सम्प्रभुता के सिद्धान्त: अर्थ, लक्षण, एकलवादी और बहुलवादी सिद्धान्त

सम्प्रभुता के सिद्धान्त नोट्स – अर्थ, लक्षण, एकलवादी और बहुलवादी सिद्धान्त
सम्प्रभुता (Sovereignty): अर्थ, लक्षण, विविध रूप एवं बहुलवादी सिद्धान्त
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में 'सम्प्रभुता (Sovereignty)' का अर्थ, उत्पत्ति, ऐतिहासिक विकास, विभिन्न विचारकों के कथन, एकलवादी (ऑस्टिन) एवं बहुलवादी सिद्धान्तों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह राजनीति विज्ञान के हस्तलिखित नोट्स पर आधारित है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

✦ 1. सम्प्रभुता का अर्थ, उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास

सम्प्रभुता राज्य का प्राण तत्व है। सम्प्रभुता के अभाव में हम राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकते। सम्प्रभुता ही एक ऐसा तत्व है जो किसी राज्य को अन्य संस्थाओं से अलग करता है। सम्प्रभुता के कारण ही राज्य अपनी गृह नीति (Internal Policy) व विदेश नीति (Foreign Policy) का निर्धारण स्वयं करता है। इसे अंतिम सत्ता, सर्वोच्च सत्ता व प्रभुसत्ता आदि विविध नामों से जाना जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य: सम्प्रभुता आधुनिक कालीन अवधारणा है, इसका उदय 16वीं शताब्दी में हुआ और यह 'राष्ट्र राज्य' की अवधारणा के साथ जुड़ी है।

1576 में जीन बोदां (Jean Bodin) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "द सिक्स बुक्स ऑफ द रिपब्लिक' (The Six Books of the Republic) " में सर्वप्रथम सम्प्रभुता का स्पष्ट और वैज्ञानिक विचार दिया। यद्यपि बोदां ने सम्प्रभुता का विभाजन नहीं किया, परन्तु बाद में गार्नर ने आंतरिक सम्प्रभुता का और ग्रोसियस ने बाह्य सम्प्रभुता का स्वरूप स्पष्ट किया।

❖ शब्द की व्युत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास

सम्प्रभुता को अंग्रेज़ी में Sovereignty कहते हैं, जो लैटिन भाषा के दो शब्दों Super + Anus से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'सर्वोच्च सत्ता' (Supreme Power)। यद्यपि संप्रभुता आधुनिक काल की देन है लेकिन यह किसी न किसी रूप में प्राचीन काल और मध्यकाल में भी विद्यमान थी। प्राचीन काल में इसके लिए अरस्तू ने सर्वोच्च सत्ता शब्द का प्रयोग किया था जबकि मध्य काल में इसके लिए क्षेत्रीय आधिपत्य शब्द का प्रयोग किया गया था और इन्हीं दोनों विचारो से मिलकर आधुनिक काल में संप्रभुता का जन्म हुआ।

प्राचीन काल
(अरस्तू ने 'सर्वोच्च सत्ता' कहा)
+
मध्यकाल
('क्षेत्रीय आधिपत्य' की अवधारणा)
=
आधुनिक काल
(सम्प्रभुता - Sovereignty)

नोट: यद्यपि राजनीति सिद्धांत, सम्प्रभुता आदि सभी यूरोप की देन हैं और बोदां इसके जनक हैं, लेकिन सम्प्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉन लॉक ने किया था। राज्य और संप्रभुता एक दूसरे के पूरक हैं आधुनिक काल में संप्रभुता के स्थान पर लॉक ने सर्वोच्च सत्ता शब्द का प्रयोग किया है।

✦ 2. सम्प्रभुता की स्थिति: किस व्यवस्था में कहाँ निहित है?

विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में सम्प्रभुता का निवास स्थान अलग-अलग माना जाता है:

  • लोकतंत्र (Democracy) में: सम्प्रभुता जनता (Public) में निहित होती है।
  • भारत में: सम्प्रभुता संविधान (Constitution) में निहित है, क्योंकि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में संविधान ही सर्वोच्च है।
  • संघात्मक व्यवस्था (Federal System) में: सम्प्रभुता संविधान में निहित होती है।
  • संसदीय व्यवस्था (Parliamentary System) में: सम्प्रभुता संसद (Parliament) में निहित होती है (जैसे ब्रिटेन में)।

✦ 3. सम्प्रभुता के प्रमुख लक्षण / विशेषताएँ

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर सम्प्रभुता के निम्नलिखित प्रमुख 8 लक्षण (Features) बताए जा सकते हैं:

  1. अविभाज्यता (Indivisibility)
  2. पूर्णता (Absoluteness)
  3. निरंकुशता (Autocracy)
  4. अहस्तान्तरणीयता (Inalienability)
  5. अदेयता (Imprescriptibility)
  6. मौलिकता (Originality)
  7. सार्वभौमिकता (Universality)
  8. असीमितता (Unlimitedness)

✦ 4. सम्प्रभुता पर विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन

यद्यपि सम्प्रभुता के बारे में कोई एक निश्चित परिभाषा दे पाना संभव नहीं है, फिर भी विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने अनुसार सम्प्रभुता पर विचार दिए हैं:

विचारक प्रमुख कथन (Quotes)
जीन बोदां (Jean Bodin) "सम्प्रभुता प्रजाजनों और नागरिकों पर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जिस पर कानून के कोई बंधन नहीं होते।"
डॉ. गार्नर (Garner) "सम्प्रभुता राज्य की ऐसी विशेषता है जिसके कारण वह अपनी इच्छा के अलावा और किसी चीज से बंधा नहीं होता और अपने आप के अलावा किसी अन्य से सीमित नहीं होता।"
ग्रोसियस (Grotius) "सम्प्रभुता उस व्यक्ति में निहित सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जिसके कार्य अन्य किसी पर आश्रित न हो और जो अपने आप के अलावा अन्य किसी से सीमित न हो।"
वुडरो विल्सन (Wilson) "सम्प्रभुता वह शक्ति है जो सदा सक्रिय रहकर कानून बनाती है और उसका पालन करवाती है।"
विलोबी (Willoughby) "सम्प्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है।"
गेटेल (Gettell) "विभाजित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।"
ऑस्टिन (Austin) "सम्प्रभुता अन्य सभी से आदेश पालन कराने की स्थिति में होती है किन्तु स्वयं किसी के भी आदेश का पालन करने का अभ्यस्त नहीं होती।"
रूसो (Rousseau) "सार्वजनिक संकल्प ही सम्प्रभु है।"
लीबर (Lieber) "जिस प्रकार निज (स्वयं) को नष्ट किये बिना मनुष्य अपने जीवन तथा व्यक्तित्व को अलग नहीं कर सकता, उसी प्रकार सम्प्रभुता को भी राज्य से पृथक नहीं किया जा सकता।"
कालहन (Calhoun) "जिस प्रकार अर्द्धत्रिभुज और अर्द्ध वृत्त की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार आधी तिहाई सम्प्रभुता की भी कल्पना नहीं की जा सकती।"
हॉब्स (Hobbes) "सीमित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।"

✦ 5. सम्प्रभुता के विविध रूप (औपचारिक व वास्तविक)

अध्ययन की दृष्टि से सम्प्रभुता को कई रूपों में विभाजित किया जाता है। इसका पहला प्रमुख वर्गीकरण औपचारिक (Formal) और वास्तविक (Real) सम्प्रभुता के बीच है।

❖ औपचारिक सम्प्रभुता व वास्तविक सम्प्रभुता में अंतर

यह अंतर केवल संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) में पाया जाता है, अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System) में नहीं। अध्यक्षीय प्रणाली में राष्ट्र का संवैधानिक प्रधान और सरकार का वास्तविक प्रधान दोनों एक ही होता है, लेकिन संसदीय शासन प्रणाली में दोनों अलग-अलग होते हैं।

औपचारिक सम्प्रभुता (Titular/Formal)
  • वह जिसमें सैद्धांतिक रूप से सम्पूर्ण शक्तियाँ निहित होती हैं।
  • लेकिन वह स्वयं इनका प्रयोग नहीं करता क्योंकि उसे संविधान विवेक का अधिकार नहीं देता।
  • उदाहरण: इंग्लैंड का सम्राट और भारत का राष्ट्रपति।
वास्तविक सम्प्रभुता (Real)
  • वास्तविक सम्प्रभुता उसमें निहित होती है जो व्यावहारिक रूप से सभी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  • यह औपचारिक सम्प्रभु के नाम से सत्ता का संचालन करता है।
  • उदाहरण: मंत्रिपरिषद या मंत्रिमंडल (प्रधानमंत्री)।

✦ 6. कानूनी सम्प्रभुता और राजनीतिक सम्प्रभुता में अंतर

कानूनों को बनाने और उसे लागू करवाने की शक्ति जिसके पास होती है, वह 'कानूनी सम्प्रभु' (Legal Sovereign) कहलाता है। कानूनी सम्प्रभु तभी तक मान्य होता है जब तक न्यायालय उसे मान्यता देता है। जैसे ही न्यायालय अपनी मान्यता समाप्त कर देता है, वह कानूनी सम्प्रभु नहीं रह जाता। उदाहरण: इंग्लैंड में संसद सहित सम्राट और भारत में संसद सहित राष्ट्रपति कानूनी संप्रभु है।

कानूनी सम्प्रभु के पीछे एक और सम्प्रभु होता है जो कानूनी सम्प्रभु को प्रभावित करता है, जिसे राजनीतिक संप्रभु कहते हैं। किसी राज्य में पाये जाने वाले सभी प्रभावों का योग 'राजनीतिक सम्प्रभु' (Political Sovereign) कहलाता है। अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों, निर्वाचक मण्डल, जुलूसों तथा विभिन्न प्रकार की संस्थाओं में राजनीतिक सम्प्रभुता पायी जाती है।

"वकीलों द्वारा मान्य कानूनी सत्ताधारी के पीछे एक ऐसा प्रभुसत्ताधारी होता है, जिसके सामने कानूनी सम्प्रभु को अपना सिर झुकाना पड़ता है, वही राजनीतिक सम्प्रभुता धारी होता है।" — ए. वी. डायसी

नोट - डायसी पहले राजनीतिक विचारक हैं, जिन्होंने कानूनी संप्रभुता और राजनीतिक संप्रभुता में अंतर किया है।

✦ 7. राजनीतिक सम्प्रभुता और लौकिक सम्प्रभुता में अंतर

प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) में दोनों में कोई अंतर नहीं पाया जाता, क्योंकि राजनीतिक और लौकिक दोनों सम्प्रभुता सीधे जनता में निहित होती हैं (जैसे- प्राचीन यूनान में)। लेकिन अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (Indirect Democracy) में दोनों में स्पष्ट अंतर पाया जाता है।

अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में राजनीतिक सम्प्रभुता जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों में निहित होती है, जबकि लौकिक सम्प्रभुता सीधे जनता (Public) में निहित होती है। ध्यान रहे कि लौकिक सम्प्रभुता के विकास में राजनीतिक सम्प्रभुता ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सम्प्रभुता का प्रकार जनक (Father/Founder) प्रमुख समर्थक विचारक
राजनीतिक सम्प्रभुता जॉन लॉक (John Locke) ग्रोसियस
लौकिक सम्प्रभुता जीन जैक्स रूसो (J.J. Rousseau) अल्थ्यूसियस

✦ 8. विधि सम्मत एवं तथ्य सम्मत सम्प्रभुता में अंतर

प्रसिद्ध विचारक ऑस्टिन (Austin) इन दोनों में कोई अंतर नहीं मानते, जबकि डॉ. गार्नर (Garner) दोनों में स्पष्ट अंतर करते हैं।

  • विधि सम्मत सम्प्रभु (De Jure Sovereign): वह होता है जो संविधान व कानून के अनुसार किसी देश में शासन करता है।
  • तथ्य सम्मत सम्प्रभु (De Facto Sovereign): यह वह होता है जो वास्तव में शासन की शक्तियों का प्रयोग करता है और जिसकी बात जनता मानती है, भले ही कानूनी दृष्टि से सत्ता किसी और के नाम पर हो।
क्रांति और युद्ध का प्रभाव:
सामान्यतः विधि सम्मत और तथ्य सम्मत सम्प्रभु एक ही होता है। लेकिन क्रांति या तख्तापलट के समय जब कोई व्यक्ति या समूह बलपूर्वक सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, तो पुराना 'विधि सम्मत' शासक हट जाता है और नया कब्ज़ा करने वाला 'तथ्य सम्मत' (De Facto) शासक बन जाता है और तुरंत शासन करने लगता है। बाद में वह चुनाव या संविधान में बदलाव करके स्वयं को 'विधि सम्मत' (De Jure) भी बना लेता है ताकि उसे कानूनी मान्यता मिल सके।
भारत के संदर्भ में उदाहरण:
भारत में विधि सम्मत (De Jure) सम्प्रभुता राष्ट्रपति में निहित है, जबकि तथ्य सम्मत (De Facto) सम्प्रभुता प्रधानमंत्री में निहित है (क्योंकि वास्तव में शासन की शक्तियों का प्रयोग वही करते हैं)।

✦ 9. ए. आर. लॉर्ड (A.R. Lord) द्वारा सम्प्रभुता का वर्गीकरण

प्रसिद्ध विचारक ए. आर. लॉर्ड (A.R. Lord) ने सम्प्रभुता के मुख्य रूप से तीन रूप बताए हैं, जिनका विवरण और उनके विचारकों का क्रम नीचे दिया गया है:

A.R. Lord का सम्प्रभुता वर्गीकरण
1. कानूनी सम्प्रभुता
  • जनक: जीन बोदां
  • विकास: हॉब्स ने आगे बढ़ाया
  • चरम सीमा: ऑस्टिन ने पहुँचाया
2. राजनीतिक सम्प्रभुता
  • जनक: जॉन लॉक
  • समर्थक: ग्रोसियस
3. लौकिक सम्प्रभुता
  • जनक: रूसो
  • समर्थक: अल्थ्यूसियस
ऑस्टिन का कानूनी सिद्धान्त (Legal Sovereignty):
प्रमुख समर्थकों में हॉब्स, बेंथम, हीगल और ऑस्टिन का नाम कानूनी संप्रभुता के साथ मुख्य रूप से आता है। ऑस्टिन ने कानूनी संप्रभुता के विचार को चरम सीमा पर पहुँचाया, इसीलिए कानूनी संप्रभुता का विचार ऑस्टिन के नाम के साथ जुड़ गया। ऑस्टिन का प्रसिद्ध कथन है- "कानून सम्प्रभु का आदेश है।"

✦ 10. सम्प्रभुता का एकलवादी / कानूनी सिद्धान्त

सम्प्रभुता के एकलवादी (Monistic) सिद्धान्त को कानूनी संप्रभुता, परंपरागत संप्रभुता या अद्वैतवादी संप्रभुता के नाम से भी जाना जाता है। इसका उदय 16वीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धान्त का स्पष्ट मानना है कि राज्य की सारी सत्ता एक ही जगह (एक ही व्यक्ति या संस्था) पर केंद्रित होनी चाहिए।

❖ एकलवादी बनाम बहुलवादी सम्प्रभुता (एक दृष्टि में)

एकलवादी (परम्परागत) सम्प्रभुता बहुलवादी (आधुनिक/नव) सम्प्रभुता
काल: 16वीं से 19वीं शताब्दी तक वर्चस्व। काल: 20वीं शताब्दी में उदय।
सत्ता का स्वरूप: सत्ता का केन्द्रीकरण (सारी सत्ता एक जगह पर केन्द्रित)। सत्ता का स्वरूप: सत्ता का विकेन्द्रीकरण (विभाजन)।
दृष्टिकोण: व्यक्तिवादी (समान वितरण)। यह राज्य में, सुरक्षा, शांति और न्याय व्यवस्था पर बल देता है। दृष्टिकोण: सकारात्मक उदारवाद व लोककल्याणकारी। यह न्यायपूर्ण वितरण पर बल देता है।

❖ एकलवादी सिद्धान्त का ऐतिहासिक विकास क्रम

जीन बोदां
(जनक)
➔
थॉमस हॉब्स
आगे बढ़ाया (वैज्ञानिक स्वरूप)
➔
जॉन ऑस्टिन
(चरम सीमा पर पहुँचाया)

[I] जीन बोदां (Jean Bodin) का विचार

बोदां एक फ्रांसीसी विचारक था जो मध्यकाल में पैदा हुआ। उस समय फ्रांस में चर्च (पोप) और राजा के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा था जिससे जनता असुरक्षा महसूस कर रही थी। बोदां ने फ्रांस के राजा में संप्रभुता का रूप देखा और कहा कि यदि सत्ता राजा को दे दी जाए, तो जनता की सुरक्षा हो सकेगी। अतः संप्रभुता धार्मिक युद्धों की देन है।

बोदां ने संप्रभुता को परिभाषित करते हुए कहा: "संप्रभुता प्रजाजनों व नागरिकों पर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जिस पर कानून के कोई बंधन नहीं होता।" अर्थात बोन्दा का मानना है कि - कानून संप्रभु का आदेश होता है और संप्रभु द्वारा बनाए हुए कानून से संपूर्ण जनता संचालित होती है लेकिन स्वयं संप्रभु उन कानून से ऊपर होगा।

जीन बोदां ने जिस संप्रभुता का विचार दिया उसे अमर्यादित संप्रभुता कहा गया, लेकिन अंत में जीन बोदां ने यह भी कहा कि यद्यपि प्रभुसत्ताधारी स्वयं के बनाए हुए कानूनों से ऊपर है, लेकिन वह सभी कानूनों से ऊपर नहीं है। संप्रभु राज्य के मौलिक कानूनों, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, ईश्वरीय कानूनों और शाश्वत (उत्तराधिकार) कानूनों के अधीन होगा।

इस प्रकार बोदां स्वयं के विरोधाभासी विचारों में उलझ कर रह गया। एक तरफ उसने निरंकुश संप्रभुता का विचार तो दिया लेकिन वहीं पर दूसरी तरफ उस पर अनेक प्रतिबंध लगा दिया।

सेबाइन ने लिखा - "वह (बोदां) न तो मध्यकालीन रहा और न ही आधुनिक बन सका।"

इसका अर्थ यह है कि बोदां ने संप्रभुता का विचार देकर अपनी आधुनिकता का परिचय तो दिया, लेकिन संप्रभु पर ईश्वर का प्रतिबंध लगाकर उसे मध्यकाल की तरफ फिर से धकेल दिया।

[II] थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) का विचार

हॉब्स ने बोदां के विचारों की कमियों को दूर किया और संप्रभुता को पूर्णतः निरंकुश, असीम, अदेय और अहस्तान्तरणीय बताया। हॉब्स ने कहा कि संप्रभु न केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था व न्याय की स्थापना करता है, बल्कि वह जनता पर मनमानी कर लगा सकता है, किसी को मृत्युदंड की सजा दे सकता है, यहां तक कि चर्च को भी राज्य के अधीन कर दिया।

"सीमित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।" — हॉब्स

हॉब्स ने अंत में कहा कि यदि संप्रभु या राजा जनता के प्राणों की सुरक्षाा नहीं कर पाता, तो अपवाद स्वरूप प्रजा राजा का विरोध कर सकती है।

[III] जॉन ऑस्टिन (John Austin) का चरम कानूनी सिद्धान्त

जेरेमी बेंथम ने संप्रभुता को कृत्रिम बताया और उसे एक व्यक्ति में निहित माना। बेंथम के परम अनुयायी और इंग्लैंड के प्रसिद्ध न्यायवादी जॉन ऑस्टिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Lectures on Jurisprudence" में कानूनी संप्रभुता के विचार को चरम सीमा (Peak) पर पहुँचाया और उसे पूर्ण वैज्ञानिक बनाया।

आस्टिन ने कानूनी संप्रभुता को परिभाषित करते हुए कहा - "एक निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति जो अपने समकक्ष अन्य किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के आज्ञा के पालन का आदी न हो और उसकी आज्ञा का पालन सभी स्वभावतः करते हो तो वह निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति संप्रभु होगा और उस श्रेष्ठ व्यक्ति सहित सम्पूर्ण समाज एक राजनीतिक समाज होगा ।"

आस्टिन के उपर्युक्त कथन से निम्नलिखित बाते स्पष्ट होती है -

  • सम्प्रभुता एक निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति में निहित होनी चाहिए ।
  • संप्रभु अपने समकक्ष किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की आज्ञा पालन का आदी न हो ।
  • संप्रभु की आज्ञा का पालन संपूर्ण समाज स्वयं करता हो
  • कानून उच्चतर द्वारा निम्नतर को दिया गया आदेश है ।
  • कानून संप्रभु की आज्ञा है ।

✦ 11. ऑस्टिन के कानूनी सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ

विशेष नोट (Note):
ध्यान रहे कि ऑस्टिन ने ब्रिटिश संसद को ध्यान में रखकर कानूनी संप्रभुता का विचार दिया है जो निरंकुश और श्रेष्ठ है, लेकिन उस पर भी परम्परा एवं रीति-रिवाज का प्रतिबंध है।

ऑस्टिन के इस कठोर और अत्यधिक निरंकुश कानूनी सिद्धान्त की आगे चलकर 20वीं शताब्दी में बहुत कड़ी आलोचना हुई। प्रमुख विचारकों द्वारा की गई आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

आलोचक विचारक आलोचनात्मक कथन
सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) "इतना निरंकुश संप्रभु इतिहास में ढूँढा नहीं जा सकता।"
हर्नशा (Hearnshaw) "ऑस्टिन के दर्शन से हवलदारी की गंध आती है।"
अर्नेस्ट बार्कर (Ernest Barker) "ऑस्टिन का संप्रभुता सम्बन्धी विचार आधुनिक राज्यों से काफी दूर है।"

20वीं शताब्दी में ऑस्टिन की इसी एकलवादी संप्रभुता की कड़ी आलोचना हुई और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप बहुलवाद (Pluralism) का जन्म हुआ। बहुलवादियों के अनुसार, संप्रभु ने कानून का निर्माण नहीं किया है, बल्कि संप्रभु को अस्तित्व में लाने का श्रेय स्वयं कानून को ही प्राप्त है।

✦ 12. सम्प्रभुता का बहुलवादी/आधुनिक/नव-सम्प्रभुता सिद्धान्त का उदय

16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक एकलवादी सम्प्रभुता का बोलबाला था। जहाँ यह माना जाता था कि राज्य या सम्प्रभुता देश के अन्दर व देश के बाहर दोनों स्थितियों में सर्वोच्च है, अर्थात् सम्प्रभुता अविभाज्य एवं असीमित है। यह सत्ता के केन्द्रीयकरण पर आधारित था और एकात्मक व्यवस्था का सूचक था। एकलवादी सम्प्रभुता का विचार व्यक्तिवादियों (Individualists) की देन है। इसे परंपरागत संप्रभुता या कानूनी संप्रभुता के नाम से भी जाना जाता है।

लेकिन 20वीं शताब्दी में एकलवादी सम्प्रभुता के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई और बहुलवादी सम्प्रभुता (Pluralistic Sovereignty) का जन्म हुआ, जिसे आधुनिक या नव-सम्प्रभुता भी कहा जाता है।

बहुलवाद एक ऐसी विचारधारा है जो यह मानती है कि सत्ता एक नहीं बल्कि अनेक जगह पर स्थित है। यह संघात्मक व्यवस्था और सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देता है। यह सम्प्रभुता को विभाज्य और सीमित मानता है। सकारात्मक उदारवाद और लोक कल्याणकारी राज्य का सम्बन्ध बहुलवाद से है। सामाजिक न्याय की अवधारणा भी बहुलवाद से जुड़ी है।

बहुलवाद का मुख्य उद्देश्य:
जहाँ मार्क्सवाद, श्रम संघवाद और अराजकतावाद राज्य का ही अंत कर देना चाहते हैं, वहीं बहुलवादी राज्य और सम्प्रभुता का अंत नहीं चाहते, बल्कि वे उसे सीमित कर देना चाहते हैं। इसी प्रकार सीमित सम्प्रभुता की अवधारणा बहुलवाद के साथ जुड़ी है।

16वीं से 19वीं शताब्दी (एकलवादी काल) के दौरान राज्य के अलावा कोई संगठन नहीं था, इसलिए लोगों की पूर्ण निष्ठा केवल 'राज्य' (State) के प्रति थी। लेकिन 20वीं शताब्दी (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद), देश के अंदर और देश के बाहर (UNO, WTO, NAFTA, NGO आदि) कई संगठन बन गए। फलस्वरूप, लोगों की निष्ठा अब एक जगह (राज्य) पर न रहकर, कई संगठनों के प्रति बँट गई। इसी स्थिति को बहुलवादी सम्प्रभुता कहते हैं।

✦ 13. बहुलवाद के प्रमुख जनक एवं मूलभूत सिद्धान्त

बहुलवाद के जनक संयुक्त रूप से गियर्क (Gierke) एवं मेटलैंड (Maitland) माने जाते हैं। गियर्क जर्मनी के तथा मेटलैंड इंग्लैंड के रहने वाले थे। जबकि अमेरिका में बहुलवाद को विलियम जेम्स (William James) ने दार्शनिक आधार प्रदान किया। प्रमुख बहुलवादी विचारकों में लास्की, मैकाइवर, G.D.H. कोल, डिग्बी, क्रैब, फिगिस, लिंडसे, और मिस फॉलेट आदि शामिल हैं।

❖ बहुलवाद: राज्य एवं अन्य संघों में सम्बन्ध

बहुलवादियों का मानना है कि राज्य में अनेक छोटे संघ या समुदाय होते हैं और ये संघ उतने ही शक्तिशाली हैं जितना कि राज्य। इसका कारण यह है कि व्यक्ति राज्य का भी सदस्य है और संघ का भी। इसलिए, व्यक्ति अपनी निष्ठा जितनी राज्य के प्रति रखता है, उतनी ही संघ के प्रति भी। अतः, संप्रभुता राज्य और संघों के बीच विभाजित है।

बहुलवादियों का प्रसिद्ध कथन है: "राज्य संघों का संघ है।"

❖ राज्य और अन्य संघों में अंतर

यद्यपि बहुलवादी राज्य और अन्य संघों में कोई विशेष अंतर नहीं मानते, फिर भी वे निम्नलिखित दो प्रमुख अंतर स्पष्ट करते हैं:

  • सदस्यता की प्रकृति: राज्य की सदस्यता अनिवार्य है, जबकि अन्य संघों की सदस्यता अनिवार्य नहीं है।
  • शक्ति का स्वरूप: राज्य के पास बाध्यकारी या दण्डकारी शक्ति है, जो अन्य संघों के पास नहीं होती। राज्य के पास यह शक्ति इसलिए है ताकि वह संघों के बीच विवादों का निपटारा कर सके और उनके बीच समन्वय व सामंजस्य स्थापित कर सके। अतः राज्य एक 'सर्व-समावेशक शक्ति' के रूप में कार्य करता है।

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (Quick Review)

प्रश्न: बहुलवाद क्या है?
(a) राज्य संघों का संघ है।
(b) राज्य सर्व-समावेशक शक्ति है।

💡 नोट: यहाँ वरीयता (b) राज्य सर्व-समावेशक शक्ति है को पहले मिलेगी, क्योंकि यह राज्य की अंतिम भूमिका को स्पष्ट करती है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
  • राजनीतिक संप्रभुता (सत्ता का विकेन्द्रीकरण): इसे ही बहुलवाद कहा जाता है।
  • व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के समर्थक: G. D. H. कोल (G.D.H. Cole)।

❖ बहुलवाद के 6 प्रमुख सिद्धान्त

  1. बहुलवाद राज्य को 'संघों का संघ' (Union of Unions) मानता है।
  2. बहुलवाद कानूनी संप्रभुता के प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आया। कानूनी संप्रभुता मानती है कि "कानून संप्रभु का आदेश है", जबकि बहुलवाद मानता है कि "राज्य या संप्रभु को अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को ही प्राप्त है।"
  3. बहुलवाद सीमित संप्रभुता में विश्वास करता है।
  4. बहुलवाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण (Decentralization) में विश्वास करता है।
  5. बहुलवाद लोकतंत्र में विश्वास करता है।
  6. बहुलवाद व्यावसायिक प्रतिनिधित्व (Occupational Representation) में विश्वास करता है। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का शाब्दिक अर्थ यह है कि जिस क्षेत्र में जिस व्यवसाय के सर्वाधिक लोग हों, उस क्षेत्र में उसी व्यवसाय के व्यक्ति को प्रतिनिधि चुना जाए। इसके प्रमुख समर्थक जी. डी. एच. कोल हैं।

✦ 14. बहुलवादी विचारक: गियर्क, मेटलैंड एवं फिगिस

❖ (A) गियर्क एवं मेटलैंड (Gierke & Maitland) का विचार

इन्हें संयुक्त रूप से बहुलवाद का जनक माना जाता है। इनका मानना है कि "जितने भी संघ अस्तित्व में हैं, उनका अपना स्वतंत्र एवं स्थायी व्यक्तित्व है, उनकी अपनी चेतना या इच्छा होती है, वह किसी पर निर्भर नहीं है।" अतः संप्रभुता को राज्य और इन संघों के बीच विभाजित होना चाहिए। ये लोग राज्य को संघ की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं, अर्थात् राज्य एक प्रमुख संघ है, क्योंकि वह सभी संघों के बीच समन्वय स्थापित करता है।

नोट: अर्नेस्ट बार्कर ने गियर्क एवं मेटलैंड द्वारा प्रतिपादित 'संघों के वास्तविक व्यक्तित्व' की धारणा को नामंजूर कर दिया था।

❖ (B) फिगिस (Figgis) का विचार

फिगिस एक प्रमुख बहुलवादी ईसाई विचारक हैं, जो चर्च या धर्म संघों को अधिक महत्व देते हैं और उसे राज्य के समकक्ष मानते हैं। फिगिस ने परंपरागत संप्रभुता (कानूनी संप्रभुता) को एक आदर्शीय अंधविश्वास माना और धर्म संघ को महत्व दिया।

"मानव समाज व्यक्तियों का ऐसा बालू का ढेर नहीं है जो केवल राज्य के जरिये ही एक-दूसरे से जुड़े हों, बल्कि समाज में तो नीचे से ऊपर तक सोपानित क्रम से एक के ऊपर एक संघ होते हैं।" — फिगिस

❖ (C) ए. डी. लिंडसे (A.D. Lindsay) का विचार

लिंडसे का मानना है कि छोटे-छोटे संघों का महत्व अधिक होता है। लिंडसे का सबसे प्रसिद्ध कथन है:

"राज्य संघों का संघ है।" (State is the Union of Unions)

(यद्यपि यह कथन सभी बहुलवादियों से सम्बंधित है, लेकिन मुख्य रूप से यह लिंडसे के नाम के साथ जुड़ा हुआ है।)

✦ 15. बहुलवादी विचारक: लास्की के विचार (Harold Laski)

लास्की एक समालोचक (Critic) हैं और समय के साथ उन्होंने कई विचारधाराओं का समर्थन किया। उनका जन्म 1893 में इंग्लैण्ड में हुआ था और मृत्यु 1950 में हुई। उन्होंने अपने जीवन में विश्व में घटित अनेक घटनाओं को देखा और समय के साथ अपने विचारों में परिवर्तन किया।

लास्की ने प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध, विश्व आर्थिक मंदी, फासीवाद का उदय, एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका का राष्ट्र-राज्य के रूप में उदय, लोक कल्याणकारी राज्य का उदय और बहुलवाद का उदय आदि को देखा। अंततोगत्वा लास्की को एक प्रमुख बहुलवादी विचारक के रूप में देखा जाता है।

प्रमुख पुस्तकें:
लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Grammar of Politics' और 'An Introduction to Politics' में अपने बहुलवादी विचारों का प्रतिपादन किया।
"यदि संप्रभुता सम्बन्धी सम्पूर्ण विचार का परित्याग कर दिया जाय तो राजनीतिशास्त्र को एक स्थायी लाभ होगा।" — लास्की

लास्की पुनः लिखते हैं कि समाज का स्वरूप संघात्मक है, अतः सत्ता का स्वरूप भी संघात्मक होना चाहिए।

लास्की मानते हैं कि आज समाज में छोटे-छोटे संघ या संगठन विद्यमान हैं और राज्य इन्हीं संघों में से एक है। अर्थात् राज्य और संघ के बीच कोई अंतर नहीं है, संघ उतने ही प्रभुत्व सम्पन्न हैं जितना कि राज्य। लेकिन, लास्की भी इस बात को मानते हैं कि राज्य अन्य संघों की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि राज्य की सदस्यता अनिवार्य है जबकि संघ की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्य के पास बाध्यकारी या दण्डकारी शक्ति है।

  • लास्की कहते हैं: "संघ राज्य से कम प्रभुत्व सम्पन्न नहीं है।"
  • लास्की पुनः कहते हैं: "सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार मानव के कल्याण के साथ मेल नहीं खाता।"

लास्की का मानना है कि आज न केवल राष्ट्रीय बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संप्रभुता का विचार धराशायी हो चुका है। आज इंग्लैण्ड को यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह खान में काम करने वाले मजदूरों को कितनी मजदूरी दे और कितना शस्त्रीकरण करे।

✦ 16. बहुलवादी विचारक: मैकाइवर के विचार (R.M. MacIver)

मैकाइवर को समाजशास्त्री माना जाता है, इसलिए वह राज्य की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देते हैं। मैकाइवर की प्रसिद्ध पुस्तक 'The Modern State' है। मैकाइवर भी अन्य बहुलवादियों की तरह संघ को राज्य के समकक्ष मानते हैं। मैकाइवर कहते हैं कि राज्य समाज का अंग है और सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए राज्य अस्तित्व में आया है।

"राज्य शक्ति का नहीं बल्कि सेवा का साधन है।" — मैकाइवर

मैकाइवर ने समाज को महत्व देते हुए कहा कि राज्य परम्पराओं, रीतिरिवाजों और फैशन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। मैकाइवर ने निगमनात्मक राज्य (Corporate State) और सेवाधर्मी राज्य (Service State) का प्रतिपादन किया। मैकाइवर कानूनी संप्रभुता को भी नकारते हैं।

"राज्य कानून का शिशु व जनक दोनों है।" — मैकाइवर

अर्थात् राज्य को अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को प्राप्त है, लेकिन जब राज्य अस्तित्व में आ जाता है, तो कानून को बनाना और उसे लागू करना तथा उसकी सुरक्षा करना राज्य का कर्तव्य बन जाता है। इस प्रकार मैकाइवर ने राज्य और कानून को एक-दूसरे का पूरक माना।

✦ 17. डिग्बी एवं क्रैब के विचार (Diguit & Krabbe)

ये दोनों विचारक कानूनी संप्रभुता पर प्रबल प्रहार करते हैं। क्रैब का प्रसिद्ध कथन है:

"संप्रभुता संबंधी धारणा को राजनीतिशास्त्र से हटा देना चाहिए।" — क्रैब

डिग्बी और क्रैब दोनों मानते हैं कि कानून संप्रभु का आदेश नहीं है, बल्कि संप्रभु के अस्तित्व में आने के बहुत पहले से कानून विद्यमान था और संप्रभु को भी अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को प्राप्त है। लेकिन जब संप्रभु अस्तित्व में आ जाता है, तो वह कानूनों का निर्माण करता है और लोग कानून का पालन इसलिए करते हैं कि ऐसा करना उनके हित में है।

❖ डिग्बी और क्रैब के विचारों में मुख्य अंतर

डिग्बी (Diguit) का मत क्रैब (Krabbe) का मत
कानूनों का पालन करना समाज का 'कर्तव्य' (Duty) है। कानूनों का पालन करना एक 'दायित्व / स्वतः बोध' (Liability) है।

❖ मिस फॉलेट के अनुसार (Miss Follett)

"मेरी आत्मा का निवास राज्य में है।" — मिस फॉलेट

आज राज्य या संप्रभु न केवल देश के अंदर सीमित है, बल्कि वह देश के बाहर भी सीमित है। आज सम्प्रभुता पर अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का भी प्रतिबन्ध है। संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO), विश्व बैंक (World Bank), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व व्यापार संगठन (WTO) तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) से भी कहीं न कहीं राज्य सीमित होते हैं।

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