पाश्चात्य राजनीतिक विचारक: जेरेमी बेंथम सम्पूर्ण नोट्स TGT PGT NET JRF

पाश्चात्य राजनीतिक विचारक जेरेमी बेंथम के नोट्स - TGT, PGT, LT, GIC और NET/JRF परीक्षा के लिए
पाश्चात्य राजनीतिक विचारक: जेरेमी बेंथम (1748-1832) सम्पूर्ण नोट्स
Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में महान ब्रिटिश विचारक और उपयोगितावाद के जनक जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) के राजनीतिक व विधिक विचारों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें बेंथम का जीवन परिचय, उपयोगितावाद (Utilitarianism) का सिद्धांत व उसकी विशेषताएं, सुख-दुख मापक यंत्र (Felicific Calculus), प्राकृतिक कानूनों का खण्डन और दण्ड व न्याय व्यवस्था पर उनके क्रांतिकारी विचारों का गहन विश्लेषण किया गया है। TGT, PGT, NET/JRF एवं सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए यह एक अत्यंत प्रामाणिक संकलन है।

✦ 1. जेरेमी बेंथम (1748-1832): जीवन परिचय एवं पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान में चल रहे कानूनों के जनक तथा उपयोगितावाद (Utilitarianism) के जनक जेरेमी बेंथम का जन्म 15 फरवरी 1748 को इंग्लैण्ड में एक सम्पन्न वकील परिवार में हुआ था।

  • प्रारंभिक जीवन व वकालत: 1772 में कानून की डिग्री लेने के बाद बेंथम ने भी अपने पिता के साथ वकालत प्रारम्भ कर दी।
  • तत्कालीन परिस्थितियां: उस समय इंग्लैण्ड में प्राकृतिक कानूनों का बोलबाला था। प्राकृतिक कानून का आधार 'विवेक' है और इसका सम्बध संविधान के अलिखित हिस्से से है। यह असीमित होता है और यह तर्क-वितर्क पर आधारित होता है।
  • वकालत छोड़ना: बेंथम ने अदालत में देखा कि बड़े-बड़े वकील अपने तर्कों के द्वारा अपराधियों को बचा लेते हैं और जो निर्दोष या निरपराध है उन्हें सजा हो जाती है।
  • कानून सुधारक: बेंथम का दृष्टिकोण मानवीय था, उन्हें इसे देखकर बड़ा दुख हुआ। बेंथम ने वकालत छोड़ने का निर्णय लिया। बेंथम की रुचि अब कानून के प्रयोग में नहीं बल्कि कानून के सुधार में हो गई।
बेंथम का 'कृत्रिम कानून' (Artificial Law):

बेंथम ने प्राकृतिक कानून को विज्ञान से मिलाया और 'कृत्रिम कानून' का प्रतिपादन किया। कृत्रिम कानून वह कानून है जिसका सम्बन्ध संविधान के उस हिस्से से है जिसमें बुद्धि या विवेक के बल पर निर्णय नहीं होता बल्कि 'तथ्यों' के आधार पर निर्णय होता है।

■ प्रमुख रचनाएं और प्रभाव

  • बेंथम ने 1776 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Fragment on Government' (शासन पर कुछ विचार) प्रकाशित की। इस पुस्तक में बेंथम ने प्राकृतिक कानूनों की धज्जियां उड़ा दीं।
  • उन्होंने पूछा कि प्राकृतिक कानून क्या है, इसको किसने बनाया, इसका क्या योग्यता है, यह स्पष्ट नहीं है। ब्लैकस्टोन (Blackstone) जो कि प्राकृतिक कानूनों के सबसे बड़े व्याख्याकार थे, कृत्रिम कानून का विचार आने के बाद उनकी लोकप्रियता घटने लगी।
  • बेंथम उपनिवेशवाद का विरोधी था और एक भौतिकवादी विचारक था।
  • 1776 में ही अमेरिकी क्रांति हुई और एडम स्मिथ (Adam Smith) की महान पुस्तक 'वेल्थ ऑफ नेशन' (Wealth of Nations) प्रकाशित हुई। इसी पुस्तक में स्मिथ ने 'अहस्तक्षेप' (Laissez-faire) तथा 'आर्थिक मानव' का विचार दिया। बेंथम भी एडम स्मिथ से प्रभावित होकर आर्थिक क्षेत्र में राज्य के अहस्तक्षेप सिद्धान्त का समर्थन किया।

बेंथम को एक महान समाज सुधारक भी माना जाता है। उन्हें 19वीं शताब्दी में उपयोगितावाद के जनक के रूप में देखा जाता है। लॉर्ड विलियम बेंटिक (Lord William Bentinck) जो कि भारत के गवर्नर जनरल बनकर आये थे, 'बेंथमवादी गवर्नर जनरल' माने जाते हैं।

बेंथम ने कानून पर कई पुस्तकें लिखीं और इनकी तो कई पांडुलिपियां अभी भी अधूरी पड़ी हैं, जिसके बारे में विल्सन का बेंथम के बारे में कथन: "यदि आप अपनी बुद्धि का 1/20 भाग किसी योजना में लगाते तो आप दुनिया के महान व्यक्ति होते, लेकिन आप तो एक योजना छोड़कर दूसरी योजना बनाते रहते हैं।"

डायसी (Dicey) का कथन: "बेंथम विधि का प्रथम प्रतिपादक है।"

सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) के अनुसार: "आज तक इतिहास में कोई ऐसा कानून नहीं बना जिस पर बेंथम का प्रभाव न दिखाई देता हो।"

✦ 2. उपयोगितावाद (Utilitarianism): विकास और प्रमुख विचारक

बेंथम भले ही उपयोगितावाद का जनक है, लेकिन उपयोगितावाद का विचार पहले से ही विद्यमान रहा है। प्राचीन यूनान में एपिक़्यूरियन (Epicurean) दर्शन में उपयोगितावाद का विचार विद्यमान था।

  • आधुनिक काल में डेविड ह्यूम (David Hume) ने उपयोगितावाद का सर्वप्रथम प्रतिपादन किया (अपनी पुस्तक Treatise of Human Nature में)।
  • प्रिस्टले (Priestley) ने अपनी पुस्तक 'Essay on Government' में "अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख" का विचार दिया।
  • जे. एस. मिल (J. S. Mill) ने 'उपयोगितावाद' (Utilitarianism) शब्द का प्रयोग किया और इसे गुणात्मक तथा मात्रात्मक दोनों पहलुओं को जानने का प्रयास किया।

बेंथम इन दोनों पुस्तकों (ह्यूम और प्रिस्टले) से प्रभावित था। बेंथम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'An Introduction to the Principles of Morals and Legislation' (1789) में अपने राजनीतिक विचार दिए। बेंथम की मृत्यु सन् 1832 में हुई।

डेविड ह्यूम
(प्रतिपादक)
प्रिस्टले
(अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख)
बेंथम
(जनक व व्यवस्थित रूप)

✦ 3. उपयोगितावाद की प्रमुख विशेषताएं एवं सुख-दुख मापक यंत्र

उपयोगितावाद की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. शाब्दिक अर्थ: उपयोगितावाद का शाब्दिक अर्थ है— "हमें वही कार्य करना चाहिए जो हमारे लिए उपयोगी है और वह कार्य नहीं करना चाहिए जो हमारे लिए अनुपयोगी है।" अर्थात् जो उपयोगी है वह सुख देने वाला है, और जो अनुपयोगी है वह दुख देने वाला है। इसलिए उपयोगितावाद को 'सुख-दुख देने वाला सिद्धान्त' कहा जाता है।
  2. मूल मंत्र: उपयोगितावाद का मूल मंत्र है— "अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख"।
  3. व्यापक दृष्टिकोण: उपयोगितावाद का दृष्टिकोण राजनीतिक है, इसका अर्थ है कि यह सार्वजनिक है, जो कि प्रत्येक क्षेत्र में समान रूप से लागू होता है।
  4. मात्रात्मक दृष्टिकोण: बेंथम का उपयोगितावाद मात्रात्मक (Quantitative) है (यह गुणात्मक नहीं है)। यह संख्या बल पर अधिक बल देता है।
  5. व्यक्तिवादी दृष्टिकोण: उपयोगितावादी व्यक्तिवादी हैं। यह व्यक्तिवादियों की तरह इस बात को मान्यता देते हैं कि समाज = व्यक्तियों का योग। यदि अधिकतम व्यक्ति सुखी हैं तो समाज सुखी है, और यदि अधिकतम व्यक्ति दुखी हैं तो समाज दुखी है।
सुख-दुख मापक यंत्र (Felicific Calculus):

बेंथम की तमन्ना राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में 'न्यूटन' (Newton) बनने की थी। उन्होंने सुख-दुख को मापने के लिए एक काल्पनिक यंत्र अर्थात् 'हेडोनेस्टिक कैलकुलस' (Felicific / Hedonistic Calculus) का निर्माण किया और कहा कि सुख-दुख को मापना चाहिए। यदि सुख की मात्रा अधिक हो, तभी वह कार्य करना चाहिए।

■ बेंथम का सुख-दुख पर दर्शन

बेंथम का प्रसिद्ध कथन है— "प्रकृति ने मानव जाति को सुख और दुख दो प्रभुत्वरूपी स्वामी के अधीन रखा है।" अर्थात् बेंथम का मानना है कि किसी कार्य का सत् (अच्छा) या असत् (बुरा) होना इस बात पर निर्भर करता है कि वह सुख देने वाला है या दुख देने वाला।

बेंथम कहते हैं कि हमें केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किससे कितना सुख मिल रहा है, न कि इस बात पर कि सुख का स्रोत क्या है। अतः स्पष्ट है कि बेंथम केवल बाह्य सुखों (मात्रा) पर अधिक बल देते हैं। बेंथम ने सुख के स्रोत को नकारते हुए सुख की मात्रा पर ज्यादा बल दिया।

बेंथम का प्रसिद्ध कथन: "यदि सुख की मात्रा समान है तो 'पुष्पिन' (Pushpin) का खेल (तारा, शतरंज) और 'काव्य' (Poetry) के पाठ में कोई अंतर नहीं है।"

✦ 4. उपयोगितावाद के प्रमुख सिद्धान्त (बेंथम के विचार)

बेंथम के उपयोगितावाद के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

  • (1) प्राकृतिक कानूनों का खण्डन और कृत्रिम कानूनों का मण्डन (समर्थन)।
  • (2) प्राकृतिक अधिकारों का खण्डन और कानूनी अधिकारों का मण्डन।
  • (3) राज्य की उत्पत्ति के 'सामाजिक समझौते' के सिद्धान्त का खण्डन।

■ प्राकृतिक कानूनों का खण्डन और कृत्रिम कानूनों का मण्डन

बेंथम ने प्राकृतिक कानून का इसलिए खण्डन किया क्योंकि वह 'विवेक' पर आधारित है और 'अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख' के अनुकूल नहीं है। बेंथम ने कृत्रिम कानून अर्थात् 'राज्य द्वारा निर्मित कानून' का समर्थन किया।

स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा:

बेंथम को 'स्वतंत्रता' शब्द से चिढ़ थी क्योंकि स्वतंत्रता एक 'प्राकृतिक अधिकार' है। इसलिए बेंथम ने स्वतंत्रता के स्थान पर 'सुरक्षा' (Security) को महत्व दिया और स्वतंत्रता को सुरक्षा में निहित माना।

बेंथम का कथन: "लोग सुरक्षा चाहते हैं स्वतंत्रता नहीं।"

बेंथम का मानना है कि कानून उतना ही होना चाहिए जितना लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक कानून 'सुरक्षा' की जगह 'असुरक्षा' पैदा कर देता है। बेंथम का कथन है— "कानून एक अनिवार्य दोष है।" बेंथम कहते हैं कि राज्य जब कानूनों का निर्माण करे तो इस बात को ध्यान रखे कि वह बहुमत के हित के अनुरूप हो।

बेंथम का कथन: "यदि विशाल जनमत किसी कानून का विरोध करता है तो राज्य का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उसे कानून का रूप कदापि न दे।"

✦ 5. प्राकृतिक अधिकारों व सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का खण्डन

■ प्राकृतिक अधिकारों का खण्डन और कृत्रिम/कानूनी अधिकारों का मण्डन

हम जानते हैं कि बेंथम को 'प्राकृतिक' शब्द से चिढ़ थी। उन्होंने प्राकृतिक अधिकार को 'कपोल-कल्पना' (Nonsense upon stilts) या 'अहंकारिक शैली की निरर्थक चातुरी' कहकर ठुकरा दिया। बेंथम ने फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी क्रांति की भी आलोचना की क्योंकि यह 'प्राकृतिक अधिकारों' पर आधारित थी।

बेंथम ने कृत्रिम अधिकार या राज्य द्वारा निर्मित अधिकार का समर्थन किया, इसे कानूनी अधिकार कहा गया। बेंथम को 'कानूनी अधिकारों के सिद्धान्त का जनक' माना जाता है। लेकिन कानूनी अधिकार तभी तक मान्य रहते हैं जब तक न्यायालय उसे मान्यता दिये रहता है।

■ राज्य की उत्पत्ति के 'सामाजिक समझौते' के सिद्धान्त का खण्डन

बेंथम ने राज्य की उत्पत्ति के 'सामाजिक समझौते' के सिद्धान्त का खण्डन कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य का आधार 'समझौता' नहीं बल्कि 'उपयोगिता' है। सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का इसलिए भी विरोध किया क्योंकि यह प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त पर आधारित है।

बेंथम का प्रसिद्ध कथन: "राज्य का आधार आदत है समझौता नहीं।"

✦ 6. राज्य, प्रतिनिधि लोकतंत्र एवं दण्ड व्यवस्था पर बेंथम के विचार

■ राज्य पर विचार

व्यक्तिवादियों की भाँति बेंथम भी राज्य को एक कृत्रिम संस्था (Artificial Institution) मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्तियों ने अपने सुख में वृद्धि के लिए राज्य का निर्माण किया है। राज्य का आधार 'उपयोगिता' है। बेंथम राज्य को 'साधन' (Means) और व्यक्ति को 'साध्य' (End) मानते हैं।

बेंथम का कथन: "राज्य व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति राज्य के लिए।"

बेंथम कहते हैं कि राज्य के कार्यों का एक ही मापदण्ड है और वह है— अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख। बेंथम जमींदारी उन्मूलन के पक्षधर थे। बेंथम एडम स्मिथ से प्रभावित होकर आर्थिक क्षेत्र में 'अहस्तक्षेप' (Laissez-faire) की नीति का समर्थन किया। अतः स्पष्ट है कि बेंथम राज्य को एक 'उपयोगी संस्था' के रूप में देखते हैं।

■ प्रतिनिधि लोकतंत्र पर विचार

बेंथम को 'प्रतिनिधि लोकतंत्र का जनक' (Father of Representative Democracy) माना जाता है। बेंथम ने कहा कि लोकतंत्र प्रायः हर देश में संभव है। बेंथम ने 'एक व्यक्ति और एक वोट' (One man, one vote) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

बेंथम ने केवल शिक्षितों को मताधिकार दिया जो पढ़ना-लिखना जानते थे। बेंथम ने न केवल अशिक्षितों को मताधिकार से वंचित किया बल्कि महिलाओं को भी मताधिकार से वंचित कर दिया।

बेंथम का प्रसिद्ध कथन: "प्रत्येक व्यक्ति को एक माना जाय किसी को एक से अधिक नहीं।"

बेंथम गुप्त मतदान (Secret Ballot) के पक्षधर थे। वह इंग्लैण्ड की संसद का कार्यकाल 1 वर्ष रखना चाहते थे और वह इंग्लैण्ड की लॉर्ड सभा (House of Lords) के विरोधी थे क्योंकि वह आनुवांशिकता (Heredity) पर आधारित है।

■ दण्ड पर विचार

यद्यपि बेंथम दण्ड के विरोधी हैं क्योंकि दण्ड से दुख मिलता है सुख नहीं। लेकिन उनका मानना है कि यदि समाज में कोई ऐसा अपराधी पैदा हो जाये जिससे समाज में अधिक लोगों को दुख मिलता हो तो उसे दण्ड मिलना चाहिए।

बेंथम मुख्य रूप से 'सुधारात्मक दण्ड सिद्धान्त' (Reformative Theory of Punishment) के समर्थक हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य है अपराधी के चरित्र में सुधार। वह कहते हैं कि 'अपराध की मात्रा के अनुसार ही किसी को दण्ड दिया जाना चाहिए'。

जेल सुधार और पैनाप्टिकन (Panopticon):

बेंथम ने जेल सुधार पर भी पर्याप्त कार्य किया। बेंथम ने फ़्रांस में एक 'आदर्श जेल' (Panopticon) बनाने की योजना प्रस्तुत की। (इसीलिए उसे फ्रांसीसी नागरिक की उपाधि भी दी गई थी।)

✦ 7. न्याय व्यवस्था पर बेंथम के विचार

बेंथम इंग्लैण्ड की न्याय व्यवस्था के घोर विरोधी हैं क्योंकि वह 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धान्त पर आधारित है। बेंथम ने कहा कि— "न्यायाधीशों ने न्याय व्यवस्था को अपने लाभ को ध्यान में रखकर बनाया है।"

बेंथम ने इंग्लैण्ड की न्याय व्यवस्था और न्यायाधीशों को "Judges & Company" (जज और उनकी कम्पनी) कहकर पुकारा है।

✍️ 8. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त सम्पूर्ण विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) 19वीं सदी के एक महान समाज सुधारक और उपयोगितावाद (Utilitarianism) के सबसे सशक्त प्रतिपादक थे। उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी शासन में व्याप्त प्राकृतिक कानूनों और अधिकारों के पाखण्ड को 'कपोल-कल्पना' कहकर सिरे से ख़ारिज कर दिया और राज्य निर्मित कृत्रिम (कानूनी) अधिकारों को प्रतिष्ठित किया।

बेंथम ने राज्य को एक कृत्रिम और उपयोगी संस्था माना जिसका एकमात्र उद्देश्य "अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख" सुनिश्चित करना है। उन्होंने प्रतिनिधि लोकतंत्र, गुप्त मतदान, और सुधारात्मक दण्ड व्यवस्था (जेल सुधार) का प्रबल समर्थन किया, यद्यपि महिलाओं और अशिक्षितों को मताधिकार न देकर उनके विचार अपने युग की सीमाओं में भी बंधे रहे।

अंततः, कानून के सरलीकरण, न्याय व्यवस्था में सुधार और 'सुख-दुख मापक यंत्र' (Hedonistic Calculus) के माध्यम से राजनीति विज्ञान को एक 'विज्ञान' का रूप देने का उनका प्रयास उन्हें आधुनिक विधिक और लोकतांत्रिक चिंतन का अग्रदूत बनाता है।

📝 अपनी तैयारी परखें!

अगर आपने जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) के उपयोगितावाद को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रैक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।

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📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. उपयोगितावाद (Utilitarianism) का जनक किसे माना जाता है?
उपयोगितावाद का जनक 'जेरेमी बेंथम' (Jeremy Bentham) को माना जाता है, यद्यपि आधुनिक काल में इसके सर्वप्रथम प्रतिपादक डेविड ह्यूम थे।
Q2. बेंथम के उपयोगितावाद का मूल मंत्र क्या है?
बेंथम के उपयोगितावाद का मूल मंत्र है — "अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख" (Greatest happiness of the greatest number)।
Q3. बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों को क्या कहा है?
बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों का कड़ा खण्डन करते हुए उन्हें 'कपोल-कल्पना' (Nonsense upon stilts) या 'अहंकारिक शैली की निरर्थक चातुरी' कहकर पुकारा है।
Q4. बेंथम ने इंग्लैण्ड की न्याय व्यवस्था को किस नाम से पुकारा है?
बेंथम प्राकृतिक न्याय के विरोधी थे, इसलिए उन्होंने तत्कालीन इंग्लैण्ड की न्याय व्यवस्था और न्यायाधीशों को व्यंग्य में "Judges & Company" (जज और उनकी कम्पनी) कहा है।
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