| राज्य: अर्थ, निर्माणक तत्व, राष्ट्र एवं समाज में अंतर |
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Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस लेख में राज्य का अर्थ, इसके 4 निर्माणक तत्व, सरकार, सम्प्रभुता, राष्ट्र व समाज में अंतर तथा लोक कल्याणकारी राज्य के विकास को हस्तलिखित नोट्स के आधार पर विस्तार से समझाया गया है। यह UPSC, PCS, NET, TGT, PGT सहित सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। |
- 1. राज्य का अर्थ और सामंती व्यवस्था
- 2. राष्ट्र राज्य (Nation State) का उदय
- 3. राजनीतिशास्त्र का केन्द्रीय विषय: राज्य
- 4. राज्य के स्वरूप का विकास क्रम
- 5. आधुनिक राज्य और मैकियावेली
- 6. राज्य के निर्माणक तत्व (संक्षिप्त अवलोकन)
- 7. पहला तत्व: पर्याप्त जनसंख्या (Population)
- 8. दूसरा तत्व: निश्चित भूक्षेत्र (Territory)
- 9. तीसरा तत्व: एक सरकार (Government)
- 10. राज्य और सरकार में सैद्धांतिक व व्यावहारिक अंतर
- 11. चौथा तत्व: सम्प्रभुता (Sovereignty)
- 12. सम्प्रभुता के महत्वपूर्ण तथ्य व डोमिनियन स्टेट
- 13. राज्य के कार्य: पुलिस राज्य का स्वरूप
- 14. लोक कल्याणकारी राज्य और बेवरिज रिपोर्ट
- 15. लोक कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ
- 16. आधुनिक राज्य की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा (गार्नर)
- 17. राज्य पर विचारकों के महत्वपूर्ण कथन (भाग-1)
- 18. राज्य पर विचारकों के महत्वपूर्ण कथन (भाग-2)
- 19. विभिन्न विचारधाराओं में राज्य का स्वरूप
- 20. राज्य और राष्ट्र में अंतर
- 21. राष्ट्र और राष्ट्रीयता पर विचारकों के मत
- 22. राज्य और समाज में अंतर
✦ 1. राज्य का अर्थ और सामंती व्यवस्था
वर्तमान समय का राज्य मुख्य रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। राज्य के निर्माण में व्यापारिक-वाणिज्यक क्रांति ने आमूलचूल परिवर्तन किए हैं, इसके साथ ही पुनर्जागरण आंदोलन और धर्म सुधार आंदोलन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
❖ मध्यकाल का सामंती राज्य (Feudal State)
मध्यकाल का राज्य एक सामंती राज्य था, जिसमें सत्ता का बंटवारा पदानुक्रम (Hierarchy) के आधार पर होता था:
सामंती राज्य में व्यापार पूरी तरह से स्थानीय था। एक जागीर के लोग दूसरे जागीर में जाकर व्यापार नहीं कर सकते थे। लेकिन आगे चलकर सत्ता के परमाधिकारों को लेकर जागीरदार और राजा के बीच संघर्ष छिड़ गया।
✦ 2. राष्ट्र राज्य (Nation State) का उदय
जागीरदारों और राजा के बीच संघर्ष के बाद, जनता पर यह उत्तरदायित्व आ गया कि वह सत्ता को किसे सौंपे। अंततः जनता ने राजा को चुना। इस संघर्ष में जमींदार और जागीरदार मारे गए।
बाद में केवल जनता और राजा बचे। अभी तक क्षेत्र बंटे हुए थे, लेकिन अब जनता सीधे राजा के संपर्क में आने लगी।
इस अवस्था में व्यापार राष्ट्रीय हो गया। जनता में आपस में प्रेम और बन्धुता पैदा हो गयी, जिससे राष्ट्र राज्य (Nation State) पैदा हो गया।
✦ 3. राजनीतिशास्त्र का केन्द्रीय विषय: राज्य
राज्य और व्यक्ति के बीच संबंधों के अध्ययन को राजनीति (Politics) कहा जाता है। राजनीतिशास्त्र का केन्द्रीय विषय 'राज्य' है, और राज्य को सभ्य समाज की पहचान माना जाता है।
हम जानते हैं कि एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए सुरक्षा, शांति व्यवस्था और न्याय की आवश्यकता होती है। इन्हीं की स्थापना करने के लिए राज्य अस्तित्व में आता है। अर्थात समाज के एक निश्चित भूक्षेत्र में किसी सत्ता का निवास ही राज्य है।
जैसे-जैसे समाज का स्वरूप बदलता जाता है, वैसे-वैसे राज्य का भी स्वरूप बदलता जाता है। प्राचीन काल से लेकर अब तक राज्य एवं राजनीति दोनों के स्वरूपों में परिवर्तन हुआ है, अतः स्पष्ट है कि राजनीति एक गतिशील एवं परिवर्तनशील अवधारणा है।
✦ 4. राज्य के स्वरूप का विकास क्रम
राज्य का स्वरूप समाज के बदलने के साथ लगातार बदलता रहा है। राज्य के विकास के ऐतिहासिक क्रम को हम निम्नलिखित प्रकार से इंगित कर सकते हैं:
✦ 5. आधुनिक राज्य और मैकियावेली
आज हम जिस राज्य की चर्चा करते हैं उसे 'राष्ट्र राज्य' (Nation State) कहा जाता है। इसे हम आधुनिक राज्य भी कहते हैं। इसका उदय आधुनिक काल में अर्थात 16वीं शताब्दी में हुआ।
- राष्ट्र राज्य के उदय में पुनर्जागरण आंदोलन, धर्मसुधार आंदोलन तथा व्यापारिक वाणिज्यक क्रांति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- महत्वपूर्ण तथ्य: 'राज्य' शब्द का पहली बार प्रयोग मैकियावेली (Machiavelli) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द प्रिंस' (The Prince) में किया।
- आज राजनीतिशास्त्र का केन्द्रीय विषय यही राज्य है, इसलिए 'राजनीतिक सिद्धांत' (Political Theory) भी आधुनिक काल की देन मानी जाती है।
✦ 6. राज्य के निर्माणक तत्व (संक्षिप्त अवलोकन)
आधुनिक राजनीतिशास्त्र के अनुसार, किसी भी राज्य के निर्माण के लिए मुख्य रूप से चार मौलिक तत्वों का होना अनिवार्य है:
- पर्याप्त जनसंख्या (पहला मानवीय तत्व)
- एक निश्चित भूक्षेत्र
- एक सरकार
- संप्रभुता (Sovereignty) / सर्वोच्च सत्ता
नोट: अंतर्राष्ट्रीय विधिशास्त्रियों ने 'अंतर्राष्ट्रीय मान्यता' (International Recognition) को राज्य का पांचवा तत्व माना है, लेकिन अभी इसे सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किया जा सका है। अतः 4 मौलिक तत्व ही माने जाते हैं।
✦ 7. पहला तत्व: पर्याप्त जनसंख्या (Population)
जनसंख्या राज्य का पहला मानवीय तत्व है। एक राज्य के निर्माण के लिए कितनी जनसंख्या होनी चाहिए यह निश्चित नहीं है, इसलिए 'पर्याप्त जनसंख्या' शब्द का प्रयोग किया गया है। चीन और भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश भी राज्य हैं और वेटिकन सिटी जैसे कम आबादी वाले भी।
"किसी राज्य की जनसंख्या इतनी अधिक न हो कि वह आत्मनिर्भर न बन सके, लेकिन जनसंख्या इतनी कम भी न हो कि वह अपनी सुरक्षा न कर सके।"
| विचारक (Thinker) | आदर्श राज्य की जनसंख्या पर विचार |
|---|---|
| प्लेटो (Plato) | आदर्श राज्य की जनसंख्या 5040 होनी चाहिए। |
| अरस्तू (Aristotle) | जनसंख्या पर्याप्त होनी चाहिए (लगभग 1 लाख), जिसमें 1/10 यानी 10,000 नागरिक होने चाहिए। |
| रूसो (Rousseau) | आदर्श राज्य में 10,000 नागरिक होने चाहिए। |
✦ 8. दूसरा तत्व: निश्चित भूक्षेत्र (Territory)
राज्य के निर्माण के लिए भूक्षेत्र का निश्चित होना आवश्यक है। यदि सीमाएं विवादित हैं तब भी वह राज्य होता है बशर्ते वह घुमक्कड़ राज्य न हो। यहाँ भूक्षेत्र का आशय स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल तीनों से है।
- समुद्री सीमा: यदि किसी राज्य के निकट समुद्र है, तो तट से 15 मील अंदर तक उस राज्य का अपना भूक्षेत्र होता है (इसे जलनिमग्न तट भी कहते हैं)। अरस्तू ने समुद्र में 3 मील (या 12 मील) तक उस राज्य का भूक्षेत्र माना था।
👉 सीले, हाल और डुग्गी: ये विचारक भूमि को राज्य का आवश्यक तत्व नहीं मानते।
👉 ब्लंटशली, मैक्स वेबर और वुडरो विल्सन: ये भूमि को राज्य का आवश्यक तत्व मानते हैं।
✦ 9. तीसरा तत्व: एक सरकार (Government)
व्यावहारिक रूप से राज्य और सरकार में कोई अंतर नहीं माना जाता क्योंकि राज्य के कार्यों, नीतियों और भावनाओं को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर केवल सरकार ही व्यक्त करती है। अतः सरकार राज्य का एजेन्ट या संवाहक है।
सरकार के स्वरूप से ही राज्य का स्वरूप तय होता है:
- यदि राज्य में एक व्यक्ति की सरकार है तो उसे राजतंत्र कहते हैं।
- यदि कुछ व्यक्तियों की सरकार है तो उसे कुलीनतंत्र कहते हैं।
- यदि बहुत सारे व्यक्तियों की सरकार है तो उसे लोकतंत्र के नाम से जाना जाता है।
अतः स्पष्ट है कि सरकार की अच्छाई व बुराई से राज्य की अच्छाई व बुराई तय होती है। राज्य की सम्प्रभुता का प्रयोग सरकार ही करती है।
✦ 10. राज्य और सरकार में सैद्धांतिक व व्यावहारिक अंतर
व्यावहारिक रूप से भले ही राज्य व सरकार में कोई अंतर न हो, लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों में निम्नलिखित अंतर हैं:
| आधार | राज्य (State) | सरकार (Government) |
|---|---|---|
| स्वरूप | राज्य अमूर्त (Abstract) है। | सरकार उसका मूर्त (Concrete) रूप है। |
| सदस्यता | राज्य की सदस्यता अनिवार्य है। | सरकार की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। |
| स्थायित्व | राज्य स्थायी (Permanent) है। | सरकार अस्थायी (Temporary) है। |
| आकार | राज्य का आकार बड़ा होता है। | सरकार का आकार छोटा होता है। |
👉 लॉक (Locke): आधुनिक काल का पहला विचारक है जिसने राज्य और सरकार में स्पष्ट अंतर किया।
✦ 11. चौथा तत्व: सम्प्रभुता (Sovereignty)
सम्प्रभुता को प्रभुसत्ता, सर्वोच्च सत्ता या अंतिम सत्ता भी कहा जाता है। यह एक ऐसा तत्व है जो राज्य को अन्य संस्थाओं से अलग करता है। सम्प्रभुता के अभाव में हम राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकते।
सम्प्रभुता राज्य का वह प्राणतत्व है जिसके कारण वह राज्य अपनी गृह नीति (Internal Policy) व विदेश नीति (Foreign Policy) का निर्धारण स्वयं करता है। देश के अंदर उसके समकक्ष कोई सत्ता नहीं होती और देश के बाहर वह किसी भी बात को मानने के लिए बाध्य नहीं होता।
👉 सम्प्रभुता आधुनिक काल की देन है। इसके जनक जीन बोदां (Jean Bodin) माने जाते हैं।
👉 लोकतंत्र में सम्प्रभुता जनता में निहित है।
👉 भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में सम्प्रभुता संविधान में निहित है।
👉 संघात्मक व्यवस्था में सम्प्रभुता संविधान में निहित होती है, जबकि संसदीय शासन प्रणाली में सम्प्रभुता संसद में निहित होती है (जैसे ब्रिटेन में)।
✦ 12. सम्प्रभुता के महत्वपूर्ण तथ्य व डोमिनियन स्टेट
उपर्युक्त चारों तत्व जहाँ पाये जाते हैं वही राज्य है। इस अर्थ में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि राज्य हैं। जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर आदि राज्य नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय राज्य के घटक या इकाई हैं।
इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ (UN), राष्ट्रमण्डल, विश्व व्यापार संगठन (WTO) भी राज्य नहीं हैं, बल्कि यह स्वतंत्र एवं सम्प्रभु राज्यों के स्वैच्छिक संगठन हैं। किसी संगठन का सदस्य बनने से सम्प्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि यह एक स्वैच्छिक करार है।
❖ भारत राज्य कब बना?
- स्वतंत्रता के पूर्व भारत राज्य नहीं था क्योंकि भारत की नीतियों को अंग्रेज तय करते थे। 15 Aug 1947 के पहले भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश था।
- 15 Aug 1947 से 25 Jan 1950 तक: भारत डोमीनियन स्टेट (Dominion State) था क्योंकि सरकार भारत की थी लेकिन कानून अंग्रेजों का था।
- 26 Jan 1950 को: जब भारत का संविधान पूर्णरूप से लागू हो गया तो कानून और सरकार दोनों भारतीयों की हो गई और भारत पूर्ण सम्प्रभु राज्य बना।
✦ 13. राज्य के कार्य: पुलिस राज्य का स्वरूप
राज्य के कार्यों को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दो प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है:
पुलिस राज्य (Police State): 16वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक पुलिस राज्य का बोलबाला था। यहाँ राज्य का कार्य क्षेत्र सीमित था। वह केवल आवश्यक कार्य करता था जिसके अंतर्गत (1) सीमाओं की सुरक्षा करना, (2) शांति व्यवस्था बनाये रखना, और (3) न्याय प्रदान करना शामिल था।
राज्य का लोककल्याण के कार्यों से कोई लेना-देना नहीं था। सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं था। व्यक्ति स्वतंत्र था, यह व्यक्तिवाद का समर्थन करते थे। अर्थात् व्यक्तिवादी राज्य को साधन और व्यक्ति को साध्य मानते हैं।
✦ 14. लोक कल्याणकारी राज्य और बेवरिज रिपोर्ट
राज्य के केवल आवश्यक कार्य करने का परिणाम यह हुआ कि अमीर और अमीर होता गया और गरीब और गरीब होता गया। इसी विषमता ने संघर्ष और युद्ध को जन्म दिया।
अतः द्वितीय विश्व युद्ध (WWII) के दौरान 1945 में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री क्लीमेण्ट एटली (Clement Attlee) ने विषमता को मिटाने के लिए यह तय करने को कहा कि राज्य को और कौन सा कार्य करना चाहिए। इसके लिए लार्ड विलियम बेवरिज (Lord Beveridge) की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया।
- अशिक्षा दूर करना (Ignorance)
- बेरोजगारी दूर करना (Idleness/Unemployment)
- बीमारी उन्मूलन करना (Disease)
- आश्रयाभाव दूर करना / मकान की व्यवस्था (Squalor)
- दरिद्रता दूर करना (Want/Poverty)
सरकार ने इस रिपोर्ट को लागू कर दिया और जब राज्य ने यह कार्य करना प्रारम्भ कर दिया तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसका नाम 'पुलिस राज्य' से बदलकर 'लोक कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) हो गया।
✦ 15. लोक कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ
लोक कल्याणकारी राज्य वह राज्य होता जो अपने यहाँ निवास करने वाले नागरिकों की न्यूनतम या बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। एक व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकता रोटी, कपडा, व मकान है। जिसे यह प्राप्त नहीं हो रहा वही B.P.L. (Below Poverty Line) है। लोक कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य इन्ही गरीबों का कल्याण करना है।
- लोक कल्याणकारी राज्य और लोकतंत्र दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं।
- यह राज्य मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का समर्थक है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का अर्थ है सरकारीकरण व निजीकरण का मिश्रण।
- लोक कल्याणकारी राज्य अमीरों पर विभिन्न प्रकार के Tax लगाता है और गरीबों के कल्याण की योजनाएं बनाता है ताकि अमीर और गरीब के बीच की विषमता को कम किया जा सके और संघर्ष को टाला जा सके।
"दुनिया में सभी पतित हैं क्योंकि अमीर कभी झुके नहीं और गरीब कभी उठे नहीं।"
✦ 16. आधुनिक राज्य की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा (गार्नर)
आधुनिक काल में राज्य की सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रामाणिक परिभाषा राजनीतिशास्त्री गार्नर (Garner) ने दी है। इस परिभाषा में राज्य के चारों मौलिक तत्व (जनसंख्या, भूभाग, सरकार, और सम्प्रभुता) पूरी तरह से समाहित हैं।
"राज्य व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो न्यूनाधिक एक निश्चित भू-भाग में रहता है तथा बाह्य नियंत्रण से लगभग पूर्णतः मुक्त होता है, जिसका अपना शासन तंत्र होता है और इस शासन तंत्र के प्रति स्वभावतः सभी निवासियों में आज्ञा पालन की भावना होती है।"
ब्लंटशली (Bluntschli) के अनुसार:
"राज्य एक निश्चित भूभाग में रहने वाले राजनीतिक तौर पर संगठित लोगों का जन समुदाय है।"
✦ 17. राज्य पर विचारकों के महत्वपूर्ण कथन (भाग-1)
विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने राज्य की प्रकृति और उसके उद्देश्यों को लेकर अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं:
- 👉 स्पेंसर (Spencer): "राज्य एक ऐसी ज्वाइंट स्टाक कम्पनी (Joint Stock Company) है जो व्यक्तियों को परस्पर सुरक्षा का आश्वासन देती है।"
- 👉 वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson): "विधि के लिए एकता के सूत्र में आबद्ध और निश्चित प्रदेश में रहने वाली जनता ही राज्य है।"
- 👉 बर्क (Burke): "राज्यों को कालीमिर्च या काफी, वस्त्र या तम्बाकू अथवा इस प्रकार की तुच्छ वस्तुओं के व्यापार के लिए किये गये व्यापारिक साझेदारी सी वस्तु नहीं समझना चाहिए।"
- 👉 हीगल (Hegel): "राज्य एक नैतिक भाव का मूर्त रूप है इसमें वस्तु रूप से आत्मा एवं दृढ़ स्वतंत्रता का मिश्रण है।"
- 👉 लेनिन (Lenin): "राज्य को दमन की विशेष अवस्था बताया।" साथ ही लेनिन ने कहा- "जब राज्य होगा तो स्वतंत्रता नहीं होगी और जब स्वतंत्रता होगी तो राज्य अस्तित्व में नहीं रहेगा।"
✦ 18. राज्य पर विचारकों के महत्वपूर्ण कथन (भाग-2)
राज्य और व्यक्ति के संबंधों को स्पष्ट करते हुए कुछ अन्य प्रमुख विचारकों के कथन निम्नलिखित हैं:
- 👉 मैकाइवर (MacIver): "राज्य कानून का संतान व जनक दोनों है।"
- 👉 काण्ट (Kant): "राज्य सर्वोच्च नैतिकता का प्रतिनिधित्व करता है।"
- 👉 अरस्तू (Aristotle): अरस्तू ने राज्य को व्यक्ति से पूर्व माना है। उनके अनुसार- "अच्छे नागरिक उत्तम राज्य का निर्माण करते हैं जबकि बुरे नागरिक बुरे राज्य का निर्माण करते हैं।"
- 👉 रूसो (Rousseau): "सरकार को राज्य का एक जीवित उपकरण माना।"
- 👉 बार्कर (Barker): "राज्य एक सावयव (Organism) नहीं बल्कि सावयव की भाँति है।"
- 👉 मार्क्स (Marx): "राज्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का उपकरण है।"
✦ 19. विभिन्न विचारधाराओं में राज्य का स्वरूप
राजनीति विज्ञान की अलग-अलग विचारधाराओं में राज्य को भिन्न-भिन्न नजरियों से देखा गया है:
- व्यक्तिवाद (Individualism): व्यक्तिवादियों ने राज्य के सीमित कार्यक्षेत्र का समर्थन किया है। ये राज्य को साधन तथा व्यक्ति को साध्य मानते हैं।
- आदर्शवाद, समाजवाद और फासीवाद: ये विचारधाराएँ राज्य को साध्य और व्यक्ति को साधन के रूप में मानती हैं। इनका मानना है कि व्यक्ति अपना सब कुछ केवल राज्य में ही प्राप्त कर सकता है।
- उदारवाद (Liberalism): उदारवाद के अनुसार राज्य साधन एवं साध्य दोनों है।
❖ उदारवाद का विकास क्रम
(व्यक्तिवाद)
उदारवाद
उदारवाद
✦ 20. राज्य और राष्ट्र में अंतर (State vs Nation)
16वीं शताब्दी में जिस राज्य का उदय हुआ उसे 'राष्ट्र राज्य' के नाम से जाना जाता है। व्यावहारिक रूप से आज राज्य और राष्ट्र में कोई अंतर नहीं है (जैसे भारत एक राष्ट्र भी है और राज्य भी)। लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों में स्पष्ट अंतर है:
सूत्र: राष्ट्र + सम्प्रभुता = राज्य
| आधार | राष्ट्र (Nation) | राज्य (State) |
|---|---|---|
| प्रकृति (Nature) | राष्ट्र एक नैतिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक व भावात्मक तत्व है। यह लोगों के लगाव, निष्ठा व अनेकता में एकता से व्यक्त होता है। | राज्य एक भौतिक व राजनैतिक तत्व है, जो सुरक्षा, शांति व न्याय की स्थापना करता है। |
| सम्प्रभुता | राष्ट्र के पास अपनी सम्प्रभुता (Sovereignty) का होना अनिवार्य नहीं है। | राज्य के पास सम्प्रभुता अनिवार्य रूप से होती है। यही मुख्य अंतर है। |
| उदाहरण | स्वतंत्रता (1947) के पूर्व भारत एक 'राष्ट्र' था, लेकिन 'राज्य' नहीं था। | 1950 में संविधान लागू होने के बाद भारत पूर्ण रूप से एक सम्प्रभु 'राज्य' बना। |
नोट: राज्य में राष्ट्र निहित होता है (Nation is a set of Nationality)।
✦ 21. राष्ट्र और राष्ट्रीयता पर विचारकों के मत
एक राष्ट्र वह होता है जिसमें विभिन्न धर्म या भाषा के लोग अपनी निष्ठा एक स्थान पर रखते हैं। यह निष्ठा सामान्य इतिहास, सामान्य भूगोल व सामान्य संस्कृति से आती है। एक राष्ट्र में कई राष्ट्रीयता हो सकती हैं, जिसे बहुराष्ट्रीयता (Multi-nationality) कहते हैं।
राष्ट्र और राष्ट्रीयता में भी अंतर माना जाता है। एक राष्ट्र में कई राष्ट्रीयता हो सकती है, वास्तव में राष्ट्रीयता अपने धर्म या भाषा के प्रति रखा जाने वाला विशेष लगाव है, जैसे एक हिन्दु की राष्ट्रीयता हिन्दु धर्म और मुस्लमान की राष्ट्रीयता मुस्लिम धर्म है, एक राष्ट्र में कई राष्ट्रीयता होने के कारण बहुराष्ट्रीयता का विचार आता है। जब राष्ट्रवाद की भावना होगी, तब राष्ट्र शक्तिशाली होगा। विकास शील देशो की मुख्य समस्या राष्ट्र राज्य का निर्माण है।
- 👉 गार्नर (Garner): "राष्ट्रीयता योगित राष्ट्र को राज्य कहते हैं।"
- 👉 टी. एच. ग्रीन (T.H. Green): "राज्य में राष्ट्र निहित है और इस प्रकार राज्य, राष्ट्र को एक विशिष्ट रूप से संगठित करने पर हो जाता है।"
- 👉 जे. एस. मिल (J.S. Mill): "एक राज्य में एक ही राष्ट्रीयता होनी चाहिए यह दशा स्वतंत्र संस्थाओं के लिए आवश्यक है। जिन राज्यों में एक से अधिक राष्ट्रीयताएं होती हैं, उनमें स्वतंत्र संस्थाओं का अस्तित्व असंभव हो जाता है।" (इन्होंने बहुराष्ट्रीयता का विरोध किया)।
- 👉 लार्ड कर्जन: लार्ड कर्जन ने एक राष्ट्र-राज्य सिद्धांत को 'दो धारी तलवार' कहा।
- 👉 जिमर्न (Zimmern): "राष्ट्र धर्म की भाँति आध्यात्मिक है, राज्य भौतिक है, राष्ट्रीयता मनोवैज्ञानिक है, राजत्व राजनैतिक है।"
- 👉 बेनेडिक्ट एण्डरसन: इन्होंने राष्ट्र को एक कल्पित समुदाय (Imagined Community) बताया है।
✦ 22. राज्य और समाज में अंतर (State vs Society)
यद्यपि राज्य का निर्माण समाज के भीतर ही होता है (समाज के एक निश्चित भूक्षेत्र में किसी सत्ता का निवास ही राज्य है), फिर भी समाज और राज्य में निम्नलिखित महत्वपूर्ण अंतर पाये जाते हैं:
| आधार | समाज (Society) | राज्य (State) |
|---|---|---|
| प्राथमिकता | समाज पूर्ववर्ती (Prior) है। (समाज पहले बना) | राज्य पश्चात्वर्ती (Later) है। (राज्य बाद में बना) |
| सभ्यता | समाज सभ्य एवं असभ्य दोनों हो सकता है। | राज्य सदैव सभ्यता का ही परिचायक है। |
| भूक्षेत्र (Territory) | समाज का भूक्षेत्र निश्चित नहीं होता (ग्रामीण से लेकर अंतर्राष्ट्रीय समाज तक हो सकता है)। | राज्य का भूक्षेत्र सदैव निश्चित होता है। |
| सम्प्रभुता (Sovereignty) | समाज के पास अपनी कोई सम्प्रभुता नहीं होती है। | राज्य के पास सम्प्रभुता (सर्वोच्च शक्ति) होती है। |
| कार्यक्षेत्र | समाज का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। | समाज की तुलना में राज्य का कार्यक्षेत्र संकीर्ण (सीमित) है। |
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