| राजनीतिक सिद्धांत: स्वरूप, क्षेत्र, उपागम एवं ऐतिहासिक विकास |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ, इसके परम्परागत व आधुनिक (व्यवहारवादी व उत्तर-व्यवहारवादी) उपागम, राजनीतिशास्त्र का विज्ञान एवं कला के रूप में विश्लेषण, तथा इतिहास जैसे अन्य विषयों के साथ इसके संबंध को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर विस्तार से समझाया गया है। यह UPSC, PCS, NET-JRF, TGT, PGT परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। |
- 1. राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ
- 2. राजनीतिशास्त्र का उदय एवं विकास
- 3. राजनीतिशास्त्र: विज्ञान, दर्शन या कला?
- 4. पोलक का वर्गीकरण: सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक राजनीति
- 5. अध्ययन के उपागम (Approaches) और पद्धतियाँ
- 6. राजनीतिक सिद्धांत के दो प्रमुख भाग
- 7. परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत (16वीं से 19वीं सदी)
- 8. परम्परागत राजनीतिशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र
- 9. राजनीतिशास्त्र पर विचारकों के प्रमुख कथन (भाग-1)
- 10. परम्परागत दृष्टिकोण की आलोचना एवं पतन
- 11. आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत का उदय (व्यवहारवाद)
- 12. आधुनिक (व्यवहारवादी) उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
- 13. व्यवहारवाद पर विचारकों के प्रमुख कथन
- 14. डेविड ईस्टन: उत्तर-व्यवहारवाद का जन्म (1969)
- 15. परम्परागत और आधुनिक उपागम में मुख्य अंतर
- 16. राजनीतिशास्त्र का अन्य विषयों के साथ संबंध (अंतर्विषयक उपागम)
- 17. राजनीतिशास्त्र और इतिहास का घनिष्ठ संबंध
- 18. इतिहास और राजनीति पर प्रमुख विचारकों के कथन
- 19. राजनीति विज्ञान की प्रमुख पुस्तकें और उनके लेखक
✦ 1. राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ
'राजनीति' शब्द राज्य और नीति दो शब्दों से मिलकर बना है। राज्य में नागरिक रहते हैं और राज्य इन नागरिकों के हित के लिए कानून बनाता है। अतः राजनीति का शाब्दिक अर्थ हुआ सार्वजनिक हित में किया गया कार्य।
राजनीति का केन्द्रीय विषय 'राज्य' है और राज्य समाज में बनता है, अर्थात समाज के एक निश्चित भूक्षेत्र में किसी सत्ता का निवास ही राज्य कहलाता है। चूँकि समाज का स्वरूप लगातार बदलता रहता है, अतः राज्य का स्वरूप भी बदलता रहता है और इसके साथ ही राजनीति का स्वरूप भी बदलता रहता है। स्पष्ट है कि राजनीति एक परिवर्तनशील एवं गतिशील अवधारणा है।
सार्वजनिक हित से सम्बंधित क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त करना ही राजनीतिक सिद्धांत है। इसका संबंध केवल राज्य तथा राजनीतिक संस्थाओं की व्याख्या और वर्णन से ही नहीं होता, बल्कि उसके नैतिक उद्देश्यों का समाधान करने से भी है। अतः स्पष्ट है कि राजनीतिक सिद्धांत दर्शन और विज्ञान का समन्वय है अर्थात यह दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
✦ 2. राजनीतिशास्त्र का उदय एवं विकास
यद्यपि राजनीति एक प्राचीन कला है, लेकिन सामाजिक विज्ञान के रूप में इसका विकास आधुनिक काल में हुआ। प्राचीन चीन के प्रसिद्ध विचारक कन्फ्यूशियस और भारत के कौटिल्य ने राज्य सिद्धांत की अपेक्षा 'शासन कला' और 'नीतिशास्त्र' पर अधिक बल दिया, क्योंकि प्राचीन राज्य नैतिकता पर आधारित था।
राजनीतिशास्त्र का उदय सर्वप्रथम यूनान (Greece) में हुआ। प्लेटो (Plato) को दार्शनिक राजनीति का जनक माना जाता है क्योंकि प्लेटो ने राजनीतिशास्त्र और नीतिशास्त्र में कोई अंतर नहीं किया।
अरस्तू पहले विचारक थे जिन्होंने राजनीतिशास्त्र और नीतिशास्त्र में अंतर किया तथा राजनीति का क्रमबद्ध और वैज्ञानिक अध्ययन किया। इसलिए उन्हें राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है।
'Politics' शब्द ग्रीक शब्द पॉलिस (Polis) से निकला है जिसका अर्थ 'नगर राज्य' है। अतः नगर राज्य की सम्पूर्ण गतिविधियों का अध्ययन ही राजनीति है। अरस्तू ने राजनीति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अपनी पुस्तक 'दी पॉलिटिक्स' (The Politics) में किया था।
✦ 3. राजनीतिशास्त्र: विज्ञान, दर्शन या कला?
राजनीतिशास्त्र को लेकर अलग-अलग विचारकों ने भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग किया है। अरस्तू ने इसे 'राजनीति' कहा, विलियम गॉडविन ने इसे 'राजनीति विज्ञान', पोलक ने 'राजनीति का विज्ञान' तथा बिस्मार्क ने इसे 'सम्भाव्य कला' बताया।
विज्ञान का अर्थ सैद्धांतिक पहलू से है, जबकि कला का अर्थ उसके व्यावहारिक रूप से है। सामाजिक विज्ञान मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन करता है, जो संवेदनशील है। प्राकृतिक विज्ञानों (जैसे भौतिकी) की तरह इसके सिद्धांत पूर्णतः सार्वभौमिक (Time-Space से अप्रभावित) नहीं होते।
✦ 4. पोलक का वर्गीकरण: सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक राजनीति
प्रसिद्ध विचारक सर फ्रेडरिक पोलक (Sir Frederick Pollock) ने राजनीतिक सिद्धांत को दो स्पष्ट भागों में बाँटा है:
| वर्गीकरण | अर्थ एवं अध्ययन क्षेत्र |
|---|---|
| 1. सैद्धांतिक राजनीति (Theoretical Politics) |
इसका संबंध राज्य की मूल समस्याओं से है। सरकार के किसी विशेष कार्यों या लक्ष्य तक पहुँचने वाले साधनों से इसका वास्ता नहीं होता है। |
| 2. व्यावहारिक राजनीति (Practical Politics) |
इसका संबंध सरकार की वास्तविक कार्यपद्धति से है, जिसके द्वारा सरकार अपने विभिन्न कार्यों में सफलता प्राप्त करती है। |
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत को मुख्य रूप से दो भागों में समझा जा सकता है: पहला राजनीतिक दर्शन (जो चिंतनमूलक पद्धति पर आधारित है) और दूसरा राजनीतिक विज्ञान (जो अनुभवमूलक/वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है)।
✦ 5. अध्ययन के उपागम (Approaches) और पद्धतियाँ (Methods)
राजनीति विज्ञान के अध्ययन में 'उपागम' और 'पद्धति' का महत्वपूर्ण स्थान है। उपागम का अर्थ 'दृष्टिकोण' से है, जबकि पद्धति का अर्थ वह तकनीक है जिसके माध्यम से हम किसी विषय के बारे में विश्वसनीय ज्ञान प्राप्त करते हैं।
सूत्र: उपागम = पद्धति + केन्द्रीय समस्या
परम्परागत उपागम के अंतर्गत प्रमुख पद्धतियाँ:
नोट: ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग मुख्य रूप से मैकियावेली, मार्क्स और अरस्तू ने किया था।
✦ 6. राजनीतिक सिद्धांत के दो प्रमुख भाग
ऐतिहासिक विकास क्रम के आधार पर राजनीतिक सिद्धांत को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जाता है:
- परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत (Traditional Political Theory)
- आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत (Modern Political Theory / Behavioralism)
परम्परागत उपागम के अंतर्गत संस्थाओं (Institutions) के अध्ययन पर बल दिया जाता था। परन्तु, द्वितीय विश्वयुद्ध (WWII) से पहले राजनीति सिद्धांत स्वायत्त नहीं था, यह दर्शनशास्त्र, इतिहास और कानून से जुड़ा हुआ था। 20वीं शताब्दी में (विशेषकर 1925 के बाद) संस्थाओं के अध्ययन के स्थान पर मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार (Political Behavior) का अध्ययन करना शुरू हुआ, जिसे 'व्यवहारवाद' कहा गया।
✦ 7. परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत (16वीं से 19वीं सदी)
राजनीतिक
सिद्धान्त
राजनीतिक
सिद्धान्त
अध्ययन पर बल देता था
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत का काल 16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक (और विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले तक) माना जाता है।
- चिंतनमूलक (Deductive Method): इसमें निगमन पद्धति को महत्व दिया गया। यह पद्धति अनुभव पर आधारित न होकर केवल चिंतन पर आधारित होती है (तर्क-वितर्क करके निष्कर्ष पर पहुँचना)।
- दार्शनिक दृष्टिकोण: इसका दृष्टिकोण पूर्णतः दार्शनिक था।
- संस्थागत अध्ययन: इसमें मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहार को समझने का प्रयास नहीं किया गया, बल्कि केवल संस्थाओं (राज्य, सरकार) के अध्ययन पर बल दिया गया।
- मूल्य और नैतिकता: इसमें मूल्यों, नैतिकता और आदर्शों को अधिक महत्व दिया गया तथा तथ्यों (Facts) की उपेक्षा हुई।
- व्यक्तिनिष्ठ (Subjective): यह विषयनिष्ठ (Subjective) था, वस्तुनिष्ठ (Objective) नहीं।
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत के अंतर्गत राजनीतिक सिद्धांत स्वायत्त नहीं था और वह अपनी सामग्री के लिए इतिहास, दर्शन और कानून पर आधारित था अतः परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत के अंतर्गत परम्परागत पद्धति और परम्परागत उपागम को अपनाया गया। परम्परागत पद्धति के अंतर्गत ऐतिहासिक पद्धति, दार्शनिक पद्धति, कानूनी पद्धति और संस्थात्मक पद्धति आती है। इसके अंतर्गत मानकीय पद्धति को भी रखा जाता है जबकि परम्परागत उपागम के अन्तर्गत ऐतिहासिक उपागम, दार्शनिक उपागम, कानूनी उपागम व संस्थात्मक उपागम को रखा जाता है।
✦ 8. परम्परागत राजनीतिशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत का क्षेत्र काफी सीमित था, क्योंकि यह केवल संस्थाओं का ही अध्ययन करता था। इसका अध्ययन क्षेत्र राज्य, सरकार व सम्प्रभुता के क्षेत्र तक सीमित था। विचारकों के अलग-अलग मत निम्नलिखित हैं:
| विचारक (Thinkers) | अध्ययन का क्षेत्र (Focus Area) |
|---|---|
| ब्लंटशली, गार्नर | केवल राज्य (State) के अध्ययन को राजनीतिशास्त्र का क्षेत्र मानते हैं। |
| सीले, लीकाक | केवल सरकार (Government) के अध्ययन को ही राजनीतिशास्त्र का क्षेत्र माना। |
| गैटल, गिलक्राइस्ट, मैकाइवर | राज्य और सरकार दोनों के अध्ययन को राजनीतिशास्त्र का क्षेत्र माना। |
✦ 9. राजनीतिशास्त्र पर विचारकों के प्रमुख कथन (भाग-1)
राजनीतिशास्त्र की प्रकृति और उसके क्षेत्र को लेकर विचारकों ने महत्वपूर्ण परिभाषाएं दी हैं:
- 👉 गार्नर (Garner): "राजनीतिशास्त्र का उदय और अंत राज्य के साथ होता है।" (यह आधुनिक काल में राजनीतिशास्त्र की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा मानी जाती है)।
- 👉 अरस्तू (Aristotle): इन्होंने राजनीतिशास्त्र को 'विज्ञानों का विज्ञान' (Master Science) या सर्वोच्च विज्ञान की संज्ञा दी।
- 👉 लास्की (Laski): राजनीति व राजनीति विज्ञान को एक दूसरे का पर्याय माना।
- 👉 विलोबी (Willoughby): "राजनीतिशास्त्र राज्य, सरकार व कानून की व्याख्या करता है।"
- 👉 गैटल (Gettell): "राजनीति विज्ञान के अंतर्गत राज्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य तथा राजनीतिक संगठन और राजनीति के मूल तत्वों का अध्ययन किया जाता है।"
- 👉 अर्नेस्ट बेन (Ernest Benn): "राजनीति किसी परेशानी को ढूंढ़ने, उसे खोज निकालने (चाहे उसका अस्तित्व हो या न हो), उसका गलत कारण बताने और उसका गलत हल ढूढ़ निकालने की कला है।"
- 👉 पोलक (Pollock): "राजनीतिशास्त्र उसी प्रकार एक विज्ञान है जिस प्रकार नीति विज्ञान।"
✦ 10. परम्परागत दृष्टिकोण की आलोचना एवं पतन
कुछ विचारकों ने परम्परागत राजनीतिशास्त्र की तीखी आलोचना की है क्योंकि यह वैज्ञानिक कम और दार्शनिक अधिक था:
- 👉 बेयर्ड: "राजनीति विज्ञान का होना न तो सम्भव है न वांछनीय।"
- 👉 लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce): "राजनीति विज्ञान मौसम विज्ञान (Meteorology) की तरह एक अनिश्चित विज्ञान है।"
- 👉 मेटलैण्ड (Maitland): "जब मैं 'राजनीति विज्ञान' शीर्षक के अंतर्गत अच्छे प्रश्नों के समूह को देखता हूँ तो मुझे प्रश्नों पर नहीं, बल्कि शीर्षक पर खेद होता है।"
उपर्युक्त बातों से यह स्वतः स्पष्ट होता है कि परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त आदर्शवाद के मकड़जाल में उलझी रही और वास्तविकता को कभी भी समझने का प्रयास नहीं किया इसका तथ्यों या यथार्थ से कोई लेना देना नहीं रहा अर्थात परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का दृष्टिकोण व्यक्तिवादी था क्योंकि नैतिकता या आदर्श व्यक्तिनिष्ठ होता है इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया।
❖ परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का विकास और पतन
परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त राज्य, सरकार, सम्प्रभुता और शासन के तत्वों के अध्ययन तक ही सीमित था। इस संदर्भ में सीले (Seeley) का मत अत्यंत महत्वपूर्ण है— "राजनीतिशास्त्र शासन के तत्वों का अनुसंधान उसी प्रकार से करता है जैसे अर्थशास्त्र धन का, जीव विज्ञान जीव का, बीजगणित अंकों का, तथा ज्यामिति स्थान का अध्ययन करता है।"
❖ ब्लंटशली (Bluntschli) के अनुसार: ब्लंटशली ने राजनीति विज्ञान को राज्य से सम्बंधित शास्त्र बताया जो उसकी प्रकृति, विभिन्न रूपों में उसकी अभिव्यक्ति तथा विकास का अध्ययन करता है।
राजनीति विज्ञान के पारम्परिक दृष्टिकोण में व्यक्ति के अध्ययन पर तो बल दिया गया लेकिन उसके व्यवहार को समझने का प्रयास नहीं हुआ। इसी संदर्भ में लास्की (Laski) के अनुसार— "राजनीति विज्ञान के अध्ययन का सम्बन्ध संगठित राज्यों से सम्बंधित मनुष्य के जीवन से है।"
परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत राज्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य का अध्ययन, सरकार के विभिन्न रूपों का अध्ययन, नागरिको के अधिकारों, कर्तव्यों, स्वतंत्रताओ और दायित्वो का अध्ययन शामिल है। परम्परागत राजनीति अपनी प्रकृति व स्वरूप में आदर्शात्मक रही जिसका सम्बन्ध 'राज्य क्या है' इससे नहीं रहा बल्कि 'राज्य कैसा होना चाहिए' इस बात से रहा।
मूल्यपरकता इसकी विशेषता रही, विचारमूलक होने के कारण यह कल्पनाओ से जुड़ी रही और वास्तविकता से काफी दूर रही। आत्मपरकता इसकी विशेषता रही, यह इतिहास की चारदीवारी में कैद रही जैसा कि राबर्ट सी बोन ने लिखा है — "राजनीतिशास्त्र इतिहास की चारदीवारी में फला फूला यहाँ तथ्यों का संकलन तो किया गया लेकिन उनके विश्लेषण पर ध्यान नही दिया गया अर्थात यह आदर्शों मे उलझी रही और वास्तविकता को समझने का प्रयास नही किया इसका दुष्परिणाम प्रथम विश्व युद्ध के रूप में देखने को मिला।"
उपर्युक्त बातों से यह स्वतः स्पष्ट होता है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त बेमेल पड़ गया और इससे बाहर निकलने की छटपटाहट प्रारम्भ हुई और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परम्परागत राजनीतिशास्त्र का अंत हो गया और आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त का उदय हुआ।
✦ 11. आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत का उदय (व्यवहारवाद)
इसे व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान या वैज्ञानिक राजनीति या आधुनिक उपागम या वैज्ञानिक उपागम के नामो से जाना जाता है। व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है: "मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करना।" आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अनुभवमूलक पद्धति पर आधारित है। चूँकि विज्ञान शक्ति का प्रतीक है, इसलिए इसे 'शक्तिवादी राजनीति' भी कहा जाता है।
आधुनिक उपागम पूर्ण रूप से 1950 में अस्तित्व में आया। परन्तु इसकी नींव 1908 में इंग्लैंड की दो महान कृतियों ने रख दी थी:
1. ग्राहम वालेस (Graham Wallas) की 'Human Nature in Politics'
2. आर्थर बेंटले (Arthur Bentley) की 'The Process of Government'
इन कृतियों को आधुनिक उपागम का अग्रदूत माना जाता है। ग्राहम वालेस ने मनोविज्ञान की प्रेरणा से राजनीति के अध्ययन में 'व्यक्ति के व्यवहार' को प्रमुखता दिया और आर्थर बेंटले ने समाजविज्ञान की प्रेरणा से राजनीति में 'समूहों के व्यवहार' पर ध्यान केंद्रित किया।
व्यवहारवादी आन्दोलन को आगे बढ़ाने में दो अमेरिकी संगठनो American Political Science Association और Social Science Research Council की प्रमुख भूमिका रही। व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान में संस्थाओं के अध्ययन को गौण (secondary) बना दिया गया और मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार को प्रमुखता दे दिया गया। इसने राजनीतिशास्त्र को 'मूल्य निरपेक्ष' बनाया अर्थात मूल्यों के स्थान पर 'तथ्यों' (Facts) के अध्ययन पर बल दिया।
इसकी वास्तविक शुरुआत 1925 में अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय (Chicago School) में हुई, जब चार्ल्स मेरियम (Charles Merriam) की अध्यक्षता में राजनीतिशास्त्रियों की एक बैठक हुई। चार्ल्स मेरियम ने अपने भाषण में कहा कि "प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अब परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त बेमेल पड़ गया है अतः इसके स्थान पर हमें अब आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त के अपनाने पर ध्यान देना चाहिए।"
उन्होंने कहा कि परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त में केवल संस्थाओं के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाता रहा और मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहार को समझने का प्रयास नहीं हुआ, अतः अब हमें व्यवहारवाद के अध्ययन पर बल देना चाहिए ताकि मनुष्यों के व्यवहार का पहले से अध्ययन करके किसी विषय पर एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण बनाया जाना चाहिए और उसी आधार पर भविष्यवाणी किया जाना चाहिए। चार्ल्स मेरियम को व्यवहारवाद का बौद्धिक जनक माना जाता है, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'Primary Election' है। यद्यपि व्यवहारवाद का पूर्ण रूप से जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ, ध्यान रहे कि 1925 में यह बैठक अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में हुई।
✦ 12. आधुनिक (व्यवहारवादी) उपागम की प्रमुख विशेषताएँ
आधुनिक उपागम में राजनीतिक सिद्धान्त अब किसी अन्य विषय पर आश्रित नहीं रही बल्कि अब यह पूर्णतः स्वायत्त हो गई। अब यह अपनी सामग्री स्वयं से प्राप्त करने लगी। आधुनिक उपागम के अंतर्गत निम्नलिखित बाते शामिल हैं:
- मानव व्यवहार पर बल: व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान में संस्थाओं के स्थान पर मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन पर विशेष बल दिया गया।
- तथ्यों पर बल (मूल्य निरपेक्ष): व्यवहारवाद में राजनीतिशास्त्र में मूल्यों के स्थान पर तथ्यों के पर विशेष बल दिया अर्थात राजनीतिशास्त्र को मूल्य निरपेक्ष बनाया।
- प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित: व्यवहारवाद ने राजनीतिशास्त्र को प्राकृतिक विज्ञान (Phy, Che) पर आधारित किया अर्थात भौतिकी और रसायन की तरह यहाँ भी मानव के व्यवहार के आधार पर एक प्रयोग करके सार्वभौमिक सिद्धान्त के निर्माण का प्रयास किया गया।
- अनुभवमूलक एवं प्रत्यक्षवाद: व्यवहारवाद या आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त अनुभवमूलक पद्धति पर आधारित है। यह प्रत्यक्षवाद पर अधिक बल देता है। यह प्रयोग और परीक्षण के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करता है।
- शक्तिवादी राजनीति: अमेरिका के शिकागो वि.वि. में जिस व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान का जन्म हुआ उसे शक्तिवादी राजनीति भी कहा जाता है। शक्ति का शाब्दिक अर्थ है एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क व क्रियाकलापों पर नियंत्रण करना।
✦ 13. व्यवहारवाद पर विचारकों के प्रमुख कथन
- 👉 कैटलिन (Catlin): कैटलिन ने राजनीतिशास्त्र के अध्ययन को 'शक्ति का अध्ययन' बताया।
- 👉 राबर्ट डाहल (Robert Dahl): राबर्ट डाहल का कथन है— "राबर्ट डाहल ने व्यवहारवाद को परम्परागत राजनीति में एक आन्दोलन बताया।"
- 👉 हैरोल्ड लासवेल (Harold Lasswell): "राजनीति का सरोकार शक्ति को संवारने और मिल-बाँट कर उसका प्रयोग करने से है।" (लासवेल की प्रसिद्ध पुस्तक 'Why What and How' है अर्थात शक्ति क्यों, शक्ति क्या और शक्ति कैसे)।
- 👉 डेविड ईस्टन (David Easton): व्यवहारवाद को विकसित करने का श्रेय डेविड ईस्टन को जाता है। डेविड ईस्टन ने 'व्यवस्था सिद्धान्त', 'आगत-निर्गत माडल' और 'मूल्यों के आधिकारिक आवंटन के सिद्धान्त' को जन्म दिया।
- 👉 चार्ल्स मेरियम (Charles Merriam): व्यवहारवाद के अंतर्गत 'अंतरविषयक उपागम' या 'अंतः अनुशासनात्मक उपागम' का जन्म हुआ, इसको जन्म देने का श्रेय चार्ल्स मेरियम को जाता है।
अंतरविषयक उपागम का अर्थ है कि— "जब हम किसी एक विषय का अध्ययन करते हैं तो केवल उसी विषय तक सीमित नहीं रहते बल्कि अपना ध्यान अन्य विषयों पर भी केंद्रित करते हैं और उस विषय से उपयुक्त सामग्री लेकर हम अपने विषय को अधिक मजबूत बना सकते हैं बशर्ते तुलना करते समय हम इस बात को ध्यान रखें कि मूल विषय को न छोड़ें।"
✦ 14. डेविड ईस्टन: व्यवहारवाद से उत्तर-व्यवहारवाद (1969)
डेविड ईस्टन का मानना था कि जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञान में हम प्रयोग करके किसी माडल का निर्माण कर लेते हैं और उसके आधार पर भविष्यवाणी कर लेते हैं, उसी आधार पर हम एक जैसी परिस्थिति में रहने वाले मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करके एक माडल बना सकते हैं और भविष्यवाणी भी कर सकते हैं।
लेकिन डेविड ईस्टन इसमें सफल नहीं हो पाये क्योंकि मनुष्य कोई पदार्थ नहीं है और मनुष्य के व्यवहार में 'नियमितता' को खोजा नहीं जा सकता। अतः डेविड ईस्टन मनुष्यों के व्यवहार के आधार पर एक सार्वभौमिक सिद्धान्त का निर्माण नहीं कर पाये।
1969 में अमेरिकन पोलिटिकल साइंस एसोसिएसन (APSA) की मीटिंग में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए डेविड ईस्टन ने कहा— "व्यवहारवाद मानव जीवन की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम नहीं है अतः व्यवहारवाद में संशोधन होना चाहिए और इसके स्थान पर उत्तर व्यवहारवाद का जन्म होना चाहिए।"
उत्तर-व्यवहारवाद ने व्यवहारवाद में संशोधन करके उसमें 'परंपरागत राजनीतिक सिद्धान्त' को जोड़ दिया और उसे 'क्रियानिष्ठ' (Action) और 'प्रासंगिक' (Relevance) बनाया। (क्रियानिष्ठ -> जब कोई वस्तु लागू होने की स्थिति में हो)।
जहाँ परम्परागत राजनीतिशास्त्र ने केवल मूल्यों के अध्ययन पर बल दिया, वहीँ व्यवहारवाद ने केवल तथ्यों के अध्ययन पर बल दिया, लेकिन उत्तर व्यवहारवाद ने तथ्यों एवं मूल्यों का समन्वय कर दिया। (1950 - 1969 के बीच उत्तर व्यवहारवाद के दौरान सर्वाधिक माडल बनाये गये)।
वर्तमान में व्यवहारवाद के स्थान पर उत्तर व्यवहारवाद को मान्यता प्राप्त है। आज राजनीतिशास्त्र में केवल इस बात का अध्ययन नहीं होता कि 'कोई विषय क्या है' बल्कि इस बात का भी अध्ययन किया जाता है कि 'उसे क्या होना चाहिए'। अतः आज यह माना जाता है कि राजनीतिशास्त्र दर्शन और विज्ञान का समन्वय है।
✦ 15. परम्परागत और आधुनिक उपागम में मुख्य अंतर
| मूल्य – तथ्य प्रभेद | परम्परागत उपागम (Traditional) | आधुनिक उपागम (Modern/Behavioral) |
|---|---|---|
| अध्ययन का केंद्र | राज्य, सरकार और संस्थाएँ | मनुष्य का राजनीतिक व्यवहार |
| दृष्टिकोण (Approach) | मूल्य-आधारित (Value-laden), दार्शनिक | मूल्य-निरपेक्ष (Value-free), तथ्य-आधारित |
| पद्धति (Method) | निगमन (Deductive) - सामान्य से विशेष | आगमन (Inductive), अनुभवमूलक, वैज्ञानिक |
| प्रकृति | आदर्शवादी, व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) | यथार्थवादी, वस्तुनिष्ठ (Objective) |
| उद्देश्य | 'क्या होना चाहिए' पर बल | 'क्या है' (What is) पर बल |
✦ 16. राजनीतिशास्त्र का सम्वर्गीय विषयों के साथ सम्बन्ध
यद्यपि सामाजिक विज्ञान का उदय 16वीं शताब्दी में हुआ लेकिन जिस रूप आज हम सामाजिक विज्ञान का अध्ययन करते हैं वह 20वीं शताब्दी की देन है और यहीं अंतरविषयक उपागम (अंतः अनुशासनात्मक उपागम) का जन्म हुआ है। जिसका अर्थ है किसी एक विषय का अध्ययन करते समय हम केवल उसी विषय तक सीमित न रहें बल्कि अन्य विषयों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करें और उस विषय से उपयुक्त सामग्री लेकर हम अपने विषय को और परिपक्व बना सकते हैं, लेकिन अन्य विषय से तुलना करते समय हम मूल विषय को न छोड़ें।
आज राजनीतिशास्त्र का इतिहास, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के साथ गहरा सम्बन्ध है। इन विषयो की राजनीतिशास्त्र से काफी समानता है लेकिन फिर भी दोनो को एक मानना भूल होगी।
- ★ इतिहास: अतीत की घटनाओं का वर्णन। शुरुआत में राजनीति में अतीत की घटनाओं का वर्णन किया जाता था, अरस्तू-प्लेटो की अकादमी में इतिहास का प्रोफेसर था।
- ★ हीगल, कांट ने दर्शनशास्त्र के माध्यम से राजनीति का अध्ययन किया।
- ★ सामाजिक न्याय = कानूनी न्याय + नैतिक न्याय।
- ★ मैकाइवर, स्पेंसर, कार्ल मार्क्स मुख्य रूप से समाजशास्त्री थे।
- मैकाइवर का कथन: "राज्य को परम्परा रीतिरिवाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।"
- ★ ग्राहम वालेस ने मनोविज्ञान पर बल दिया (The Human nature of the politics)।
- ★ कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र में राजनीति का वर्णन है। दण्ड नीति का वर्णन।
✦ 17. राजनीतिशास्त्र और इतिहास का घनिष्ठ संबंध
इतिहास अतीत की घटनाओं का वर्णन है। जब से सभ्य समाज आया तब से राज्य (राज) अस्तित्व में आया उसके बाद राजनीति आयी। मानव का इतिहास आद्य काल से आया अर्थात इतिहास राजनीति से पहले आया।
"इतिहास वृक्ष है और राजनीति उसमे लगा हुआ फल है"
इतिहास - व्यापक है (Collection of facts)।
राजनीति - संकीर्ण है (Analysis of facts)।
समाजशास्त्र - विस्तीर्ण है।
✦ 18. इतिहास और राजनीति पर प्रमुख विचारकों के कथन
- 👉 फ्रीमैन के अनुसार: "इतिहास अतीत की राजनीति है, राजनीति वर्तमान का इतिहास।"
- 👉 सीले के अनुसार: "राजनीति के बिना इतिहास निष्फल है, इतिहास के बिना राजनीति निर्मूल।"
- 👉 सीले के अनुसार (अन्य कथन): "इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति बर्बर और राजनीति के साथ अपना सम्बन्ध भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।"
- 👉 विलोबी के अनुसार: "विलोबी ने इतिहास को राजनीतिशास्त्र का तीसरा आयाम माना है।"
✦ 19. राजनीति विज्ञान की प्रमुख पुस्तकें और उनके लेखक
विभिन्न राजनीतिक सिद्धांतकारों द्वारा लिखी गई कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तकें निम्नलिखित हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछी जाती हैं:
| पुस्तक का नाम (Books) | लेखक (Author) |
|---|---|
| Political Science and Government | गार्नर |
| Political Man | सीमोर लिपसेट |
| End of History | फ्रांसिस फुकियामा |
| The End of Ideology | डेनियल बेल ("विचारधारा अब केवल बंद गली (खत्म) हो गई है") |
| Human Nature in Politics | ग्राहम वालेंस |
| The Process of Government | आर्थर बेंटले |
| Primary Election | चार्ल्स मेरियम |
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