| प्लेटो (427 B.C. - 347 B.C.) : पाश्चात्य राजनीतिक विचारक |
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Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में पाश्चात्य राजनीतिक विचारक प्लेटो (Plato) के जीवन, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'रिपब्लिक', न्याय सिद्धांत, शिक्षा और दार्शनिक राजा के विचारों को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर सरल पैराग्राफ शैली में समझाया गया है। यह मटेरियल UPSC, State PCS, UGC NET, TGT, PGT सहित सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। |
- 1. प्लेटो का जीवन परिचय
- 2. लोकतंत्र का विरोध और 'Republic' की रचना
- 3. प्लेटो की अध्ययन पद्धति (Dialectical Method)
- 4. अकादमी की स्थापना और अन्य रचनाएँ
- 5. प्लेटो पर सुकरात का प्रभाव और नामकरण
- 6. न्याय के सिद्धांत और राज्य-व्यक्ति संबंध
- 7. न्याय के सिद्धांत की पृष्ठभूमि
- 8. प्लेटो का न्याय और सावयवी सम्बन्ध
- 9. व्यक्ति के गुण और राज्य के वर्ग
- 10. प्लेटो के न्याय की प्रमुख विशेषताएँ
- 11. आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन और निष्कर्ष
- 12. दार्शनिक राजा की अवधारणा
- 13. दार्शनिक राजा: उदाहरण और आलोचना
- 14. प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था और समानता
- 15. शिक्षा के उद्देश्य और प्राथमिक शिक्षा
- 16. शिक्षा का दूसरा चरण: उच्च शिक्षा
- 17. प्लेटो का साम्यवाद (Communism)
- 18. साम्यवाद के प्रावधान और प्रमुख उद्देश्य
- 19. साम्यवाद पर विचारकों की टिप्पणियाँ
- 20. स्टेट्समैन और लॉज में विचार
- 21. रिपब्लिक और लॉज में प्रमुख अंतर
- 22. प्लेटो के राजनीतिक दर्शन का निष्कर्ष
✦ 1. प्लेटो का जीवन परिचय
पाश्चात्य जगत में आदर्श राज्य (Ideal State) की योजना प्रस्तुत करने वाले, दार्शनिक राजनीति के जनक तथा सुकरात के परम शिष्य प्लेटो का जन्म 427 ई.पू. (B.C.) में एथेंस के एक संपन्न राजपरिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम एरिस्टोन और माता का नाम परिकीटनी(पेरिक्टिओनी/पेरिक्टोन) था। राज परिवार में जन्म लेने के कारण प्लेटो की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई.
प्लेटो को सुकरात से दर्शनशास्त्र की शिक्षा मिली और व्यायाम व संगीत के लिए उनके अलग अध्यापक थे. इसलिए प्लेटो को एक संगीत प्रेमी विचारक भी माना जाता है. राज परिवार में जन्म लेने के कारण राजनेता बनना उनका स्वाभाविक अधिकार था, लेकिन सुकरात की असामयिक मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया और वे एक महान राजनीतिक चिंतक बन गए.
✦ 2. लोकतंत्र का विरोध और 'Republic' की रचना
एथेंस की तत्कालीन प्रजातंत्रीय सरकार ने राज्य के कानून के अंतर्गत उनके गुरु सुकरात को विषपान (जहर) कराया था। इस घटना के कारण प्लेटो को प्रारम्भ से ही प्रजातंत्र और कानून के राज्य से घृणा हो गयी। प्लेटो ने प्रजातंत्र की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मूर्खों, अज्ञानियों और दुष्टो की सरकार बताया।
सुकरात की मृत्यु के बाद प्लेटो लम्बे समय तक इधर-उधर घूमते रहे और इसी भटकाव तथा अपनी युवावस्था के दौरान उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Republic' (रिपब्लिक) की रचना की। Republic को 'Polity' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है - राजव्यवस्था। प्लेटो ने इस पुस्तक में एक ऐसे आदर्श राज्य की परिकल्पना दी, जिसमे इतनी बेहतरीन न्याय व्यवस्था हो कि सुकरात सरीखे किसी ऋषि को फिर कभी विषपान न करना पड़े।
✦ 3. प्लेटो की अध्ययन पद्धति (Dialectical Method)
यह स्पष्ट है कि Republic का मुख्य विषय आदर्श राज्य और न्याय व्यवस्था स्थापित करना है और इस पुस्तक में न्याय व्यवस्था, आदर्श राज्य, शिक्षा और साम्यवाद की विस्तार से चर्चा की गई है। यह पुस्तक संवाद शैली (Dialogue Style) पर आधारित है और प्लेटो ने इसमें मुख्य रूप से निगमनात्मक पद्धति का प्रयोग किया है।
प्लेटो ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए द्वन्द्वात्मक पद्धति (Dialectic System) का प्रयोग किया है। इस पद्धति को अंग्रेजी में डायलेक्टिक सिस्टम कहा जाता है जो कि ग्रीक शब्द 'डायलोगो' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - वार्तालाप। यह वह वैज्ञानिक पद्धति होती है जिसमें तर्क-वितर्क के द्वारा सत्य का अनुसंधान (खोज) किया जाता है।
इस द्वन्द्वात्मक पद्धति के अंतर्गत मुख्य रूप से तीन चरण आते हैं— वाद (Thesis), प्रतिवाद (Antithesis) और संवाद (Synthesis)। वाद एक प्रारम्भिक वस्तु या विचार है जो कि पूर्णतः सत्य नहीं होता। उसकी प्रतिक्रिया के रूप में प्रतिवाद जन्म लेता है। प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरुप असत्य (झूठे) तत्व नष्ट हो जाते हैं और जो पूर्ण सत्य बचता है, वह मिलकर संवाद का निर्माण करता है।
✦ 4. अकादमी की स्थापना और अन्य रचनाएँ
देशाटन और लम्बे समय के बाद प्लेटो एथेंस पुनः वापस आये और वहाँ उन्होंने एक विश्वविद्यालय खोला जिसका नाम 'अकादमी' (Academy) रखा गया। इस विश्वविद्यालय में मुख्य रूप से दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। इस अकादमी के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट रूप से लिखा हुआ था कि— "जिसे गणित या ज्यामिति का अध्ययन न हो, वह इस अकादमी में प्रवेश न ले।"
प्लेटो का जीवन जैसे-जैसे बीतता गया, उन्हें जीवन की वास्तविकताओं का गहरा ज्ञान हुआ और इसी कारण उन्होंने अपने अंतिम समय में अपने विचारों में काफी बदलाव किया। अपने पूरे जीवनकाल में प्लेटो ने लगभग 36 किताबों की रचना की। इन सभी पुस्तकों में 'Republic' के अलावा Statesman (स्टेट्समैन) और Laws (लॉज) का विशेष महत्व माना जाता है। आकार में लॉज़ सबसे बड़ा ग्रंथ है।
✦ 5. प्लेटो पर सुकरात का प्रभाव और नामकरण
प्लेटो के सम्पूर्ण जीवन और विचारों पर सर्वाधिक प्रभाव उनके गुरु सुकरात का पड़ा। ऐसा माना जाता है कि उनके हृदय में अपने गुरु की जो महान प्रतिमा अंकित हुई, वह जीवन भर कभी धूमिल न पड़ी। इस संदर्भ में हर्नशा ने लिखा है कि— "सौभाग्य से सुकरात को प्लेटो जैसा शिष्य मिला, जिसकी बौद्धिक प्रतिभा स्वयं अपने गुरु के समान थी।" प्लेटो किसी भी विषय पर तर्कों को प्रस्तुत करते समय अपनी इसी द्वन्दवादी प्रतिभा का शानदार परिचय देते थे।
प्लेटो के बचपन का मूल नाम एरिस्टोक्लीज था। चूंकि उन्हें व्यायाम का शौक था, इसलिए व्यायाम करते-करते उनका कंधा 'प्लेट' के समान चौड़ा हो गया था। उनके इसी चौड़े कंधे के कारण उनके गुरु ने उन्हें 'प्लेटो' कहना प्रारम्भ कर दिया और वे इसी नाम से विश्वविख्यात हुए। एक महान दार्शनिक के रूप में प्लेटो की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 347 ई.पू. में हुई।
✦ 6. न्याय के सिद्धांत और राज्य-व्यक्ति संबंध
प्लेटो की महान रचना 'Republic' का मुख्य उप-शीर्षक (Title) Concerning Justice है, जिसका अर्थ है "न्याय से सम्बंधित"। प्लेटो ने अपनी पुस्तक में तत्कालीन समय में प्रचलित न्याय के विभिन्न सिद्धांतों का खंडन किया है।
- न्याय का परम्परागत सिद्धांत: सिफालस और पोलीमार्कस
- न्याय का उग्रवादी सिद्धांत: थ्रेसीमेकस
- न्याय का उदारवादी सिद्धांत: ग्लाउकन
❖ "राज्य व्यक्ति (आत्मा) का वृहद रूप है"
प्लेटो का मानना था कि जो गुण छोटे रूप में व्यक्ति के अंदर होते हैं, वही विशाल रूप में राज्य में दिखाई देते हैं। उन्होंने व्यक्ति के तीन सद्गुणों के आधार पर राज्य को तीन वर्गों में बाँटा है। इसकी तुलना भारतीय वर्ण व्यवस्था से भी की जा सकती है:
| प्रधान लक्षण | सद्गुण (व्यक्ति की आत्मा) | सर्वाधिक वर्ग (राज्य में) | भारत में (तुलनात्मक) |
|---|---|---|---|
| ज्ञान की प्रधानता | विवेक (Wisdom) | शासक / दार्शनिक वर्ग | ब्राह्मण |
| मनोवेग की प्रधानता | साहस (Courage) | सैनिक वर्ग | क्षत्रिय |
| क्षुधा / वासना की प्रधानता | संयम (Temperance) | उत्पादक वर्ग | वैश्य (तथा शूद्र) |
✦ 7. न्याय के सिद्धांत की पृष्ठभूमि
प्लेटो की महान रचना 'Republic' का मुख्य उप-शीर्षक (Title) Concerning Justice है, जिसका अर्थ है "न्याय से सम्बंधित"। सुकरात के साथ हुए घोर अन्याय के कारण ही प्लेटो ने अपनी रचनाओं में न्याय पर सर्वाधिक बल दिया है।
- न्याय का परम्परावादी सिद्धांत: इसके समर्थक सिफालस और पोलीमार्कस थे।
- न्याय का उग्रवादी सिद्धांत: इसके समर्थक थ्रेसीमेकस थे, जिनका प्रसिद्ध कथन है— "न्याय शक्तिशाली का हित है।"
- न्याय का उदारवादी सिद्धांत: इसके समर्थक ग्लाउकन थे।
✦ 8. प्लेटो का न्याय और सावयवी सम्बन्ध
प्लेटो ने न्याय के उपर्युक्त तीनों सिद्धांतों का तर्कपूर्ण खण्डन करते हुए अपने नवीन न्याय सिद्धांत का प्रतिपादन किया। प्लेटो का स्पष्ट कथन है कि— "राज्य में रहने वाले तीनों वर्गों द्वारा अपने निर्धारित कार्यों को करते हुए एक दूसरे में सामंजस्य स्थापित करना ही न्याय है।"
राज्य और व्यक्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए प्लेटो का एक अत्यंत प्रसिद्ध कथन है— "राज्य व्यक्ति का वृहद रूप है।" प्लेटो पुनः लिखते हैं कि, "राज्य का निर्माण वृक्षों और चट्टानों से नहीं होता, बल्कि उसमें रहने वाले मनुष्यों के चरित्र से होता है। जब व्यक्ति की आत्मा बाह्य रूप से प्रकट हो जाती है, तो वह राज्य बन जाती है।"
चूँकि प्लेटो एक दार्शनिक थे, इसलिए उन्होंने अपनी व्याख्या में 'व्यक्ति' के स्थान पर 'आत्मा' शब्द का प्रयोग अधिक किया है। प्लेटो ने राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध (Organic Relationship) माना है। इसका अर्थ यह है कि राज्य अपने आप में एक 'सम्पूर्ण' इकाई है और व्यक्ति उस सम्पूर्ण इकाई का मात्र एक अंग या अंश है।
✦ 9. व्यक्ति के गुण और राज्य के वर्ग
प्लेटो के अनुसार छोटे स्तर पर जो गुण किसी व्यक्ति या उसकी आत्मा में पाया जाता है, ठीक वही गुण बड़े स्तर पर राज्य में भी परिलक्षित होता है; इसीलिए राज्य को व्यक्ति का वृहद रूप कहा गया है। प्लेटो ने व्यक्ति की आत्मा में तीन मुख्य गुण बताए हैं— विवेक, साहस और वासना (क्षुधा)। इसी के अनुरूप राज्य में भी तीन वर्ग पाए जाते हैं— शासक व दार्शनिक वर्ग, सैनिक वर्ग, और उत्पादक वर्ग।
न्याय की परिभाषा को गहराई से समझाते हुए प्लेटो कहते हैं कि एक व्यक्ति को आदर्श और न्यायशील तभी माना जाता है, जब उसके भीतर मौजूद तीनों गुण (विवेक, साहस, वासना) अपने-अपने निर्धारित कार्यों को करते हुए एक-दूसरे में सामंजस्य स्थापित करें और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि नीचे वाले दोनों गुणों (साहस और वासना) का संचालन सर्वोच्च गुण 'विवेक' के द्वारा हो।
ठीक इसी प्रकार, एक राज्य को आदर्श और न्यायशील तभी माना जायेगा, जब राज्य के तीनों वर्ग अपने प्राकृतिक गुणों के अनुसार कार्य करते हुए एक-दूसरे में सामंजस्य स्थापित करें तथा नीचे वाले दोनों वर्गों (सैनिक और उत्पादक) का संचालन शासक (दार्शनिक) वर्ग द्वारा किया जाए।
| प्रधान लक्षण (Dominant Trait) | सद्गुण (Virtue) | वर्ग (Class in State) |
|---|---|---|
| ज्ञान की प्रधानता | विवेक (Wisdom) | दार्शनिक / शासक वर्ग |
| मनोवेग की प्रधानता | साहस (Courage) | सैनिक वर्ग |
| क्षुधा / वासना की प्रधानता | संयम (Temperance) | उत्पादक वर्ग |
✦ 10. प्लेटो के न्याय की प्रमुख विशेषताएँ
प्लेटो के न्याय सिद्धांत की कुछ प्रमुख विशेषताएँ (तथ्य) निम्नलिखित हैं, जिन्हें उन्होंने अपने आदर्श राज्य की स्थापना के लिए अनिवार्य माना है:
- प्लेटो का न्याय अहस्तक्षेप (Non-interference) के सिद्धांत पर आधारित है।
- प्लेटो का न्याय कार्य विशेषीकरण (Functional Specialization) के सिद्धांत पर आधारित है।
- प्लेटो के न्याय को न्याय का प्रकल्पमूलक सिद्धांत (Architectonic Theory) कहा जाता है (जिसका अर्थ है - बिखरी हुई चीजों को मिलाकर बनायी गयी एक सुव्यवस्थित वस्तु)।
- प्लेटो का न्याय भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था के अनुरूप है, अर्थात यह 'स्वधर्म' के पालन पर बल देता है।
- इसे न्याय का सामंजस्य सिद्धांत भी कहा जाता है, क्योंकि प्लेटो का न्याय समाज में अनेकता में एकता की स्थापना करता है।
- प्लेटो का न्याय स्वकर्तव्य मूलक पर आधारित है।
✦ 11. आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन और निष्कर्ष
विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने प्लेटो के न्याय सिद्धांत की समीक्षा की है और इसके संदर्भ में अपने महत्वपूर्ण कथन दिए हैं:
- 👉 बार्कर (Barker) का कथन: "प्लेटो का न्याय वास्तव में न्याय नहीं है, बल्कि मनुष्यों को अपने कर्तव्यों तक सीमित रखने की एक भावना मात्र है।"
- 👉 बार्कर पुनः लिखते हैं: "न्याय Republic की आधारशिला है और Republic न्याय का संस्थागत रूप।"
- 👉 सेबाइन (Sabine) के अनुसार: "प्लेटो का न्याय काल्पनिक, आत्मपरक, जड़, अनैतिक और निष्क्रिय है।"
- 👉 कार्ल पापर (Karl Popper) के अनुसार: "प्लेटो विशेषाधिकारों को न्यायपूर्ण कहकर पुकारता है, जबकि हम विशेषाधिकारों के अभाव को ही न्याय कहते हैं।"
❖ महत्वपूर्ण निष्कर्ष
ध्यान रहे कि: प्लेटो अपने न्याय को सामाजिक न्याय (Social Justice) कहकर पुकारता है। जबकि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में हम उसे सामाजिक न्याय की संज्ञा नहीं दे सकते, क्योंकि वास्तविक 'सामाजिक न्याय' तो आज बीसवीं सदी की देन है। जो विशेषाधिकारों का उन्मूलन करती है।
✦ 12. दार्शनिक राजा (Philosopher King) की अवधारणा
प्लेटो के समस्त राजनीतिक विचारों के शीर्ष पर एक दार्शनिक राजा बैठा हुआ है। राजनीतिक विचारक फोस्टर (Foster) ने इसे प्लेटो का सबसे मौलिक विचार बताया है। प्लेटो का मानना था कि यही दार्शनिक राजा राज्य में वास्तविक न्याय की स्थापना करेगा।
❖ दार्शनिक राजा का स्वरूप (Diagram)
राज्य ➔ दार्शनिक राजा (विवेक) ➔ निर्लिप्त बुद्धि द्वारा शासन ➔ निरपेक्ष ज्ञानी
चूँकि प्लेटो के गुरु सुकरात को राज्य के तत्कालीन कानून के अंतर्गत विषपान करना पड़ा था, इसलिए प्लेटो को 'कानून के राज्य' से घृणा हो गई। उन्होंने कहा कि शासक ऐसा होना चाहिए जिसकी बुद्धि निर्लिप्त हो और वह निरपेक्ष ज्ञानी हो, ताकि राज्य में वह 'अपने व पराये' में कोई भेदभाव न कर सके। अतः दार्शनिक राजा के शासन का आधार 'विवेक' होगा, 'कानून' नहीं।
✦ 13. दार्शनिक राजा: उदाहरण और आलोचना
दार्शनिक राजा की आवश्यकता को सिद्ध करने के लिए प्लेटो दैनिक जीवन का उदाहरण देते हैं कि जब किसी व्यक्ति का जूता या चप्पल टूट जाता है, तो वह एक कुशल मोची की तलाश करता है। और जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो वह एक योग्य चिकित्सक की तलाश करता है, किसी वाक्पटु (सिर्फ अच्छा बोलने वाले) व्यक्ति की नहीं। तो आज अगर सम्पूर्ण नगर-राज्य ही बीमार है, तो एक 'साधारण शासक' से कैसे काम चलेगा?
यद्यपि प्लेटो का यह विचार बहुत आदर्श था, लेकिन आगे चलकर दार्शनिक राजा के इस विचार की कटु आलोचना हुई:
- 👉 लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) का कथन: "सत्ता लोगों को भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण भ्रष्ट करती है।" (क्योंकि प्लेटो ने दार्शनिक राजा को असीमित शक्तियाँ दे दी थीं)
- 👉 कार्ल पापर (Karl Popper) का कथन: "प्लेटो स्वयं दार्शनिक है और रिपब्लिक दार्शनिक बनाये जाने का दावा।"
निष्कर्ष: दार्शनिक राजा विचारों का राजा है। यह पूरी तरह से एक काल्पनिक राजा है। इसे धरातल पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। ध्यान रखें कि 'निरपेक्ष ज्ञानी' केवल सत्यम, शिवम, सुंदरम (ईश्वर) ही हो सकता है, जिसे इस धरातल (पृथ्वी) पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
✦ 14. प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था और समानता
प्लेटो इतिहास का पहला विचारक है जिसने स्त्री और पुरुष में पूर्ण समानता मानी। उसके अनुसार स्त्रियाँ भी शासक और सैनिक बन सकती हैं। प्लेटो कहता है कि स्त्री और पुरुष में केवल शारीरिक 'शक्ति' का अंतर है, बौद्धिक क्षमता का नहीं। प्लेटो का प्रसिद्ध कथन है— "एक शक्तिशाली स्त्री कमजोर पुरुष है, और एक कमजोर पुरुष एक शक्तिशाली स्त्री है।"
❖ शिक्षा का अधिकार और वर्गों का विभाजन
प्लेटो ने राज्य में शासक, सैनिक और उत्पादक— इन तीन वर्गों की चर्चा की है। इनमें से शासक और सैनिक वर्ग को मिलाकर उसने अभिभावक वर्ग (या संरक्षक वर्ग) कहा है। प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था केवल इसी अभिभावक वर्ग (स्त्रियों व पुरुषों दोनों) पर समान रूप से लागू होती है।
| मुख्य वर्ग | उप-वर्ग (राज्य के वर्ग) | शिक्षा का अधिकार |
|---|---|---|
| अभिभावक / संरक्षक वर्ग (Guardian Class) |
शासक (दार्शनिक) वर्ग | प्राप्त है (उच्च शिक्षा तक) |
| सैनिक वर्ग | प्राप्त है (प्राथमिक शिक्षा) | |
| उत्पादक वर्ग (Producer Class) | किसान, कारीगर, मजदूर | शिक्षा से पूर्णतः वंचित |
(नोट: यद्यपि कुछ लेखकों का मानना है कि उत्पादक वर्ग के बच्चों को भी प्राथमिक शिक्षा दी जाती थी, लेकिन इसके पीछे कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।)
✦ 15. शिक्षा के उद्देश्य और प्राथमिक शिक्षा
प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था के महत्व को देखते हुए विभिन्न विचारकों ने इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की है:
- 👉 रूसो (Rousseau): "रिपब्लिक राजनीति पर नहीं, वरन शिक्षा पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है।"
- 👉 बार्कर (Barker): "शिक्षा मानसिक रोगों को दूर करने की मानसिक औषधि है।"
- 👉 जौबेट (Joubert): "प्लेटो के अनुसार शिक्षा का क्रम आजीवन चलना चाहिए।"
❖ शिक्षा का प्रथम चरण: प्राथमिक शिक्षा
प्लेटो अपनी सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटता है— (1) प्राथमिक शिक्षा और (2) उच्च शिक्षा।
प्राथमिक शिक्षा: यह शिक्षा किशोरावस्था के लिए निर्धारित है और इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को 'सैनिक' बनाना है। प्लेटो ने प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से दो विषयों को शामिल किया है— व्यायाम (Gymnastics) और संगीत (Music)।
- प्लेटो का कथन: "व्यायाम शरीर का भोजन है और संगीत आत्मा का भोजन है।"
- संगीत का प्रभाव: "जब संगीत के स्वर निकलते हैं तो राष्ट्र के कानून बदल जाते हैं।"
- राज्य और संगीत: प्लेटो पुनः लिखते हैं कि— "मुझे राष्ट्र के लिए संगीत लिखने दो, मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि शासन कौन चला रहा है।"
✦ 16. शिक्षा का दूसरा चरण: उच्च शिक्षा
प्लेटो की उच्च शिक्षा प्रौढ़ावस्था के लिए निर्धारित है और इसका मुख्य उद्देश्य दार्शनिक बनाना है। जो छात्र इस शिक्षा में उत्तीर्ण हो जायेंगे, वे लम्बे समय तक जीवन का अनुभव लेंगे और निरपेक्ष ज्ञानी होने पर सत्ता सम्भालेंगे।
ध्यान रहे कि शिक्षा की तार्किक चरम परिणति न्याय व्यवस्था में होती है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य आत्म संयम तथा अपने कर्तव्य व दायित्व का बोध कराना है।
✦ 17. प्लेटो का साम्यवाद (Communism)
साम्यवाद का शाब्दिक अर्थ है किसी वस्तु से निजी स्वामित्व को हटाकर उस पर सार्वजनिक स्वामित्व की स्थापना करना। प्लेटो का साम्यवाद केवल अभिभावक (शासक व सैनिक श्रेणी) वर्ग के स्त्रियों और पुरुषों पर समान रूप से लागू होता है। यह साम्यवाद उत्पादक वर्ग पर लागू नहीं होता।
❖ साम्यवाद का वर्गीकरण (Diagram)
अभिभावक वर्ग (शासक + सैनिक) ➔ साम्यवाद ➔ (1) सम्पत्ति का साम्यवाद + (2) परिवार का साम्यवाद
(यहाँ अभिभावक वर्ग के स्त्री व पुरुष दोनों में समानता मानी गई है।)
✦ 18. साम्यवाद के प्रावधान और प्रमुख उद्देश्य
प्लेटो ने सम्पत्ति और परिवार के क्षेत्र में साम्यवाद लागू किया। उनके अनुसार अभिभावक वर्ग के स्त्री व पुरुष शादी-विवाह नहीं करेंगे तथा उनका अपना निजी घर नहीं होगा। सोना, चाँदी व अन्य प्रकार की सम्पत्ति उनके पास नहीं होगी। वह बैरकों में साथ-साथ रहेंगे। सभी स्त्रियों का सभी पुरुषों के साथ सम्बन्ध होगा ताकि जन्म लेने वाला बच्चा अपने पिता की पहचान न कर सके।
प्रसव के बाद बच्चे को तत्काल माँ के पास से हटाकर सार्वजनिक बच्चों में मिला दिया जायेगा, जिससे माता-पिता बच्चे की और बच्चे माता-पिता की पहचान नहीं कर पायेंगे।
- इससे लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन कर सकेंगे।
- स्त्रियों को घर की चहारदीवारी से मुक्ति मिल सकेगी।
- शासक को भ्रष्टाचार से बचाया जा सकता है।
- इससे राज्य में न्याय की स्थापना करने में मदद मिलेगी।
✦ 19. साम्यवाद पर विचारकों की टिप्पणियाँ
प्लेटो के इस उग्र साम्यवादी विचार की विभिन्न विचारकों ने आलोचना और समीक्षा की है:
- 👉 अरस्तू (Aristotle): "प्लेटोवादी पुत्र होने की अपेक्षा निकट का रिश्तेदार होना अच्छा है।" अरस्तू पुनः कहते हैं - "जिस प्रकार थोड़ी सी स्वादिष्ट मदिरा में जल की अधिक मात्रा मिला देने पर मदिरा अपना स्वाद खो देती है, उसी प्रकार पिता पुत्र के नाम से सूचित रिश्ता भी शिथिल पड़ जाता है।"
- 👉 कार्ल पापर (Karl Popper): कार्ल पापर ने प्लेटो को प्रथम फाँसीवादी विचारक कहा है।
- 👉 नेटर्प (Natorp): नेटर्प ने प्लेटो के साम्यवाद को अर्द्ध साम्यवाद की संज्ञा दी है।
- 👉 बार्कर (Barker): "यह त्याग की मांग है और यह मांग सर्वश्रेष्ठ से किया गया है।"
- 👉 मैक्सी (Maxey): "यदि प्लेटो आज जीवित होता तो आधुनिक साम्यवादियों से अधिक साम्यवादी होता।"
| प्लेटो और मार्क्स के साम्यवाद में तुलना | |
|---|---|
| मुख्य अंतर: प्लेटो का साम्यवाद राजनीतिक (Political) है, जबकि मार्क्स का साम्यवाद आर्थिक (Economic) है। | |
| मुख्य समानता: दोनों में मुख्य समानता यह है कि दोनों 'राज्य या समाज' को सर्वाधिक महत्व देते हैं। | |
(ध्यान रहे कि प्लेटो उत्पादक वर्ग को सम्पत्ति रखने और शादी विवाह की छूट देता है।)
✦ 20. स्टेट्समैन और लॉज में विचार
Statesman और Laws, ये दोनों पुस्तकें प्लेटो के अंतिम जीवन के विचार को व्यक्त करती हैं। प्लेटो ने जीवन के अंतिम समय में यह स्वीकार किया कि आदर्श राज्य को धरातल पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। जब उन्हें जीवन की वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो उन्होने अपने विचारों को बदलने का प्रयास किया और Statesman में जो कुछ कहा है, उसकी चरम परिणति Laws में देखने को मिलती है।
स्टेट्समैन का शाब्दिक अर्थ है Politics जिसका अर्थ है राजपुरुष या राजमर्मज्ञ। प्लेटो ने स्टेट्समैन में उपादर्श राज्य (Sub-ideal state) या मिश्रित राज्य की बात कही है। उन्होंने स्वीकार किया कि आदर्श राज्य व दार्शनिक राजा प्राप्त नहीं किया जा सकता, अतः शासक के ऊपर कुछ कानूनों का प्रतिबंध होना चाहिए।
❖ स्टेट्समैन में राज्य का वर्गीकरण
- कानून प्रिय राज्य: यदि शासक कानून से बंधा है, तो 'राजतंत्र' श्रेष्ठ होगा और 'प्रजातंत्र' निकृष्ट।
- कानून विहीन राज्य: यदि शासक कानून से बंधा नहीं है, तो 'प्रजातंत्र' श्रेष्ठ होगा और 'राजतंत्र' निकृष्ट।
✦ 21. रिपब्लिक और लॉज में प्रमुख अंतर
प्लेटो ने अपनी अंतिम पुस्तक लॉज (Laws) लिखी, जो आकार में उनका सबसे बड़ा ग्रंथ है। स्टेट्समैन की बातें लॉज में पूर्णतः प्राप्त होती हैं और रिपब्लिक में दिये गये विचारों को इसमें पूरी तरह बदल दिया गया है:
| विषय | रिपब्लिक (Republic) | लॉज (Laws) |
|---|---|---|
| राज्य का स्वरूप | आदर्श राज्य की स्थापना का प्रावधान। | उपादर्श या मिश्रित राज्य की बात। |
| शासन का आधार | दार्शनिक राजा का आधार विवेक है, कानून का कोई बंधन नहीं। | शासक को पूर्णतः कानून के अधीन कर दिया गया। |
| शिक्षा व्यवस्था | केवल अभिभावक वर्ग के बच्चों के लिए, वह भी केवल सरकारी शिक्षा। | उत्पादक वर्ग के बच्चों को भी शिक्षा, सरकारी के साथ निजी शिक्षा भी। |
| सम्पत्ति व परिवार | अभिभावक वर्ग को इनसे वंचित कर साम्यवाद लागू किया गया। | अभिभावक वर्ग को भी सम्पत्ति व परिवार रखने की इजाजत दे दी गई। |
✦ 22. प्लेटो के राजनीतिक दर्शन का निष्कर्ष
ध्यान रहे कि भले ही प्लेटो ने अपने अंतिम समय में शासक को कानूनों के अधीन कर दिया, लेकिन उन्होने इस बात को हमेशा माना कि शासक को विवेकवान होना चाहिए।
पाश्चात्य जगत में प्लेटो का सर्वाधिक महत्व उनकी पुस्तक रिपब्लिक के ही कारण है, क्योंकि उन्होंने इसमें जिन भी आदर्शों को बताया है, उसे तर्कों के साथ सही सिद्ध करने का पूरा प्रयास किया है।
प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य की कुल जनसंख्या 5040 होनी चाहिए।

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