अधिकार : अर्थ, प्रकृति और अधिकारों का विभिन्न सिद्धान्त | राजनीति विज्ञान नोट्स

अधिकार अर्थ प्रकृति और विभिन्न सिद्धांत नोट्स | Political Science
अधिकार (Rights): अर्थ, प्रकृति एवं अधिकारों के विभिन्न सिद्धान्त
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में 'अधिकार' (Rights) का अर्थ, प्रकृति, प्रकार और इसके 6 प्रमुख सिद्धान्तों (प्राकृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक, आदर्शवादी, समाज कल्याण और मानव अधिकार) का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। यह UPSC, PCS, NET-JRF और TGT-PGT राजनीति विज्ञान की परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हस्तलिखित नोट्स पर आधारित है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

✦ 1. अधिकार: प्रस्तावना, अर्थ एवं मूल अवधारणा

राजनीतिशास्त्र की मूल अवधारणा में अधिकार का स्थान सर्वोपरि है। जब किसी प्रकार का अधिकार किसी को मिल जाता है, तो स्वतंत्रता का जन्म स्वमेव (अपने आप) हो जाता है। जब सबको स्वतंत्रता व समानता मिलती है तो समानता का जन्म होता है। जिस समाज में स्वतंत्रता और समानता पायी जाती है, वह समाज न्यायपूर्ण होता है। न्याय लोकतंत्र में ही संभव है, और लोकतंत्र विधि के शासन (Rule of Law) पर आधारित है। विधि में दंड निहित है और नागरिकता का विचार भी केवल लोकतंत्र में सम्भव है।

ऐतिहासिक तथ्य: उपर्युक्त सभी अवधारणाएं आधुनिक काल की देन हैं और इसको जन्म देने का श्रेय उदारवाद (Liberalism) को प्राप्त है।

❖ उदारवाद बनाम मार्क्सवाद

मार्क्सवाद ने उदारवाद की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि "उदारवाद (पूंजीवाद) में समाज विभाजित है", अर्थात् अमीर और गरीब के बीच समाज बँटा हुआ है। इसलिए इन अधिकारों का प्रयोग केवल पूँजीपति ही करता है और गरीब इससे वंचित रह जाता है। मार्क्सवाद के अनुसार, जब समाज वर्गविहीन व राज्यविहीन हो जाय (अर्थात् साम्यवादी समाज की स्थापना हो जाय), तभी अधिकारों का प्रयोग सभी समान रूप से कर सकते हैं।

❖ 'अधिकार' (Right) का शाब्दिक अर्थ

अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थिति है जिसके अभाव में व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता। यहाँ व्यक्तित्व के विकास का अर्थ आंतरिक विकास और बाह्य विकास दोनों से है। अधिकार को अंग्रेजी में Right कहते हैं जिसका अर्थ है 'उचित'। इसका विलोम Wrong है जिसका अर्थ है 'अनुचित'।

अर्थात जो अधिकार है वह उचित है, लेकिन जो अनुचित है उसे अधिकार नहीं कहा जा सकता। अधिकार समाज की देन है, राज्य इनकी सुरक्षा करता है या उसे लागू करता है।

✦ 2. अधिकार की प्रकृति एवं 3 प्रमुख लक्षण

उपर्युक्त अवधारणा से अधिकार के बारे में निम्नलिखित तीन बातें स्वतः स्पष्ट होती हैं:

  • अधिकार उचित का दावा है।
  • अधिकार समाज की देन है।
  • राज्य अधिकारों की सुरक्षा करता है।

❖ अधिकारों की परिवर्तनशील (गत्यात्मक) प्रकृति

अधिकार समाज की देन है। चूँकि समाज गत्यात्मक (Dynamic) है, अतः समाज के बदलने के साथ अधिकारों के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। ऐसे अधिकार जो समाज और परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदल पाते, वह कभी भी समाज का भला नहीं कर सकते हैं। अतः अधिकार गतिशील एवं परिवर्तनशील है। चूँकि अधिकार समाज की देन है, इसलिए व्यक्ति अधिकारों का प्रयोग समाज के विरुद्ध नहीं कर सकता है।

✦ 3. अधिकार और कर्तव्य: एक-दूसरे के पूरक

अधिकार को कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा जाता है। आज के समय में अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं। प्रसिद्ध विचारक लास्की और मैकाइवर जैसे विचारकों ने भी अधिकार और कर्तव्य को एक-दूसरे का पूरक बताया है।

❖ प्रमुख विचारकों के कथन

महात्मा गाँधी के अनुसार:
"आप कर्तव्य कीजिए, अधिकार स्वतः मिल जायेगा।"
जे. एन. वाइल्ड (J.N. Wilde) के अनुसार:
"अधिकारों का महत्व कर्तव्यों के संसार में है।"

अर्थात, बिना कर्तव्यों के अधिकारों की कोई महत्ता नहीं है। जब एक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करता है, तो दूसरे व्यक्ति के अधिकारों की स्वतः ही रक्षा हो जाती है।

✦ 4. अधिकारों के प्रकार: नकारात्मक एवं सकारात्मक अधिकार

अधिकारों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है: नकारात्मक अधिकार और सकारात्मक अधिकार। इन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे दिया गया है:

नकारात्मक अधिकार (Negative Rights) सकारात्मक अधिकार (Positive Rights)
यह वह अधिकार होता है जिस पर राज्य की तरफ से कोई प्रतिबंध नहीं होता। यह वह अधिकार होता है जिस पर राज्य की तरफ से प्रतिबंध होता है।
सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होते हैं। यह सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर प्रदान किया जाता है (ताकि समाज में समानता आ सके)।
इसका दृष्टिकोण मुख्य रूप से व्यक्तिवादी (Individualistic) होता है। इसका दृष्टिकोण मुख्य रूप से लोक कल्याणकारी (Welfare) होता है।

✦ 5. अधिकारों के 6 प्रमुख सिद्धान्त (संक्षिप्त परिचय)

समय-समय पर अधिकारों की उत्पत्ति और उनके स्रोत के विषय में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गए हैं। इन सिद्धान्तों को उनके उद्भव काल (शताब्दी) के आधार पर मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:

अधिकारों के सिद्धान्त
16वीं से 19वीं शताब्दी तक
  • 1. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त: प्रकृति की देन (यह प्राचीनतम सिद्धान्त है)।
  • 2. कानूनी अधिकार का सिद्धान्त: अधिकार राज्य की देन है।
  • 3. ऐतिहासिक अधिकारों का सिद्धान्त: अधिकार इतिहास/परम्पराओं की देन है।
  • 4. आदर्शवादी / नैतिक अधिकारों का सिद्धान्त।
20वीं शताब्दी में उदित
  • 1. समाज कल्याण अधिकारों का सिद्धान्त: अधिकार समाज की देन है और लोक कल्याण के लिए है।
  • 2. मानव अधिकारों का सिद्धान्त: मनुष्य होने के नाते जन्म से प्राप्त अधिकार।

✦ 6. [I] प्राकृतिक / उदारवादी अधिकारों का सिद्धान्त

प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को उदारवादी या व्यक्तिवादी सिद्धान्त भी कहा जाता है। यह 17वीं शताब्दी में ज्यादा प्रचलित था। इसके जनक जॉन लॉक (John Locke) माने जाते हैं। इसके अन्य प्रमुख समर्थकों में ग्रोसियस, टॉमस पेन और थॉमस जेफरसन का नाम आता है।

मूल मान्यता:
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार प्रकृति या ईश्वर की देन है, राज्य व समाज की नहीं। चूँकि यह प्रकृति की देन है, इसलिए इसे 'जन्मजात अधिकार' भी कहा जाता है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त होता है।

❖ जॉन लॉक का विचार (Father of Natural Rights)

लॉक ने मुख्य रूप से तीन प्राकृतिक अधिकारों की बात की है:

जॉन लॉक के अनुसार:
"जीवन, स्वतंत्रता, और सम्पत्ति का अधिकार प्राकृतिक अधिकार है।"

इसे जन्मजात अधिकार भी कहा जाता है। यह अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त होता है। यह अधिकार बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को समान रूप से मिलता है (किसी को कम या ज्यादा नहीं)। अतः स्पष्ट है कि इसका स्वरूप व्यक्तिवादी है। लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया और जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकार को सम्पत्ति के अधिकार में ही निहित माना।

"लॉक के राजनीतिक दर्शन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की सम्पत्ति की सुरक्षा करना है।"

✦ 7. प्राकृतिक अधिकारों की विशेषताएँ एवं क्रांतियों पर प्रभाव

प्राकृतिक अधिकार अविभाज्य, निरंकुश, असीम, अदेय तथा अहस्तान्तरणीय हैं। इन अधिकारों को राज्य या समाज नहीं देता, बल्कि इसे ईश्वर या प्रकृति सभी को समान रूप में देती है। राज्य का कार्य केवल इन अधिकारों की सुरक्षा व क्रियान्वयन करना है।

❖ फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति पर प्रभाव

विश्व की दो महान क्रांतियां (फ्रांसीसी व अमेरिकी) इसी प्राकृतिक सिद्धान्तों पर आधारित थीं:

  • फ्रांसीसी क्रांति (1789): इसका नारा "स्वतंत्रता, समानता व बंधुता" का अधिकार था (जिसे मानवीय या प्राकृतिक अधिकार कहा गया)। इसके प्रेरणा स्रोत रूसो (Rousseau) थे।
  • अमेरिकी क्रांति (1776): इसके प्रेरणा स्रोत लॉक माने जाते हैं और क्रांति के नायक थॉमस जेफरसन थे। इसका नारा था: "जीवन, स्वतंत्रता, और सुख का अधिकार।"
थॉमस जेफरसन का कथन:
"हे ईश्वर हमें जीवन, स्वतंत्रता और सुख का अधिकार दीजिए।"

❖ निष्कर्ष एवं सिद्धान्त की आलोचना

उपर्युक्त बातों से स्वतः स्पष्ट है कि इस सिद्धान्त ने सभी व्यक्तियों के बराबर महत्व को बताकर व्यक्ति की महानता को स्थापित किया और मध्य काल में प्रचलित विशेषाधिकारों पर कड़ा प्रहार किया।

आलोचना: जहाँ इस सिद्धान्त ने व्यक्तिवाद की नींव डाली, वहीं सभी व्यक्तियों को बराबर मानते हुए राज्य को केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय तक सीमित कर दिया। इसने राज्य को लोक कल्याण का कार्य करने से मना कर दिया, जिससे अमीर व गरीब के बीच दूरियाँ बढ़ती गयीं और विषमता मूलक समाज का उदय हुआ।

(नोट: लॉक को व्यक्तिवाद, उदारवाद या पूँजीवाद का जनक माना जाता है। यह अधिकारों का सबसे प्राचीन सिद्धान्त है।)

✦ 8. [II] कानूनी अधिकारों का सिद्धान्त (Legal Theory)

यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी में प्रचलित था। यह सिद्धान्त प्राकृतिक अधिकारों का उल्टा (विरोधी) है। जहाँ प्राकृतिक सिद्धान्तों का मानना है कि अधिकार 'प्रकृति' की देन है, राज्य की नहीं; वहीं कानूनी अधिकारों का सिद्धान्त अधिकारों को 'राज्य की देन' मानता है।

इसलिए इसे 'कानूनी अधिकार' कहा जाता है। लेकिन यह कानूनी अधिकार के रूप में तभी तक मान्य होता है जब तक न्यायालय उसे मान्यता दिये रहता है। जैसे ही न्यायालय उसे अवैध घोषित कर देता है, वह कानूनी अधिकार नहीं रह जाता।

कानूनी अधिकारों के प्रमुख समर्थक
जेरेमी बेंथम
(सिद्धान्त के जनक)
थॉमस हॉब्स
(प्रमुख समर्थक)
जॉन ऑस्टिन
(वैज्ञानिक स्वरूप दिया)

कानूनी अधिकारों के सिद्धांत के जनक बेंथम हैं। हॉब्स और ऑस्टिन इसके प्रमुख समर्थक हैं। लेकिन कानूनी अधिकारों के सिद्धान्तों को पूर्ण वैज्ञानिक स्वरूप ऑस्टिन ने दिया, इसलिए यह सिद्धान्त ऑस्टिन के नाम के साथ सम्बद्ध हो गया।

❖ बेंथम की आलोचनाएँ

बेंथम प्राकृतिक अधिकारों के बड़े विरोधी थे। बेंथम प्राकृतिक अधिकारों के कानूनों को "कपोल कल्पना व कोरा बकवास" (Nonsense upon stilts) कहते हैं। बेंथम फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी क्रांति के आलोचक हैं, क्योंकि यह क्रांति प्राकृतिक सिद्धान्तों के अधिकारों पर आधारित थी।

✦ 9. [III] ऐतिहासिक / रूढ़िवादी अधिकारों का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के जनक इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अनुदारवादी (Conservative) विचारक एडमंड बर्क (Edmund Burke) हैं। बर्क इंग्लैण्ड के रहने वाले थे और वे चर्च में ज्यादा विश्वास करते थे (परम्परा, रीति-रिवाज को महत्व देते थे)।

मूल मान्यता:
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार इतिहास की देन है। चूँकि इतिहास परम्पराओं और रीति-रिवाजों पर आधारित होता है, अतः इस सिद्धान्त की मान्यता है कि "ऐसे अधिकार जो परम्पराओं और रीति-रिवाजों का हिस्सा नहीं हैं, उसे हम अधिकार की संज्ञा नहीं दे सकते।"

बर्क ने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त और कानूनी अधिकारों के सिद्धान्त की आलोचना की, क्योंकि ये अधिकार परम्परा और रीति-रिवाज का हिस्सा नहीं हैं। यह सिद्धान्त प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्तों के प्रतिक्रिया स्वरूप आया है।

❖ क्रांतियों पर बर्क का दृष्टिकोण

  • फ्रांसीसी क्रांति का विरोध: बर्क ने फ्रांसीसी क्रांति की आलोचना करते हुए कहा कि फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने जिस समानता, स्वतंत्रता, बन्धुता के अधिकारों का प्रतिपादन किया, उसका प्रयोग फ्रांस की जनता पहले से नहीं करती थी। अतः यह क्रांति सफल नहीं हो सकती।
  • इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रांति (1688) का समर्थन: बर्क ने 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति (संसदीय सम्प्रभुता के उदय) की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस क्रांति के द्वारा जिन अधिकारों का जन्म हुआ, वह अंग्रेजों के परम्परागत अधिकारों पर आधारित थी।
एडमंड बर्क का कथन:
"फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा प्रतिपादित स्वतंत्रता, समानता, बन्धुता का अधिकार अमूर्त अधिकार है।"

❖ ऐतिहासिक सिद्धान्त की आलोचना

ऐतिहासिक अधिकारों के सिद्धान्त की आगे चलकर कटु आलोचना हुई, क्योंकि सभी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को हम अधिकार का हिस्सा नहीं मान सकते या उसे बनाये नहीं रख सकते। जैसे भारत में सती प्रथा व बाल विवाह को आज हम कुरीतियों के रूप में देखते हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि परम्परा और रीति-रिवाज समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और उसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते।

✦ 10. [IV] आदर्शवादी / नैतिक / व्यक्तित्व अधिकारों का सिद्धान्त

19वीं शताब्दी में आदर्शवाद का जन्म हुआ। आदर्श - जो विचारों में है; वह व्यवहार में नहीं। आदर्श का मतलब 'प्रत्यय' भी होता है। (आदर्शवाद ⇄ प्रत्ययवाद ⇄ कल्पनावाद ⇄ रहस्यवाद)

राज्य और व्यक्ति के बीच के अध्ययन को ही राजनीति कहते हैं। आदर्शवादियों के अनुसार राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध (Organic Relationship) होता है, अर्थात् अंश व सम्पूर्ण का सम्बन्ध।

आदर्शवाद (Idealism) व्यक्तिवाद (Individualism)
फोकस: यह आंतरिक विकास पर बल देता है। फोकस: यह बाह्य विकास पर बल देता है।
स्वरूप: नैतिक विकास (Moral Development) स्वरूप: भौतिक विकास (Material Development)

व्यक्तित्व का पूर्ण अर्थ: आंतरिक विकास + बाह्य विकास।

प्रमुख विचारक:
  • जनक: इमैनुएल कांट (Kant)
  • प्रमुख समर्थक: हीगल (Hegel), बोसांके (Bosanquet), रूसो (Rousseau), टी. एच. ग्रीन (T.H. Green)
नोट: हीगल जर्मनी में पैदा हुआ था। हीगल हिटलर का प्रेरणा स्रोत रहा (आदर्शवाद, फासीवाद का प्रेरणा स्रोत है)।

❖ इस सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताएँ

आदर्शवाद राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध मानता है, अर्थात् राज्य सम्पूर्ण है और व्यक्ति उसका अंश। आदर्शवाद की मान्यता है कि जिस प्रकार अंश अपना सब कुछ अंशी के साथ प्राप्त कर सकता है, उसी प्रकार व्यक्ति अपना सब कुछ राज्य के साथ प्राप्त कर सकता है। आदर्शवादी राज्य को एक नैतिक संस्था के रूप में देखते हैं।

इस सिद्धान्त के अनुसार हम केवल उसे ही अधिकार की संज्ञा दे सकते हैं जो व्यक्ति के आंतरिक व नैतिक विकास में सहायक हो। अधिकार समाज की देन है (राज्य व समाज को एक मानता है) और राज्य इनकी सुरक्षा और क्रियान्वयन करता है।

❖ प्रमुख विचारकों के कथन

टी. एच. ग्रीन (T.H. Green) के अनुसार:
"अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं जिनके अभाव में कोई भी व्यक्ति अपना नैतिक विकास नहीं कर सकता।"
बोसांके (Bosanquet) के अनुसार:
"अधिकार वह दावा है जो समाज के द्वारा निर्मित किया जाता है और राज्य के द्वारा लागू किया जाता है।"
हीगल (Hegel) के अनुसार:
"व्यक्ति अपना सब कुछ राज्य में रहकर ही प्राप्त कर सकता है।"
(हीगल ने राज्य की तुलना ईश्वर से करते हुए उसे 'सर्वोच्च नैतिकता' बताया)

रूसो का भी मानना है कि सामान्य इच्छा अर्थात् राज्य (सामान्य इच्छा) सामान्य हित की चेतना है और व्यक्ति अपना नैतिक विकास राज्य में ही रहकर कर सकता है।

कांट ने भी व्यक्ति के नैतिक विकास को सर्वश्रेष्ठ बताया और कहा कि नैतिकता अंतरात्मा पर अंकित होती है।

✦ 11. [V] समाज कल्याण अधिकारों का सिद्धान्त

यह सिद्धान्त 20वीं शताब्दी में आया। यह सिद्धान्त मानता है कि अधिकार समाज की देन है।

व्यक्तिवादी दृष्टिकोण (पुराने सिद्धान्त) समाज कल्याण दृष्टिकोण (20वीं सदी)
  • प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त (लॉक)
  • कानूनी सिद्धान्त (बेंथम)
  • ऐतिहासिक सिद्धान्त (बर्क)
  • आदर्शवादी सिद्धान्त (कांट)
व्यक्ति का हित सर्वोपरि
यह सिद्धान्त मानता है कि अधिकार समाज की देन है।

सामाजिक हित > व्यक्ति का हित
(सामाजिक हित सर्वोपरि)

(महत्वपूर्ण बिंदु: यहाँ सामाजिक हित का मतलब है - 'गरीब का हित')

यह सिद्धान्त उपर्युक्त सभी (प्राचीन) अधिकारों के सिद्धान्तों का समन्वय करता है। यह मनुष्य को एक 'सामाजिक प्राणी' के रूप में देखता है। इसकी मान्यता है कि अधिकार हम उसी को कह सकते हैं जो समाज कल्याण पर आधारित होता है। इसके अनुसार ऐसे अधिकार जो सामाजिक हित के विरुद्ध हैं, उन्हें हम अधिकार की संज्ञा नहीं दे सकते।

इस सिद्धान्त का मानना है कि अधिकारों का स्वरूप चाहे प्राकृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक या नैतिक क्यों न हो उनको केवल एक आधार पर हम उचित ठहरा सकते हैं कि वे सामाजिक हित में हैं या नहीं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करना होना चाहिए और सभी को समाज कल्याण के समक्ष झुकना चाहिए।

इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थकों में बेंथम, जे. एस. मिल, लास्की, ग्रीन, जी. डी. एच. कोल (G.D.H. Cole), हॉब हाउस (Hobhouse), बार्कर आदि का नाम आता है।

जे. एस. मिल (J.S. Mill) के अनुसार:
"व्यक्ति के विकास और समाज के कल्याण में कोई मौलिक विरोध नहीं है बल्कि वह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"
हॉब हाउस (Hobhouse) के अनुसार:
"असली अधिकार सामाजिक कल्याण की शर्तें हैं और विभिन्न अधिकारों का औचित्य इस बात में है कि समाज के सामंजस्य पूर्ण विकास के लिए वह अपनी क्या भूमिका निभाते हैं।"

✦ 12. हेरोल्ड लास्की (H.J. Laski) के अधिकारों पर विशेष विचार

समाज कल्याण अधिकारों के सिद्धान्त की सर्वोत्तम व्याख्या लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Grammar of Politics' में की है। लास्की अधिकारों के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं।

एच. जे. लास्की का कथन:
"अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में कोई भी व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्राप्त नहीं कर सकता।"

"लोक कल्याण के विरुद्ध मेरे कोई अधिकार नहीं हो सकते हैं क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार देना है जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ और अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।"

लास्की अधिकारों के सम्बन्ध में 4 प्रमुख बातें कहते हैं:

  1. अधिकार सामाजिक जीवन की एक शर्त है।
  2. अधिकारों का सवाल केवल समाज में ही पैदा होता है।
  3. किसी व्यक्ति को सामाजिक हित के विरुद्ध अधिकार नहीं मिल सकता।
  4. अधिकार मनुष्य को इसलिए दिये जाते हैं ताकि वह सामाजिक हित में अपना योगदान कर सके, अतः अधिकारों को कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा जाता है (लास्की ने अधिकार और कर्तव्यों को एक-दूसरे का पूरक माना)।

अधिकारों को परिवर्तनशील व गतिशील बताते हुए लास्की कहते हैं: "मेरे अधिकारों की मांग इसलिए खड़ी होती है क्योंकि मैं सामाजिक हित में अपना योगदान देना चाहता हूँ।" (सामाजिक हित के विरुद्ध कोई अधिकार नहीं)

❖ राज्य और अधिकारों के बीच सम्बन्ध (लास्की का दृष्टिकोण)

लास्की राज्य और अधिकारों के बीच सम्बन्ध बताते हुए लिखते हैं कि "हम राज्य की पहचान इस बात से करते हैं कि उसने अपने नागरिकों को कितना अधिकार दे रखा है।" और व्यक्ति के पास कितना अधिकार है, उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह सामाजिक हित में अपना कितना योगदान दे रहा है।

निष्कर्ष:
लास्की का मानना है कि राज्य अधिकारों को जन्म नहीं देता, बल्कि उन्हें मान्यता देता है। इसलिए लास्की अधिकारों को राज्य से ऊपर मानते हैं। लास्की अधिकारों को अत्यधिक शक्तिशाली मानते हुए कहते हैं— "अधिकार सक्षम निरंकुशवाद से भी ज्यादा निरंकुश है।"

लास्की कुछ विशेष अधिकारों की भी बात करते हैं जो व्यक्तित्व के विकास का हिस्सा हैं, जैसे— शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, संघ बनाने का अधिकार, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आदि।

एच. जे. लास्की का कथन:
"ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो व्यक्तित्व के विकास को मान्यता नहीं देती, बालू की दीवार की तरह है।"

✦ 13. [VI] मानव अधिकारों का सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण

यह सिद्धान्त भी 20वीं शताब्दी की देन है। जहाँ प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त 'मानवीय बुद्धि या विवेक' पर आधारित होता है, वहीं मानव अधिकारों का सिद्धान्त 'मानवीय आवश्यकताओं' पर आधारित होता है। मानवीय आवश्यकताओं का प्रेरणा स्रोत वह व्यक्ति होता है जो जेल की सलाखों के पीछे बंद है, शोषित और पीड़ित है, निर्धन और अशिक्षित है, बीमार व बेरोजगार है, विकलांग और उपेक्षित है, या मलिन बस्तियों में गंदा जल पी रहा है।

ऐसे अमानवीय जीवन जी रहे व्यक्तियों को इस स्थिति से बाहर निकाला जाए और उसे मानवीय जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जाए—यही मानव अधिकारों का मुख्य लक्ष्य है।

मैकफरलेन (Macfarlane) का कथन:
"मानव अधिकार वह नैतिक अधिकार है जो प्रत्येक स्त्री व पुरुष को केवल मानव होने के नाते मिलते हैं।" (प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य होता है कि वह इन्हें ऐसे व्यक्तियों को उपलब्ध कराये।)

❖ मानव अधिकारों के दो रूप (UNO घोषणा पत्र)

10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के घोषणा पत्र में अनुच्छेद 1 से लेकर 30 तक मानव अधिकारों का व्यापक प्रावधान किया गया है। इसके दो रूप हैं:

  • 1. नकारात्मक अधिकार (अनुच्छेद 1 से 21):
    इसमें राजनीतिक अधिकार, नागरिक अधिकार और कानूनी अधिकार शामिल हैं। इस पर राज्य की तरफ से कोई प्रतिबंध नहीं होता और यह सभी को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्राप्त होता है। (दृष्टिकोण: व्यक्तिवादी)।
  • 2. सकारात्मक अधिकार (अनुच्छेद 22 से 26):
    इसके अंतर्गत सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधिकार आते हैं। यह अधिकार समाज के कमजोर वर्गों (गरीब, दीन-हीन, शोषित) को ध्यान में रखते हुए प्रदान किये जाते हैं। इसे मानव अधिकार का दूसरा चरण कहा जाता है।
प्रमुख मानवाधिकार संस्थाएँ (तथ्य):
  • अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार की रक्षा के लिए 1962 में 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' का गठन हुआ (मुख्यालय: लंदन)।
  • भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन 1993 में हुआ। उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश इसका अध्यक्ष होता है।
  • मानवाधिकार आयोग अपनी रिपोर्ट एमनेस्टी इंटरनेशनल को देता है और वह अपनी रिपोर्ट UNO को, जिसके आधार पर 'मानव विकास सूचकांक' (HDI) तैयार किया जाता है।

❖ अधिकारों का स्वरूप एवं उपयुक्त व्यवस्था

अधिकारों का स्वरूप उपयुक्त व्यवस्था
प्राकृतिक अधिकार बाजार समाज व्यवस्था
नागरिक अधिकार संविधानिक शासन व्यवस्था
राजनीतिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था
सामाजिक-आर्थिक अधिकार लोक कल्याणकारी राज्य
मानवीय अधिकार मानवीय विश्व व्यवस्था

❖ मानव अधिकारों के 5 विभिन्न सिद्धान्त/दृष्टिकोण

  1. उदारवादी सिद्धान्त (जनक: लॉक): इसमें व्यक्ति को महत्व दिया जाता है, राज्य को केवल सेवक माना जाता है।
  2. स्वेच्छातंत्रवादी या नव-उदारवादी सिद्धान्त (जनक: रॉबर्ट नोजिक): इसमें बाजारीकरण को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।
  3. मार्क्सवादी सिद्धान्त (समर्थक: मार्क्स व लेनिन): यह राज्य को पूँजीपतियों की संस्था समझता है।
  4. समुदायवादी सिद्धान्त (समर्थक: अलेस्डेयर मैकिन्टायर, माइकल सैंडेल): यह व्यक्तिगत हित को सामुदायिक हित के रूप में देखता है।
  5. नारीवादी सिद्धान्त (समर्थक: शीला रोबाथम व फायर स्टोन): यह नारियों के हितों की बात करता है और पुरुष व स्त्री में समानता खोजता है।

✦ 14. अधिकारों का मार्क्सवादी सिद्धान्त

मार्क्सवाद की मान्यता है कि उदारवादी व्यवस्था में अधिकारों का प्रयोग केवल एक ही वर्ग (अमीर/पूँजीपति) करता है, जबकि गरीब वर्ग अधिकारों से वंचित हो जाता है। क्योंकि पूँजीवादी समाज वर्गों में विभाजित है।

पूँजीवाद से साम्यवाद की ओर (मार्क्सवादी दृष्टिकोण)
वर्तमान राज्य (State) अमीर और गरीब में बँटा हुआ है। अधिकार केवल अमीरों के पास हैं।
साम्यवाद (Communism) यह वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज है। यहाँ सभी समान होंगे।

(मार्क्सवाद के अनुसार: निजी संपत्ति और राज्य का अंत होने पर ही साम्यवाद आएगा।)

मार्क्सवाद के अनुसार, केवल साम्यवादी समाज में ही सभी को समान रूप से अधिकार संभव हो सकता है। वैसे तो मार्क्सवाद अधिकारों पर कम और कर्तव्यों पर अधिक बल देता है। 1936 में जब सोवियत संघ का संविधान बना, तो 'काम के अधिकार' (Right to Work) को मौलिक अधिकार घोषित किया गया।

❖ अधिकारों का सारांश (Quick Revision)

राजनीतिक अधिकार उदारवाद
आर्थिक अधिकार मार्क्सवाद
राजनीतिक, नागरिक, कानूनी नकारात्मक अधिकार
सामाजिक, आर्थिक अधिकार सकारात्मक अधिकार

✦ 15. निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विस्तृत अध्ययन से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि 'अधिकार' (Rights) केवल व्यक्ति की स्वार्थ पूर्ति या मनमानी का साधन नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक जीवन की वे अनिवार्य परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई भी मनुष्य अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण (आंतरिक व बाह्य) विकास नहीं कर सकता।

अधिकारों की उत्पत्ति के संदर्भ में यद्यपि प्राकृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक और आदर्शवादी सिद्धान्तों ने अपने-अपने काल में महत्वपूर्ण वैचारिक आधार तैयार किया, परंतु आधुनिक युग में समाज कल्याण का सिद्धान्त (विशेषकर लास्की का विचार) और मानव अधिकारों का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रासंगिक व सार्वभौमिक रूप से मान्य हैं।

वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में अधिकारों को कर्तव्यों के अभिन्न पूरक के रूप में देखा जाता है। अधिकार असीमित या निरंकुश नहीं होते हैं; एक सभ्य समाज में उन पर लोक कल्याण एवं सामाजिक हित के नाम पर उचित व सकारात्मक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

अंततः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि एक श्रेष्ठ, आदर्श और न्यायपूर्ण राज्य वही है जो अपने नागरिकों को अधिक से अधिक अधिकार प्रदान करता है और बिना किसी भेदभाव के उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, ताकि एक समतामूलक एवं शोषणविहीन समाज की स्थापना की जा सके।

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