| अधिकार (Rights): अर्थ, प्रकृति एवं अधिकारों के विभिन्न सिद्धान्त |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में 'अधिकार' (Rights) का अर्थ, प्रकृति, प्रकार और इसके 6 प्रमुख सिद्धान्तों (प्राकृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक, आदर्शवादी, समाज कल्याण और मानव अधिकार) का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। यह UPSC, PCS, NET-JRF और TGT-PGT राजनीति विज्ञान की परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हस्तलिखित नोट्स पर आधारित है। |
- 1. अधिकार: प्रस्तावना, अर्थ एवं मूल अवधारणा
- 2. अधिकार की प्रकृति एवं 3 प्रमुख लक्षण
- 3. अधिकार और कर्तव्य: एक-दूसरे के पूरक
- 4. अधिकारों के प्रकार: नकारात्मक एवं सकारात्मक अधिकार
- 5. अधिकारों के 6 प्रमुख सिद्धान्त (संक्षिप्त परिचय)
- 6. [I] प्राकृतिक / उदारवादी अधिकारों का सिद्धान्त
- 7. प्राकृतिक अधिकारों की विशेषताएँ एवं क्रांतियों पर प्रभाव
- 8. [II] कानूनी अधिकारों का सिद्धान्त (बेंथम)
- 9. [III] ऐतिहासिक / रूढ़िवादी अधिकारों का सिद्धान्त (बर्क)
- 10. [IV] आदर्शवादी / नैतिक अधिकारों का सिद्धान्त
- 11. [V] समाज कल्याण अधिकारों का सिद्धान्त (लास्की)
- 12. हेरोल्ड लास्की के अधिकारों पर विशेष विचार
- 13. [VI] मानव अधिकारों का सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण
- 14. अधिकारों का मार्क्सवादी सिद्धान्त
✦ 1. अधिकार: प्रस्तावना, अर्थ एवं मूल अवधारणा
राजनीतिशास्त्र की मूल अवधारणा में अधिकार का स्थान सर्वोपरि है। जब किसी प्रकार का अधिकार किसी को मिल जाता है, तो स्वतंत्रता का जन्म स्वमेव (अपने आप) हो जाता है। जब सबको स्वतंत्रता व समानता मिलती है तो समानता का जन्म होता है। जिस समाज में स्वतंत्रता और समानता पायी जाती है, वह समाज न्यायपूर्ण होता है। न्याय लोकतंत्र में ही संभव है, और लोकतंत्र विधि के शासन (Rule of Law) पर आधारित है। विधि में दंड निहित है और नागरिकता का विचार भी केवल लोकतंत्र में सम्भव है।
उदारवाद बनाम मार्क्सवाद:
मार्क्सवाद ने उदारवाद की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि "उदारवाद (पूंजीवाद) में समाज विभाजित है", अर्थात् अमीर और गरीब के बीच समाज बँटा हुआ है। इसलिए इन अधिकारों का प्रयोग केवल पूँजीपति ही करता है और गरीब इससे वंचित रह जाता है। मार्क्सवाद के अनुसार, जब समाज वर्गविहीन व राज्यविहीन हो जाय (अर्थात् साम्यवादी समाज की स्थापना हो जाय), तभी अधिकारों का प्रयोग सभी समान रूप से कर सकते हैं।
'अधिकार' (Right) का शाब्दिक अर्थ:
अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थिति है जिसके अभाव में व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता। यहाँ व्यक्तित्व के विकास का अर्थ आंतरिक विकास और बाह्य विकास दोनों से है। अधिकार को अंग्रेजी में Right कहते हैं जिसका अर्थ है 'उचित'। इसका विलोम Wrong है जिसका अर्थ है 'अनुचित'।
अर्थात जो अधिकार है वह उचित है, लेकिन जो अनुचित है उसे अधिकार नहीं कहा जा सकता। अधिकार समाज की देन है, राज्य इनकी सुरक्षा करता है या उसे लागू करता है।
✦ 2. अधिकार की प्रकृति एवं 3 प्रमुख लक्षण
उपर्युक्त अवधारणा से अधिकार के बारे में निम्नलिखित तीन बातें स्वतः स्पष्ट होती हैं:
- अधिकार उचित का दावा है।
- अधिकार समाज की देन है।
- राज्य अधिकारों की सुरक्षा करता है।
अधिकारों की परिवर्तनशील (गत्यात्मक) प्रकृति:
अधिकार समाज की देन है। चूँकि समाज गत्यात्मक (Dynamic) है, अतः समाज के बदलने के साथ अधिकारों के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। ऐसे अधिकार जो समाज और परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदल पाते, वह कभी भी समाज का भला नहीं कर सकते हैं। अतः अधिकार गतिशील एवं परिवर्तनशील है। चूँकि अधिकार समाज की देन है, इसलिए व्यक्ति अधिकारों का प्रयोग समाज के विरुद्ध नहीं कर सकता है।
✦ 3. अधिकार और कर्तव्य: एक-दूसरे के पूरक
अधिकार को कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा जाता है। आज के समय में अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं। प्रसिद्ध विचारक लास्की और मैकाइवर जैसे विचारकों ने भी अधिकार और कर्तव्य को एक-दूसरे का पूरक बताया है।
प्रमुख विचारकों के कथन:
अर्थात, बिना कर्तव्यों के अधिकारों की कोई महत्ता नहीं है। जब एक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करता है, तो दूसरे व्यक्ति के अधिकारों की स्वतः ही रक्षा हो जाती है।
✦ 4. अधिकारों के प्रकार: नकारात्मक एवं सकारात्मक अधिकार
अधिकारों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है: नकारात्मक अधिकार और सकारात्मक अधिकार। इन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे दिया गया है:
| नकारात्मक अधिकार (Negative Rights) | सकारात्मक अधिकार (Positive Rights) |
|---|---|
| यह वह अधिकार होता है जिस पर राज्य की तरफ से कोई प्रतिबंध नहीं होता। | यह वह अधिकार होता है जिस पर राज्य की तरफ से प्रतिबंध होता है। |
| सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होते हैं। | यह सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर प्रदान किया जाता है (ताकि समाज में समानता आ सके)। |
| इसका दृष्टिकोण मुख्य रूप से व्यक्तिवादी (Individualistic) होता है। | इसका दृष्टिकोण मुख्य रूप से लोक कल्याणकारी (Welfare) होता है। |
✦ 5. अधिकारों के 6 प्रमुख सिद्धान्त (संक्षिप्त परिचय)
समय-समय पर अधिकारों की उत्पत्ति और उनके स्रोत के विषय में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गए हैं। इन सिद्धान्तों को उनके उद्भव काल (शताब्दी) के आधार पर मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
अधिकारों के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्गीकरण:
- 1. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त: प्रकृति की देन (यह प्राचीनतम सिद्धान्त है)।
- 2. कानूनी अधिकार का सिद्धान्त: अधिकार राज्य की देन है।
- 3. ऐतिहासिक अधिकारों का सिद्धान्त: अधिकार इतिहास/परम्पराओं की देन है।
- 4. आदर्शवादी / नैतिक अधिकारों का सिद्धान्त।
- 1. समाज कल्याण अधिकारों का सिद्धान्त: अधिकार समाज की देन है और लोक कल्याण के लिए है।
- 2. मानव अधिकारों का सिद्धान्त: मनुष्य होने के नाते जन्म से प्राप्त अधिकार।
✦ 6. [I] प्राकृतिक / उदारवादी अधिकारों का सिद्धान्त
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को उदारवादी या व्यक्तिवादी सिद्धान्त भी कहा जाता है। यह 17वीं शताब्दी में ज्यादा प्रचलित था। इसके जनक जॉन लॉक (John Locke) माने जाते हैं। इसके अन्य प्रमुख समर्थकों में ग्रोसियस, टॉमस पेन और थॉमस जेफरसन का नाम आता है।
जॉन लॉक का विचार (Father of Natural Rights):
लॉक ने मुख्य रूप से तीन प्राकृतिक अधिकारों की बात की है:
यह अधिकार बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को समान रूप से मिलता है (किसी को कम या ज्यादा नहीं)। अतः स्पष्ट है कि इसका स्वरूप व्यक्तिवादी है। लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया और जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकार को सम्पत्ति के अधिकार में ही निहित माना।
"लॉक के राजनीतिक दर्शन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की सम्पत्ति की सुरक्षा करना है - वाहन।"
✦ 7. प्राकृतिक अधिकारों की विशेषताएँ एवं क्रांतियों पर प्रभाव
प्राकृतिक अधिकार अविभाज्य, निरंकुश, असीम, अदेय तथा अहस्तान्तरणीय हैं। इन अधिकारों को राज्य या समाज नहीं देता, बल्कि इसे ईश्वर या प्रकृति सभी को समान रूप में देती है। राज्य का कार्य केवल इन अधिकारों की सुरक्षा व क्रियान्वयन करना है।
फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति पर प्रभाव:
विश्व की दो महान क्रांतियां (फ्रांसीसी व अमेरिकी) इसी प्राकृतिक सिद्धान्तों पर आधारित थीं:
- फ्रांसीसी क्रांति (1789): इसका नारा "स्वतंत्रता, समानता व बंधुता" का अधिकार था (जिसे मानवीय या प्राकृतिक अधिकार कहा गया)। इसके प्रेरणा स्रोत रूसो (Rousseau) थे।
- अमेरिकी क्रांति (1776): इसके प्रेरणा स्रोत लॉक माने जाते हैं और क्रांति के नायक थॉमस जेफरसन थे। इसका नारा था: "जीवन, स्वतंत्रता, और सुख का अधिकार।"
निष्कर्ष एवं सिद्धान्त की आलोचना:
उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट है कि इस सिद्धान्त ने सभी व्यक्तियों के बराबर महत्व को बताकर व्यक्ति की महानता को स्थापित किया और मध्य काल में प्रचलित विशेषाधिकारों पर कड़ा प्रहार किया।
आलोचना: जहाँ इस सिद्धान्त ने व्यक्तिवाद की नींव डाली, वहीं सभी व्यक्तियों को बराबर मानते हुए राज्य को केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय तक सीमित कर दिया। इसने राज्य को लोक कल्याण का कार्य करने से मना कर दिया, जिससे अमीर व गरीब के बीच दूरियाँ बढ़ती गयीं और विषमता मूलक समाज का उदय हुआ।
लॉक को व्यक्तिवाद या उदारवाद या पूँजीवाद का जनक माना जाता है। प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त अधिकारों का सबसे प्राचीन सिद्धान्त है।
✦ 8. [II] कानूनी अधिकारों का सिद्धान्त (Legal Theory)
यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी में प्रचलित था। यह सिद्धान्त प्राकृतिक अधिकारों का उल्टा (विरोधी) है। जहाँ प्राकृतिक सिद्धान्तों का मानना है कि अधिकार 'प्रकृति' की देन है, राज्य की नहीं; वहीं कानूनी अधिकारों का सिद्धान्त अधिकारों को 'राज्य की देन' मानता है।
इसलिए इसे 'कानूनी अधिकार' कहा जाता है। लेकिन यह कानूनी अधिकार के रूप में तभी तक मान्य होता है जब तक न्यायालय उसे मान्यता दिये रहता है। जैसे ही न्यायालय उसे अवैध घोषित कर देता है, वह कानूनी अधिकार नहीं रह जाता।
(कानूनी अधिकारों के सिद्धान्त के जनक)
(प्रमुख समर्थक)
(पूर्ण वैज्ञानिक स्वरूप दिया)
कानूनी अधिकारों के सिद्धान्तों को पूर्ण वैज्ञानिक स्वरूप ऑस्टिन ने दिया, इसलिए यह सिद्धान्त ऑस्टिन के नाम के साथ सम्बद्ध हो गया।
बेंथम की आलोचनाएँ:
बेंथम प्राकृतिक अधिकारों के बड़े विरोधी थे। बेंथम प्राकृतिक अधिकारों के कानूनों को "कपोल कल्पना व कोरा बकवास" (Nonsense upon stilts) कहते हैं। बेंथम फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी क्रांति के आलोचक हैं, क्योंकि यह क्रांति प्राकृतिक सिद्धान्तों के अधिकारों पर आधारित थी।
✦ 9. [III] ऐतिहासिक / रूढ़िवादी अधिकारों का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के जनक इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अनुदारवादी (Conservative) विचारक एडमंड बर्क (Edmund Burke) हैं। बर्क इंग्लैण्ड के रहने वाले थे और वे चर्च में ज्यादा विश्वास करते थे (परम्परा, रीति-रिवाज को महत्व देते थे)।
बर्क ने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त और कानूनी अधिकारों के सिद्धान्त की आलोचना की, क्योंकि ये अधिकार परम्परा और रीति-रिवाज का हिस्सा नहीं हैं। यह सिद्धान्त प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्तों के प्रतिक्रिया स्वरूप आया है।
क्रांतियों पर बर्क का दृष्टिकोण:
- फ्रांसीसी क्रांति का विरोध: बर्क ने फ्रांसीसी क्रांति की आलोचना करते हुए कहा कि फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने जिस समानता, स्वतंत्रता, बन्धुता के अधिकारों का प्रतिपादन किया, उसका प्रयोग फ्रांस की जनता पहले से नहीं करती थी। अतः यह क्रांति सफल नहीं हो सकती।
- इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रांति (1688) का समर्थन: बर्क ने 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति (संसदीय सम्प्रभुता के उदय) की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस क्रांति के द्वारा जिन अधिकारों का जन्म हुआ, वह अंग्रेजों के परम्परागत अधिकारों पर आधारित थी।
ऐतिहासिक सिद्धान्त की आलोचना:
ऐतिहासिक अधिकारों के सिद्धान्त की आगे चलकर कटु आलोचना हुई, क्योंकि सभी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को हम अधिकार का हिस्सा नहीं मान सकते या उसे बनाये नहीं रख सकते। जैसे भारत में सती प्रथा व बाल विवाह को आज हम कुरीतियों के रूप में देखते हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि परम्परा और रीति-रिवाज समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और उसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते।
✦ 10. [IV] आदर्शवादी / नैतिक / व्यक्तित्व अधिकारों का सिद्धान्त
19वीं शताब्दी में आदर्शवाद का जन्म हुआ। आदर्श - जो विचारों में है; वह व्यवहार में नहीं। आदर्श का मतलब 'प्रत्यय' भी होता है। (आदर्शवाद ⇄ प्रत्ययवाद ⇄ कल्पनावाद ⇄ रहस्यवाद)
राज्य और व्यक्ति के बीच के अध्ययन को ही राजनीति कहते हैं। आदर्शवादियों के अनुसार राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध (Organic Relationship) होता है, अर्थात् अंश व सम्पूर्ण का सम्बन्ध।
- फोकस: आंतरिक विकास पर बल देता है।
- स्वरूप: नैतिक विकास (Moral Development)।
- फोकस: बाह्य विकास पर बल देता है।
- स्वरूप: भौतिक विकास (Material Development)।
व्यक्तित्व का पूर्ण अर्थ: आंतरिक विकास + बाह्य विकास।
- जनक: इमैनुएल कांट (Kant)
- प्रमुख समर्थक: हीगल (Hegel), बोसांके (Bosanquet), रूसो (Rousseau), टी. एच. ग्रीन (T.H. Green)
इस सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताएँ:
आदर्शवाद राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध मानता है, अर्थात् राज्य सम्पूर्ण है और व्यक्ति उसका अंश। आदर्शवाद की मान्यता है कि जिस प्रकार अंश अपना सब कुछ अंशी के साथ प्राप्त कर सकता है, उसी प्रकार व्यक्ति अपना सब कुछ राज्य के साथ प्राप्त कर सकता है। आदर्शवादी राज्य को एक नैतिक संस्था के रूप में देखते हैं।
इस सिद्धान्त के अनुसार हम केवल उसे ही अधिकार की संज्ञा दे सकते हैं जो व्यक्ति के आंतरिक व नैतिक विकास में सहायक हो। अधिकार समाज की देन है (राज्य व समाज को एक मानता है) और राज्य इनकी सुरक्षा और क्रियान्वयन करता है।
प्रमुख विचारकों के कथन:
"कांट ने भी व्यक्ति के नैतिक विकास को सर्वश्रेष्ठ बताया।"
(हीगल ने राज्य की तुलना ईश्वर से करते हुए उसे 'सर्वोच्च नैतिकता' बताया)
रूसो का भी मानना है कि सामान्य इच्छा अर्थात् राज्य (सामान्य इच्छा) सामान्य हित की चेतना है और व्यक्ति अपना नैतिक विकास राज्य में ही रहकर कर सकता है।
✦ 11. [V] समाज कल्याण अधिकारों का सिद्धान्त
यह सिद्धान्त 20वीं शताब्दी में आया। यह सिद्धान्त मानता है कि अधिकार समाज की देन है।
| व्यक्तिवादी दृष्टिकोण (पुराने सिद्धान्त) | समाज कल्याण दृष्टिकोण (20वीं सदी) |
|---|---|
व्यक्ति का हित सर्वोपरि
|
यह सिद्धान्त मानता है कि अधिकार समाज की देन है। सामाजिक हित > व्यक्ति का हित
(सामाजिक हित सर्वोपरि)
|
यहाँ सामाजिक हित का मतलब है - 'गरीब का हित'।
यह सिद्धान्त उपर्युक्त सभी (प्राचीन) अधिकारों के सिद्धान्तों का समन्वय करता है। यह मनुष्य को एक 'सामाजिक प्राणी' के रूप में देखता है। इसकी मान्यता है कि अधिकार हम उसी को कह सकते हैं जो समाज कल्याण पर आधारित होता है। इसके अनुसार ऐसे अधिकार जो सामाजिक हित के विरुद्ध हैं, उन्हें हम अधिकार की संज्ञा नहीं दे सकते।
इस सिद्धान्त का मानना है कि अधिकारों का स्वरूप चाहे प्राकृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक या नैतिक क्यों न हो उनको केवल एक आधार पर हम उचित ठहरा सकते हैं कि वे सामाजिक हित में हैं या नहीं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करना होना चाहिए और सभी को समाज कल्याण के समक्ष झुकना चाहिए।
इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थकों में बेंथम, जे. एस. मिल, लास्की, ग्रीन, जी. डी. एच. कोल (G.D.H. Cole), हॉब हाउस (Hobhouse), बार्कर आदि का नाम आता है।
जे. एस. मिल (J.S. Mill) के अनुसार:
हॉब हाउस (Hobhouse) के अनुसार:
✦ 12. हेरोल्ड लास्की (H.J. Laski) के अधिकारों पर विशेष विचार
समाज कल्याण अधिकारों के सिद्धान्त की सर्वोत्तम व्याख्या लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Grammar of Politics' में की है। लास्की अधिकारों के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं।
लास्की पुनः लिखते हैं—
लास्की अधिकारों के सम्बन्ध में निम्नलिखित 4 प्रमुख बातें कहते हैं:
- अधिकार सामाजिक जीवन की एक शर्त है।
- अधिकारों का सवाल केवल समाज में ही पैदा होता है।
- किसी व्यक्ति को सामाजिक हित के विरुद्ध अधिकार नहीं मिल सकता।
- अधिकार मनुष्य को इसलिए दिये जाते हैं ताकि वह सामाजिक हित में अपना योगदान कर सके, अतः अधिकारों को कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा जाता है (लास्की ने अधिकार और कर्तव्यों को एक-दूसरे का पूरक माना)।
अधिकारों को परिवर्तनशील व गतिशील बताते हुए लास्की कहते हैं:
(सामाजिक हित के विरुद्ध कोई अधिकार नहीं - लास्की)
राज्य और अधिकारों के बीच सम्बन्ध (लास्की का दृष्टिकोण):
लास्की राज्य और अधिकारों के बीच सम्बन्ध बताते हुए लिखते हैं कि "हम राज्य की पहचान इस बात से करते हैं कि उसने अपने नागरिकों को कितना अधिकार दे रखा है।" और व्यक्ति के पास कितना अधिकार है, उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह सामाजिक हित में अपना कितना योगदान दे रहा है।
लास्की का मानना है कि राज्य अधिकारों को जन्म नहीं देता, बल्कि उन्हें मान्यता देता है। इसलिए लास्की अधिकारों को राज्य से ऊपर मानते हैं। लास्की अधिकारों को अत्यधिक शक्तिशाली मानते हुए कहते हैं— "अधिकार सक्षम निरंकुशवाद से भी ज्यादा निरंकुश है।"
लास्की कुछ विशेष अधिकारों की भी बात करते हैं जो व्यक्तित्व के विकास का हिस्सा हैं, जैसे— शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, संघ बनाने का अधिकार, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आदि।
✦ 13. [VI] मानव अधिकारों का सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण
यह सिद्धान्त भी 20वीं शताब्दी की देन है। जहाँ प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त 'मानवीय बुद्धि या विवेक' पर आधारित होता है, वहीं मानव अधिकारों का सिद्धान्त 'मानवीय आवश्यकताओं' पर आधारित होता है। मानवीय आवश्यकताओं का प्रेरणा स्रोत वह व्यक्ति होता है जो जेल की सलाखों के पीछे बंद है, शोषित और पीड़ित है, निर्धन और अशिक्षित है, बीमार व बेरोजगार है, विकलांग और उपेक्षित है, या मलिन बस्तियों में गंदा जल पी रहा है।
ऐसे अमानवीय जीवन जी रहे व्यक्तियों को इस स्थिति से बाहर निकाला जाए और उसे मानवीय जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जाए—यही मानव अधिकारों का मुख्य लक्ष्य है।
(प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य होता है कि वह इन्हें ऐसे व्यक्तियों को उपलब्ध कराये।)
मानव अधिकारों के दो रूप (UNO घोषणा पत्र):
10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के घोषणा पत्र में अनुच्छेद 1 से लेकर 30 तक मानव अधिकारों का व्यापक प्रावधान किया गया है। इसके दो रूप हैं:
-
1. नकारात्मक अधिकार (अनुच्छेद 1 से 21):
इसमें राजनीतिक अधिकार, नागरिक अधिकार और कानूनी अधिकार शामिल हैं। इस पर राज्य की तरफ से कोई प्रतिबंध नहीं होता और यह सभी को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होता है। (दृष्टिकोण: व्यक्तिवादी)। -
2. सकारात्मक अधिकार (अनुच्छेद 22 से 26):
इसके अंतर्गत सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधिकार आते हैं। यह अधिकार समाज के कमजोर वर्गों (गरीब, दीन-हीन, शोषित) को ध्यान में रखते हुए प्रदान किये जाते हैं। इसे मानव अधिकार का दूसरा चरण कहा जाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार की रक्षा के लिए 1962 में 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' का गठन हुआ (मुख्यालय: लंदन)। प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ।
- भारत में इसका गठन 1993 में हुआ। उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश इसका अध्यक्ष होता है।
- मानवाधिकार आयोग अपनी रिपोर्ट एमनेस्टी इंटरनेशनल को देता है और वह अपनी रिपोर्ट UNO को, जिसके आधार पर 'मानव विकास सूचकांक' (HDI) तैयार किया जाता है।
अधिकारों का स्वरूप एवं उपयुक्त व्यवस्था
| अधिकारों का स्वरूप | उपयुक्त व्यवस्था |
|---|---|
| प्राकृतिक अधिकार | बाजार समाज व्यवस्था |
| नागरिक अधिकार | संविधानिक शासन व्यवस्था |
| राजनीतिक अधिकार | लोकतांत्रिक व्यवस्था |
| सामाजिक-आर्थिक अधिकार | लोक कल्याणकारी राज्य |
| मानवीय अधिकार | मानवीय विश्व व्यवस्था |
मानव अधिकारों के 5 विभिन्न सिद्धान्त/दृष्टिकोण:
- उदारवादी सिद्धान्त (जनक: लॉक): इसमें व्यक्ति को महत्व दिया जाता है, राज्य को केवल सेवक माना जाता है।
- स्वेच्छातंत्रवादी या नव-उदारवादी सिद्धान्त (जनक: रॉबर्ट नोजिक): इसमें बाजारीकरण को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।
- मार्क्सवादी सिद्धान्त (समर्थक: मार्क्स व लेनिन): यह राज्य को पूँजीपतियों की संस्था समझता है।
- समुदायवादी सिद्धान्त (समर्थक: अलेस्डेयर मैकिन्टायर (Alasdair MacIntyre), माइकल सैंडेल (Michael Sandel),): यह व्यक्तिगत हित को सामुदायिक हित के रूप में देखता है।
- नारीवादी सिद्धान्त (समर्थक: शीला रोबाथम व फायर स्टोन): यह नारियों के हितों की बात करता है और पुरुष व स्त्री में समानता खोजता है।
✦ 14. अधिकारों का मार्क्सवादी सिद्धान्त
मार्क्सवाद की मान्यता है कि उदारवादी व्यवस्था में अधिकारों का प्रयोग केवल एक ही वर्ग (अमीर/पूँजीपति) करता है, जबकि गरीब वर्ग अधिकारों से वंचित हो जाता है। क्योंकि पूँजीवादी समाज वर्गों में विभाजित है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण: पूँजीवाद से साम्यवाद की ओर
(मार्क्सवाद के अनुसार: निजी संपत्ति और राज्य का अंत होने पर ही साम्यवाद आएगा, जहाँ सभी समान होंगे।)
मार्क्सवाद के अनुसार, केवल साम्यवादी समाज में ही सभी को समान रूप से अधिकार संभव हो सकता है। वैसे तो मार्क्सवाद अधिकारों पर कम और कर्तव्यों पर अधिक बल देता है। 1936 में जब सोवियत संघ का संविधान बना, तो 'काम के अधिकार' (Right to Work) को मौलिक अधिकार घोषित किया गया।
अधिकारों का सारांश (Quick Revision)
| राजनीतिक अधिकार | उदारवाद |
| आर्थिक अधिकार | मार्क्सवाद |
| राजनीतिक, नागरिक, कानूनी | नकारात्मक अधिकार |
| सामाजिक, आर्थिक अधिकार | सकारात्मक अधिकार |

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