उदारवाद और व्यक्तिवाद: सम्पूर्ण सिद्धांत, प्रकार एवं विचारक

उदारवाद (Liberalism) और व्यक्तिवाद: सम्पूर्ण सिद्धांत
Study Material Overview: Polity Study Adda के इस प्रीमियम पोस्ट में उदारवाद (Liberalism) और व्यक्तिवाद (Individualism) की विचारधारा को पूर्ण विस्तार से समझाया गया है। इस पोस्ट में उदारवाद का अर्थ, इसका वर्गीकरण, नकारात्मक उदारवाद, सकारात्मक उदारवाद, लोककल्याणकारी राज्य, नव-उदारवाद और प्रमुख विचारकों (जॉन लॉक, जेरेमी बेंथम, एडम स्मिथ, हर्बर्ट स्पेंसर, टी.एच. ग्रीन, लास्की, नोज़िक) के सिद्धांतों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है।

✦ 1. राजनीतिक विचारधारा: राज्य और व्यक्ति के संबंध

राज्य और व्यक्ति के बीच के सम्बन्धों के अध्ययन को 'राजनीतिक विचारधारा' के नाम से जाना जाता है। राजनीति में इसी विचारधारा का ही विशेष महत्व है, और इसी विचारधारा के मध्य लड़ाई होती है। जिस विचारधारा से जितने ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ जाते हैं, वह विचारधारा उतना ही शक्तिशाली हो जाती है।

व्यक्तिवाद (Individualism) समाजवाद / फासीवाद / आदर्शवाद
  • जो विचारधारा व्यक्ति को साध्य और राज्य को साधन मानती है, वह 'व्यक्तिवाद' कहलाती है।
  • कुछ विचारधारा ऐसी है जो राज्य को साध्य और व्यक्ति को साधन मानती है। यह व्यक्ति का हित राज्य में देखती है। इसमें समाजवाद, फांसीवाद और आदर्शवाद जैसी विचारधारा आती है।

महत्वपूर्ण बिंदु: लेकिन उदारवाद (Liberalism) एक ऐसी विचारधारा है जो राज्य को साधन और साध्य दोनों रूप में देखती है。

✦ 2. उदारवाद (Liberalism): अर्थ, जनक और उदय

उदारवाद के जनक जॉन लॉक (John Locke) माने जाते हैं, इनका जन्म इंग्लैण्ड में हुआ।

  • उदय: वैसे उदारवाद पुनर्जागरण आन्दोलन व धर्मसुधार आन्दोलन की देन है लेकिन 'उदारवाद' शब्द उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में औद्योगिक क्रांति के बाद सुना गया। इसके पहले इसे 'व्यक्तिवाद' के नाम से जाना जाता था।
  • मूलमंत्र: उदारवाद का मूलमंत्र है — स्वतंत्रता (अर्थात सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता)।
  • शाब्दिक अर्थ: उदारवाद विवेक (Reason) पर आधारित है। उदारवाद 'उदार' और 'वाद' दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें 'उदार' का अर्थ है लचीला एवं परिवर्तनशील।
  • प्रमुख तत्व: यहाँ उदारवाद से कई तत्वों का बोध होता है जैसे— लोकतंत्र में विश्वास करने वाला, विधि के शासन में आस्था, सहिष्णुता, शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक साधनों में विश्वास।
हम कह सकते हैं कि "उदारवाद विवेक पर आधारित एक ऐसी परिवर्तनशील एवं लचीली व्यवस्था है, जो विधि के शासन में विश्वास करते हुए और लोकतंत्र में आस्था रखते हुए समय एवं परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता है।" यही कारण है कि आज उदारवाद के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं जैसे— नकारात्मक उदारवाद, सकारात्मक उदारवाद, लोक कल्याणकारी राज्य और नव उदारवाद।

उदारवाद ने प्रारम्भ में व्यक्ति को महत्व दिया लेकिन आगे चलकर अपने समूह को महत्व दिया। उदारवाद ने प्रारम्भ में राज्य को एक 'साधन' के रूप में देखा लेकिन आगे चलकर 'साधन और साध्य' दोनों रूप में देखा।

✦ 3. उदारवाद का वर्गीकरण व ऐतिहासिक विकासक्रम

उदारवाद का विकासक्रम (Timeline of Liberalism)

1. प्राचीन काल में

  • नकारात्मक उदारवाद (Negative Liberalism)
  • अन्य नाम: परम्परागत उदारवाद / शास्त्रीय / व्यक्तिवाद / चिरसम्मत उदारवाद।

2. मध्यकाल में

  • सकारात्मक उदारवाद (समूहवाद)
  • इसी से लोककल्याणकारी राज्य (समाजवाद) का जन्म हुआ।

3. वर्तमान में

  • नव उदारवाद (Neo Liberalism)
  • इसमें उदारीकरण (सिद्धांत), निजीकरण (प्रक्रिया) और वैश्वीकरण (व्यावहारिक रूप) शामिल हैं।

■ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • प्राचीन काल: तानाशाही व्यवस्था थी, जहाँ राज्य की सर्वोच्चता स्थापित थी।
  • मध्यकाल: सामन्ती व्यवस्था और विशेषाधिकार मूलक व्यवस्था थी (किसान ➔ जमींदार ➔ जागीरदार ➔ राजा ➔ चर्च)। यहाँ भी राज्य की सर्वोच्चता थी।
  • 15वीं व 16वीं शताब्दी: पुनर्जागरण आन्दोलन चला जिसने 'स्वतंत्रता', 'समानता', और 'मानववाद' को जन्म दिया, जिससे व्यक्तिवाद का उदय हुआ।

प्रतिक्रिया का चक्र (Reaction Cycle):
नकारात्मक उदारवाद (व्यक्तिवाद) ने अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ाई ➔ जिसके परिणामस्वरूप मार्क्सवाद (Marxism) आया (जनता शोषित से लड़ने लगी) ➔ सकारात्मक उदारवादियों ने मार्क्सवाद से पूँजीवाद को बचाने के लिए सकारात्मक उदारवाद (लोककल्याणकारी राज्य) का जन्म दिया।

✦ 4. नकारात्मक उदारवाद / व्यक्तिवाद (Individualism)

15 वीं व 16 वीं शताब्दी में पुनर्जागरण आन्दोलन और धर्म सुधार आन्दोलन के परिणाम स्वरूप व्यक्तिवाद का जन्म हुआ। यही व्यक्तिवाद औद्योगिक क्रांति के बाद 19 वीं शताब्दी के मध्य में विभिन्न नामों से जाना गया जिसे— शास्त्रीय उदारवाद, परम्परागत उदारवाद या नकारात्मक उदारवाद या चिरसम्मत उदारवाद के नाम से जाना गया।

  • चूँकि प्राचीन काल व मध्यकाल में केवल राज्य की महत्ता को स्थापित किया गया और व्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य में विलीन कर दिया गया। अतः आधुनिक काल में पुनर्जागरण आन्दोलन ने स्पष्ट कर दिया कि "मानव ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है" और इसी पुनर्जागरण आन्दोलन ने स्वतंत्रता और समानता को जन्म दिया जो कि व्यक्तिवाद का आधार स्तम्भ है।
  • राज्य की प्रकृति: व्यक्तिवाद की मान्यता है कि राज्य का निर्माण व्यक्तियों ने आपस में मिलकर किया है, अतः राज्य एक कृत्रिम संस्था है। व्यक्तिवाद राज्य को साधन और व्यक्ति को साध्य मानता है।
  • व्यक्तिवाद कहता है: "समाज में रहने वाले व्यक्तियों के बीच कुछ आपसी मतभेद है, उनके बीच संघर्ष है या विवाद है; उसी सबका निपटारा करने के लिए राज्य का निर्माण किया गया है, अतः राज्य वर्गों में सहयोग या सामंजस्य बनाने वाली एक संस्था है।"

■ राज्य के न्यूनतम कार्य:

व्यक्ति ने राज्य को जो कार्य सौंपा है, राज्य को केवल उन्हीं कार्यो तक ही सीमित रहना चाहिए। व्यक्तिवाद राज्य को केवल आवश्यक कार्यो तक सीमित रखता है, लोक कल्याण का कार्य नहीं सौंपता। व्यक्तिवादियों के अनुसार "राज्य एक आवश्यक बुराई है"। राज्य एक पुलिस मैन (Night Watch man) की भाँति है।

वह कहता है कि व्यक्ति अपने हितो को स्वयं जानता है इसलिए उसे सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में खुला छोड़ देना चाहिए। अर्थात राज्य अहस्तक्षेप (Laissez-Faire) की नीति पर कार्य करे। व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य का आवश्यक कार्य निम्नलिखित है:

  1. सीमाओं की सुरक्षा करना
  2. शांति व्यवस्था बनाये रखना
  3. न्याय प्रदान करना

Note: व्यक्तिवादी राज्य को एक यंत्र की भाँति मानते है। व्यक्तिवादी मानते है प्राकृतिक रूप से सारे व्यक्ति बराबर है। व्यक्तिवादी राज्य व समाज दोनो को कृत्रिम संस्था मानते है (समाज = व्यक्तियों का योग)। सरकार लोक कल्याण के सारे कार्य बंद कर दे।
तीन बातें कहते है व्यक्तिवादी — राज्य एक आवश्यक बुराई है; न्यूनतम अंकुश; राज्य नाइट वाच मैन की तरह है।

यहाँ आवश्यक का अर्थ है सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय की स्थापना; तथा बुराई इसलिए है क्योंकि इसका ज्यादा हस्तक्षेप व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है। ध्यान रहे कि व्यक्तिवादी या नकारात्मक स्वतंत्रता के पक्षधर 'स्वतंत्रता' को अधिक महत्व देते है।

व्यक्तिवाद मानता है कि व्यक्ति को जितनी स्वतंत्रता मिलेगी, व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास उतना ही अधिक करेगा। व्यक्तिवाद या नकारात्मक उदारवाद 'मध्यवर्ग' (उद्योगपति) का दर्शन है। यह पूँजीवाद के हितों का पोषक है। यह बाजारीकरण का समर्थक है。

✦ 5. राजनीतिक उदारवाद: जॉन लॉक और जेरेमी बेंथम

नकारात्मक उदारवाद (व्यक्तिवाद) को आगे बढ़ाने का श्रेय मुख्य रूप से दो विचारकों— जॉन लॉक (जनक) और जेरेमी बेंथम को जाता है。

■ (A) जॉन लॉक (John Locke) के विचार:

  • राजनीतिक उदारवाद के जनक लॉक माने जाते है। बेंथम ने इंग्लैण्ड में उदारवाद को दार्शनिक आधार प्रदान किया, जबकि इसको स्पेंसर ने चरम सीमा पर पहुँचाया।
  • लॉक ने सर्वप्रथम प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त का प्रतिपादन करके व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया।
  • लॉक ने विशेषाधिकार (भेदभाव) पर प्रहार करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से जीवन, स्वतंत्रता और सम्पत्ति रूपी प्राकृतिक अधिकार समान रूप से प्राप्त है।
  • उसने संपत्ति के अधिकार को अधिक महत्व देते हुए कहा, उसमें जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार निहित हैं।
  • वाहन ने लिखा है कि - लॉक के दर्शन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की सम्पत्ति की सुरक्षा करना है। लॉक को मध्यवर्ग या पूँजीवाद की विचारधारा का जनक भी माना जाता है।
  • लॉक ने संवैधानिक सरकार, सीमित सरकार, उत्तरदायी सरकार, प्रतिनिधि सरकार, शक्तियों का विभाजन आदि विचारधारा का समर्थन किया।
  • लॉक ने स्पष्ट किया कि राज्य का निर्माण व्यक्तियों ने आपस में एक समझौता करके किया है, अतः राज्य एक कृत्रिम संस्था है और उसके अधिकार क्षेत्र सीमित है। व्यक्तियों ने राज्य को इसलिए बनाया है कि वह उनके प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करे, यदि वह ऐसा नहीं कर पाता तो जनता बहुमत से सरकार को हटा सकती है।
  • लॉक का मानना है कि राज्य को कानून बनाकर व्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना चाहिए, व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अन्य कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। जैसा कि लॉक का कथन है— "विधि और स्वतंत्रता एक दूसरे के पूरक है।" अर्थात जहां विधि नहीं वहां स्वतंत्रता नहीं अथवा स्वतंत्रता कानून के अतिरिक्त अन्य नियंत्रणों का अभाव है। लॉक ने हर परिस्थितियों में व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया है।
  • वाहन ने लिखा है कि - लॉक का सम्पूर्ण विचार व्यक्ति के इर्दगिर्द घूमता है। लॉक का कथन है— "समुदाय (जनता) एक ऐसे गृह स्वामी की तरह है जो अपने लिए पहरेदार की नियुक्ति करता है और फिर वह जाग जाग कर यह देखता रहता है कि पहरेदार कहीं सो तो नहीं गया है। यदि सोता हुआ मिलता है तो उसे हटाकर नये पहरेदार की नियुक्ति कर देता है।"
  • लॉक ने चर्च को राज्य से अलग करके धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धान्त का भी प्रतिपादन किया।

■ (B) जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) के विचार:

  • राजनीतिक उदारवाद को इंग्लैण्ड में दार्शनिक आधार बेंथम ने प्रदान किया। यद्यपि बेंथम उपयोगितावाद (Utilitarianism) के जनक है और वह 'अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख' की बात करते है।
  • लेकिन व्यक्तिवादियों की भाँति बेंथम भी राज्य के न्यूनतम कार्य के पक्षधर है।
  • बेंथम स्वतंत्रता के विरोधी है क्योंकि 'स्वतंत्रता एक प्राकृतिक अधिकार है'। बेंथम ने सुरक्षा को महत्व दिया और उसमे स्वतंत्रता को निहित माना।
  • बेंथम का कथन है— "लोग सुरक्षा चाहते है, स्वतंत्रता नहीं।" राज्य कानून का निर्माण करके व्यक्ति की सुरक्षा को सुनिश्चित करे।
  • बेंथम का कथन है कि "कानून एक अनिवार्य दोष है।" इसका अर्थ यह है कि कानून सुरक्षा के लिए अनिवार्य है लेकिन अत्याधिक कानून असुरक्षा भी पैदा कर देता है।
  • बेंथम भी व्यक्तिवादियों की भाँति यह मानते है कि 'राज्य व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति राज्य के लिए'।
  • बेंथम एडम स्मिथ से प्रभावित होकर आर्थिक क्षेत्र में राज्य के 'अहस्तक्षेप' के सिद्धान्त का समर्थन किया।
  • बेंथम ने कहा कि राज्य का आधार समझौता नहीं बल्कि उपयोगिता है; व्यक्तियों ने राज्य का निर्माण इसलिए किया है क्योकि वह एक उपयोगी संस्था है। राज्य का मूल्यांकन केवल एक ही आधार पर हो सकता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के अनुकूल है या नहीं।
  • बेंथम को प्रतिनिधि लोकतंत्र का जनक भी माना जाता है, उन्होंने 'एक व्यक्ति और एक वोट' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
  • बेंथम प्राकृतिक कानून के विरोधी थे व कानूनी/वैधानिक कानून के समर्थक थे। आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितने भी कानून विद्यमान हैं, वह सब बेंथम की देन माने जाते हैं। डायसी का कथन है: "बेंथम विधि का प्रथम प्रतिपादक है।" सर हेनरी मैन का कथन है: "आज तक मैंने ऐसा कानून नहीं देखा जिस पर बेंथम का प्रभाव ना हो।"

■ वैज्ञानिक व्यक्तिवाद (Scientific Individualism):

  • व्यक्तिवाद की विचारधारा को स्पेंसर (Herbert Spencer) ने चरम सीमा पर पहुँचाया, इसलिए स्पेंसर को वैज्ञानिक व्यक्तिवाद का जनक माना जाता है।
  • राज्य एक आवश्यक बुराई है, राज्य एक पुलिस मैन की भाँति है और राज्य को न्यूनतम कार्य करना चाहिए, इस बात को सभी व्यक्तिवादी मानते है, लेकिन ये तीनों बाते स्पेंसर के नाम के साथ जुड़ गयी।
  • स्पेंसर समाजशास्त्री थे जिन्होंने 'शरीर सिद्धान्त' / 'सावयवी सिद्धान्त' (Organic Theory) दिया (भारतीय विचारधारा में कौटिल्य ने दिया)। समाज = शरीर है, व्यक्ति = अंग है।
  • डार्विन ने जीव विज्ञान के क्षेत्र में वही विचार दिया जो स्पेंसर ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में दिया। जो अंग शरीर के अनुसार विकास करता है वही शरीर को लाभ देता है, समाज में रहने वाला व्यक्ति जब समाज में अपने आपको फिट न कर पाये तो उसका होना न होना एक है।

■ समझिए विस्तार से:

स्पेंसर राज्य की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देते हैं। उन्होंने राज्य या समाज की तुलना शरीर से किया है और उनमें रहने वाले व्यक्तियों की तुलना शरीर के अंगों से किया है और कहा है कि जिस प्रकार शरीर का जो अंग शरीर के अनुरूप विकसित नहीं हो पाता है, वह महत्वहीन हो जाता है, उसी प्रकार राज्य या समाज में रहने वाले व्यक्ति उसके अनुसार स्वयं को फिट नहीं कर पाता तो वह बेकार हो जाता है। इस प्रकार स्पेंसर ने शरीर सिद्धांत का प्रतिपादन किया तथा राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी संबंध माना है। ध्यान रहे कि राज्य का शरीर सिद्धांत और सावयवी सिद्धांत दोनों स्पेंसर के नाम के साथ जुड़ गया है। इस प्रकार से स्पेंसर ने 'योग्यतम की उत्तरजीविता' (Survival of the Fittest) का सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। यह सिद्धांत प्राकृतिक सामंजस्य (Natural Coordination) के सिद्धांत पर आधारित है।

  • स्पेंसर राज्य के न्यूनतम कार्य के पक्षधर हैं। वह कहते हैं कि राज्य का कार्य बाह्य शत्रुओं से रक्षा, आंतरिक शत्रुओं से रक्षा और न्याय प्रदान करना है। स्पेंसर का कथन: "राज्य और कानून एक दूसरे के विरोधी है।" पुस्तक: "The Man Versus The State" (व्यक्ति बनाम राज्य) और "Social Statics"।
स्पेंसर तो यहां तक मानते हैं कि विधि और स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी हैं। स्पेंसर का कथन है: "एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जो करना चाहता है, वह करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते दूसरे व्यक्ति के उसी प्रकार के कार्यों में कोई बाधा न आए।"
  • स्पेंसर ने अपनी पुस्तक Social Statics में कहा है कि एक आदर्श समाज वह समाज होगा जिसमे राज्य नाम की कोई संस्था ही न हो और प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए एकदम स्वतंत्र हो।

Note: ध्यान रहे कि व्यक्तिवादी राज्य को 'अम्पायर' या 'रेफरी' के रूप में देखते है और कहते है कि राज्य को अपने 3 आवश्यक कार्य करते हुए तटस्थ रहना चाहिए, और व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए खुला छोड़ देना चाहिए。

✦ 6. आर्थिक उदारवाद और वैज्ञानिक व्यक्तिवाद

■ आर्थिक उदारवाद (Economic Liberalism):

  • आर्थिक उदारवाद के जनक एडम स्मिथ (Adam Smith) माने जाते है। माल्थस और रिकार्डो इसके समर्थको में है।
  • एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "The Wealth of Nations" (1776) में 'आर्थिक मानव' और 'लेसेजफेयर' (Laissez-Faire - अहस्तक्षेप) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • लेसेजफेयर का शाब्दिक अर्थ है— "मुझे अकेला छोड़ दो या चुप रहो"। इसे 'यद्भाव्यम् की नीति' भी कहते है। (अर्थात आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति को स्वतंत्र छोड़ दिया जाय)।
  • एडम स्मिथ का कथन है— "वाणिज्य और स्वतंत्रता एक दूसरे के पूरक है।"
  • एडम स्मिथ राष्ट्रीय आय को व्यक्तियों की आय का योग मानते है। और वह कहते है बाजार में प्रत्येक व्यक्ति को मुक्त प्रतियोगिता करने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए। जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय में वृद्धि कर लेगा तो राष्ट्रीय आय में स्वमेव वृद्धि हो जायेगी।
  • इसी को 'नकारात्मक अर्थशास्त्र' भी कहते है। माल्थस ने जनसंख्या सिद्धान्त, रिकार्डो ने लगान सिद्धान्त और मजदूरी के लौह नियम का प्रतिपादन किया।

✦ 7. सकारात्मक उदारवाद (Positive Liberalism)

नकारात्मक उदारवाद या पूँजीवाद की विचारधारा ने समाज में दो वर्ग (अमीर और गरीब) को जन्म दे दिया। एक वर्ग मुक्त प्रतियोगिता का लाभ उठाकर अमीर बन गया, लेकिन समाज के अधिकांश व्यक्ति इस प्रतियोगिता में सफल नहीं हो पाये और अत्यधिक गरीब हो गए। इसी का लाभ उठाकर मार्क्सवाद (Marxism) आ गया, जिसने गरीबों के हितों की बात करके अमीरों के विरुद्ध क्रांति करने की सलाह दे डाली। अतः उदारवाद (पूँजीवाद) को मार्क्सवाद से बचाने के लिए नकारात्मक उदारवाद में संशोधन करके 'सकारात्मक उदारवाद' का विचार दिया गया।

सकारात्मक उदारवाद एक ऐसी विचारधारा है जो राज्य को एक सकारात्मक संस्था के रूप में देखती है और मनुष्य को एक 'सामाजिक प्राणी' के रूप में देखती है। इसका मानना है कि राज्य को सामाजिक हित में भी कार्य करना चाहिए。

■ प्रमुख विचारक और उनके सिद्धांत:

  • जे.एस. मिल (J.S. Mill): नकारात्मक उदारवाद को सकारात्मक उदारवाद में बदलने का पहला उल्लेखनीय प्रयास जे.एस. मिल ने किया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Principles of Political Economy' में मिल ने लिखा है कि "समाज में सभी व्यक्ति समानता के आधार पर जन्म नहीं लेते, इसलिए सामाजिक-आर्थिक विषमता स्वाभाविक है।" मिल ने कहा कि राज्य को सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप करके इस विषमता को मिटाना चाहिए, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में राज्य के अहस्तक्षेप के सिद्धान्त का समर्थन किया। (मिल राज्य को शिक्षा और सामाजिक सुधार जैसे कार्य सौंपते हैं) जे. एस. मिल सकारात्मक उदारवाद के जनक नहीं बन पाए लेकिन फिर भी उन्हें सकारात्मक उदारवादी माना जाता है।
  • टी.एच. ग्रीन (T.H. Green): ग्रीन ने मिल की कमियों को दूर किया। ग्रीन ने कहा कि आत्म तत्व समाज तत्व है और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज को केवल आवश्यक कार्य तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सामाजिक हित के आधार पर हस्तक्षेप भी करना चाहिए। ग्रीन ने 'सामाजिक मानव' और सकारात्मक/हस्तक्षेपी राज्य का विचार प्रस्तुत किया। ग्रीन का मानना है कि "राज्य एक आवश्यक बुराई न होकर एक सकारात्मक भलाई है।" ग्रीन कहते हैं कि राज्य को अशिक्षा, नशाखोरी और दरिद्रता (गरीबी) जैसी समस्याओं को हल करना चाहिए। ग्रीन नकारात्मक स्वतंत्रता के स्थान पर सकारात्मक स्वतंत्रता का विचार देते हैं। वह स्वतंत्रता को प्रतिबंधों की अनुपस्थिति न मानकर प्रतिबंधों की उपस्थिति मानते हैं। ग्रीन का प्रसिद्ध कथन है— "स्वतंत्रता ऐसे कार्यों को करने या कराने का नाम है जो करने योग्य हो" (यहाँ 'योग्यता' का अर्थ सामाजिक हित है)। ग्रीन कहते हैं कि राज्य का कार्य व्यक्ति के आंतरिक व बाह्य जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। जब ग्रीन कहते हैं कि जब राज्य का कार्य बाधाओं को बाधित करना है, तब वह प्रत्ययवाद की नींव रखते हैं। ग्रीन के अनुसार राज्य का कार्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करना है, ऐसा कहकर ग्रीन ने लोक कल्याणकारी राज्य का मार्ग प्रशस्त किया।
  • आर्थिक क्षेत्र में सकारात्मक उदारवाद: आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप की नीति का समर्थन जे.एम. कीन्स (J.M. Keynes) ने किया ताकि बाजार में सामंजस्य व संतुलन बनाया जा सके। जे.के. गैलब्रेथ (J.K. Galbraith) ने अपनी पुस्तक 'The Affluent Society' और 'The New Industrial State' में औद्योगिक राज्य और मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का विचार दिया।

✦ 8. लोककल्याणकारी राज्य (Welfare State)

यह भी उदारवाद की देन है। कुछ लोगों ने आलोचना के रूप में लोक कल्याणकारी राज्य को पूंजीवाद की चौकी कहा, वास्तव में सकारात्मक उदारवाद का विस्तृत रूप ही लोककल्याणकारी राज्य है। लोककल्याणकारी राज्य शब्द का प्रयोग पहली बार मध्य काल में निरंकुश सत्ता के विरुद्ध आर्क विशप टेम्पिल (Archbishop Temple) ने अपनी पुस्तक 'Citizen and Churchman' में किया था। हॉबमैन (Hobman) के अनुसार— "लोककल्याणकारी राज्य उदारवाद और साम्यवाद के मध्य का मार्ग है।"

लोक कल्याणकारी राज्य वह राज्य होगा जो अपने नागरिकों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। लोक कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य गरीबों के कल्याण का प्रबंध करना है। यह लोकतंत्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था का समर्थक है। लोक कल्याणकारी राज्य में पूंजीवाद और समाजवाद दोनों के लक्षण विद्यमान हैं।

■ उदय और बेवरिज रिपोर्ट:

लोककल्याणकारी राज्य का उदय मुख्य रूप से इंग्लैण्ड में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ। इंग्लैण्ड के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली (Clement Attlee) ने 1944 में 'लॉर्ड विलियम बेवरिज' (William Beveridge) की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया और उसको यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह इस बात का पता लगाए कि राज्य को ऐसे कौन-कौन से कार्य करने चाहिए जिससे विषमता और संघर्ष को कम किया जा सके। इस रिपोर्ट में समाज की 5 बुराइयों को दूर करने की बात कही गई:

  1. अशिक्षा (Ignorance) दूर करना
  2. बेरोजगारी (Idleness) दूर करना
  3. बीमारी (Disease) दूर करना
  4. आश्रय अभाव दूर करना
  5. दरिद्रता / गरीबी (Want) दूर करना

सरकार ने इसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया और लोककल्याणकारी राज्य का जन्म हो गया। यह अमीरों पर विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाकर उनसे धन एकत्रित करता है और गरीबों के कल्याण की योजनाएं बनाकर उनकी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। (विनोबा भावे का कथन: "दुनिया में सभी पतित हैं क्योंकि अमीर कभी झुके नहीं और गरीब कभी उठे नहीं।")

■ प्रमुख विचारक:

  • हेराल्ड लास्की (H.J. Laski): लास्की पहले राजनीतिक विचारक हैं जिन्होंने विश्व का ध्यान 'पुलिस राज्य' की तरफ से 'लोककल्याणकारी राज्य' की तरफ आकर्षित किया। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'A Grammar of Politics' है। लास्की उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने के पक्षधर हैं, ताकि मांग और पूर्ति में निरंतरता बनी रहे। प्रसिद्ध कथन: "राज्य को उद्योगों पर नियंत्रण करना चाहिए, वरना उद्योग ही राज्य पर नियंत्रण कर लेंगे।" लास्की का मानना है कि राज्य को सामाजिक हित के सामान्य कार्य करने चाहिए और विशेष रूप से गरीबों के हित को ध्यान में रखकर करना चाहिए। सरकार को सामाजिक सुरक्षा, मुद्रा, शिक्षा, रोजगार और बीमारी उन्मूलन से संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
  • W.T. Kant के अनुसार: लोक कल्याणकारी राज्य वह राज्य है जो नागरिकों को सामाजिक सेवाएं उपलब्ध कराता है।
  • हॉबहाउस (Hobhouse): ये सामाजिक उदारवाद के समर्थक हैं। ये लोकतंत्रीय व्यवस्था व सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना चाहते थे।
  • मैकाइवर (MacIver): अपनी पुस्तक 'The Modern State' में लिखा कि आधुनिक राज्य का कार्य विभिन्न संघचरों (समूहों) के हितों में सामंजस्य स्थापित करना है। 'Democracy and Economic Challenge' में कहा कि लोक कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था करना जिसमें राज्य की छत्रछाया में सर्वसाधारण अभाव व असुरक्षा से पीड़ित न हो।
  • आर.एच. टॉनी (R.H. Tawney): लोकतंत्रीय समाजवाद के समर्थक। इन्होंने वर्ग संघर्ष और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के स्थान पर नैतिकता और समाजवाद को आधार बनाया। कथन: "केवल उत्तम मनुष्य ही उत्तम समाज का निर्माण कर सकता है।" इनकी पुस्तकें 'The Acquisitive Society' (पूँजीवाद धन एकत्रित करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है जिससे अमीर-गरीब दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं) और टानी ने अपनी अन्य पुस्तक 'Equality' में सामाजिक विषमताओं को मिटाने के लिए सामाजिक सेवाओं के विस्तार पर जोर दिया और प्रगतिशील कर प्रणाली लागू किए जाने का समर्थन किया। टानी नैतिकता पर आधारित समाजवाद का समर्थन करते हैं। टानी के अनुसार समानता का आशय सभ्यता के साधनों का विस्तार है। 'Equality' पुस्तक को समाजवादी साहित्य का गौरव ग्रंथ माना जाता है। टानी का कथन है, "आधुनिक समाज की समस्या अनुपातों की समस्या है, न कि परिणामों की। न्याय की समस्या है, न कि खुशहाली का।"

✦ 9. समकालीन उदारवाद / नव-उदारवाद (Neo-Liberalism)

इसे 'नव उदारवाद' की संज्ञा दी जाती है। इसकी प्रेरणा उदारीकरण की प्रक्रिया से प्रारम्भ हुई। इसका उदय 1970 के दशक में इंग्लैण्ड में हुआ और व्यावहारिक रूप में 1980 के दशक में दिखाई पड़ा। इसके जनक रॉबर्ट नोज़िक (Robert Nozick) माने जाते हैं。

नव उदारवाद, लोककल्याणकारी राज्य के विरुद्ध एक 'प्रतिक्रिया' के रूप में आया। यह परम्परागत उदारवाद या पूँजीवाद को नये सिरे से स्थापित करने का एक प्रयास है। (मार्गरेट थैचर की नीतियां)।

■ नव-उदारवाद मुख्य रूप से दो रूपों में विभक्त है:

1. इच्छा स्वातंत्रवाद / स्वेच्छातंत्रवाद (Libertarianism)

  • इसके जनक रॉबर्ट नोज़िक माने जाते हैं। एफ. हेयक, आइज़िया बर्लिन, मिल्टन फ्रीडमैन आदि इसके प्रमुख समर्थक हैं।
  • यह विचारधारा नकारात्मक उदारवाद या पूँजीवाद को नये सिरे से स्थापित करने का प्रयास करती है।
  • इनका मानना है कि लोककल्याणकारी राज्य विषमताओं को मिटाने में असफल रहा है और इससे भ्रष्टाचार तेजी के साथ फैला है। लोक-कल्याणकारी कार्यों से व्यक्ति आलसी और कायर हो जाता है, उसकी कार्य करने की क्षमता घट जाती है और राजस्व घाटा बढ़ जाता है।
  • अतः राज्य को लोक कल्याण का कार्य तत्काल बंद कर देना चाहिए और राज्य को केवल न्यूनतम कार्यों (सुरक्षा, शांति और न्याय) तक सीमित हो जाना चाहिए। राज्य को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और व्यक्ति को मुक्त प्रतिस्पर्धा करने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए। स्वेच्छा तंत्रवादी व्यक्तिवादियों की भांति केवल स्वतंत्रता को अत्यधिक महत्व देते हैं। वह स्वतंत्रता और समानता को एक दूसरे का विरोधी मानते हैं। स्वेच्छा तंत्रवादियों के निम्नलिखित दो रूप हैं।
  • दो रूप:
    (A) परिमिति या संमत स्वेच्छातंत्रवाद: इन्हें अर्ध अराजकतावादी कहा जाता है। ये लोग राज्य का पूर्णतः विरोध नहीं करते हैं। इनका मानना है कि ऐसा कार्य जिनको करने में व्यक्ति को कठिनाई होती है, उस कार्य को राज्य को करना चाहिए। अर्थात राज्य को सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय का कार्य अपने हाथ में लेना चाहिए। रॉबर्ट नोज़िक ने राज्य को 'रात्रि प्रहरी' (Night Watchman) की संज्ञा दी।
    (B) चरम स्वेच्छातंत्रवाद: इसे अराजकतावादी भी कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है राज्य विहीनता या शासन विहीनता। ये सभी प्रकार के शासन को अवैध मानते हैं। इनका मानना है कि मानव स्वभाव से अच्छा होता है लेकिन राजनीतिक संस्थाएं उन्हें भ्रष्ट बना देती हैं। इसलिए राजनीतिक संस्थाएं नष्ट होनी चाहिए और व्यक्ति अपने अनुसार सामाजिक व्यवस्था का संचालन करें। इनकी विचारधारा क्रांतिकारी है और यह बहुत कुछ मार्क्सवाद से मिलती-जुलती है।

2. समकालीन सकारात्मक उदारवाद / समतावाद (Egalitarianism)

  • इसे समतावाद भी कहा जाता है। इसके जनक सी.बी. मैकफर्सन (C.B. Macpherson) माने जाते हैं। जॉन रॉल्स (John Rawls) और जॉन ग्रे (John Gray) इसके समर्थक हैं।
  • यह सकारात्मक उदारवाद और लोककल्याणकारी राज्य का समर्थक है। यह स्वतंत्रता और समानता में सामंजस्य स्थापित करता है। इसे स्वेच्छातंत्र का विरोधी माना जाता है और यह समाज के कमजोर वर्गों के लिए कार्य करने के लिए राज्य का समर्थन करता है।
  • इनका मानना है कि समाज एक श्रृंखला है और श्रृंखला की जो कड़ी कमजोर है उसे मजबूत बनाने के लिए राज्य को (समाज के कमजोर वर्गों के लिए) कार्य करना चाहिए। जहाँ स्वेच्छातंत्रवाद राज्य को नकारात्मक संस्था मानता है, वहीं समतावाद राज्य को एक सकारात्मक संस्था मानता है।

✦ 10. अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ल पॉपर एवं निष्कर्ष

कार्ल पॉपर (Karl Popper):
कार्ल पॉपर ने 'क्रमिक सामाजिक परिवर्तन' या 'खण्डशः सामाजिक परिवर्तन' (Piecemeal Social Engineering) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। कार्ल पॉपर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Open Society and its Enemies' में मार्क्सवाद को 'मुक्त समाज' (बाजार व्यवस्था) का दुश्मन ठहराया है।

■ विस्तृत निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विस्तृत विवेचन का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि 'उदारवाद' (Liberalism) कोई जड़ या रूढ़िवादी विचारधारा नहीं है, बल्कि यह समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला एक अत्यंत लचीला, विवेकपूर्ण और प्रगतिशील दर्शन है।

अपने प्रारंभिक दौर (नकारात्मक उदारवाद / व्यक्तिवाद) में, जॉन लॉक और एडम स्मिथ जैसे विचारकों ने राज्य को एक 'आवश्यक बुराई' मानते हुए व्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता और 'अहस्तक्षेप' (Laissez-Faire) की नीति पर सर्वाधिक बल दिया। किन्तु, जब अनियंत्रित पूंजीवाद ने समाज में गहरी आर्थिक विषमता और वर्ग-संघर्ष (मार्क्सवाद के उदय का कारण) को जन्म दिया, तब टी.एच. ग्रीन और लास्की जैसे विचारकों ने इसमें सुधार करते हुए 'सकारात्मक उदारवाद' की मजबूत नींव रखी। इन्होंने राज्य को एक 'सकारात्मक भलाई' माना और 'लोककल्याणकारी राज्य' (Welfare State) का मार्ग प्रशस्त किया, जिसका मुख्य उद्देश्य गरीबों का कल्याण और सामाजिक न्याय स्थापित करना था।

किन्तु समय का चक्र फिर घूमा और जब लोककल्याणकारी नीतियों से भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और राजस्व घाटा बढ़ने लगा, तो 20वीं सदी के अंत में रॉबर्ट नोज़िक जैसे विचारकों ने 'नव-उदारवाद' (Neo-Liberalism) के माध्यम से पुनः राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप और मुक्त बाजार व्यवस्था (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) की पुरजोर वकालत की।

अंततः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि उदारवाद ने भले ही अपने स्वरूप बदले हों, लेकिन उसका मूल उद्देश्य और आत्मा सदैव 'व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसके अधिकार और उसके विवेक' की रक्षा करना ही रहा है—चाहे उसके लिए राज्य की शक्तियों को सीमित करना पड़े, या समाज के व्यापक हित में राज्य का सकारात्मक उपयोग करना पड़े।

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अगर आपने उदारवाद (Liberalism) के सिद्धान्तों और विचारकों को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रेक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।

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★ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. उदारवाद का जनक किसे माना जाता है?
उदारवाद का जनक जॉन लॉक (John Locke) को माना जाता है। उन्होंने व्यक्तिवाद को दार्शनिक आधार प्रदान किया और प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) का समर्थन किया।
Q2. "राज्य एक आवश्यक बुराई है" - यह किस विचारधारा का मानना है?
यह नकारात्मक उदारवाद (व्यक्तिवाद) की मान्यता है। यह आवश्यक इसलिए है क्योंकि यह सुरक्षा और न्याय प्रदान करता है, तथा बुराई इसलिए है क्योंकि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है।
Q3. 'लेसेजफेयर' (Laissez-Faire) या अहस्तक्षेप का सिद्धांत किसने दिया?
आर्थिक उदारवाद के जनक एडम स्मिथ (Adam Smith) ने अपनी पुस्तक "The Wealth of Nations" (1776) में यह सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है "मुझे अकेला छोड़ दो"।
Q4. नव-उदारवाद (Neo-Liberalism) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उदय लोककल्याणकारी राज्य के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। यह परम्परागत उदारवाद या पूंजीवाद को नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास है, जिसमें राज्य के न्यूनतम कार्यों पर बल दिया गया है। इसके जनक रॉबर्ट नोज़िक माने जाते हैं।
Q5. "राज्य को उद्योगों पर नियंत्रण करना चाहिए, वरना उद्योग ही राज्य पर नियंत्रण कर लेंगे" - यह किसने कहा?
यह कथन लोककल्याणकारी राज्य के प्रमुख समर्थक हेराल्ड लास्की (H.J. Laski) का है, जिन्होंने उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का पुरजोर समर्थन किया था।
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