मैकियावेली के राजनीतिक विचार एवं मध्यकालीन चिंतन नोट्स
| अरस्तू के बाद का राजनीतिक चिंतन एवं मैकियावेली के विचार |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में अरस्तू के बाद के राजनीतिक चिंतन का ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें एपीक्यूरियन और स्टोइक विचारधारा, मध्यकाल में सामंती राज्य व चर्च की प्रधानता, और मार्सिलियो ऑफ पडुआ द्वारा आधुनिक काल की नींव रखने का विस्तृत वर्णन है। इसके अतिरिक्त, आधुनिक राजनीति विज्ञान के जनक मैकियावेली (Machiavelli) के मानव स्वभाव, राज्य की सुरक्षा (शेर और लोमड़ी की नीति), साध्य-साधन के सिद्धान्त तथा शासन प्रणालियों के वर्गीकरण का परीक्षापयोगी संकलन किया गया है। |
- 1. अरस्तू के बाद का राजनीतिक चिंतन (Post-Aristotelian Thought)
- 2. एपीक्यूरियन और स्टोइक विचारधारा (Epicurean and Stoic Thought)
- 3. मध्यकाल: सामंती राज्य (Middle Ages: Feudal State)
- 4. मार्सिलियो ऑफ पडुआ और आधुनिक काल का उदय
- 5. धर्म सुधार व व्यापारिक वाणिज्यिक क्रांति का प्रभाव
- 6. मैकियावेली (Machiavelli): जीवन परिचय व मानव स्वभाव
- 7. इटली की राजनीतिक दुर्दशा और मैकियावेली की चिंता
- 8. राज्य या राजा पर मैकियावेली के विचार (Views on State/Prince)
- 9. मैकियावेली का राज्य/शासन प्रणाली का वर्गीकरण
- 10. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
✦ 1. अरस्तू के बाद का राजनीतिक चिंतन (Post-Aristotelian Thought)
अरस्तू की विचारधारा के विरोध में मुख्य रूप से दो नई विचारधाराएं सामने आईं: एपीक्यूरियन (Epicurean) और स्टोइकवाद (Stoicism)।
■ अरस्तू की विचारधारा का पतन और कारण
- अरस्तू ने व्यक्ति को महत्व दिया और राज्य को सर्वोच्च संस्था माना।
- यूनानी नगर-राज्यों का यह अंतिम महान विचारक था। अरस्तू की मृत्यु होते ही यूनान में अंतःकलह शुरू हो गया।
- इस अंतःकलह से यूनानी नगर-राज्य कमजोर पड़ने लगे, फलस्वरूप रोम (Rome) ने यूनान पर आक्रमण कर दिया और यूनान पर अधिकार कर लिया।
■ रोमन साम्राज्य का उदय और विचार
- अरस्तू के देहावसान के बाद यूनानी नगर राज्य में अंतःकलह शुरू हो गई फलस्वरूप यूनान कमजोर पड़ गया। रोम ने उस पर आक्रमण किया तथा अपने में मिला लिया तथा एक रोमन साम्राज्य की स्थापना की। रोम सारी सभ्यता का केन्द्र बना यद्यपि रोमनों ने सब कुछ यूनानियों से ही सीखा फिर भी उनकी विचारधारा यूनानियों से भिन्न रही।
- जहाँ यूनानियों ने राज्य के लिए POLIS शब्द का प्रयोग किया था, वहीं रोमनों ने CIVITAS शब्द का प्रयोग किया।
- जहाँ यूनानी चिंतकों ने राज्य को सर्वाधिक महत्व दिया और उसे साध्य के रूप में देखा, वहीं रोमनों ने राज्य के स्थान पर व्यक्ति को महत्व दिया।
- रोमन पहले विचारक हैं जिन्होंने व्यक्ति की सम्प्रभुता को स्वीकार किया तथा राज्य को एक साधन के रूप में माना। रोमनों ने विधि का शासन या मानवीय विधि को महत्व दिया। रोमनों ने व्यक्तियों की समानता में विश्वास किया।
रोम का एक गुलाम शासक स्पार्टाकस (Spartacus) का कथन है: "हर मानव के रक्त का रंग एक जैसा है।" इस समय के सिसरो (Cicero), पोलीबियस और सेनेका राजनीतिज्ञ चिंतक माने जाते हैं। सिसरो ने ही सबसे पहले 'प्राकृतिक कानून' (Natural Law) की स्पष्ट व्याख्या की थी।
(भौतिक जगत)
(ईश्वर)
(मध्यकाल की सारी राजनीति ईश्वर/चर्च पर केंद्रित थी)
✦ 2. एपीक्यूरियन और स्टोइक विचारधारा (Epicurean and Stoic Thought)
अरस्तू की विचारधारा के प्रतिक्रियास्वरूप यूनान में एपीक्यूरियन और स्टोइकवाद की विचारधारा पनपी जो व्यक्तिवादी विचारधारा थी। जो अरस्तू के बिल्कुल विपरीत थी जहाँ प्लेटो और अरस्तू ने राज्य को सर्वाधिक महत्व दिया और व्यक्ति को राज्य के अधीन कर दिया और यह बताने का प्रयास किया कि व्यक्ति अपना सब कुछ राज्य में ही प्राप्त कर सकता है।
इसके संस्थापक एपिक्यूरस (Epicurus) थे। एपीक्यूरियन विचारधारा का मानना है कि राज्य का निर्माण व्यक्ति ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया है और राज्य का आधार उपयोगिता है। राज्य का निर्माण व्यक्तियों ने इसलिए किया है ताकि वह शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। यह राजनीति से दूर रहने (Political Apathy) की सलाह देते थे।
इसके संस्थापक जीनो (Zeno) थे। स्टोइकवाद विचारधारा ने 'सार्वभौमिक भ्रातृत्व' (Universal Brotherhood) का संदेश दिया। इनका मानना था कि हर मानव ईश्वर का एक-एक अंश है, इसलिए सभी मानव समान हैं। विश्व-राज्य (World State) की कल्पना सबसे पहले इन्होंने ही की थी।
✦ 3. मध्यकाल: सामंती राज्य (Middle Ages: Feudal State)
मध्यकाल (6वीं सदी से 15वीं सदी तक) को 'अंधकार युग' (Dark Age) के नाम से भी जाना जाता है। मध्यकाल में अंधविश्वास एवं आस्था का बोलबाला था। यहाँ किसी भी विषय को तर्क और ज्ञान की कसौटी पर कसे बिना आंख मूंदकर स्वीकार किया जाता था। मध्यकाल की निम्नलिखित तीन विशेषताएँ थीं:
| 1. चर्च की प्रधानता | 2. सामंती राज्य का बोलबाला | 3. चर्च और राज्य के बीच संघर्ष |
|---|---|---|
| मध्यकाल का सम्पूर्ण राजनीतिक चिंतन धर्म पर आधारित है। यहाँ पर चर्च की प्रधानता है, यहाँ तक कि राज्य भी चर्च के अधीन है। राज्य सम्पूर्ण कार्य चर्च के निर्देशानुसार करता है। हर प्रकार से बौद्धिक जगत का शासन अलौकिक सत्ता के नाम से किया जाता है। धर्म द्वारा थोपे आस्था या विश्वास के नाम से स्वीकार किया जाता यहाँ ज्ञान विज्ञान का अंत हो गया था अर्थात् सब कुछ अंधविश्वास पर आधारित था। एक प्रकार से धर्म का बोलबाला था और यहाँ की राजनीति पूर्णतः धार्मिक व आध्यात्मिक थी इसलिए मध्यकाल को राजनीतिक चिंतन में शामिल नहीं किया जाता। | मध्यकाल में सामंती राज्य का बोलबाला था। सामंती राज्य वह राज्य है जो सत्ता के बटवारे पर आधारित था। यहाँ पर हर व्यक्ति का कोई न कोई मालिक था जैसे - किसान ➝ जमींदार ➝ जागीरदार ➝ राजा ➝ पोप ➝ ईसामसीह। यह व्यवस्था विशेषाधिकारों पर आधारित थी जहाँ जाति, धर्म, भाषा, जन्म, सम्पत्ति व लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता था। अर्थात् विशेषाधिकार युक्त व्यवस्था वह है जहाँ जन्म की प्रधानता है कर्म की नहीं। | जहाँ 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक राज्य चर्च के अधीन था और सम्पूर्ण विषय का निर्धारण पोप करता था वहीं 13वीं शताब्दी से चर्च व राज्य के बीच संघर्ष छिड़ गया और चर्च की प्रधानता को चुनौती मिलने लगी। राजा स्वयं कहने लगा कि मैं पोप के प्रति नहीं बल्कि ईसा मसीह के प्रति उत्तरदायी हूँ और राज्य की सत्ता चर्च की सत्ता से छुटकारा पाने के लिए छटपटाने लगी और धीरे-धीरे कई मध्ययुगीन चिंतक आये जिनकी विचारधारा ने लगातार चर्च की सत्ता को कमजोर किया। |
संत ऑगस्टाइन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द सिटी ऑफ गॉड' (The City of God) में दो नगरों के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने एक ईश्वरीय नगर और दूसरे को मानवीय नगर बताया अर्थात् बौद्धिक और अलौकिक नगर को अलग-अलग परिभाषित किया। इसी प्रकार मध्यकाल के महान विचारक संत थॉमस एक्वीनास (St. Thomas Aquinas) ने आध्यात्मिक न्याय और मानवीय न्याय में अंतर किया। पोप गेलेरियस द्वितीय ने 'दो तलवारों के सिद्धान्त' का प्रतिपादन किया। यहां पर तलवार सत्ता का प्रतीक था। उसके अनुसार ईश्वर ने दो सत्ता दिया है और कभी एक साथ दो सत्ता नहीं रह सकती।
✦ 4. मार्सिलियो ऑफ पडुआ और आधुनिक काल का उदय
मार्सिलियो ऑफ पडुआ (Marsilius of Padua - 1275-1343) जो कि मध्यकाल का अंतिम इतालवी चिंतक था, जिसकी विचारधारा ने मध्यकाल को समाप्त करने और आधुनिक काल को उदय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- पडुआ ने अपनी पुस्तक 'डिफेन्सर पेसिस' (Defensor Pacis) में लिखा है कि पोप और राजा की सत्ता अलग-अलग होनी चाहिए।
- राजा का कार्य है कि इहलोक सुधारे जबकि पोप का कार्य है कि परलोक सुधारे।
- पडुआ ने स्पष्ट कर दिया कि कानून मानवीय होना चाहिए। पडुआ ने यहाँ तक कह दिया कि परलोक सुधारने का कार्य भी केवल उसी को दिया जा सकता है जिसे जनता का समर्थन प्राप्त हो।
- इस प्रकार पडुआ की विचारधारा ने मध्यकाल की समाप्ति और आधुनिक काल के उदय की भूमिका तैयार कर दी।
■ आधुनिक काल के उदय में सहायक आंदोलन
आधुनिक काल के उदय में निम्नलिखित दो प्रमुख आंदोलनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा:
यह यूरोप की जनता के द्वारा चलाया गया आन्दोलन था, जिसका उद्देश्य चर्च के भीतर पोप की निरंकुश सत्ता को समाप्त कर परिषदों (Councils) को सर्वोच्च बनाना था।
इसे अंग्रेजी में रेनेसां कहते हैं जिसका अर्थ है 'पुनर्जन्म या ज्ञानोदय'। यह 15वीं शताब्दी में चला एक सांस्कृतिक आन्दोलन था, इसका अर्थ है कि इसने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया और प्रत्येक क्षेत्र में स्वतंत्रता व समानता की मांग की। इस आन्दोलन का नारा था 'मानव ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है' (Man is the measure of all things)। इसी आन्दोलन ने स्वतंत्रता व समानता को जन्म दिया फलस्वरूप मानववाद या व्यक्तिवाद का जन्म हुआ।
✦ 5. धर्म सुधार व व्यापारिक वाणिज्यिक क्रांति का प्रभाव
आधुनिक काल के उदय में पुनर्जागरण के साथ-साथ धर्म सुधार और वाणिज्यिक क्रांति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:
- धर्म सुधार आन्दोलन (Reformation): यह 16वीं शताब्दी में चला। मार्टिन लूथर (Martin Luther) और जॉन केल्विन इसके प्रमुख प्रणेता थे। इस आन्दोलन ने धर्म आधारित राज्य को समाप्त किया और धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) को जन्म दिया।
- व्यापारिक वाणिज्यिक क्रांति (Commercial Revolution): 16वीं शताब्दी में इस क्रांति ने व्यापार को क्षेत्रीय से राष्ट्रीय बना दिया, जिससे एक मजबूत केंद्रीय सत्ता की आवश्यकता महसूस हुई और इसने राष्ट्र-राज्य (Nation-State) के उदय में अपनी भूमिका अदा की।
उपर्युक्त आन्दोलनों ने मध्यकाल के मौत की घंटी बजा दी और 16वीं शताब्दी में आधुनिक काल के उदय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। पुनर्जागरण आन्दोलन, धर्म सुधार आन्दोलन और व्यापारिक वाणिज्यिक क्रांति ने राष्ट्र राज्य के उदय में मुख्य रूप से अपनी भूमिका निभाई।
✦ 6. मैकियावेली (Machiavelli): जीवन परिचय व मानव स्वभाव
निकोलस मैकियावेली (1469-1527) का जन्म इटली के 'फ्लोरेंस' नामक गणराज्य में हुआ था। जिस समय मैकियावेली ने जन्म लिया, उस समय पुनर्जागरण आन्दोलन (Renaissance) चल रहा था, अतः मैकियावेली इस आन्दोलन से काफी प्रभावित था। इसीलिए प्रसिद्ध विचारक डनिंग ने मैकियावेली को 'अपने युग का शिशु' (Child of his times) कहा।
■ आधुनिक राजनीति विज्ञान का जनक
- मैकियावेली अरस्तू के विचारों से प्रभावित था। अतः उसे इटली का अरस्तू भी कहा जाता है।
- जहाँ प्राचीन काल में अरस्तू ने राजनीतिशास्त्र को नीतिशास्त्र से पृथक् करके राजनीति का क्रमबद्ध एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया और राजनीति विज्ञान का जनक बनने का श्रेय प्राप्त किया, उसी प्रकार आधुनिक काल में यही कार्य मैकियावेली ने किया। अतः मैकियावेली को आधुनिक राजनीति विज्ञान का जनक माना गया।
- मैकियावेली ने आगमन पद्धति (Inductive Method), ऐतिहासिक और यथार्थवादी पद्धति का प्रयोग किया।
- मैकियावेली को राष्ट्र राज्य के जनक के रूप में देखा जाता है। मैकियावेली ने सर्वप्रथम 'राज्य' (State/Stato) शब्द का आधुनिक अर्थों में प्रयोग अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द प्रिंस' (The Prince - 1513) में किया।
मैकियावेली की आधुनिकता का मुख्य कारण ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग है।
- विलियम टी. ब्लूम ने मैकियावेली को 'व्यवहारवाद का अग्रदूत' कहा है।
- विलियम टी. जोन्स ने मैकियावेली को 'आधुनिक युग का श्रेष्ठ निचोड़' बताया है।
- कैटलिन ने मैकियावेली को ' प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक' बताया है।
■ मानव स्वभाव पर विचार (Views on Human Nature)
मैकियावेली ने विशेष रूप से इटली के मानव को ध्यान में रखकर मानव स्वभाव का एक निराशावादी एवं सार्वभौमिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, यद्यपि आगे चलकर यह आलोचना का विषय बना क्योंकि मैकियावेली ने यह तो बता दिया कि मानव का स्वभाव बुरा है लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक कारण स्पष्ट नहीं कर सका।
मैकियावेली के अनुसार— मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी है। वह स्वार्थी, चंचल, कायर, झूठा और कृतघ्न (Ungrateful) है। मनुष्य का काम जब किसी व्यक्ति से पड़ता है, तो वह उसके सामने ऐसा प्रस्तुत होता है जैसे वह अपना सब कुछ उसे दे देगा। अपने पत्नी, बच्चों और सम्पत्ति को भी दांव पर लगा सकता है। लेकिन जैसे ही काम निकल जाता है, वह एहसान भूल जाता है।
मैकियावेली का कथन है— "मनुष्य न केवल डरपोक तथा अज्ञानी होते हैं, वरन वह चरित्रहीन भी होते हैं और अपनी वासनाओं के दास और प्रथम श्रेणी के स्वार्थी भी होते हैं।" मैकियावेली ने यहाँ तक लिखा है कि जो मनुष्य अपने माता-पिता का नहीं होता वह दूसरों का क्या होगा।
मैकियावेली का सबसे प्रसिद्ध कथन है:
"लोग अपने पिता की मृत्यु का गम आसानी से भूल जाते हैं लेकिन पैतृक सम्पत्ति (धन) की हानि को कभी नहीं भूलते।"
ध्यान रहे कि: मैकियावेली मनुष्य में सामाजिकता के गुण भी देखता है। वह स्विट्जरलैंड के लोगों को अच्छा भी मानता है, लेकिन इटली के मनुष्यों को ध्यान में रखते हुए उसने मानव स्वभाव का एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर दिया।
✦ 7. इटली की राजनीतिक दुर्दशा और मैकियावेली की चिंता
1343 में मार्सिलियो ऑफ पडुआ की मृत्यु होने और 1469 में मैकियावेली के जन्म होने के बीच यूरोप में जो पुनर्जागरण आन्दोलन चला उससे यूरोप के कई देशों जैसे— इंग्लैण्ड, स्पेन, फ्रांस व स्विट्जरलैण्ड में मजबूत राष्ट्र राज्य की स्थापना हो गई। लेकिन मैकियावेली के इटली में राष्ट्र राज्य की स्थापना नहीं हो सकी।
- इटली 5 छोटे भागों में बँटा हुआ था: वेनिस, मिलान, नेपल्स, फ्लोरेंस और पोप राज्य।
- ये लोग सत्ता और स्वार्थ के लिए आपस में लड़ रहे थे। मैकियावेली की मुख्य चिंता यह थी कि यदि ये आपस में लड़ेंगे तो कमजोर हो जायेंगे और बाहर की शक्तियाँ (जैसे स्पेन या फ्रांस) आक्रमण करके इटली को नष्ट कर देंगी।
■ 'द प्रिंस' (The Prince) और 'डिस्कोर्सेज ऑन लिवी'
फ्लोरेंस गणराज्य की तरफ से मैकियावेली को यूरोप के विभिन्न देशों में राजदूत (Diplomat) बनने का मौका मिला। मैकियावेली ने घूम-घूम कर यह देखा कि कहाँ गणराज्य की स्थापना हुई है और कहाँ निरंकुश राजतंत्र विद्यमान है।
मैकियावेली ने अपनी पुस्तक 'डिस्कोर्सेज ऑन लिवी' (Discourses on Livy) में शासन प्रणाली का वर्गीकरण करते हुए स्पष्ट किया:
"जिस देश के लोग चरित्रवान, ईमानदार और कर्तव्य परायण हैं वहाँ गणतंत्र (Republic) सफल है। लेकिन जिस देश के लोग चरित्रहीन, बेईमान और भ्रष्ट हैं वहाँ निरंकुश राजतंत्र (Absolute Monarchy) सफल है।"
इस आधार पर मैकियावेली ने यह निर्णय लिया कि इटली के लोग भी चरित्रहीन, भ्रष्ट, झगड़ालू और गुटबंदी से युक्त हैं, इसलिए इटली में निरंकुश राजतंत्र ही सफल हो सकता है। मैकियावेली के समक्ष मुख्यत: दो समस्याएं थीं:
- इटली का एकीकरण (Unification of Italy) करना।
- एक ऐसे शक्तिशाली शासक की नियुक्ति करना जो राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
मैकियावेली की प्रमुख पुस्तकें 'द आर्ट ऑफ वार' (The Art of War), 'हिस्ट्री ऑफ फ्लोरेंस' और 'द प्रिंस' (The Prince) हैं।
✦ 8. राज्य या राजा पर मैकियावेली के विचार (Views on State/Prince)
मैकियावेली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द प्रिंस' में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना पर बल दिया और मानव स्वभाव को देखते हुए इस बात को महसूस किया कि निरंकुश राजतंत्र ही इटली के लिए अपरिहार्य है। मैकियावेली ने राजा के आदर्श गुण नहीं बताए (जैसे प्लेटो ने बताए थे), बल्कि उसने यह बताया कि राज्य की सुरक्षा के लिए राजा को यथार्थ में क्या-क्या करना चाहिए। मैकियावेली के राजनीतिक दर्शन का मुख्य उद्देश्य इटली में राष्ट्र राज्य की स्थापना और उसकी सुरक्षा है।
मैकियावेली का प्रसिद्ध कथन है— "राजा को केवल राज्य की सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए, साधन तो स्वयं आदरणीय व पवित्र माने जायेंगे।" मैकियावेली कहता है कि राज्य की सुरक्षा के लिए राजा नैतिक व अनैतिक किसी भी साधन का प्रयोग कर सकता है। उसका मानना था कि "साध्य की सफलता ही साधन को पवित्र बना देती है।" मैकियावेली लिखता है कि राज्य का काम नैतिकता (Morality) सिखाना नहीं है।
■ शक्ति और शासक का चरित्र (शेर और लोमड़ी की नीति)
मैकियावेली का कथन है— राज्य का आधार शक्ति है, अतः राजा को लगातार शक्ति अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए। शक्ति का अर्जन, परिरक्षण और प्रसार ही राज्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
मैकियावेली कहता है कि राजा राज्य की सुरक्षा के लिए कोई भी तरीका अपना सकता है: कर (Tax), बल, छल। मैकियावेली ने राज्य को 'शेर और लोमड़ी' की नीति (Lion and Fox Policy) अपनाने की सलाह दी। अर्थात् राजा को शेर की तरह साहसी (ताकि वह भेड़ियों को डरा सके) और लोमड़ी की तरह चालाक (ताकि वह जाल को पहचान सके) होना चाहिए।
मैकियावेली कहता है कि "शासक के लिए प्रेम की अपेक्षा भयभीत होना अधिक सुरक्षित है।" क्योंकि स्वार्थी जनता आवश्यकता पड़ने पर प्रेम तोड़ सकती है लेकिन दण्ड का भय नहीं। इसलिए जनता को नियंत्रण में रखने के लिए भय का सहारा लेना चाहिए, परन्तु शासक को जनता की घृणा से बचना चाहिए (स्त्रियों और सम्पत्ति का सम्मान करके)।
राजा का चरित्र दोहरा होना चाहिए— बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और, बाहर से ऐसा लगे कि वह जनता के लिए समर्पित, धार्मिक और दयालु है, लेकिन अंदर से वह अपने लक्ष्य के प्रति कठोर बना रहे। (Virtu और Fortuna): मैकियावेली शासक को 'वर्च्यू' (पराक्रम/वीरता) अपनाने को कहता है ताकि वह 'फॉर्च्यूना' (भाग्य रूपी विनाशकारी नदी) पर नियंत्रण पा सके।
मैकियावेली अंत में कहता है कि यदि जनता किसी भी तरीके से वश में ना आए तो राजा धर्म का सहारा ले, लेकिन राजा अंदर से स्वयं धार्मिक ना हो और धर्म का सहारा लेकर जनता को डराए। इस संदर्भ में मैकियावेली का प्रसिद्ध कथन है:
"धर्मभीरु (डरपोक) पुरुष स्वर्ग की लालसा में सदैव लगे रहते हैं। वे चोट सह लेते हैं मगर बदला नहीं लेते हैं।"
✦ 9. मैकियावेली का राज्य/शासन प्रणाली का वर्गीकरण
हम जानते हैं कि शासन प्रणाली का प्रथम वैज्ञानिक वर्गीकरण अरस्तू ने किया था, आधुनिक काल में यही कार्य मैकियावेली ने किया। मैकियावेली ने भी शासन प्रणाली के तीन शुद्ध और तीन अशुद्ध रूप बताये। मैकियावेली कहता है जब शासक शासन जनहित में करता है तब वह शासन का उत्कृष्ट रूप है, लेकिन वही शासक जब शासन अपने हित में करने लगता है तब वह विकृत या निकृष्ट हो जाता है।
| शासन का आधार (संख्या) | उत्कृष्ट रूप (Normal) - जनहित में | विकृत रूप (Corrupt) - स्वार्थ में |
|---|---|---|
| एक व्यक्ति का शासन | राजतंत्र (Monarchy) | आततायी तंत्र / निरंकुश तंत्र (Tyranny) |
| कुछ व्यक्तियों का शासन | कुलीनतंत्र (Aristocracy) | गुटतंत्र / वर्गतंत्र (Oligarchy) |
| बहुत सारे व्यक्तियों का शासन | गणतंत्र (Republic / Polity) | भीड़तंत्र (Democracy) |
यद्यपि सैद्धांतिक रूप से मैकियावेली गणतंत्र (Republic) को सर्वश्रेष्ठ मानता था, परन्तु इटली की तत्कालीन भ्रष्ट परिस्थितियों को देखते हुए उसने व्यवहार में निरंकुश राजतंत्र (Absolute Monarchy) का समर्थन किया।
✍️ 10. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त सम्पूर्ण विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि मध्यकाल के 'अंधकार युग' और चर्च की निरंकुश सत्ता के पतन के पश्चात् मैकियावेली ने पुनर्जागरण के विचारों को आत्मसात करते हुए आधुनिक राजनीति विज्ञान की ठोस नींव रखी। अरस्तू के यथार्थवाद को आगे बढ़ाते हुए मैकियावेली ने राजनीति को धर्म और नैतिकता से पूरी तरह अलग किया।
यद्यपि मैकियावेली का मानव स्वभाव संबंधी दृष्टिकोण अत्यधिक निराशावादी (स्वार्थी, कायर, कृतघ्न) था, परन्तु तत्कालीन इटली की राजनैतिक दुर्दशा और विखंडन को देखते हुए उनका 'निरंकुश राजतंत्र' और 'शेर व लोमड़ी' की नीति का समर्थन एक व्यावहारिक और कूटनीतिक आवश्यकता थी। उनका दर्शन आदर्शवाद से हटकर कठोर यथार्थ, शक्ति की राजनीति (Power Politics) और मजबूत राष्ट्र-राज्य की स्थापना पर केंद्रित था। इसी कारण मैकियावेली को 'अपने युग का शिशु' (Child of his times) और आधुनिक राजनीतिक चिंतन का प्रणेता कहा जाता है।
📝 अपनी तैयारी परखें!
अगर आपने मध्यकालीन राजनीतिक चिंतन और मैकियावेली के विचारों को अच्छी तरह से समझ लिया है, तो प्रैक्टिस करने के लिए हमने आपके लिए MCQs प्रैक्टिस सेट तैयार किया है।
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