एकात्मक व संघात्मक व्यवस्था और सरकार के प्रकार - संसदीय व अध्यक्षीय प्रणाली नोट्स
| एकात्मक व संघात्मक व्यवस्था (Unitary and Federal System) - सम्पूर्ण नोट्स |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में राजनीति विज्ञान के महत्वपूर्ण विषय 'एकात्मक व संघात्मक शासन व्यवस्था' का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें सत्ता के बँटवारे के आधार पर राज्य के स्वरूप, डॉयसी, फाइनर व गार्नर जैसे विचारकों की प्रमुख परिभाषाओं, तथा इन दोनों व्यवस्थाओं के लक्षणों, गुणों और दोषों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, संघवाद की सफलता की शर्तें, के. सी. व्हीयर के अनुसार संघवाद में केन्द्रीकरण की प्रवृत्तियाँ और भारतीय संघवाद के समक्ष उभरती हुई नई चुनौतियों को प्रामाणिक हस्तलिखित नोट्स के आधार पर विस्तार से समझाया गया है। इसके साथ ही सरकार के प्रकार (संसदीय व अध्यक्षीय शासन प्रणाली) और परिसंघ (Confederation) का भी विस्तृत अध्ययन शामिल किया गया है। |
- 1. एकात्मक एवं संघात्मक व्यवस्था: अर्थ एवं सत्ता का बँटवारा
- 2. एकात्मक शासन: अर्थ, प्रमुख परिभाषाएं एवं 5 लक्षण
- 3. एकात्मक व्यवस्था के गुण, दोष एवं इसे अपनाने वाले देश
- 4. संघात्मक शासन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अर्थ एवं लक्षण
- 5. संघात्मक व्यवस्था के गुण एवं दोष
- 6. संघवाद की सफलता की शर्तें एवं केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति
- 7. भारतीय संघवाद का स्वरूप: 'राज्यों का संघ'
- 8. भारतीय संघवाद की आलोचना: प्रमुख विचारकों के मत
- 9. सरकार के प्रकार: संसदीय और अध्यक्षीय प्रणाली
- 10. परिसंघ (Confederation): अर्थ एवं संघ (Federation) से तुलना
- 11. संसदीय एवं अध्यक्षीय शासन प्रणाली में अंतर
- 12. भारत में संसदीय प्रणाली: ऐतिहासिक कारण एवं विचारकों के मत
- 13. संसदीय प्रणाली के अंग (दो प्रधान) एवं प्रमुख लक्षण
- 14. संसदीय व्यवस्था के गुण, दोष एवं सिडनी लो के विचार
- 15. अध्यक्षीय शासन प्रणाली: अर्थ, जन्म एवं संरचनात्मक स्वरूप
- 16. अध्यक्षीय शासन के 4 प्रमुख लक्षण एवं गार्नर की परिभाषा
- 17. अध्यक्षीय शासन व्यवस्था के गुण और दोष (लॉर्ड ब्राइस का कथन)
- 18. अध्यक्षीय शासन अपनाने वाले देश एवं अर्द्ध-अध्यक्षीय प्रणाली
- 19. संसद पर महत्वपूर्ण विचार (वाल्टर बेजहॉट का कथन)
- 20. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
✦ 1. एकात्मक एवं संघात्मक व्यवस्था: अर्थ एवं सत्ता का बँटवारा
सत्ता के बँटवारे के आधार पर शासन व्यवस्था में मुख्य रूप से दो प्रकार की प्रणालियों में अन्तर किया जाता है: एकात्मक व्यवस्था (Unitary System) और संघात्मक व्यवस्था (Federal System)।
यदि सम्पूर्ण सत्ता एक ही जगह (केन्द्र में) केन्द्रित कर दी जाती है, तो उसे एकात्मक व्यवस्था कहा जाता है। इसके विपरीत, यदि सत्ता का बँटवारा एक से अधिक स्तरों (केन्द्र और राज्य) के बीच कर दिया जाता है, तो उसे संघात्मक व्यवस्था कहा जाता है। यह सत्ता का बँटवारा संविधान के द्वारा किया जाता है अर्थात् एकात्मक व्यवस्था सत्ता के केन्द्रीकरण (Centralization) पर और संघात्मक व्यवस्था सत्ता के विकेन्द्रीकरण (Decentralization) पर आधारित है।
■ सत्ता के बँटवारे का संरचनात्मक स्वरूप
सरकार
सत्ता के बँटवारे के आधार पर
सरकार
जहाँ एकात्मक व्यवस्था का जन्म इंग्लैण्ड (U.K.) में हुआ, वहीं संघात्मक व्यवस्था का जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A) में हुआ। एकात्मक व्यवस्था का आदर्श घर इंग्लैण्ड माना जाता है, वहीं संघात्मक व्यवस्था का आदर्श घर U.S.A माना जाता है। एकात्मक व्यवस्था छोटे देशों के लिये उपयुक्त है, वहीं संघात्मक व्यवस्था बड़े देशों के लिये उपयुक्त होती है।
✦ 2. एकात्मक शासन: अर्थ, प्रमुख परिभाषाएं एवं 5 लक्षण
संविधान के अनुसार एक केन्द्रीय सरकार होती है जिसमें सारी शक्तियाँ उसी में निहित होती हैं और प्रान्तीय सरकारें अपनी सत्ता उसी केन्द्रीय सरकार से प्राप्त करती हैं। अर्थात्, एकात्मक व्यवस्था वह व्यवस्था होती है जिसमें संविधान के द्वारा सम्पूर्ण सत्ता एक केन्द्रीय सरकार को प्रदान कर दी जाती है। इस प्रकार प्रान्तीय स्तर का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता। वे अपने अस्तित्व के लिये पूर्णता केन्द्र सरकार पर निर्भर होती हैं।
■ प्रमुख विचारकों की परिभाषाएं
ए. वी. डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार:
"सम्पूर्ण शक्ति का एक जगह केन्द्रित होना एकात्मक व्यवस्था है।"
"केन्द्रीय सरकार द्वारा सर्वोच्च शक्ति का प्रयोग किया जाना ही एकात्मक शासन है।"
फाइनर (Finer) के अनुसार:
"एकात्मक राज्य वह है जिसमें शासन सत्ता एवं शक्ति एक केन्द्र में निहित रहती है तथा जिसकी इच्छा एवं अभिकर्त्ता सम्पूर्ण क्षेत्र में विधिवत सर्वशक्तिमान होता है।"
गार्नर (Garner) के अनुसार:
"एकात्मक शासन वह शासन प्रणाली है जिसमें संविधान द्वारा शासन की सभी शक्तियाँ शासन के एक या एक से अधिक अंगों को सौंप दिया जाता है जिससे प्रान्तीय सरकार अपने अधिकार व स्वायत्तता प्राप्त करती है।"
■ एकात्मक शासन व्यवस्था के 5 प्रमुख लक्षण / विशेषताएं
- इसमें केवल एक केन्द्रीय सरकार का अस्तित्व होता है (एक ही गुट)।
- इसमें शक्तियों का विभाजन नहीं होता।
- इसमें क्षेत्रीय या प्रान्तीय सरकारें नहीं होती हैं। (यदि होती भी हैं तो उन्हें स्वतन्त्रता/अस्तित्व प्राप्त नहीं होता)।
- प्रान्तीय सरकारों का अस्तित्व पूर्णतः केन्द्र पर निर्भर करता है।
- इसमें एकहरा संविधान और एकहरी नागरिकता होती है।
✦ 3. एकात्मक व्यवस्था के गुण, दोष एवं इसे अपनाने वाले देश
■ एकात्मक व्यवस्था के गुण
- इसका सबसे महत्वपूर्ण गुण है— राष्ट्रीय एकता में सहायक।
- संकट काल में अत्यंत उपयुक्त।
- प्रशासकीय एकरूपता बनी रहती है।
- प्रभावी एवं दृढ़ शासन व्यवस्था।
- इसमें संघर्ष का अभाव होता है।
- इसमें संविधान संशोधन में आसानी होती है (संविधान लचीला होता है)।
■ एकात्मक व्यवस्था के दोष
- सरकार के निरंकुशता का भय बना रहता है।
- नौकरशाही का शासन स्थापित हो जाता है।
- केन्द्र पर अत्यधिक कार्यभार होने से कार्य कुशलता का अभाव पाया जाता है।
- यह अधिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था नहीं है।
- इसमें जनता की सहभागिता का कम अवसर मिलता है।
- इसमें स्थानीय स्वशासन को कुचल दिया जाता है।
एकात्मक व्यवस्था किन देशों में पायी जाती है: इंग्लैण्ड, बांग्लादेश, भूटान, कम्बोडिया, क्यूबा, चीन, डेनमार्क, मिस्र, यूनान, इण्डोनेशिया, आयरलैण्ड, इजराइल, केन्या, लाओस, म्यांमार, न्यूजीलैण्ड, नीदरलैण्ड, पोलैण्ड, पुर्तगाल, रोमानिया, सिंगापुर, स्पेन, स्वीडन, ताइवान, श्रीलंका व फ्रांस आदि देशों में एकात्मक व्यवस्था पायी जाती है।
नोट: एकात्मक व्यवस्था वहीं लागू हो सकती है जहाँ समाज का आकार छोटा हो और समाज में विभिन्नताएं कम हों।
✦ 4. संघात्मक शासन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अर्थ एवं लक्षण
संघात्मक व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमें एक लिखित एवं कठोर संविधान के माध्यम से जो देश की मौलिक विधि होती है, संघ व राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण कर दिया जाता है। इन शक्तियों को लेकर संघ व राज्यों के बीच कोई विवाद न हो इसलिये एक स्वतन्त्र एवं सर्वोच्च न्यायपालिका की व्यवस्था होती है।
के. सी. व्हीयर (K.C. Wheare) संघात्मक व्यवस्था के सबसे बड़े विद्वान माने जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'Federal Government' है। संघवाद राष्ट्र की एकता पर आधारित होता है तथा यह बड़े देशों के लिये उपयुक्त होता है क्योंकि इसमें विकेन्द्रीकरण पर बल दिया जाता है।
■ प्रमुख विचारकों की परिभाषाएं
ए. वी. डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार:
"संघात्मक व्यवस्था एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता एवं क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।"
गार्नर (Garner) के अनुसार:
"संघात्मक शासन वह पद्धति है जिसमें एक सम्प्रभुता के अधीन केन्द्रीय व स्थानीय सरकारें संगठित होती हैं जो संसद के कानून के अन्तर्गत अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च होती हैं।"
हैमिल्टन (Hamilton) के अनुसार:
"संघ राज्यों का एक ऐसा समुदाय है जो एक नये राज्य का निर्माण करता है।"
■ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं शाब्दिक अर्थ
संघात्मक व्यवस्था का जन्म सर्वप्रथम U.S.A (अमेरिका) में हुआ। चूँकि 1787 में U.S.A. में संघ बना और U.S.A. ने संघीय व्यवस्था के सम्पूर्ण लक्षण तय किये अतः के.सी. व्हीयर ने U.S.A. के संघ को आदर्श संघ की संज्ञा दी।
संघ को अंग्रेजी में Federation कहते हैं जो लैटिन भाषा के शब्द 'Foedus' (फोएडस) से निकला है जिसका अर्थ 'समझौता' होता है。
संघ (आपसी मेल-जोल) के दो रूप होते हैं:
- समझौता (Federation): जैसे U.S.A.
- एकीकरण (Union): जैसे India (भारत)
■ अमेरिकी संघ का निर्माण (एक आदर्श संघ)
U.S.A में पहले 13 राज्य थे जो कि कभी स्वतन्त्र एवं सम्प्रभु थे लेकिन कुछ निहित स्वार्थों हेतु आपस में लड़ा करते थे। जब लड़ते-लड़ते थक गये तब उन्होंने आपस में मिलकर एक समझौता किया। समझौते में संघ को शक्तियाँ लिख दी गयीं, शेष शक्तियाँ (अवशिष्ट शक्तियाँ) राज्यों को दे दी गयीं।
संघ और राज्य दोनों आपसी सहमति से ही संविधान में संशोधन करके अलग हो सकते हैं। अतः स्पष्ट है कि राज्यों ने मिलकर संघ बनाया इसलिये आरम्भ में राज्य शक्तिशाली थे, बाद में संघ में धीरे-धीरे शक्तियों में वृद्धि होती जा रही है। आज U.S.A. संघ को 'अविनाशी राज्यों का अविनाशी संघ' कहा जाता है।
| संघ का निर्माण | निर्माण का वर्ष |
|---|---|
| संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A) | 1787 |
| स्विट्जरलैण्ड | 1848 |
| कनाडा | 1867 |
| आस्ट्रेलिया | 1901 |
| भारत | 1950 |
■ संघात्मक व्यवस्था के लक्षण / विशेषताएं
U.S.A. ने प्रारम्भ में संघवाद के निम्न लिखित चार मुख्य लक्षण तय किया:
- एक लिखित एवं कठोर संविधान
- संविधान की सर्वोच्चता
- दोहरी सरकार या संघ एवं राज्य के बीच शक्तियों का वितरण
- एक स्वतन्त्र एवं सर्वोच्च न्यायपालिका
उपर्युक्त चार लक्षण जहाँ पाये जाते हैं, वह सैद्धांतिक रूप से संघीय व्यवस्था वाला देश होता है। U.S.A में उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ और लक्षण पाये जाते हैं जिसे गौण लक्षण कहा जाता है:
- दोहरा संविधान
- दोहरी न्यायपालिका
- दोहरी चुनाव मशीनरी
- अवशिष्ट शक्तियों का राज्य के पास होना
- राज्यों के सहमति के बिना नये राज्य का निर्माण नहीं हो सकता
- दोहरी नागरिकता
निष्कर्ष: इसलिये U.S.A सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक रूप से एक संघीय व्यवस्था वाला देश है।
✦ 5. संघात्मक व्यवस्था के गुण एवं दोष
■ संघात्मक व्यवस्था के गुण
- राष्ट्रीय एकता एवं क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच सामंजस्य।
- लोकतन्त्र की शक्ति के लिये आवश्यक।
- कार्यकुशलता में वृद्धि।
- स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा।
- जनता की सहभागिता का व्यापक अवसर।
- बड़े राज्यों के लिये उपयुक्त।
- विश्व संघ की अवधारणा के अनुरूप।
■ संघात्मक व्यवस्था के दोष
- संकट काल के लिये उपयुक्त नहीं।
- निर्णय लेने में कठिनाई।
- अधिक खर्चीली व्यवस्था।
- कमजोर शासन।
- शासन में जटिलता।
- उत्तरदायित्व निश्चित करने में कठिनाई।
✦ 6. संघवाद की सफलता की शर्तें एवं केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति
हम जानते हैं कि संघवाद राष्ट्र की एकता पर आधारित है। इसके सफलता के लिये संघ व राज्य के बीच सहयोग होना आवश्यक है। अतः संघवाद के सफलता के लिये निम्न शर्तें होनी चाहिए:
■ संघवाद की सफलता की शर्तें
- भौगोलिक समीपता
- आर्थिक समानता
- इकाइयों (राज्यों) के बीच समानता
- एकता की इच्छा
- जाति, भाषा, धर्म व संस्कृति की समरूपता (समानता)
- सामाजिक प्रथाओं और राजनीतिक संस्थाओं में समानता
■ संघवाद में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति के कारण
यद्यपि संघवाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है, परन्तु आधुनिक समय में संघवाद में केन्द्रीकरण (संघ का अधिक शक्तिशाली होना) की प्रवृत्ति देखी जा रही है। इसके प्रमुख कारण हैं:
- प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध का संचालन संघ (केन्द्र) द्वारा किया जाना।
- संघ द्वारा राज्यों को दी जाने वाली आर्थिक अनुदान (Grants)।
- तकनीकि ज्ञान का उदय।
- लोक कल्याणकारी राज्य का उदय।
- संघ द्वारा विदेश नीति का संचालन।
- दलीय व्यवस्था का स्वरूप व राजनीति।
के. सी. व्हीयर (K.C. Wheare) का मत:
के. सी. व्हीयर ने अपनी पुस्तक 'Federal Government' में संघवाद में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति का कारण बताते हुए लिखा है— "युद्ध की राजनीति, आर्थिक राजनीति, लोक कल्याण की राजनीति तथा तकनीकि राजनीति (मैक्रो) आदि इसके मुख्य कारण हैं।"
संघवाद राष्ट्र की एकता पर आधारित है। अतः राष्ट्र की एकता में जो बाधक तत्व हैं, वही संघवाद में उभरती नयी प्रवृत्तियाँ हैं। इसमें जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकतावाद, आर्थिक विषमता, क्षेत्रीय दलों के उदय आदि शामिल हैं।
संघात्मक व्यवस्था मुख्य रूप से अमेरिका (USA), स्विट्जरलैंड, कनाडा, भारत, रूस, जर्मनी, अर्जेन्टीना, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, ब्राजील, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में पायी जाती है।
✦ 7. भारतीय संघवाद का स्वरूप: 'राज्यों का संघ'
स्वतन्त्रता के पूर्व भारत ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों और देशी रियासतों में विभक्त था। स्वतन्त्रता के बाद इसका एकीकरण हुआ और एक भारतीय संघ का निर्माण हुआ।
चूँकि भारत बहुत विशाल था, इसलिए इसे अनेक घटकों में बाँट दिया गया और उसे साधारण बोलचाल की भाषा में 'राज्य' कह दिया गया। अतः स्पष्ट है कि भारत में राज्यों का निर्माण संघ ने किया है। इसलिये भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया। चूँकि संघ ने राज्यों का निर्माण किया इसलिये प्रारम्भ से ही संघ शक्तिशाली रहा।
भारत को विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ कहा गया है।
■ भारत का अर्द्ध-संघात्मक स्वरूप (Semi-Federal)
भारतीय संघवाद में संघवाद के मुख्य चारों लक्षण अपनाये गये हैं, इसलिये सैद्धान्तिक रूप से भारत एक संघ व्यवस्था वाला देश है। लेकिन इसके अतिरिक्त भारतीय संघ में कुछ ऐसे लक्षण हैं जो U.S.A के संघीय व्यवस्था में नहीं पाये जाते हैं, जैसे—
- एकहरा संविधान
- इकहरी न्यायपालिका
- एकहरी नागरिकता
- एकहरी चुनाव मशीनरी
- अवशिष्ट शक्ति का केन्द्र के पास होना
- राज्यों के सहमति के बिना नये राज्यों का निर्माण करना
इसलिये वर्तमान भारतीय संघ के कारण आलोचना हुई। कुछ लोग भारत को संघ की अपेक्षा एकात्मक कहते हैं।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) का मत:
आलोचनाओं को नकारते हुए उन्होंने कहा— "हर देश की व्यवस्था उसकी परिस्थितियों के अनुसार तय होती है। भारत की स्थिति U.S.A जैसी तो नहीं है। भारत ने संघवाद के मुख्य चारों लक्षण अपनाये हैं इसलिये सैद्धान्तिक रूप से संघात्मक है लेकिन व्यावहारिक रूप से संघात्मक नहीं, जैसा कि U.S.A। बल्कि केन्द्र की ओर झुका वाला संघीय व्यवस्था वाला देश है। सामान्य काल में भारत संघीय व्यवस्था की तरह कार्य करेगा, आपात काल में भारत एकात्मक हो जाता है क्योंकि राष्ट्र की एकता व अखण्डता को बनाये रखना सर्वोपरि है।"
✦ 8. भारतीय संघवाद की आलोचना: प्रमुख विचारकों के मत
विभिन्न विदेशी व भारतीय राजनीतिक विचारकों ने भारतीय संघवाद के स्वरूप का अध्ययन कर उसे अलग-अलग नाम दिए हैं। अक्सर परीक्षाओं में इनसे प्रश्न पूछे जाते हैं।
| विचारक (Thinker) | भारतीय संघ के लिए प्रयुक्त शब्द/टिप्पणी |
|---|---|
| के. सी. व्हीयर (K.C. Wheare) | "अर्द्ध-संघ" (Quasi-Federal) (इन्होंने ही कहा था कि भारतीय संघवाद में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है।) |
| आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings) | केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघ |
| ग्रैनविल ऑस्टिन (Granville Austin) | सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) |
| मॉरिस जोन्स (Morris Jones) | सौदेबाजी का संघ (Bargaining Federalism) |
| एलेक्जेंड्रोविच (Alexandrowicz) | परम् या पूर्ण संघ |
✦ 9. सरकार के प्रकार: संसदीय और अध्यक्षीय प्रणाली
कार्यपालिका व विधायिका के सम्बन्धों के आधार पर लोकतन्त्र या शासन को मुख्य रूप से दो भागों में अन्तर किया जाता है:
| संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) | अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System) |
|---|---|
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महत्वपूर्ण तथ्य: जहाँ संसदीय व्यवस्था शक्तियों के विलयन (कार्यपालिका के सदस्य विधायिका के भी सदस्य होते हैं) पर आधारित है, वहीं अध्यक्षीय व्यवस्था मोन्टेस्क्यू के शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका पूरी तरह से अलग) पर आधारित है。
✦ 10. परिसंघ (Confederation): अर्थ एवं संघ (Federation) से तुलना
परिसंघ का निर्माण 1976 में सोवियत संघ (USSR) और 1963 में यूगोस्लाविया में हुआ। परिसंघ में विभिन्न राज्य आपस समझौता कर परिसंघ को जन्म देते हैं, जिसमें वे अपनी कुछ शक्तियाँ परिसंघ को सौंप देते हैं लेकिन अधिकतम शक्तियाँ अपने पास ही सुरक्षित रखते हैं।
यहाँ तक कि राज्य अपनी स्वतन्त्र सेना, विदेश नीति और सम्प्रभुता भी अपने पास रख सकते हैं और संविधान में यह भी स्पष्ट किया जाता है कि राज्य जब चाहें स्वेच्छा से परिसंघ से अलग हो सकते हैं। इसी कारण 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और 2002 में यूगोस्लाविया का भी विघटन हो गया।
■ संघ (Federation) और परिसंघ (Confederation) में अंतर
- यह परिसंघ की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है।
- इसमें राज्यों को स्वेच्छा से अलग होने का अधिकार नहीं होता है।
- केन्द्र (संघ) के पास अधिक शक्तियाँ होती हैं।
- यह संघ की अपेक्षा काफी कमजोर होता है।
- इसमें राज्य आसानी के साथ परिसंघ से अलग हो सकते हैं।
- राज्यों के पास अधिक शक्तियाँ एवं सम्प्रभुता होती है।
✦ 11. संसदीय एवं अध्यक्षीय शासन प्रणाली में अंतर
कार्यपालिका व विधायिका के सम्बन्धों के आधार पर सरकार (शासन प्रणाली) को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है:
| संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) | अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System) |
|---|---|
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✦ 12. भारत में संसदीय प्रणाली: ऐतिहासिक कारण एवं विचारकों के मत
भारत ने संसदीय प्रणाली U.K. (ब्रिटेन) से ग्रहण की है। भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाये जाने के मुख्य रूप से दो कारण हैं:
- इसमें उत्तरदायित्व की भावना पायी जाती है, जिससे सरकार निरंकुश नहीं हो पाती।
- स्वतन्त्रता से पूर्व लगभग 50 वर्षों से इसका प्रयोग भारत में हो रहा था, जिससे भारतीयों को इसका व्यापक अनुभव था।
संसदीय शासन प्रणाली वह है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिपरिषद्) व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से विधायिका के निम्न सदन (लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होती है। चूँकि वास्तविक सत्ता मन्त्रिपरिषद् में निहित होती है, इसलिये इसे मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली भी कहा जाता है। मंत्रिमण्डल का मुखिया P.M. होता है, इसलिये इसे प्रधानमंत्री शासन प्रणाली या वेस्टमिंस्टर शासन प्रणाली (Westminster Model) भी कहा जाता है।
■ संसदीय प्रणाली और प्रधानमंत्री पर विचारकों के प्रमुख कथन
- विलियम हारकोर्ट (William Harcourt): "प्रधानमंत्री तारों में चन्द्रमा के समान है।"
- आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings): "इसे ग्रहों में सूर्य के समान बताया है।"
- लॉर्ड मार्ले (Lord Morley): "प्रधानमंत्री समकक्षों में प्रथम (Primus inter pares) है।"
- रामजे म्योर (Ramsay Muir): "प्रधानमंत्री 'राज्य के जहाज का स्टेयरिंग व्हील' (Steering wheel of the ship of state) है।"
- क्रॉसमैन (Crossman): "PM को मंत्रिमण्डल रूपी मेहराब का केन्द्र बिन्दु (Keystone) बताया।"
- गार्नर (Garner): "संसदीय शासन प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) विधायिका के लोकप्रिय सदन (प्रथम सदन) के प्रति अपने कार्यों तथा अपनी राजनीतिक नीतियों के लिये उत्तरदायी होती है।"
- बेजहॉट (Bagehot): "मन्त्रिमण्डल वह कड़ी है जो जोड़ती है और एक बकलस (Buckle) है जो विधायिका व कार्यपालिका के बीच गठबन्धन करती है।"
- लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce): "संसदीय शासन प्रणाली दलीय भावना को सबल बनाती है और उसे कठोरता प्रदान करती है।"
- ए. वी. डायसी (A.V. Dicey): "संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत मंत्रिमण्डल को जनमत के प्रति अधिक सचेत रहना पड़ता है क्योंकि उसी पर उसका अस्तित्व टिका रहता है।"
- बर्गेस (Burgess): "संसद एक ऐसा रंगमंच है जहाँ राजनीति का नाटक खेला जाता है, यह राष्ट्रीय विचारों का रंगमंच है जहाँ भावी राजनेताओं का परीक्षण होता है।"
✦ 13. संसदीय प्रणाली के अंग (दो प्रधान) एवं प्रमुख लक्षण
संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका (मन्त्रिपरिषद्) अपने सभी कार्यों के लिये सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से विधायिका के निम्न सदन के प्रति उत्तरदायी होती है। निम्न सदन कभी भी अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पारित करके सरकार को उसके पद से हटा सकता है।
इस प्रणाली में मुख्य रूप से दो प्रधान होते हैं:
- (1) राष्ट्र का औपचारिक/नाममात्र/वैधानिक प्रधान: इसे U.K. में 'सम्राट' और भारत में 'राष्ट्रपति' कहा जाता है। सैद्धान्तिक रूप से सम्पूर्ण शक्ति इसी में निहित होती है लेकिन व्यावहारिक रूप से वह किसी शक्ति का प्रयोग नहीं करता क्योंकि संविधान उसे स्वविवेक का अधिकार नहीं देता है। क्योंकि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह (अनुच्छेद 74) पर काम करने के लिए बाध्य हैं। हालांकि, कुछ बहुत ही विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति के पास परिस्थितिजन्य स्वविवेक (Situational Discretion) होता है। उदाहरण के लिए, जब चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब राष्ट्रपति अपने विवेक से तय करते हैं कि किसे प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित किया जाए।
- (2) सरकार का वास्तविक प्रधान: वास्तविक प्रधान P.M. (प्रधानमंत्री) होता है, जो मन्त्रिपरिषद् के माध्यम से देश का शासन करता है। वास्तविक सत्ता मन्त्रिपरिषद् में निहित होती है। व्यावहारिक रूप में सारा कार्य यही करता है, लेकिन वह सभी कार्य 'राष्ट्र के संवैधानिक प्रधान' के नाम से करता है।
इस प्रणाली में राष्ट्र का संवैधानिक प्रधान, सरकार के वास्तविक प्रधान की नियुक्ति करता है और वास्तविक प्रधान के परामर्श पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। मंत्रिमण्डल राष्ट्र प्रधान के 'प्रसाद पर्यन्त' (During Pleasure) अपने पद पर बने रहते हैं। इस प्रणाली में कार्यपालिका का कार्यकाल अनिश्चित होता है। सरकार अपने पद पर तभी तक बनी रहती है जब तक उसे सदन में बहुमत प्राप्त होता है। इससे सरकार कभी निरंकुश नहीं हो सकती है।
■ संसदीय शासन प्रणाली के प्रमुख लक्षण
- कार्यपालिका अपने सभी कार्यों के लिये विधायिका के प्रति उत्तरदायी है।
- इसमें कार्यपालिका व विधायिका के बीच विलयन का सिद्धांत कार्य करता है अर्थात् कार्यपालिका के सभी सदस्य, विधायिका के किसी न किसी सदन के सदस्य होते हैं।
- इसमें कार्यपालिका दो भागों में बँटी होती है (नाममात्र और वास्तविक)।
- ध्यान रहे कि संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका दोहरी या बहुल हो सकती है।
- इसमें वास्तविक सत्ता मन्त्रिपरिषद में निहित होती है।
- इसमें कार्यपालिका (सरकार) का कार्यकाल अनिश्चित होता है।
✦ 14. संसदीय व्यवस्था के गुण, दोष एवं सिडनी लो के विचार
■ संसदीय प्रणाली के गुण
- इसमें कार्यपालिका व विधायिका के बीच सद्भाव एवं सहयोग पाया जाता है।
- इसमें उत्तरदायित्व की भावना (Accountability) पायी जाती है। सरकार कभी निरंकुश नहीं हो सकती।
- इसमें विपक्ष (Opposition) का सर्वाधिक महत्व होता है।
- यह एक अधिक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था है।
- इस प्रणाली में गोपनीयता व एकरूपता पायी जाती है।
■ संसदीय प्रणाली के दोष
- इसका सबसे बड़ा दोष शासन में अस्थायित्व (Instability) है, क्योंकि इसमें सरकार कभी भी गिर सकती है।
सिडनी लो (Sidney Low) ने संसदीय शासन प्रणाली के निम्नलिखित लाभ बताए हैं:
- लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों की रक्षा।
- जनप्रतिनिधियों के ऊपर प्रशासन संचालन का दायित्व।
- मन्त्रिमण्डल का विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व।
- जनता में सम्प्रभुता का निवास।
- कार्यपालिका व विधायिका के बीच गहरा सहयोग।
✦ 15. अध्यक्षीय शासन प्रणाली: अर्थ, जन्म एवं संरचनात्मक स्वरूप
अध्यक्षीय शासन प्रणाली (Presidential System) का जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में हुआ और अमेरिका ही इस शासन प्रणाली का आदर्श घर है। यह वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका अपने कार्यों के लिये विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है और विधायिका का कोई भी सदस्य कार्यपालिका का सदस्य नहीं होता।
■ अध्यक्षीय प्रणाली का संरचनात्मक स्वरूप (डायग्राम)
तथा
नियन्त्रण व सन्तुलन
इस प्रणाली में कार्यपालिका व विधायिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers) पाया जाता है तथा इसके साथ-साथ यह नियन्त्रण तथा सन्तुलन (Checks and Balances) के सिद्धान्त पर आधारित है।
नियन्त्रण व सन्तुलन का अर्थ: राष्ट्रपति अपने मन्त्रियों का अनुमोदन सीनेट (सदन) से करवा लेता है और विधायिका यदि कोई कानून बनाती है तो उस पर राष्ट्रपति की अनुमति ले लेती है। राष्ट्रपति विशेषाधिकार स्वरूप इस पर रोक लगा सकता है, जिसे 'वीटो' (Veto) कहते हैं; लेकिन उसके बाद अनुमति देना आवश्यक है (राष्ट्रपति पॉकेट वीटो / Pocket Veto का प्रयोग भी कर सकता है)।
✦ 16. अध्यक्षीय शासन के 4 प्रमुख लक्षण एवं गार्नर की परिभाषा
गार्नर (Garner) के अनुसार:
"अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका अपनी अवधि के सम्बन्ध में व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होती है तथा अपनी राजनीतिक नीतियों के लिये उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होती है।"
■ अध्यक्षीय प्रणाली के 4 प्रमुख लक्षण:
- एकल कार्यपालिका (Single Executive): इस प्रणाली में कार्यपालिका राष्ट्रपति होता है, अर्थात् राष्ट्र का संवैधानिक प्रधान तथा वास्तविक प्रधान एक ही होता है (राष्ट्रपति)। वह जनता द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चुना जाता है।
- कार्यपालिका व विधायिका के बीच शक्ति पृथक्करण: राष्ट्रपति अपने मन्त्रियों को अपनी मर्जी से बनाता है। मन्त्रिगण राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं। कार्यपालिका पर विधायिका का कोई अंकुश नहीं होता है।
- नियन्त्रण तथा सन्तुलन का सिद्धान्त: शक्तियों के बँटवारे के बावजूद सरकार के अंगों के बीच एक-दूसरे पर नियंत्रण और संतुलन कार्य करता है।
- सरकार का कार्यकाल निश्चित होता है: समय पूर्व महाभियोग (Impeachment) के द्वारा ही राष्ट्रपति को हटाया जा सकता है, जो कि एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है।
✦ 17. अध्यक्षीय शासन व्यवस्था के गुण और दोष
■ अध्यक्षीय व्यवस्था के गुण (Merits)
- शासन में स्थायित्व (Stability) रहता है क्योंकि कार्यकाल निश्चित होता है।
- शासन में कुशलता पायी जाती है।
- राजनीतिक दलबंदी के दुर्गुणों का अभाव रहता है।
- यह प्रणाली संकट काल के लिये अत्यन्त उपयुक्त है।
- बहुदलीय पद्धति वाले देशों के लिये यह व्यवस्था अधिक उपयुक्त है।
- यह राष्ट्रीय एकता का समर्थक है।
■ अध्यक्षीय व्यवस्था के दोष (Demerits)
- इसमें उत्तरदायित्व की भावना नहीं पायी जाती है।
- इसमें विधायिका व कार्यपालिका के बीच सहयोग का अभाव (संघर्ष की सम्भावना) होता है।
- शासन प्रणाली में कठोरता होती है (लोचशीलता का अभाव)।
- इसमें जनता की सहभागिता का कम अवसर मिलता है।
- इसमें शासक के निरंकुश होने का भय बना रहता है।
- इसमें राजनीतिक दलों की भूमिका नगण्य होती है।
लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) का प्रसिद्ध कथन:
राजनीतिक दलों की नगण्य भूमिका को देखते हुए लॉर्ड ब्राइस ने U.S.A. के राजनीतिक दलों को "दो खाली बोतलों के समान" कहा है।
✦ 18. अध्यक्षीय शासन अपनाने वाले देश एवं अर्द्ध-अध्यक्षीय प्रणाली
अध्यक्षीय शासन प्रणाली मुख्य रूप से U.S.A. (अमेरिका), ब्राजील, इण्डोनेशिया, अर्जेन्टीना, नाइजीरिया, फिलीपींस, पेरू, मैक्सिको, कोस्टारिका आदि देशों में पायी जाती है।
■ अर्द्ध-अध्यक्षीय / अर्द्ध-संसदीय प्रणाली (Semi-Presidential System)
कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ संसदीय तथा अध्यक्षीय दोनों शासन प्रणालियों का मिश्रण पाया जाता है। उसे 'अर्द्ध-अध्यक्षीय' या 'अर्द्ध-संसदीय' शासन प्रणाली कहा जाता है।
हम जानते हैं कि संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री शक्तिशाली होता है और अध्यक्षीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति शक्तिशाली होता है। जब किसी देश में इन दोनों का मिश्रण पाया जाता है, तो उस देश में प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति दोनों अपने-अपने क्षेत्र में शक्तिशाली होते हैं।
अर्द्ध-अध्यक्षीय प्रणाली वाले देश: फ्रांस, श्रीलंका, पुर्तगाल, रूस, नामीबिया, मोजाम्बिक आदि देशों में यह प्रणाली लागू है।
✦ 19. संसद पर महत्वपूर्ण विचार (बर्गेस का कथन)
शासन प्रणाली में संसद (Parliament) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसी महत्ता को दर्शाते हुए प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक बर्गेस (Burgess) ने एक अत्यंत प्रसिद्ध और सटीक टिप्पणी की है:
"संसद एक ऐसा रंगमंच है जहाँ राजनीति का नाटक खेला जाता है। यह राष्ट्रीय विचारों का रंगमंच है। यह वह विद्यालय है जहाँ भावी राजनेताओं का परीक्षण होता है।"
✦ 20. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Comprehensive Conclusion)
इस संपूर्ण अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि राज्य की सत्ता और उसके शासन का स्वरूप विभिन्न देशों में उनकी ऐतिहासिक, भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। जहाँ एकात्मक व्यवस्था छोटे देशों और संकटकाल के लिए एक मज़बूत और एकरूप शासन प्रदान करती है, वहीं संघात्मक व्यवस्था भारत और अमेरिका जैसे विशाल देशों में क्षेत्रीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन स्थापित करती है। हालांकि आधुनिक कल्याणकारी राज्य में संघवाद के अंतर्गत भी केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
दूसरी ओर, सरकार के स्वरूप में संसदीय और अध्यक्षीय प्रणालियों का अपना-अपना महत्व है। अध्यक्षीय प्रणाली जहाँ 'स्थायित्व' (Stability) को प्राथमिकता देती है, वहीं संसदीय प्रणाली (जिसे भारत ने अपनाया है) 'उत्तरदायित्व' (Accountability) को सर्वोच्च मानती है। आधुनिक युग में फ्रांस जैसे देशों ने अर्द्ध-अध्यक्षीय प्रणाली विकसित कर इन दोनों के श्रेष्ठ तत्वों को मिलाया है। अंततः, शासन प्रणाली कोई भी हो, उसकी सफलता उस देश के नागरिकों, राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा पर ही निर्भर करती है।
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