहा जा सकता है: "दो या अधिक समूहों के बीच शक्ति प्राप्ति करने के लिए आपस में किया गया संघर्ष ही राष्ट्रीय राजनीति कहलाता है।" उपर्युक्त तीनों में 'विवाद' का सर्वाधिक महत्व है।
बर्ट्रेन्ड डी जुवेनल (Bertrand de Jouvenel) ने 'विवाद' को — 'राजनीति की आत्मा या जड़ बताया है।' विवाद अमूर्त है, झगड़ा उसका मूर्त रूप। विवाद के कारण झगड़े होते हैं और झगड़े के कारण विवाद बने रहते हैं।
विवाद ही राजनीति को संचालित करने का सबसे बड़ा माध्यम है। लेकिन विवाद इतना अधिक न हो कि समझौते की कोई गुंजाइस न रह जाय, लेकिन विवाद इतना कम भी न हो कि समझौता आसानी के साथ हो जाय। अतः स्पष्ट है कि राजनीति का मूल अर्थ— शक्ति प्राप्ति करने के लिए किया गया संघर्ष है।
"राजनीति एक ऐसी प्रतिक्रिया है जिसमें हम परिस्थितियों के अनुसार दूसरों के साथ ऐसा सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करते हैं जिसमें अपने लक्ष्य की अधिक से अधिक प्राप्ति हो सके।"
✦ 2. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति एवं 3 प्रमुख तत्व
अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध को दो पक्षों में देखा जा सकता है:
➔ IR is a applied form of IP (अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध, अंतरराष्ट्रीय राजनीति का व्यावहारिक रूप है)।
सकारात्मक (सार्वजनिक हित)
(नीति: सार्वजनिक कल्याण हेतु के विषय हेतु किया गया कार्य ➔ नागरिक के लिए)
➔ वर्तमान में शक्ति का राज्य (शक्ति संघर्ष) है, शक्ति प्राप्ति के लिए।
शक्ति (बल प्रयोग + दण्ड + हिंसा) = प्रभाव
| राष्ट्रीय राजनीति | शक्ति प्राप्त करना (राजनीतिक दल द्वारा) |
| अंतरराष्ट्रीय राजनीति | राष्ट्र (राष्ट्र राजनीति करते हैं) |
विवाद: अमूर्त (Dispute) ➔ झगड़ा: मूर्त रूप
शक्ति संघर्ष = Power Politics
• फासीवाद - राज्य पर बल देता है।
• "विवाद को राजनीति की जड़ बताया" - जुवेनल
■ अंतरराष्ट्रीय राजनीति के 3 प्रमुख तत्व
जहाँ राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक दल राजनीति करते हैं और दलों के बीच शक्ति प्राप्त करने के लिए दोनों में टकराव होता है, वहीं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्र राजनीति करते हैं और राष्ट्रों के बीच शक्ति प्राप्त करने के लिए आपस में टकराव होता है। क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र का उद्देश्य अपने राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति है और प्रत्येक राष्ट्र के राजनीति अलग-अलग होते हैं, इसलिए उनके बीच विवाद उत्पन्न हो जाता है और शक्ति तब ज्यों का त्यों बना रहता है।
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी निम्न तीन तत्व हैं:
- राष्ट्रीय हित (लक्ष्य)
- विवाद (प्रकृति)
- शक्ति (साधन)
अतः स्पष्ट है कि राष्ट्रों के बीच शक्ति प्राप्ति करने के लिए आपस में किया गया संघर्ष ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति है।
इन तीनों में विवाद सर्वोपरि है क्योंकि यदि विवाद नहीं होगा तो राष्ट्रीय हित की सुरक्षा उत्पन्न नहीं होगी और शक्ति प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होगी। शक्ति साधन और साध्य दोनों है। शक्ति सापेक्ष है इसे मापा नहीं जा सकता।
अतः स्पष्ट है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों में ही संघर्ष को महत्व दिया गया है। लेकिन ये कहना कि 'केवल संघर्ष ही राजनीति है', राजनीति का केवल एक पक्ष होगा क्योंकि राजनीति में सहयोग भी होता है। इसीलिए राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन की सरकारें बनती हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अंतरराष्ट्रीय संधियां होती हैं और विभिन्न प्रकार के संगठनों का जन्म होता है।
अतः स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संघर्ष और सहयोग दोनों के लक्षण पाये जाते हैं और यही दोनों मिलकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को गतिशीलता प्रदान करते हैं। इन दोनों में संघर्ष का ज्यादा योगदान है क्योंकि यदि संघर्ष ही न होता तो सहयोग की क्या आवश्यकता होती। इस प्रकार संघर्ष गाड़ी का अगला पहिया तो सहयोग पिछला पहिया।
✦ 3. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नामकरण की समस्या
इसके लिए विश्व राजनीति, अंतरराष्ट्रीय मामले, विश्व मामले और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।
स्पाइरो (Spiro) जैसे लेखक इसे 'विश्व राजनीति' की संज्ञा देते हैं लेकिन यह उचित नहीं है क्योंकि विश्व राजनीति कायम होने के बाद भी राज्यों के आपसी राजनीति विश्व संस्थाओं में चलेगी। आज विश्व राज्य के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट राष्ट्र की सम्प्रभुता (Sovereignty) है। यदि ऐसा न होता तो विश्व राजनीति का निर्माण उसी प्रकार से सम्भव हो सकता है जैसे किसी राष्ट्र को लेकर राष्ट्रीय राजनीति होती है।
अंतरराष्ट्रीय मामले और विश्व मामले एक दूसरे के पूरक हैं। ये किसी राजनीति को व्यक्त नहीं करते बल्कि किसी आश्चर्यजनक या विस्मयकारी घटना को अभिव्यक्त करते हैं। जैसे इंडिया में चार आँखों वाला और चार पैरों वाला बच्चे ने जन्म दिया। यह एक अंतरराष्ट्रीय मामला हो सकता है।
✦ 4. अंतरराष्ट्रीय राजनीति बनाम अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध (अंतर)
अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध (International Relations): इसके अन्तर्गत राष्ट्रों के आपसी सारे सम्बन्धों की विवेचना किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अंतर्गत— आर्थिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कानूनी, राजनीतिक, खोज एवं अन्वेषण, अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन, रेड क्रास, पर्यटन, व्यापार, आवागमन, संचार, नैतिकता आदि सभी प्रकार के सम्बन्ध आ जाते हैं। इससे विभिन्न राष्ट्रों के सम्पर्क, सहयोग, क्रिया-प्रतिक्रिया का बोध होता है।
यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक सम्बन्धों का रूप है। इसलिए यह कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध कोई विषय न होकर सम्बन्धों विषयों का पुलिन्दा है, या सम्बन्धों का जाल है।
अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध इतना व्यापक है कि उसमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सभी विषय-वस्तु समाहित हो जाती हैं। चाहे वह राजनीतिक हो या गैर-राजनीतिक, शांतिमय हो या युद्धमय, आर्थिक हो या भौगोलिक, सरकारी हो या गैर-सरकारी; जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल राजनीतिक पहलू का अध्ययन (बल) देता है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध के राजनीतिक पहलू को अंतरराष्ट्रीय राजनीति कहते हैं।
■ दोनों में मुख्य अंतर
① अंतरराष्ट्रीय राजनीति संकीर्ण (Narrow) है तथा अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध विस्तीर्ण (Broad) है।
② अंतरराष्ट्रीय राजनीति विश्लेषणात्मक (Analytical) है तथा अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध वर्णनात्मक (Descriptive) है।
आज दोनों में कोई अंतर नहीं माना जाता है, दोनों का मूल तत्व और मर्म एक ही जैसा है। आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अंतर्गत लगभग वे सभी कार्यों का अध्ययन हो रहा है। मार्गेन्थाऊ और केनेथ थॉम्पसन दोनों को लगभग एक ही मानते हैं। जबकि कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध की उपश्रेणी मानते हैं।
• मार्गेन्थाऊ (Hans Morgenthau): "राष्ट्रों के मध्य शक्ति के लिए संघर्ष तथा उसका प्रयोग अंतरराष्ट्रीय राजनीति है।"
• जेम्स रोजेनाउ (James Rosenau): "अंतरराष्ट्रीय राजनीति अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों का एक महत्वपूर्ण उप-क्षेत्र है।"
• मार्गेन्थाऊ (पुनः): "राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और वह सिक्का है शक्ति और संघर्ष।"
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्र (Scope): इसके अंतर्गत वे सभी तत्व आ जाते हैं जिसका अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में अध्ययन किया जाता है। इसका क्षेत्र निश्चित कर पाना सम्भव नहीं है, इसका विकास लगातार होता रहता है। फिर भी इसके अंतर्गत ➔ शक्ति का अध्ययन, युद्ध एवं शांति, राष्ट्रीय हित, नवसाम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, राष्ट्रीय कानून, अंतरराष्ट्रीय कानून, विदेश नीति, शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय संगठन, निशस्त्रीकरण, शस्त्रीकरण, विश्व जनमत, तथा राज्येत्तर कर्ता (Non-State Actors) का अध्ययन किया जाता है।
✦ 5. समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले तत्व
समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को निम्नलिखित प्रमुख तत्व प्रभावित करते हैं:
- राज्यों की संख्या में वृद्धि
- यूरोपीय राजनीति का अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिवर्तन
- विदेशनीति का लोकतंत्रीकरण
- परमाणु बम का उदय और शांति के लिए बढ़ता हुआ खतरा
- राज्येत्तर कर्ता (Non-State Actors) की भूमिका
- शक्ति संतुलन के स्थान पर आतंक के संतुलन का उदय
- सूचना एवं प्रौद्योगिकी का उदय
- उदारीकरण की शुरुआत और सोवियत संघ का विघटन
- आतंकवाद का वैश्वीकरण होना
राज्येत्तर कर्ता वे कर्ता हैं जो 'राष्ट्र' तो नहीं हैं लेकिन आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गयी है। इसके अंतर्गत— संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO), गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (NAM), विश्व व्यापार संगठन (WTO), विश्व बैंक (World Bank), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), अंतरराष्ट्रीय सैनिक संगठन (नाटो - NATO, सियेटो - SEATO, सेण्टो - CENTO) आदि, तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ (MNCs) आती हैं।
✦ 6. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विकास के चरण
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के विषय को एक शैक्षणिक विषय के रूप में 1919 में अंतरराष्ट्रीय राजनीति विभाग की स्थापना हुई जिसे 'वुडरो विल्सन चेयर' (Woodrow Wilson Chair) के नाम से पुकारा गया। इसके विकास को निम्न 4 चरणों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है:
① पहला चरण
कूटनीतिक इतिहास का चरण: शुरू-शुरू में इस पर इतिहासकारों का प्रभुत्व रहा। इसमें राजनीति के अंतर्गत केवल ऐतिहासिक या अतीत की बातों का अध्ययन किया गया है। जिसमें घटनाओं का वर्णन कालक्रम के अनुसार था। वर्तमान को भूतकाल से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई और न ही भविष्य को समझने का प्रयास किया गया।।
② दूसरा चरण
समसामयिक घटनाओं का काल: इसमें केवल समसामयिक (Current) घटनाओं पर बल दिया गया। दिन प्रतिदिन को समझने के लिए समाचार पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ा गया। इसमें भी वर्तमान को अतीत से नहीं जोड़ा गया और न भविष्य को समझने का प्रयास किया गया। केवल वर्तमान के आधार पर समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया गया। कूटनीतिक इतिहास की तरह यह भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के भविष्य को निर्धारित करने में असमर्थ रहा।
③ तीसरा चरण
कानूनी/आदर्शवादी युग:अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संस्थाओं के द्वारा अंतरराष्ट्रीय भविष्य को सुधारने का प्रयत्न किया गया। पहले विश्व युद्ध से दुखी होकर विद्वानों ने आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया और यह विश्वास व्यक्त किया कि राष्ट्रों के बीच आपसी समस्याओं को इसी कानूनी तरीकों के माध्यम से सुलझाया जाएगा। इसमें मुख्य कमी यह रही कि इसने अतीत और वर्तमान की उपेक्षा किया और एक सुंदर भविष्य का सपना संजोया। इसमें यथार्थ की उपेक्षा करकेआदर्श को अधिक महत्व दिया गया, जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध देखने को मिला।
④ चतुर्थ चरण
सैद्धांतिक/वैज्ञानिक युग (1945 के बाद): द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद चतुर्थ चरण का श्री गणेश हुआ। अब अध्ययन का केंद्र राष्ट्रों के व्यवहार को प्रभावित करने वाली शक्तियां बन गया। अब राष्ट्र संघ के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना हुई और इसका अध्ययन राजनीतिक दृष्टि से किया जाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में सिद्धांतिकरण की प्रवृत्ति दिखाई पड़ने लगी और वैज्ञानिक सिद्धांतों के निर्माण पर बल दिया जाने लगा।
तीसरे चरण (आदर्शवादी युग) के दौरान प्रसिद्ध लेखक शूमा (Schuman) ने अपनी पुस्तक International Politics में आदर्शवादी विचार का विरोध करते हुए यथार्थवादी विचारधारा की पुष्टि की। क्विन्सी राइट की प्रसिद्ध पुस्तक The Study of War से इसे बड़ा बल मिला।
■ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सिद्धांत निर्माण
1950 के बाद ऐसे अनेक ग्रंथों और शोधों का विकास हुआ जिसमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विदेशनीति के सम्बन्ध में सिद्धांत निर्माण और आनुभविक अध्ययन की अंतर्दृष्टि दिखाई देती है:
- केनेथ वाल्ट्ज (Kenneth Waltz) का शोध लेख ➔ Theory of International Relations
- मार्गेन्थाऊ (Morgenthau) की पुस्तक ➔ Politics Among Nations (इसने यथार्थवादी सिद्धांत की रूपरेखा तैयार की)
- मार्टन कैपलान (Morton Kaplan) की पुस्तक ➔ System and Process in International Politics
- स्टैनले हॉफमैन (Stanley Hoffmann) की पुस्तक ➔ Contemporary Theory in International Relations
इस युग में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन हेतु अनेक आंशिक सिद्धांत (Partial Theories) अस्तित्व में आये— जैसे: संतुलन सिद्धांत, संचार सिद्धांत, खेल सिद्धांत, यथार्थवादी सिद्धांत, और व्यवस्था सिद्धांत प्रमुख हैं।
✦ 7. प्रथम महान बहस: आदर्शवाद V/S यथार्थवाद
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मुख्य रूप से दो महान बहसें (Great Debates) प्रचलित हैं: पहली आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद और दूसरी परम्परावाद बनाम विज्ञानवाद। इन बहसों को समझने से पहले दृष्टिकोण (Approach) को समझना आवश्यक है।
यदि राज्यों के व्यवहार के बारे में हम कोई सामान्य सिद्धांत बनाने में सफल हो जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक स्वतंत्र विषय के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े पैमाने पर सिद्धांत निर्माण के प्रयत्न किए जा रहे हैं।
दृष्टिकोण (Approach) और सिद्धांत (Theory) में अंतर:
• दृष्टिकोण: मानकों का एक ऐसा समूह जिसके आधार पर सैद्धांतिक विचार-विमर्श के लिए प्रश्न या आधार सामग्री लेने या छोड़ने का निर्णय किया जाता है। (अर्थात् किसी समस्या को पद्धति के माध्यम से हल करने के बाद जो विचार उत्पन्न होता है वही दृष्टिकोण है)।
• सिद्धांत: दृष्टिकोण का अगला चरण सिद्धांत कहलाता है। यह तर्क-संगत अनुमान है जो किसी घटना के मूल कारणों की विवेचना करता है। सिद्धांत का मुख्य कार्य व्याख्या करना है। सिद्धांत का स्वरूप दृष्टिकोण से निर्धारित होता है। अतः सिद्धांत और दृष्टिकोण एक दूसरे के पर्याय हैं।
[A] आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद (द्वितीय युद्ध के पहले)
| आदर्शवाद (Idealism) | यथार्थवाद (Realism) |
|---|---|
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समन्वयवाद (Synthesis): जहाँ यथार्थवाद निराशावाद को व्यक्त करता है, वहीं आदर्शवाद आशावाद को व्यक्त करता है। समन्वयवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखता है। क्विन्सी राइट के अनुसार: "यथार्थवाद और आदर्शवाद का प्रयोग अल्पकालिक और दीर्घकालिक नीतियों का अंतर दिखाने के लिए किया जाता है।" जहाँ यथार्थवाद कहता है कि भविष्य के उद्देश्यों की खातिर हम वर्तमान या तात्कालिक आवश्यकताओं की उपेक्षा नहीं कर सकते, वहीं आदर्शवाद कहता है- हम वर्तमान के लिए भविष्य को दाँव पर नहीं लगा सकते।
राइनहोल्ड नेबुर (Reinhold Niebuhr) का सिद्धान्त
राइनहोल्ड नेबुर ने आदर्शवाद को 'प्रकाश की सन्तान' (Children of Light) और यथार्थवाद को 'अन्धकार की सन्तान' (Children of Darkness) की संज्ञा दी है।
- प्रकाश की सन्तान: वे लोग जो मानते हैं कि स्वहित को सार्वभौमिक नियमों के अधीन रखना चाहिए अर्थात अंतरराष्ट्रीय हित में राष्ट्रीय हित देखना चाहिए, इस आधार पर नेबूर इसे पुण्य आत्मा मानते हैं।
- अन्धकार की सन्तान: वे लोग जो अपने संकल्प व हित के अलावा कोई नियम नहीं मानते अर्थात राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हैं इस आधार पर नेबुर इन्हें बदमाश और दुष्ट मानते हैं।
निष्कर्ष: नेबुर कहते हैं कि "अन्धकार की सन्तान समझदार हैं लेकिन प्रकाश की सन्तान मूर्ख हैं।" क्योंकि अन्धकार की सन्तान आत्मसंकल्प को पूर्णरूप से पहचानती हैं, जबकि प्रकाश की सन्तान इसे नहीं पहचानती। अतः दोनों को एक-दूसरे से सीखना चाहिए। आज राष्ट्रीय हित और अंतरराष्ट्रीय हित में समन्वय ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन का उपयुक्त दृष्टिकोण है।
उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट होता है कि आदर्शवाद और यथार्थवाद का दृष्टिकोण एकांगी है क्योंकि आदर्शवाद जहाँ केवल मूल्यों या नैतिकता को ही महत्व देता है, वहीं यथार्थवाद केवल शक्ति या संघर्ष को ही महत्व देता है।
अतः दोनों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है, अतः दोनों में विरोध अनावश्यक है इसलिए दोनों में समन्वय होना चाहिए। क्योंकि वर्तमान के बिना भविष्य का निर्माण असम्भव है और भविष्य के बिना वर्तमान का कोई अर्थ नहीं है।
आज राष्ट्रीय हित और अंतरराष्ट्रीय हित में समन्वय ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन का उपयुक्त दृष्टिकोण है।
✦ 8. द्वितीय महान बहस: परम्परावाद V/S विज्ञानवाद
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यथार्थवाद और आदर्शवाद की आपसी बहस चरमसीमा पर पहुँच गयी। 1965 के बाद इसका स्थान एक नई बहस ने ले लिया जिसे विज्ञानवाद V/s परम्परावाद (वैज्ञानिक उपागम बनाम परम्परागत उपागम) कहा जाता है।
- मार्टन कैपलान ने इसे 'नई महान बहस' (A New Debate) कहकर पुकारा।
- डेविड सिंगर ने इसे दो भिन्न बौद्धिक शैलियाँ या संस्कृतियां कहकर पुकारा।
ये लोग जोर-जोर से इस बात पर बहस करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पद्धति के आधार में कौन सी प्रणालियां उपयुक्त हैं, जबकि यथार्थवाद और आदर्शवाद के बीच इस बात पर बहस हुई थी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन की विषय वस्तु क्या होनी चाहिए। वैसे दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है क्योंकि परंपरावाद भी आदर्शवाद का वकालत करता है और यथार्थवाद विज्ञानवाद का वकालत करता है।
जहाँ परम्परावाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में परम्परावादी पद्धति का वकालत करता है, वहीं विज्ञानवाद वैज्ञानिक पद्धति की वकालत करते हुए परम्परावाद का खण्डन करता है। यद्यपि दोनों के बीच विवाद बहुत पहले से चला आ रहा था, लेकिन विज्ञानवाद को सर्वप्रथम गम्भीर चुनौती सन् 1966 में हेडले बुल (Hedley Bull) ने दी।
■ हेडले बुल द्वारा विज्ञानवाद पर लगाए गए 7 आरोप
हेडले बुल ने अपने एक लेख में दृढ़तापूर्वक कहा कि विज्ञानवाद का विकास हुआ है उसे हम राजनीतिक विकास के लिए उपयुक्त नहीं मान सकते। बुल ने विज्ञानवाद के विरुद्ध 7 तर्क प्रस्तुत किये:
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति की विषय-वस्तु ऐसी प्रकृति की है कि उसे हम वैज्ञानिक उपकरणों से नहीं समझ सकते।अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न नैतिक है, इसलिए इसे हम वैज्ञानिक सिद्धांत से नहीं समझ सकते हैं।
- वैज्ञानिक विधि के प्रतिपादक छोटे-छोटे प्रश्नों में उलझे रहते हैं आधारभूत प्रश्न उनके अध्ययन क्षेत्र में स्थान नहीं पा सके हैं।
- विज्ञानवादी के इस दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उनके अध्ययन अभी प्रारम्भिक अवस्था में हैं। बुल कहते हैं विज्ञानवादी आंकड़ों में ज्यादा खोये रहते हैं और व्यवहारिकता में कम।
- विज्ञानवाद माडल का झंझट खड़ा करके यथार्थ की दुनिया से कट जाते हैं।
- विज्ञानवादी उपकरणों के पीछे इतना पागल हो जाते हैं कि वे वास्तविकता से काफी दूर हो जाते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों में यद्यपि परिसुद्धता की आवश्यकता है लेकिन विज्ञानवादी परिशुद्धता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विषयवस्तु को अपने में समाहित कर लें ऐसी जिद करते हैं।
- वैज्ञानिक पद्धति के समर्थकों ने अपने आपको इतिहास और दर्शन से पृथक कर दिया है। अतः विज्ञानवाद सामाजिक समस्याओं का निराकरण नहीं कर सकता।
■ मार्टन कैपलान द्वारा विज्ञानवाद का बचाव
मार्टन कैपलान (Morton Kaplan) ने अपने लेख में हेडले बुल द्वारा लगाए गए आरोपों से विज्ञानवाद का बचाव किया और परम्परावाद पर पलटकर प्रहार किया। कैपलान ने निम्न तर्क प्रस्तुत किये:
- ① मानवीय उद्देश्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण हो सकता है। हम व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार को केवल मानवीय प्रेरणा से नहीं समझ सकते।
- ② कैपलान कहते हैं आज का युग वैज्ञानिक युग है, हर क्षेत्र में विज्ञान चमत्कार कर रहा है अतः राजनीति क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है।
- ③ कैपलान का कहना है माडल की एकता और वास्तविकता दोनों मानना भूल है।
- ④ ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जो दार्शनिक हैं इसलिए ये कहना कि विज्ञानवाद इतिहास व दर्शन की एकदम उपेक्षा करता है गलत होगा।
निष्कर्ष: विज्ञानवाद और परम्परावाद दोनों ने अपनी-अपनी पद्धति को महत्वपूर्ण बताया और परंपरावाद ने जो विज्ञानवाद पर आरोप लगाया उसका जवाब मार्टन कैप्लान ने देकर उसका बचाव किया। लेकिन यह कहने में कोई संकोच न होगा कि दोनों अलग-अलग अधूरे हैं क्योंकि मानवीय समस्याओं का निराकरण के लिए तथ्यों एवं मूल्यों दोनों की आवश्यकता है। इसलिए यह विवाद 'विज्ञानवाद V/S परम्परावाद' न होकर 'परम्परावाद Vs विज्ञानवाद' होना चाहिए।
✦ 9. हंस मार्गेन्थाऊ का यथार्थवादी सिद्धान्त
18वीं और 19वीं शताब्दी में जिस यथार्थवादी दर्शन को अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने की कुंजी माना जाता था, उसका दूसरे विश्व-युद्ध के बाद पुनरुत्थान हुआ और आज मार्गेन्थाऊ (Hans Morgenthau) को इसका सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता माना जाता है। यद्यपि जॉर्ज केनन और राइनहोल्ड नेबुर ने भी यथार्थवाद के विकास में अपना योगदान दिया लेकिन इसे सैद्धांतिक आधार मार्गेन्थाऊ ने ही दिया।
महेन्द्र कुमार के अनुसार: "मार्गेन्थाऊ केवल यथार्थवादी लेखक ही नहीं हैं बल्कि पहले सिद्धान्तकार हैं जिन्होंने यथार्थवादी साँचे को वैज्ञानिक विधि से विकसित किया।"
गाजी एल्गो साबी ने मार्गेन्थाऊवाद और यथार्थवाद को एक-दूसरे का पर्याय माना।
मार्गेन्थाऊ के अनुसार: "अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्य कुंजी राष्ट्रहित है जिसे केवल शक्ति के संदर्भ में ही देखा जा सकता है।"
यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख कर्ता अर्थात् राज्यों पर ही बल देता है। इसे यथार्थवादी दृष्टिकोण इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह 'राष्ट्रहित' पर विशेष बल देता है, और मानव-स्वभाव को उसी वास्तविक या यथार्थरूप में देखता है, जो अनादि काल से चला आ रहा है। यथार्थवादी दृष्टिकोण शक्ति (Power) को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्रबिंदु मानता है, इसलिए इस दृष्टिकोण को 'शक्तिवादी दृष्टिकोण' भी कहा जाता है।
मार्गेन्थाऊ ने शक्ति की परिभाषा करते हुए कहा— "मनुष्यों का अन्य मनुष्यों के मस्तिष्क या क्रिया-कलापों पर नियंत्रण प्राप्त करना ही शक्ति कहलाता है।"
■ मार्गेन्थाऊ के 6 यथार्थवादी सिद्धान्त
मार्गेन्थाऊ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Politics Among Nations' में अपने यथार्थवादी सिद्धान्त का वर्णन किया है, जिसके 6 प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं:
- [1] वस्तुनिष्ठ नियम (Objective Laws): राजनीति पर प्रभाव डालने वाले सभी नियमों की जड़ें मानव प्रकृति में होती हैं। अर्थात् मनुष्य जिन नियमों के अनुरूप संसार में क्रिया-कलाप करता है वे सार्वभौम हैं। यदि हम किसी देश की विदेश-नीति को समझना चाहते हैं तो हमें तर्कबुद्धि से विश्लेषण करना होगा कि उन कार्यों के पीछे राजनेताओं का उद्देश्य क्या रहा होगा।
- [2] राष्ट्रीय हित को शक्ति के रूप में परिभाषित करना: अर्थात् राष्ट्रीय हित की प्रधानता होनी चाहिए। यथार्थवादी सिद्धांत इस बात की परवाह नहीं करता कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में क्या नैतिक है और क्या अनैतिक, बस वह केवल इस बात की परवाह करता है कि वह राष्ट्रीय हित के अनुरूप है या नहीं।
- [3] राष्ट्रीय हित की परिवर्तनशीलता: राष्ट्रीय हित का कोई निश्चित अर्थ नहीं होता। यद्यपि राष्ट्रीय हित के मूलतत्व स्थायी होते हैं लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं, इसलिए एक सफल राजनेता वह होता है जो बदली हुई परिस्थितियों में स्वयं को ढालने का प्रयास करे।
- [4] राजनीतिक विवेक (Prudence): राजनीतिक विवेक राजनीति का उच्चतम मूल्य है। अर्थात् राजनीतिक यथार्थवाद नैतिकता के प्रति उदासीन नहीं है, लेकिन राष्ट्र की नैतिकता और सार्वभौमिक नैतिकता में अंतर है। इसलिए विवेक के अनुरूप मूल्य तय किया जाना चाहिए।
- [5] सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों से पृथक्करण: राष्ट्र के नैतिक मूल्यों से सार्वभौमिक मूल्यों को पृथक माना जाना चाहिए। अर्थात् सार्वभौमिक मूल्य और राष्ट्र के मूल्य दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि यथार्थवाद राष्ट्र को ऐसे राजनीतिक कर्ता के रूप में मानता है जो शक्ति के माध्यम से अपने हितों को प्राप्त करने में लगा रहता है।
- [6] राजनीतिक क्षेत्र की स्वायत्तता: यथार्थवाद राजनीतिक क्षेत्र में स्वायत्तता में विश्वास करता है। अर्थात् वह गैर-राजनीतिक नियमों के अधीन मानता है। यथार्थवाद उन सभी विचारधाराओं का विरोधी है जो गैर-राजनीतिक नियमों को जबरदस्ती थोपने का प्रयास करते हैं।
■ मार्गेन्थाऊ के यथार्थवाद की आलोचना
उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट है कि यथार्थवादी दृष्टिकोण निम्न तीन मान्यताओं पर आधारित है: (i) प्रत्येक देश का राजनेता अपने राष्ट्रीय हित को प्राप्त करने का सदैव प्रयत्न करता है। (ii) प्रत्येक राष्ट्र का हित उसके भौतिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विस्तार में है। (iii)प्रत्येक राज्य की विदेश नीति पूर्णतः शक्ति पर निर्भर है। इन्ही कारणों से इसकी कड़ी आलोचना भी हुई:
- यह अवैज्ञानिक है।
- पूरी तरह से आनुभविक (Empirical) नहीं है।
- यह शक्ति एकलवाद (Power Monism) का सिद्धान्त है।
- युद्ध विस्तारवाद का समर्थन करता है।
- राष्ट्रीय हित को नैतिकता से श्रेष्ठ बताता है।
- यह एक आंशिक सिद्धान्त है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल 'शक्ति' को महत्व देता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति व संघर्ष के अतिरिक्त 'सहयोग' भी होता है।
बैनो वाशरमैन (Beno Wasserman): "अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वैज्ञानिक अध्ययन में उन्नत तब तक सम्भव नहीं है, जब तक मार्गेन्थाऊ का यथार्थवादी सिद्धान्त प्रभावशाली है। मार्गेन्थाऊ का सिद्धान्त निर्पेक्ष एवं अप्रमाणिक, आवश्यकतावादी नियमों पर आधारित है।"
केनेथ वाल्टेज़ (Kenneth Waltz): "मार्गेन्थाऊ से हमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति का कोई सुनिश्चित सिद्धान्त चाहे न मिलता हो पर उसके सिद्धान्त रचना के लिए पर्याप्त सामग्री अवश्य मिलती है।"
थॉम्पसन (Thompson): "मार्गेन्थाऊ विश्व के राजनीति पर लिखने वाले समकालीन लेखकों में सबसे बड़े हैं और उन्हें इस युग का अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सिद्धान्त का निर्माण करने वाला प्रमुख विचारक माना जाता है।"
✦ 10. नव-यथार्थवाद (Neo-Realism) एवं केनेथ वाल्ट्ज़
नव यथार्थवाद परम्परागत यथार्थवाद से कुछ भिन्न है। जहाँ परम्परागत यथार्थवाद का एकमात्र केंद्र बिन्दु है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति के लिए संघर्ष है और यह मानव स्वभाव की दृढ़ एवं स्थायी विशेषताओं पर आधारित है। यह समस्त अंतरराष्ट्रीय राजनीति की व्याख्या राष्ट्रीय हित या राष्ट्रीय शक्ति के आधार पर करता है। परम्परागत यथार्थवाद 1940 से लेकर 1988 तक लोकप्रिय रहा। 1980 के दशक में नव-यथार्थवाद (Neo-Realism) लोकप्रिय हुआ।
नव यथार्थवाद शक्ति को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय बिंदु स्वीकार करते हुए साथ-साथ कुछ अन्य तत्वों विशेषकर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना (Structure) को भी महत्व देता है।
नव यथार्थवाद यह स्वीकार करता है कि केवल राष्ट्रीय हित या राष्ट्रीय शक्ति नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय संगठन की संरचना भी राज्यों के व्यवहार (अर्थात् उनकी विदेश नीतियों तथा उद्देश्यों) को निर्धारित करती है। अतः अंतरराष्ट्रीय संरचना के अध्ययन के बिना किसी भी राज्य के वास्तविक व्यवहार को नहीं समझा जा सकता। इसलिए नव यथार्थवाद को 'संरचनात्मक यथार्थवाद' भी कहा जाता है। इसके प्रमुख समर्थक केनेथ वाल्ट्ज़ (Kenneth Waltz) हैं और इनकी पुस्तक 'Theory of International Politics' है।
■ नव-यथार्थवाद के 5 प्रमुख तत्व
नव यथार्थवादी प्रकृति के सम्बन्ध में निम्न तत्वों को स्वीकार किया जाता है:
- राष्ट्र जो कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख कर्ता हैं।
- राष्ट्रीय शक्ति जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय तत्व है।
- अंतरराष्ट्रीय संरचना या व्यवस्था जो राष्ट्र-राज्य के व्यवहार को सदैव प्रभावित करता है।
- राष्ट्रों का तुलनात्मक लाभ का महत्व।
- राष्ट्रीय शक्ति के साथ-साथ अन्य राज्यों की तुलना में राष्ट्रीय शक्ति।
✍️ निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त समग्र विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics) का अध्ययन केवल राष्ट्रों के बीच के मनमाने संघर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर विकसित होने वाला अत्यंत गतिशील (Dynamic) और वैज्ञानिक विषय है। अपने प्रथम चरण (कूटनीतिक इतिहास) से लेकर वर्तमान सैद्धांतिक युग तक, इसने कई 'महान बहसों' (Great Debates) का सामना किया है, जिन्होंने इसे एक परिपक्व आकार दिया।
जहाँ एक ओर आदर्शवाद ने विश्व में शांति, नैतिकता और न्यायपूर्ण व्यवस्था का सपना देखा, वहीं दूसरी ओर हंस मार्गेन्थाऊ के यथार्थवाद (Realism) ने हमें यह कड़वी सच्चाई दिखाई कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल आधार केवल 'राष्ट्रीय हित' और 'शक्ति का संघर्ष' है। समय के साथ जब यथार्थवाद की आलोचना हुई, तो केनेथ वाल्ट्ज़ का नव-यथार्थवाद (Neo-Realism) अस्तित्व में आया, जिसने यह सिद्ध किया कि केवल मानव स्वभाव या शक्ति ही नहीं, बल्कि 'अंतरराष्ट्रीय संरचना' (International Structure) भी राष्ट्रों की विदेश नीति को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाती है।
अंततः हम यह कह सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को किसी एक चश्मे (दृष्टिकोण) से नहीं समझा जा सकता। इसे समग्रता से समझने के लिए तथ्यों (विज्ञानवाद) और मूल्यों (परम्परावाद), तथा शक्ति संघर्ष (यथार्थवाद) और सहयोग (आदर्शवाद) के बीच एक सकारात्मक समन्वय स्थापित करना ही सबसे उपयुक्त और प्रासंगिक मार्ग है।
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