भारतीय संविधान: प्रस्तावना, संघ राज्य क्षेत्र एवं नागरिकता

भारतीय संविधान की प्रस्तावना, संघ राज्य क्षेत्र और नागरिकता के विस्तृत अध्ययन नोट्स, जो TGT, PGT, LT, GIC और NET/JRF परीक्षाओं की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण हैं
भारतीय संविधान: प्रस्तावना, संघ राज्य क्षेत्र (भाग-1) एवं नागरिकता (भाग-2)
Study Material Overview: प्रस्तुत मेगा पोस्ट में भारतीय संविधान के प्रारंभिक और सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों का एक साथ विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) एवं न्यायिक निर्णय, भाग-1 (अनुच्छेद 1-4) के तहत संघ व राज्यों का पुनर्गठन, क्षेत्रीय परिषदें, तथा भाग-2 (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों का प्रामाणिक विश्लेषण किया गया है। आगामी TGT, PGT, NET/JRF व UPSC परीक्षाओं के लिए यह एक अत्यंत रामबाण संकलन है।

✦ 1. प्रस्तावना: अर्थ, महत्व एवं मूल पाठ

प्रस्तावना को संविधान की 'उद्देशिका', 'आमुख', संविधान का दर्पण तथा संविधान की आत्मा के रूप में देखा जाता है। प्रस्तावना को संविधान की 'कुंजी' भी कहा जाता है।

■ प्रस्तावना का महत्व

संविधान में प्रस्तावना का वही महत्व है जो किसी पुस्तक के आरम्भ में 'भूमिका' का होता है। जिस प्रकार से पुस्तक की भूमिका पढ़ लेने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि पुस्तक को लिखने के पीछे लेखक का क्या उद्देश्य है और वह अपने पाठकों को क्या संदेश देना चाहता है, उसी प्रकार प्रस्तावना पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माण के पीछे संविधान निर्माताओं का क्या उद्देश्य है और वे भारत में कौन-सी शासन प्रणाली की स्थापना करना चाहते हैं तथा अपने नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार व स्वतंत्रताएं देना चाहते हैं।

■ प्रस्तावना पर प्रमुख विचारकों के कथन

  • के. एम. मुंशी: इन्होंने प्रस्तावना को 'संविधान की राजनीतिक जन्म कुण्डली' (Political Horoscope) कहा है।
  • सर अर्नेस्ट बार्कर: इन्होंने प्रस्तावना पढ़कर संविधान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि, "प्रस्तावना पढ़ लेने के बाद संविधान में कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता।"
बीज / आत्मा / नींव
(प्रस्तावना)
↔
वृक्ष / शरीर / मकान
(संविधान)

नोट: जो सम्बन्ध बीज और वृक्ष में है, नींव और मकान में है, आत्मा और शरीर में है, वही सम्बन्ध प्रस्तावना और संविधान में है। प्रस्तावना के अभाव में संविधान एक 'उपन्यास' बनकर रह जाता है। ध्यान रहे कि प्रस्तावना को सर्वसम्मति से 'संविधान की आत्मा' के रूप में स्वीकार किया गया है।

■ प्रस्तावना की कानूनी स्थिति

यद्यपि प्रस्तावना का कोई कानूनी महत्व नहीं है, यह न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय (Non-justiciable) है, अर्थात न्यायालय द्वारा इसे लागू नहीं कराया जा सकता। इसके बावजूद इसका महत्व कम नहीं है क्योंकि जहाँ संविधान की भाषा अस्पष्ट और संदिग्ध है, उसके निर्वचन (व्याख्या) में हम प्रस्तावना की मदद ले सकते हैं।

■ प्रस्तावना का मूल पाठ (Text of Preamble)

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को; सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

✦ 2. प्रस्तावना में निहित आदर्श एवं न्यायिक निर्णय

प्रस्तावना में निहित आदर्शों की विवेचना निम्नलिखित है:

आदर्श (Ideals) विस्तृत अर्थ (Meaning)
1. सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न इसका अर्थ संप्रभुता से है। एक सम्प्रभु राज्य वह होता है जो अपनी गृह नीति और विदेश नीति का निर्धारण स्वयं करता है और देश के अन्दर व देश के बाहर वह किसी की बात को मानने के लिए बाध्य नहीं होता। भारत 26 जनवरी 1950 को एक सम्प्रभु राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
2. समाजवाद समाजवाद का अर्थ राष्ट्रीयकरण से होता है, अर्थात् उत्पादन, वितरण और विनिमय के साधनों का पूर्णतया राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। लेकिन भारत का समाजवाद पूर्व सोवियत संघ के समाजवाद से भिन्न है। भारत ने इसके लिए 'समाजवादी ढांचे' शब्द का प्रयोग किया है और इसका प्रतिपादन 1955 में तमिलनाडु के अवादी अधिवेशन में किया गया था।

पं. जवाहर लाल नेहरू ने इसे 'लोकतान्त्रिक समाजवाद' की संज्ञा दिया है। भारत का समाजवाद राष्ट्रीयकरण व निजीकरण का समन्वय करता है और अमीर तथा गरीब दोनों को आगे बढ़ने का अवसर देता है। पं. जवाहर लाल नेहरू की पंचवर्षीय योजनायें इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, निजी सम्पत्ति को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बनाया जाना, जमींदारी उन्मूलन आदि समाजवाद की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।
3. पंथनिरपेक्षता इसका आशय यह है कि राज्य सभी धर्मों को समान रूप से मानता है। यह धर्मों के मामले में तटस्थ है तथा अपने यहाँ सभी व्यक्तियों को अपने अन्तःकरण की स्वतंत्रता तथा किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने व प्रचार करने की छूट देता है। भारतीय पंथनिरपेक्षता का दृष्टिकोण सकारात्मक है। यह धर्म-विरोधी प्रचार या नास्तिकता को बढ़ावा नहीं देता।
4. लोकतंत्र यह एक ऐसी शासन प्रणाली को व्यक्त करता है जिसमें अंतिम सत्ता जनता में होती है और जनता के द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि शासन करता है। लोकतंत्र जनता की सहमति पर आधारित शासन है।
5. गणराज्य यदि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष आनुवंशिक या वंशानुगत न होकर उस देश की जनता के द्वारा प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है तो वहाँ गणराज्य होता है। इंग्लैंड में सम्राट आनुवंशिक है इसलिए वहां गणतंत्र नहीं है।

■ प्रस्तावना में न्याय के तीन रूप

  • (6) सामाजिक न्याय: समाज जाति, धर्म, भाषा, लिंग व विशेषाधिकारों पर आधारित न हो। सामाजिक न्याय का उद्देश्य गरीब का हित है और यह समाज में भाईचारे की स्थापना के लिए आवश्यक होता है। सामाजिक न्याय को लोककल्याणकारी राज्य की आधारशिला माना जाता है।
  • (7) आर्थिक न्याय: इसका अर्थ है आर्थिक विषमता कम से कम हो, गरीबों का शोषण न हो तथा गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले नागरिकों की बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति हो।
  • (8) राजनीतिक न्याय: बिना किसी भेदभाव के सभी को राजनीति में भागीदारी का अवसर मिले। कोई इस आधार पर राजनीति से वंचित न रह जाये कि वह आर्थिक रूप से विपन्न है।

■ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की अखंडता

  • (9) व्यक्ति की गरिमा: इसे भारतीय संविधान की इकाई बनाया गया है। यह सामाजिक न्याय की स्थापना के अनुरूप है। भारत में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ सभी प्रकार के भेदभाव करता था। जब तक प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा बहाल नहीं होगी तब तक भारत में सच्चे अर्थ में लोकतंत्र की स्थापना नहीं होगी। डॉ. अम्बेडकर ने गाँव को संविधान की इकाई बनाने से इंकार करते हुए कहा कि "गाँव साम्प्रदायिकता और अज्ञानता के गुफा हैं।"
  • (10) राष्ट्र की अखंडता: राष्ट्र की अखंडता संविधान की पहली प्राथमिकता रही क्योंकि भारतीय समाज इतना विविधतामूलक था कि इसे एकजुट कर पाना सम्भव नहीं था, इसलिए अखंडता को महत्वपूर्ण स्थान देते हुए संविधान निर्माताओं ने कई ऐसे प्रावधान रखे जो विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश के संविधान में नहीं है। जैसे- राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ व अध्यादेश जारी करने की शक्ति आदि।

■ प्रस्तावना पर न्यायिक निर्णय व अन्य तथ्य

  • (1) बेरुबारी यूनियन बनाम भारत संघ (1960): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है और इसमें अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संशोधन नहीं किया जा सकता। प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।
  • (2) केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): सर्वोच्च न्यायालय की 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने 7:6 के बहुमत से पूर्व के निर्णय को पलटते हुए कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग है और अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत इसमें संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान का मूल ढाँचा (Basic Structure) नष्ट न हो।
  • (3) 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976): इसके द्वारा प्रस्तावना में तीन नए शब्द — समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, और अखण्डता या निष्ठा शब्द जोड़े गए।
  • (4) संशोधन की आवृत्ति: प्रस्तावना में केवल एक बार संशोधन हुआ है।
  • (5) प्रस्तावना पर प्रभाव: प्रस्तावना पर फ़्रांसीसी, अमेरिकी और रूसी क्रान्ति का प्रभाव है।
  • (6) देश का नामकरण: हमारे देश को इण्डिया और भारत दो नामों से संबोधित किया गया है। 'इण्डिया' पहले और 'भारत' शब्द का प्रयोग वैधानिक तौर पर 26 जनवरी 1950 को हुआ।

✦ 3. संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र: भाग-1 (अनुच्छेद 1 से 4)

भारतीय संविधान के भाग-1 में अनुच्छेद 1 से लेकर 4 तक में संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र का व्यापक प्रावधान किया गया है।

अनुच्छेद 1 (Article 1):

"इण्डिया जो कि भारत है राज्यों का संघ होगा।" (India shall be a union of states)

इससे निम्नलिखित अर्थ निकलता है:

  • (I) भारतीय संघ अमेरिका की तरह राज्यों के आपसी समझौते का परिणाम नहीं है, अर्थात भारत में संघ ने राज्यों का निर्माण किया है।
  • (II) राज्यों को संघ से अलग होने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
  • (III) भारत के सभी राज्यों पर एक समान लागू होता है। (यह भाग जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होता था क्योंकि अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत जम्मू और कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान किया गया था। यद्यपि अनुच्छेद-1 के अन्तर्गत जम्मू कश्मीर भी भारत का अविभाज्य एवं अभिन्न अंग है।)

ध्यान रहे: अनुच्छेद-1 में भारत की प्रकृति या परिभाषा बताया गया है।

  • अनुच्छेद 2: भारतीय संघ में नये राज्यों के प्रवेश या स्थापना का प्रावधान है। ध्यान रहे कि विदेशों से अर्जित भू-क्षेत्र को नये राज्य के रूप में इसी के अन्तर्गत भारतीय संघ में प्रवेश दिलाया जाता है।
  • अनुच्छेद 3: नये राज्यों के निर्माण तथा वर्तमान राज्यों के नामों, सीमाओं और क्षेत्रों में परिवर्तन सम्बन्धी प्रावधान अपनाये गये हैं।
    नये राज्यों के निर्माण का अधिकार भारत में संसद को प्राप्त है। इसके लिए राज्यों की सहमति आवश्यक नहीं है (यह अनुच्छेद J&K पर लागू नहीं होता था)। राज्यों के निर्माण के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से एक विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग साधारण बहुमत से पारित हो जाता है तो पुनः राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक विधि बन जाता है और नया राज्य अस्तित्व में आ जाता है।
  • अनुच्छेद 4: अनुच्छेद 2 और 3 के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया संविधान में संशोधन की प्रक्रिया नहीं मानी जायेगी।

✦ 4. राज्यों का पुनर्गठन (आयोग एवं समितियां)

राज्यों के पुनर्गठन के सम्बन्ध में कुछ तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • (1) नेहरू रिपोर्ट (1928): 1928 में बनी नेहरू रिपोर्ट में इस बात का प्रावधान किया गया था कि भाषायी आधार पर भारत के प्रान्तों का पुनर्गठन होना चाहिए।
  • (2) एस. के. धर आयोग (1947): 27 Nov. 1947 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस. के. धर की अध्यक्षता में प्रान्तों के पुनर्गठन के लिए एक आयोग बनाया। इस आयोग ने प्रशासनिक आधार पर प्रान्तों के पुनर्गठन की बात कही जिसे अस्वीकार कर दिया गया (रिपोर्ट- 10 Dec. 1948)।
  • (3) पोट्टी श्रीरामुलु का आन्दोलन: पोट्टी श्रीरामुलु के नेतृत्व में मद्रास से अलग आन्ध्र प्रदेश राज्य की मांग कर रहे तेलुगू भाषी लोग आन्दोलन पर थे।
  • (4) जे.वी.पी. समिति (1948): 1 Dec. 1948 को कांग्रेस कार्यकारिणी ने भाषायी आधार पर मद्रास प्रान्त के पुनर्गठन के मुद्दे का परीक्षण करने के लिए JVP कमेटी (Jawaharlal, Vallabhbhai, Pattabhi) बनायी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भाषायी आधार का विरोध करते हुए भी जन-भावनाओं को महत्वपूर्ण बताया। 1 अप्रैल 1949 को रिपोर्ट प्रस्तुत किया।
(5) आन्ध्र प्रदेश का गठन:

इस रिपोर्ट के बाद पोट्टी श्रीरामुलु के नेतृत्व में आन्दोलन तेज हो गया। पोट्टी श्रीरामुलु 56 दिन के लिए आमरण अनशन पर बैठे और इस दौरान उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद हिंसक आन्दोलन भड़क उठा। तत्कालीन परिस्थितियों को भांपते हुए 1 अक्टूबर 1953 को भाषायी आधार पर पहला राज्य आन्ध्र प्रदेश बना।

  • (6) फजल अली आयोग (1953): 22 Dec. 1953 को फजल अली की अध्यक्षता में एक 3 सदस्यीय राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया जिसके अन्य 2 सदस्य के. एम. पणिक्कर और हृदयनाथ कुंजरू थे। इसने अपनी रिपोर्ट 30 Sep. 1955 को भारत सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में भाषायी आधार का उल्लेख नहीं था। सरकार ने भाषायी आधार को अपनी तरफ से जोड़ते हुए राज्यों का पुनर्गठन कर दिया।
  • (7) 1 Nov. 1956: को 14 राज्य और 6 केन्द्रशासित प्रदेश अस्तित्व में आये। (जम्मू कश्मीर भी)।

✦ 5. नए राज्यों का गठन (वर्षवार सूची)

भारत में भाषायी और प्रशासनिक आधार पर 1956 के बाद गठित प्रमुख राज्यों का वर्षवार विवरण इस प्रकार है:

गठन वर्ष राज्य / विवरण
1953 आन्ध्र प्रदेश: (भाषायी आधार पर पहला राज्य, 1 अक्टूबर 1953)
1956 राजस्थान
1954 / 1962 पांडिचेरी: 14वें संविधान संशोधन अधिनियम 1962 द्वारा पांडिचेरी को भारत का केन्द्रशासित राज्य बनाया गया। ज्ञातव्य है कि 1954 में फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी, माहे, यनम और कराइकल को समझौते द्वारा भारत को सौंप दिया गया था।
1961 गोवा, दमन एवं दीव: 1961 में सैनिक कार्यवाही (ऑपरेशन विजय) द्वारा गोवा, दमन एवं दीव को पुर्तगालियों से मुक्त कराकर उसे संघ राज्य क्षेत्र का दर्जा दिया गया।
1960 गुजरात (15वां राज्य), महाराष्ट्र: 1960 में गुजरात का गठन बम्बई प्रान्त से गुजराती भाषी क्षेत्रों को पृथक कर किया गया।
1963 नागालैंड (16वां राज्य): 1963 में असम से अलग कर नागालैंड को भारत का 16वाँ राज्य बनाया गया।
1966 हरियाणा: 1966 में पंजाब से हिन्दी भाषियों को अलग कर हरियाणा राज्य बनाया गया। चंडीगढ़ को संघशासित क्षेत्र बना दिया गया।
1971 हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा 1971 में प्रदान किया गया था।
1972 मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा: 1969 में असम को पुन: विभाजित कर मेघालय उपराज्य बनाया गया जिसे 1972 में मणिपुर और त्रिपुरा के साथ राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया गया।
1974 / 1975 सिक्किम: 1974 में 35वें संविधान संशोधन द्वारा सिक्किम को भारत के सहराज्य (Associate state) का दर्जा दिया गया तथा 36वें संविधान संशोधन 1975 द्वारा इसे पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करते हुए भारत का 22वाँ राज्य बनाया गया।
1987 मिजोरम (23वां), अरुणाचल प्रदेश (24वां), गोवा: 1987 में मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य बनाया गया। पुनः 56वें संशोधन अधिनियम 1987 द्वारा गोवा को 25वाँ राज्य बना दिया गया।
2000 (नवम्बर) छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश से पृथक कर भारत का 26वाँ राज्य बनाया गया - 1 Nov. 2000
उत्तराखण्ड: उत्तर प्रदेश से पृथक कर उत्तराखण्ड को 27वाँ राज्य बनाया गया - 9 Nov. 2000
झारखण्ड: बिहार से अलग कर झारखण्ड को 28वाँ राज्य बनाया गया - 15 Nov. 2000
2014 तेलंगाना: आन्ध्र प्रदेश से अलग कर तेलंगाना को 29वें राज्य का दर्जा 2 June 2014 को दिया गया।

इस प्रकार वर्तमान में भारत में कुल 28 राज्य व 8 संघशासित क्षेत्र हैं। ज्ञातव्य है कि 69वें संविधान संशोधन अधिनियम 1991 द्वारा संघ शासित क्षेत्र दिल्ली का नाम बदलकर 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली' कर दिया गया। उल्लेखनीय है संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

✦ 6. क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils) एवं मुख्यालय

क्षेत्रीय परिषदों के सम्बन्ध में मूल संविधान में कोई प्रावधान नहीं था। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 की धारा-15 में इसके सम्बन्ध में प्रावधान किया गया। वर्तमान में भारत में कुल 5 क्षेत्रीय परिषदें हैं। इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

भारत के गृहमंत्री या राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत केन्द्रीय मंत्री परिषद् का अध्यक्ष तथा सम्बन्धित राज्यों के मुख्यमंत्री उपाध्यक्ष होते हैं। क्षेत्रीय परिषदें केवल चर्चात्मक तथा परामर्शदात्री निकाय हैं। ये क्षेत्रीय परिषदें निम्नलिखित हैं:

  • (1) उत्तरी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय - नई दिल्ली
  • (2) मध्य क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय - इलाहाबाद (प्रयागराज)
  • (3) दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय - चेन्नई
  • (4) पूर्वी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय - कोलकाता
  • (5) पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय - मुम्बई
दिल्ली
मुम्बई ←
इलाहाबाद
→ कोलकाता
चेन्नई

✦ 7. नागरिकता: अर्थ, प्रकार एवं भाग-2 (अनुच्छेद 5-11)

एक नागरिक वह होता है जो राज्य में अधिकार रखता है। नागरिकता राज्य का गुण है और यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ही सम्भव है। नागरिकता का उदय आधुनिक काल में हुआ और यह राष्ट्र-राज्य के उदय के साथ जुड़ा है। नागरिकता का विचार मुख्य रूप से फ़्रांसीसी क्रान्ति ने दिया।

■ नागरिकता के प्रकार

नागरिकता निम्नलिखित 2 प्रकार की होती है:

  1. औपचारिक नागरिकता (Formal Citizenship): इसके अन्तर्गत व्यक्ति को केवल नागरिक अधिकार प्राप्त होता है। नागरिक अधिकारों की रक्षा न्यायालय करता है। (जैसे- 2003 से विश्व के विभिन्न 16 देशों में बसे अप्रवासी भारतीयों को दोहरी नागरिकता प्रदान किया गया है। उन्हें भारत में केवल नागरिक अधिकार प्राप्त होगा, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार नहीं)।
  2. तात्विक नागरिकता (Real Citizenship): इसके अन्तर्गत व्यक्ति को राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक तीनों नागरिकता प्राप्त होती है। राजनीतिक नागरिकता के अंतर्गत राजनीतिक अधिकार मिलता है, इसकी रक्षा राजनीतिक संस्थाएं करती हैं, जबकि सामाजिक नागरिकता के अंतर्गत व्यक्ति को सामाजिक अधिकार प्राप्त होता है और इसकी रक्षा सामाजिक संस्थाएं करती हैं।

भारतीय संविधान के भाग-2 में अनुच्छेद 5-11 तक में नागरिकता का व्यापक प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान में नागरिकता की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है। केवल इतना ही बताया गया है कि कौन नागरिक होगा और कौन नहीं होगा।

✦ 8. नागरिकता प्राप्ति, समाप्ति एवं प्रमुख अनुच्छेद

अनुच्छेद 11 के अन्तर्गत संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह समय-समय पर कानून बनाकर नागरिकता के बारे में उपबन्ध कर सकती है। संसद ने इसी आधार पर नागरिकता अधिनियम 1955 पारित किया जिसमें वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2015 में नागरिकता से सम्बन्धित संशोधन होते रहे।

✅ नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके
  • (1) जन्म के आधार पर
  • (2) वंश के आधार पर
  • (3) रजिस्ट्रेशन के आधार पर
  • (4) देशीयकरण के आधार पर
  • (5) किसी विदेशी भू-क्षेत्र को भारत में मिलाने पर
❌ नागरिकता समाप्ति के 4 तरीके
  • (1) स्वेच्छा से परित्याग करने पर
  • (2) विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर
  • (3) देशद्रोह के आधार पर
  • (4) भ्रष्टाचार के आधार पर

■ नागरिकता के प्रमुख अनुच्छेद (Articles 5-10)

  • अनुच्छेद 5: संविधान लागू होने की तिथि से ऐसे व्यक्ति को भारत का नागरिक माना जायेगा जो भारत राज्य क्षेत्र में जन्मा हो या जिसके माता या पिता में से कोई भारत राज्य क्षेत्र में जन्मा हो या कम से कम 5 वर्ष पहले से भारत में मामूली तौर से निवास कर रहा हो।
  • अनुच्छेद 6: पाकिस्तान से भारत आने वाले ऐसे व्यक्ति को भारत का नागरिक माना जायेगा जो निम्नलिखित शर्त पूरी करता हो:
    (I) उसके माता या पिता या पितामह या पितामही या मातामह या मातामही में से कोई एक भारत शासन अधिनियम 1935 के अधिनियम में परिभाषित जन्मा हो।
    (II) 19 जुलाई 1948 से पहले पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गया हो तो उसे नागरिक तब माना जायेगा जब वह नागरिकता के लिए आवेदन करे और आवेदन करने के 6 महीने पूर्व से भारत में मामूली तौर से रह रहा हो।
  • अनुच्छेद 7: 1 मार्च 1947 के बाद जो भारत छोड़कर पाकिस्तान चला गया है उसे भारत का नागरिक नहीं माना जायेगा लेकिन किसी वैधानिक नियम के अन्तर्गत उसे भारत पुनः लाया जाय तो वह भारत का नागरिक मान लिया जायेगा।
  • अनुच्छेद 8: यदि किसी बच्चे का जन्म विदेश में होता है और उसके माता या पिता में कोई भारत का नागरिक है तो भारतीय दूतावास में पंजीकरण / आवेदन करने पर वह भारत का नागरिक पंजीकृत कर लिया जायेगा।
  • अनुच्छेद 9: यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेता है तो वह भारत का नागरिक नहीं रह जायेगा।
  • अनुच्छेद 10: यदि कोई व्यक्ति नागरिकता की उपर्युक्त शर्तों में से नागरिकता प्राप्ति की कोई एक शर्त पूरी करता है तो वह भारत का नागरिक बना रहेगा।

✍️ 9.सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त सम्पूर्ण अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना एक अपरिवर्तनीय दस्तावेज न होकर, केशवानंद भारती केस के अनुसार संशोधनीय है, बशर्ते इसका मूल ढाँचा (Basic Structure) सुरक्षित रहे।

संविधान के भाग-1 (अनुच्छेद 1 से 4) ने भारतीय संघ को एक ऐसी अविनाशी इकाई के रूप में स्थापित किया है जिसमें राज्यों को संघ से अलग होने का कोई अधिकार नहीं है। इसके अतिरिक्त, स्वतंत्रता के पश्चात हुए राज्यों के पुनर्गठन तथा क्षेत्रीय परिषदों के निर्माण ने भारत की प्रशासनिक दक्षता और राष्ट्रीय एकता को अत्यंत सुदृढ़ किया है।

वहीं भाग-2 (अनुच्छेद 5 से 11) नागरिकता के स्पष्ट प्रावधानों को तय करते हुए संसद को यह शक्ति देता है कि वह नागरिकता प्राप्ति और समाप्ति से जुड़े नियम बना सके। यह पूरी वैधानिक संरचना भारत को एक सशक्त, अखंड और लोककल्याणकारी राष्ट्र बनाती है।

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अगर आपने प्रस्तावना, संघ राज्य क्षेत्र और नागरिकता के इन सम्पूर्ण नोट्स को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रैक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।

👉 प्रस्तावना, भाग-1 और भाग-2: MCQs हल करें

📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. सर्वोच्च न्यायालय ने किस वाद में माना कि प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है?
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग है और अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन किया जा सकता है, परन्तु मूल ढाँचा नष्ट नहीं होना चाहिए।
Q2. भारत में नए राज्यों के निर्माण का अधिकार किसे प्राप्त है?
अनुच्छेद 3 के अनुसार, भारत में नए राज्यों के निर्माण, नाम, तथा सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार केवल 'संसद' (Parliament) को प्राप्त है।
Q3. भारत में नागरिकता प्राप्ति के कितने तरीके हैं?
नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार भारत में नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके हैं— जन्म से, वंश से, पंजीकरण से, देशीयकरण से, और भू-भाग के अर्जन से।
Q4. क्षेत्रीय परिषदों (Zonal Councils) का गठन कौन करता है?
क्षेत्रीय परिषदों का गठन 'राष्ट्रपति' द्वारा किया जाता है। भारत के गृहमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। यह मूल संविधान का हिस्सा नहीं था, इसे 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम से जोड़ा गया था।
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