| समानता (Equality): अर्थ, प्रकार और स्वतंत्रता के साथ संबंध |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस प्रीमियम लेख में 'समानता' (Equality) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके नकारात्मक व सकारात्मक रूप, और 'स्वतंत्रता एवं समानता' के बीच संबंधों (विरोधी एवं पूरक दृष्टिकोण) का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह लेख लार्ड एक्टन, डी. टॉकविल, लास्की और आर. एच. टानी जैसे प्रमुख विचारकों के कथनों सहित आगामी TGT, PGT, LT, GIC, UGC NET/JRF परीक्षाओं के लिए बेहद उपयोगी है। |
- 1. समानता: प्रस्तावना, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रमुख क्रांतियां
- 2. समानता के दो प्रमुख रूप: नकारात्मक और सकारात्मक दृष्टिकोण
- 3. नकारात्मक समानता: अर्थ, मान्यताएँ एवं स्वरूप
- 4. सकारात्मक समानता: अर्थ, उद्देश्य एवं विचारकों के मत
- 5. एच. जे. लास्की के विचार: समानता की तीन प्रमुख शर्तें
- 6. स्वतंत्रता और समानता में संबंध: नकारात्मक दृष्टिकोण (विरोधी)
- 7. स्वतंत्रता और समानता में संबंध: सकारात्मक दृष्टिकोण (पूरक)
✦ 1. समानता: प्रस्तावना, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रमुख क्रांतियां
समानता की मांग हमेशा से ही विषमता (Inequality) के विरुद्ध खड़ी रही है। जैसे-जैसे विषमता के स्वरूप में परिवर्तन होता गया, वैसे-वैसे समानता की मांग में भी परिवर्तन होता गया। समाज में असमानताओं का अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना कि मानवीय समाज।
विशेषाधिकारों पर आधारित समाज (प्राचीन व मध्य काल):
- प्लेटो: समाज 3 वर्गों में विभाजित (शासक, सैनिक, उत्पादक)
- अरस्तू: समाज 2 वर्गों में विभाजित (स्वामी और दास)
- किसान ➔ जमींदार ➔ जागीरदार ➔ राजा ➔ पोप
प्राचीन और मध्यकाल विशेषाधिकारों पर आधारित था। जहाँ प्लेटो और अरस्तू ने समाज को विभिन्न वर्गों के रूप में देखा, वहीं मध्यकाल में सामंती व्यवस्था का बोलबाला था, जहाँ हर व्यक्ति का कोई न कोई मालिक था। समानता इसी विशेषाधिकारों के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में अस्तित्व में आई।
पुनर्जागरण और प्रमुख क्रांतियां:
15वीं शताब्दी में पुनर्जागरण आन्दोलन (Renaissance) चला, जिसने यह नारा दिया कि "मानव ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है।" समानता को आधुनिक काल में इंग्लैण्ड की क्रांतियों एवं अन्य महान क्रांतियों की देन माना जाता है:
| वर्ष | क्रांति का नाम |
|---|---|
| 1649 | खूनी क्रांति (Blood Revolution) |
| 1688 | गौरवपूर्ण क्रांति (Glorious Revolution) |
| 1776 | अमेरिकी क्रांति |
| 1789 | फ्रांसीसी क्रांति |
- फ्रांसीसी क्रांति (1789): "मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं तथा अपने अधिकारों के विषय में भी स्वतंत्र और समान हैं।"
- अमेरिकी घोषणा पत्र (1776): "हम इस तथ्य को स्वतः सिद्ध स्वीकार करते हैं कि सभी मनुष्य समान हैं।"
- विनोबा भावे का कथन: "दुनिया में सभी पतित हैं, अमीर कभी झुके नहीं और गरीब कभी उठे नहीं।"
✦ 2. समानता के दो प्रमुख रूप: नकारात्मक और सकारात्मक दृष्टिकोण
समय के साथ-साथ समानता की धारणा में भी परिवर्तन आया। इसे मुख्य रूप से दो कालों में बाँटकर समझा जा सकता है:
| नकारात्मक समानता (Negative Equality) | सकारात्मक समानता (Positive Equality) |
|---|---|
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समानता के लिए आवश्यक तत्व:
- विशेषाधिकारों की समाप्ति (End of Special Privileges)
- अवसरों की उपलब्धता (Availability of Opportunities)
- न्यूनतम आवश्यकता की सर्वप्रथम पूर्ति (सर्वप्रथम शर्त)
राजनीतिक समानता का सम्बंध उदारवाद से है, जबकि आर्थिक समानता का सम्बंध मार्क्सवाद से है।
✦ 3. नकारात्मक समानता: अर्थ, मान्यताएँ एवं स्वरूप
नकारात्मक समानता 16वीं से 19वीं शताब्दी तक प्रचलित रही। नकारात्मक समानता विशेषाधिकारों का उन्मूलन करते हुए 'सबकी समान समानता' का पक्षधर है।
- इसका मानना है कि जाति, धर्म, भाषा, जन्म, सम्पत्ति, लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न हो।
- यह प्राकृतिक विषमता को बनाये रखते हुए कृत्रिम विषमता को समाप्त किया जाय अर्थात् समाज में सभी व्यक्ति समान हैं। यहाँ किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
प्रमुख समर्थक और राज्य की भूमिका:
नकारात्मक उदारवादी या व्यक्तिवादी तथा विशिष्ट वर्गीय दृष्टिकोण के समर्थक इसी प्रकार की समानता के पक्षधर हैं। राजनीतिक और कानूनी समानता नकारात्मक समानता में आती है।
अर्थात् राज्य केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय का कार्य करेगा। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में राज्य कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
✦ 4. सकारात्मक समानता: अर्थ, उद्देश्य एवं विचारकों के मत
20वीं शताब्दी में नकारात्मक समानता, सकारात्मक समानता में बदल गई। यहाँ समानता का अर्थ 'सबकी समानता' न होकर "समानों में समानता" है।
अर्थात् एक ही प्रकार की योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के साथ जाति, धर्म, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाय। सकारात्मक समानता न केवल कृत्रिम विषमता को मिटाने का प्रयास करती है, बल्कि वह प्राकृतिक विषमता को भी कम करने का आश्वासन देती है।
सकारात्मक समानता का उद्देश्य (उदाहरण):
जैसे एक व्यक्ति जो गरीब है, विकलांग है, भूखा है— उसे विभिन्न प्रकार की सुविधाएं प्रदान किया जाय। सकारात्मक उदारवादी, लोक कल्याण के समर्थक और समाजवादी विचारधारा के समर्थक सकारात्मक विचार का समर्थन करते हैं। सामाजिक-आर्थिक समानता, सकारात्मक समानता का उदाहरण है। यह लोग राज्य को एक सकारात्मक संस्था मानते हैं।
प्रमुख विचारकों के कथन:
(अर्थात् सकारात्मक समानता मनुष्य को न्यूनतम आवश्यकता उपलब्ध कराने तक राज्य के पूर्ण हस्तक्षेप की मांग करती है, इसके बाद यदि समानता स्थापित हो जाय तो योग्यता, गुण और क्षमता के आधार पर उसे सुविधा मिलनी चाहिए।)
✦ 5. एच. जे. लास्की के विचार: समानता की तीन प्रमुख शर्तें
एच. जे. लास्की सकारात्मक समानता के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने सकारात्मक समानता स्थापित करने के लिए निम्नलिखित तीन गुण (शर्तें) बताए हैं:
- विशेष सुविधाओं का अभाव हो।
- सभी के लिए समान अवसरों की उपलब्धि हो।
- न्यूनतम आवश्यकता की सर्वप्रथम पूर्ति हो।
"फ्रांसीसी क्रांतिकारी न तो पागल थे और न ही मूर्ख जो उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का नारा दिया।"
✦ 6. स्वतंत्रता और समानता में संबंध: नकारात्मक दृष्टिकोण (विरोधी)
स्वतंत्रता और समानता के संबंधों को लेकर राजनीति विज्ञान में मुख्य रूप से दो दृष्टिकोण प्रचलित हैं। पहला दृष्टिकोण इन्हें एक-दूसरे का विरोधी मानता है।
1. नकारात्मक दृष्टिकोण (विरोधी):
16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक इसी दृष्टिकोण का बोलबाला था। इस दृष्टिकोण के समर्थक स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी रूप में देखते हैं। उनके अनुसार स्वतंत्रता और समानता अलग-अलग वस्तु है, उनके बीच आपस में कोई तालमेल नहीं है। बस समानता केवल इसी को माना जा सकता है कि सबको समान स्वतंत्रता प्राप्त हो।
प्रमुख समर्थक:
नकारात्मक दृष्टिकोण के प्रमुख समर्थकों में व्यक्तिवादी या नकारात्मक उदारवादी और विशिष्ट वर्गीय सिद्धान्त के समर्थक आते हैं। इसके प्रमुख समर्थकों में लार्ड एक्टन, डी. टॉकविल, लेकी, बैजहाट, पेरेटो, मोस्का, आइज़िया बर्लिन, एफ. हेयक आदि का नाम आता है।
(हेयक ने भी स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी माना।)
✦ 7. स्वतंत्रता और समानता में संबंध: सकारात्मक दृष्टिकोण (पूरक)
दूसरा दृष्टिकोण स्वतंत्रता और समानता को विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक मानता है।
2. सकारात्मक दृष्टिकोण (परस्पर पूरक):
20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता और समानता को एक दूसरे का विरोधी न मानकर परस्पर पूरक माना जाने लगा और यह कहा जाने लगा कि एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है, दोनों एक दूसरे की जरूरत हैं।
इसके प्रमुख समर्थकों में लास्की, मैकाइवर, रूसो, आर. एच. टानी (R.H. Tawney), मैकफरसन आदि का नाम आता है। जहाँ लास्की ने स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी न मानते हुए एक दूसरे का पूरक माना है।
विभिन्न विचारकों के प्रसिद्ध कथन:
- आर. एच. टानी (R.H. Tawney): "समानता स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है।" (टानी पुनः लिखते हैं— "समानता की एक बड़ी मात्रा स्वतंत्रता के लिए विरोधी न होकर उसके लिए आवश्यक है।")
- एच. जे. लास्की (Laski): "बिना कुछ समानता के स्वतंत्रता छिछली होगी और स्वतंत्रता के बिना समानता निरर्थक होगी।"
- प्रो. पोलार्ड (Prof. Pollard): "स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही हल है और वह केवल समानता में ही निहित है।"
- टी. एच. ग्रीन (T.H. Green): "जब तक मनुष्यों की आवश्यकताओं और क्षमताओं में भिन्नता है तब तक व्यवहार की एकरूपता और प्रतिफल की एकरूपता हो ही नहीं सकती।"
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जी. डी. एच. कोल (G.D.H. Cole): "आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक कपोल कल्पना है।"
(यह कथन लास्की से भी सम्बंधित है।) - सी. ई. एम. जोड (C.E.M. Joad): "आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक भ्रम है।"
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