जॉन लॉक: जीवन परिचय, प्राकृतिक अधिकार और सामाजिक समझौता सिद्धान्त
| पश्चिमी राजनीतिक विचारक: जॉन लॉक (1632-1704) |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda के इस विशेष लेख में उदारवाद व व्यक्तिवाद के जनक जॉन लॉक (John Locke) के राजनीतिक दर्शन का प्रामाणिक विश्लेषण किया गया है। इसमें उनके जीवन, प्राकृतिक अधिकारों (Life, Liberty, Property), मानव स्वभाव, टू ट्रीटाइजेज़ ऑन सिविल गवर्नमेंट, और सामाजिक समझौता सिद्धान्त का शानदार फ्लोचार्ट्स के माध्यम से वर्णन किया गया है। यह लेख UPSC, PCS, TGT, PGT, LT, GIC, UGC NET/JRF (Political Science) आदि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। |
- 1. जॉन लॉक: जीवन परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 2. प्रमुख रचनाएँ एवं 'टू ट्रीटाइजेज़' का महत्व
- 3. धर्मनिरपेक्षता और श्रम का सिद्धान्त
- 4. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त (Natural Rights)
- 5. मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था (Human Nature & State of Nature)
- 6. जॉन लॉक का सामाजिक समझौता (Social Contract)
- 7. राज्य या सरकार का स्वरूप (Nature of State)
- 8. राज्य व व्यक्ति के बीच सम्बन्ध (क्रांति का अधिकार)
- 9. प्रमुख कथन
- 10. संपूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
✦ 1. जॉन लॉक: जीवन परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जॉन लॉक (29 Aug 1632 - 1704) को "व्यक्तिवाद व उदारवाद का जनक" तथा मध्यवर्ग व पूँजीवाद का प्रबल समर्थक माना जाता है। वे 72 वर्ष तक जीवित रहे।
- जन्म: 29 अगस्त 1632 को इंग्लैण्ड के समरसेट (Somerset) के रिंगटन (Wrington) नामक स्थान पर एक प्यूरिटन/मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।
- उनके पिता एक वकील थे और आगे चलकर लॉक का झुकाव पूँजीवाद की तरफ हुआ। लॉक के जीवन पर लॉर्ड ऐशले (Lord Ashley / Shaftesbury) का गहरा प्रभाव पड़ा, जिनसे उनकी भेंट 1666 में हुई थी।
इंग्लैण्ड में 1688 में गौरवपूर्ण (रक्तहीन) क्रांति हुई। उस समय वहाँ का निरंकुश राजा जेम्स द्वितीय था। यह क्रांति मुख्य रूप से कराधान (Taxation) के निर्धारण को लेकर हुई थी (जिससे आगे चलकर 'प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं' का विचार पुष्ट हुआ, जो अमेरिकी क्रांति का मुख्य नारा बना)। गौरवपूर्ण क्रांति के परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड से निरंकुश राजतंत्र समाप्त हो गया और संवैधानिक राजतंत्र व संसदीय लोकतंत्र का जन्म हुआ।
लॉक के पिता भी इस गौरवपूर्ण क्रांति में शामिल थे। जॉन लॉक के सम्पूर्ण राजनीतिक दर्शन का मुख्य उद्देश्य 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति के यथास्थिति के औचित्य को सिद्ध करना था। लॉक ने संवैधानिक राजतंत्र और संसदीय लोकतंत्र का पुरजोर समर्थन किया।
लॉक के विचारों का सबसे अधिक प्रभाव अमेरिकी संविधान पर दिखाई देता है (जो विश्व का पहला लिखित व लोकतांत्रिक संविधान है)। अमेरिकी क्रांति के जनक व प्रेरणा स्रोत थॉमस जेफरसन (Thomas Jefferson) लॉक से अत्यधिक प्रभावित थे। जेफरसन ने अमेरिकी क्रांति के दौरान नारा दिया— "हे ईश्वर हमें जीवन, स्वतंत्रता व सुख का अधिकार दीजिए।"
✦ 2. प्रमुख रचनाएँ एवं 'टू ट्रीटाइजेज़' का महत्व
लॉक ने 1690 में अपनी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक 'टू ट्रीटाइजेज़ ऑन सिविल गवर्नमेंट' (Two Treatises on Civil Government) की रचना की। इसके दो खण्ड प्रकाशित हुए:
प्रथम खण्ड (First Treatise)
रॉबर्ट फिल्मर (Robert Filmer) की आलोचना
फिल्मर द्वारा प्रतिपादित 'दैवीय अधिकारों के सिद्धान्त' का तार्किक खण्डन किया।
द्वितीय खण्ड (Second Treatise)
थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) की आलोचना
हॉब्स के 'निरंकुश विचारों' की आलोचना करते हुए अपने उदारवादी राजनीतिक विचारों का प्रतिपादन किया।
"लॉक की द्विखण्ड लेखनी (Two Treatises) दो नाली बंदूक है, जिसकी एक नली रॉबर्ट फिल्मर के विरुद्ध और दूसरी नली हॉब्स के विरुद्ध तनी हुई है।"
वाहन पुनः लिखते हैं— "यह पुस्तक अपने प्रकाशन के बाद कम से कम दो पीढ़ियों तक इंग्लैण्ड व फ्रांस में बाइबिल की तरह पढ़ी जाती रही।"
✦ 3. धर्मनिरपेक्षता और श्रम का सिद्धान्त
लॉक आधुनिक काल का पहला विचारक है जिसने धार्मिक सहिष्णुता (Religious Toleration) का प्रतिपादन किया।
- उसकी प्रसिद्ध पुस्तक 'Letters on Toleration' (धार्मिक सहिष्णुता पर पत्र) है। बाद में उसने 'Four Letters on Toleration' भी लिखे।
- जहाँ हॉब्स ने चर्च को राज्य के अधीन कर दिया था, वहीं लॉक ने चर्च को राज्य से स्वतंत्र कर दिया और कहा कि "धर्म अंतःकरण का विषय है और इस पर बाहुबल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।" (अर्थात् राज्य को धर्म से पृथक किया)।
- अपवाद: जॉन लॉक नास्तिकों का विरोधी था क्योंकि उसका मानना था कि ईश्वर में विश्वास न होने के कारण उन पर सामाजिक अनुबंध या शपथ (Oaths) के पालन का भरोसा नहीं किया जा सकता। साथ ही, उसने कैथोलिकों और मुसलमानों को भी सहिष्णुता के दायरे से बाहर रखा था, लेकिन इसका कारण उनकी धार्मिक कट्टरता नहीं, बल्कि 'विदेशी सत्ता (पोप या मुफ्ती) के प्रति उनकी राजनीतिक निष्ठा' थी, जिसे लॉक राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा मानता था।
लॉक आधुनिक काल का पहला विचारक है जिसने यह सिद्धान्त दिया कि:
अर्थात्, जब कोई व्यक्ति प्रकृति द्वारा दी गई सार्वजनिक वस्तु में अपना श्रम (मेहनत) मिला देता है, तो उस वस्तु पर उसका निजी स्वामित्व हो जाता है। फिर उसकी सहमति के बिना कोई दूसरा उसे छीन नहीं सकता।
✦ 4. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त (Natural Rights)
लॉक को प्राकृतिक अधिकारों का जनक (Father of Natural Rights) माना जाता है। लॉक के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही मुख्य रूप से तीन प्राकृतिक अधिकार प्राप्त हैं:
(Life)
(Liberty)
(Property)
(सर्वाधिक महत्वपूर्ण)
- इसे जन्मजात या अहस्तान्तरणीय अधिकार भी कहा जाता है। यह अधिकार बिना किसी भेदभाव के सभी मनुष्यों को समान रूप से प्राप्त है।
- लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार को सर्वाधिक महत्व दिया और जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकार को सम्पत्ति के अधिकार में ही निहित माना।
- वाहन (Vaughan) के अनुसार: "लॉक के सम्पूर्ण राजनीतिक दर्शन का उद्देश्य व्यक्ति की सम्पत्ति की सुरक्षा करना है।"
- लॉक ने कहा कि प्राकृतिक अधिकार अविभाज्य, निरंकुश, असीम, अदेय और अहस्तान्तरणीय हैं। यह अधिकार राज्य और समाज के उदय के पूर्व के हैं।
- राज्य या सरकार का जन्म इसलिए हुआ है ताकि वह इन अधिकारों की रक्षा कर सके। यह अधिकार विकासशील नहीं है (अर्थात् जो स्थिति राज्य से पहले थी, वही बाद में भी रहेगी)।
लॉक ने प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त देकर व्यक्तिवाद का नारा बुलंद किया और यह सिद्ध किया कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म से बराबर है। इसी सिद्धान्त के आधार पर अमेरिकी क्रान्ति (नारा: जीवन, स्वतंत्रता और सुख का अधिकार) और फ्रांसीसी क्रान्ति (नारा: स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) सम्पन्न हुई।
लॉक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'टू ट्रीटाइजेज़ ऑन सिविल गवर्नमेंट' (Two Treatises on Civil Government) में हॉब्स की तरह अपने राजनीतिक विचारों का प्रतिपादन किया है, जो कि निम्नलिखित हैं:
- प्राकृतिक या नैसर्गिक अधिकार
- मानव स्वभाव
- प्राकृतिक अवस्था
- सामाजिक समझौता
- नागरिक समाज या राज्य का जन्म
- राज्य और व्यक्ति के बीच संबंध
✦ 5. मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था
मानव स्वभाव (Human Nature)
चूँकि लॉक का जन्म एक शालीन परिवार में हुआ और बचपन से उसे अच्छा वातावरण मिला, इसलिए उसने मानव स्वभाव के प्रति अच्छे भाव रखे। लॉक ने मनुष्य को एक सामाजिक और विवेकशील प्राणी माना। उसके अनुसार मनुष्यों में प्रेम, दया, सहानुभूति और सहयोग की भावना होती है। (यह हॉब्स के स्वार्थी और झगड़ालू मानव स्वभाव के ठीक विपरीत है)।
प्राकृतिक अवस्था (State of Nature)
चूँकि मानव स्वभाव अच्छा है, अतः प्राकृतिक अवस्था भी बहुत अच्छी थी। लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में मानव जीवन में परस्पर शांति, सहयोग, सद्भावना और पारस्परिक प्रेम विद्यमान था।
- यहाँ रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को समान रूप से जीवन, स्वतंत्रता व सम्पत्ति रूपी प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे। सभी अपने नैसर्गिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए शांति से जीते थे, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी।
- प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक कानून (Natural Laws) विद्यमान थे, जिन्हें लॉक ने 'विवेक का आदेश' बताया।
- प्रसिद्ध कथन: लॉक कहता है— "पहले सम्पूर्ण संसार अमेरिका जैसा था।"
यद्यपि प्राकृतिक अवस्था शांतिपूर्ण थी, फिर भी कुछ असुविधाएँ थीं। वहाँ एक निश्चित सार्वभौम सत्ता का अभाव था। अर्थात् कानून को बनाने वाला (विधायिका), उसे लागू करने वाला (कार्यपालिका), और उसकी व्याख्या करने वाला (न्यायपालिका) कोई निष्पक्ष अंग नहीं था। इसलिए विवादों को सुलझाने के लिए प्राकृतिक अवस्था का परित्याग आवश्यक था। (ध्यान दें: लॉक की प्राकृतिक अवस्था पूर्व-राजनीतिक थी, पूर्व-सामाजिक नहीं)।
✦ 6. जॉन लॉक का सामाजिक समझौता (Social Contract)
हॉब्स के अनुसार केवल एक ही समझौता हुआ और उसी से राज्य व सरकार दोनों का जन्म हुआ। वहीं जॉन लॉक के अनुसार दो समझौते हुए- पहले से राज्य और दूसरे से सरकार ने जन्म हुआ। लॉक आधुनिक काल का पहला विचारक है जिसने राज्य व सरकार में अंतर किया।
| समझौता | किनके मध्य हुआ? | परिणाम / प्रकृति |
|---|---|---|
| प्रथम समझौता (सामाजिक) |
व्यक्तियों का व्यक्तियों से (सभी ने मिलकर आपस में किया)। | इसके द्वारा प्राकृतिक अवस्था भंग हो गई और नागरिक समाज (Civil Society) का जन्म हुआ। यह समझौता स्थायी है। |
| द्वितीय समझौता (राजनीतिक) |
यह द्विपक्षीय व सशर्त था। यह जनता (नागरिक समाज) और शासक के बीच हुआ। | जनता ने अपनी रक्षा का दायित्व शासक को सौंपा। शासक ने उसकी सुरक्षा का आश्वासन दिया। इससे सरकार (State/Government) का जन्म हुआ। अतः लॉक ने सीमित सरकार का समर्थन किया। |
✦ 7. राज्य या सरकार का स्वरूप
- लॉक ने कहा कि किसी व्यक्ति को राज्य का सदस्य बनने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा।
- सरकार जनता की सहमति पर आधारित है। इसलिए लॉक ने राज्य/सरकार के लिए 'ट्रस्ट' (Trust / धरोहर / प्रन्यास) शब्द का प्रयोग किया।
- लॉक को 'सम्प्रभुता' (Sovereignty) शब्द से चिढ़ थी, अतः उसने सम्प्रभुता के स्थान पर 'सर्वोच्च सत्ता' (Supreme Power) शब्द का प्रयोग किया।
- चूँकि सरकार जनता की सहमति पर आधारित है, अतः लॉक ने सीमित सरकार (संवैधानिक राजतंत्र) की अवधारणा प्रस्तुत की।
- लॉक ने शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धान्त भी प्रस्तुत किया। उसने व्यवस्थापिका (विधायिका) और कार्यपालिका को अलग-अलग माना। विधायिका में जनप्रतिनिधि होंगे और कार्यपालिका में मंत्रीगण।
- कार्यपालिका अपने सभी कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होगी। इस प्रकार उसने संसदीय शासन प्रणाली या उत्तरदायी सरकार का समर्थन किया। विधायिका जब तक जनता के 'ट्रस्ट' को भंग नहीं करती, तब तक कार्यपालिका उसे भंग नहीं कर सकती।
- लॉक ने मताधिकार जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को दे दिया और प्रतिनिधि लोकतंत्र (Representative Democracy) का समर्थन किया।
✦ 8. राज्य व व्यक्ति के बीच सम्बन्ध (क्रांति का अधिकार)
लॉक ने सरकार को जनता की सहमति पर आधारित माना। उसका स्पष्ट मत था कि यदि राज्य या सरकार जनता के प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता, सम्पत्ति) की रक्षा नहीं कर पाती, तो जनता बहुमत से सरकार को कभी भी उसके पद से हटा सकती है।
इस प्रकार लॉक ने प्रत्येक स्थिति में जनता को सरकार के विरोध का अधिकार देकर व्यक्ति को 'साध्य' (End) और राज्य को 'साधन' (Means) बना दिया। इसी कारण उसे 'व्यक्तिवाद का जनक' बनने का श्रेय प्राप्त हुआ।
"समुदाय (जनता) एक ऐसे गृह स्वामी की भाँति है जो अपनी सुरक्षा के लिए पहरेदार (सरकार) की नियुक्ति करता है, और स्वयं जाग-जाग कर यह देखता रहता है कि पहरेदार कहीं सो तो नहीं गया है। यदि वह सोता हुआ मिलता है, तो गृह स्वामी उस पहरेदार को हटाकर नये पहरेदार की नियुक्ति कर लेता है।"
✦ 9. प्रमुख कथन
| विचारक | महत्वपूर्ण कथन / टिप्पणी |
|---|---|
| जॉर्ज एच. सेबाइन (Sabine) |
"लॉक की वाणी उस युग (मध्यकालीन परम्परा) की अंतिम महान वाणी थी और दूसरे युग (आधुनिक/व्यक्तिवाद) की पहली महान वाणी थी।" |
| सी. ई. वाहन (Vaughan) |
"लॉक का सम्पूर्ण राजनीतिक विचार व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है।" |
- आधुनिक युग में 'विचारधाराओं का युग' (Age of Ideology) फ्रांसीसी क्रांति (1789) से प्रारम्भ हुआ।
- रूस की बोल्शेविक क्रांति 1917 में हुई थी।
- 'Politics Among Nations' पुस्तक के लेखक हंस जे. मॉर्गेन्थाऊ (Hans J. Morgenthau) हैं।
- लॉक ने चर्च को राज्य से पूर्णतः पृथक करके मध्यकालीन परम्परा का खण्डन किया (इसे अंतिम महान वाणी माना गया) और व्यक्तिवाद का प्रबल समर्थन करके (आधुनिक युग की प्रथम महान वाणी होने का श्रेय) प्राप्त किया।
✦ 10. संपूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
जॉन लॉक के सम्पूर्ण राजनीतिक दर्शन का अध्ययन करने के पश्चात् यह स्पष्ट होता है कि वे आधुनिक राजनीतिक चिंतन में व्यक्तिवाद, उदारवाद और संवैधानिक लोकतंत्र के सच्चे प्रणेता थे। जहाँ हॉब्स ने निरंकुशता को सही ठहराया, वहीं लॉक ने व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्राकृतिक अधिकारों (विशेषकर सम्पत्ति) को सर्वोपरि माना।
- लॉक की प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक कानून विद्यमान थे। लॉक ने इन प्राकृतिक कानूनों को 'विवेक का आदेश' (Dictates of Reason) बताया, जो मनुष्यों को शांति और सहयोग से रहने की प्रेरणा देते हैं।
- उनका मानना था कि राज्य या सरकार कोई दैवीय संस्था नहीं है, बल्कि यह जनता द्वारा अपनी सुविधाओं (प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा) के लिए बनाया गया एक 'ट्रस्ट' (धरोहर) है।
- लॉक ने धर्म को राजनीति से अलग करके और शासक को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाकर आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों की नींव रखी।
- उनका 'क्रांति का अधिकार' यह सिद्ध करता है कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता ही है।
संक्षेप में, जॉन लॉक का दर्शन एक ऐसे समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करता है जहाँ कानून का शासन (Rule of Law) हो, सरकार की शक्तियाँ सीमित हों, और व्यक्ति अपने अधिकारों का बिना किसी भय के उपभोग कर सके। यही कारण है कि लॉक के विचार आज भी विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों (विशेषकर अमेरिका) के संविधानों की आत्मा बने हुए हैं।
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