| अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कतिपय आंशिक सिद्धान्त (Partial Theories) |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सिद्धांत निर्माण की खोज में विकसित आंशिक सिद्धान्तों व नवीन दृष्टिकोणों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें संतुलन सिद्धान्त (जॉर्ज लिस्का), व्यवस्था सिद्धान्त (मॉर्टन कैप्लान की 6 व्यवस्थाएं), और निर्णय निर्माण सिद्धान्त (रिचर्ड स्नाइडर) के साथ-साथ खेल व सौदेबाजी सिद्धान्त (थॉमस शेलिंग), संचार सिद्धान्त (कार्ल डायच) तथा निर्भरता/केन्द्र-परिधि मॉडल (ए.जी. फ्रैंक) का गहन और आलोचनात्मक विश्लेषण शामिल है। इसके अतिरिक्त तृतीय विश्व की भूमिका एवं अमेरिकी नीतियों को भी स्पष्ट किया गया है। यह हस्तलिखित नोट्स पर आधारित एक सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री है। |
- 1. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आंशिक सिद्धान्त (परिचय)
- 2. संतुलन सिद्धान्त (Balance Theory) एवं इसके प्रकार
- 3. जॉर्ज लिस्का का संरचनात्मक संतुलन सिद्धान्त
- 4. व्यवस्था सिद्धान्त (System Theory) की उत्पत्ति
- 5. मॉर्टन कैप्लान का व्यवस्था सिद्धान्त
- 6. कैप्लान की 6 अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं (रेखाचित्र)
- 7. मॉर्टन कैप्लान के व्यवस्था सिद्धान्त की आलोचना
- 8. निर्णय निर्माण सिद्धान्त (Decision Making Theory)
- 9. निर्णय में पर्यावरण व व्यक्तित्व की भूमिका (स्प्राउट एवं जॉर्ज)
- 10. कार्यकताओं की भूमिका: कोहेन और हिल्समैन
- 11. खेल सिद्धान्त (Game Theory): उत्पत्ति व अर्थ
- 12. खेल सिद्धान्त के 5 नियम एवं 3 प्रमुख प्रकार
- 13. थॉमस शेलिंग की आलोचना व नये गेम (चिकन गेम)
- 14. प्रिजनर्स डायलेम्मा गेम (Prisoner's Dilemma)
- 15. सौदेबाजी का सिद्धान्त (Bargaining Theory)
- 16. वार्ता के दृष्टिकोण एवं ओरान यंग का वर्गीकरण
- 17. संचार सिद्धान्त (Communication Theory) व साइबरनेटिक्स
- 18. कार्ल डायच का संचार प्रतिमान (Communication Model)
- 19. केन्द्र-परिधि मॉडल / निर्भरता सिद्धान्त (Dependency Theory)
- 20. लैटिन अमेरिका का विश्लेषण (ए.जी. फ्रैंक व वालरस्टेन)
- 21. संचार सिद्धान्त एवं निर्भरता मॉडल के आरेख (Diagrams)
- 22. तृतीय विश्व (Third World): उत्पत्ति, अर्थ एवं इतिहास
- 23. तृतीय विश्व की विशेषताएँ, भूमिका, माँगें एवं समस्याएँ
- 24. अमेरिका एवं तृतीय विश्व (प्रमुख नीतियाँ)
✦ 1. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आंशिक सिद्धान्त (परिचय)
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्य परीक्षा- सिद्धान्त निर्माण की है, इस दृष्टि से यह विषय अभी भी शैशवावस्था में है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति विषय में सिद्धान्त निर्माण की खोज में कई आंशिक सिद्धान्तों का निर्माण हुआ।
आंशिक सिद्धान्त क्यों? इन्हें आंशिक सिद्धान्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये पूर्ण नहीं हैं और मानवीय समाज पर लागू होने के कारण इनमें नैतिकता का भी समावेश है।
इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्नलिखित सिद्धान्त आते हैं:
- संतुलन सिद्धान्त (Balance Theory)
- व्यवस्था सिद्धान्त (System Theory)
- निर्णयन सिद्धान्त (Decision Making Theory)
- खेल सिद्धान्त (Game Theory)
- सौदेबाजी का सिद्धान्त (Bargaining Theory)
- संचार सिद्धान्त (Communication Theory)
✦ 2. संतुलन सिद्धान्त (Balance Theory) एवं इसके प्रकार
संतुलन सिद्धान्त का प्रयोग सर्वप्रथम अर्थशास्त्र में माँग और पूर्ति में संतुलन कायम करना अपरिहार्य माना जाता है।
क्विंसी राइट (Quincy Wright) के अनुसार:
"संतुलन किसी एक सत्ता या सत्ताओं के समूह पर या उनके भीतर कार्य कर रहे बलों का वह आपसी सम्बन्ध है जिसमें समष्टि (सम्पूर्ण) में एक प्रकार का स्थायित्व दिखायी पड़ता है।"
■ संतुलन के प्रकार एवं प्रकृति
संतुलन मोटे रूप से दो प्रकार का होता है और इसकी प्रकृति भी दो प्रकार की होती है, जिसे नीचे रेखाचित्र से समझा जा सकता है:
| संतुलन के दो मुख्य प्रकार | |
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1. स्थायित्व संतुलन इसमें स्वचालित और स्वनियंत्रित संतुलन स्थापित होता है। ऐसा संतुलन समाज के किसी भी व्यवस्था में नहीं पाया जाता क्योंकि समाज मनुष्यों एवं राज्यों से मिलकर बना होता है और मनुष्य स्थिर न होकर गतिशील होते हैं। |
2. गतिशील संतुलन यह एक वास्तविकता है और किसी न किसी रूप में समाज या राज्य में उपस्थित रहता है। |
| संतुलन की प्रकृति (Nature of Balance) | |
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1. वैधानिक संतुलन इससे तात्पर्य यह है कि समाज और राज्य में शांति और व्यवस्था बनी रहनी चाहिए। |
2. सामान्य संतुलन 'राजनीति व्यवस्था' में उसके सभी अंग अंतःक्रिया की दृष्टि से अन्योन्याश्रित होते हैं, इन अंगों की क्रिया-प्रतिक्रिया के कारण या एक-दूसरे से सम्बंधित होने के कारण अन्त में स्थायित्व प्राप्त होता है। |
✦ 3. जॉर्ज लिस्का का संरचनात्मक संतुलन सिद्धान्त
संतुलन सिद्धान्त को अपनाने वाले विद्वानों में जॉर्ज लिस्का (George Liska) और मॉर्टन कैप्लान (Morton Kaplan) का नाम आता है। जिसमें जॉर्ज लिस्का का विशेष महत्व है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'International Equilibrium' है। लिस्का ने खास तौर से प्रगतिशील, स्थायी और अस्थायी संतुलन पर विशेष बल दिया है।
लिस्का ने अंतरराष्ट्रीय संगठन या अंतरराष्ट्रीय संरचना को आधार बनाकर संतुलन सिद्धान्त का वर्णन किया है इसलिए लिस्का के संतुलन सिद्धान्त को संरचनात्मक संतुलन सिद्धान्त कहते हैं। जिसे खास तौर से अंतरराष्ट्रीय संगठन की संरचना, सदस्यों की प्रतिबद्धता, इसकी प्रकार्यात्मकता और भौगोलिक सीमाओं से सम्बद्ध किया गया है। लिस्का कई शाखाओं में विश्वास करता है इसलिए अपने संतुलन को बहुल संतुलन का नाम देता है।
■ लिस्का के सिद्धान्त का महत्व व 3 मुख्य बातें
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति को स्वीकार करते हुए भी लिस्का इसका प्रयोग विश्लेषण के एक रूप में मानक के रूप में करना चाहते हैं। उनकी मान्यता है कि "राज्य व्यवस्था की ऐसी स्थिति जिसमें शांति है चूँकि शांति ही संतुलन की कसौटी है इसलिए संतुलन की खोज एक आवश्यक बात है।" संतुलन की खोज में कुछ व्यक्ति, सामाजिक अर्थव्यवस्थाएं आदि लगी हुई हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन सिद्धान्त लागू करने में लिस्का निम्न तीन बातों पर ध्यान देते हैं:
- अलग-अलग राज्य सामूहिक संगठन के हिस्से हैं और यह सामूहिक संगठन किसी अंतरराष्ट्रीय संघ के निर्देशन में काम करता है।
- किसी भी राज्य की नीतियों की परीक्षा अंतरराष्ट्रीय एकीकरण के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए।
- संतुलन सिद्धान्त को उस सामाजिक एवं भौगोलिक पर्यावरण की समीक्षा करनी चाहिए जिसमें राज्य एकतरफा कार्यवाही द्वारा अपनी स्थिति सुधारने का प्रयास करते हैं।
लिस्का के अनुसार:
"संतुलन का प्रत्यय एकीकरण का प्रत्यय है जिससे एक विश्व व्यवस्था के जन्म होने में सुविधा होगी।"
संतुलन सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति स्थायित्व एवं संतुलन की ओर है।
आलोचना एवं निष्कर्ष: संतुलन सिद्धान्त की आलोचना भी किया जाता है कि बाह्य पर्यावरण इतना जटिल होता है कि संतुलन की प्राप्ति असम्भव है। यह यथार्थवादी सिद्धान्त न होकर आदर्शवादी सिद्धान्त है। क्योंकि मानव व्यवहार इतना अनिश्चित होता है कि उसके व्यवहार का मापन सम्भव नहीं है।
निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि लिस्का का सिद्धान्त अंतरराष्ट्रीय संगठन का सिद्धान्त है न कि अंतरराष्ट्रीय संतुलन का।
✦ 4. व्यवस्था सिद्धान्त (System Theory) की उत्पत्ति
इसे सिस्टम थियरी या निकाय सिद्धान्त भी कहा जाता है। यह व्यवहारवादी क्रान्ति का परिणाम है। इसके जन्म का मुख्य उद्देश्य सामाजिक विज्ञानों के विभिन्न अनुशासनों को मिलाकर एक सामान्य ज्ञान राशि का निर्माण करना है, जो विज्ञान और वैज्ञानिक विश्लेषण का एकीकरण कर सके।
- इस सिद्धान्त का बीज लुडविग वॉन बर्टलान्फी (Ludwig von Bertalanffy) के चिंतन में दिखायी देता है, यह एक जीव वैज्ञानिक था जिसने 1920-30 में विज्ञान के एकीकरण पर बल दिया।
- निकाय सिद्धान्त द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आया।
सिस्टम या निकाय की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि - "सिस्टम एक समष्टि है जिसमें बहुत से हिस्से होते हैं।"
सिस्टम के बारे में हम कह सकते हैं कि यह किन्हीं वस्तुओं या अवयवों का वह समूह है जिसमें अवयवों का एक-दूसरे के साथ कोई संरचनात्मक सम्बन्ध होता है। इस सिद्धान्त को विकसित करने में कैनेथ बोल्डिंग (Kenneth Boulding) का भी योगदान है। इसमें माना जाता है कि किसी व्यवस्था के बहुत से हिस्से होते हैं और उन्हीं के बीच होने वाली क्रियाओं का विश्लेषण करके हम व्यवस्था को समझ सकते हैं।
व्यवस्था के हिस्से उप-व्यवस्था कहलाते हैं जबकि उसे अलग कर दिया जाए तो वह अपने आप में एक व्यवस्था बन जाते हैं। निकाय की व्याख्या करने में कैनेथ के अतिरिक्त और चार्ल्स मैक्लेलेंड (Charles McClelland) का भी योगदान है।
✦ 5. मॉर्टन कैप्लान का व्यवस्था सिद्धान्त
संरचनात्मक संतुलन को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार मानते हुए मॉर्टन कैप्लान (Morton Kaplan) का मत है कि- "अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक क्रम एवं सम्बद्धता है तथा आगे भी रहेगी।" कैप्लान ने अपनी मान्यता में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और राष्ट्रीय राजव्यवस्था दोनों को शामिल किया है。
मॉर्टन कैप्लान का विश्वास है कि राष्ट्रीय राज्यों का अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में व्यवहार सदैव राष्ट्रीय हित के आधारभूत विचारों से अनुशासित होता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संगठन को दो श्रेणियों में विभक्त किया:
- राष्ट्र राज्य (National States): जो कि कर्ता के रूप में कार्य करते हैं। इसमें अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि आते हैं।
- राज्येतर कर्ता या राष्ट्रोपरि कर्ता (Non-State Actors): जैसे- नाटो (NATO), विश्व बैंक (World Bank), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) आदि हैं।
मॉर्टन कैप्लान के अनुसार:
"अंतरराष्ट्रीय क्रिया-कलाप अंतरराष्ट्रीय नेताओं के बीच घटित होता है।"
कैप्लान ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं को भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का तत्व माना है। समुचित अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन के प्रभाव की परीक्षा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नेताओं के व्यवहार की परीक्षा भी आवश्यक है।
✦ 6. कैप्लान की 6 अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं
मॉर्टन कैप्लान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था के लिए निम्न 6 प्रकार की व्यवस्था बताया। इन विभिन्न व्यवस्थाओं के गहन अध्ययन के आधार पर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था के भूत, वर्तमान और भावी स्वरूप का समुचित विवेचन कर सकते हैं:
[यूरोप में विद्यमान थी] (ऐतिहासिक)
(ऐतिहासिक / यथार्थवादी)
ऐतिहासिक नोट: मॉर्टन कैप्लान ने उपर्युक्त प्रथम दोनों व्यवस्था को ऐतिहासिक (यथार्थवादी) माना है क्योंकि जब यह मॉडल आया तो ये दोनों व्यवस्था आ चुकी थीं और अन्तिम चार काल्पनिक (आदर्शवादी) हैं।
मॉर्टन कैप्लान के व्यवस्था दृष्टिकोण के अनुसार यह परीक्षण करना पड़ता है— जब अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं की व्यवस्था के अन्दर परिवर्तन होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में क्या होता है, और जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में परिवर्तन होता है तब अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के व्यवहार में क्या परिवर्तन होता है।
✦ 7. मॉर्टन कैप्लान के व्यवस्था सिद्धान्त की आलोचना
यद्यपि व्यवस्था सिद्धान्त एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है लेकिन विभिन्न आधारों पर इसकी कड़ी आलोचना होती है:
- यह एक मनमाना बंटवारा है, इस प्रकार तो कोई भी व्यक्ति इनकी संख्या को घटा व बढ़ा सकता है।
- पहले दो ऐतिहासिक या यथार्थवादी हैं, शेष काल्पनिक या आदर्शवादी हैं। भविष्य के बारे में सामाजिक विज्ञानों में घोषणा करना एक कोरा आदर्शवाद ही है।
- यह क्रम बार-बार चलकर प्रक्रिया नियम को अपनाता है।
- शिथिल द्विध्रुवीय व्यवस्था का रूपान्तरण बहु-ध्रुवीय व्यवस्था का होना सम्भव नहीं हो पाया। गुट द्विध्रुवीय व्यवस्था तभी आयेगी जब गुट निरपेक्ष समूह समाप्त हो, लेकिन इसकी सक्रियता और बढ़ती गयी।
- मॉर्टन कैप्लान के अनुसार- सार्वभौमिक व्यवस्था सोपानीय व्यवस्था में बदलेगी सिर्फ एक राष्ट्र सार्वभौमिक कर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाएगा, ऐसी व्यवस्था तो साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के पुनर्जीवित होने पर होगा।
- भविष्यवाणी असत्य: मॉर्टन कैप्लान की भविष्यवाणी सत्य नहीं हुई। सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय व्यवस्था का जन्म हुआ और आज विश्व के कई देश परमाणु बमों का निर्माण कर लिये हैं, ऐसा लगता है कि विश्व इकाई निषेधाधिकार व्यवस्था (Unit Veto System) की ओर बढ़ रही है। आज परमाणु देशों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि अब कोई भी देश किसी भी कार्यवाही को वीटो (Veto) करने की स्थिति में आ गया है।
समकालीन उदाहरण: हाल में जब भारत ने मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने का प्रयास किया तो बार-बार चीन वीटो करके विश्व को यह बता दिया कि एक ध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती मिल रही है। उत्तर कोरिया जैसा छोटा देश अमेरिका पर बार-बार परमाणु हमले की चेतावनी देकर यह साबित कर दिया कि एक ध्रुवीय व्यवस्था को भी चुनौती मिल रही है।
✦ 8. निर्णय निर्माण सिद्धान्त (Decision Making Theory)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रिचर्ड स्नाइडर (Richard Snyder), H.W. बर्क (H.W. Bruck) और बर्टन सापिन (Burton Sapin) ने विदेश नीति के अध्ययन में निर्णयपरक सिद्धान्त अपनाने का प्रयत्न किया।
- यद्यपि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह सिद्धान्त मुख्य रूप से रिचर्ड स्नाइडर के साथ जुड़ा है जिसे विदेश नीतियों के अध्ययन में प्रयोग किया गया।
- लोक प्रशासन में: इसका प्रयोग प्रशासनिक निर्णयों में किया गया जिसका सम्बन्ध हर्बर्ट साइमन (Herbert Simon) के साथ है।
- राजनीति विज्ञान में: इसका प्रयोग मतदान व्यवहार, विधायिका में मतगणाना और जनमत के निर्माण में होने लगा है।
संतुलन और व्यवस्था सिद्धान्त के विपरीत यह सिद्धान्त अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के बजाय अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं के अधिमान्य व्यवहार के अध्ययन पर बल देता है। जो अंतरराष्ट्रीय घटनाचक्र को निर्धारित व प्रभावित करते हैं।
निर्णयपरक सिद्धान्त विदेश नीति निर्माण की लम्बी प्रक्रिया में लिये जाने वाले 'निर्णयों' के अध्ययन पर जोर देता है। निर्णय निर्माण, नीति निर्माण से भिन्न है। नीति अपेक्षाकृत विस्तृत होती है, अनेक समस्याओं को प्रकाशित करती है। इसके अतिरिक्त निर्णय का सम्बन्ध एक विशेष समस्या से होता है।
हम जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मूल इकाइयाँ यद्यपि राज्य हैं, तथापि राज्यों का समस्त कार्य प्रशासन के उच्च अधिकारियों द्वारा होता है। अतः राज्य के नाम पर सारा निर्णय व्यक्ति ही लेते हैं। अतः स्पष्ट है कि निर्णयपरक दृष्टिकोण उन कार्यकर्ताओं पर ध्यान केन्द्रित करता है जो निर्णयकर्ता कहलाते हैं और उन राज्यों पर भी ध्यान केन्द्रित करता है जो निर्णय की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
✦ 9. निर्णय में पर्यावरण व व्यक्तित्व की भूमिका
निर्णयकरण सिद्धान्त अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों का व्यक्तिपरक निर्णय पर आधारित होता है। निर्णय लेने में पर्यावरण का विशेष महत्व होता है।
हेरोल्ड स्प्राउट (Harold Sprout) और मार्गरेट स्प्राउट (Margaret Sprout) ने पर्यावरण पर अधिक बल दिया। इनका मानना है किसी राष्ट्र से सम्बंधित विदेश नीति से सम्बंधित निर्णय एक विशिष्ट पर्यावरण में ही लिये जाते हैं।
1. आंतरिक पर्यावरण | 2. बाह्य पर्यावरण
और इन दोनों से अलग निर्णय लेना सम्भव नहीं हो पाता क्योंकि देश के अन्दर और देश के बाहर की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विदेश नीतियों का संचालन किया जाता है।
■ व्यक्तित्व (Personality) का महत्व
एलेक्जेंडर जॉर्ज (Alexander George) और जूलियट जॉर्ज (Juliette George) विदेश नीति के ठीक अध्ययन के लिए निर्णयकर्ताओं के व्यक्तित्व के विविध आयामों का विश्लेषण आवश्यक मानते हैं। उनका मानना है जो राजनेता विदेश नीतियों का निर्धारण करता है उसका व्यक्तित्व क्या है, यह बहुत अधिक मायने रखता है।
उदाहरण (नेहरू बनाम इंदिरा):
जैसे नेहरू के व्यक्तित्व और इंदिरा गाँधी के व्यक्तित्व में अन्तर था। जहाँ नेहरू का दृष्टिकोण आदर्शवादी था, वहीं इंदिरा का दृष्टिकोण यथार्थवादी था। यही वजह है कि दोनों के विदेश नीति में व्यापक अन्तर देखा जाता है।
✦ 10. कार्यकताओं की भूमिका: कोहेन और हिल्समैन
उन कार्यकताओं का अध्ययन भी महत्वपूर्ण होता है जो विदेश नीति के निर्माण में सचमुच हिस्सा लेते हैं। इसकी निम्न दो शाखाएं हैं:
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बर्नार्ड कोहेन (Bernard Cohen):
सरकारी और गैर सरकारी कार्य-क्रिया-प्रतिक्रिया को भी विदेश नीति के निर्धारण में महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है गैर सरकारी संगठनों (NGOs) की उपेक्षा करके विदेश नीतियों के बारे में निर्णय कर पाना सम्भव नहीं है। -
रोजर हिल्समैन (Roger Hilsman):
कार्यपालिका और विधायिका की परस्पर क्रिया से विदेश नीतियों के निर्धारण में मदद मिलती है। क्योंकि संसद में जन प्रतिनिधि बैठते हैं, इसलिए कई मामलों में निर्णय लेते समय कार्यपालिका को विधायिका की सहमति लेना आवश्यक हो जाता है।
■ निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट होता है कि निर्णयन सिद्धान्त ने विदेश नीतियों के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए इतनी प्रक्रियाओं का निर्धारण कर देता है कि सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। जैसा कि जॉन बर्टन (John Burton) मानते हैं कि "निर्णय एक प्रक्रम या प्रक्रिया बनकर रह जाता है और सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।"
निर्णयन सिद्धान्त केवल विदेश नीतियों के सम्बन्ध में ही निर्णय की बात करता है, अतः यह एक एकांगी सिद्धान्त (One-sided theory) बनकर रह जाता है।
✦ 11. खेल सिद्धान्त (Game Theory): उत्पत्ति व अर्थ
खेल का सिद्धान्त मुख्यतः गणितज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने विकसित किया। इसमें अनेक समानताओं के आधार पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक खेल मान लिया जाता है और इसके अध्ययन के लिए खेल जैसा एक नमूना बनाकर अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन किया।
- खेल सिद्धान्त को प्रतिपादित करने का श्रेय — मार्टिन सूबिन, कार्ल ड्वाइच और ऑस्कर मार्गेन्स्तर को जाता है।
- इसका व्यापक प्रयोग जॉन न्यूमैन ने किया और विकास थॉमस शेलिंग ने किया।
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मॉर्टन कैप्लान, आर्थर बर्न्स तथा रिचर्ड क्वांट ने इस विचार को अपनाया।
खेल उपागम विश्लेषण का एक तरीका है इसमें कई विकल्पों में से श्रेष्ठ विकल्प का चयन करना होता है। यह इस बात का उत्तर देता है कि किस परिस्थिति में कौन सा निर्णय अधिक विवेकसंगत होता है। जैसे— शतरंज का खेल होता है वैसे ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का खेल होता है।
खेल सिद्धान्त युक्ति का खेल है न कि संयोग का खेल। एक खेल की भाँति इसमें भी स्वयं के नियम, खिलाड़ी, क्रियाएँ, रणनीति और प्रतिपूर्ति होता है। खेल प्रतिस्पर्धात्मक (नकारात्मक) और सहकारितामूलक (सकारात्मक) होता है। खिलाड़ी दो भी हो सकते हैं और अधिक भी।
नियमों का महत्व: खेल के नियमों पर इन खिलाड़ियों का बस नहीं होता। जैसे— शतरंज का नियम है कि पैदल मोहरा एक बार में एक या दो घर ही प्राप्त कर सकता है। खेल के नियम ही निर्णय करते हैं कि खिलाड़ी क्या कदम उठायेगा।
✦ 12. खेल सिद्धान्त के 5 नियम एवं 3 प्रमुख प्रकार
■ खेल सिद्धान्त के 5 नियम
| 1 | रणनीति तय करना (Strategy) |
| 2 | विरोधी का होना |
| 3 | क्षतिपूर्ति का होना (Payoff) अर्थात् खेल के अन्त में क्या मूल्य प्राप्त होगा। |
| 4 | नियमों का होना |
| 5 | सूचनाओं का होना अर्थात् खेल में सभी विकल्पों की जानकारी का खिलाड़ी के पास होना आवश्यक है। |
■ खेल सिद्धान्त के 3 प्रकार
खेल सिद्धान्त निम्न 3 प्रकार का होता है:
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Zero Sum Two Person Game:
इसमें सिर्फ दो खिलाड़ी होते हैं और इसमें एक खिलाड़ी को जितना लाभ होता है दूसरे खिलाड़ी को उतनी ही हानि होती है, अर्थात् दोनों खिलाड़ियों के खेलों का योग शून्य होता है (जैसे: 4 - 4 = 0)। यह दो विरोधी दलों का खेल है इसका स्वरूप प्रतिद्वन्दी होता है। -
Constant Sum Two Person Game:
इस खेल में प्रतिद्वन्दी दूसरे को हानि पहुँचाकर स्वयं लाभ नहीं उठाते अपितु परस्पर सहयोग की भावना से उत्प्रेरित होकर दोनों समान लाभ उठाते हैं। -
Non Zero Sum Two Person Game:
यह उपर्युक्त दोनों प्रकार के खेलों के बीच का है, इसमें दोनों प्रतिद्वन्दियों के बीच विरोध अथवा सहयोग दोनों सम्भव हैं।
✦ 13. थॉमस शेलिंग की आलोचना व नये गेम (चिकन गेम)
थॉमस शेलिंग ने Zero Sum Two Person Game की मान्यता पर आपत्ति किया है, इस रूप में खेल का सिद्धान्त सीमित युद्ध, युद्ध निवारण, आकस्मिक आक्रमणों, निशस्त्रीकरण, परमाणु बम आदि जैसी समस्याओं के समाधान में इसका कोई योगदान नहीं है।
थॉमस शेलिंग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक स्ट्रेटजी आफ कन्फ्लिक्ट (Strategy of Conflict) में इसकी आलोचना किया है।
- थॉमस शेलिंग के सम्प्रत्यय (विचार) का मिश्रित अभिप्रेरक खेल मनोवैज्ञानिक और समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत सम्पन्न है।
- थॉमस शेलिंग ने अपना विश्लेषण मुख्यतः सीमित युद्ध और युद्ध निवारण तथा शस्त्र नियन्त्रण पर लगाया है।
दरअसल मुख्य समस्या यह है कि Zero Sum Two Person Game का विश्लेषण अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता से कोई मेल नहीं खाता। यही वजह है कि इस खेल से केवल युद्ध की स्थिति का विश्लेषण हो सकता है। लेकिन आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न देश विदेश-नीतियों का विश्लेषण करते हैं कि किस देश के साथ कितना सहयोग करना है और कितना असहयोग करना है। इसलिए आज कुछ विद्वानों ने निम्न दो और खेलों की चर्चा किया है:
■ 1. चिकिन गेम (Chicken Game)
चिकिन गेम की मुख्य विशेषता यह है कि यदि कोई राष्ट्र अपने प्रतिद्वन्दी राष्ट्र के इरादों को पूरी तरह से न समझता हो तो भी वह ऐसी नीति अपना सकता है जिससे उसके हितों की रक्षा हो सके। बशर्ते कि वह इस बात की परवाह न करे कि उसकी इस नीति से विरोधी राष्ट्र को भी फायदा हो सकता है।
✦ 14. प्रिजनर्स डायलेम्मा गेम (Prisoner's Dilemma)
■ 2. प्रिजनर्स डायलेम्मा गेम
इसके अनुसार राष्ट्रों के आपसी सम्बन्धों में दुविधा पायी जाती है। प्रत्येक राष्ट्र इस बारे में अनिश्चित रहता है कि दूसरा राष्ट्र विवेकपूर्ण व्यवहार करेगा या अविवेकपूर्ण।
उदाहरण: अलग-अलग जेल में बन्द कैदी से जेलर यह पूँछे यदि अपने दोनों अपने अपराध स्वीकार कर ले तो उन्हें फाँसी हो जायेगी और दोनों नहीं करेंगे तो आजीवन कारावास। यदि एक स्वीकार करे और दूसरा न स्वीकार करे तो उसे छोड़ दिया जायेगा।
इस स्थिति में दोनों कैदी दुविधा में पड़ जाते हैं और उनका निर्णय लेना कठिन हो जाता है।
चिकिन गेम और प्रिजनर्स डायलेम्मा गेम इन दोनों प्रतिमानों (मॉडल) के पीछे यह धारणा है कि किन्हीं दो राष्ट्रों के नीति-निर्माता यह तो जानते हैं कि वे एक-दूसरे के प्रति किस प्रकार की नीति अपना सकते हैं लेकिन वे यह नहीं जानते हैं कि इसके परिणाम क्या होंगे।
✦ 15. सौदेबाजी का सिद्धान्त (Bargaining Theory)
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी स्थितियाँ बहुत थोड़ी होती हैं कि Zero Sum Two Person गेम होता है क्योंकि यह केवल युद्ध की स्थितियों में ही लागू हो सकता है। किन्तु अंतरराष्ट्रीय स्थितियों में युद्ध के अलावा सहयोग एवं समन्वय के तत्व भी विद्यमान होते हैं, ये स्थितियाँ अधिकतर सौदेबाजी की स्थितियाँ होती हैं जिसमें संघर्ष और विरोध दोनों पाये जाते हैं।
खेल सिद्धान्त की कमियों को दूर करने के लिए थॉमस शेलिंग ने सौदेबाजी का सिद्धान्त सुझाया है और जॉन सी. हर्षानी ने भी इसका समर्थन किया है। वास्तव में यह खेल सिद्धान्त का ही विस्तृत रूप है लेकिन शेलिंग ने इसका प्रयोग मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के क्षेत्र में किया। क्योंकि संघर्षों को शांति से दूर करने के लिए एक साधन के रूप में अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं का बड़ा महत्व होता है, इसलिए आज इसकी प्रासंगिकता काफी बढ़ गयी है।
यह सिद्धान्त संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख तत्व मानता है। संघर्ष में इन दो राष्ट्रों के अपने-अपने दावे होते हैं जो कि दोनों को अमान्य होता है। चूँकि दोनों में कोई भी आणविक युद्ध नहीं चाहता इसलिए अपना हित सिद्ध करने के लिए वार्ता का सहारा लेना पड़ता है और वार्ता के दौरान दोनों साम, दाम, दण्ड, भेद सभी नीतियाँ अपनाकर बुरी से बुरी स्थितियों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं।
✦ 16. वार्ता के दृष्टिकोण एवं ओरान यंग का वर्गीकरण
सौदेबाजी सिद्धान्त में वार्ताओं का विशेष महत्व है, और इस वार्ता के बारे में निम्न तीन मत हैं:
- वार्ता में लगे पक्षों को अपनी माँगें स्पष्ट एवं स्थिर रखनी चाहिए और वार्ता के दौरान इसमें परिवर्तन नहीं कर सकते हैं।
- वार्ता के दौरान दोनों पक्षों को अपनी अधिमान्यता को बदलने का अधिकार है।
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तीसरा दृष्टिकोण जोसेफ नेगी का है:
इस दृष्टिकोण के अनुसार कुछ वार्तायें ऐसी होती हैं जिसमें कोई भी पक्ष समझौते पर पहुँचना नहीं चाहता लेकिन कोई भी पक्ष यह भी स्पष्ट नहीं करना चाहता कि वार्ता विफल रही है और वह ऐसी दृढ़ता भी नहीं अपनाना चाहता कि दूसरे पक्ष को मजबूरन वार्ता तोड़नी पड़े। अतः अक्सर यह प्रयास किया जाता है कि ऐसे प्रस्ताव पेश किया जाय जिसे आम जनता पसंद करती हो लेकिन उसमें एक जोकर (Joker) अर्थात् कोई एक पक्ष ऐसा रख दिया जाय कि दूसरा पक्ष उसे स्वीकार न करे। जिसके चलते वह सारे दावे को अस्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाय। इसे वार्ताकल्प का सिद्धान्त कहा जाता है।
■ ओरान यंग (Oran Young) का वर्गीकरण
ओरान यंग ने अपनी पुस्तक — The Politics of Force bargaining in International Crisis में सरल सौदेबाजी और युक्तिमूलक सौदेबाजी में अन्तर किया है:
- सरल सौदेबाजी: में सामान्य सूचनाओं के आधार पर कुछ ले देकर समझौता करने की इच्छा रहती है।
- युक्तिमूलक सौदेबाजी: में कूटनीतिक दाँव पेंचों का सहारा लेते हुए अपने हितों को प्राप्त करने की इच्छा रहती है। और इसके पीछे शक्ति के प्रबल तत्व होते हैं। सौदेबाजी का यह प्रकार शक्ति के साथ वार्ता के विचार के अधिक निकट है, इस प्रकार सौदेबाजी हमेशा एक प्रकार से बल प्रयोग है।
आलोचना एवं निष्कर्ष: इस सिद्धान्त की भी आलोचना हुई। इसका नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समस्याओं को नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। कई बार जाँचना अन्वेषक हो जाता है। यह उपागम तभी महत्वपूर्ण होता है जब गम्भीर स्थिति की संकट उत्पन्न हो गयी हो। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु युग का उदय हुआ है इसलिए आज इसे अति मारकता का युग कहा जाता है। इस युग में अब सौदेबाजी का सिद्धान्त अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
✦ 17. संचार सिद्धान्त (Communication Theory) व साइबरनेटिक्स
प्रसिद्ध अमेरिकी गणितज्ञ नॉर्बर्ट वीनर (Norbert Wiener) को संचार सिद्धान्त का प्रवर्तक माना जाता है। वीनर ने — साइबरनेटिक्स (Cybernetics) तथा फीडबैक सिस्टम के आधार पर संचार सिद्धान्त का विकास किया है।
राजनीति विज्ञान तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संचार सिद्धान्त को लागू करने का श्रेय हार्वर्ड प्रो. कार्ल डायच (Karl Deutsch) को जाता है। कार्ल डायच की पुस्तक — The Nerves of Government है।
संचार सिद्धान्त निर्णयों के परिणामों में उतनी रुचि नहीं लेता जितनी उनकी निर्माण की प्रक्रिया में। यह साइबरनेटिक्स के प्रतिरूप के अनुकूल ही है क्योंकि उसमें भी लक्ष्य से अधिक महत्व संचालन एवं समायोजन की प्रक्रिया को दिया जाता है। यह सिद्धान्त अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक संचार प्रणाली के रूप में देखता है और इसका साइबरनेटिक्स की सहायता से अध्ययन करता है।
साइबरनेटिक्स (Cybernetics) का अर्थ:
साइबरनेटिक्स सभी प्रकार के संगठनों पर नियंत्रण एवं संचार का विज्ञान है। यह मानवीय तथा मशीनी सभी प्रकार की संगठन की निर्णय प्रक्रिया का विज्ञान है।
✦ 18. कार्ल डायच का संचार प्रतिमान (Communication Model)
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संचार सिद्धान्त राष्ट्रों के मध्य सम्बन्धों को एक ऐसी संचार प्रणाली जिसमें निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मानवीय प्रयत्नों को नियन्त्रित तथा सही दिशा दी जाती है।
संचार सिद्धान्त यह मानता है कि राजनीतिक प्रणाली की कोई भी प्रक्रिया तब तक नहीं हो सकती जब तक उस प्रणाली के अंग एक-दूसरे से आपस में विचार-विनिमय अथवा संचार नहीं कर सकते। यह भाग का कुल से सम्बन्ध जोड़ता है। यह निर्णय निर्माण पर अधिक जोर देता है और निर्णय निर्माण सूचना की प्रक्रिया का ही परिणाम है। क्योंकि सूचनाओं के प्रवाह को ही संचार कहा जाता है। यह एक स्वसमायोजित एवं स्वनियंत्रित प्रक्रिया है।
कार्ल डायच का संचार प्रतिमान इस बात को मानता है कि सभी सामाजिक एवं राजनीतिक प्रक्रियाओं में सम्प्रेषण (संचार) प्रवाह की प्रतिक्रिया होती है, और इसी के द्वारा ही हम राजनीति तथा सामाजिक प्रक्रियाओं को समझ सकते हैं।
निष्कर्ष: संचार एक ऐसा सीमेंट है जिससे संगठन बनते हैं। अतः संचार प्रक्रिया को समझकर हम सभी संगठनों के वास्तविक कार्यप्रणाली को समझ सकते हैं। अतः राष्ट्रों के मध्य राजनीति को अच्छी तरह समझने के लिए यह प्रणाली महत्वपूर्ण हो सकती है।
✦ 19. केन्द्र-परिधि मॉडल / निर्भरता सिद्धान्त (Dependency Theory)
इसे केन्द्र-परिधि मॉडल (Center-Periphery Model), निर्भरता सिद्धान्त या पराश्रितता मॉडल (Dependency Theory) भी कहा जाता है। यह मॉडल विकसित और विकासशील देशों के सम्बन्ध को व्यक्त करता है।
इसके अनुसार विकसित देश 'केन्द्र' (Center) पर और विकासशील देश 'परिधियों' (Periphery) पर माने गए हैं। जिस प्रकार से केन्द्र से अलग परिधि का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता और परिधियों का निर्धारण केन्द्र करता है, उसी प्रकार से विकासशील देशों का विकसित देशों से अलग कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है और विकासशील देशों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों का निर्धारण भी किसी न किसी रूप में केन्द्र ही करता है।
विश्व पूँजीवादी व्यवस्था जिस पर विकसित देशों (अर्थात् केन्द्र) का प्रभुत्व है, उसके विश्लेषण के आधार पर इस मॉडल को हम समझ सकते हैं।
निर्भरता सिद्धान्त का मुख्य आधार: निर्भरता सिद्धान्त का केन्द्र बिन्दु यह है कि तीसरे विश्व के राज्यों की सामाजिक प्रक्रियाओं की प्रकृति का निर्धारण निम्न स्तरीय विकास की प्रक्रिया जो विश्व स्तर पर चलाया जा रहा है, वह पूँजीवादी विस्तार का ही परिणाम है।
सभी निर्भरताकार सिद्धान्त साधारण रूप से यह स्वीकार करते हैं कि निम्न स्तरीय विकास सदैव बाहरी निर्भरता से ही प्राप्त होते हैं और विकासशील देशों के अल्प/निम्न विकास का कारण विकसित देश हैं, क्योंकि आज भी विकासशील देश स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितियों को तय नहीं कर पा रहे हैं।
■ निर्भरता सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक
- ए.जी. फ्रैंक (A.G. Frank)
- वालरस्टेन (Immanuel Wallerstein)
- डॉस सैंटोस (Theotonio Dos Santos)
- फुर्तादो (Celso Furtado)
- फ्रांज फैनन (Frantz Fanon)
ये सभी मानते हैं कि तीसरे विश्व के देशों का निम्न स्तरीय विकास इनके नव-उपनिवेशीय आश्रित (Neo-colonial dependence) के कारण है। निर्भरता सिद्धान्त की उत्पत्ति के विकास का विवरण लैटिन अमेरिकी आर्थिक आयोग के कार्य से प्रारम्भ माना जा सकता है।
✦ 20. लैटिन अमेरिका का विश्लेषण (ए.जी. फ्रैंक व वालरस्टेन)
इसने सर्वप्रथम लैटिन अमेरिका के निम्न स्तरीय विकास का विश्लेषण किया।
ए.जी. फ्रैंक और वालरस्टेन का मत है कि विकासशील देशों के निम्न स्तरीय विकास को विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं ने संचालित किया है। इसने कहा कि परिधि देशों का विकास विद्यमान विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में नहीं हो सकता क्योंकि यह केन्द्र अर्थात् धनी राज्यों के पक्ष में है और परिधियों के लिए हानिकारक है।
विद्यमान व्यवस्था को जड़ से समाप्त करके ही विकासशील देश अपना विकास कर सकते हैं। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कुछ निर्भरता सिद्धान्तकारों ने समाजवादी क्रान्ति लाने का काम किया है तो कुछ ने उदारवादी सुधारों (जैसे— व्यापार में सन्तुलन, क्षेत्रीय सहयोग द्वारा सौदेबाजी, नयी तकनीकी तथा आर्थिक उपकरणों द्वारा अपनाकर इस उद्देश्य को प्राप्त करने की वकालत किया है।
■ ए.जी. फ्रैंक द्वारा लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था के 3 कारण
ए.जी. फ्रैंक ने लैटिन अमेरिकी राज्यों की अर्थव्यवस्था का गहन विश्लेषण किया और उसके निम्नलिखित तीन कारण बताये:
- आर्थिक अतिरेक (Economic Surplus)
- महानगरीय अनुषंगी ध्रुवीकरण (Metropolitan-satellite polarization)
- विरोधाभास (Contradiction - दोनों के बीच)
दृष्टिकोण में अन्तर:
ए.जी. फ्रैंक समाजवादी क्रान्ति द्वारा इस व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहते हैं, लेकिन मार्क्सवादी क्रान्ति द्वारा नहीं।
जबकि वालरस्टेन उदारवादी क्रान्ति (संरचनात्मक सन्तुलन) के द्वारा व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहते हैं।
✦ 21. संचार सिद्धान्त एवं निर्भरता मॉडल के आरेख (Diagrams)
■ राबर्ट वीनर का संचार सिद्धान्त प्रतिमान
संचार सिद्धान्त — जिसे कार्ल डायच ने विकसित किया, उसकी जड़ें प्रसिद्ध गणितज्ञ राबर्ट वीनर (Robert Wiener) के विचारों में हैं।
↓
संचार भेजा जाता है
↓
संगठन पर नियन्त्रण करता है।
संचार का विज्ञान है।
↓
पुनर्निवेशन
(आना और जाना)
खर्च होना और प्राप्त
संचार ⇒ यह दो राष्ट्रों को जोड़ता है। निर्णय निर्माण में अपनी भूमिका निभाता है।
■ केन्द्र-परिधि मॉडल (पराश्रितता मॉडल)
केन्द्र परिधि मॉडल → निर्भरता सिद्धान्त → पराश्रितता मॉडल (Dependency Theory)।
देश
देश
(विकसित देश) विकासशील देशों का
निर्धारण करता है
✦ 22. तृतीय विश्व (Third World): उत्पत्ति, अर्थ एवं इतिहास
तृतीय विश्व ⇒ एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के देश हैं जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आये।
राजनीतिक रूप से यदि हम विश्व का विभाजन करें तो यह देखा जा सकता है कि प्रथम विश्व युद्ध के पहले जो देश विद्यमान थे उन्हें 'प्रथम विश्व' की श्रेणी में रखा जाता है, इसमें— अमेरिका व यूरोपीय देश आते हैं। जबकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जो साम्यवादी देश अस्तित्व में आये उन्हें 'द्वितीय विश्व' की श्रेणी में रखा जाता है, इसमें— रूस और अन्य साम्यवादी देशों को रखा जाता है। और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो देश अस्तित्व में आये इन्हें 'तृतीय विश्व' की श्रेणी में रखा जाता है, इसमें— एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों को भी रखा जाता है।
लैटिन अमेरिका की विशेष स्थिति: लैटिन अमेरिका यद्यपि 19वीं शताब्दी में ही आजाद हो गया था लेकिन उस पर अमेरिका का प्रभुत्व किसी न किसी रूप में बना था इसलिए वह 'स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य' के रूप में अस्तित्व में नहीं आ सका था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब एशिया व अफ्रीका के देश स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापित हुए तो लैटिन अमेरिका भी उनके साथ शामिल हो गया।
अतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को तृतीय विश्व की श्रेणी में रखा गया। इन्हीं को विकासशील देश या अल्प विकसित देश या अर्द्ध विकसित देश के नाम से जाना जाता है।
शब्द की उत्पत्ति:
'तृतीय विश्व' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1952 में अल्फ्रेड सावी (Alfred Sauvy) ने किया था और इसकी विस्तृत व्याख्या फ्रांज फैनन (Frantz Fanon) ने किया।
तृतीय विश्व के देश वे देश हैं जो लम्बे समय तक पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े थे और उनका व्यापक सामाजिक, आर्थिक शोषण हुआ इसलिए आज वे काफी पिछड़ गये हैं। आज ये अपना विकास करना चाहते हैं, लेकिन विकास नहीं कर पाये हैं इसलिए आज इनकी स्थिति विश्व में गरीब व पिछड़े की है।
✦ 23. तृतीय विश्व की विशेषताएँ, भूमिका, माँगें एवं समस्याएँ
■ तृतीय विश्व की विशेषताएँ
तृतीय विश्व की स्थिति लगभग एक जैसी है, कुछ एक देशों को छोड़कर सब में लगभग एक जैसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जो कि निम्न हैं:
- इनकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि एवं बागवानी है।
- ये निर्यातों पर आश्रित हैं। यहाँ कच्चा माल और उपभोक्ता पर्याप्त मात्रा में हैं।
- यहाँ असन्तुलित घटक हैं।
- करिश्माई नेतृत्व है।
- राजनीतिक अस्थायित्व है।
- विधायिका का ह्रास।
- गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी आदि पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं।
- जाति, धर्म, भाषा पर आधारित राजनीतिक दल।
- राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव।
■ विश्व में तृतीय विश्व की भूमिका
तृतीय विश्व के देश निम्नलिखित आधार पर विश्व में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं:
- एफ्रो-एशियाई मैत्री सम्मेलन के माध्यम से।
- गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (NAM) के माध्यम से।
- बांडुंग सम्मेलन के माध्यम से।
- G-77 व G-15 के माध्यम से।
■ तृतीय विश्व की माँगें
- नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की स्थापना हो (पुरानी व्यवस्था नष्ट हो)।
- साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के साथ-साथ नव-साम्राज्यवाद व नव-उपनिवेशवाद की समाप्ति।
- उत्तर-दक्षिण संवाद (North-South Dialogue)।
- संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का लोकतंत्रीकरण।
■ तृतीय विश्व की समस्या
- ऋण ग्रस्तता की समस्या (Debt Trap)।
- हथियारों की होड़ (Arms Race)।
- आपसी एकता का अभाव।
✦ 24. अमेरिका एवं तृतीय विश्व (प्रमुख नीतियाँ)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैण्ड और यूरोप की शक्ति में ह्रास हो गया और उनका स्थान अमेरिका ने ले लिया। आज तृतीय विश्व के देशों को अमेरिका अपने अनुसार संचालित करने का प्रयास करता है। अमेरिका तृतीय विश्व के देशों के साथ निम्न नीतियाँ अपनाने का प्रयास कर रहा है:
- साम्यवाद परिरोधन (Containment of Communism) की नीति।
- आर्थिक सहायता की नीति।
- सैनिक अड्डा स्थापित करने की नीति।
- आर्थिक व सांस्कृतिक साम्राज्यवाद अपनाने की नीति।
- परमाणु संधियों की नीति।
- नई टेक्नॉलॉजी (Technology) के हस्तांतरण पर रोक की नीति।
- हथियारों के निर्यात की नीति।
- विभिन्न विश्व संगठनों के माध्यम से उस पर नियन्त्रण करने की नीति।
- उदारीकरण (Liberalization) की नीति।
✦ 25. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
उपर्युक्त 24 बिन्दुओं के विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप अत्यधिक जटिल और बहुआयामी हो गया है। विभिन्न विद्वानों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने और उसके सिद्धान्त निर्माण के लिए अनेक आंशिक सिद्धान्तों (Partial Theories) और मॉडल्स का विकास किया है। इन सभी का समग्र निष्कर्ष निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है:
-
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आंशिक सिद्धान्त (बिन्दु 1 से 10):
अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को समझने के लिए जॉर्ज लिस्का का संतुलन सिद्धान्त और मॉर्टन कैप्लान का व्यवस्था सिद्धान्त (6 मॉडल्स) बहुत महत्वपूर्ण हैं। लिस्का जहाँ अंतरराष्ट्रीय एकीकरण और संतुलन पर बल देते हैं, वहीं कैप्लान यह बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था किस तरह कार्य करती है। हालाँकि, कैप्लान के मॉडल को काल्पनिक बताकर इसकी आलोचना भी की गई, क्योंकि 'एक ध्रुवीय व्यवस्था' (Unipolarity) और 'परमाणु सम्पन्न देशों' की बढ़ती संख्या ने उनके मॉडल्स को चुनौती दी है। इसी कड़ी में, रिचर्ड स्नाइडर का निर्णय निर्माण सिद्धान्त यह सिद्ध करता है कि विदेश नीतियाँ केवल राज्यों द्वारा नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाले नेताओं के व्यक्तिगत और पर्यावरणीय कारकों (जैसे- नेहरू और इंदिरा के दृष्टिकोण में अन्तर) से गहराई से प्रभावित होती हैं। -
खेल और सौदेबाजी के सिद्धान्त (बिन्दु 11 से 16):
अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है, जहाँ हर राष्ट्र अपने लाभ (Payoff) के लिए रणनीति (Strategy) बनाता है। 'Zero Sum Two Person Game' केवल युद्ध की स्थिति का विश्लेषण करता है। इसलिए, वर्तमान की जटिल राजनीति (सहयोग और संघर्ष दोनों) को समझने के लिए थॉमस शेलिंग का सौदेबाजी का सिद्धान्त (Bargaining Theory), चिकिन गेम और प्रिजनर्स डायलेम्मा (दुविधा) अधिक प्रासंगिक हैं। ये सिद्धान्त बताते हैं कि परमाणु युग में कोई भी राष्ट्र सीधे युद्ध नहीं चाहता, बल्कि साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति अपनाकर मेज़ पर (वार्ताओं के ज़रिए) अपने हितों को साधना चाहता है। -
संचार और निर्भरता का सिद्धान्त (बिन्दु 17 से 21):
कार्ल डायच का संचार सिद्धान्त (Cybernetics) यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रों के बीच सूचनाओं का प्रवाह (Communication/Feedback) ही अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों और संगठनों की सफलता की कुंजी है। वहीं दूसरी ओर, विकासशील देशों की दरिद्रता का पर्दाफाश करते हुए ए.जी. फ्रैंक और वालरस्टेन ने 'केन्द्र-परिधि मॉडल' (Dependency Theory) दिया। इसके अनुसार, विकसित देश (केन्द्र) आज भी नव-उपनिवेशवाद के ज़रिए विकासशील देशों (परिधि) का आर्थिक व सामाजिक शोषण कर रहे हैं, जिससे विकासशील देश चाहकर भी स्वतंत्र रूप से अपना विकास नहीं कर पा रहे हैं। -
तृतीय विश्व की भूमिका और चुनौतियाँ (बिन्दु 22 से 24):
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नव-स्वतंत्र देशों को सम्मिलित रूप से 'तृतीय विश्व' (Third World) कहा जाता है। ये देश गरीबी, भुखमरी, ऋण-ग्रस्तता और राजनीतिक अस्थायित्व जैसी गम्भीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। अपने अधिकारों और नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की माँग को लेकर ये गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (NAM) और G-77 जैसे मंचों से अपनी आवाज़ बुलन्द कर रहे हैं। हालाँकि, अमेरिका जैसी महाशक्तियाँ आर्थिक सहायता, तकनीक हस्तांतरण पर रोक और 'साम्यवाद परिरोधन' जैसी नीतियों के माध्यम से आज भी तृतीय विश्व पर अपना नव-साम्राज्यवादी नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं।
सार-संक्षेप (Final Word): अंततः, अंतरराष्ट्रीय राजनीति कोई स्थिर विषय नहीं है, बल्कि यह निरंतर गतिशील (Dynamic) है। यद्यपि उपर्युक्त सभी सिद्धान्त (संतुलन, व्यवस्था, निर्णय-निर्माण, खेल, संचार और निर्भरता) अपने आप में पूर्ण (Universal) नहीं हैं और इनकी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं, फिर भी ये आंशिक सिद्धान्त (Partial Theories) विश्व राजनीति की भूलभुलैया, राष्ट्रों के व्यवहार, विदेशी नीतियों के निर्माण और महाशक्तियों के प्रभुत्व को समझने के लिए सबसे मज़बूत वैज्ञानिक आधार (Scientific Base) प्रदान करते हैं।
📝 अपनी तैयारी परखें!
अगर आपने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आंशिक सिद्धान्त (संतुलन, व्यवस्था, खेल, संचार आदि) को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रेक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।
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