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📢 "Polity Study Adda पर आपका स्वागत है!📜राजव्यवस्था रटना छोड़ दो, अब समझने की बारी है! 📜 यहाँ आपको TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET/JRF और UPSC, State PCS, SSC व अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए Political Science के प्रमाणित नोट्स और महत्वपूर्ण MCQs मिलेंगे। 📜"
INDIAN POLITY MCQs
POLITICAL THINKER MCQs
POLITICAL THEORY MCQs
COMPARATIVE POLITICS MCQs
PUBLIC ADMINISTRATION MCQs
INTERNATIONAL RELATION MCQs
INDIAN POLITY NOTES
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Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

Polity Study Adda पर TGT/PGT, LT/GIC, UGC NET, UPSC, SSC सहित सभी One-Day प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजनीति विज्ञान और भारतीय राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण MCQs और नोट्स पढ़ें। 'राजव्यवस्था रटने का नहीं, समझने का विषय है' — इसी मूल विचार के साथ, यह सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक बेहतरीन मंच है।

यहाँ हम संपूर्ण राजनीति विज्ञान से संबंधित उच्च-स्तरीय MCQs, विस्तृत नोट्स और तथ्यपूर्ण आर्टिकल्स नियमित रूप से अपलोड करते हैं। संविधान के अनुच्छेदों, शासन व्यवस्था और जटिल राजनीतिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाना ही हमारा लक्ष्य है।

यह एक निजी एजुकेशनल (शैक्षिक) पोर्टल है जिसे विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) विषय के साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी सफलता का परचम लहराना चाहते हैं।

Polity Study Adda की मुख्य विशेषताएँ

  • विषयवार विस्तृत आर्टिकल्स: भारतीय राजव्यवस्था, राजनीतिक चिंतक, सिद्धांत, लोक प्रशासन और IR की संपूर्ण सामग्री।
  • उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs): हर टॉपिक पर आधारित अति महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective Questions) और Mock Tests।
  • परीक्षा-उपयोगी शॉर्ट नोट्स: त्वरित रिवीजन (Quick Revision) के लिए टू-द-पॉइंट (To-the-point) आर्टिकल्स।
  • सरल और स्पष्ट भाषा: कठिन से कठिन विषय को भी आसान शब्दों में समझाने का प्रयास।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग क्यों करना चाहिए?

राजनीति विज्ञान अक्सर छात्रों को केवल अनुच्छेदों (Articles) और अधिनियमों को याद रखने वाला विषय लगता है। इस भ्रांति को दूर करने के लिए आपको इसका उपयोग करना चाहिए क्योंकि:

  • यहाँ रटने के बजाय देश की व्यवस्था समझने पर जोर दिया जाता है।
  • यह TGT/PGT/LT और UGC NET के विस्तृत सिलेबस को कवर करता है, जिससे One-Day परीक्षाएँ स्वतः ही आसान हो जाती हैं।
  • परीक्षा के बदलते पैटर्न के अनुसार नवीनतम सामग्री लगातार अपडेट होती है।

Polity Study Adda वेबसाइट का उपयोग हम कैसे कर सकते हैं?

  • कैटेगरी चुनें: होमपेज पर Indian Polity, Political Thinker या Theory के सेक्शन में जाएं।
  • सर्च करें: किसी विशेष विषय (जैसे- मूल अधिकार, प्लेटो) के लिए सर्च बॉक्स का उपयोग करें।
  • रिवीजन और प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के बाद उसी विषय के MCQs और Mock Tests को हल करें।

प्रतियोगी परीक्षाओं में 'राजनीति विज्ञान' विषय का क्या महत्व है?

भारत में सिविल सेवा और शिक्षक भर्ती (Teaching Exams) जैसे क्षेत्रों में राजव्यवस्था की भूमिका निर्णायक होती है:

  • सामान्य अध्ययन (GS) का आधार: UPSC और State PCS में राजव्यवस्था (Polity) से संविधान और गवर्नेंस पर कई प्रश्न पूछे जाते हैं।
  • स्कोरिंग विषय: यदि कॉन्सेप्ट क्लियर हों, तो राजनीति विज्ञान में पूरे अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • सामाजिक और कानूनी समझ: यह विषय हमें हमारे अधिकारों, कर्तव्यों और देश की कानूनी प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।

हम परीक्षाओं में राजनीति विज्ञान में अच्छे अंक कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

  • क्रमबद्ध अध्ययन: अनुच्छेदों को रटने के बजाय भागों और संबंधित अवधारणाओं के साथ पढ़ें।
  • मानक स्रोत: केवल प्रामाणिक पुस्तकों और Polity Study Adda जैसे सटीक प्लेटफॉर्म्स पर अध्ययन करें।
  • MCQs की प्रैक्टिस: थ्योरी पढ़ने के तुरंत बाद उससे जुड़े अधिक से अधिक बहुविकल्पीय प्रश्न हल करें।
  • शॉर्ट नोट्स: एग्जाम के अंतिम दिनों के लिए खुद के की-वर्ड्स (Keywords) वाले नोट्स बनाएं।

भारत में सरकारी नौकरियां लोगों को क्यों पसंद हैं?

हमारे देश में सरकारी नौकरी (Government Job) को लेकर युवाओं में एक अलग ही जुनून देखने को मिलता है। इसे केवल एक रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता माना जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • करियर और जॉब सिक्योरिटी: प्राइवेट सेक्टर की अनिश्चितता के उलट, सरकारी सेवा में नौकरी जाने का डर न के बराबर होता है।
  • शानदार वेतन और सुविधाएं: आकर्षक सैलरी के साथ-साथ महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया (HRA) और मेडिकल जैसी बेहतरीन सुविधाएं मिलती हैं।
  • समाज में प्रतिष्ठा: सरकारी अफसर या शिक्षक बनने पर समाज और रिश्तेदारों के बीच सम्मान और रुतबा बढ़ता है।
  • तनावमुक्त पारिवारिक जीवन: फिक्स वर्किंग आवर्स और सरकारी छुट्टियों के कारण आप अपने परिवार को क्वालिटी टाइम दे पाते हैं।

सरकारी नौकरी हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

सरकारी नौकरी पाना रातों-रात का चमत्कार नहीं है; इसके लिए सही दिशा, अटूट धैर्य और स्मार्ट स्टडी की जरूरत होती है:

  • अपना फोकस साफ रखें: सबसे पहले तय करें कि आपको टीचिंग फील्ड (TGT, PGT, NET) में जाना है या प्रशासनिक सेवा (UPSC, PCS) में।
  • पाठ्यक्रम (Syllabus) से चिपके रहें: ऑफिशियल सिलेबस का प्रिंटआउट लें और पिछले 5-10 सालों के प्रश्न-पत्रों (Previous Year Papers) का बारीकी से अध्ययन करें।
  • प्रामाणिक अध्ययन सामग्री: 10 अलग-अलग किताबें पढ़ने से बेहतर है कि 1 अच्छी किताब को 10 बार पढ़ें। पॉलिटी के लिए Polity Study Adda के सटीक नोट्स फॉलो करें।
  • रोज़ाना प्रैक्टिस: सिर्फ थ्योरी पढ़ने से काम नहीं चलेगा। जो टॉपिक पढ़ें, तुरंत उसके MCQs हल करें और मॉक टेस्ट देकर अपनी गलतियों को सुधारें।

Polity Study Adda आपकी कैसे मदद कर सकता है?

  • सिलेबस-आधारित सामग्री: TGT, PGT, UPSC, NET/JRF के लेटेस्ट सिलेबस के अनुसार कंटेंट।
  • समय की बचत: आपको कई किताबें छानने की जरूरत नहीं, सभी प्रामाणिक स्रोतों का निचोड़ मिलता है।
  • मार्गदर्शन: किस परीक्षा के लिए क्या और कितना पढ़ना है, इसका सही मार्गदर्शन।

Polity Study Adda पर हमें भरोसा क्यों करना चाहिए?

  • तथ्यों की प्रामाणिकता: हमारा कंटेंट मानक राजनीतिक पुस्तकों और प्रामाणिक स्रोतों से अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता है।
  • छात्र-हित सर्वोपरि: हमारा उद्देश्य भ्रामक जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्र की सफलता को सुनिश्चित करना है।
  • लगातार अपडेट्स: हम पुरानी सामग्री पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि नए परीक्षा पैटर्न के अनुसार कंटेंट को अपडेट करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. Polity Study Adda वेबसाइट क्या है?

उत्तर: यह एक निजी शैक्षिक (Educational) पोर्टल है जो विशेष रूप से 'राजनीति विज्ञान' (Political Science) और 'भारतीय राजव्यवस्था' (Indian Polity) विषय की तैयारी कर रहे छात्रों (TGT, PGT, UPSC, NET आदि) के लिए बनाया गया है।

Q2. क्या यह एक सरकारी वेबसाइट है?

उत्तर: नहीं, यह एक निजी (Private) प्लेटफॉर्म है जो छात्रों को मुफ्त एवं उच्च गुणवत्ता वाली अध्ययन सामग्री प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।

Q3. यह वेबसाइट किन परीक्षाओं के लिए उपयोगी है?

उत्तर: मुख्य रूप से Teaching Exams (TGT, PGT, LT Grade, UGC NET) और Civil Services (UPSC, State PCS, SSC, Railway) के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।

Q4. क्या यहाँ मुझे लोक प्रशासन (Public Administration) के नोट्स मिलेंगे?

उत्तर: हाँ, भारतीय राजव्यवस्था और राजनीतिक विचारकों के साथ-साथ आपको लोक प्रशासन और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध (IR) के भी विस्तृत नोट्स और MCQs यहाँ प्राप्त होंगे。

Q5. क्या वेबसाइट पर केवल थ्योरी (Theory) पढ़ाई जाती है?

उत्तर: नहीं, थ्योरी के साथ-साथ आपकी प्रैक्टिस के लिए उच्च स्तरीय बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective MCQs) और मॉक टेस्ट भी उपलब्ध हैं。

Q6. क्या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी प्रामाणिक है?

उत्तर: बिल्कुल, यहाँ उपलब्ध कराई गई सभी अध्ययन सामग्री मानक और प्रामाणिक राजनीतिक पुस्तकों के गहन अध्ययन के बाद ही तैयार की जाती है।

Q7. मैं इस वेबसाइट पर किसी विशेष टॉपिक की मांग कैसे कर सकता हूँ?

उत्तर: आप 'Contact Us' पेज पर जाकर या सीधे PolityStudyAdda@gmail.com पर ईमेल के माध्यम से हमें अपने सुझाव और डिमांड भेज सकते हैं।

Q8. क्या पॉलिटी स्टडी अड्डा का कोई यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया ग्रुप है?

उत्तर: हाँ, आप वेबसाइट के फुटर (सबसे नीचे) में दिए गए लिंक के माध्यम से हमारे Telegram, WhatsApp और YouTube चैनल आदि से जुड़ सकते हैं।

Q9. भारत में सरकारी नौकरी (Government Job) की इतनी मांग क्यों है?

उत्तर: जॉब सिक्योरिटी, बेहतर वेतन, भत्ते और समाज में उच्च सम्मान के कारण सरकारी नौकरी युवाओं की पहली पसंद होती है।

Q10. मैं शिक्षक या सिविल सेवा परीक्षा में सफलता कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

उत्तर: सिलेबस के अनुसार रणनीति बनाकर पढ़ने, प्रामाणिक स्रोतों (जैसे Polity Study Adda) का उपयोग करने और नियमित MCQs की प्रैक्टिस करने से सफलता निश्चित है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

'Polity Study Adda' पर प्रकाशित सभी अध्ययन सामग्री, नोट्स, बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) और अन्य सूचनाएं केवल छात्रों की परीक्षा की तैयारी और उनके त्वरित मार्गदर्शन के लिए प्रदान की गई हैं। इन्हें कानूनी दस्तावेज़ या अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि हमारी टीम ने सभी तथ्यों और उत्तरों को मानक पुस्तकों के आधार पर पूरी तरह से सटीक और प्रामाणिक रखने का हर संभव प्रयास किया है, लेकिन हम अनजाने में हुई किसी भी मानवीय त्रुटि, टाइपिंग की गलती या चूक के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

प्रश्नों के उत्तर और आयोग (Commissions) के संबंध में विशेष सूचना —
राजनीति विज्ञान जैसे विस्तृत विषय और प्रतियोगी परीक्षाओं के संदर्भ में अक्सर यह देखा जाता है कि अलग-अलग भर्ती आयोग (Commissions) कभी-कभी एक ही प्रश्न के अलग-अलग उत्तरों को सही मान लेते हैं, या विवाद की स्थिति में एक से अधिक विकल्पों को सही ठहरा देते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी प्रश्न का उत्तर एक आयोग के अनुसार कुछ और होता है, जबकि दूसरे आयोग के अनुसार कुछ और। आधिकारिक 'उत्तर कुंजी' (Official Answer Key) और हमारे द्वारा दिए गए उत्तरों में भिन्नता होने की स्थिति में 'Polity Study Adda' किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा।

छात्रों को स्पष्ट रूप से सलाह दी जाती है कि किसी भी उत्तर या तथ्य की अंतिम पुष्टि के लिए वे संबंधित विभाग/आयोग की आधिकारिक वेबसाइट, उनकी उत्तर कुंजी और मान्यता प्राप्त मानक पुस्तकों (Standard Books) का ही संदर्भ लें। यह वेबसाइट किसी भी सरकारी संगठन या आयोग से संबद्ध नहीं है; यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र और निजी शैक्षिक मंच है।

राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त: दैवीय, शक्ति, सामाजिक समझौता और विकासवादी सिद्धान्त

राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त: स्वरूप, प्रकार एवं ऐतिहासिक विकास
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में 'राज्य की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्तों' (दैवीय, शक्ति, परिवार, सामाजिक समझौता एवं विकासवादी सिद्धान्त) तथा मार्क्सवादी विचारधारा का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। यह UPSC, PCS, NET-JRF, TGT, PGT, LT, GIC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हस्तलिखित नोट्स पर आधारित है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

1. राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त: एक परिचय

राज्य सभ्य समाज की पहचान है। प्रारम्भ में सभ्य समाज नहीं था, इसलिए राज्य भी नहीं था। प्रसिद्ध विचारक गिलक्राइस्ट (Gilchrist) का मानना है कि "राज्य सर्वप्रथम कब दिखाई दिया? यह कब अस्तित्व में आया? उसे हम केवल इतिहास के माध्यम से ही जान सकते हैं और जहाँ इतिहास मौन हो जाता है, वहाँ हम कल्पनाओं का सहारा लेते हैं।"

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में समय-समय पर विभिन्न विचार प्रचलित रहे हैं। राजनीतिशास्त्र में राज्य की उत्पत्ति का अध्ययन मुख्य रूप से दो विचारधाराओं के अंतर्गत किया जाता है:

राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्त
मार्क्सवादी विचारधारा (वामपंथ)
  • यह राज्य की उत्पत्ति का राजनीतिशास्त्रीय सिद्धान्त है।
  • यह वर्ग-संघर्ष और सम्पत्ति पर आधारित है।
उदारवादी विचारधारा (दक्षिणपंथ)

A. समाजशास्त्रीय सिद्धान्त:

  • शक्ति सिद्धान्त
  • परिवार सिद्धान्त

B. राजनीतिशास्त्रीय सिद्धान्त:

  • दैवीय / धार्मिक सिद्धान्त (सबसे प्राचीन)
  • सामाजिक समझौते का सिद्धान्त
  • विकासवादी सिद्धान्त (सबसे मान्य)
महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु (Note):
प्रश्न: राज्य की उत्पत्ति का कौन सा सिद्धान्त वर्तमान में सर्वाधिक मान्य है?
उत्तर: विकासवादी सिद्धान्त।

यदि परीक्षा में प्रश्न हो कि "राज्य की उत्पत्ति के उदारवादी सिद्धान्त कौन से हैं?" और विकल्प में 'सामाजिक समझौता' तथा 'विकासवादी सिद्धान्त' दोनों हों, तो विकासवादी सिद्धान्त पर ही चिह्न लगेगा।

2. राज्य की उत्पत्ति के प्रमुख 5 सिद्धान्त

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो प्रमुख 5 सिद्धान्त अस्तित्व में आये, उनका क्रमिक विवरण निम्नलिखित है:

  1. राज्य की उत्पत्ति का दैवीय / धार्मिक सिद्धान्त (Divine Theory)
  2. राज्य की उत्पत्ति का शक्ति / बल / युद्ध का सिद्धान्त (Force Theory)
  3. राज्य की उत्पत्ति का परिवार सिद्धान्त (Kinship/Patriarchal Theory)
  4. राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता / यंत्रीय सिद्धान्त (Social Contract Theory)
  5. राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी / ऐतिहासिक / क्रमिक / वैज्ञानिक सिद्धान्त (Evolutionary Theory)

जहाँ दैवीय सिद्धान्त राज्य या राजा को 'ईश्वर की रचना' मानता है, वहीं सामाजिक समझौते का सिद्धान्त राज्य को 'मनुष्यों की रचना' मानता है। इसके विपरीत, विकासवादी सिद्धान्त राज्य को किसी निश्चित दिन का निर्माण नहीं, बल्कि 'लम्बे ऐतिहासिक विकास का परिणाम' बताता है।

सिद्धान्तों की प्रतिक्रिया का क्रम:
ध्यान रहे कि दैवीय सिद्धान्त की प्रतिक्रिया स्वरूप ही सामाजिक समझौते का सिद्धान्त आया, जबकि सामाजिक समझौते की प्रतिक्रिया स्वरूप विकासवादी सिद्धान्त अस्तित्व में आया। वर्तमान में राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त ही सर्वाधिक मान्य है।

नोट: शक्ति सिद्धान्त और परिवार सिद्धान्त को शुद्ध राजनीतिशास्त्र के अंतर्गत नहीं रखा जाता है, क्योंकि ये सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति कम और 'समाज' की उत्पत्ति को अधिक बताते हैं।

3. राज्य की उत्पत्ति का दैवीय / धार्मिक सिद्धान्त

यह राज्य की उत्पत्ति का सबसे प्राचीन सिद्धान्त है। चूँकि सारे सिद्धान्त यह मानते थे कि प्रारम्भ में कोई राज्य नहीं था। दैवीय सिद्धान्त के अनुसार राज्य या राजा की रचना ईश्वर (God) ने की है, मनुष्यों ने नहीं।

इस सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताएँ निम्नलिखित हैं:

  • असीमित शासन और निरंकुशता: चूँकि राजा को ईश्वर ने बनाया है, अतः राजा अपने प्रत्येक कार्य के लिए केवल 'ईश्वर के प्रति उत्तरदायी' है, जनता के प्रति नहीं। इसलिए जनता को राजा का विरोध नहीं करना चाहिए। इस प्रकार राजा निरंकुश (Absolute) था।
  • उत्तराधिकारी का नियम: इस सिद्धान्त के अनुसार राजा की अनुपस्थिति या मृत्यु के बाद उसका बड़ा लड़का (उत्तराधिकारी) ही राजा बनेगा। राजा पर किसी का अंकुश नहीं था।
  • जनता के पापों का दंड: इस सिद्धान्त का यह भी मानना है कि यदि राजा जनता को मारता-पीटता है या प्रताड़ित करता है, तो जनता को यह मानकर संतोष करना चाहिए कि उसने किसी पिछले जन्म में कोई पाप किया था, और ईश्वर उसी का दंड राजा के माध्यम से दे रहा है।

4. दैवीय सिद्धान्त के समर्थक एवं विचारकों के मत

यह सिद्धान्त लगभग सभी धर्मों (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी) में मिलता है। सभी धर्म यह मानते थे कि पहला राजा ईश्वर की ही रचना थी।

विचारक / धर्म / देश कथन एवं मान्यताएँ
जेम्स प्रथम (James I)
(इंग्लैंड का राजा, 16वीं सदी)
दैवीय सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रतिपादन (स्वतंत्र राजतंत्र के रूप में) इन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Law of Free Monarchy में किया। कथन: "राजा लोग पृथ्वी पर ईश्वर की जीवित प्रतिमा हैं।"
रॉबर्ट फिल्मर (Robert Filmer) दैवीय सिद्धान्त का सबसे प्रबल समर्थन फिल्मर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'पैट्रियार्का' (Patriarcha) में किया।
ब्रुस्वे एवं लुई 14वाँ
(फ्रांस)
फ्रांस में दैवीय सिद्धान्त का प्रतिपादन ब्रुस्वे ने किया जो लुई चौदहवें (Louis XIV) के कार्यकाल में लिख रहा था। लुई 14वें का प्रसिद्ध कथन है: "मैं ही राज्य हूँ।" (I am the State)
हिन्दू धर्म (मनुस्मृति) भारत में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मनु ने किया। मनुस्मृति में राजा को ब्रह्मा की रचना बताया गया है। (नोट: हिन्दू धर्म सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है, जबकि अन्य धर्म केन्द्रीयकरण पर)।
महाभारत (भगवान कृष्ण) महाभारत में भगवान कृष्ण ने कहा है: "हे अर्जुन, मनुष्यों में मैं ही राजा हूँ।"
अन्य धर्म व सभ्यताएं इस्लाम में मोहम्मद साहब को पहला पैगंबर या राजा बताया गया, ईसाई धर्म में ईसा मसीह को राजा बताया गया। चीन और मिस्र में राजा को सूर्यपुत्र व देवपुत्र कहकर पुकारा गया।
बर्गेस (Burgess) यूरोपीय परम्परा में मध्यकाल के अंतिम दौर में जब राजा और पोप के बीच संघर्ष छिड़ा, तब राजा ने स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताया। बर्गेस का कथन है: "राज्य के आधार पुजारी थे।"

5. दैवीय सिद्धान्त की आलोचना एवं वर्तमान में महत्व

दैवीय सिद्धान्त की आगे चलकर काफी आलोचना हुई। आधुनिक विचारकों द्वारा इसे अतार्किक (Illogical), अनैतिहासिक (Unhistorical) और अवैज्ञानिक (Unscientific) कहकर पूरी तरह से ठुकरा दिया गया।

भले ही राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धान्त आज मान्य नहीं है, फिर भी इसका एक बड़ा ऐतिहासिक महत्व रहा है। प्रारम्भ में जब लोग खूंखार एवं उजड्ड (Savage and Wild) अवस्था में थे और उन्हें इकट्ठा करके एक राज्य का निर्माण करना अत्यंत कठिन था, तब इसी सिद्धान्त ने समाज को सभ्य बनाने का कार्य किया।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
इस सिद्धान्त ने ईश्वर के नाम और भय पर लोगों को आज्ञापालन (Obedience), अनुशासन (Discipline) और राजभक्ति (Loyalty) का पाठ पढ़ाया, जिससे प्रारंभिक अवस्था में राज्य के निर्माण, शांति स्थापना और सुदृढ़ीकरण में बहुत बड़ी मदद मिली।

6. राज्य की उत्पत्ति का शक्ति / बल प्रयोग / युद्ध का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भ में कोई राज्य नहीं था, बल्कि दो वर्ग विद्यमान थे— एक बलशाली (Strong)दूसरा निर्बल (Weak)। बलशाली व्यक्ति ने निर्बल व्यक्ति पर आक्रमण करके उसे युद्ध में पराजित किया और उसके जनपद (Territory) को जीतकर अपने जनपद में मिला लिया।

इस प्रकार बलशाली व्यक्ति ने कई जनपदों को जीता और सबको मिलाकर एक विशाल जनपद का निर्माण किया, जिसे 'राज्य' (State) की संज्ञा दी गई। इस प्रकार यह सिद्धान्त राज्य के निर्माण में शक्ति या युद्ध का हाथ बताया है। इसके प्रमुख समर्थकों में ओपेनहाइमर, डेविड ह्यूम, वाल्टेयर, त्रितस्के (Treitschke) और नीत्से आदि शामिल हैं।

7. शक्ति सिद्धान्त पर प्रमुख विचारकों के कथन एवं महत्व

विचारक प्रमुख कथन एवं मान्यताएँ
ओपेनहाइमर
(Oppenheimer)
"राज्य एक वर्गीय संगठन है, जिसकी उत्पत्ति एक युद्ध के द्वारा हुई।"
डेविड ह्यूम
(David Hume)
"राज्य की उत्पत्ति में युद्ध का हाथ है।"
वाल्टेयर
(Voltaire)
"पहला राजा एक भाग्यशाली योद्धा था।"
त्रित्सके
(Treitschke)
"राज्य शक्ति का मूर्त रूप है।"
मैकियावेली
(Machiavelli)
"राज्य का आधार शक्ति है।"
बोदां
(Bodin)
"शक्ति केवल डाकुओं के गिरोह का ही संगठन करती है, राज्य का नहीं।"
टी. एच. ग्रीन
(T.H. Green)
"राज्य का आधार इच्छा (Will) है, शक्ति नहीं।"
शक्ति सिद्धान्त का आधुनिक महत्व:
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शिकागो विश्वविद्यालय में जिस 'व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान' का जन्म हुआ, उसे शक्तिवादी राजनीति कहा जाता है। आज राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति को शक्ति संघर्ष के रूप में देखा जाता है, जिसे Power Politics कहा जाता है।

आलोचना: भले ही आज शक्ति को राज्य का आधार माना जाता हो, लेकिन केवल शक्ति के बल पर हम राज्य को सुरक्षित नहीं रख सकते क्योंकि जो शक्ति के द्वारा प्राप्त होता है, वह शक्ति के द्वारा ही नष्ट हो जाता है (हिटलर और मुसोलिनी इसके प्रतीक हैं)।

8. राज्य की उत्पत्ति का परिवार / रक्त सम्बन्ध सिद्धान्त

चूँकि परिवार रक्त सम्बन्धों पर आधारित होता है, इसलिए इसे राज्य की उत्पत्ति का रक्त सम्बन्धीय सिद्धान्त भी कहा जाता है। एक प्रसिद्ध कहावत है कि "खून पानी से गाढ़ा होता है" (Blood is thicker than Water)

एक परिवार वह है जो पुरुष, स्त्री व बच्चों से मिलकर बना होता है। यही बच्चे आगे चलकर एक नये परिवार को जन्म देते हैं और जब कई परिवार आपस में मिल जाते हैं, तो एक वंश का निर्माण करते हैं। वंश आगे चलकर कबीला का और कबीला राज्य का निर्माण करते हैं।

"रक्त सम्बन्ध समाज को जन्म देता है और समाज अंततः राज्य को जन्म देता है।" — मैकाइवर

राज्य के निर्माण का क्रमिक विकास (Flowchart):

परिवार
(पुरुष, स्त्री, बच्चे)
वंश
(Families)
कबीला
(Tribe)
राज्य
(State)

9. परिवार सिद्धान्त के रूप: पितृसत्तात्मक एवं मातृसत्तात्मक

परिवार सिद्धान्त के मुख्यतः दो रूप माने जाते हैं: पितृसत्तात्मक (Patriarchal) और मातृसत्तात्मक (Matriarchal)। इन दोनों का विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन निम्नलिखित है:

I. पितृसत्तात्मक सिद्धान्त (Patriarchal) II. मातृसत्तात्मक सिद्धान्त (Matriarchal)
प्रमुख समर्थक:
★प्राचीन काल में अरस्तू (Aristotle) ने इसका समर्थन किया (उन्होंने स्त्रियों का स्थान घर की चारदीवारी में बताया)।
★आधुनिक काल में सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) इसके सबसे बड़े समर्थक हैं।
प्रमुख समर्थक:
★इसके प्रमुख समर्थक जैक्स (Jenks), वार्ड (Ward), स्माल (Small) और बैसोफेन (Bachofen) माने जाते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
  • परिवार का मुखिया वयोवृद्ध पुरुष होता है और वही सारी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी होता है।
  • वैवाहिक सम्बन्ध प्रचलित हैं और वंशावली पुरुषों के नाम से जानी जाती है।
  • पिता की अनुपस्थिति में बड़ा लड़का परिवार का मुखिया होता है (आनुवंशिक शासन प्रणाली की नींव)।
प्रमुख विशेषताएँ:
  • परिवार की मुखिया वयोवृद्ध महिला होती है और वही सम्पत्ति की उत्तराधिकारी होती है।
  • वैवाहिक सम्बन्ध अप्रचलित हैं एक स्त्री की कई पुरुषों से संबंध है (बहुपति प्रथा) इसीलिए वंशावली माँ के नाम से जानी जाती है।
  • माँ की अनुपस्थिति में बड़ी लड़की परिवार की मुखिया होती है।
बैसोफेन का ऐतिहासिक दृष्टिकोण:
बैसोफेन का मानना है कि पुरुष सत्तात्मक समाज के उदय के लगभग 10,000 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के कुछ द्वीपों पर मातृ सत्तात्मक समाज प्रचलित था। वहाँ स्त्रियाँ घर के अन्दर व बाहर दोनों का कार्य करती थीं (तीर, तलवार व घोड़े चलाती थीं) और श्रम का विभाजन नहीं था। लेकिन कालान्तर में कुछ बलशाली पुरुषों ने स्त्रियों से युद्ध करके उन्हें पराजित किया और उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया, फलस्वरूप मातृसत्तात्मक समाज पितृसत्तात्मक में बदल गया।

नोट: भारत के पूर्वोत्तर राज्य मेघालय  की पहाड़ियों (गारो, खासी, जयंतिया) की अनुसूचित जनजातियों में आज भी यह मातृसत्तात्मक प्रथा  प्रचलित है।

10. राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता (यंत्रीय) सिद्धान्त

यह सिद्धान्त 17वीं और 18वीं शताब्दी में सर्वाधिक प्रचलित था और फ्रांसीसी क्रांति के दौरान अपनी चरम सीमा पर था। इस सिद्धान्त का मूल आधार यह है कि राज्य का निर्माण ईश्वर ने नहीं, बल्कि मानव (व्यक्तियों) ने आपस में समझौता करके किया है।

यह सिद्धान्त दैवीय सिद्धान्त के प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आया। जहाँ दैवीय सिद्धान्त के अनुसार राज्य की रचना ईश्वर ने की और राजा या राज्य ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, वहीं सामाजिक समझौता सिद्धांत के अनुसार राज्य की रचना मनुष्यों ने आपस में एक समझौता करके किया है, जैसा कि राज्य की रचना मनुष्यों ने किया है इसलिए राज्य जनता के प्रति उत्तरदायी है तथा राज्य का स्वरूप मानवीय है।

★ सामाजिक समझौता सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ / मान्यताएँ:

  • मानवीय स्वरूप: राज्य ईश्वरीय नहीं, बल्कि मानवीय संस्था है, क्योंकि राज्य का निर्माण मनुष्य ने आपसी समझौता करके बनाया है।
  • साध्य और साधन: चूँकि राज्य की रचना व्यक्तियों ने की है, इसलिए व्यक्ति साध्य (End) है और राज्य साधन (Means) है।
  • व्यक्तिवाद की नींव: इस सिद्धान्त ने व्यक्ति की महत्ता को स्थापित कर व्यक्तिवाद की नींव डाली।
  • राज्य एक यंत्र की भांति है: राज्य को जिस कार्य के लिए बनाया गया है, उसे उसी तक सीमित रहना चाहिए, इसलिए इसे 'यंत्रीय सिद्धान्त' भी कहते हैं।
  • लोकतंत्र की नींव: यह सिद्धान्त राज्य को लोगों की 'सहमति' (Consent) पर आधारित मानता है, जिससे लोकतंत्र की नींव पड़ी।
  • राजनीतिक उत्तरदायित्व: इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दायित्व की व्याख्या करना है।

11. सामाजिक समझौते के समर्थक एवं ऐतिहासिक विकास

सामाजिक समझौते का सिद्धान्त भारतीय और यूरोपीय दोनों परम्पराओं में विद्यमान रहा है। कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'अर्थशास्त्र' में और महाभारत के शांतिपर्व/भीष्मपर्व में भी इस सिद्धान्त का वर्णन मिलता है (जहाँ प्राकृतिक अवस्था में हिंसा और अराजकता थी, तब मनुष्यों ने समझौता किया)।

ऐतिहासिक उदाहरण (Mayflower Pact):
इस सिद्धान्त का एक वास्तविक उदाहरण 1620 में देखने को मिलता है, जब 'मेफ्लावर' (Mayflower) नामक समुद्री पोत से कुछ अंग्रेज अमेरिका जा रहे थे और रास्ते में उन्होंने आपस में मिलकर एक समझौता किया था।

यूरोपीय परम्परा में सर्वप्रथम प्राचीन कालीन यूनान में सोफिस्ट (Sophist) विचारकों में यह सिद्धान्त दिखाई पड़ता है, सोफिस्टो ने भी राज्य को व्यक्तियों के आपसी समझौते का परिणाम माना, सोफिस्ट जो व्यक्तिवादी व मानवतावादी थे। आधुनिक काल में इसका वैज्ञानिक प्रतिपादन रिचर्ड हूकर (Richard Hooker) ने किया तथा स्पिनोजा, ग्रोसियस, और पुण्डेफोर्ड ने इसका समर्थन किया। लेकिन इसे स्पष्ट रूप से स्थापित करने का श्रेय हॉब्स, लॉक और रूसो को जाता है।

हॉब्स, लॉक और रूसो के अनुसार समझौते का क्रम

मानव स्वभाव
(Human Nature)
प्राकृतिक अवस्था
(State of Nature)
समझौते का कारण
(Reason for Contract)
सामाजिक समझौता
(Social Contract)
नागरिक समाज / राज्य
(Civil Society/State)

हॉब्स, लॉक और रूसो तीनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रारम्भ में कोई राज्य नहीं था, लोग प्राकृतिक अवस्था में रहते थे। कालान्तर में लोगों ने आपस में एक समझौता करके राज्य का निर्माण किया। अतः हॉब्स, लॉक, रूसो ने सामाजिक समझौते के द्वारा राज्य के जन्म का क्रम के बारे में इस प्रकार बताया - मानव स्वभाव 👉 प्राकृतिक अवस्था 👉 समझौते का कारण 👉 सामाजिक समझौता 👉 नागरिक समाज या राज्य का जन्म हुआ, तो इसके बारे में विस्तार से बताया, तो इस प्रकार राज्य का स्वरूप तथा राज्य व व्यक्ति के बीच सम्बन्धों का वर्णन किया।

आलोचना: ग्रीन ने इसे 'कपोल कल्पना', बुल्जे (Woolsey) ने 'सरासर झूठा' बताया, सर हेनरी मेन ने 'अनैतिहासिक' बताया और बेंथम ने इसे 'ठुकरा दिया' क्योंकि यह प्राकृतिक अधिकारों पर आधारित था, बेंथम के अनुसार राज्य का आधार समझौता नहीं बल्कि उपयोगिता (Utility) है। इन आलोचनाओं के बावजूद, यह अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति का प्रेरणा स्रोत बना।

उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद इस सिद्धान्त के महत्व को कम करके नहीं देखा जा सकता। इस सिद्धान्त ने व्यक्तिवाद और लोकतंत्र की नींव डाली, इसने व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया। यह अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति का प्रेरणा स्रोत है। यह सिद्धान्त तर्क-वितर्क पर आधारित है, अतः यह एक दार्शनिक सत्य को व्यक्त करता है। सामाजिक समझौते का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दायित्व की व्याख्या करना है।

12. राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी / ऐतिहासिक / वैज्ञानिक सिद्धान्त

सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की प्रतिक्रिया स्वरूप विकासवादी सिद्धान्त (Evolutionary Theory) का जन्म हुआ। इसे ऐतिहासिक, क्रमिक या वैज्ञानिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में यही सिद्धान्त सर्वाधिक मान्य है।

जहाँ सामाजिक समझौते का मानना है कि राज्य का निर्माण हुआ है, वहीं यह सिद्धान्त मानता है कि राज्य का विकास हुआ है। डॉ. गार्नर (Garner) राज्य की उत्पत्ति के अन्य सभी सिद्धान्तों का खण्डन करते हुए विकासवादी सिद्धान्त का मण्डन करते हैं:

गार्नर का प्रसिद्ध कथन: "राज्य का विकास हुआ है, निर्माण नहीं।"

"राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न ही भौतिक शक्तियों का परिणाम, न ही किसी समझौते की कृति है और न ही परिवार का विस्तार, बल्कि क्रमिक रूप से विकसित एक ऐतिहासिक संस्था है।" — डॉ. गार्नर

इस सिद्धान्त का मानना है कि राज्य का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि सैकड़ों-हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होकर राज्य अस्तित्व में आया है। ब्लंटशली का मानना है कि राज्य के उपर्युक्त सभी सिद्धान्त आंशिक रूप से सत्य हैं, क्योंकि हर सिद्धान्त ने किसी न किसी तत्व को जन्म दिया है (जैसे- दैवीय सिद्धान्त ने धर्म, शक्ति सिद्धान्त ने शक्ति, परिवार सिद्धान्त ने रक्त सम्बन्ध) और सामाजिक समझौते के सिद्धांत ने स्वाभाविक सामाजिक प्रवृत्तियां और राजनीतिक चेतना को जन्म दिया इन्हीं तत्वों ने मिलकर विकासवादी सिद्धांत के उदय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

13. विकासवादी सिद्धान्त के प्रमुख तत्व एवं राज्य का विकास-क्रम

विकासवादी सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक गेटेल, गिलक्राइस्ट, मैकाइवर, समनर व केलर आदि हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य के उदय में निम्नलिखित प्रमुख तत्वों ने भूमिका निभाई है:

  1. धर्म (Religion)
  2. शक्ति (Force)
  3. रक्त सम्बन्ध (Blood Relation)
  4. स्वाभाविक सामाजिक प्रवृत्तियाँ (Natural Social Tendencies)
  5. राजनीतिक चेतना (Political Consciousness)
महत्वपूर्ण तथ्य: यद्यपि उपर्युक्त सभी तत्वों ने राज्य की उत्पत्ति में अपनी भूमिका निभाई, लेकिन इनमें 'स्वाभाविक सामाजिक प्रवृत्तियां और राजनीतिक चेतना' (Political Consciousness) ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दिया (इसे 1st वरीयता दी जाती है)।

राज्य का क्रमिक विकास (Stages of State Evolution)

कबीला राज्य
(Tribal State)
प्राच्य साम्राज्य
(Oriental Empire)
यूनानी नगर राज्य
(Greek City State)
रोमन साम्राज्य
(Roman Empire)
सामंती राज्य
(Feudal State)
राष्ट्र राज्य
(Nation State)

निष्कर्षतः, उदारवादी विचारधारा के अंतर्गत राज्य की उत्पत्ति में सामाजिक समझौते और विकासवादी सिद्धान्त दोनों को रखा जाता है, लेकिन मुख्य रूप से विकासवादी सिद्धान्त को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

14. राज्य की उत्पत्ति का मार्क्सवादी सिद्धान्त

स्वयं कार्ल मार्क्स (Karl Marx) ने राज्य की उत्पत्ति पर अपना कोई स्पष्ट विचार नहीं दिया, बल्कि उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार राज्य के माध्यम से एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता है। मार्क्सवाद मूलतः उदारवाद का प्रतिवाद है और उदारवाद पूंजीवाद का प्रतीक है।

मार्क्स के राजनीतिक प्रतिनिधि फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels) ने अपनी पुस्तक "Origin of Family, Private Property and State" तथा "Anti-Duhring" में राज्य की उत्पत्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। मार्क्सवाद के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का मूल साधन 'उत्पादन का साधन' (प्रथम वरीयता) और 'निजी सम्पत्ति' (द्वितीय वरीयता) है।

एंगेल्स का ऐतिहासिक दृष्टिकोण:
एंगेल्स का मानना है कि प्रारम्भ में न कोई राज्य था, न ही कोई वर्ग। प्राकृतिक रूप से जो उत्पादन का साधन था, उस पर सबका साझा नियंत्रण था। कालान्तर में 'निजी सम्पत्ति' का उदय हुआ और समाज दो वर्गों में बँट गया— एक वर्ग जो उत्पादन के साधन का मालिक बना (अमीर) और दूसरा वर्ग जो इससे विहीन था (गरीब)। जैसे ही समाज दो वर्गों में बँटा, वैसे ही राज्य का उदय हो गया।

मार्क्सवाद के अनुसार राज्य का उदय एवं अंत

प्राकृतिक अवस्था
(साझा नियंत्रण)
निजी सम्पत्ति का उदय
(उत्पादन के साधन)
वर्ग विभाजन
(अमीर व गरीब)
राज्य का उदय
(शोषण का यंत्र)
साम्यवाद (Communism)
(राज्यविहीन व वर्गविहीन समाज)

मार्क्सवाद के अनुसार— "राज्य वर्ग विभाजन का परिणाम है।" एंगेल्स का मानना है कि जब तक यह राज्य बना रहेगा, तब तक किसी न किसी रूप में वर्ग बना रहेगा और तब तक उत्पादन के साधनों पर एक वर्ग का नियंत्रण बना रहेगा तथा एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करता रहेगा। अतः राज्य के समाप्त होते ही वर्ग समाप्त हो जायेगा तथा उत्पादन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का नियंत्रण स्थापित हो जायेगा। इस प्रकार आर्थिक समानता आयेगी तथा वर्ग विहीन, राज्य विहीन व शोषण विहीन समाज की स्थापना होगी। इसी को साम्यवाद (Communism) भी कहा जाता है।

"राज्य चरखे और कुल्हाड़ी की भांति अजायबघर (Museum) में रखने वाली एक वस्तु बन जायेगा।" — फ्रेडरिक एंगेल्स

कार्ल मार्क्स के प्रमुख विचार (Notes):

  • मार्क्स के अनुसार, राज्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का उपकरण है।
  • मार्क्स ने राज्य को 'पूंजीपतियों की कार्यकारिणी' बताया है।
  • पूंजीपतियों ने राज्य का निर्माण एक वैधानिक संस्था के रूप में किया है, ताकि उनके द्वारा किए जा रहे शोषण को वैधानिक (Legal) बनाया जा सके।

15. मार्क्सवाद में लेनिन और ग्राम्शी का योगदान

मार्क्सवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने और उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करने में लेनिन और ग्राम्शी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है:

(I) वी. आई. लेनिन (V.I. Lenin)

लेनिन को 'मार्क्सवाद का व्यावहारिक पिता' कहा जाता है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "State and Revolution" में राज्य की उत्पत्ति पर अपने विचार दिए हैं:

"राज्य वर्ग संघर्ष की असाध्य (कभी न ठीक होने वाली) अभिव्यक्ति है।" — लेनिन

अर्थात् लेनिन का मानना है कि वर्ग कभी समाप्त नहीं होगा, अतः किसी न किसी रूप में संघर्ष भी बना रहेगा। राज्य के उदय का मूल कारण यही वर्ग संघर्ष है। इस प्रकार लेनिन ने 'राज्य के लुप्त होने' (Withering away of state) के मार्क्सवादी विचार को पीछे धकेल दिया।

(II) एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci)

इटली में पैदा हुए ग्राम्शी को 'मार्क्सवादी संशोधनवादी' कहा जाता है। जहाँ मार्क्स ने कहा था कि आर्थिक बल पर एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन करता है, वहीं मार्क्स के विचारों में संशोधन करते हुए ग्राम्शी ने लिखा है:

"केवल धन (आर्थिक बल) के बल पर कोई किसी पर शासन नहीं करता, बल्कि शासन का आधार बल, बुद्धि और चरित्र है।" — ग्राम्शी

ग्राम्शी ने राज्य की उत्पत्ति में निम्नलिखित तीन शक्तियों का आपसी टकराव माना है:

  1. नेतृत्व करने वाली शक्तियाँ
  2. नेतृत्व विरोधी शक्तियाँ
  3. सहायक शक्तियाँ (जनमत, प्रेस, बुद्धि, विकास आदि)
ग्राम्शी का निष्कर्ष:
राज्य के निर्माण में इन 'सहायक शक्तियों' का सबसे अधिक और विशेष योगदान है। ये सहायक संस्थाएं (प्रेस, जनमत आदि) जिसके पक्ष में अपना योगदान देती हैं, अंततः उसी वर्ग की विजय होती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्षतः, राज्य की उत्पत्ति का कोई एक निश्चित दिन या समय नहीं है। प्रारम्भिक अवस्था में दैवीय सिद्धान्त ने जहाँ जंगली अवस्था में लोगों को अनुशासन और राजभक्ति सिखाई, वहीं शक्ति सिद्धान्त ने राज्य के विस्तार में मदद की। परिवार सिद्धान्त ने रक्त सम्बन्धों की महत्ता को दर्शाया, जबकि सामाजिक समझौते ने व्यक्तिवाद और लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी। मार्क्सवाद ने इसे वर्ग संघर्ष और शोषण के यंत्र के रूप में देखा।

अंततः, आधुनिक राजनीति विज्ञान में विकासवादी (ऐतिहासिक) सिद्धान्त को ही सर्वाधिक प्रामाणिक और वैज्ञानिक माना जाता है। इसके अनुसार राज्य न तो ईश्वर की रचना है और न ही किसी समझौते का परिणाम, बल्कि यह एक लम्बे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है।

📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. राज्य की उत्पत्ति का सबसे सर्वमान्य सिद्धान्त कौन सा है?
उत्तर: आधुनिक राजनीति विज्ञान में 'विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त' को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। इसके अनुसार राज्य का निर्माण किसी एक दिन नहीं हुआ, बल्कि इसका क्रमिक विकास हुआ है।
Q2. सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
उत्तर: सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रतिपादन मुख्य रूप से हॉब्स, लॉक और रूसो ने किया था।
Q3. मार्क्सवाद के अनुसार राज्य क्या है?
उत्तर: मार्क्सवाद के अनुसार राज्य कोई प्राकृतिक संस्था नहीं है, बल्कि यह 'वर्ग विभाजन' का परिणाम है और एक वर्ग (अमीर) द्वारा दूसरे वर्ग (गरीब) के शोषण का यंत्र है।
Q4. "राज्य का आधार इच्छा है, शक्ति नहीं" - यह कथन किसका है?
उत्तर: यह प्रसिद्ध कथन टी. एच. ग्रीन (T.H. Green) का है, जिन्होंने शक्ति सिद्धान्त की आलोचना करते हुए यह बात कही थी।
Q5. दैवीय सिद्धान्त की मुख्य मान्यता क्या है?
उत्तर: इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य या राजा की रचना स्वयं ईश्वर ने की है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है और वह अपने कार्यों के लिए केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, जनता के प्रति नहीं।
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