| लोकतंत्र एवं अधिनायक तंत्र: ऐतिहासिक विकास और सम्पूर्ण सिद्धांत |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda के इस मास्टर पोस्ट में लोकतंत्र (Democracy) और अधिनायक तंत्र (Dictatorship) का सम्पूर्ण अध्ययन एक ही जगह उपलब्ध कराया गया है। इसमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, 'क्लासिकी (व्यक्तिवादी) लोकतंत्र', लोकतंत्र के गुण-दोष, प्रमुख विचारकों के कथन, और 20वीं शताब्दी के आधुनिक सिद्धांतों— विशिष्ट वर्गीय (Elitist), बहुलवादी (Pluralist) और जनवादी/मार्क्सवादी (Marxist) दृष्टिकोण को बहुत ही सरल व व्यवस्थित ढंग से समझाया गया है। |
📌 सम्पूर्ण विषय सूची (Table of Contents)
- 1. लोकतंत्र एवं अधिनायक तंत्र: एक परिचय
- 2. राजतंत्र से लोकतंत्र तक का ऐतिहासिक सफर
- 3. क्लासिकी (व्यक्तिवादी) लोकतंत्र: अर्थ व विशेषताएँ
- 4. लोकतंत्र के प्रकार (प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष)
- 5. व्यक्तिवादी लोकतंत्र के प्रमुख समर्थक
- 6. जेरेमी बेंथम और जे.एस. मिल के विचारों की तुलना
- 7. लोकतंत्र के प्रमुख गुण और दोष
- 8. लोकतंत्र की सफलता की प्रमुख शर्तें
- 9. लोकतंत्र पर विचारकों के महत्वपूर्ण कथन
- 10. लोकतंत्र के प्रमुख आलोचक
- 11. लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत (Elitist)
- 12. लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धांत (Pluralist)
- 13. जनवादी लोकतंत्र: मार्क्सवादी दृष्टिकोण
✦ 1. लोकतंत्र एवं अधिनायक तंत्र: एक परिचय
राजतंत्र का ठीक विलोम (Opposite) लोकतंत्र (Democracy) है। जैसे-जैसे उदारवाद का स्वरूप बदलता गया है वैसे-वैसे लोकतंत्र की विचारधारा में भी परिवर्तन होता गया और वहीं, लोकतंत्र का विलोम अधिनायक तंत्र (Dictatorship) है। अधिनायक तंत्र का सीधा सा अर्थ 'कट्टरता' से होता है। इसे फासीवाद (Fascism) और सर्वाधिकारवाद (Totalitarianism) के नाम से भी जाना जाता है।
| लोकतंत्र (Democracy) | अधिनायक तंत्र (Dictatorship) |
|---|---|
| लोकतंत्र व्यक्ति की स्वतंत्रता पर सर्वाधिक बल देता है। | यह राज्य को सर्वाधिक महत्व देता है और व्यक्ति को राज्य में विलीन कर देता है। |
| उदारवाद (Liberalism) की देन है। | फासीवाद और सर्वाधिकारवाद का रूप है। |
| व्यक्ति साध्य है, राज्य साधन है। | अधिनायकवाद कहता है कि राज्य ही सब कुछ है और राज्य की मर्ज़ी के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व नहीं है। |
✦ 2. राजतंत्र से लोकतंत्र तक का ऐतिहासिक सफर
16वीं शताब्दी में आधुनिकीकरण का उदय हुआ लेकिन 16वीं व 17वीं शताब्दी में निरंकुश राजतंत्र का ही बोलबाला था। कालक्रम के अनुसार लोकतंत्र का विकास कुछ इस प्रकार हुआ:
17वीं शताब्दी (1688 की क्रांति)
1688 में इंग्लैंड में 'गौरवपूर्ण क्रांति' हुई। इसके बाद निरंकुश राजतंत्र खत्म हो गया और संवैधानिक राजतंत्र का जन्म हुआ, जिसे लोकतंत्र के उदय का प्रारंभिक चरण माना जाता है।
18वीं शताब्दी (महान क्रांतियों का युग)
इस शताब्दी में लोकतंत्र की दिशा में दो महान क्रांतियाँ हुईं:
1. 1776 की अमेरिकी क्रांति: इसके प्रेरणास्रोत जॉन लॉक और जनक थॉमस जेफरसन माने जाते हैं। इसका नारा था— "जीवन, स्वतंत्रता और सुख का अधिकार।"
2. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति: इसके जनक रूसो माने जाते हैं। इसका नारा था— "स्वतंत्रता, समानता और बंधुता।"
Note: मुख्य रूप से फ्रांसीसी क्रांति से ही विश्व में लोकतंत्र का उदय माना गया है। इसीलिए 18वीं शताब्दी को 'संवैधानिक सरकार के उदय का युग' कहा जाता है।
19वीं शताब्दी (क्लासिकी लोकतंत्र)
सच्चे अर्थों में लोकतंत्र का उदय 19वीं शताब्दी में हुआ। इसे व्यक्तिवादी लोकतंत्र या क्लासिकी लोकतंत्र (Classical Democracy) कहा गया, जिसके जनक जॉन लॉक (John Locke) माने जाते हैं।
20वीं शताब्दी (विचारधाराओं का टकराव)
20वीं सदी में लोकतंत्र उदारवाद की देन बना रहा, लेकिन उदारवादी विचारधारा के विरोध में मार्क्सवाद और फासीवाद का जन्म हुआ। बाद में फासीवाद और मार्क्सवाद के विरोध में लोकतंत्र के नए रूप— विशिष्ट वर्गीय लोकतंत्र और बहुलवादी लोकतंत्र का जन्म हुआ।
✦ 3. क्लासिकी (व्यक्तिवादी) लोकतंत्र: अर्थ व विशेषताएँ
प्रारम्भ में उदारवाद का दृष्टिकोण व्यक्तिवादी था, इसलिए इसे व्यक्तिवादी लोकतंत्र, परम्परागत लोकतंत्र, शास्त्रीय लोकतंत्र या क्लासिकी (Classical) लोकतंत्र के नाम से जाना गया।
19वीं शताब्दी के इस लोकतंत्र में व्यक्ति किसी समूह या दल के माध्यम से राजनीति में भागीदारी नहीं करता था, बल्कि वह निर्दलीय चुनाव लड़ता था। चुनाव जीतकर वह बहुमत से सरकार बनाता था, जो जनता के प्रति उत्तरदायी होती थी।
क्लासिकी लोकतंत्र की 6 प्रमुख विशेषताएँ:
- इसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।
- यह बहुमत के शासन पर आधारित व्यवस्था है।
- इसमें सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।
- इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सिद्धांत पाया जाता है।
- इसमें विधि के शासन (Rule of Law) को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।
- शक्तियों के विभाजन और शक्ति के पृथक्करण (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका) पर बल दिया जाता है।
✦ 4. लोकतंत्र के प्रकार (प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष)
मुख्य रूप से लोकतंत्र दो प्रकार का होता है, जिसे प्रत्यक्ष (Direct) तथा अप्रत्यक्ष/प्रतिनिधि (Representative) लोकतंत्र कहा जाता है।
| प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) | अप्रत्यक्ष / प्रतिनिधि लोकतंत्र |
|---|---|
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अर्थ: इसमें जनता शासन में सीधे (Directly) भाग लेती है。 जनक: रूसो (Rousseau) उपयोगिता: यह छोटे देशों के लिए उपयुक्त है। जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण अब इसका महत्व कम हो गया है。 प्रमुख साधन (Tools):
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अर्थ: इसमें जनता स्वयं शासन न करके, अपने द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेती है。 जनक: जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) उपयोगिता: वर्तमान समय में विशाल जनसंख्या वाले देशों में इसी प्रणाली का बोलबाला है。 सिद्धांत: यह मुख्य रूप से 'एक व्यक्ति - एक वोट' के सिद्धांत पर आधारित है। |
✦ 5. व्यक्तिवादी लोकतंत्र के प्रमुख समर्थक
क्लासिकी (व्यक्तिवादी) लोकतंत्र के प्रमुख समर्थकों में जॉन लॉक, मॉन्टेस्क्यू, एडम स्मिथ, बेंथम और जे.एस. मिल का नाम प्रमुखता से आता है।
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1. जॉन लॉक (John Locke):
लॉक ने व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा कि 'विधि और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं।' उनके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को जीवन, स्वतंत्रता और सम्पत्ति (Life, Liberty & Property) नामक प्राकृतिक अधिकार प्राप्त हैं, इसलिए सभी व्यक्ति बराबर हैं।
लॉक ने प्रतिनिधि लोकतंत्र, सीमित सरकार, उत्तरदायी सरकार, विधि का शासन आदि का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लॉक का स्पष्ट मानना था कि राज्य/सरकार का निर्माण प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है; यदि सरकार ऐसा नहीं कर पाती, तो जनता बहुमत से सरकार को हटा सकती है। -
2. मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu):
इन्होंने 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यही सिद्धांत आगे चलकर अमेरिका में 'अध्यक्षीय शासन प्रणाली' (Presidential System) का मुख्य आधार बना। -
3. एडम स्मिथ (Adam Smith):
इन्होंने आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए राज्य के 'अहस्तक्षेप के सिद्धांत' (Laissez-Faire) का प्रतिपादन किया।
✦ 6. जेरेमी बेंथम और जे.एस. मिल के विचारों की तुलना
यद्यपि जे.एस. मिल (J.S. Mill), जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) के ही शिष्य थे, लेकिन लोकतंत्र और मतदान प्रणाली को लेकर दोनों के विचारों में भारी बुनियादी अंतर था।
| जेरेमी बेंथम (मात्रात्मक दृष्टिकोण) | जे.एस. मिल (गुणात्मक दृष्टिकोण) |
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प्रमुख कथन: "प्रत्येक व्यक्ति को एक माना जाय, किसी को एक से अधिक नहीं।"
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प्रमुख कथन: "मतों को तोला जाय, गिना जाय नहीं।"
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💡 जे.एस. मिल के अन्य महत्वपूर्ण कथन:
अतः स्पष्ट है कि व्यक्तिवादी लोकतंत्र में व्यक्ति को महत्व दिया जाता है, और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है यह बहुमत के शासन पर आधारित व्यवस्था है।
✦ 7. लोकतंत्र के प्रमुख गुण और दोष
व्यक्तिवादी लोकतंत्र में जहाँ एक ओर व्यक्ति और उसकी स्वतंत्रता को सर्वोच्च माना गया है, वहीं इसकी कुछ व्यावहारिक कमियां भी हैं। इसके गुण व दोष इस प्रकार हैं:
✅ लोकतंत्र के गुण (Merits)
- जनकल्याण की भावना
- सर्वाधिक कुशल प्रशासन
- जनता का नैतिक उत्थान
- देशभक्ति का स्रोत
- क्रांति से सुरक्षा (शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन)
- स्वतंत्रता की रक्षा
- समानता का पोषक
- सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व
❌ लोकतंत्र के दोष (Demerits)
- गुण की अपेक्षा संख्या (बहुमत) पर बल
- दल प्रणाली (Party System) का अहंकारी प्रभाव
- अयोग्यता की पूजा (भीड़तंत्र का डर)
- भ्रष्ट शासन व्यवस्था (चुनावों में धन-बल)
- धनवानों (पूंजीपतियों) का अप्रत्यक्ष शासन
- पेशेवर राजनीतिज्ञों का विकास
- युद्ध एवं संकट के समय निर्णय लेने में देरी
- बहुमत होने पर निरंकुशता का डर
✦ 8. लोकतंत्र की सफलता की शर्तें
किसी भी देश में लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित 9 प्रमुख शर्तों का होना अत्यंत आवश्यक माना गया है:
- शिक्षित एवं जागरूक जनता
- नागरिकों का नैतिक उत्थान
- आर्थिक समानता
- लिखित संविधान एवं प्रजातांत्रिक व्यवस्था
- स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government)
- स्वस्थ एवं सुदृढ़ राजनीतिक दल
- बुद्धिमान एवं सतर्क नेतृत्व
- स्वतंत्र प्रेस (Free Press)
- समाज में एकता की भावना
✦ 9. लोकतंत्र पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण कथन
"लोकतंत्र जीवन का एक ढंग है।"
ने लोकतंत्र को 'एक जीवन शैली' के रूप में परिभाषित किया।
"लोकतंत्र का अर्थ है सहिष्णुता, न केवल उनके प्रति जिनसे हम सहमत हैं, बल्कि उनके प्रति भी जिनसे हम असहमत हैं।"
"मनुष्यों में न्याय की क्षमता पायी जाती है इसलिए लोकतंत्र संभव है, परन्तु मनुष्यों में अन्याय की प्रवृत्ति पायी जाती है इसलिए लोकतंत्र आवश्यक है।"
"प्रजातंत्र ऐसा राज्य नहीं होता जिसमें जनता भेड़ों के समान कार्य करे, इसमें जनता को जागरूक रहना पड़ता है।"
"लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है जिसमें शासन की शक्ति किसी विशेष वर्ग या वर्गों में निहित न होकर सम्पूर्ण जन समुदाय में निहित होती है।"
"लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है जिसमें शासक समुदाय सम्पूर्ण राष्ट्र का अपेक्षाकृत एक बड़ा भाग होता है।"
"लोकतंत्र लोगों की देशभक्ति को बढ़ाता है क्योंकि नागरिक यह अनुभव करते हैं कि सरकार उन्ही की उत्पन्न की हुई वस्तु है और अधिकारी उनके स्वामी न होकर सेवक हैं।"
"पूर्ण लोकतंत्र में कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिला। "
"मैं प्रजातंत्र में इसलिए विश्वास करता हूँ कि वह प्रत्येक की शक्ति को उन्मुक्त कर देता है।"
"लोकतंत्र एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जनसाधारण के मन में सत्ता के बारे में अधिकतम भ्रम पैदा किया जाता है जबकि वास्तव में उन्हें सबसे कम सत्ता दी जाती है।"
✦ 10. लोकतंत्र के प्रमुख आलोचक (Critics)
लोकतंत्र के कई प्रखर आलोचक भी रहे हैं, जिन्होंने इसे अयोग्यों और भीड़ का शासन कहा है। प्रमुख आलोचक इस प्रकार हैं:
- 🔴 टेलीरैण्ड (Talleyrand): ने लोकतंत्र को "दुष्टों का कुलीनतंत्र" कहा।
- 🔴 लुडोविसी (Ludovici): "प्रजातंत्र लोगों को मृत्यु की ओर ले जाता है।"
- 🔴 सर हेनरी मेन: "लोकतंत्र साहित्य, कला, विज्ञान तथा जीवन के विभिन्न पक्षों की उन्नति के लिए सर्वाधिक अनुपयुक्त है।"
- 🔴 प्लेटो (Plato): ने लोकतंत्र को मूर्खों, अभिज्ञों और अल्पज्ञों का शासन कहा।
- 🔴 अरस्तु (Aristotle): ने लोकतंत्र को 'भीड़तंत्र' (Mobocracy) की संज्ञा दी।
🔸 सीले (Seeley): "लोकतंत्र वह शासन है जिसमें हर व्यक्ति हिस्सा लेता है।"
🔸 सारटोरी (Sartori): ने लोकतंत्र को "प्रजातांत्रिक भ्रम का युग" कहा।
✦ 11. लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत (Elitist Theory)
20वीं शताब्दी में क्लासिकी लोकतंत्र (Classical Democracy) की आलोचना करके 'उदारवाद' ने लोकतंत्र का समकालीन सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें विशिष्ट वर्गीय लोकतंत्र और बहुलवादी लोकतंत्र को रखा जाता है।
यह अनुभववादियों (Empiricists) की देन है। यह सिद्धांत वास्तव में फासीवाद और मार्क्सवाद का दार्शनिक उत्तर था। इसका मुख्य मानना है कि यदि लोकतंत्र को बचाना है, तो इसे जनसाधारण (Masses) से दूर रखना होगा।
विशिष्ट वर्ग (Elite) का क्या अर्थ है?
विशिष्ट वर्ग (Elite) ऐसे व्यक्तियों का छोटा समूह होता है जो ज्यादा समझदार, संभ्रांत (Aristocratic) और योग्य होता है। इसे जनसाधारण से अलग रखा जाता है। इसे अभिजन वर्ग या कुलीन वर्ग भी कहा जाता है। इसमें 'नेताओं की भूमिका' को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रमुख प्रतिपादक एवं समर्थक:
विशिष्ट वर्गीय लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुसार किसी भी समाज या संगठन के अंतर्गत महत्वपूर्ण निर्णय केवल गिने-चुने लोग ही करते हैं। वर्गीय लोकतंत्र के लिए विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया है। इटली के दो समाज वैज्ञानिक पैरेटो (Pareto) और मोस्का (Mosca) इसके प्रमुख प्रतिपादक हैं। अन्य समर्थकों में राबर्ट मिचेल, जेम्स बर्नहम, कार्ल मानहाइम, सारटोरी, और शुम्पीटर (Schumpeter) शामिल हैं।
| विचारक (Thinker) | सिद्धांत / शब्दावली / कथन |
|---|---|
| पैरेटो (Vilfredo Pareto) |
• इन्होंने 'शासक विशिष्ट वर्ग' (Governing Elite) शब्द का प्रयोग किया。 • कथन: "इतिहास कुलीनतंत्र का कब्रिस्तान है।" |
| राबर्ट मिचेल (Robert Michels) |
• इन्होंने 'शक्ति विशिष्ट वर्ग' (Power Elite) शब्द का प्रयोग किया。 • 'अल्पतंत्र का लौह नियम' (Iron Law of Oligarchy): सत्ता हमेशा कुछ ही लोगों (अल्पतंत्र) के हाथ में होती है。 • 'विशिष्ट वर्ग की अदला-बदली' (Circulation of Elites) का सिद्धांत दिया। |
| मोस्का (Gaetano Mosca) | • इन्होंने 'राजनीति विशिष्ट वर्ग' (Political Elite) शब्द का प्रयोग किया। |
| सारटोरी (Sartori) | अपनी पुस्तक 'डेमोक्रेटिक थिअरी' में लिखा: "विशिष्ट वर्ग चुनाव मैदान में उतरकर आपस में मुकाबला करते हैं जिसमें योग्य नेता के चुनाव का अवसर मिलता है।" |
| शुम्पीटर (Schumpeter) | लोकतंत्र मे राजनीतिक निर्णय नेताओं द्वारा लिए जाते हैं, जनसाधारण द्वारा नहीं। जनसाधारण का कार्य केवल नेताओं के बीच 'खुली प्रतियोगिता' में वोट देकर उन्हें चुनना है। |
मैकफर्सन (C.B. Macpherson) ने इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए लिखा है: "लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत ने लोकतंत्र को एक मानवीय आकांक्षा के स्तर से नीचे गिराकर बाजार संतुलन (Market Equilibrium) में बदल दिया है।"
✦ 12. लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धांत (Pluralist Theory)
लोकतंत्र के बहुलवादी सिद्धांत के प्रमुख समर्थक राबर्ट डाहल (Robert Dahl) हैं। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'पोलार्की' (Polyarchy - बहुलतंत्र) है।
- बहुलवादी लोकतंत्र ने विशिष्ट वर्गीय लोकतंत्र को क्लासिकी लोकतंत्र के साथ मिलाया।
- यह स्वीकार करता है कि सत्ता कुछ ही लोगों (नेताओं) में होती है, लेकिन वे अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
- जहाँ 19वीं शताब्दी में 'व्यक्ति' राजनीति में अकेले भागीदारी करता था, वहीं 20वीं सदी में व्यक्ति किसी समूह या संस्था (Groups/Organizations) के माध्यम से भागीदारी करेगा।
बहुलवादी लोकतंत्र की विशेषताएँ:
यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें विभिन्न समूहों के आपसी सलाह मशविरे से नीति निर्धारण होता है। इसमें सत्ता के विकेंद्रीकरण (Decentralization of Power) को महत्व दिया जाता है और सत्ता समाज के विभिन्न हिस्सों में बंटी होती है।
आज बहुलवादी लोकतंत्र का ही बोलबाला है। आज सरकार जब कोई निर्णय लेती है तो विभिन्न समूहों या संगठनों से सलाह मशविरा करती है। आज समूहवादी लोकतंत्र को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे सहभागी लोकतंत्र, विमर्श लोकतंत्र, तृणमूल लोकतंत्र।
✦ 13. मार्क्सवादी दृष्टिकोण: जनवादी लोकतंत्र (People's Democracy)
मार्क्सवाद, उदारवाद (Liberalism) का घोर विरोधी है। जहाँ उदारवाद लोकतंत्र और पूंजीवाद की संस्थाओं में कोई विरोध नहीं देखता, वहीं मार्क्सवाद कहता है कि लोकतंत्र की सार्थकता के लिए 'समाजवाद' लाना अनिवार्य है।
- मार्क्सवादी, उदारवादी लोकतंत्र को 'बुर्जुआ लोकतंत्र' (Bourgeois Democracy) कहकर पुकारते हैं।
- ममार्क्सवादी की मान्यता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में समाज वर्ग विभाजित है अतः केवल एक ही वर्ग लोकतंत्र का प्रयोग करता है और दूसरा वर्ग उससे वंचित हैं।
- सच्चे अर्थ में लोकतंत्र तब आएगा जब उत्पादन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का नियंत्रण स्थापित हो जाएगा।
लेनिन का योगदान (लोकतांत्रिक केंद्रवाद)
जनवादी लोकतंत्र का सम्बन्ध मार्क्सवाद से है और इसका स्पष्ट प्रतिपादन लेनिन ने किया। जनवादी लोकतंत्र लोकतांत्रिक केन्द्रवाद के सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें एक ही दल होता है जिसे माना जाता है कि वह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करता है, कोई दूसरा प्रतिस्पर्धी दल नहीं होता। इसे कैडर आधारित व्यवस्था कहते है। इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक छोटे-छोटे कम्यून होते है और सबसे ऊपर जो सबसे बड़ा कम्यून होता है उसे पोलिट ब्यूरो कहते है। यहाँ नीचे वाला कम्यून का सदस्य ऊपर वाले का क्रमशः चुनाव करते हैं, अर्थात चुनाव नीचे से ऊपर की ओर होता है और आदेश ऊपर से नीचे की ओर आता है। पोलिट ब्यूरो का महासचिव स्वमेव राष्ट्र की बागडोर संभाल लेता है। माउत्सेतुंग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Democratic Dictatorship में लोकतांत्रिक केन्द्रवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया। यही व्यवस्था वर्तमान में China में भी है। China की संसद का नाम जनवादी कांग्रेस है जिसमे 2987 लोग है और इसका महासचिव ही राष्ट्र की बागडोर संभालता है। डेंग शियाओ पेंग ने चीन का आधुनिकीकरण किया।
■ विस्तृत निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त विवेचन का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि लोकतंत्र (Democracy) कोई स्थिर या जड़ अवधारणा नहीं है, बल्कि यह समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार निरंतर विकसित होने वाली एक जीवंत व्यवस्था है।
जहाँ 19वीं शताब्दी के 'क्लासिकी या व्यक्तिवादी लोकतंत्र' (Classical Democracy) ने निरंकुश राजतंत्र के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और 'विधि के शासन' की मजबूत नींव रखी, वहीं 20वीं शताब्दी तक आते-आते इसके कई यथार्थवादी आयाम सामने आए। विशिष्ट वर्गीय (Elitist) और बहुलवादी (Pluralist) विचारकों ने यह सिद्ध किया कि आधुनिक जटिल और विशाल समाजों में सत्ता पूरी तरह से आम जनता के हाथों में नहीं, बल्कि योग्य 'विशिष्ट वर्गों' या 'विभिन्न दबाव समूहों' के पास होती है, जो जनमत के प्रति उत्तरदायी होते हैं। दूसरी ओर, मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने पूंजीवादी लोकतंत्र की आलोचना करते हुए 'जनवादी लोकतंत्र' की वकालत की, जिसका उद्देश्य आर्थिक समानता स्थापित करना है।
अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि लोकतंत्र में कुछ व्यावहारिक कमियां (जैसे- भीड़तंत्र का डर या दलीय राजनीति का अहंकार) हो सकती हैं, किन्तु अधिनायक तंत्र (Dictatorship) की निरंकुशता, तानाशाही और व्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन की तुलना में लोकतंत्र आज भी विश्व की सबसे मानवीय, उत्कृष्ट और जनकल्याणकारी शासन प्रणाली है। अंततः, लोकतंत्र की वास्तविक सफलता केवल इसके संवैधानिक ढाँचे पर नहीं, बल्कि एक जागरूक, शिक्षित और सतर्क जनता पर निर्भर करती है, जिसके हाथ में मतदान रूपी सदाबहार डंडा हो।