भारत शासन अधिनियम 1935 से स्वतन्त्रता तक सम्पूर्ण नोट्स

भारत शासन अधिनियम 1935 से स्वतंत्रता तक के विस्तृत अध्ययन नोट्स, जो TGT, PGT, LT, GIC और NET/JRF परीक्षाओं की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण हैं
भारत शासन अधिनियम 1935 से भारतीय स्वतन्त्रता एवं विभाजन तक (1935-1947)
Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष 'मेगा-लेख' में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अंतिम और सर्वाधिक निर्णायक चरण (1935-1947) का अत्यंत प्रामाणिक और विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इसमें भारत शासन अधिनियम 1935, द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव, अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आन्दोलन, आज़ाद हिन्द फौज, कैबिनेट मिशन (1946), माउन्टबेटन योजना और भारत विभाजन जैसी युगांतरकारी घटनाओं को शानदार फ्लोचार्ट्स के माध्यम से समझाया गया है। यह क्लासरूम हस्तलिखित नोट्स UPSC, PCS, RO/ARO, TGT, PGT, LT Grade, UGC NET/JRF आदि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 'रामबाण' अध्ययन सामग्री है।
📌 विषय सूची (Table of Contents)

✦ 1. भारत शासन अधिनियम 1935: एक परिचय एवं संरचना

यह ब्रिटिश संसद द्वारा भारत की जनता पर शासन करने वाला अन्तिम अधिनियम था। अब तक पारित सभी अधिनियमों में यह सबसे बड़ा और विस्तृत था। भारतीय संविधान का लगभग 75% संवैधानिक ढाँचा इसी एक्ट पर आधारित है।

अनुच्छेद (Articles)
321
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अनुसूचियाँ (Schedules)
10
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भाग (Parts)
14

इस एक्ट के पूर्व भारत के शासन का स्वरूप एकात्मक (Unitary) था। इसके द्वारा भारत में सर्वप्रथम संघात्मक सरकार (Federal Government) की स्थापना का प्रावधान हुआ।

✦ 2. अखिल भारतीय संघ का निर्माण (Federal Structure)

भारतीय संघ का निर्माण ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों और देशी रियासतों से मिलकर होना था। प्रांतों का विलय संघ में अनिवार्य था, लेकिन देसी रियासतों का विलय उनकी इच्छा पर निर्भर था। जो देशी रियासतें भारतीय संघ में अपना विलय करना चाहती थीं, उन्हें 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' (Instrument of Accession - अधिमिलन या विलय पत्र) पर हस्ताक्षर करना होता था। कुछ देसी रियासतों के शासकों के अड़ियल रवैये के कारण भारतीय संघ व्यावहारिक रूप से अस्तित्व में नहीं आ सका, यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भारतीय संघ का निर्माण हो चुका था।

भारतीय संघ (All India Federation)
(सर्वप्रथम संघात्मक सरकार की स्थापना)
ब्रिटिश
भारतीय
प्रान्त
(संख्या-11)
संघ में विलय अनिवार्य था
(भारत की गरीब जनता रहती थी)
देशी
रियासतें
(संख्या-562)
संघ में विलय ऐच्छिक (इच्छा पर निर्भर)
(धनी/अमीर वर्ग)
तथ्य एवं निष्कर्ष (Reasoning):

कथन (A): 1935 के एक्ट की संघीय व्यवस्था व्यावहारिक नहीं थी।
कारण (R): कुछ देशी रियासतों के शासकों (राजाओं) के अड़ियल रवैये के कारण उन्होंने संघ में विलय करने से इनकार कर दिया।
निष्कर्ष: दोनों सही हैं, (R), (A) की सही व्याख्या करता है। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भारतीय संघ का निर्माण हो गया था, परन्तु व्यावहारिक रूप से यह अस्तित्व में नहीं आ सका।

✅ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य (Fact Check):

भारतीय स्वतंत्रता के समय (1947 में) देशी रियासतों (Princely States) की कुल संख्या प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेजों और NCERT के अनुसार, अविभाजित भारत में देशी रियासतों की कुल संख्या 565 थी (कुछ पुरानी समितियों की रिपोर्ट में यह 562 भी मिलती है)।

आंकड़ों का सही ऐतिहासिक विभाजन:

  • कुल देशी रियासतें (अविभाजित भारत में): 565 (या 562)
  • भारत की भौगोलिक सीमा में आने वाली रियासतें: 552
  • पाकिस्तान की सीमा में जाने वाली रियासतें: 13 (565 में से)

भारत में विलय की प्रक्रिया: भारत की सीमा में आने वाली 552 रियासतों में से 549 ने स्वेच्छा से भारतीय संघ (Indian Union) में विलय स्वीकार कर लिया था। केवल 3 रियासतों (जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर) ने शुरुआत में इनकार किया था, जिनका बाद में लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सैन्य कार्रवाई, जनमत संग्रह और विलय पत्र (Instrument of Accession) के माध्यम से भारत में एकीकरण किया गया।

✦ 3. शक्तियों का विभाजन एवं संघीय न्यायालय (Federal Court)

  • इस अधिनियम द्वारा केन्द्र और प्रान्तों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया। इसके द्वारा 3 सूचियों का निर्माण हुआ:
    1. संघ सूची (Federal List): 59 विषय
    2. प्रान्तीय सूची (Provincial List): 54 विषय
    3. समवर्ती सूची (Concurrent List): 36 विषय
  • संघीय न्यायालय (Federal Court): संघ एवं प्रान्तों के बीच विवादों के निपटारे के लिये दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना (1937) हुयी। लेकिन यह अन्तिम अपीलीय न्यायालय नहीं था। इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील इंग्लैण्ड स्थित 'प्रिवी कौंसिल' (Privy Council) में होती थी।
संघ सूची
(59 विषय)
प्रान्तीय सूची
(54 विषय)
समवर्ती सूची
(36 विषय)
↓ विवाद निपटारे हेतु ↓
संघीय न्यायालय
(Federal Court)
➔ (विरुद्ध अपील) ➔
इंग्लैण्ड की
प्रिवी कौंसिल

✦ 4. केन्द्र में द्वैध शासन और प्रान्तों में स्वायत्तता

1919 के एक्ट द्वारा प्रान्तों में जो द्वैध शासन प्रणाली (Dyarchy) लागू की गई थी, वह बुरी तरह विफल रही थी। अतः 1935 के एक्ट द्वारा इसे प्रान्तों से समाप्त कर दिया गया।

प्रान्त (Provinces)
↓ द्वैध शासन समाप्त ↓
प्रान्तीय स्वायत्तता
(Provincial Autonomy)
केन्द्र (Center)
↓
द्वैध शासन प्रणाली
लागू
  • इस एक्ट द्वारा प्रान्तों को स्वायत्तता (Autonomy) दे दी गई।
  • केन्द्र में द्वैध शासन लागू कर दिया गया।
  • 11 प्रान्तों में से 6 प्रान्तों के विधानमण्डल को द्विसदनात्मक (Bicameral) बनाया गया (जैसे आज के समय में विधानसभा और विधानपरिषद होती है)।

✦ 5. अधिनियम की अन्य प्रमुख विशेषताएँ (मताधिकार, बर्मा का पृथक्करण)

  • मताधिकार का विस्तार: इस एक्ट के द्वारा महिलाओं को सर्वप्रथम मताधिकार दिया गया। (ध्यान रहे, भारत में सभी महिलाओं को पूर्ण वयस्क मताधिकार 1950 में संविधान लागू होने पर मिला)।
  • साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार: 1909 में मुसलमानों को और 1919 में सिखों को पृथक निर्वाचन दिया गया था। 1935 के एक्ट द्वारा इसे और बढ़ाकर ईसाइयों और हरिजनों (दलितों) के लिये भी पृथक निर्वाचन प्रणाली का प्रावधान किया गया। (यद्यपि पूना पैक्ट के कारण हरिजनों वाला हिस्सा संशोधित हो गया)।
  • संघ लोक सेवा आयोग: इसके द्वारा भारत के लिये एक संघ लोक सेवा आयोग (Federal Public Service Commission) के गठन का प्रावधान हुआ।
भू-राजनैतिक परिवर्तन:
  • इसके द्वारा भारत से बर्मा (म्यांमार) को अलग कर दिया गया (1937 में)।
  • अदन (Aden) को ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया गया और उसे भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया।
  • बरार (Berar) को मध्य प्रान्त का अंग घोषित कर दिया गया।
महिलाओं को मताधिकार (वैश्विक परिदृश्य):
"विश्व में सर्वप्रथम महिलाओं को मताधिकार न्यूज़ीलैण्ड (1893) ने दिया। 1918 में जर्मनी ने और 1920 में अमेरिका ने दिया। 1922 में आयरलैण्ड ने, 1928 में इंग्लैण्ड ने, 1950 में भारत ने पूर्णतः और प्रमुख विकसित देशों में सबसे अंत में 1971 में स्विट्जरलैण्ड ने महिलाओं को मताधिकार दिया।"

✦ 6. 1935 के अधिनियम की आलोचना (विद्वानों के कथन)

1935 के अधिनियम में बहुत सी खूबियां थीं, परन्तु इसमें मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) एवं प्रस्तावना (Preamble) का पूर्णतः अभाव था। इसी कारण कुछ संशोधनों के साथ 1919 के एक्ट की प्रस्तावना को ही इसमें जोड़ दिया गया था।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध कथन:
  • नेहरू जी ने इस एक्ट को "दासों का एक नया चार्टर" (A New Charter of Slavery) कहा।
  • नेहरू जी ने इस एक्ट को "अनेक ब्रेकों वाली तथा इंजन रहित मशीन/रेलगाड़ी" कहा।
  • इसे 'निरंकुशता का एक्ट' भी कहा, क्योंकि इस एक्ट की संघीय व्यवस्था भारत को बाँटने वाली (देशी रियासतों को वीटो देकर) थी।

विद्वानों द्वारा इस एक्ट को "आरक्षण एवं संरक्षण का एक्ट" (Act of Safeguards and Reservations) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें ब्रिटिश हितों की रक्षा के लिए अनेक 'सेफगार्ड' मौजूद थे।

✦ 7. 1937 के प्रान्तीय चुनाव एवं कांग्रेस मंत्रिमण्डल

1 अप्रैल सन् 1937 को प्रान्तीय स्वायत्तता से सम्बन्धित उपबन्ध लागू हुए और इसके अन्तर्गत भारत के 11 प्रान्तों में ऐतिहासिक चुनाव हुए।

1 अप्रैल 1937 - प्रान्तीय चुनाव
6 प्रान्तों में पूर्ण बहुमत
कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत प्राप्त करके अपनी सरकार (मंत्रिमण्डल) बनाई।
2 प्रान्तों में गठबंधन सरकार
असम तथा पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में कांग्रेस सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी और वहाँ मिली-जुली (गठबंधन) सरकार बनाई।
  • इस प्रकार कुल मिलाकर 11 में से 8 प्रान्तों में कांग्रेस की सरकार बनी।
  • मुस्लिम लीग को इन चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और वह कहीं भी अपने बलबूते सत्ता में नहीं आ सकी।
  • (नोट: इसी राजनीतिक निराशा के बीच वर्ष 1933 में कैम्ब्रिज के छात्र चौधरी रहमत अली ने अपने ऐतिहासिक पर्चे "नाउ ऑर नेवर" (Now or Never) में सर्वप्रथम "पाकिस्तान" (PAKSTAN) शब्द गढ़ा था। यह नाम मुस्लिम बहुल प्रांतों—पंजाब (P), अफगानिया (A), कश्मीर (K), सिंध (S) और बलूचिस्तान (tan) के अक्षरों को मिलाकर बनाया गया था।)

✦ 8. द्वितीय विश्व युद्ध (1939) एवं 'मुक्ति दिवस'

1 सितम्बर 1939 को हिटलर ने पोलैण्ड पर आक्रमण किया और इसी के साथ द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो गयी।

  • अंग्रेजों ने भारतीयों को इंग्लैण्ड की ओर से विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिये कहा। लेकिन भारतीयों ने विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों से भारत छोड़ देने की शर्त (पूर्ण स्वराज्य) रखी।
  • अंग्रेजों ने बिना भारतीय नेताओं या विधानमंडलों की सहमति के ही भारत के द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने की घोषणा कर दी।
  • इसकी तीखी प्रतिक्रियास्वरूप अक्टूबर 1939 में 8 प्रान्तों की कांग्रेसी सरकारों ने एक साथ सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया। (कांग्रेस का यह शासन लगभग 28 महीने चला था)।
मुक्ति दिवस (Day of Deliverance):

ध्यातव्य है कि कांग्रेस मन्त्रिमण्डल द्वारा त्यागपत्र दिये जाने के पश्चात् मुस्लिम लीग ने भारी खुशी मनाते हुए 22 दिसम्बर 1939 को 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाया। इस अवसर पर डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी मुस्लिम लीग का साथ दिया था।

✦ 9. अगस्त प्रस्ताव (1940) के प्रमुख प्रावधान

कांग्रेस मन्त्रिमण्डल के त्यागपत्र से उत्पन्न संवैधानिक संकट तथा विश्वयुद्ध में भारत के सहयोग की भारी आवश्यकतावश ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow) के माध्यम से 8 अगस्त 1940 को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसे 'अगस्त प्रस्ताव' (August Offer) कहा जाता है।

अगस्त प्रस्ताव के मुख्य बिन्दु:
  1. गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में और अधिक संख्या में भारतीयों को शामिल किया जायेगा।
  2. एक युद्ध सलाहकार परिषद् (War Advisory Council) का गठन किया जायेगा।
  3. भारत का संविधान बनाना भारतीयों का अपना अधिकार है, और युद्ध की समाप्ति पर भारत में औपनिवेशिक स्वराज (Dominion Status) स्थापित किया जायेगा। (पहली बार अंग्रेजों ने संविधान सभा की बात मानी)।

अगस्त प्रस्ताव की विफलता: ज्ञातव्य है कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने इस पर घोर असंतोष व्यक्त किया। कांग्रेस जहाँ भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता से कम पर समझौता नहीं चाहती थी (वे 'डोमिनियन स्टेट' को बीती बात मानते थे), वहीं मुस्लिम लीग अपनी 'भारत विभाजन' (पाकिस्तान) की माँग पर अड़िग थी। अतः अगस्त प्रस्ताव पूरी तरह असफल रहा।

✦ 10. व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) - 'दिल्ली चलो आन्दोलन'

कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव के विरोध तथा युद्ध से अपने को अलग साबित करने के लिए (यह दिखाने के लिए कि भारतीय जनता विश्वयुद्ध में अंग्रेजों के साथ नहीं है) 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' (Individual Satyagraha) आरंभ किया। इस विचारधारा के पोषक महात्मा गाँधी जी थे।

  • व्यक्तिगत सत्याग्रह 17 अक्टूबर 1940 को पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) से शुरू किया गया।
  • इसके प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे तथा दूसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू थे। (तीसरे सत्याग्रही ब्रह्मदत्त थे)।
  • इस आन्दोलन को 'दिल्ली चलो आन्दोलन' भी कहा जाता है, क्योंकि सत्याग्रही भाषण देते हुए दिल्ली की ओर कूच करते थे।

महत्वपूर्ण तथ्य (NOTE): 1940 के अगस्त प्रस्ताव में प्रान्त में भारतीयों तथा केन्द्र में अंग्रेजों के शासन (डोमिनियन स्टेट) का प्रस्ताव लाया गया था, परन्तु तब भारतीयों ने इसे ठुकरा कर पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की। (ध्यान रहे: 1940 से 1946 तक मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, जो सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाले नेता बने)।

✦ 11. क्रिप्स मिशन (1942): पृष्ठभूमि एवं प्रमुख प्रस्ताव

भारतीयों द्वारा अपनी स्वतन्त्रता के लिए लगातार लड़ी जा रही लड़ाई तथा द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की बढ़ती हुई शक्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय जगत का ध्यान भारत की ओर आकृष्ट किया। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व चीन ने भारत को स्वतन्त्र करने के लिए ब्रिटेन पर भारी दबाव डाला।

  • अब ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया कि भारतीयों की माँग को और टाला नहीं जा सकता।
  • अतः तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने युद्ध मन्त्रिमण्डल के सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारतीय नेताओं से वार्ता हेतु भारत भेजा।
  • क्रिप्स मिशन के साथ कांग्रेस के आधिकारिक वार्ताकार पं. जवाहरलाल नेहरू तथा मौलाना आजाद थे।

■ क्रिप्स प्रस्ताव (30 मार्च 1942) के मुख्य बिन्दु:

  1. संविधान सभा: युद्धोपरांत नये संविधान की रचना के लिए निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जायेगा।
  2. प्रान्तों की स्वायत्तता: प्रान्तों को संविधान को स्वीकार करने या अपने लिए अलग संविधान निर्माण की स्वतन्त्रता होगी।
  3. डोमिनियन स्टेट: युद्ध के बाद एक ऐसा भारतीय संघ स्थापित किया जायेगा जिसे पूर्ण उपनिवेश (Dominion Status) का दर्जा प्राप्त होगा।
  4. मुस्लिम लीग: मुस्लिम लीग को भारतीय संघ को स्वीकार करने अथवा न करने की स्वतन्त्रता होगी।
  5. रक्षा का दायित्व: नये संविधान के निर्माण तक भारत की रक्षा का दायित्व ब्रिटिश सरकार पर होगा।

✦ 12. क्रिप्स प्रस्ताव की विफलता एवं विद्वानों के कथन

क्रिप्स मिशन पूरी तरह से विफल रहा क्योंकि भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इसे अस्वीकार कर दिया:

मुस्लिम लीग का विरोध

मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि देश का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन की उसकी माँग नामंजूर कर दी गयी थी।

कांग्रेस का विरोध

कांग्रेस ने प्रस्ताव का विरोध इसलिए किया क्योंकि इसमें भारत को टुकड़ों में बाँटने की सम्भावनाओं के द्वार खोल दिये गए थे तथा रक्षा के प्रश्न पर कांग्रेस क्रिप्स प्रस्ताव से सहमत नहीं थी।

■ क्रिप्स प्रस्ताव पर ऐतिहासिक कथन:

  • महात्मा गाँधी: गाँधी जी ने प्रस्ताव की आलोचना करते हुए इसे 'बाद की तिथि का चेक' (Post-dated cheque) कहा।
  • पं. जवाहरलाल नेहरू: गाँधी जी के शब्दों में कुछ और शब्द जोड़ते हुए नेहरू ने इस प्रस्ताव को "टूटते हुए बैंक के नाम उत्तरतिथांकित चेक" (Post-dated cheque on a crashing bank) की संज्ञा दी।
  • पट्टाभि सीतारमैय्या: इन्होंने इसे 'अगस्त प्रस्ताव का परिवर्धित संस्करण' मात्र कहा।

✦ 13. भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) - 'अगस्त क्रान्ति'

क्रिप्स मिशन की विफलता के पश्चात् कांग्रेस को यह विश्वास हो गया कि ब्रिटिश सरकार से किसी प्रकार की आशा करना व्यर्थ है।

14 जुलाई 1942
वर्धा प्रस्ताव
कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पारित किया गया।
➔
8 अगस्त 1942
गवालिया टैंक मैदान (मुम्बई)
मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में प्रस्ताव का अनुमोदन।
➔
9 अगस्त 1942
आन्दोलन की शुरुआत
इसे 'अगस्त क्रान्ति' भी कहा जाता है। गाँधी व नेहरू गिरफ्तार।
  • इस अधिवेशन में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिसका सरदार वल्लभ भाई पटेल ने समर्थन किया था।
  • इस ऐतिहासिक सम्मेलन में गाँधी जी ने 'करो या मरो' (Do or Die) का नारा दिया।
  • नेतृत्वविहीन आन्दोलन: 9 अगस्त 1942 को गाँधी जी और नेहरू समेत सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया (ऑपरेशन जीरो आवर के तहत)। नेतृत्व के रूप में भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 में ही समाप्त हो गया, लेकिन नेतृत्वविहीन आन्दोलन (Leaderless Movement) चलता रहा।

✦ 14. सुभाष चन्द्र बोस एवं आज़ाद हिन्द फौज (INA)

1942 में ही सुभाष चन्द्र बोस नजरबंद से फरार होकर जर्मनी पहुँचे और हिटलर से मिले। इसके बाद बोस सिंगापुर पहुँचे।

आज़ाद हिन्द फौज (Indian National Army) की संरचना:
  • मानस पुत्र (Brainchild/Idea): कैप्टन मोहन सिंह
  • गठनकर्ता (Founder): रास बिहारी बोस
  • सर्वोच्च कमाण्डर (Supreme Commander): सुभाष चन्द्र बोस
  • रास बिहारी बोस ने 43,000 लोगों (सैनिकों) को लेकर एक फौज का निर्माण किया जिसकी कमान उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को दे दी।
  • सुभाष चन्द्र बोस का प्रसिद्ध नारा था— "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।"
  • सिंगापुर से रेडियो (आज़ाद हिन्द रेडियो) पर बोस ने गाँधी जी को 'राष्ट्रपिता' (Father of the Nation) कहा। यह राजनीतिक उपाधि है, वैधानिक नहीं।

नोट: गाँधी और बोस के बीच पहले से ही वैचारिक मतभेद थे (विशेषकर त्रिपुरी संकट 1939 में)। इसी कारण बोस ने कांग्रेस छोड़ दी थी और 'फॉरवर्ड ब्लॉक' (Forward Bloc) का गठन किया था।

✦ 15. वेवेल योजना (14 जून 1945) के प्रमुख प्रावधान

अक्टूबर 1943 में लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर लॉर्ड वेवेल (Lord Wavell) को भारत का वायसराय बनाया गया। वेवेल ने भारत में संवैधानिक गतिरोध दूर करने तथा अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए 14 जून 1945 को एक विस्तृत योजना प्रस्तुत की, जिसे 'वेवेल योजना' कहा जाता है।

वेवेल योजना की प्रमुख बातें:
  1. केन्द्र में नयी कार्यकारिणी परिषद् का गठन किया जायेगा। परिषद् में वायसराय तथा सैन्य प्रमुख (Commander-in-chief) के अतिरिक्त शेष सभी सदस्य भारतीय होंगे। रक्षा विभाग वायसराय के अधीन होगा।
  2. कार्यकारिणी में मुस्लिम सदस्यों की संख्या हिन्दुओं के बराबर होगी।
  3. कार्यकारिणी परिषद् एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार के समान होगी। गवर्नर जनरल बिना कारण वीटो शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा।
  4. द्वितीय विश्व युद्धोपरांत भारतीय स्वयं अपना संविधान बनायेंगे।
  5. भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान निरूद्ध सभी नेताओं को रिहा किया जायेगा और शिमला में एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया जायेगा।

✦ 16. शिमला सम्मेलन (1945) एवं उसकी विफलता

वेवेल योजना के प्रावधानों पर विचार करने के लिए 25 जून से 14 जुलाई 1945 के मध्य शिमला में एक सर्वदलीय सम्मेलन आहूत किया गया।

  • सम्मेलन में कांग्रेस प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया। महात्मा गाँधी जी ने सम्मेलन में भाग नहीं लिया था।
  • मुस्लिम लीग की जिद: मुस्लिम लीग (जिन्ना) यह चाहती थी कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में नियुक्त होने वाले मुस्लिम सदस्यों का चयन सिर्फ वही करेगी, जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।
  • सम्मेलन विफल: फलतः 14 जुलाई 1945 को वायसराय ने शिमला सम्मेलन को विफल घोषित कर दिया।

निष्कर्ष: इस सम्मेलन में कांग्रेस जहाँ अखण्ड भारत की माँग कर रही थी, वहीं मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिये अपनी जिद पर अड़ी रही। इसी हठधर्मिता के कारण वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन दोनों विफल हो गए।

✦ 17. कैबिनेट मिशन (1946): पृष्ठभूमि एवं प्रमुख सदस्य

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त, ब्रिटेन में 1945 में हुए आम चुनाव में सर क्लीमेंट एटली (Clement Attlee) के नेतृत्व में लेबर पार्टी (Labour Party) की उदारवादी दृष्टिकोण वाली सरकार बनी।

  • 14 मार्च 1946 को प्रधानमंत्री एटली ने 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में यह ऐतिहासिक घोषणा की कि "भारतीयों को स्वतन्त्र होने का अधिकार है।"
  • इसके लिए उन्होंने अपने कैबिनेट मन्त्रियों का एक तीन सदस्यीय मिशन भारत भेजा, जिसे 'कैबिनेट मिशन' कहा जाता है।
  • 24 मार्च 1946 को कैबिनेट मिशन दिल्ली पहुँचा और 16 मई 1946 को मिशन ने भारत में तत्काल एक अन्तरिम सरकार की स्थापना तथा संविधान निर्माण हेतु एक योजना प्रस्तुत की।

■ कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य:

लॉर्ड पैथिक लॉरेंस
(भारत सचिव)
मिशन के अध्यक्ष
स्टैफोर्ड क्रिप्स
(व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष)
सदस्य
ए. वी. अलेक्जेंडर
(नौसेना मंत्री)
सदस्य

✦ 18. कैबिनेट मिशन योजना के प्रमुख प्रावधान

कैबिनेट मिशन द्वारा प्रस्तुत योजना के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान किये गए थे:

  1. भारतीय संघ: भारत का एक संघ (Union) होगा जिसमें ब्रिटिश प्रान्त तथा देशी रियासतें शामिल होंगी।
  2. अखण्ड भारत: भारत की एकता बनाए रखी जाये। इसके लिए मुस्लिम लीग द्वारा की गई 'पाकिस्तान' की माँग को ठुकरा दिया गया।
  3. संविधान सभा का गठन: संविधान सभा का गठन प्रान्तीय विधानसभाओं तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा। इसमें प्रान्तीय विधानसभा सदस्यों द्वारा संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली (न कि वयस्क मताधिकार के आधार पर) किया जायेगा।
  4. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व: प्रत्येक समुदाय के प्रतिनिधि विधान मण्डल में अपने समुदाय के सदस्यों द्वारा ही चुने जाने थे। मान्यता प्राप्त समुदाय थे— सामान्य, मुस्लिम और सिख (सिख केवल पंजाब में)।
  5. देशी रियासतें: देशी रियासतों के सदस्यों का चुनाव 'समझौता समिति' (जो प्रान्तों से संविधान सभा के लिए चुने गए सदस्यों से गठित होगी) एवं देशी रियासतों की ओर से गठित समिति के बीच पारस्परिक विचार-विमर्श से किया जायेगा।
महत्वपूर्ण तथ्य:

इस योजना में प्रान्तों के लिए अलग संविधान के निर्माण का भी प्रावधान था। हैदराबाद (Hyderabad) एक ऐसी देशी रियासत थी जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुए थे।

✦ 19. अंतरिम सरकार का गठन (1946)

कैबिनेट मिशन योजना के तहत भारत में एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार (Interim Government) के गठन की प्रक्रिया आरंभ हुई।

1 अगस्त 1946
लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के लिए निमंत्रण दिया।
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24 अगस्त 1946
प्रथम अन्तरिम राष्ट्रीय सरकार के गठन की औपचारिक घोषणा की गयी।
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2 सितम्बर 1946
पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार का गठन हुआ।
  • 2 सितम्बर 1946 को जो अंतरिम सरकार गठित हुई, उसका अध्यक्ष वायसराय वेवेल था, जबकि उपाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। परिषद् में कुल 13 सदस्य थे।
  • प्रारम्भ में मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल नहीं हुई। किन्तु लॉर्ड वेवेल के प्रयास से 26 अक्टूबर 1946 को मुस्लिम लीग भी सरकार में शामिल हो गयी।
  • परिषद् के 3 सदस्यों— सैयद अली जहीर, शरतचन्द्र बोस तथा सर शफात अहमद खाँ को मंत्रिपरिषद से हटाकर लीग के 5 प्रतिनिधियों को इसमें शामिल कर लिया गया, जिससे मंत्रिमंडल के सदस्यों की कुल संख्या 15 हो गयी।
  • वित्त मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग का दायित्व मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि लियाकत अली खाँ को सौंपा गया।
मुस्लिम लीग का उद्देश्य एवं डॉ. अम्बेडकर का कथन:

मुस्लिम लीग का सरकार में शामिल होने का मुख्य उद्देश्य परिषद् के भीतर रहकर पाकिस्तान के लिए लड़ना था। मुस्लिम लीग के असहयोग एवं विरोधी दृष्टिकोण की वजह से अन्तरिम सरकार एक विफल निकाय साबित हुई। अन्तरिम सरकार के सम्बन्ध में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि:
"यह एक देश की सरकार है जिसे दो राष्ट्र चला रहे हैं।"

✦ 20. प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस एवं साम्प्रदायिक दंगे

कैबिनेट मिशन योजना के तहत पं. जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार हेतु आमन्त्रित किये जाने के घोर विरोध में मुस्लिम लीग (Muslim League) ने हिंसक मार्ग अपना लिया।

  • प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस (Direct Action Day): मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाया।
  • साम्प्रदायिक दंगे: इस दिन की घोषणा से पूरे देश में भीषण साम्प्रदायिक दंगे हुए। धीरे-धीरे सम्पूर्ण बंगाल (विशेषकर नोआखली), पंजाब तथा संयुक्त प्रान्त का काफी बड़ा भाग साम्प्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया।

राजनीतिक गतिरोध: इन्हीं भीषण दंगों के बीच 2 सितम्बर 1946 को नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनी। बाद में मुस्लिम लीग भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गई, परन्तु उसका उद्देश्य केवल सरकार के कार्यों में गतिरोध उत्पन्न करना था। लीग ने संविधान सभा की प्रथम बैठक से भी अनुपस्थित रहकर यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारतीय एकता बनाये रखना असम्भव है।

✦ 21. क्लीमेंट एटली की घोषणा (20 फरवरी 1947)

भारत में तेजी से बिगड़ती हुई साम्प्रदायिक स्थिति और राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली (Clement Attlee) ने एक ऐतिहासिक घोषणा की।

एटली की घोषणा (20 Feb 1947):

20 फरवरी 1947 को हाउस ऑफ कॉमन्स में यह घोषणा की गई कि "ब्रिटिश सरकार 30 जून 1948 के पूर्व सत्ता भारतीयों को सौंप देगी।"

सत्ता के निर्बाध हस्तान्तरण की व्यवस्था करने के लिए लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउन्टबेटन (Lord Mountbatten) को नये वायसराय के रूप में भारत भेजा गया। वह 24 मार्च 1947 को भारत का गवर्नर जनरल बनकर भारत आये।

✦ 22. माउन्टबेटन योजना / 3 जून योजना (1947)

लॉर्ड माउन्टबेटन ने भारत आकर विभिन्न नेताओं से गहन विचार-विमर्श किया। जब उन्हें लगा कि विभाजन ही एकमात्र विकल्प है, तो वे अपनी योजना पर सहमति लेने लंदन चले गए, वहाँ ब्रिटिश सरकार के सामने देश विभाजन की अपनी योजना प्रस्तुत की और योजना पर सहमति प्राप्त कर वह 31 मई 1947 को वापस भारत आ गए।

  • 3 जून 1947 को माउन्टबेटन ने अपने नीति-विषयक बयान को जारी किया, जिसे 'माउन्टबेटन योजना' (Mountbatten Plan) कहा जाता है।
  • इस योजना को '3 जून योजना', 'मन बाटन योजना' या 'बाल्कन प्लान' (Balkan Plan) की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है।
  • इसी योजना के आधार पर भारत का विभाजन सुनिश्चित हुआ और भारत तथा पाकिस्तान नामक दो स्वतन्त्र राष्ट्रों के निर्माण की रूपरेखा तैयार हुई।

✦ 23. विभाजन की त्रासदी एवं महात्मा गाँधी की भूमिका

भारत का विभाजन रोकने के लिए महात्मा गाँधी ने अंतिम क्षण तक प्रयास किया।

गाँधी जी का अंतिम प्रयास (2 अप्रैल 1947):

2 अप्रैल 1947 को माउन्टबेटन से एक मुलाकात में गाँधी जी ने सुझाव दिया कि "आप मुहम्मद अली जिन्ना को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित कीजिए, कम से कम देश का बँटवारा रुक जायेगा।" परन्तु पं. जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल ने गाँधी जी के इस प्रस्ताव का जमकर विरोध किया।

  • नेहरू और पटेल के विरोध से गाँधी जी अत्यधिक आहत हुए। वे दिल्ली की राजनीति छोड़कर नोआखली (बंगाल) की गलियों में साम्प्रदायिक दंगों के बीच लोगों को समझाते हुए अकेले टहलते रहे।
  • गाँधी जी एक हाथ में हिन्दू तथा दूसरे हाथ में मुस्लिम के बच्चे को लेकर साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रहे थे।
वन मैन बाउंड्री फोर्स (One Man Boundary Force):

दंगों को शांत करने में गाँधी जी के इस अदम्य साहस और अकेले प्रयास की प्रशंसा में लॉर्ड माउन्टबेटन ने उन्हें 'One Man Boundary Force' की संज्ञा दी थी। अन्ततः देश में फैली भीषण साम्प्रदायिकता की लहर और रक्तपात को देखते हुए गाँधी जी ने भी भारी मन से विभाजन को मौन स्वीकृति दे दी थी।

✦ 24. वित्तीय विवाद एवं राष्ट्रपिता की हत्या

हिंसा और साम्प्रदायिकता के आधार पर पाकिस्तान का जन्म हो गया। परन्तु विभाजन के तुरंत बाद ही दोनों नवगठित देशों के बीच वित्तीय परिसम्पत्तियों के बँटवारे को लेकर गहरा विवाद उत्पन्न हो गया।

  • 55 करोड़ रुपये का विवाद: पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये (नोट में उल्लिखित) देने का निर्णय लिया गया था, क्योंकि विभाजन के समय जो लोग भारत से पाकिस्तान गए, वे अपनी जमीन यहीं छोड़ गए थे और उसी की कीमत पाकिस्तान को देनी थी।
  • गाँधी जी का अनशन: भारत सरकार (विशेषकर सरदार पटेल) पाकिस्तान के भारत विरोधी रवैये को देखते हुए यह धन नहीं देना चाहते थे। इसी बात को लेकर गाँधी जी आमरण अनशन पर बैठ गए कि पाकिस्तान भी हमारा बच्चा है, उसको उसका हक (मुआवजा) देना चाहिए।
  • वल्लभभाई पटेल का तर्क था कि यह मुआवजा नहीं दिया जाए क्योंकि विभाजन से भारत का बहुत नुकसान हुआ है और भारत के पास देने के लिए पैसा भी नहीं है।
महात्मा गाँधी की हत्या (30 जनवरी 1948)

गाँधी जी द्वारा पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलवाने की जिद और अनशन से नाराज होकर, नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में गोली मारकर गाँधी जी की हत्या कर दी।

✦ 25. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त ऐतिहासिक घटनाक्रमों का विश्लेषण करने से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि 1935 से 1947 का कालखंड भारतीय इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा, संघर्षपूर्ण और दर्दनाक अध्याय था। जहाँ एक ओर भारत शासन अधिनियम 1935 ने संघात्मक व्यवस्था, शक्तियों का विभाजन और संघीय न्यायालय जैसी संस्थागत रूपरेखाओं के माध्यम से स्वतंत्र भारत के वर्तमान संविधान (1950) की ठोस नींव रखी, वहीं दूसरी ओर 1940 के दशक के आन्दोलनों ने भारत की आज़ादी को सुनिश्चित किया।

'भारत छोड़ो आन्दोलन' (अगस्त क्रान्ति) और सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के प्रहारों ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें पूरी तरह से हिला दीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दबाव में क्रिप्स मिशन और वेवेल योजना जैसे असफल प्रयासों के बाद, कैबिनेट मिशन (1946) ने एक अखण्ड भारत की अंतिम उम्मीद जगाई थी। परन्तु मुस्लिम लीग की 'प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' की जिद के कारण भड़के भीषण साम्प्रदायिक दंगों ने इस उम्मीद को चकनाचूर कर दिया।

माउन्टबेटन योजना (3 जून योजना) ने देश के विभाजन पर अपनी मुहर लगा दी। नोआखली के दंगों में 'वन मैन बाउंड्री फोर्स' की भूमिका निभाने वाले महात्मा गाँधी का अंतिम प्रयास भी बँटवारा रोक न सका। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद दोनों देशों के बीच कटुता कम करने के प्रयास में 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। इसी अपार रक्तपात, संघर्ष और असंख्य बलिदानों की नींव पर 15 अगस्त 1947 को एक स्वतन्त्र भारत का उदय हुआ।

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अगर आपने भारत शासन अधिनियम 1935 से लेकर भारत के विभाजन तक के इतिहास को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रैक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।

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📝 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. भारत शासन अधिनियम 1935 को "दासों का नया चार्टर" किसने कहा था?
भारत शासन अधिनियम 1935 की आलोचना करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे 'दासों का नया चार्टर' (A New Charter of Slavery) और 'अनेक ब्रेकों वाली इंजन रहित रेलगाड़ी' कहा था।
Q2. 'मुक्ति दिवस' (Day of Deliverance) कब और किसने मनाया था?
कांग्रेस मंत्रिमंडलों द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के बाद, मुस्लिम लीग ने मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में 22 दिसम्बर 1939 को 'मुक्ति दिवस' मनाया था। इसमें डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी लीग का समर्थन किया था।
Q3. व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) के प्रथम और द्वितीय सत्याग्रही कौन थे?
महात्मा गाँधी की प्रेरणा से महाराष्ट्र के पवनार आश्रम से शुरू हुए 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' (दिल्ली चलो आन्दोलन) के प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे थे और दूसरे सत्याग्रही पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।
Q4. क्रिप्स प्रस्ताव (1942) को गाँधी जी ने क्या कहा था?
गाँधी जी ने क्रिप्स प्रस्ताव को 'बाद की तिथि का चेक' (Post-dated cheque) कहा था, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने "टूटते हुए बैंक के नाम" (on a crashing bank) शब्द जोड़ दिए थे।
Q5. 'भारत छोड़ो आन्दोलन' का प्रस्ताव कब और कहाँ पारित किया गया था?
भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में लाया गया और 8 अगस्त 1942 को मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान में इसे अंतिम रूप से पारित किया गया।
Q6. आज़ाद हिन्द फौज (INA) के गठन का श्रेय किसे दिया जाता है?
आज़ाद हिन्द फौज का विचार कैप्टन मोहन सिंह का था। इसके औपचारिक गठनकर्ता रास बिहारी बोस थे, जिन्होंने बाद में इसकी सर्वोच्च कमान सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी थी।
Q7. गाँधी जी को सर्वप्रथम 'राष्ट्रपिता' (Father of the Nation) किसने कहा था?
सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर स्थित 'आज़ाद हिन्द रेडियो' से प्रसारित अपने संदेश में महात्मा गाँधी को सर्वप्रथम 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया था।
Q8. कैबिनेट मिशन (1946) के अध्यक्ष कौन थे?
कैबिनेट मिशन के अध्यक्ष तत्कालीन भारत सचिव 'लॉर्ड पैथिक लॉरेंस' थे। इसके अन्य दो सदस्य स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर थे।
Q9. लॉर्ड माउन्टबेटन ने महात्मा गाँधी को 'One Man Boundary Force' क्यों कहा था?
विभाजन के समय जब पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगे चरम पर थे, तब गाँधी जी ने बंगाल के नोआखली में अकेले पैदल घूमकर साम्प्रदायिक सौहार्द कायम किया। उनके इस अदम्य साहस के कारण ही माउन्टबेटन ने उन्हें यह उपाधि दी थी।
Q10. नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या क्यों की?
विभाजन के पश्चात् भारत सरकार पाकिस्तान को तय की गई 55 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता नहीं देना चाहती थी, परन्तु गाँधी जी ने पाकिस्तान को यह राशि दिलाने के लिए आमरण अनशन किया। इसी बात से क्रोधित होकर नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी।
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