जनमत, प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त और निर्वाचन प्रणालियाँ नोट्स

जनमत, प्रतिनिधित्व के सिद्धांत और निर्वाचन प्रणालियाँ – संपूर्ण नोट्स
जनमत, प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त और निर्वाचन प्रणालियाँ: सम्पूर्ण नोट्स
Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में राजनीति विज्ञान के तीन अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषयों— 'जनमत (Public Opinion)', 'प्रतिनिधित्व (Representation)' और 'निर्वाचन प्रणालियाँ (Electoral Systems)' का विस्तृत एवं समग्र अध्ययन किया गया है। इसमें जनमत का अर्थ, गैलप पोल, और रूसो, वाल्टर लिपमैन, ब्राइस जैसे विचारकों के कथनों का समावेश है। इसके साथ ही प्रतिनिधित्व के विभिन्न सिद्धान्तों (प्रतिक्रियावादी, रूढ़िवादी, उदारवादी, आमूलवादी), सदिष्ट व आदेशहीन प्रतिनिधि, और महिला मताधिकार के ऐतिहासिक क्रम को बारीकी से समझाया गया है। लेख के अंतिम भाग में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय व सूची प्रणाली), गैरीमैंडरिंग, और पूर्ण बहुमत एवं सामान्य बहुमत आधारित निर्वाचन प्रणालियों का परीक्षापयोगी सम्पूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

✦ 1. जनमत (Public Opinion) का अर्थ एवं विशेषताएँ

जनमत या लोकमत का शाब्दिक अर्थ है 'जन साधारण का मत'। लोकमत न तो सर्वसम्मत और न ही बहुमत का नाम दिया जा सकता है। लोकमत को जन इच्छा भी नहीं कहा जा सकता, यह किसी वर्ग, जाति, भाषा पर आधारित मत भी नहीं है। जनमत की कोई निश्चित परिभाषा दे पाना निश्चित सम्भव नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने इसे अपने-अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया है।

सामान्य परिभाषा: सामान्यतया परिभाषा करते हुए जनमत के बारे में कहा जा सकता है, "जनमत जनता पर आधारित वह रूढ़ि/विवेकपूर्ण विचार है जो आवश्यक रूप से जन-कल्याण की भावना से प्रेरित हो।"

■ जनमत की 3 प्रमुख विशेषताएँ

  1. जन साधारण का मत
  2. विवेक पर आधारित स्थायी विचार
  3. लोक कल्याण की भावना से प्रेरित

✦ 2. जनमत के अध्ययन का विकास: गैलप पोल (Gallup Poll)

डी टॉकविले, जेफरसन, वाल्टर लिपमैन आदि ने लोकमत को परम्परागत रूप से समझाने का प्रयास किया।

  • 1930 के बाद: 1930 के बाद 'गैलप पोल' या 'एग्जिट पोल' या 'चुनाव पूर्व सर्वेक्षण' तकनीक का विकास हुआ।
  • इसे जनमत के अध्ययन की आधुनिक या वैज्ञानिक तकनीक का विकास कहते हैं।
  • आज विश्व के लगभग प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र में यह पाया जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य: 'गैलप पोल' का सर्वप्रथम प्रयोग U.S.A. व U.K. में हुआ (1930)। इसे जनमत मापने की वैज्ञानिक विधि कहा जाता है। यह चुनाव के पूर्व सर्वेक्षण की तकनीक है।

✦ 3. जनमत (लोकमत) पर प्रमुख विचारकों के कथन (भाग-1)

लार्ड जेम्स ब्राइस (Lord James Bryce):
"लोकमत के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को शासन के आधार पर पृथ्वी पर कोई शासन नहीं कर सकता।"

(ब्राइस ने अपनी पुस्तक 'मॉडर्न डेमोक्रेसीज' में लिखा है— लोकमत मनुष्यों के उन विभिन्न दृष्टिकोणों का योगमात्र है जो सार्वजनिक हित से सम्बद्ध विषयों से रखते हैं।)

डेविड ह्यूम (David Hume):
"सभी सरकारें चाहे वे कितनी दूषित क्यों न हों अपनी शक्ति के लिये लोकमत पर निर्भर होती हैं।"
जियोवानी सारटोरी (Giovanni Sartori):
"जनमत किसी विषय पर लोगों के विचार को इंगित करता है जब वे एक ही सामाजिक समूह के हों।"
जीन जैक्स रूसो (Jean-Jacques Rousseau):
"लोकमत एक रहस्यात्मक शक्ति है।"
"जनता की आवाज ईश्वर की आवाज है।"

(नोट: रूसो ने सर्वप्रथम जनमत/लोकमत शब्दावली का प्रयोग किया था।)

✦ 4. जनमत पर प्रमुख विचारकों के कथन (भाग-2)

मौरिस गिन्सबर्ग (Morris Ginsberg):

"जब अनेक व्यक्तियों के मन परस्पर क्रिया करते हैं तो उससे जिस सामाजिक तत्व का निर्माण होता है वह जनमत है।"

अपनी पुस्तक 'ऑन जस्टिस इन सोसाइटी' में उन्होंने लिखा है: "कभी-कभी विचार की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अन्तर किया जाता है परन्तु यदि विचार को अभिव्यक्ति का अवसर न मिले तो उसका दम घुट जाता है।"

वाल्टर लिपमैन (Walter Lippmann):

वाल्टर लिपमैन ने यह विचार व्यक्त किया कि जनमत के निर्माण में सर्वप्रथम भूमिका पर्यावरण (विचार) की होती है।

इन्होंने अपनी पुस्तक 'पब्लिक ओपिनियन' (Public Opinion) में लोकमत के परम्परागत रूप या रूढ़ि या अपरिवर्तनीय धारा (स्टीरियोटाइप) को समझाने का प्रयास किया। इन्होंने समाचार पत्रों को 'प्रजातन्त्र का धर्म ग्रन्थ' कहा।

  • लॉवेल (Lowell): इन्होंने अपनी पुस्तक 'पब्लिक ओपिनियन एण्ड पॉपुलर गवर्नमेंट' में लेविस के मत का विरोध करते हुए कहा कि जनमत बनाने के लिये बहुमत काफी नहीं है। उन्होंने 'रूझानों का मनोरंजन सिद्धान्त' दिया।
  • मैकियावेली (Machiavelli): "जनमत ईश्वर की आवाज है।"
  • आशीर्वादम (Asirvatham): "जागरूक सचेत मत स्वस्थ प्रजातन्त्र की प्रथम आवश्यकता है।"
  • डॉ. बेनी प्रसाद (Dr. Beni Prasad): "वही मत वास्तविक होता है जो जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो।"
  • वॉल्टेयर (Voltaire): "मैं आप के विचारों से सहमत न हूँ लेकिन आप के स्वतंत्र विचार के लिये मैं अपने प्राण दे दूँगा।"
  • हेनरी मेन (Henry Maine): "जनता की आवाज ईश्वर की आवाज है।"

✦ 5. जनमत बनाने और व्यक्त करने के साधन

जनमत के निर्माण और अभिव्यक्ति में समाज के विभिन्न अंगों की भूमिका होती है। प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं:

  1. प्रेस (Press): यह जनमत निर्माण का सबसे उत्कृष्ट साधन माना जाता है।
  2. समाचार पत्र व पत्रिकाएं
  3. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम
  4. सार्वजनिक सभाएं
  5. राजनीतिक दल व दबाव समूह: उपर्युक्त मुख्य तत्वों के अलावा जनमत निर्माण के ये अन्य साधन भी हैं।
  6. मानव तत्व: ये तीन प्रकार के होते हैं:
    • (क) चिन्तनशील मानव: ये प्रथम श्रेणी के मानव हैं जो नवीन विचारों को जन्म देते हैं।
    • (ख) अध्ययनशील मानव: ये चिन्तनशील मानव के विचारों का अध्ययन करके उन्हें आगे बढ़ाते हैं।
    • (ग) कर्मशील मानव: ये अध्ययनशील मानव के बताये गये विचारों से अवगत होकर अपना कार्य करते हैं।
  7. परिवार व प्राथमिक समूह
  8. धर्म व धार्मिक संगठन
  9. शिक्षण संस्थाएं
  10. व्यवस्थापिका या संसद
  11. चुनाव
  12. राजनीतिक साहित्य

✦ 6. स्वस्थ जनमत के निर्माण की पूर्व शर्तें

एक स्वस्थ और प्रभावकारी जनमत के निर्माण के लिए समाज में कुछ अनुकूल परिस्थितियों का होना आवश्यक है:

  • सुशिक्षित एवं समझदार जनता का होना।
  • समाज में आर्थिक समानता।
  • स्वतंत्र प्रेस की उपस्थिति।
  • नागरिकों में राष्ट्रवाद की भावना।
  • जाति, भाषा व धर्म पर आधारित समाज का न होना।

निष्कर्ष: जनमत को प्रजातन्त्र का प्राण माना जाता है। जनमत को व्यक्त करने वालों में प्रेस का विशेष महत्त्व है।

✦ 7. प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त, निर्वाचन प्रणालियाँ और मतदान आचरण

■ प्रतिनिधित्व (Representation) के प्रकार

  1. सदिष्ट प्रतिनिधित्व: जिसमें प्रतिनिधि अपने मतदाताओं का आदेश लेता है।
  2. आदेशहीन प्रतिनिधित्व: जिसमें जो प्रतिनिधि कार्य करता है, वह जनता से कोई आदेश नहीं लेता।

■ प्रतिनिधित्व के प्रमुख सिद्धान्त

प्रतिक्रियावादी
(हॉब्स, हैमिल्टन)
रूढ़िवादी
(बर्क, मेडिसन)
उदारवादी
(लॉक, जेफरसन)
आमूलवादी
(रूसो, नव-वामपन्थी)
कार्यपालिका का स्वरूप राजतन्त्रात्मक, इसके आगे जनता को कोई स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। ये लोग मानते हैं कि एक बार जनता चुन लेती है तो फिर उसे कोई जरूरत नहीं होती। ये लोग मानते हैं कि जनता एक बार प्रतिनिधि चुन लेती है तो प्रतिनिधि समय-समय पर जनता को बताते-समझाते रहते हैं। ये प्रत्यक्ष लोकतन्त्र की देन हैं।

■ प्रतिनिधित्व को तीन और रूपों में व्यक्त किया जाता है:

  1. साम्प्रदायिक निर्वाचन: जिसमें धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व देना (जैसे 1909 के ऐक्ट द्वारा धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व)।
  2. व्यवसायिक निर्वाचन: व्यवसाय/कोटा के आधार पर।
  3. प्रादेशिक निर्वाचन: विभिन्न क्षेत्रों को छोटे-छोटे क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है।

✦ 8. निर्वाचन व मतदान के प्रकार तथा विचारकों के मत

■ निर्वाचन (Election) के प्रकार

  • प्रत्यक्ष (Direct): जनता स्वयं अपना प्रतिनिधि चुनती है।
  • अप्रत्यक्ष (Indirect): जिसमें प्रतिनिधि सीधे जनता से नहीं चुने जाते, बल्कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से चुने जायें।

■ मतदान (Voting) के प्रकार

  • प्रकट / खुला मतदान (Open Voting): इसका समर्थन स्टुअर्ट मिल (Stuart Mill) ने किया।
  • गुप्त मतदान (Secret Voting): इसका समर्थन बेंथम (Bentham) ने किया।

✦ 9. प्रतिनिधित्व (Representation): अर्थ, प्रकार एवं सिद्धान्त

प्रतिनिधि वह होता है जो जनता के द्वारा निर्वाचित होता है। चूँकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राजनीतिक सत्ता/सम्प्रभुता अन्तिम रूप से जनता में निहित होती है, इसलिये जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि का महत्त्व अधिक होता और जनता अपने प्रतिनिधि के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करती है। प्रतिनिधि जिस संस्था में बैठता है उसे प्रतिनिधि संस्था कहा जाता है और वह प्रतिनिधि अपने जनता के भावनाओं व विचारों का प्रतिनिधित्व करता है।

जार्ज कॉनबे (George Canbe) का विचार: इन्होंने अपनी पुस्तक 'रिप्रेजेंटेशन' (Representation) में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अर्थ बताते हुए लिखा है, "राजनीतिक प्रतिनिधि एक ऐसा व्यक्ति है जो परम्परा या कानून द्वारा एक राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधि का स्तर रखता है और प्रतिनिधि का भूमिका निभाता है।"

एक प्रतिनिधि बनने के लिये निम्नलिखित तीन योग्यताओं का होना आवश्यक है:

  1. नागरिकता
  2. न्यूनतम आयु
  3. आवास

■ प्रतिनिधित्व के दो मुख्य प्रारूप (Forms)

  1. सदिष्ट प्रतिनिधि (Instructed Delegate): जब प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों के स्पष्ट आदेश पर काम करते हैं तो इसे सदिष्ट प्रतिनिधि कहा जाता है। आज प्रतिनिधियों को इसका पालन करना सम्भव नहीं है। लास्की ने इसकी आलोचना की है।
  2. आदेश हीन प्रतिनिधि (Uninstructed Delegate): जब प्रतिनिधि पर निर्वाचकों द्वारा कोई आदेश या निर्देश नहीं दिया जाता है और प्रतिनिधि अपने विवेक से अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के उद्धार को ध्यान में रखते हुए कार्य करे, लेकिन साथ-साथ वह इस बात का भी ध्यान रखे कि ऐसे कार्य राष्ट्रीय हित में बाधा न पहुँचायें। आज यही व्यवस्था स्वीकार की गयी है।

✦ 10. प्रतिनिधित्व के 4 प्रमुख सिद्धान्त (Theories of Representation)

प्रतिनिधित्व के सिद्धान्तों को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा जाता है:

1. प्रतिक्रियावादी सिद्धान्त (Reactionary Theory)
इसके प्रवर्तक हॉब्स व हैमिल्टन हैं। यह सिद्धान्त 'व्यवस्था और सत्ता की आवश्यकता पर बल' देता है। कार्यपालिका के लिये इसमें राजतन्त्र को उपयुक्त मार्ग माना है। इस सिद्धान्त के अनुसार कार्यपालिका और संसद सदस्य को जनहित का पूरा सम्मान होना चाहिये, उन्हें लोकमत की ओर ध्यान देना चाहिए लेकिन उससे बंधना नहीं चाहिए। इस सिद्धान्त ने सत्ताधारियों पर जनसाधारण के नियन्त्रण की कोई व्यवस्था नहीं की। आज इसे अलोकतांत्रिक माना जाता है।
2. रूढ़िवादी सिद्धान्त (Conservative Theory)
इसके प्रवर्तक बर्क और मेडिसन हैं। ये सार्वजनिक नियन्त्रण को स्वीकार करते हैं और वे शासन प्रक्रिया में जनसाधारण की सहभागिता की अनुमति नहीं देते हैं। जनसाधारण को विशिष्ट वर्गों में से 'अपने शासकों का चयन' करना चाहिए। फिर उनके बाद जनसाधारण से कोई निर्देश नहीं प्राप्त होगा, यदि जनता सन्तुष्ट नहीं है तो अगले चुनाव में उन्हें हटा सकती है।
3. उदारवादी सिद्धान्त (Liberal Theory)
इसके प्रवर्तक लॉक व जेफरसन हैं। यह सबसे अधिक लोकतान्त्रिक है और वर्तमान में यही मान्य है। इसमें प्रत्येक प्रतिनिधि को अपने निर्वाचकों के लिये सन्देशवाहक के रूप में कार्य करना पड़ता है।
4. आमूल परिवर्तनवादी सिद्धान्त (Radical Theory)
इसके प्रवर्तक रूसो व नववामपन्थी विचारक माने जाते हैं। प्रत्यक्ष लोकतन्त्र इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है।

✦ 11. मताधिकार पर प्रमुख तथ्य एवं विचारकों के कथन

सार्वभौमिक मताधिकार का अर्थ है एक निश्चित आयु के बाद व्यक्ति को मत देने का अधिकार।

जे. एस. मिल (J.S. Mill) का विचार:
"जे. एस. मिल सार्वभौमिक मताधिकार के आलोचक हैं क्योंकि वे शिक्षा को माध्यम से सार्वभौमिक मताधिकार देने की बात करते हैं।"
  • लॉस्की (Laski): "सार्वभौमिक मताधिकार का कोई विकल्प नहीं है।"
  • गिलक्राइस्ट (Gilchrist): "सार्वभौमिक मताधिकार वास्तव में सार्वभौमिक नहीं होता।"
  • अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्वाचन के बारे में लॉस्की ने कहा: "यह एक महान् व्यभिचार है।"
  • ऐसमीन (Esmein) के अनुसार: "एक प्रतिनिधि वह है जो पूर्ण स्वतन्त्र हो, पर वैधानिक सीमा में रहकर कार्य करता हो।"

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का कथन: "मै व्यवस्थापिका मण्डल के सदस्यों के लिये कुछ योग्यताएं निश्चित करने के पक्ष में हूँ। यह अजीब लगता है कि कानून के प्रशासकों के लिये हम कड़ी योग्यताएं निश्चित करते हैं, लेकिन जो उसको, जो निर्माण करते हैं उनके निर्वाचन होने में हम निश्चित कर देते हैं।"

■ महिला मताधिकार (Women's Suffrage)

जे. एस. मिल महिला मताधिकार के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने समर्थन करते हुए कहा है कि, "मैं केवल लिंग के आधार पर किसी आत्म निर्भर व्यक्ति जो अन्यथा अयोग्य नहीं हो, मताधिकार प्रदान न करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं समझता।"

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आलोचक मिल व मैकाले माने जाते हैं।

जे. एस. मिल आनुपातिक प्रतिनिधित्व का सूत्रपात किया जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों को विधायिका में प्रतिनिधित्व देना था।

क्लीमेंट एटली (Clement Attlee) का कथन:
"हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति सचेत हैं और अल्पसंख्यक गुट मुक्त होकर रहनें योग्य हों, दूसरी ओर हम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के पथ पर निषेध के अधिकार की स्वीकृति नहीं दे सकते।"

✦ 12. विश्व में महिला मताधिकार का ऐतिहासिक क्रम

सर्वप्रथम फ्रांसीसी क्रान्ति के दौरान महिलाओं को मताधिकार देने की मांग उठी। सर्वप्रथम न्यूजीलैण्ड में 1893 में अपने यहाँ मताधिकार दिया। विभिन्न देशों में महिलाओं को मताधिकार मिलने का वर्ष इस प्रकार है:

वर्ष (Year) देश का नाम (Country)
1893न्यूजीलैण्ड (प्रथम देश)
1906फिनलैण्ड
1915डेनमार्क
1917रूस
1919जर्मनी
1920U.S.A. (अमेरिका)
1922आयरलैण्ड
1928इंग्लैण्ड
1931स्पेन
1946फ्रांस
1950भारत
1971स्विट्जरलैण्ड
2005कुवैत

✦ 13. निर्वाचन प्रणाली और अनिवार्य मतदान

निर्वाचक मण्डल का सम्बन्ध अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से है।

■ मतदान (Voting) के प्रकार (अनिवार्यता के आधार पर)

  • एकल / गुप्त मतदान: इसमें मतदान करना ऐच्छिक होता है।
  • अनिवार्य मतदान (Compulsory Voting): आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, अर्जेन्टीना और स्विट्जरलैंड (केवल शैफहौसेन कैंटन) आदि में अनिवार्य मतदान व्यवस्था है।

बेवालियों (Bavaliyo) का कथन: "अज्ञानी व्यक्तियों को मताधिकार दो, ये आत्मघाती शासन के शिकार हो जायेंगे।"

■ गैरीमैंडरिंग (Gerrymandering)

निर्वाचन क्षेत्रों का इस प्रकार गठन की प्रक्रिया जिसमें सत्ता पक्ष को आसानी से बहुमत मिल जाये और विपक्ष को अल्पमत में रखा जाये, गैरीमैंडरिंग कहलाती है।

✦ 14. निर्वाचन प्रणालियाँ (Electoral Systems)

आनुपातिक प्रणाली में बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होता है। इसमें गैरीमैंडरिंग जैसी बुराइयों का अन्त हो जाता है।

■ निर्वाचन प्रणालियों के मुख्य प्रकार

1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
(Proportional Representation)
2. पूर्ण बहुमत आधारित प्रणाली
(Absolute Majority)
3. बहुमत आधारित प्रणाली
(Plurality System)
  • थॉमस हेयर ने 19वीं शताब्दी में सबसे पहले प्रस्तुत की गई।
  • अल्पसंख्यकों के लिये।
  • जे. एस. मिल ने इस प्रणाली का समर्थन किया।
  • यह बहु-सदस्यीय निर्वाचन प्रणाली (आवश्यक) पर आधारित है।
  • द्वितीय मत पत्र योजना (फ्रांस): इसमें यदि प्रथम चरण में पूर्ण बहुमत न मिले, तो दूसरे चरण का चुनाव होता है।
  • वैकल्पिक मत प्रणाली: इसमें मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसन्द के क्रम (1, 2, 3) में वोट देते हैं।
  • सामान्य बहुमत आधारित प्रणाली (First-Past-The-Post): जो सर्वाधिक मत प्राप्त करता है, वही जीतता है (भारत में यही लागू है)।
  • सीमित मत प्रणाली: मतदाताओं को चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से कम मत देने का अधिकार होता है।

■ आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के 2 मुख्य रूप

  1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote): इसमें एक ही मत (Single Vote) होता है, जो पसन्द के अनुसार हस्तांतरित (Transfer) हो सकता है। मतदाता को जितने सदस्य चुने जाने हैं, उतनी ही पसन्द (Preference) देने का अधिकार होता है।
  2. सूची प्रणाली (List System): इसमें चुनाव दल के आधार पर होता है, उम्मीदवार के आधार पर नहीं। दल चुनाव से पूर्व अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करता है।

✦ 15. निर्वाचन क्षेत्र (Constituencies) के प्रकार

निर्वाचन क्षेत्र निम्न प्रकार का होता है:

  1. एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र (Single-Member Constituency): जब किसी राज्य को उतने ही निर्वाचन क्षेत्र में बाँट दिया जाता है जितनी संख्या में प्रतिनिधि चुने जाने हैं, और एक निर्वाचन क्षेत्र से चाहे जितने उम्मीदवार चुनाव लड़े लेकिन सदैव एक ही उम्मीदवार चुना जाता है, उसे एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र कहा जाता है। वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इसी निर्वाचन क्षेत्र का बोलबाला है।
  2. बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र (Multi-Member Constituency): जब सम्पूर्ण राज्य अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से अनेक प्रतिनिधि चुने जाते हैं, उसे बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र कहा जाता है। प्रायः विधायिका में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिये बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र अपनाया जाता है।

✦ 16. अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की पद्धतियाँ

(A) आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation)

इस प्रणाली का प्रयोग थॉमस हेयर ने 19वीं शताब्दी में किया था। इसका प्रयोग करने के लिये बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र का होना आवश्यक है और ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में प्रत्येक मतदाता को उतने ही मत देने का अधिकार होता है जितने कि उम्मीदवारों को चुना जाना है। इसमें उसी उम्मीदवार को विजयी समझा जाता है जिसे अपेक्षाकृत बहुमत नहीं बल्कि मतदाताओं की एक निश्चित संख्या प्राप्त हो, जिसे निर्वाचन 'न्यूनतम कोटा' प्राप्त करना है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व निम्न दो रूपों में अपनाया जाता है:

(क) एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System)

सामान्यतया आनुपातिक प्रतिनिधित्व को एकल संक्रमणीय प्रणाली के आधार पर अपनाया जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र जरूरी है। एक निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या चाहे जितनी हो, प्रत्येक मतदाता को केवल एक ही मत देने का अधिकार होगा। लेकिन यह मत पसन्दगी (Preferences) के आधार पर दिया जाता है। इस प्रणाली में प्रत्येक मतदाता को निर्वाचित होने के लिये मतों का एक निश्चित संख्या प्राप्त करनी होती है। इसके लिये दो पद्धति प्रचलित हैं:

  • हेयर पद्धति (Hare Quota): इसे थॉमस हेयर (1851) ने दिया था। इसे वर्तमान में कम न्यायसंगत माना जाता है।
    न्यूनतम कोटा = (कुल पड़े वैध मतों की संख्या) / (निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या)
  • ड्रूप पद्धति (Droop Quota): इसे कार्ल ड्रूप (1864, डेनमार्क) ने दिया था। वर्तमान में इसे ही अधिक न्यायसंगत माना जाता है।
    न्यूनतम कोटा = [ (कुल पड़े वैध मतों की संख्या) / (निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या + 1) ] + 1
(ख) सूची प्रणाली (List System)

इस प्रणाली के अन्तर्गत राजनीतिक दल व्यक्तिगत रूप से चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि राजनीतिक दलों की सूचियां चुनाव क्षेत्र में राजनीतिक प्रतियोगिता करती हैं। इसमें हर राजनीतिक दल जीतने उम्मीदवार चाहता है, उतने उम्मीदवार की सूची जारी कर देता है। इसमें मतदाता विभिन्न सूचियों में से किसी एक सूची को मत देता है। सूची प्रणाली में स्थानों का वितरण सूचियों को मिले मतों के आधार पर किया जाता है।

इसके लिये बहुसदस्यीय निर्वाचन आवश्यक होता है। लेकिन इसमें निर्वाचन का आधार व्यक्तिगत उम्मीदवार नहीं होता, बल्कि दलीय आधार पर उम्मीदवारी की सूची होती है।

उदाहरण: यदि किसी व्यवस्थापिका में 100 सीटें हों और कांग्रेस, भाजपा व सपा की सूचियों को क्रमशः 10 हज़ार, 8 हज़ार और 2 हज़ार मत प्राप्त होता है, तो:

निश्चित मत (कोटा) = (कुल वैध मत) / (सीटों की संख्या) = (20000) / 100 = 200 मत।
इसका अर्थ यह है कि सूची के एक उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिये 200 मत आवश्यक हैं।

कांग्रेस को प्राप्त सीट = 10000 / 200 = 50 सीटें
भाजपा को प्राप्त सीट = 8000 / 200 = 40 सीटें
सपा को प्राप्त सीट = 2000 / 200 = 10 सीटें

पश्चिमी जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैण्ड और U.S.A. के कुछ राज्यों में भी यह पाया जाता है।

(B) एकत्रीभूत मत प्रणाली (Cumulative Vote System)

उपर्युक्त के अतिरिक्त अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिये एकत्रीभूत मत प्रणाली का भी प्रचलन है, लेकिन यह प्रणाली इतनी जटिल है इसका प्रयोग कहीं नहीं होता।

एकत्रीभूत मत प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक मतदाता को उतने मत देने का अधिकार होता है जितने उस क्षेत्र से चुने जाने हैं। मतदाता को यह भी अधिकार होता है कि वह चाहे तो किसी एक ही उम्मीदवार को ही दे सकता है। इसमें बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होता है।

✦ 17. पूर्ण बहुमत आधारित प्रणाली और उसके प्रकार

पूर्ण बहुमत का शाब्दिक अर्थ होता है— चुनाव में 50% से अधिक मत प्राप्त करना (50% + 1)। यह प्रणाली निम्नलिखित दो प्रकार की होती है:

(A) द्वितीय मत पत्र योजना (Second Ballot System)

इस प्रणाली में एक निर्वाचन क्षेत्र में दो बार मतदान होता है। पहले मतदान में कई प्रत्याशी हो सकते हैं। प्रथम मतदान के बाद सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दो उम्मीदवारों को छोड़कर शेष को निर्वाचन क्षेत्र से हटा दिया जाता है।

और उन दो उम्मीदवारों के लिये दुबारा मतदान होता है, और इस बार जो उम्मीदवार निरपेक्ष बहुमत अर्थात् 50% से अधिक मत को प्राप्त करता है, वही विजयी होता है।

ऐतिहासिक तथ्य: 1962 के बाद फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव में इसका प्रयोग होने लगा था। इस चुनाव प्रणाली को Run Off भी कहा जाता है।

(B) वैकल्पिक मत प्रणाली (Alternative Vote System)

इसे मत पसन्दगी (Preferences) मत व्यवस्था भी कहते हैं। इसका प्रयोग एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में होता है। इसमें उम्मीदवार को पसन्दगी के आधार पर वोट दिया जाता है, इसलिये इसे पसन्दगी मत प्रणाली कहा जाता है।

इसमें मतदाता जिसको चुनाव जिताना चाहता है उसे 'प्रथम वरीयता' तथा अन्य को 'अन्य वरीयता' देता है। यदि पहली बार में किसी को पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त होता तो सबसे कम मत पाये उम्मीदवार को निर्वाचन क्षेत्र से हटा दिया जाता है और उसके 'द्वितीय मत' को बाँट दिया जाता है। यह क्रम तब तक लिया जाता है जब तक किसी को पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त हो जाता है।

पसन्दगी का उदाहरण:
उम्मीदवार A - 1 - 3 - 2 - 2 - 1
उम्मीदवार B - 2 - 1 - 3 - 1 - 3
उम्मीदवार C - 3 - 2 - 1 - 3 - 2

(यहाँ मतदाता 1, 2, 3 क्रम में अपनी वरीयता दर्ज करता है)।

✦ 18. बहुमत आधारित प्रणाली (Plurality System)

बहुमत आधारित प्रणाली में जितने लोग चुनाव में होते हैं, उनमें जो सर्वाधिक मत पाता है वही विजयी होता है। यह प्रणाली निम्नलिखित दो प्रकार की होती है:

(A) सामान्य बहुमत प्रणाली (Simple Majority System)

यह ब्रिटेन की देन है। वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली में इसी का प्रयोग किया जाता है। इसमें जितने उम्मीदवार चुनाव मैदान में होते हैं, उनमें से किसी एक उम्मीदवार को सर्वाधिक मत पाना होता है। जो सबसे अधिक मत पाता है वही चुनाव जीत जाता है (भले ही उसे 50% से कम मत मिले हों)।

(B) सीमित मत प्रणाली (Limited Vote System)

इसमें प्रत्येक राजनीतिक दल कुल स्थानों (सीटों) में से एक या दो स्थानों पर कम उम्मीदवार खड़ा करता है और मतदाता भी उतना ही मत देगा जितने कि उम्मीदवार खड़े हैं। जैसे— किसी निर्वाचन क्षेत्र से यदि 4 उम्मीदवार को चुना जाना है तो प्रत्येक राजनीतिक दल 3 उम्मीदवार खड़ा करेगा। और मतदाता भी 3 मत देगा और यह मत अलग-अलग तीन प्रत्याशियों को देगा।

नोट: यद्यपि इस प्रणाली का वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में प्रयोग नहीं होता है। यह बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में काम आती थी।

✦ 19. प्रतिनिधित्व के 3 अन्य विशिष्ट रूप

निर्वाचन प्रणाली या प्रतिनिधित्व के निम्नलिखित तीन तरीके भी महत्वपूर्ण हैं:

  1. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation): इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक धर्म या सम्प्रदाय के लिये स्थान सुरक्षित कर दिये जाते हैं और उस सम्प्रदाय के व्यक्ति को ही उम्मीदवार घोषित बनाया जाता है। (उदाहरण: भारत में 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार)।
  2. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व (Territorial Representation): वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इसी को मान्यता दिया गया है। इसमें निर्वाचन क्षेत्र को प्रादेशिक आधार पर बाँट दिया जाता है, फिर सर्वाधिक मत पाने वाले उम्मीदवार को चुन लिया जाता है।
  3. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व (Functional/Occupational Representation): इसका अर्थ होता है व्यवसाय के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र बँटे होना। जैसे— उद्योगपति, डॉक्टर, किसान, मजदूर, जमींदार, व्यापारी आदि व्यावसायिक वर्ग होते हैं और उसी वर्ग के व्यक्ति व्यावसायिक वर्ग से चुनाव जीतकर आते हैं।
    इसके समर्थक: कोल (G.D.H. Cole), फेबियनवादी, सिंडिकेलिस्ट (श्रेणी समाजवादी) और गिल्ड समाजवादी इसके प्रमुख समर्थक हैं।
    मुसोलिनी (Mussolini) ने इसे 'कारपोरेट राजनीति' (Corporate Politics) पर लागू किया था।

✍️20. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि लोकतन्त्र का आधार स्तंभ जनमत (Public Opinion) है, जो केवल बहुमत नहीं बल्कि जन-कल्याण की भावना से प्रेरित विवेकपूर्ण विचार है। इसके निर्माण में स्वतंत्र प्रेस और सुशिक्षित जनता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आधुनिक काल में 'गैलप पोल' के माध्यम से इसका वैज्ञानिक मापन सम्भव हो सका है।

वहीं, प्रतिनिधित्व (Representation) के सिद्धांतों में 'उदारवादी सिद्धान्त' सर्वाधिक लोकतान्त्रिक माना गया है, जिसमें 'आदेशहीन प्रतिनिधि' की अवधारणा को श्रेष्ठ माना जाता है, जहाँ प्रतिनिधि अपने विवेक से राष्ट्रहित में कार्य करता है। महिला मताधिकार ने लोकतान्त्रिक समानता को वास्तविक अर्थ प्रदान किया है।

निर्वाचन प्रणालियों के संदर्भ में देखा जाए तो अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली' (एकल संक्रमणीय व सूची प्रणाली) सर्वाधिक न्यायसंगत है। हालांकि, भारत और ब्रिटेन जैसे देशों ने व्यावहारिक सरलता और स्थायित्व के लिए 'सामान्य बहुमत आधारित प्रणाली (First-Past-The-Post)' को अपनाया है। गैरीमैंडरिंग जैसी बुराइयों से बचकर ही एक स्वच्छ निर्वाचन प्रणाली और स्वस्थ जनमत का निर्माण किया जा सकता है।

📝 अपनी तैयारी परखें!

अगर आपने जनमत, प्रतिनिधित्व और निर्वाचन प्रणालियों को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रैक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।

👉 Political Theory MCQs हल करें

📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. जनमत (Public Opinion) की सबसे सटीक विशेषता क्या है?
जनमत जनता पर आधारित वह विवेकपूर्ण और स्थायी विचार है जो अनिवार्य रूप से 'लोक कल्याण' की भावना से प्रेरित होता है। यह केवल भीड़ का मत या साधारण बहुमत नहीं है।
Q2. गैलप पोल (Gallup Poll) क्या है और इसकी शुरुआत कहाँ हुई?
गैलप पोल चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण (Exit Poll) की एक आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक है। इसकी शुरुआत 1930 के दशक में अमेरिका (USA) और ब्रिटेन (UK) में हुई थी।
Q3. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य विधायिका में अल्पसंख्यकों को उनके मतों के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करना है। इसके लिए बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र का होना आवश्यक है और इसके प्रमुख समर्थक जे. एस. मिल थे।
Q4. 'सदिष्ट प्रतिनिधि' और 'आदेशहीन प्रतिनिधि' में क्या अंतर है?
सदिष्ट प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के स्पष्ट आदेशों का पालन करता है, जबकि आदेशहीन प्रतिनिधि अपने विवेक का प्रयोग करते हुए राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर स्वतंत्र निर्णय लेता है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'आदेशहीन प्रतिनिधि' की अवधारणा ही मान्य है।
Q5. गैरीमैंडरिंग (Gerrymandering) किसे कहते हैं?
गैरीमैंडरिंग निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की वह अनुचित प्रक्रिया है जिसमें सत्ता पक्ष अपने लाभ के लिए क्षेत्रों का इस प्रकार गठन करता है कि विपक्ष आसानी से अल्पमत में रह जाए।
Join Telegram Join WhatsApp
Related Posts
Latest Posts
Loading...
Disclaimer: 'Polity Study Adda' पर उपलब्ध सभी अध्ययन सामग्री और नोट्स केवल छात्रों के त्वरित मार्गदर्शन और परीक्षा की तैयारी के लिए हैं; इन्हें कानूनी दस्तावेज़ न मानें। राजनीति विज्ञान के प्रश्नों में अक्सर अलग-अलग भर्ती आयोगों (Commissions) द्वारा अलग-अलग उत्तरों को सही मान लिया जाता है। अतः, किसी भी मानवीय/टाइपिंग त्रुटि या आधिकारिक उत्तर कुंजी (Answer Key) से भिन्नता के लिए हम उत्तरदायी नहीं होंगे। अंतिम पुष्टि के लिए हमेशा संबंधित आयोग की आधिकारिक वेबसाइट और मानक पुस्तकों का ही संदर्भ लें। यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र निजी शैक्षिक मंच है।