पाश्चात्य राजनीतिक चिंतक सुकरात का इतिहास

पाश्चात्य राजनीतिक चिंतकों का इतिहास
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत यह आर्टिकल राजनीति विज्ञान (Political Science) के अभ्यर्थियों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें राजनीति का मूल अर्थ, राज्य के प्रकार और सुकरात व सोफिस्ट जैसे महान पाश्चात्य राजनीतिक चिंतकों के विचारों का विस्तृत समावेश है। यह बेहतरीन स्टडी मटेरियल UPSC, SSC, UGC NET/JRF, TGT, PGT, LT Grade, GIC प्रवक्ता सहित अन्य सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

राजनीति और राज्य का अर्थ :-

राजनीति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— राज्य + नीति। राज्य में नागरिक रहते हैं और इन्हीं नागरिकों के हित के लिए राजा विभिन्न प्रकार की नीतियाँ बनाता है। इस प्रकार 'राजनीति' का शाब्दिक अर्थ है— सार्वजनिक हित में किया गया कार्य।

राजनीति का सम्बन्ध व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन से होता है। राजनीति का विश्लेषण राज्य और व्यक्ति के बीच सम्बन्धों के आधार पर किया जाता है। राजनीतिशास्त्र का केन्द्रीय विषय 'राज्य' है। एक राज्य के अंदर जितने भी क्रियाकलाप या गतिविधियां संपन्न होती हैं, वे सब राजनीति कहलाती हैं。

राज्य के प्रकार :-

राज्य मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

  • प्राकृतिक राज्य: यह असीमित होता है।
  • कृत्रिम राज्य: यह मानव निर्मित होता है और सीमित होता है।

राज्य समाज में बना है, अर्थात समाज के एक निश्चित भूक्षेत्र में किसी सत्ता का निवास राज्य कहलाता है। जैसे-जैसे समाज का स्वरूप बदलता गया,वैसे-वैसे राज्य का भी स्वरूप बदलता गया। फलस्वरूप राजनीति में भी परिवर्तन होता गया। राज्य सभ्य समाज की पहचान है, और सभ्य समाज के लिए सुरक्षा, शांति व्यवस्था व न्याय की आवश्यकता होती है; इसी को बनाये रखने के लिए राज्य का जन्म होता है।

राज्य का ऐतिहासिक विकास क्रम :-

राज्य एक दिन में अस्तित्व में नहीं आया, बल्कि इसके उदय का एक इतिहास है जो निम्नलिखित है:

• प्राचीन काल (प्रारम्भ से 5वीं शताब्दी तक): कबीला राज्य ➔ प्राच्य साम्राज्य (पूर्वी राज्य) ➔ यूनानी नगर राज्य ➔ रोमन साम्राज्य
• मध्यकाल (6वीं से 15वीं शताब्दी तक): सामन्ती राज्य
• आधुनिक काल (16वीं सदी से आज तक): राष्ट्र राज्य

राजनीतिक चिंतन का इतिहास :-

राजनीतिक चिंतन का उदय यूनान में हुआ, लेकिन इसका विकास यूरोप में हुआ। चिंतक चिंतन करता है, चिंतन समयबद्ध होता है, समय बदल जाता है, तो चिंतन भी बदल जाता है। सभी राजनीतिक चिंतकों ने इसी बात पर चिंतन किया कि— राज्य क्या है? राज्य की प्रकृति क्या है? अधिकार, समानता, स्वतंत्रता, न्याय आदि को लेकर राज्य और व्यक्ति के बीच क्या सम्बन्ध है?

राजनीतिक चिंतन को जन्म देने का श्रेय यूनानियों को इसलिए दिया जाता है क्योंकि उन्होंने राजनीति पर क्रमबद्ध एवं वैज्ञानिक चिंतन किया और स्वतंत्रतापूर्वक विषय का प्रतिपादन किया।

राजनीतिक चिंतन के तीन प्रमुख काल :-

  1. प्राचीन काल (प्रारम्भ से 5वीं सदी तक): राजनीतिक चिंतन का उदय यूनानी नगर राज्य में माना जाता है। प्लेटो और अरस्तू इसी नगर राज्य के महान चिंतक हैं। प्राचीनकाल का दृष्टिकोण नैतिक आदर्शवादी था। इनका लक्ष्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना था। प्राचीन काल के चिंतकों ने राज्य को 'साध्य' और व्यक्ति को 'साधन' माना है अर्थात राज्य व व्यक्ति के बीच सावयवी संबंध मानते हैं, जिसका मतलब राज्य संपूर्ण है और व्यक्ति उसका एक अंश है और अंश अपना सब कुछ संपूर्ण के साथ प्राप्त कर सकता है, कहने का मतलब व्यक्ति अपना सब कुछ राज्य के साथ प्राप्त कर सकता है।
  2. मध्य काल (6वीं से 15वीं शताब्दी तक): यह आस्था और अंधविश्वास पर आधारित था। यहाँ धर्मशास्त्र का बोलबाला था। अतः यहाँ की राजनीति धार्मिक थी। इसीलिए इसे विशेष महत्व तो नहीं मिला लेकिन ऑगस्टाइन, थॉमस एक्विनास जैसे विचारक इसी काल में पैदा हुए।
  3. आधुनिक काल (16वीं शताब्दी से): पुनर्जागरण, धर्मसुधार आंदोलन, व्यापारिक क्रांति आदि ने मध्यकाल की मौत की घंटी बजा दी और आधुनिक काल के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका आधुनिक कालीन चिंतकों ने निभाई जिसमें मैकियावेली, हॉब्स, लॉक, रूसो, बेंथम, मिल, मार्क्स जैसे चिंतक इस काल में आते हैं।

यूनानी नगर राज्य :-

यूनानी नगर राज्य छोटे-छोटे भागों में विभाजित था। इसमें एथेंस और स्पार्टा का विशेष महत्व था। एथेंस में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का बोलबाला था; सुकरात, प्लेटो, अरस्तू का सम्बन्ध एथेंस से ही है। जबकि स्पार्टा में सैनिक शासन था। एथेंस व स्पार्टा के बीच शत्रुता थी, यूनानी नगर राज्य चारों तरफ से समुद्र से घिरे हुए थे, अतः सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं थी अतः वह स्वतंत्र चिंतन करते थे। यूनानी नगर राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि था, इसीलिए यहां प्रचुर मात्रा में अन्य का उत्पादन होता था अतः वह आत्मनिर्भर थे, कोई आयात और निर्यात नहीं होता था, यूनानी बहुत विद्वान थे और वह इसीलिए अहंकारी भी थे, वह अपने से अधिक सभ्य और विद्वान किसी दूसरे को नहीं मानते थे। यूनानी चिंतकों ने राज्य को साध्य माना और प्रत्येक विषय को प्राकृतिक आधार पर उचित ठहरने का प्रयास किया।

प्लेटो के पूर्व का चिंतन (सोफिस्ट विचारधारा) :-

जहाँ प्लेटो और अरस्तू ने राज्य को सर्वाधिक महत्व दिया और व्यक्ति को राज्य में विलीन कर दिया, वहीं प्लेटो से पूर्व 'सोफिस्ट' विचारधारा का बोलबाला था। सोफिस्ट का शाब्दिक अर्थ है— विद्वान शिक्षक, सोफिस्ट धन लेकर शिक्षा देते थे। सोफिस्ट व्यक्तिवादी थे और वे लोग राज्य को एक कृत्रिम संस्था मानते थे।

सोफिस्टों के अनुसार राज्य व्यक्तियों के आपसी समझौते का परिणाम है, अतः राज्य मानव निर्मित है (कृत्रिम और सीमित है)। सोफिस्ट राज्य को साधन और व्यक्ति को साध्य मानते हैं। सोफिस्ट मानवतावाद और सार्वभौमिकतावाद में विश्वास करते हैं प्रसिद्ध सोफिस्ट विचारक प्रोटागोरस का कथन है: "मानव ही सभी वस्तुओं का मापदंड है।"

महान दार्शनिक सुकरात (Socrates) :-

इसी समय एथेंस में सुकरात का बोलबाला था, जो कि एक महान दार्शनिक थे। सुकरात का प्रसिद्ध कथन है— "स्वयं को जानो (Know Thyself)"। सुकरात को सोफिस्ट नहीं माना जाता, क्योंकि वे शिक्षा के बदले धन नहीं लेते थे। सुकरात प्लेटो के गुरु थे। सुकरात के प्रमुख विचार आज प्लेटो के प्रमुख विचार माने जाते हैं, क्योंकि प्लेटो ने जो कुछ भी कहा उसे अपने गुरु सुकरात को समर्पित कर दिया। प्लेटो सुकरात से इतने प्रभावित थे कि - उनसे अलग वह अपना अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते थे。

सुकरात के प्रमुख विचार :-

  • पूर्ण सत्य वैचारिक है: व्यावहारिक नहीं।
  • ज्ञान के प्रकार: ज्ञान दो प्रकार का होता है— 
    • 1. सापेक्ष ज्ञान (अस्थायी/अपूर्ण) - जो कि मानव जगत का ज्ञान है।
    • 2. निरपेक्ष ज्ञान (पूर्ण/स्थायी) - जो कि ब्रह्म जगत का ज्ञान है।
"मैं एक ही चीज जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता।" — सुकरात 
"दुनिया में यदि कोई सबसे अधिक जानता है तो मैं जानता हूँ अर्थात मैं अपनी कमियाँ जानता हूँ।" - सुकरात
  • सद्गुण ही ज्ञान है: ज्ञान और आचरण में एकरूपता होनी चाहिए।
  • दार्शनिक राजा: निर्लिप्त बुद्धि द्वारा शासन होना चाहिए, शासक ऐसा होना चाहिए जिसकी बुद्धि किसी से लिप्त न हो। राजा अपने और पराये में भेद न करे अर्थात वह निरपेक्ष ज्ञानी हो, प्लेटो ने अपनी पुस्तक 'रिपब्लिक' में सुकरात के संवादों के माध्यम से इसे ही 'दार्शनिक राजा' का नाम दिया है।
  • सुकरात प्रजातंत्र के विरोधी हैं, क्योंकि उस समय प्रजातंत्र की सरकार बिल्कुल भ्रष्ट थी।
  • सुकरात द्वंद्वात्मक पद्धति में विश्वास करते हैं।

सुकरात के समय एथेंस में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का बोलबाला था और यह प्रजातंत्र सरकार बिल्कुल भ्रष्ट थी, इसीलिए सुकरात ने तत्कालीन एथेंस के भ्रष्ट प्रत्यक्ष लोकतंत्र का विरोध किया क्योंकि यह प्रजातंत्रीय सरकार भाई-भतीजावाद में लिप्त थी। सुकरात घूम-घूम कर सरकार की आलोचना करते थे, जिसकी वजह से सरकार के विरुद्ध वातावरण बनता था। प्रजातंत्रीय सरकार ने उन पर युवाओं को भड़काने (देशद्रोह) का आरोप लगाया और सुकरात को बंदी बना लिया। सुकरात को सजा के रूप में उन्हें विषपान करने को कहा गया तो, सुकरात ने राजा के कानून का पालन करते हुए खुशी-खुशी विषपान कर लिया और सदैव के लिए चिर निद्रा में सो गए।

■ विस्तृत निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विवेचन का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन का इतिहास केवल राज्यों के निर्माण और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव विचारों और दर्शन के क्रमिक विकास की एक शानदार यात्रा है। प्राचीन यूनान से शुरू हुआ यह चिंतन दो बिल्कुल विपरीत विचारधाराओं का साक्षी रहा है।

जहाँ एक ओर 'सोफिस्ट' (Sophists) विचारकों ने राज्य को एक मानव-निर्मित कृत्रिम साधन माना और 'व्यक्तिवाद' (Individualism) को बढ़ावा दिया, वहीं दूसरी ओर महान दार्शनिक सुकरात (Socrates) ने इसके ठीक विपरीत एक 'नैतिक और आदर्शवादी' दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। सुकरात ने यह स्पष्ट किया कि 'सद्गुण ही ज्ञान है' और शासन करने का अधिकार केवल उसी के पास होना चाहिए जो मोह-माया से मुक्त एक 'दार्शनिक राजा' (Philosopher King) हो।

यद्यपि सुकरात को तत्कालीन एथेंस की भ्रष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सत्य बोलने के अपराध में मृत्युदंड (विषपान) दे दिया, परंतु उनके सार्वभौमिक विचारों को समाप्त नहीं किया जा सका। उनके इन्हीं उच्च आदर्शों ने उनके शिष्य प्लेटो और बाद में अरस्तू के राजनीतिक चिंतन की मजबूत आधारशिला रखी, जिस पर संपूर्ण पाश्चात्य दर्शन टिका हुआ है।

अंततः, यह स्पष्ट है कि राज्य का उद्देश्य केवल बाहरी सुरक्षा प्रदान करना नहीं है, बल्कि एक सभ्य, न्यायपूर्ण और नैतिक समाज का निर्माण करना है। सुकरात और यूनानी नगर राज्यों से शुरू हुआ यह शुरुआती चिंतन आज के आधुनिक लोकतंत्र और राजनीतिक सिद्धांतों को गहराई से समझने के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: राजनीति और राज्य का मूल अर्थ क्या है?
उत्तर: राजनीति शब्द 'राज्य' और 'नीति' से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है— 'सार्वजनिक हित में किया गया कार्य'। राजनीतिशास्त्र का मुख्य विषय 'राज्य' होता है। एक राज्य के अंदर सुरक्षा, शांति और न्याय व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो भी नीतियाँ या गतिविधियां संपन्न होती हैं, वे राजनीति कहलाती हैं।
प्रश्न 2: राज्य कितने प्रकार के होते हैं और उनका विकास क्रम क्या है?
उत्तर: राज्य मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: पहला 'प्राकृतिक राज्य' जो असीमित होता है, और दूसरा 'कृत्रिम राज्य' जो मानव निर्मित और सीमित होता है। इसके विकास का ऐतिहासिक क्रम इस प्रकार है: प्राचीन काल (कबीला राज्य ➔ प्राच्य साम्राज्य ➔ यूनानी नगर राज्य ➔ रोमन साम्राज्य), मध्यकाल (सामन्ती राज्य) और अंततः आधुनिक काल में 'राष्ट्र राज्य' का उदय हुआ।
प्रश्न 3: सोफिस्ट विचारक कौन थे और राज्य के प्रति उनका क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर: प्लेटो से पूर्व यूनान में 'सोफिस्ट' विचारधारा का बोलबाला था। सोफिस्ट विद्वान शिक्षक थे जो धन लेकर शिक्षा प्रदान करते थे। वे पूरी तरह से 'व्यक्तिवादी' थे। उनका मानना था कि राज्य ईश्वर द्वारा नहीं बल्कि मनुष्यों के आपसी समझौते (कृत्रिम रूप) से बना है। इसलिए सोफिस्ट 'राज्य को एक साधन' और 'व्यक्ति को साध्य' मानते थे।
प्रश्न 4: महान दार्शनिक सुकरात के सबसे प्रमुख विचार क्या थे?
उत्तर: सुकरात के प्रमुख विचारों में सबसे महत्वपूर्ण उनका कथन "स्वयं को जानो (Know Thyself)" है। उनका मानना था कि पूर्ण सत्य वैचारिक होता है और "सद्गुण ही ज्ञान है"। उन्होंने 'दार्शनिक राजा' की संकल्पना दी, जिसका अर्थ है कि शासक को मोह-माया से मुक्त और निरपेक्ष ज्ञानी होना चाहिए, जो अपने और पराए में कोई भेदभाव न करे।
प्रश्न 5: सुकरात को मृत्युदंड (विषपान) की सजा क्यों दी गई?
उत्तर: सुकरात अपने समय के एथेंस में चल रहे भ्रष्ट प्रत्यक्ष लोकतंत्र के कड़े आलोचक थे। वे घूम-घूम कर सरकार की कमियों को उजागर करते थे। इससे तत्कालीन सरकार घबरा गई और उन पर युवाओं को भड़काने (देशद्रोह) का झूठा आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया। अंततः उन्हें सजा के रूप में विषपान करने का आदेश दिया गया, जिसे उन्होंने राजा के कानून का सम्मान करते हुए सहर्ष स्वीकार कर लिया।
💡 सुकरात के जीवन और दर्शन को समझने के बाद यह आवश्यक है कि आप इस पर आधारित अति महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें!
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