| स्वतंत्रता (Liberty): अर्थ, ऐतिहासिक विकास और प्रमुख सिद्धान्त |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस प्रीमियम लेख में 'स्वतंत्रता' (Liberty) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता के रूप, और जे. एस. मिल, हर्बर्ट स्पेंसर व जॉन लॉक जैसे प्रमुख विचारकों के सिद्धान्तों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह राजनीति विज्ञान की आगामी परीक्षाओं TGT, PGT, LT, GIC, UGC NET/JRF UPSC के लिए बेहद उपयोगी है। |
- 1. स्वतंत्रता: प्रस्तावना, मूल अवधारणा एवं ऐतिहासिक विकास
- 2. स्वतंत्रता के दो प्रमुख रूप: नकारात्मक (Liberty) और सकारात्मक (Freedom)
- 3. नकारात्मक स्वतंत्रता: अर्थ, मान्यताएँ एवं प्रमुख समर्थक
- 4. हर्बर्ट स्पेंसर का दृष्टिकोण: वैज्ञानिक व्यक्तिवाद और सावयवी सिद्धान्त
- 5. जे. एस. मिल (J.S. Mill) के विचार: पुस्तक 'On Liberty' और स्वतंत्रता का प्रबल समर्थन
- 6. मिल द्वारा मानव कार्यों का विभाजन: स्वाविषयक और परविषयक कार्य
- 7. नकारात्मक स्वतंत्रता की आलोचना एवं निष्कर्ष (सीले का कथन)
- 8. सकारात्मक स्वतंत्रता: 20वीं शताब्दी की देन, अर्थ एवं मूल अवधारणा (Coming Soon)
- 9. सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थक
- 10. एच. जे. लास्की (H.J. Laski) का विचार
- 11. समकालीन स्वतंत्रता एवं नव-उदारवाद
- 12. समकालीन नकारात्मक स्वतंत्रता
- 13. समकालीन सकारात्मक स्वतंत्रता
- 14. स्वतंत्रता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण
✦ 1. स्वतंत्रता: प्रस्तावना, मूल अवधारणा एवं ऐतिहासिक विकास
स्वतंत्रता उदारवाद (पूंजीवाद, व्यक्तिवाद) की केन्द्रीय अवधारणा है। स्वतंत्रता आधुनिक काल की देन है और इसे पुनर्जागरण आन्दोलन की संतान माना जाता है। स्वतंत्रता और समानता का उदय एक साथ हुआ और यह व्यावहारिक रूप से फ्रांसीसी क्रांति के बाद अस्तित्त्व में आयी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (प्राचीन एवं मध्य काल):
प्राचीन काल और मध्य काल विशेषाधिकारों (व्यक्ति विशेष का अधिकार) पर आधारित था। वहाँ न कोई स्वतंत्रता थी और न कोई समानता। इसे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते हैं:
- प्लेटो: समाज 3 वर्गों में (शासक, सैनिक, उत्पादक) - प्राकृतिक आधार पर वर्गीकरण।
- अरस्तू: समाज 2 वर्गों में (स्वामी और दास)।
- किसान ➔ जमींदार ➔ जागीरदार ➔ राजा
- (विशेषाधिकारों का बोलबाला)
पुनर्जागरण आन्दोलन और आधुनिक काल का उदय:
स्वतंत्रता आधुनिक काल की देन है। पुनर्जागरण आन्दोलन (ज्ञानोदय) ने स्थापित किया कि "मानव ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है।" इसी मानववाद से व्यक्तिवाद का जन्म हुआ, जिसने स्वतंत्रता और समानता को जन्म दिया।
16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक स्वतंत्रता का व्यक्तिवादी या नकारात्मक रूप प्रचलित रहा जिसे Liberty नाम से जाना गया (जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत हित था)। लेकिन 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता का सकारात्मक रूप सामने आया जिसे Freedom कहा गया (जिसका उद्देश्य सार्वजनिक हित है)।
✦ 2. स्वतंत्रता के दो प्रमुख रूप: नकारात्मक और सकारात्मक
स्वतंत्रता को मुख्य रूप से दो कालों और रूपों में विभक्त किया जाता है। एक जो 16वीं सदी से शुरू हुआ और दूसरा जो 20वीं सदी में उभरा:
| ① नकारात्मक स्वतंत्रता (Liberty) | ② सकारात्मक स्वतंत्रता (Freedom) |
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एडम स्मिथ का आर्थिक दृष्टिकोण:
नकारात्मक स्वतंत्रता के दौर में आर्थिक क्षेत्र में एडम स्मिथ (Adam Smith) ने अपनी पुस्तक "Wealth of Nation" में अहस्तक्षेप की नीति का समर्थन किया। उनके अनुसार:
व्यक्तियों की आय का योग (x+y+z=xyz)
व्यक्तियों का योग मात्र
उदारवाद (निजी) + समाजवाद (सार्वजनिक) = लोककल्याणकारी राज्य
✦ 3. नकारात्मक स्वतंत्रता: अर्थ, मान्यताएँ एवं प्रमुख समर्थक
नकारात्मक स्वतंत्रता को अंग्रेजी में 'Liberty' कहते हैं, जो कि लैटिन भाषा के शब्द 'Liber' से निकला है, जिसका अर्थ है "प्रतिबंधों का अभाव" अर्थात् राज्य व्यक्ति से सारे प्रतिबंध हटा ले और सभी व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए खुला छोड़ दे।
- नकारात्मक स्वतंत्रता उदारवाद की देन है और यह विशेषाधिकारों के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में अस्तित्व में आई।
- इसका दृष्टिकोण व्यक्तिवादी है।
- नकारात्मक स्वतंत्रता राज्य को केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय तक सीमित कर देती है। यह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में राज्य को हस्तक्षेप करने से मना करती है। राज्य तभी हस्ताक्षेप करेगा जब कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के उसी प्रकार की स्वतंत्रता में कोई बाधा डालने का प्रयत्न करता है।
- नकारात्मक दृष्टिकोण से संघर्ष बढ़ता है और संघर्ष से असमानता आती है।
प्रमुख समर्थक:
नकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थकों को नकारात्मक उदारवादी या व्यक्तिवादी कहते हैं। इनमें जॉन लॉक, ह्यूम, एडम स्मिथ, हर्बर्ट स्पेंसर, जे. एस. मिल, डी. टॉकविल, लार्ड एक्टन आदि का नाम आता है। इनमें लॉक, स्मिथ, स्पेंसर और मिल का स्थान अति महत्वपूर्ण है। इन व्यक्तिवादियों के अनुसार— "राज्य एक आवश्यक बुराई है।"
लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार को प्राकृतिक अधिकार माना। उन्होंने कहा कि राज्य इसकी रक्षा करे। लॉक कहते हैं कि राज्य को स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानून का निर्माण करना चाहिए।
इस बात का समर्थन माल्थस और रिकार्डो ने भी किया। एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक The wealth of Nation में आर्थिक मानव के विचार का समर्थन किया। एडम स्मिथ का मानना है कि राष्ट्रीय आय व्यक्ति की आय का योग है। यदि आर्थिक क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, तो वह अपनी आय में वृद्धि कर लेगा, इस तरह राष्ट्रीय आय में स्वमेव वृद्धि हो जायेगी।
✦ 4. हर्बर्ट स्पेंसर का दृष्टिकोण: वैज्ञानिक व्यक्तिवाद
नकारात्मक स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) को माना जाता है। स्पेंसर ने व्यक्तिवाद को चरम सीमा पर पहुँचाया, इसलिए उन्हें वैज्ञानिक व्यक्तिवाद का जनक माना जाता है। स्पेंसर मूलतः एक समाजशास्त्री थे।
सावयवी सिद्धान्त (Organic Theory):
स्पेंसर पहले विचारक हैं जिन्होंने सावयवी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। वह राज्य या समाज की तुलना 'शरीर' से करते हैं तथा व्यक्ति की तुलना 'शरीर के अंगों' से करते हैं। उनका मानना है कि "जिस प्रकार से शरीर का अंग शरीर के विकास के साथ यदि अपना विकास नहीं करता तो उसका नष्ट हो जाना ही अच्छा है, उसी प्रकार समाज में जो व्यक्ति समाज के अनुरूप अपने आपको फिट नहीं कर पाता, उसका नष्ट हो जाना ही अच्छा है।"
इस प्रकार स्पेंसर ने "योग्यतम की उत्तरजीविता" (Survival of the fittest) और "प्राकृतिक चयन के सिद्धान्त" (Natural co-ordination theory) का प्रतिपादन किया। यह थ्योरी व्यक्तिवाद की पराकाष्ठा है।
स्पेंसर राज्य के न्यूनतम कार्य के पक्षधर हैं। हर्बर्ट स्पेंसर कहते हैं कि राज्य को आंतरिक दुश्मनों तथा बाह्य दुश्मनों से रक्षा करना तथा न्याय तक ही राज्य को सीमित रहना चाहिए और किसी भी स्थिति में व्यक्ति के स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Man V/s State" में राज्य को व्यक्ति का शत्रु बताया है, और अपनी पुस्तक "Social Statics" में कहा है कि एक आदर्श दशा वह है जिसमें राज्य नाम की कोई चीज़ ही न हो।
✦ 5. जे. एस. मिल (J.S. Mill) के विचार: स्वतंत्रता का प्रबल समर्थन
जे. एस. मिल नकारात्मक स्वतंत्रता के सबसे प्रबल पक्षधर माने जाते हैं। मिल ईस्ट इंडिया कम्पनी में सचिव थे और इंग्लैण्ड के सांसद भी रहे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'On Liberty' है।
इस कथन से निम्नलिखित दो बातें स्पष्ट होती हैं:
- मस्तिष्क का अभिप्राय: इसका अर्थ 'भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से है। यह राजनीतिक स्वतंत्रता है।
- शरीर का अर्थ: इसका अभिप्राय 'कार्य करने की स्वतंत्रता' (नागरिक स्वतंत्रता/घूमने-फिरने) से है।
भाषण एवं अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता:
मिल भाषण व अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता के पक्षधर थे। यहाँ तक कि मिल पागलों, मूर्खों और सनकियों को भी बोलने की स्वतंत्रता देना चाहते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन है कि— "दस सनकी व्यक्तियों में से नौ निरर्थक/बुद्धू हो सकते हैं, लेकिन दसवाँ व्यक्ति समाज के लिए इतना महत्वपूर्ण हो सकता है कि अनेकों व्यक्ति मिलकर भी नहीं हो सकते।"
नोट: जे. एस. मिल सांसदों की स्वतंत्र विवेकशीलता के पक्षधर थे और सांसदों को बोलने की असीमित आजादी देना चाहते थे।
✦ 6. मिल द्वारा मानव कार्यों का विभाजन
जे. एस. मिल ने 'शरीर की स्वतंत्रता' अर्थात् कार्य करने की स्वतंत्रता को दो प्रमुख भागों में बाँटा है:
① स्वाविषयक कार्य (Self-regarding Actions)
व्यक्ति के स्वाविषयक कार्य वे कार्य हैं जिनका सम्बन्ध स्वयं से होता है, जिनको करने से समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मिल कहता है कि व्यक्ति के ऐसे कार्यों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अपवाद: लेकिन आत्मरक्षा के आधार पर वह हस्तक्षेप को उचित ठहराता है (जैसे: आत्महत्या को रोकना)। "मानव जाति व्यक्ति की स्वतंत्रता में एक ही आधार पर हस्तक्षेप कर सकती है, वह है आत्मरक्षा।"
② परविषयक कार्य (Other-regarding Actions)
व्यक्ति के ऐसे कार्य जिसको करने से समाज पर प्रभाव पड़ता है (अन्य संबंधी कार्य)। ऐसे कार्यों में राज्य (सरकार) हस्तक्षेप कर सकता है और प्रतिबंध लगा सकता है।
मिल की आलोचना (बार्कर का दृष्टिकोण):
जे. एस. मिल के स्वतंत्रता विषयक विचार की कड़ी आलोचना हुई। प्रसिद्ध विचारक बार्कर (Barker) ने मिल को "खोखली स्वतंत्रता का वाहक" कहा है। चूँकि आज मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी के रूप में देखा जाता है, इसलिए व्यक्ति के हर प्रकार की स्वतंत्रता पर सामाजिक हित के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यहाँ तक कि आज 'आत्महत्या' को भी दण्डनीय अपराध माना गया है।
✦ 7. नकारात्मक स्वतंत्रता की आलोचना एवं निष्कर्ष
जे. एस. मिल अधिक पढ़े-लिखे एवं विद्वान व्यक्ति थे अतः उनका दृष्टिकोण 'कबीर पंथी' था। उनका मानना था कि समाज की अच्छी बात ग्रहण कर लेना चाहिए और बुरी बात छोड़ देना चाहिए।
महत्वपूर्ण कथन (NOTE):
- सीले (Seeley) के अनुसार: "स्वतंत्रता अतिशासन का विलोम है।"
- सीले (Seeley) के अनुसार: "पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ है सरकार का पूर्णतः न होना।"
- जे. एस. मिल के अनुसार: "सच्ची स्वतंत्रता वह है जिसमें हम अपने तरीके से अपनी भलाई (सुख) ढूँढ सकें, बशर्ते कि (या जब तक कि) हम दूसरों को उनके सुख से वंचित न करें या उनके प्रयासों में बाधा न डालें।"
निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि नकारात्मक स्वतंत्रता ने लोगों के बीच विषमता (Inequality) को बढ़ा दिया। इससे पुनः एक विषमता मूलक समाज का जन्म हुआ। क्योंकि नकारात्मक स्वतंत्रता सामाजिक और आर्थिक स्थिति को देखे बिना सबको बराबर स्वतंत्रता देने का समर्थन करती है।
राजनीतिक स्वतंत्रता और कानूनी स्वतंत्रता को नकारात्मक स्वतंत्रता के अंतर्गत रखा जा सकता है, लेकिन समाज के वास्तविक कल्याण के लिए 20वीं शताब्दी में 'सकारात्मक स्वतंत्रता' का उदय अनिवार्य हो गया।
✦ 8. सकारात्मक स्वतंत्रता: 20वीं शताब्दी की देन, अर्थ एवं मूल अवधारणा
सकारात्मक स्वतंत्रता 20वीं शताब्दी की देन है। इसके लिए अंग्रेजी में 'Freedom' शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है— "अनुचित प्रतिबंधों का अभाव और उचित प्रतिबंधों की उपस्थिति।" अर्थात् व्यक्ति से ऐसे प्रतिबंध हटाए जाएं जो उसके व्यक्तित्व विकास में बाधा हैं, लेकिन उस पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाएं जो सामाजिक हित में आवश्यक हैं।
सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करने का नाम है। यह मनुष्य को एक 'सामाजिक प्राणी' के रूप में देखती है। इसका मानना है कि सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर ही मनुष्य को स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
"विषमता क्रांति की जननी है।" — अरस्तू
(इसी विषमता को दूर करने के लिए सकारात्मक स्वतंत्रता ने अवसर की समानता पर बल दिया।)
स्वतंत्रता के दृष्टिकोणों की तुलना (Liberty vs Freedom):
| नकारात्मक दृष्टिकोण (Liberty) | सकारात्मक दृष्टिकोण (Freedom) |
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राज्य और स्वतंत्रता में संबंध:
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक राज्य और व्यक्ति के बीच कोई विरोध नहीं देखते। वे मानते हैं कि राज्य एक सकारात्मक संस्था है। राज्य की उपस्थिति में ही व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति कर सकता है। उनके अनुसार, राज्य के उचित कानून स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक न होकर स्वतंत्रता की सुरक्षा करते हैं।
सकारात्मक स्वतंत्रता समाज के वंचित और शोषित वर्गों की स्वतंत्रता को कायम करने के लिए व्यक्तियों पर उचित प्रतिबंध लगाने की बात करती है। इसका उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना है जिससे लोगों के सामाजिक और आर्थिक हित सुनिश्चित हो सकें जैसे— एक विकलांग व्यक्ति को कृत्रिम अंग देना, अनपढ़ व्यक्ति को शिक्षा देना, या बेरोजगार व्यक्ति को काम देना स्वतंत्रता की धारणा का सकारात्मक पहलू है अतः स्पष्ट है की स्वतंत्रता व्यक्तिगत होने के साथ-साथ सामाजिक धारणा है।
✦ 9. सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थक और उनके कथन
सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थकों में टी. एच. ग्रीन, एच. जे. लास्की, रूसो, हॉबहाउस, मैकाइवर, हीगल, बोसांके, लिण्डसे व बार्कर आदि का नाम आता है। ये विचारक सकारात्मक उदारवादी, लोक कल्याणकारी राज्य के समर्थक तथा समाजवादी माने जाते हैं।
टी. एच. ग्रीन (T. H. Green) के विचार:
ग्रीन को सकारात्मक उदारवाद का जनक माना जाता है। उनके अनुसार, "आत्म तत्व समाज तत्व है और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा राज्य एक सकारात्मक संस्था है।" अतः स्वतंत्रता की अनुभूति प्रतिबंधों के अभाव में नहीं, बल्कि उचित प्रतिबंधों की उपस्थिति में है।
यहाँ योग्य का अर्थ 'सामाजिक हित' से है। ग्रीन पुनः लिखते हैं:
ग्रीन का मानना है कि राज्य एक सकारात्मक संस्था है और राज्य का कार्य ऐसा होना चाहिए कि व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य मार्ग की स्वतंत्रता में आने वाली बाधाएं दूर हों (अर्थात् 'बाधाओं को बाधित करना')।
अन्य प्रमुख विचारकों के प्रसिद्ध कथन:
- हॉबहाउस के अनुसार: "एक व्यक्ति की निरंकुश स्वतंत्रता का अर्थ है अन्य सभी पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े जायेंगे।"
- हॉब्सन के अनुसार: "भूख से मरते हुए व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का क्या लाभ, वह उसे न खा सकता है और न पी सकता है।"
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रूसो के अनुसार: "सच्ची स्वतंत्रता अनुशासन का पालन करने में है।"
(रूसो पुनः कहते हैं: "राज्य की नीति ऐसी होनी चाहिए कि न अमीरों की संख्या बढ़े और न ही भिखमंगों की।") - लेनिन के अनुसार: "राज्य में कोई व्यक्ति इतना अमीर न हो कि वह दूसरों को खरीद सके और कोई व्यक्ति इतना गरीब न हो कि वह खुद को बेच सके।"
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कांट (Kant) के अनुसार: कांट नैतिक स्वतंत्रता के पक्षधर हैं।
"जो व्यक्ति अपनी निम्न प्रवृत्तियों के अनुसार कार्य करता है, वह स्वतंत्र नहीं वरन गुलाम है। सच्ची स्वतंत्रता पारलौकिक बुद्धि के अनुसार कार्य करने में है।" - हीगल (Hegel) के अनुसार: "व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति केवल राज्य में ही रहकर कर सकता है।"
- बोसांके (Bosanquet) के अनुसार: "नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ था - स्वतंत्रता किससे (प्रतिबंधों का अभाव)। जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है - स्वतंत्रता किसके लिए (अर्थात उन सभी परिस्थितियों की उपस्थिति जो व्यक्ति के स्वतंत्र एवं संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं, जिन्हें सुरक्षित करना राज्य का कर्तव्य है)।"
✦ 10. एच. जे. लास्की (H.J. Laski) का विचार: प्रकार एवं सुरक्षा की शर्तें
सकारात्मक स्वतंत्रता की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति एच. जे. लास्की ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "A Grammar of Politics" में की है। लास्की ने स्वतंत्रता की प्रकृति बताते हुए लिखा है:
स्वतंत्रता अधिकार की देन है, लास्की स्वतंत्रता को केवल प्रतिबंधों का अभाव नहीं मानते क्योंकि मनुष्य के सभी व्यवहार सामाजिक होते हैं, और मनुष्य जो भी करना चाहता है, वह समाज का एक सदस्य होने के नाते कर सकता है। लास्की स्वतंत्रता को अवसरों की उपलब्धि के साथ जोड़ते हैं। अर्थात् स्वतंत्रता वह अवसर है जो ऐतिहासिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक होते हैं और अधिकारों से पृथक स्वतंत्रता की कोई कल्पना नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्वतंत्रता में अधिकार निहित है।
लास्की के अनुसार स्वतंत्रता के 3 प्रकार:
लास्की ने स्वतंत्रता को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा है:
- वैयक्तिक स्वतंत्रता (Personal Liberty): इसका संबंध व्यक्ति के निजी जीवन से है (जैसे - धर्म की स्वतंत्रता)।
- राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty): इसका अर्थ है कि बिना किसी भेदभाव के सबको राजनीतिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी प्राप्त हो।
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आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty): इसका अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को दैनिक रोजी-रोटी की चिंता से मुक्ति मिले।
(आर्थिक स्वतंत्रता से लास्की का अभिप्राय 'उद्योगों में प्रजातंत्र' से है - अर्थात् उद्योगों में भाईचारा हो।)
स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए लास्की की 3 शर्तें:
लास्की ने स्वतंत्रता की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित 3 आवश्यक शर्तें बताई हैं:
(End of Privileges)
(Availability of Opportunities)
(Govt. Accountability)
✦ 11. समकालीन स्वतंत्रता एवं नव-उदारवाद का उदय (1970 का दशक)
औद्योगिक क्रांति के बाद व्यक्तिवाद पूँजीवाद के नाम में परिवर्तित हो गया। 20वीं शताब्दी के 8वें दशक (1970 के दशक में) समकालीन स्वतंत्रता या नव-उदारवाद (Neo-Liberalism) / उदारीकरण का उदय हुआ। नव-उदारवाद के जनक राज्य को "Night watchman" (रात्रि प्रहरी) कहते हैं।
उदारवाद से समकालीन स्वतंत्रता तक का विकासक्रम:
समकालीन स्वतंत्रता के विचारकों ने स्वतंत्रता का अर्थ "जोर जबरदस्ती का अभाव" माना है, और "आत्म स्वामित्व के प्राकृतिक सिद्धान्त" का प्रतिपादन किया।
✦ 12. समकालीन नकारात्मक स्वतंत्रता: प्रमुख विचारक एवं दृष्टिकोण
यद्यपि 20वीं शताब्दी में नकारात्मक स्वतंत्रता, सकारात्मक स्वतंत्रता में बदल गई थी, लेकिन कुछ समकालीन चिंतकों ने नकारात्मक स्वतंत्रता को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इन लोगों ने भी राज्य को सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय तक सीमित रखने की बात की। इसके प्रमुख समर्थक माइकल ओकशॉट (Oakeshott), आइज़िया बर्लिन, रॉबर्ट नोजिक, मिल्टन फ्रीडमैन और एफ. ए. हेयक (Hayek) हैं।
प्रमुख विचारकों के कथन एवं पुस्तकें:
बर्लिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Two Concepts of Liberty" में नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता की बात की है। उनका प्रसिद्ध कथन है:
"स्वतंत्रता का सार वास्तव में नकारात्मक में होता है अर्थात् किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप का अभाव।"
बर्लिन स्वतंत्रता को जोर जबरदस्ती का अभाव मानते हैं। बर्लिन लिखते है कि - स्वतंत्रता, स्वतंत्रता होती है इसका समानता, न्याय और प्रजातंत्र से कोई संबंध नहीं है बर्लिन अनुसार— "जब संप्रभुता सही हाथों में पड़ती है तो स्वतंत्रता बढ़ जाती है।"
बर्लिन का मानना है कि वह स्थिति जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को मन चाहा रूप देने में समर्थ हो और राज्य उसके मार्ग में कोई रुकावट न डाले, नकारात्मक स्वतंत्रता कहलाता है; जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को मन चाहा रूप देने में असमर्थ हो और राज्य इस असमर्थता को दूर करने के लिए ठोस कार्यवाही करे।
- मिल्टन फ्रीडमैन: इन्होंने अपनी पुस्तक "Capitalism and Freedom" में लिखा है कि— "प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति पर जोर जबरदस्ती का अभाव ही स्वतंत्रता है।" इन्होंने स्वतंत्रता को केवल पूँजीवाद की विशेषता बताया।
- रॉबर्ट नोजिक: "स्वतंत्रता का अर्थ है आत्म स्वामित्व का प्राकृतिक अधिकार।"
- एफ. ए. हेयक (Hayek): हेयक ने स्वतंत्रता को वैयक्तिक स्वतंत्रता का नाम दिया। इनकी पुस्तक "The Constitution of Liberty" है। उनके अनुसार— "मनुष्य को स्वतंत्रता तब प्राप्त होती है जब वह किसी दूसरे की निरंकुश इच्छा के द्वारा विवश या बाध्य न हो।"
✦ 13. समकालीन सकारात्मक स्वतंत्रता: मैकफरसन, जॉन रॉल्स और जॉन ग्रे
समकालीन नकारात्मक स्वतंत्रता के जवाब में समकालीन सकारात्मक स्वतंत्रता भी आयी। इसके प्रमुख समर्थकों में सी. बी. मैकफरसन (Macpherson), जॉन रॉल्स (John Rawls) और जॉन ग्रे (John Gray) का नाम आता है।
प्रमुख विचारकों के दृष्टिकोण:
मैकफरसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Democratic Theory" में यह बात कही है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि स्वतंत्रता व्यक्ति की शोषणकारी शक्तियों में कमी और विकासशील शक्तियों में वृद्धि का नाम है। मैकफरसन ने सकारात्मक स्वतंत्रता को "विकासात्मक स्वतंत्रता" (Developmental Liberty) का नाम दिया।
- जॉन रॉल्स (John Rawls): रॉल्स ने सकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा कि— "वैयक्तिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक स्वतंत्रता को भी ध्यान में रखना चाहिए।"
- जॉन ग्रे (John Gray): "स्वतंत्रता का राजनीतिक सार यह है कि यदि व्यक्ति के आत्म विकास की उपलब्धि के लिए वह जो कुछ करना चाहता है या करता है, वह समाज का एक मनुष्य होने के नाते ही करता है।"
✦ 14. स्वतंत्रता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण: सच्ची स्वतंत्रता
मार्क्सवाद मानता है कि सच्ची स्वतंत्रता साम्यवाद (Communism) में ही संभव है। जहाँ राजनीतिक स्वतंत्रता का संबंध उदारवाद से है, वहीं आर्थिक स्वतंत्रता का संबंध मार्क्सवाद से है।
मार्क्सवाद उदारवाद का प्रतिवाद या विरोधी है। जहाँ उदारवाद या पूँजीवाद सभी व्यक्तियों की समान स्वतंत्रता का समर्थन करता है, वहीं मार्क्सवाद कहता है कि उदारवाद में समाज 'अमीर और गरीब' दो वर्गों में विभाजित है। अतः स्वतंत्रता की अनुभूति केवल वही वर्ग करता है जो अमीर है, और गरीब पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ उठता है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण: वर्ग-विभाजित समाज की संरचना
मार्क्सवाद का मानना है कि पूँजीवादी व्यवस्था में स्वतंत्रता का अर्थ "अकेलापन" (Alienation) है। सच्ची स्वतंत्रता केवल साम्यवाद (वर्गविहीन व राज्यविहीन समाज) में ही संभव है। वह कहता है कि साम्यवाद में ही सभी बराबर होंगे और सभी पूर्ण स्वतंत्रता की अनुभूति करेंगे। यदि विवशता लोक से निकलकर स्वतंत्रता लोक में प्रवेश करना है तो साम्यवादी व्यवस्था में ही यह संभव हो सकता है।
"मार्क्सवाद आर्थिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा पक्षधर है।"
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