पाश्चात्य राजनीतिक विचारक: टॉमस हिल ग्रीन (T. H. Green) सम्पूर्ण नोट्स
| पाश्चात्य राजनीतिक विचारक: टॉमस हिल ग्रीन (1836-1882) सम्पूर्ण नोट्स |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में ब्रिटिश आदर्शवाद (नव-प्रत्ययवाद) तथा सकारात्मक उदारवाद के जनक टॉमस हिल ग्रीन (T. H. Green) के सम्पूर्ण राजनीतिक दर्शन का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें उनके जीवन परिचय, समुदायवाद के अग्रदूत के रूप में भूमिका, राजनीतिक दायित्व (Political Obligation), पूँजीवाद व निजी सम्पत्ति पर विचार, आन्तरिक व बाह्य स्वतंत्रता, नैतिक अधिकार, राज्य का आधार (शक्ति नहीं बल्कि इच्छा), निवारणात्मक दण्ड सिद्धान्त तथा अंतरराष्ट्रीयतावाद का गहन विश्लेषण शामिल है। आगामी TGT, PGT, LT, GIC, NET/JRF एवं सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए यह एक अत्यंत प्रामाणिक संकलन है। |
- 1. टी. एच. ग्रीन (1836-1882): वैचारिक पृष्ठभूमि एवं महत्वपूर्ण सूत्र
- 2. जीवन परिचय, ब्रिटिश आदर्शवाद का उद्देश्य एवं समुदायवाद
- 3. पूँजीवाद, निजी सम्पत्ति का विनियमन एवं सकारात्मक उदारवाद
- 4. ग्रीन पर दार्शनिक प्रभाव, ऑक्सफोर्ड दर्शन एवं प्रमुख रचना
- 5. ग्रीन का स्वतंत्रता पर विचार (आन्तरिक एवं बाह्य स्वतंत्रता)
- 6. ग्रीन का अधिकार पर विचार (नैतिक एवं सामाजिक अधिकार)
- 7. ग्रीन का राज्य, दण्ड सिद्धान्त एवं अंतरराष्ट्रीयता पर विचार
- 8. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
✦ 1. टी. एच. ग्रीन (1836-1882): वैचारिक पृष्ठभूमि एवं महत्वपूर्ण सूत्र
विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएँ राज्य को साध्य (End) मानने के लिए अलग-अलग आधार प्रस्तुत करती हैं, जिनका तुलनात्मक विवरण निम्नलिखित है:
| विचारधारा (Ideology) | मुख्य आधार | राज्य की स्थिति |
|---|---|---|
| आदर्शवाद (Idealism) | नैतिकता के आधार पर | राज्य को साध्य मानता है। |
| फासीवाद (Fascism) | कट्टरता के आधार पर | राज्य को साध्य मानता है। |
| समाजवाद (Socialism) | कल्याण के आधार पर | राज्य को साध्य मानता है। |
■ टी. एच. ग्रीन के दर्शन के प्रमुख सार-बिन्दु
- चिंतन क्रम: पाश्चात्य चिंतन परंपरा में हॉब्स, लॉक, बेंथम, हीगल और ग्रीन का वैचारिक विकास क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- समुदायवाद का अग्रदूत: ग्रीन के अनुसार व्यक्ति के पृथक-पृथक हितों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, बल्कि समुदाय के हित को बढ़ावा देना चाहिए। इसीलिए ग्रीन को 'समुदायवाद का अग्रदूत' माना जाता है तथा 'सामाजिक मानव' का विचार भी ग्रीन ने ही दिया।
- राजनीतिक दायित्व (Political Obligation): इसके दो पक्ष हैं— नकारात्मक दायित्व (राज्य का विरोध न करना/अवज्ञा से बचना) और सकारात्मक दायित्व (राज्य का समर्थन करना)। इंग्लैण्ड में बुद्धिजीवियों का गुट जर्मन आदर्शवाद के उग्र प्रभाव को रोकने के लिए सक्रिय हुआ, जिसे नव-प्रत्ययवाद कहा गया।
- दार्शनिक प्रभाव व प्रमुख सूत्र: ग्रीन अरस्तू, रूसो, काण्ट और हीगल से प्रभावित था। ग्रीन का प्रसिद्ध कथन है— "राज्य एक आवश्यक भलाई है।"
- महत्वपूर्ण विचार: ग्रीन के अनुसार "आत्म तत्व समाज तत्व है और व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है।" उन्होंने यह भी कहा कि "नशाखोरी अपनी कमियों को छिपाने की क्रिया है" तथा "बुद्धिजीविता में एकता नहीं होती है।"
- ऐतिहासिक सन्दर्भ (1833): सन् 1833 में इंग्लैण्ड में व्यापारिक क्रियाकलाप चरम पर था। उस समय अशिक्षितों को वोट देने का अधिकार नहीं था, इसलिए सरकार केवल पूँजीपतियों के हित में कार्य करती थी।
परीक्षा उपयोगी प्रश्न: "राज्य का कार्य बाधाओं को बाधित करना है" (The function of the state is to hinder the hindrances) — इस कथन में ग्रीन किसकी नीति पर चलता है? उत्तर: प्रत्ययवाद (Idealism)।
✦ 2. जीवन परिचय, ब्रिटिश आदर्शवाद का उद्देश्य एवं समुदायवाद
ब्रिटिश आदर्शवाद या नव-प्रत्ययवाद तथा सकारात्मक उदारवाद के जनक, लोक कल्याणकारी राज्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले तथा 'सामाजिक मानव' का विचार देने वाले टॉमस हिल ग्रीन का जन्म सन् 1836 में इंग्लैण्ड के यॉर्कशायर (Yorkshire) में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।
ब्रिटिश आदर्शवाद का मुख्य उद्देश्य: ब्रिटिश आदर्शवाद को जन्म देने का मुख्य उद्देश्य जर्मन आदर्शवाद (तथा मार्क्सवादी क्रांति के खतरे) से ब्रिटिश पूँजीवाद को बचाना था।
ग्रीन से पहले जॉन लॉक ने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था और बेंथम ने उपयोगितावाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। ग्रीन ने इन दोनों का खण्डन किया और कहा कि—
"आत्म तत्व समाज तत्व है तथा मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।"
ग्रीन ने व्यक्ति के पृथक-पृथक हितों को मान्यता न देते हुए उन्हें सामूहिक मान्यता प्रदान की, इसीलिए ग्रीन को 'समुदायवाद का अग्रदूत' (Forerunner of Communitarianism) माना जाता है।
✦ 3. पूँजीवाद, निजी सम्पत्ति का विनियमन एवं सकारात्मक उदारवाद
ग्रीन ने पूँजीवाद की दो मान्यताओं में अपना विश्वास व्यक्त किया:
- निजी सम्पत्ति: निजी सम्पत्ति व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है।
- गरीबी का कारण: वर्तमान गरीबी और बेरोजगारी का कारण पूँजीवाद नहीं है, बल्कि जमींदारी व्यवस्था (सामंतवादी भूमि व्यवस्था) है।
ग्रीन का मुख्य उद्देश्य इंग्लैण्ड की तत्कालीन विचारधारा में परिवर्तन करके ऐसी विचारधारा का निर्माण करना था ताकि जर्मन आदर्शवाद से इंग्लैण्ड को बचाया जा सके। ग्रीन ने स्पष्ट कहा कि सम्पत्ति व्यक्तित्व के विकास में आवश्यक है, लेकिन ऐसी सम्पत्ति जो सामाजिक हितों को नुकसान पहुँचाये, उसे विनियमित (Regulate) किया जाना चाहिए।
■ नकारात्मक उदारवाद में संशोधन और सकारात्मक उदारवाद का जन्म
ग्रीन से पहले इंग्लैण्ड में नकारात्मक उदारवाद (Negative Liberalism) का बोलबाला था, जिसमें यह माना जाता था कि राज्य को केवल सुरक्षा, शांति व्यवस्था व न्याय तक ही सीमित रहना चाहिए; सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को अपने विकास के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।
लेकिन ग्रीन ने इसमें संशोधन किया और कहा कि राज्य को अपने आवश्यक कार्यों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में भी 'सामाजिक हित' के आधार पर कार्य करना चाहिए। इस प्रकार ग्रीन 'सकारात्मक उदारवाद के जनक' (Father of Positive Liberalism) बने।
ग्रीन ने व्यक्ति को एक सामाजिक प्राणी के रूप में देखा और राज्य को एक 'आवश्यक बुराई' न मानकर एक 'सकारात्मक भलाई' (Positive Good) माना। ग्रीन ने यहाँ तक कहा कि राज्य को अशिक्षा (अज्ञानता), दरिद्रता (गरीबी) और नशाखोरी को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
✦ 4. ग्रीन पर दार्शनिक प्रभाव, ऑक्सफोर्ड दर्शन एवं प्रमुख रचना
ग्रीन ने राज्य को एक नैतिक संस्था के रूप में भी देखा। राज्य की नैतिक महत्ता को स्थापित करके उन्होंने हीगल का अनुसरण किया और ब्रिटिश प्रत्ययवाद के जनक बने।
- काण्ट, अरस्तू व रूसो का प्रभाव: ग्रीन पर सर्वाधिक प्रभाव इमैनुअल काण्ट (Kant) का पड़ा। काण्ट की तरह उन्होंने अंतरराष्ट्रीयतावाद या 'वसुधैव कुटुम्बकम्' को महत्व दिया। इसके अतिरिक्त ग्रीन पर अरस्तू और रूसो का भी गहरा प्रभाव पड़ा है।
- लोक कल्याणकारी राज्य की पृष्ठभूमि: ग्रीन ने व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य की स्थापना की बात करके लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का मार्ग प्रशस्त किया, यद्यपि लोक कल्याणकारी राज्य के व्यावहारिक जनक हेराल्ड लास्की (Laski) माने जाते हैं।
- ऑक्सफोर्ड दर्शन व राजनीतिक सक्रियता: ग्रीन के दर्शन को 'ऑक्सफोर्ड दर्शन' (Oxford Philosophy) के नाम से जाना जाता है। ग्रीन उदार दल (Liberal Party) के सक्रिय सदस्य रहे और उन्हें नशाबंदी से जुड़े 'ऑक्सफोर्ड बैण्ड ऑफ टेम्परेंस' (Oxford Band of Temperance) नामक यूनियन के पद पर भी प्रतिष्ठित किया गया।
- प्रमुख पुस्तक एवं मृत्यु: ग्रीन के राजनीतिक विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'Lectures on the Principles of Political Obligation' में मिलते हैं। ग्रीन की मृत्यु सन् 1882 में हुई।
✦ 5. ग्रीन का स्वतंत्रता पर विचार (आन्तरिक एवं बाह्य स्वतंत्रता)
काण्ट की भाँति ग्रीन का सम्पूर्ण व्यावहारिक दर्शन उनकी नैतिक स्वतंत्रता की इच्छा पर आधारित है। ग्रीन कहते हैं कि— "आत्म तत्व समाज तत्व है और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जिस प्रकार आत्मा अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति परमात्मा के साथ करती है, उसी प्रकार व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति राज्य के साथ करता है।" ग्रीन, रूसो की 'सामान्य इच्छा' से काफी प्रभावित हैं।
■ स्वतंत्रता के दो भाग
ग्रीन ने स्वतंत्रता को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा है:
इसका शाब्दिक अर्थ है अपनी मनोवृत्तियों (इच्छाओं/वासनाओं) को अपने वश में रखना। यह आचारशास्त्र (Ethics) का विषय है।
इसका शाब्दिक अर्थ है उन सभी बाह्य परिस्थितियों का होना जो व्यक्ति के आन्तरिक व बाह्य (नैतिक) विकास में सहायक हैं।
ग्रीन का प्रसिद्ध कथन: "स्वतंत्रता ऐसे कार्यों को करने या पाने का नाम है जो करने योग्य हो।" (यहाँ 'योग्यता' का शाब्दिक अर्थ सामाजिक हित है)।
ग्रीन पुनः लिखते हैं: "जिस प्रकार सौन्दर्यता केवल कुरूपता का अभाव नहीं है, उसी प्रकार स्वतंत्रता केवल प्रतिबन्धों का अभाव नहीं है।"
अर्नेस्ट बार्कर (Barker) का कथन: ग्रीन के स्वतंत्रता सम्बन्धी विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए बार्कर ने लिखा है— "मानव चेतना स्वतंत्रता चाहती है, स्वतंत्रता में अधिकार निहित हैं और अधिकार राज्य की मांग करते हैं।"
अतः स्पष्ट है कि ग्रीन का स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार वास्तविक व सकारात्मक है तथा इसकी प्राप्ति राज्य में ही रहकर की जा सकती है। साथ ही ग्रीन का यह भी मानना है कि "नैतिकता और शक्ति एक-दूसरे के विरोधी होते हैं।"
✦ 6. ग्रीन का अधिकार पर विचार (नैतिक एवं सामाजिक अधिकार)
ग्रीन ने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को ठुकरा दिया, क्योंकि प्राकृतिक अधिकार व्यक्ति के नैतिक विकास में सहायक नहीं हैं और इनका दृष्टिकोण संकीर्ण व्यक्तिवादी है।
- ग्रीन का मानना है कि अधिकार राज्य की देन हैं और ये व्यक्ति के नैतिक विकास में सहायक हैं।
- अधिकारों को समाज स्वीकृति प्रदान करता है और राज्य इसका क्रियान्वयन व संरक्षण करता है।
- ग्रीन का मानना है कि राज्य के विरुद्ध व्यक्ति के कोई अधिकार नहीं हैं। राज्य व समाज से पूर्व अधिकारों की कल्पना नहीं हो सकती। इस प्रकार ग्रीन नैतिक अधिकार को महत्व देते हैं।
अधिकार पर ग्रीन का प्रसिद्ध कथन: "अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थितियां हैं जिनके अभाव में कोई व्यक्ति अपना नैतिक विकास नहीं कर सकता।"
✦ 7. ग्रीन का राज्य, दण्ड सिद्धान्त एवं अंतरराष्ट्रीयता पर विचार
■ राज्य का आधार: शक्ति नहीं बल्कि इच्छा
ग्रीन का मानना है कि ऐसा राज्य जिसका आधार केवल पाश्विक शक्ति है, वह लम्बे समय तक कायम नहीं रह सकता। राज्य एक नैतिक संस्था है और इसका उद्देश्य व्यक्ति का नैतिक विकास करना है।
ग्रीन यह भी कहता है कि सामान्यतः राज्य के विरोध का अधिकार किसी भी व्यक्ति को प्राप्त नहीं है। राज्य की बुरी से बुरी विधियों (कानूनों) का विरोध भी संवैधानिक तरीके से किया जाना चाहिए।
■ निवारणात्मक दण्ड सिद्धान्त (Preventive Theory of Punishment)
ऐसे व्यक्ति जो नैतिकता का उल्लंघन करते हैं या सामाजिक हित को नुकसान पहुँचाते हैं, राज्य उन्हें दण्ड भी देता है। ग्रीन 'निवारणात्मक दण्ड सिद्धान्त' के समर्थक हैं। इसका मुख्य उद्देश्य है— व्यक्ति के मस्तिष्क में भय का संचार करके उसे भविष्य में अपराध करने से रोकना (ताकि सामाजिक जीवन की बाह्य परिस्थितियां सुरक्षित रहें)।
ग्रीन का प्रसिद्ध कथन: "समाज के बिना मनुष्य नहीं।"
■ अंतरराष्ट्रीयतावाद एवं युद्ध का विरोध
हीगल के उग्र राष्ट्रवाद के विपरीत, ग्रीन अंतरराष्ट्रीयता (Internationalism) में विश्वास करते हैं। वह काण्ट की भाँति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (विश्व बन्धुत्व) को महत्व देते हैं और युद्ध के घोर विरोधी हैं।
युद्ध पर ग्रीन का प्रसिद्ध कथन: "युद्ध एक सामूहिक नरसंहार (सामूहिक हत्या) है।"
ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज व मानवता के व्यापक हित में ही मनुष्य का वास्तविक हित छिपा हुआ है।
✍️ 8. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त सम्पूर्ण अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि टॉमस हिल ग्रीन (T. H. Green) ने जर्मन आदर्शवाद की निरंकुशता और ब्रिटिश उदारवाद के संकीर्ण व्यक्तिवाद के बीच एक अद्भुत समन्वय स्थापित करके 'ब्रिटिश आदर्शवाद' (नव-प्रत्ययवाद) और 'सकारात्मक उदारवाद' को जन्म दिया। उन्होंने राज्य को 'आवश्यक बुराई' के स्थान पर एक 'आवश्यक एवं सकारात्मक भलाई' घोषित किया, जिसका मुख्य कार्य व्यक्ति के नैतिक विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं—अशिक्षा, गरीबी और नशाखोरी—को बाधित करना है।
ग्रीन का यह अमर सूत्र कि "राज्य का आधार शक्ति नहीं बल्कि इच्छा है" और बार्कर द्वारा वर्णित उनके दर्शन का सार कि "मानव चेतना स्वतंत्रता चाहती है, स्वतंत्रता में अधिकार निहित हैं और अधिकार राज्य की मांग करते हैं", उन्हें आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य और समुदायवाद का सच्चा अग्रदूत सिद्ध करता है।
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