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📢 "Polity Study Adda पर आपका स्वागत है!📜राजव्यवस्था रटना छोड़ दो, अब समझने की बारी है! 📜 यहाँ आपको TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET/JRF और UPSC, State PCS, SSC व अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए Political Science के प्रमाणित नोट्स और महत्वपूर्ण MCQs मिलेंगे। 📜"
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Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

Polity Study Adda पर TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET, UPSC, SSC सहित सभी One-Day प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजनीति विज्ञान और भारतीय राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण MCQs और नोट्स पढ़ें। 'राजव्यवस्था रटने का नहीं, समझने का विषय है' — इसी मूल विचार के साथ, यह सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक बेहतरीन मंच है।

यहाँ हम संपूर्ण राजनीति विज्ञान से संबंधित उच्च-स्तरीय MCQs, विस्तृत नोट्स और तथ्यपूर्ण आर्टिकल्स नियमित रूप से अपलोड करते हैं। संविधान के अनुच्छेदों, शासन व्यवस्था और जटिल राजनीतिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाना ही हमारा लक्ष्य है।

यह एक निजी एजुकेशनल (शैक्षिक) पोर्टल है जिसे विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) विषय के साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी सफलता का परचम लहराना चाहते हैं।

Polity Study Adda की मुख्य विशेषताएँ

  • विषयवार विस्तृत आर्टिकल्स: भारतीय राजव्यवस्था, राजनीतिक चिंतक, सिद्धांत, लोक प्रशासन और IR की संपूर्ण सामग्री।
  • उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs): हर टॉपिक पर आधारित अति महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective Questions) और Mock Tests।
  • परीक्षा-उपयोगी शॉर्ट नोट्स: त्वरित रिवीजन (Quick Revision) के लिए टू-द-पॉइंट (To-the-point) आर्टिकल्स।
  • सरल और स्पष्ट भाषा: कठिन से कठिन विषय को भी आसान शब्दों में समझाने का प्रयास।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग क्यों करना चाहिए?

राजनीति विज्ञान अक्सर छात्रों को केवल अनुच्छेदों (Articles) और अधिनियमों को याद रखने वाला विषय लगता है। इस भ्रांति को दूर करने के लिए आपको इसका उपयोग करना चाहिए क्योंकि:

  • यहाँ रटने के बजाय देश की व्यवस्था समझने पर जोर दिया जाता है।
  • यह TGT/PGT/LT और UGC NET के विस्तृत सिलेबस को कवर करता है, जिससे One-Day परीक्षाएँ स्वतः ही आसान हो जाती हैं।
  • परीक्षा के बदलते पैटर्न के अनुसार नवीनतम सामग्री लगातार अपडेट होती है।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग हम कैसे कर सकते हैं?

  • कैटेगरी चुनें: होमपेज पर Indian Polity, Political Thinker या Theory के सेक्शन में जाएं।
  • सर्च करें: किसी विशेष विषय (जैसे- मूल अधिकार, प्लेटो) के लिए सर्च बॉक्स का उपयोग करें।
  • रिवीजन और प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के बाद उसी विषय के MCQs और Mock Tests को हल करें।

प्रतियोगी परीक्षाओं में 'राजनीति विज्ञान' विषय का क्या महत्व है?

भारत में सिविल सेवा और शिक्षक भर्ती (Teaching Exams) जैसे क्षेत्रों में राजव्यवस्था की भूमिका निर्णायक होती है:

  • सामान्य अध्ययन (GS) का आधार: UPSC और State PCS में राजव्यवस्था (Polity) से संविधान और गवर्नेंस पर कई प्रश्न पूछे जाते हैं।
  • स्कोरिंग विषय: यदि कॉन्सेप्ट क्लियर हों, तो राजनीति विज्ञान में पूरे अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • सामाजिक और कानूनी समझ: यह विषय हमें हमारे अधिकारों, कर्तव्यों और देश की कानूनी प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।

हम परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान में अच्छे अंक कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

  • क्रमबद्ध अध्ययन: अनुच्छेदों को रटने के बजाय भागों और संबंधित अवधारणाओं के साथ पढ़ें।
  • मानक स्रोत: केवल प्रामाणिक पुस्तकों और Polity Study Adda जैसे सटीक प्लेटफॉर्म्स पर अध्ययन करें।
  • MCQs की प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के तुरंत बाद उससे जुड़े अधिक से अधिक बहुविकल्पीय प्रश्न हल करें।
  • शॉर्ट नोट्स: एग्जाम के अंतिम दिनों के लिए खुद के की-वर्ड्स (Keywords) वाले नोट्स बनाएं।

भारत में सरकारी नौकरियां लोगों को क्यों पसंद हैं?

हमारे देश में सरकारी नौकरी (Government Job) को लेकर युवाओं में एक अलग ही जुनून देखने को मिलता है। इसे केवल एक रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता माना जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • करियर और जॉब सिक्योरिटी: प्राइवेट सेक्टर की अनिश्चितता के उलट, सरकारी सेवा में नौकरी जाने का डर न के बराबर होता है।
  • शानदार वेतन और सुविधाएं: आकर्षक सैलरी के साथ-साथ महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया (HRA) और मेडिकल जैसी बेहतरीन सुविधाएं मिलती हैं।
  • समाज में प्रतिष्ठा: सरकारी अफसर या शिक्षक बनने पर समाज और रिश्तेदारों के बीच सम्मान और रुतबा बढ़ता है।
  • तनावमुक्त पारिवारिक जीवन: फिक्स वर्किंग आवर्स और सरकारी छुट्टियों के कारण आप अपने परिवार को क्वालिटी टाइम दे पाते हैं।

सरकारी नौकरी हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

सरकारी नौकरी पाना रातों-रात का चमत्कार नहीं है; इसके लिए सही दिशा, अटूट धैर्य और स्मार्ट स्टडी की जरूरत होती है:

  • अपना फोकस साफ रखें: सबसे पहले तय करें कि आपको टीचिंग फील्ड (TGT, PGT, NET) में जाना है या प्रशासनिक सेवा (UPSC, PCS) में।
  • पाठ्यक्रम (Syllabus) से चिपके रहें: ऑफिशियल सिलेबस का प्रिंटआउट लें और पिछले 5-10 सालों के प्रश्न-पत्रों (Previous Year Papers) का बारीकी से अध्ययन करें।
  • प्रामाणिक अध्ययन सामग्री: 10 अलग-अलग किताबें पढ़ने से बेहतर है कि 1 अच्छी किताब को 10 बार पढ़ें। पॉलिटी के लिए Polity Study Adda के सटीक नोट्स फॉलो करें।
  • रोज़ाना प्रैक्टिस: सिर्फ थ्योरी पढ़ने से काम नहीं चलेगा। जो टॉपिक पढ़ें, तुरंत उसके MCQs हल करें और मॉक टेस्ट देकर अपनी गलतियों को सुधारें।

Polity Study Adda आपकी कैसे मदद कर सकता है?

  • सिलेबस-आधारित सामग्री: TGT, PGT, UPSC, NET/JRF के लेटेस्ट सिलेबस के अनुसार कंटेंट।
  • समय की बचत: आपको कई किताबें छानने की जरूरत नहीं, सभी प्रामाणिक स्रोतों का निचोड़ मिलता है।
  • मार्गदर्शन: किस परीक्षा के लिए क्या और कितना पढ़ना है, इसका सही मार्गदर्शन।

Polity Study Adda पर हमें भरोसा क्यों करना चाहिए?

  • तथ्यों की प्रामाणिकता: हमारा कंटेंट मानक राजनीतिक पुस्तकों और प्रामाणिक स्रोतों से अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता है।
  • छात्र-हित सर्वोपरि: हमारा उद्देश्य भ्रामक जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्र की सफलता को सुनिश्चित करना है।
  • लगातार अपडेट्स: हम पुरानी सामग्री पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि नए परीक्षा पैटर्न के अनुसार कंटेंट को अपडेट करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

उत्तर: यह एक निजी शैक्षिक (Educational) पोर्टल है जो विशेष रूप से 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) और 'भारतीय राजव्यवस्था' (Indian Polity) विषय की तैयारी कर रहे छात्रों (TGT, PGT, UPSC, NET आदि) के लिए बनाया गया है।

Q2. क्या यह एक सरकारी वेबसाइट है?

उत्तर: नहीं, यह एक निजी (Private) प्लेटफॉर्म है जो छात्रों को मुफ्त एवं उच्च गुणवत्ता वाली अध्ययन सामग्री प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।

Q3. यह वेबसाइट किन परीक्षाओं के लिए उपयोगी है?

उत्तर: मुख्य रूप से Teaching Exams (TGT, PGT, LT Grade, UGC NET) और Civil Services (UPSC, State PCS, SSC, Railway) के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।

Q4. क्या यहाँ मुझे लोक प्रशासन (Public Administration) के नोट्स मिलेंगे?

उत्तर: हाँ, भारतीय राजव्यवस्था और राजनीतिक विचारकों के साथ-साथ आपको लोक प्रशासन और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध (IR) के भी विस्तृत नोट्स और MCQs यहाँ प्राप्त होंगे。

Q5. क्या वेबसाइट पर केवल थ्योरी (Theory) पढ़ाई जाती है?

उत्तर: नहीं, थ्योरी के साथ-साथ आपकी प्रैक्टिस के लिए उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective MCQs) और मॉक टेस्ट भी उपलब्ध हैं。

Q6. क्या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी प्रामाणिक है?

उत्तर: बिल्कुल, यहाँ उपलब्ध कराई गई सभी अध्ययन सामग्री मानक और प्रामाणिक राजनीतिक पुस्तकों के गहन अध्ययन के बाद ही तैयार की जाती है।

Q7. मैं इस वेबसाइट पर किसी विशेष टॉपिक की मांग कैसे कर सकता हूँ?

उत्तर: आप 'Contact Us' पेज पर जाकर या सीधे PolityStudyAdda@gmail.com पर ईमेल के माध्यम से हमें अपने सुझाव और डिमांड भेज सकते हैं।

Q8. क्या पॉलिटी स्टडी अड्डा का कोई यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया ग्रुप है?

उत्तर: हाँ, आप वेबसाइट के फुटर (सबसे नीचे) में दिए गए लिंक के माध्यम से हमारे Telegram, WhatsApp और YouTube चैनल आदि से जुड़ सकते हैं।

Q9. भारत में सरकारी नौकरी (Government Job) की इतनी मांग क्यों है?

उत्तर: जॉब सिक्योरिटी, बेहतर वेतन, भत्ते और समाज में उच्च सम्मान के कारण सरकारी नौकरी युवाओं की पहली पसंद होती है।

Q10. मैं शिक्षक या सिविल सेवा परीक्षा में सफलता कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

उत्तर: सिलेबस के अनुसार रणनीति बनाकर पढ़ने, प्रामाणिक स्रोतों (जैसे Polity Study Adda) का उपयोग करने और नियमित MCQs की प्रैक्टिस करने से सफलता निश्चित है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

'Polity Study Adda' पर प्रकाशित सभी अध्ययन सामग्री, नोट्स, बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) और अन्य सूचनाएं केवल छात्रों की परीक्षा की तैयारी और उनके त्वरित मार्गदर्शन के लिए प्रदान की गई हैं। इन्हें कानूनी दस्तावेज़ या अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि हमारी टीम ने सभी तथ्यों और उत्तरों को मानक पुस्तकों के आधार पर पूरी तरह से सटीक और प्रामाणिक रखने का हर संभव प्रयास किया है, लेकिन हम अनजाने में हुई किसी भी मानवीय त्रुटि, टाइपिंग की गलती या चूक के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

प्रश्नों के उत्तर और आयोग (Commissions) के संबंध में विशेष सूचना —
राजनीति विज्ञान जैसे विस्तृत विषय और प्रतियोगी परीक्षाओं के संदर्भ में अक्सर यह देखा जाता है कि अलग-अलग भर्ती आयोग (Commissions) कभी-कभी एक ही प्रश्न के अलग-अलग उत्तरों को सही मान लेते हैं, या विवाद की स्थिति में एक से अधिक विकल्पों को सही ठहरा देते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी प्रश्न का उत्तर एक आयोग के अनुसार कुछ और होता है, जबकि दूसरे आयोग के अनुसार कुछ और। आधिकारिक 'उत्तर कुंजी' (Official Answer Key) और हमारे द्वारा दिए गए उत्तरों में भिन्नता होने की स्थिति में 'Polity Study Adda' किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा।

छात्रों को स्पष्ट रूप से सलाह दी जाती है कि किसी भी उत्तर या तथ्य की अंतिम पुष्टि के लिए वे संबंधित विभाग/आयोग की आधिकारिक वेबसाइट, उनकी उत्तर कुंजी और मान्यता प्राप्त मानक पुस्तकों (Standard Books) का ही संदर्भ लें। यह वेबसाइट किसी भी सरकारी संगठन या आयोग से संबद्ध नहीं है; यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र और निजी शैक्षिक मंच है।

सम्प्रभुता के सिद्धान्त: अर्थ, लक्षण, एकलवादी और बहुलवादी सिद्धान्त

सम्प्रभुता (Sovereignty): अर्थ, लक्षण, विविध रूप एवं बहुलवादी सिद्धान्त
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में 'सम्प्रभुता (Sovereignty)' का अर्थ, उत्पत्ति, ऐतिहासिक विकास, विभिन्न विचारकों के कथन, एकलवादी (ऑस्टिन) एवं बहुलवादी सिद्धान्तों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह राजनीति विज्ञान के हस्तलिखित नोट्स पर आधारित है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

1. सम्प्रभुता का अर्थ, उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास

सम्प्रभुता राज्य का प्राण तत्व है। सम्प्रभुता के अभाव में हम राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकते। सम्प्रभुता ही एक ऐसा तत्व है जो किसी राज्य को अन्य संस्थाओं से अलग करता है। सम्प्रभुता के कारण ही राज्य अपनी गृह नीति (Internal Policy)विदेश नीति (Foreign Policy) का निर्धारण स्वयं करता है। इसे अंतिम सत्ता, सर्वोच्च सत्ता व प्रभुसत्ता आदि विविध नामों से जाना जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य: सम्प्रभुता आधुनिक कालीन अवधारणा है, इसका उदय 16वीं शताब्दी में हुआ और यह 'राष्ट्र राज्य' की अवधारणा के साथ जुड़ी है।

1576 में जीन बोदां (Jean Bodin) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "द सिक्स बुक्स ऑफ द रिपब्लिक' (The Six Books of the Republic) " में सर्वप्रथम सम्प्रभुता का स्पष्ट और वैज्ञानिक विचार दिया। यद्यपि बोदां ने सम्प्रभुता का विभाजन नहीं किया, परन्तु बाद में गार्नर ने आंतरिक सम्प्रभुता का और ग्रोसियस ने बाह्य सम्प्रभुता का स्वरूप स्पष्ट किया।

शब्द की व्युत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास

सम्प्रभुता को अंग्रेज़ी में Sovereignty कहते हैं, जो लैटिन भाषा के दो शब्दों Super + Anus से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'सर्वोच्च सत्ता' (Supreme Power)। यद्यपि संप्रभुता आधुनिक काल की देन है लेकिन यह किसी न किसी रूप में प्राचीन काल और मध्यकाल में भी विद्यमान थी। प्राचीन काल में इसके लिए अरस्तू ने सर्वोच्च सत्ता शब्द का प्रयोग किया था जबकि मध्य काल में इसके लिए क्षेत्रीय आधिपत्य शब्द का प्रयोग किया गया था और इन्हीं दोनों विचारो से मिलकर आधुनिक काल में संप्रभुता का जन्म हुआ।

प्राचीन काल
(अरस्तू ने 'सर्वोच्च सत्ता' शब्द का प्रयोग किया)
+
मध्यकाल
('क्षेत्रीय आधिपत्य' की अवधारणा)
=
आधुनिक काल
(सम्प्रभुता - Sovereignty)

नोट: यद्यपि राजनीति सिद्धांत, सम्प्रभुता आदि सभी यूरोप की देन हैं और बोदां इसके जनक हैं, लेकिन सम्प्रभुता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉन लॉक ने किया था। राज्य और संप्रभुता एक दूसरे के पूरक हैं आधुनिक काल में संप्रभुता के स्थान पर लॉक ने सर्वोच्च सत्ता शब्द का प्रयोग किया है।

2. सम्प्रभुता की स्थिति: किस व्यवस्था में कहाँ निहित है?

विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में सम्प्रभुता का निवास स्थान अलग-अलग माना जाता है:

  • लोकतंत्र (Democracy) में: सम्प्रभुता जनता (Public) में निहित होती है।
  • भारत में: सम्प्रभुता संविधान (Constitution) में निहित है, क्योंकि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में संविधान ही सर्वोच्च है।
  • संघात्मक व्यवस्था (Federal System) में: सम्प्रभुता संविधान में निहित होती है।
  • संसदीय व्यवस्था (Parliamentary System) में: सम्प्रभुता संसद (Parliament) में निहित होती है (जैसे ब्रिटेन में)।

3. सम्प्रभुता के प्रमुख लक्षण / विशेषताएँ

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर सम्प्रभुता के निम्नलिखित प्रमुख 8 लक्षण (Features) बताए जा सकते हैं:

  1. अविभाज्यता (Indivisibility)
  2. पूर्णता (Absoluteness)
  3. निरंकुशता (Autocracy)
  4. अहस्तान्तरणीयता (Inalienability)
  5. अदेयता (Imprescriptibility)
  6. मौलिकता (Originality)
  7. सार्वभौमिकता (Universality)
  8. असीमितता (Unlimitedness)

4. सम्प्रभुता पर विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन

यद्यपि सम्प्रभुता के बारे में कोई एक निश्चित परिभाषा दे पाना संभव नहीं है, फिर भी विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने अनुसार सम्प्रभुता पर विचार दिए हैं:

विचारक प्रमुख कथन (Quotes)
जीन बोदां
(Jean Bodin)
"सम्प्रभुता प्रजाजनों और नागरिकों पर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जिस पर कानून के कोई बंधन नहीं होते।"
डॉ. गार्नर
(Garner)
"सम्प्रभुता राज्य की ऐसी विशेषता है जिसके कारण वह अपनी इच्छा के अलावा और किसी चीज से बंधा नहीं होता और अपने आप के अलावा किसी अन्य से सीमित नहीं होता।"
ग्रोसियस
(Grotius)
"सम्प्रभुता उस व्यक्ति में निहित सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जिसके कार्य अन्य किसी पर आश्रित न हो और जो अपने आप के अलावा अन्य किसी से सीमित न हो।"
वुडरो विल्सन
(Woodrow Wilson)
"सम्प्रभुता वह शक्ति है जो सदा सक्रिय रहकर कानून बनाती है और उसका पालन करवाती है।"
विलोबी
(Willoughby)
"सम्प्रभुता राज्य की सर्वोच्च इच्छा है।"
गेटेल
(Gettell)
"विभाजित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।"
ऑस्टिन
(Austin)
"सम्प्रभुता अन्य सभी से आदेश पालन कराने की स्थिति में होती है किन्तु स्वयं किसी के भी आदेश का पालन करने का अभ्यस्त नहीं होती।"
रूसो
(Rousseau)
"सार्वजनिक संकल्प ही सम्प्रभु है।"
लीबर
(Lieber)
"जिस प्रकार निज (स्वयं) को नष्ट किये बिना मनुष्य अपने जीवन तथा व्यक्तित्व को अलग नहीं कर सकता, उसी प्रकार सम्प्रभुता को भी राज्य से पृथक नहीं किया जा सकता।"
कालहन
(Calhoun)
"जिस प्रकार अर्द्धत्रिभुज और अर्द्ध वृत्त की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार आधी तिहाई सम्प्रभुता की भी कल्पना नहीं की जा सकती।"
हॉब्स
(Hobbes)
"सीमित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।"

5. सम्प्रभुता के विविध रूप (औपचारिक व वास्तविक संप्रभुता में अंतर)

अध्ययन की दृष्टि से सम्प्रभुता को कई रूपों में विभाजित किया जाता है। इसका पहला प्रमुख वर्गीकरण औपचारिक (Formal) और वास्तविक (Real) सम्प्रभुता के बीच है।

औपचारिक सम्प्रभुता व वास्तविक सम्प्रभुता में अंतर

यह अंतर केवल संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) में पाया जाता है, अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System) में नहीं। अध्यक्षीय प्रणाली में राष्ट्र का संवैधानिक प्रधान और सरकार का वास्तविक प्रधान दोनों एक ही होता है, लेकिन संसदीय शासन प्रणाली में दोनों अलग-अलग होते हैं।

औपचारिक सम्प्रभुता (Titular/Formal)
  • वह जिसमें सैद्धांतिक रूप से सम्पूर्ण शक्तियाँ निहित होती हैं।
  • लेकिन वह स्वयं इनका प्रयोग नहीं करता क्योंकि उसे संविधान विवेक का अधिकार नहीं देता।
  • उदाहरण: इंग्लैंड का सम्राट और भारत का राष्ट्रपति।
वास्तविक सम्प्रभुता (Real)
  • वास्तविक सम्प्रभुता उसमें निहित होती है जो व्यावहारिक रूप से सभी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  • यह औपचारिक सम्प्रभु के नाम से सत्ता का संचालन करता है।
  • उदाहरण: मंत्रिपरिषद या मंत्रिमंडल (प्रधानमंत्री)।
"सत्य ही परमात्मा है, परमात्मा ही सत्य है।" — M.K. Gandhi

6. कानूनी सम्प्रभुता और राजनीतिक सम्प्रभुता में अंतर

कानूनों को बनाने और उसे लागू करवाने की शक्ति जिसके पास होती है, वह 'कानूनी सम्प्रभु' (Legal Sovereign) कहलाता है। कानूनी सम्प्रभु तभी तक मान्य होता है जब तक न्यायालय उसे मान्यता देता है। जैसे ही न्यायालय अपनी मान्यता समाप्त कर देता है, वह कानूनी सम्प्रभु नहीं रह जाता। उदाहरण: इंग्लैंड में संसद सहित सम्राट और भारत में संसद सहित राष्ट्रपति कानूनी संप्रभु है।

कानूनी सम्प्रभु के पीछे एक और सम्प्रभु होता है जो कानूनी सम्प्रभु को प्रभावित करता है, जिसे राजनीतिक संप्रभु कहते हैं। किसी राज्य में पाये जाने वाले सभी प्रभावों का योग 'राजनीतिक सम्प्रभु' (Political Sovereign) कहलाता है। अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों, निर्वाचक मण्डल, जुलूसों तथा विभिन्न प्रकार की संस्थाओं में राजनीतिक सम्प्रभुता पायी जाती है।

"वकीलों द्वारा मान्य कानूनी सत्ताधारी के पीछे एक ऐसा प्रभुसत्ताधारी होता है, जिसके सामने कानूनी सम्प्रभु को अपना सिर झुकाना पड़ता है, वही राजनीतिक सम्प्रभुता धारी होता है।" — ए. वी. डायसी (A.V. Dicey)

नोट - डायसी पहले राजनीतिक विचारक हैं, जिन्होंने कानूनी संप्रभुता और राजनीतिक संप्रभुता में अंतर किया है।

"राजनीतिक सम्प्रभुता किसी राज्य के अंतर्गत पाये जाने वाले समस्त प्रभावों का योग होता है।" — गिलक्राइस्ट (Gilchrist)

7.राजनीतिक सम्प्रभुता और लौकिक सम्प्रभुता में अंतर

प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) में दोनों में कोई अंतर नहीं पाया जाता, क्योंकि राजनीतिक और लौकिक दोनों सम्प्रभुता सीधे जनता में निहित होती हैं (जैसे- प्राचीन यूनान में)। लेकिन अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (Indirect Democracy) में दोनों में स्पष्ट अंतर पाया जाता है।

अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में राजनीतिक सम्प्रभुता जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों में निहित होती है, जबकि लौकिक सम्प्रभुता सीधे जनता (Public) में निहित होती है। ध्यान रहे कि लौकिक सम्प्रभुता के विकास में राजनीतिक सम्प्रभुता ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सम्प्रभुता का प्रकार जनक (Father/Founder) प्रमुख समर्थक विचारक
राजनीतिक सम्प्रभुता (Political) जॉन लॉक (John Locke) ग्रोसियस
लौकिक सम्प्रभुता (Popular) जीन जैक्स रूसो (J.J. Rousseau) अल्थ्यूसियस

8. विधि सम्मत एवं तथ्य सम्मत सम्प्रभुता में अंतर

प्रसिद्ध विचारक ऑस्टिन (Austin) इन दोनों में कोई अंतर नहीं मानते, जबकि डॉ. गार्नर (Garner) दोनों में स्पष्ट अंतर करते हैं।

  • विधि सम्मत सम्प्रभु (De Jure Sovereign): वह होता है जो संविधान व कानून के अनुसार किसी देश में शासन करता है।
  • तथ्य सम्मत सम्प्रभु (De Facto Sovereign): यह वह होता है जो वास्तव में शासन की शक्तियों का प्रयोग करता है और जिसकी बात जनता मानती है, भले ही कानूनी दृष्टि से सत्ता किसी और के नाम पर हो।
क्रांति और युद्ध का प्रभाव:
सामान्यतः विधि सम्मत और तथ्य सम्मत सम्प्रभु एक ही होता है। लेकिन क्रांति या तख्तापलट के समय जब कोई व्यक्ति या समूह बलपूर्वक सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, तो पुराना 'विधि सम्मत' शासक हट जाता है और नया कब्ज़ा करने वाला 'तथ्य सम्मत' (De Facto) शासक बन जाता है और तुरंत शासन करने लगता है। बाद में वह चुनाव या संविधान में बदलाव करके स्वयं को 'विधि सम्मत' (De Jure) भी बना लेता है ताकि उसे कानूनी मान्यता मिल सके।

भारत के संदर्भ में उदाहरण:
भारत में विधि सम्मत (De Jure) सम्प्रभुता राष्ट्रपति में निहित है, जबकि तथ्य सम्मत (De Facto) सम्प्रभुता प्रधानमंत्री में निहित है (क्योंकि वास्तव में शासन की शक्तियों का प्रयोग वही करते हैं)।

9. ए. आर. लॉर्ड (A.R. Lord) द्वारा सम्प्रभुता का वर्गीकरण

प्रसिद्ध विचारक ए. आर. लॉर्ड (A.R. Lord) ने सम्प्रभुता के मुख्य रूप से तीन रूप बताए हैं, जिनका विवरण और उनके विचारकों का क्रम नीचे दिया गया है:

A.R. Lord का सम्प्रभुता वर्गीकरण
1. कानूनी सम्प्रभुता

(अमर्यादित / निरंकुश / अद्वैत / एकलवादी / असीमित)

  • जनक: जीन बोदां
  • विकास: हॉब्स ने आगे बढ़ाया
  • चरम सीमा: ऑस्टिन ने चरम सीमा पर पहुंचाया
2. राजनीतिक सम्प्रभुता
  • जनक: जॉन लॉक
  • प्रमुख समर्थक: ग्रोसियस
3. लौकिक सम्प्रभुता

(लोकप्रिय सम्प्रभुता)

  • जनक: रूसो
  • प्रमुख समर्थक: अल्थ्यूसियस
ऑस्टिन का कानूनी सिद्धान्त (Legal Sovereignty):
प्रमुख समर्थकों में हॉब्स, बेंथम, हीगल और ऑस्टिन का नाम कानूनी संप्रभुता के साथ मुख्य रूप से आता है। ऑस्टिन ने कानूनी संप्रभुता के विचार को चरम सीमा पर पहुँचाया, इसीलिए कानूनी संप्रभुता का विचार ऑस्टिन के नाम के साथ जुड़ गया। ऑस्टिन का प्रसिद्ध कथन है- "कानून सम्प्रभु का आदेश है।" यदि परीक्षा में यह कथन पूछा जाए, तो प्रथम वरीयता ऑस्टिन पर ही चिह्न लगेगा।

10. सम्प्रभुता का एकलवादी / कानूनी सिद्धान्त (बोदां, हॉब्स, ऑस्टिन)

सम्प्रभुता के एकलवादी (Monistic) सिद्धान्त को कानूनी संप्रभुता, परंपरागत संप्रभुता या अद्वैतवादी संप्रभुता के नाम से भी जाना जाता है। इसका उदय 16वीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धान्त का स्पष्ट मानना है कि राज्य की सारी सत्ता एक ही जगह (एक ही व्यक्ति या संस्था) पर केंद्रित होनी चाहिए।

एकलवादी बनाम बहुलवादी सम्प्रभुता (एक दृष्टि में)

एकलवादी (परम्परागत) सम्प्रभुता बहुलवादी (आधुनिक/नव) सम्प्रभुता
काल: 16वीं से 19वीं शताब्दी तक वर्चस्व। काल: 20वीं शताब्दी में उदय।
सत्ता का स्वरूप: सत्ता का केन्द्रीकरण (सारी सत्ता एक जगह पर केन्द्रित)। सत्ता का स्वरूप: सत्ता का विकेन्द्रीकरण (विभाजन)।
दृष्टिकोण: व्यक्तिवादी (समान वितरण)। यह राज्य में, सुरक्षा, शांति और न्याय व्यवस्था पर बल देता है। दृष्टिकोण: सकारात्मक उदारवाद व लोककल्याणकारी। यह न्यायपूर्ण वितरण पर बल देता है।

एकलवादी सिद्धान्त का ऐतिहासिक विकास क्रम:

जीन बोदां
(जनक)
थॉमस हॉब्स
आगे बढ़ाया (वैज्ञानिक स्वरूप)
जॉन ऑस्टिन
(चरम सीमा पर पहुँचाया)

[I] जीन बोदां (Jean Bodin) का विचार

बोदां एक फ्रांसीसी विचारक था जो मध्यकाल में पैदा हुआ। उस समय फ्रांस में चर्च (पोप) और राजा के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा था जिससे जनता असुरक्षा महसूस कर रही थी। बोदां ने फ्रांस के राजा में संप्रभुता का रूप देखा और कहा कि यदि सत्ता राजा को दे दी जाए, तो जनता की सुरक्षा हो सकेगी। अतः संप्रभुता धार्मिक युद्धों की देन है।

बोदां ने संप्रभुता को परिभाषित करते हुए कहा: "संप्रभुता प्रजाजनों व नागरिकों पर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जिस पर कानून के कोई बंधन नहीं होता।" अर्थात बोन्दा का मानना है कि - कानून संप्रभु का आदेश होता है और संप्रभु द्वारा बनाए हुए कानून से संपूर्ण जनता संचालित होती है लेकिन स्वयं संप्रभु उन कानून से ऊपर होगा, संप्रभु सुरक्षा शांति व्यवस्था व न्याय की स्थापना करेगा, मुद्रा चलाएगा, दंड दे सकता है। संप्रभु के द्वारा ही राज्य की संपूर्ण व्यवस्था का संचालन होगा।

बोन्दा ने जिस संप्रभुता का विचार दिया उसे मर्यादित संप्रभुता कहा गया लेकिन अंत में बोन्दा ने यह भी कहा कि यद्यपि प्रभु सत्ताधारी स्वयं के बने हुए कानून से ऊपर हैं, लेकिन वह सभी कानून के ऊपर नहीं है। संप्रभु राज्य के मौलिक कानून (संविधान) अंतरराष्ट्रीय कानून, ईश्वरीय कानून, और शाश्वत (उत्तराधिकार) कानून के अधीन होगा।

तो इस प्रकार बोदां स्वयं अपने विचारों में उलझ गया। एक तरफ उसने निरंकुश संप्रभुता का विचार दिया, दूसरी तरफ उस पर मौलिक कानून (संविधान), अंतर्राष्ट्रीय कानून, ईश्वरीय कानून और शाश्वत कानून का प्रतिबंध लगा दिया।

"वह (बोदां) न तो मध्यकालीन रहा और न ही आधुनिक बन सका।"

(अर्थात्: बोदां ने संप्रभुता का विचार देकर अपनी आधुनिकता का परिचय तो दिया, लेकिन उस पर ईश्वर का प्रतिबंध लगाकर उसे वापस मध्यकाल की तरफ धकेल दिया।)

[II] थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) का विचार

हॉब्स ने बोदां के विचारों की कमियों को दूर किया और संप्रभुता को पूर्णतः निरंकुश, असीम, अदेय और अहस्तान्तरणीय बताया।

"सीमित सम्प्रभुता अपने आप में विरोधाभास है।" — हॉब्स

हॉब्स ने कहा कि संप्रभु न केवल सुरक्षा, शांति और न्याय की स्थापना करता है, बल्कि वह जनता पर मनमानी कर लगा सकता है और मृत्युदंड भी दे सकता है। यहाँ तक कि चर्च भी राज्य के अधीन है। लेकिन हॉब्स ने अंत में एक अपवाद दिया: "यदि संप्रभु या राजा जनता के प्राणों की रक्षा नहीं कर पाता, तो जनता राजा का विरोध कर सकती है (आत्मरक्षा का अधिकार)।"

[III] जॉन ऑस्टिन (John Austin) का चरम कानूनी सिद्धान्त

जेरेमी बेंथम ने संप्रभुता को कृत्रिम बताया और उसे एक व्यक्ति में निहित माना। बेंथम के परम अनुयायी और इंग्लैंड के प्रसिद्ध न्यायवादी जॉन ऑस्टिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Lectures on Jurisprudence" में कानूनी संप्रभुता के विचार को चरम सीमा (Peak) पर पहुँचाया और उसे पूर्ण वैज्ञानिक बनाया। यही कारण है कानूनी संप्रभुता का विचार जान ऑस्टिन के साथ जुड़ गया।

"यदि एक निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति जो अपने ही समकक्ष अन्य किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की आज्ञा के पालन का आदी न हो और उसकी आज्ञा का पालन समाज का अधिकांश भाग स्वभावतः करता हो, तो वह निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति संप्रभु होगा और वह समाज एक राजनीतिक समाज होगा।" — जॉन ऑस्टिन

ऑस्टिन के उपर्युक्त कथन से 5 प्रमुख बातें स्पष्ट होती हैं:

  1. संप्रभुता एक निश्चित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति में निहित होनी चाहिए।
  2. संप्रभु अपने समकक्ष किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की आज्ञा पालन का आदी न हो (पूर्णतः स्वतंत्र)।
  3. संप्रभु की आज्ञा का पालन संपूर्ण समाज स्वभावतः (आदत से) करता हो।
  4. कानून उच्चतर द्वारा निम्नतर को दिया गया आदेश है।
  5. कानून संप्रभु की आज्ञा है।

11. ऑस्टिन के कानूनी सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ

विशेष नोट (Note):
ध्यान रहे कि ऑस्टिन ने ब्रिटिश संसद को ध्यान में रखकर कानूनी संप्रभुता का विचार दिया है जो निरंकुश और श्रेष्ठ है, लेकिन उस पर भी परम्परा एवं रीति-रिवाज का प्रतिबंध है।

ऑस्टिन के इस कठोर और अत्यधिक निरंकुश कानूनी सिद्धान्त की आगे चलकर 20वीं शताब्दी में बहुत कड़ी आलोचना हुई। प्रमुख विचारकों द्वारा की गई आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

आलोचक विचारक आलोचनात्मक कथन
सर हेनरी मेन
(Sir Henry Maine)
"इतना निरंकुश संप्रभु इतिहास में ढूँढा नहीं जा सकता।"
हर्नशा
(Hearnshaw)
"ऑस्टिन के दर्शन से हवलदारी की गंध आती है।"
अर्नेस्ट बार्कर
(Ernest Barker)
"ऑस्टिन का संप्रभुता सम्बन्धी विचार आधुनिक राज्यों से काफी दूर है।"

20वीं शताब्दी में ऑस्टिन की इसी एकलवादी संप्रभुता की कड़ी आलोचना हुई और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप बहुलवाद (Pluralism) का जन्म हुआ। बहुलवादियों के अनुसार, संप्रभु ने कानून का निर्माण नहीं किया है, बल्कि संप्रभु को अस्तित्व में लाने का श्रेय स्वयं कानून को ही प्राप्त है।

12. सम्प्रभुता का बहुलवादी (नव-सम्प्रभुता) सिद्धान्त का उदय

16वीं - 19वीं शताब्दी एकलवादी सिद्धांत परंपरागत संप्रभुता संप्रभु अविभाज्य संप्रभु असीमित स्वरूप व्यक्तिवादी / नकारात्मक उदारवाद एकात्मक व्यवस्था सत्ता के केन्द्रीकरण पर आधारित 20वीं शताब्दी बहुलवादी आधुनिक विभाज्य सीमित सकारात्मक उदारवाद / लोक कल्याणकारी संघात्मक व्यवस्था सत्ता के विकेन्द्रीकरण

16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक एकलवादी सम्प्रभुता का बोलबाला था। जहाँ यह माना जाता था कि राज्य या सम्प्रभुता देश के अन्दर व देश के बाहर दोनों स्थितियों में सर्वोच्च है, अर्थात् सम्प्रभुता अविभाज्य एवं असीमित है। यह सत्ता के केन्द्रीयकरण पर आधारित था और एकात्मक व्यवस्था का सूचक था। एकलवादी सम्प्रभुता का विचार व्यक्तिवादियों (Individualists) की देन है। इसे परंपरागत संप्रभुता या कानूनी संप्रभुता के नाम से भी जाना जाता है।

लेकिन 20वीं शताब्दी में एकलवादी सम्प्रभुता के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई और बहुलवादी सम्प्रभुता (Pluralistic Sovereignty) का जन्म हुआ, जिसे आधुनिक या नव-सम्प्रभुता भी कहा जाता है।

एकलवादी बनाम बहुलवादी सम्प्रभुता का तुलनात्मक आरेख

एकलवादी / परम्परागत सिद्धान्त
  • काल: 16वीं से 19वीं शताब्दी तक
  • लक्षण: सम्प्रभु अविभाज्य व असीमित
  • स्वरूप: व्यक्तिवादी / नकारात्मक उदारवाद
  • व्यवस्था: एकात्मक व्यवस्था
  • आधार: सत्ता के केन्द्रीयकरण पर आधारित
VS
बहुलवादी / आधुनिक सिद्धान्त
  • काल: 20वीं शताब्दी में उदय
  • लक्षण: विभाज्य व सीमित
  • स्वरूप: सकारात्मक उदारवाद / लोक कल्याणकारी
  • व्यवस्था: संघात्मक व्यवस्था
  • आधार: सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल

बहुलवाद एक ऐसी विचारधारा है जो यह मानती है कि सत्ता एक नहीं बल्कि अनेक जगह पर स्थित है। यह संघात्मक व्यवस्था और सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देता है। यह सम्प्रभुता को विभाज्य और सीमित मानता है। सकारात्मक उदारवाद और लोक कल्याणकारी राज्य का सम्बन्ध बहुलवाद से है। सामाजिक न्याय की अवधारणा भी बहुलवाद से जुड़ी है।

बहुलवाद का मुख्य उद्देश्य:
जहाँ मार्क्सवाद, श्रम संघवाद और अराजकतावाद राज्य का ही अंत कर देना चाहते हैं, वहीं बहुलवादी राज्य और सम्प्रभुता का अंत नहीं चाहते, बल्कि वे उसे सीमित कर देना चाहते हैं। इसी प्रकार सीमित सम्प्रभुता की अवधारणा बहुलवाद के साथ जुड़ी है।

द्वि-स्तरीय निष्ठा (Loyalty) का विकास (डायग्राम आधारित)

द्वितीय विश्व युद्ध के पहले
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राज्य या
सम्प्रभुता

16वीं से 19वीं शताब्दी (एकलवादी काल) के दौरान राज्य के अलावा कोई संगठन नहीं था, इसलिए लोगों की पूर्ण निष्ठा केवल 'राज्य' (State) के प्रति थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद (बहुलवादी)
छात्र
संघ
किसान
संघ
कर्मचारी
संघ
NGO
UNO
WTO
अंतर्राष्ट्रीय
न्यायालय
NAFTA
राज्य या
सम्प्रभुता

लेकिन 20वीं शताब्दी (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद), देश के अंदर और देश के बाहर (UNO, WTO, NAFTA, NGO आदि) कई संगठन बन गए। फलस्वरूप, लोगों की निष्ठा अब एक जगह (राज्य) पर न रहकर, कई संगठनों के प्रति बँट गई। इसी स्थिति को बहुलवादी सम्प्रभुता कहते हैं।

13. बहुलवाद के प्रमुख जनक एवं मूलभूत सिद्धान्त

बहुलवाद के जनक संयुक्त रूप से गियर्क (Gierke) एवं मेटलैंड (Maitland) माने जाते हैं। गियर्क जर्मनी के तथा मेटलैंड इंग्लैंड के रहने वाले थे। जबकि अमेरिका में बहुलवाद को विलियम जेम्स (William James) ने दार्शनिक आधार प्रदान किया। प्रमुख बहुलवादी विचारकों में लास्की, मैकाइवर, G.D.H. कोल, डिग्बी, क्रैब, फिगिस, लिंडसे, और मिस फॉलेट आदि शामिल हैं।

बहुलवाद: राज्य एवं अन्य संघों में सम्बन्ध

बहुलवादियों का मानना है कि राज्य में अनेक छोटे संघ या समुदाय होते हैं और ये संघ उतने ही शक्तिशाली हैं जितना कि राज्य। इसका कारण यह है कि व्यक्ति राज्य का भी सदस्य है और संघ का भी। इसलिए, व्यक्ति अपनी निष्ठा जितनी राज्य के प्रति रखता है, उतनी ही संघ के प्रति भी। अतः, संप्रभुता राज्य और संघों के बीच विभाजित है।

बहुलवादियों का प्रसिद्ध कथन है: "राज्य संघों का संघ है।"

राज्य और अन्य संघों में अंतर:

यद्यपि बहुलवादी राज्य और अन्य संघों में कोई विशेष अंतर नहीं मानते, फिर भी वे निम्नलिखित दो प्रमुख अंतर स्पष्ट करते हैं:

  • सदस्यता की प्रकृति: राज्य की सदस्यता अनिवार्य है, जबकि अन्य संघों की सदस्यता अनिवार्य नहीं है।
  • शक्ति का स्वरूप: राज्य के पास बाध्यकारी या दण्डकारी शक्ति है, जो अन्य संघों के पास नहीं होती। राज्य के पास यह शक्ति इसलिए है ताकि वह संघों के बीच विवादों का निपटारा कर सके और उनके बीच समन्वय व सामंजस्य स्थापित कर सके। अतः राज्य एक 'सर्व-समावेशक शक्ति' के रूप में कार्य करता है।

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (Quick Review)

प्रश्न: बहुलवाद क्या है?
(a) राज्य संघों का संघ है।
(b) राज्य सर्व-समावेशक शक्ति है।

💡 नोट: यहाँ वरीयता (b) राज्य सर्व-समावेशक शक्ति है को पहले मिलेगी, क्योंकि यह राज्य की अंतिम भूमिका को स्पष्ट करती है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
  • राजनीतिक संप्रभुता (सत्ता का विकेन्द्रीकरण): इसे ही बहुलवाद कहा जाता है।
  • व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के समर्थक: G. D. H. कोल (G.D.H. Cole)।

बहुलवाद के 6 प्रमुख सिद्धान्त:

  1. बहुलवाद राज्य को 'संघों का संघ' (Union of Unions) मानता है।
  2. बहुलवाद कानूनी संप्रभुता के प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आया। कानूनी संप्रभुता मानती है कि "कानून संप्रभु का आदेश है", जबकि बहुलवाद मानता है कि "राज्य या संप्रभु को अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को ही प्राप्त है।"
  3. बहुलवाद सीमित संप्रभुता में विश्वास करता है।
  4. बहुलवाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण (Decentralization) में विश्वास करता है।
  5. बहुलवाद लोकतंत्र में विश्वास करता है।
  6. बहुलवाद व्यावसायिक प्रतिनिधित्व (Occupational Representation) में विश्वास करता है।

    (शाब्दिक अर्थ: जिस क्षेत्र में जिस व्यवसाय के सर्वाधिक लोग हों, उस क्षेत्र से उसी व्यवसाय के व्यक्ति को प्रतिनिधि चुना जाए। इसके प्रमुख समर्थक G.D.H. कोल हैं।)

14. बहुलवादी विचारक: गियर्क, मेटलैंड एवं फिगिस

(A) गियर्क एवं मेटलैंड (Gierke & Maitland) का विचार

इन्हें संयुक्त रूप से बहुलवाद का जनक माना जाता है। इनका मानना है कि "जितने भी संघ अस्तित्व में हैं, उनका अपना स्वतंत्र एवं स्थायी व्यक्तित्व है, उनकी अपनी चेतना या इच्छा होती है, वह किसी पर निर्भर नहीं है।" अतः संप्रभुता को राज्य और इन संघों के बीच विभाजित होना चाहिए। ये लोग राज्य को संघ की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं, अर्थात् राज्य एक प्रमुख संघ है, क्योंकि वह सभी संघों के बीच समन्वय स्थापित करता है।

नोट: अर्नेस्ट बार्कर ने गियर्क एवं मेटलैंड द्वारा प्रतिपादित 'संघों के वास्तविक व्यक्तित्व' की धारणा को नामंजूर कर दिया था।

(B) फिगिस (Figgis) का विचार

फिगिस एक प्रमुख बहुलवादी ईसाई विचारक हैं, जो चर्च या धर्म संघों को अधिक महत्व देते हैं और उसे राज्य के समकक्ष मानते हैं। फिगिस ने परंपरागत संप्रभुता (कानूनी संप्रभुता) को एक आदर्शीय अंधविश्वास माना और धर्म संघ को महत्व दिया।

"मानव समाज व्यक्तियों का ऐसा बालू का ढेर नहीं है जो केवल राज्य के जरिये ही एक-दूसरे से जुड़े हों, बल्कि समाज में तो नीचे से ऊपर तक सोपानित क्रम से एक के ऊपर एक संघ होते हैं।" — फिगिस

(C) ए. डी. लिंडसे (A.D. Lindsay) का विचार

लिंडसे का मानना है कि छोटे-छोटे संघों का महत्व अधिक होता है। लिंडसे का सबसे प्रसिद्ध कथन है:

"राज्य संघों का संघ है।" (State is the Union of Unions)

(यद्यपि यह कथन सभी बहुलवादियों से सम्बंधित है, लेकिन मुख्य रूप से यह लिंडसे के नाम के साथ जुड़ा हुआ है।)

15. बहुलवादी विचारक: लास्की के विचार (Harold Laski)

लास्की एक समालोचक (Critic) हैं और समय के साथ उन्होंने कई विचारधाराओं का समर्थन किया। उनका जन्म 1893 में इंग्लैण्ड में हुआ था और मृत्यु 1950 में हुई। उन्होंने अपने जीवन में विश्व में घटित अनेक घटनाओं को देखा और समय के साथ अपने विचारों में परिवर्तन किया।

लास्की ने प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध, विश्व आर्थिक मंदी, फासीवाद का उदय, एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका का राष्ट्र-राज्य के रूप में उदय, लोक कल्याणकारी राज्य का उदय और बहुलवाद का उदय आदि को देखा। अंततोगत्वा लास्की को एक प्रमुख बहुलवादी विचारक के रूप में देखा जाता है।

प्रमुख पुस्तकें:
लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Grammar of Politics' और 'An Introduction to Politics' में अपने बहुलवादी विचारों का प्रतिपादन किया।
"यदि संप्रभुता सम्बन्धी सम्पूर्ण विचार का परित्याग कर दिया जाय तो राजनीतिशास्त्र को एक स्थायी लाभ होगा।" — लास्की

लास्की पुनः लिखते हैं कि समाज का स्वरूप संघात्मक है, अतः सत्ता का स्वरूप भी संघात्मक होना चाहिए।

लास्की मानते हैं कि आज समाज में छोटे-छोटे संघ या संगठन विद्यमान हैं और राज्य इन्हीं संघों में से एक है। अर्थात् राज्य और संघ के बीच कोई अंतर नहीं है, संघ उतने ही प्रभुत्व सम्पन्न हैं जितना कि राज्य। लेकिन, लास्की भी इस बात को मानते हैं कि राज्य अन्य संघों की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि राज्य की सदस्यता अनिवार्य है जबकि संघ की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्य के पास बाध्यकारी या दण्डकारी शक्ति है।

  • लास्की कहते हैं: "संघ राज्य से कम प्रभुत्व सम्पन्न नहीं है।"
  • लास्की पुनः कहते हैं: "सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार मानव के कल्याण के साथ मेल नहीं खाता।"

लास्की का मानना है कि आज न केवल राष्ट्रीय बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संप्रभुता का विचार धराशायी हो चुका है। आज इंग्लैण्ड को यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह खान में काम करने वाले मजदूरों को कितनी मजदूरी दे और कितना शस्त्रीकरण करे।

16. बहुलवादी विचारक: मैकाइवर के विचार (R. M. MacIver)

मैकाइवर को समाजशास्त्री माना जाता है, इसलिए वह राज्य की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देते हैं। मैकाइवर की प्रसिद्ध पुस्तक 'The Modern State' है। मैकाइवर भी अन्य बहुलवादियों की तरह संघ को राज्य के समकक्ष मानते हैं। मैकाइवर कहते हैं कि राज्य समाज का अंग है और सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए राज्य अस्तित्व में आया है।

"राज्य शक्ति का नहीं बल्कि सेवा का साधन है।" — मैकाइवर

मैकाइवर ने समाज को महत्व देते हुए कहा कि राज्य परम्पराओं, रीतिरिवाजों और फैशन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। मैकाइवर ने निगमनात्मक राज्य (Corporate State) और सेवाधर्मी राज्य (Service State) का प्रतिपादन किया। मैकाइवर कानूनी संप्रभुता को भी नकारते हैं

"राज्य कानून का शिशु व जनक दोनों है।" — मैकाइवर

अर्थात् राज्य को अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को प्राप्त है, लेकिन जब राज्य अस्तित्व में आ जाता है, तो कानून को बनाना और उसे लागू करना तथा उसकी सुरक्षा करना राज्य का कर्तव्य बन जाता है। इस प्रकार मैकाइवर ने राज्य और कानून को एक-दूसरे का पूरक माना।

17. डिग्बी एवं क्रैब के विचार (Diguit & Krabbe)

ये दोनों विचारक कानूनी संप्रभुता पर प्रबल प्रहार करते हैं। क्रैब का प्रसिद्ध कथन है:

"संप्रभुता संबंधी धारणा को राजनीतिशास्त्र से हटा देना चाहिए।" — क्रैब

डिग्बी और क्रैब दोनों मानते हैं कि कानून संप्रभु का आदेश नहीं है, बल्कि संप्रभु के अस्तित्व में आने के बहुत पहले से कानून विद्यमान था और संप्रभु को भी अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को प्राप्त है। लेकिन जब संप्रभु अस्तित्व में आ जाता है, तो वह कानूनों का निर्माण करता है और लोग कानून का पालन इसलिए करते हैं कि ऐसा करना उनके हित में है।

डिग्बी और क्रैब के विचारों में मुख्य अंतर

डिग्बी (Diguit) का मत क्रैब (Krabbe) का मत
कानूनों का पालन करना समाज का 'कर्तव्य' (Duty) है। कानूनों का पालन करना एक 'दायित्व / स्वतः बोध' (Liability) है।

मिस फॉलेट के अनुसार (Miss Follett)

"मेरी आत्मा का निवास राज्य में है।" — मिस फॉलेट

आज राज्य या संप्रभु न केवल देश के अंदर सीमित है, बल्कि वह देश के बाहर भी सीमित है। आज सम्प्रभुता पर अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का भी प्रतिबन्ध है। संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO), विश्व बैंक (World Bank), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व व्यापार संगठन (WTO) तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) से भी कहीं न कहीं राज्य सीमित होते हैं।

राज्य पर बाहरी (अन्तर्राष्ट्रीय) प्रतिबंध

राज्य (State) UNO MNCs IMF WTO World Bank
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