भारत शासन अधिनियम 1919 एवं राष्ट्रीय आन्दोलन सम्पूर्ण नोट्स
| भारत शासन अधिनियम 1919 एवं राष्ट्रीय आन्दोलन (1920-1935) |
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| Study Material Overview: Polity Study Adda द्वारा प्रस्तुत इस विशेष 'मेगा-लेख' में भारत शासन अधिनियम 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) और 1920 से 1935 तक के भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का अत्यंत प्रामाणिक व विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इसमें प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली (Dyarchy), प्रत्यक्ष निर्वाचन, असहयोग आन्दोलन, स्वराज पार्टी, क्रान्तिकारी गुट (HRA व HSRA), काकोरी काण्ड, भगत सिंह का बलिदान, सविनय अवज्ञा आन्दोलन (दाण्डी मार्च), गोलमेज सम्मेलन और पूना पैक्ट जैसी युगांतरकारी घटनाओं को शानदार फ्लोचार्ट्स के माध्यम से समझाया गया है। यह लेख UPSC, PCS, RO/ARO, TGT, PGT, LT, GIC, UGC NET/JRF आदि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 'रामबाण' हस्तलिखित नोट्स का उत्कृष्ट डिजिटल रूप है। |
- 1. भारत शासन अधिनियम 1919: पृष्ठभूमि (अगस्त घोषणा)
- 2. केन्द्रीय विधानमण्डल (द्विसदनात्मक व्यवस्था)
- 3. प्रान्तीय विधानमण्डल (प्रत्यक्ष निर्वाचन व द्वैध शासन)
- 4. द्वैध शासन प्रणाली (Dyarchy) का विस्तृत विश्लेषण
- 5. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार और वीटो पावर
- 6. लोक सेवा आयोग एवं साइमन कमीशन (1927)
- 7. 1920 का दशक: तिलक की मृत्यु और क्रांतिकारी गुट
- 8. महात्मा गाँधी: विचारधारा एवं असहयोग आन्दोलन (1920-22)
- 9. स्वराज पार्टी का गठन (1923) एवं बेलगाँव अधिवेशन
- 10. क्रान्तिकारी आन्दोलन: HRA, HSRA एवं काकोरी काण्ड
- 11. भगत सिंह का बलिदान एवं 'फिलॉसफी ऑफ बम'
- 12. नेहरू रिपोर्ट (1928) एवं पूर्ण स्वराज्य की माँग (1929)
- 13. सविनय अवज्ञा आन्दोलन एवं दाण्डी मार्च (1930)
- 14. गोलमेज सम्मेलन (1930-32) एवं कराची अधिवेशन
- 15. कम्युनल अवार्ड (1932) एवं पूना पैक्ट
- 16. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
✦ 1. भारत शासन अधिनियम 1919: पृष्ठभूमि (अगस्त घोषणा)
भारत शासन अधिनियम 1919 को मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu-Chelmsford Reforms) भी कहते हैं।
- लॉर्ड मांटेग्यू: भारत सचिव (इंग्लैण्ड में)।
- लॉर्ड चेम्सफोर्ड: भारत के वायसराय।
(20 Aug 1917)
(July 1918)
(1919 में)
(1921 में)
इन्होंने 20 August 1917 को इसके प्रस्तावना की घोषणा किया था, इसलिये इसे 'अगस्त घोषणा पत्र' भी कहते हैं। इस एक्ट की रिपोर्ट जुलाई 1918 में प्रकाशित हुई। यह एक्ट 1919 में बना और 1921 में इसे लागू किया गया।
मुख्य उद्देश्य: स्थानीय संस्थाओं का स्वशासन की दिशा में क्रमिक विकास करना था (संसदीय शासन प्रणाली या उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था)।
✦ 2. केन्द्रीय विधानमण्डल (द्विसदनात्मक व्यवस्था)
इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधानमण्डल को द्विसदनात्मक (Bicameral) बनाया गया, अर्थात् विधानसभा और राज्यपरिषद् की स्थापना हुयी।
3 वर्ष
145
5 वर्ष
60 (34+26)
✦ 3. प्रान्तीय विधानमण्डल (प्रत्यक्ष निर्वाचन व द्वैध शासन)
- प्रान्तीय विधानमण्डल के कुछ सदस्य जनता के द्वारा चुनकर आने लगे, अर्थात् भारत में पहली बार प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली (Direct Election System) की शुरुआत हुयी। (महिलाओं को भी पहली बार मतदान का अधिकार मिला)।
- केन्द्रीय सूची और प्रान्तीय सूची का निर्माण हुआ। केन्द्रीय सूची में ऐसे विषय रखे गए जिस पर वायसराय कानून बनाता था और प्रान्तीय सूची में रखे गए विषयों पर प्रान्तीय सरकार को कानून बनाना था।
- अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की नींव: 1892 के भारत शासन अधिनियम से।
- अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की विधिवत शुरुआत: 1909 के भारत शासन अधिनियम से।
- प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत: 1919 के भारत शासन अधिनियम से।
✦ 4. द्वैध शासन प्रणाली (Dyarchy) का विस्तृत विश्लेषण
1919 के अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली (Dual Government / Dyarchy) लागू करना था। इसका अर्थ 'दोहरा शासन' या 'दो शासकों द्वारा किये जाने वाले शासन' से है।
द्वैध शासन प्रणाली के जनक लियोनिल कर्टिस (Lionel Curtis) थे। मैस्टन समिति (Meston Committee) की रिपोर्ट/अनुशंसा पर प्रान्तीय सूची के विषय को 2 भागों में बाँटा गया था:
- प्रशासन: ब्रिटिश गवर्नर (अंग्रेजों) के पास।
- प्रमुख विषय: पुलिस, राजस्व, वित्त, न्याय, सिंचाई।
- निर्णय: गवर्नर अपने कार्यकारी परिषद की मदद से कानून बनाता था।
- (सभी मलाईदार और शक्ति वाले पद अंग्रेजों ने अपने पास रखे)।
- प्रशासन: भारतीय मन्त्रियों के पास।
- प्रमुख विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कृषि, शांति व्यवस्था।
- समस्या: इन विभागों में काम करने के लिए धन (राजस्व) अंग्रेजों के पास (आरक्षित) था।
- (भारत की सारी समस्याएँ भारतीयों को सौंप दी गईं)।
जब भारतीय मन्त्री पैसा मांगते थे तो अंग्रेज नहीं देते थे और अंग्रेजों ने ये भी कह दिया कि जो भारतीय मन्त्री कानून बनायेंगे उस पर गवर्नर के हस्ताक्षर जरूरी है और गवर्नर चाहे तो वीटो (Veto) कर सकता है। जब गवर्नर को लगता था कि अच्छा कानून है तो उसे लागू कर देता था अर्थात् जो अंग्रेजों के हित में था उसे ही लागू करता था। इस प्रकार द्वैध शासन प्रणाली बेहद विवादित हो गयी।
द्वैध शासन इतना विवादित हो गया था कि इसकी समीक्षा करने के लिये मूडीमैन की अध्यक्षता (Muddiman Committee) में एक कमेटी बनी जिसमें मुहम्मद अली जिन्ना भी एक सदस्य के रूप में शामिल हुए।
NOTE: भारत शासन अधिनियम 1919 में वार्षिक बजट पर बहस करने और पूरक प्रश्न पूछने के साथ-साथ भारतीयों को मतदान करने का भी अधिकार मिला।
✦ 5. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार और वीटो पावर
- 1909 के एक्ट में केवल मुसलमानों को धर्म के आधार पर आरक्षण (पृथक निर्वाचन) दिया गया था। 1919 के एक्ट द्वारा मुसलमानों के साथ-साथ सिखों (एंग्लो-इंडियन, ईसाइयों और यूरोपियनों) को भी धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व (आरक्षण) दे दिया गया।
- भारत के लिए एक हाई कमिश्नर या उच्चायुक्त (High Commissioner) की नियुक्ति का प्रावधान किया गया (लंदन में)।
वीटो लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है "मैं निषेध करता हूँ" (I forbid)। किसी देश के अधिकारी को एकतरफा रूप से किसी कानून को रोक लेने का यह एक अधिकार है। गवर्नर को भारतीय मंत्रियों के कानून पर वीटो का अधिकार दे दिया गया था।
✦ 6. लोक सेवा आयोग एवं साइमन कमीशन (1927)
- इस एक्ट के तहत भारत के लिए सर्वप्रथम लोक सेवा आयोग (Public Service Commission), महालेखा परीक्षक (CAG), और लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के गठन का प्रावधान किया गया।
■ साइमन कमीशन (Simon Commission)
1919 के इस एक्ट में कहा गया था कि इसके बनने के 10 वर्ष बाद एक आयोग गठित होगा जो कि घूम-घूमकर भारत में यह समीक्षा करेगा कि स्थानीय स्वशासन और शिक्षा का विकास कहाँ तक हुआ है। कुछ परिस्थितियों (इंग्लैंड में चुनाव) के कारण यही 'साइमन कमीशन' के रूप में समय से पूर्व 1927 में गठित हो गया।
3 Feb 1928 को जार्ज साइमन की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय 'साइमन कमीशन' भारत पहुँचा। चूँकि इसमें कोई भी भारतीय शामिल नहीं था (इसे 'श्वेत कमीशन' भी कहा गया), इसी का विरोध करते हुए लाहौर में लाठियों की चोट से लाला लाजपत राय शहीद हो गये।
✦ 7. 1920 का दशक: तिलक की मृत्यु और क्रांतिकारी गुट
- बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु: 1 August 1920 को (जिस दिन असहयोग आंदोलन शुरू होना था) तिलक की मृत्यु हो गयी और तिलक के हाथ में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर थी। इन्हीं के नेतृत्व में आन्दोलन चल रहा था।
- क्रान्तिकारी गुट का उदय: 1917 में हुयी रूसी क्रान्ति से प्रभावित होकर भारत में 1920 से क्रान्तिकारी गुट का उदय हुआ। इसके प्रमुख नेताओं में— भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां का नाम लिया जाता है। जो गोला, बारूद, बम के बल पर अंग्रेजों को भारत से भगाना चाहते थे।
- गाँधी जी का प्रवेश: तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस की बागडोर गाँधी जी सम्भालते हैं। गाँधी का भारतीय राजनीति में पूर्ण प्रवेश 1920 से ही हुआ। गाँधी अहिंसा के पुजारी थे। (इसी समय गाँधी के अहिंसक आंदोलन और क्रांतिकारी गुट का हिंसक प्रवेश दोनों भारतीय राजनीति में एक साथ चल रहे थे)।
✦ 8. महात्मा गाँधी: विचारधारा एवं असहयोग आन्दोलन (1920-22)
भारतीय राजनीति में बाल गंगाधर तिलक और फिरोजशाह मेहता के राजनीतिक उत्तराधिकारी महात्मा गाँधी हुए (क्रम: फिरोजशाह मेहता ➝ तिलक ➝ गाँधी ➝ नेहरू)। गाँधी जी का सम्पूर्ण आन्दोलन उनकी 'सत्याग्रह' की विचारधारा पर आधारित था।
- सत्याग्रह: यह एक कार्यवाही करने का तरीका है। इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए गाँधी जी ने दो साधनों का इस्तेमाल किया— सत्य और अहिंसा।
- साध्य और साधन: गाँधी जी साध्य (Swaraj) और साधन (Non-violence) की पवित्रता पर बल देते थे। वे अहिंसा को साधन और स्वराज को साध्य मानते थे। उन्होंने हमेशा नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति पर बल दिया।
■ असहयोग आन्दोलन (Non-Cooperation Movement)
गाँधी जी ने अपना प्रथम अखिल भारतीय आन्दोलन 1 अगस्त 1920 को शुरू किया जो 1922 तक चला। यह भारत का पहला जन आन्दोलन था (जन आन्दोलन से तात्पर्य पूरे देश की जनता के आन्दोलन करने से है)।
5 फरवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने 22 सिपाहियों को थाने में बंद करके जला दिया। इस हिंसक घटना से दुखी होकर गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। इस कारण पूरे देश में गाँधी जी का कड़ा विरोध हुआ।
"जब जन आन्दोलन अपने चरम उत्साह पर था, उस समय आन्दोलन को वापस लेना किसी राष्ट्रीय आपदा (राष्ट्रद्रोह) से कुछ कम नहीं है।"
इसी समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) का राजनीति में प्रवेश होता है और उनकी गाँधी जी से पहली मुलाकात होती है।
✦ 9. स्वराज पार्टी का गठन (1923) एवं बेलगाँव अधिवेशन
1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा 'प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली' की शुरुआत हो गयी थी। कांग्रेस के अंदर एक धड़ा यह चाहता था कि कांग्रेस को चुनाव लड़ना चाहिए और संसद (विधानमण्डल) में जाकर अंग्रेजों की नीतियों का अंदर से विरोध करना चाहिए।
- गाँधी जी का विरोध: गाँधी जी ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि यह उचित समय नहीं है।
- स्वराज पार्टी की स्थापना: गाँधी जी के विरोध से नाराज होकर मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास (चितरंजन दास) ने 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद के 'आनंद भवन' में स्वराज पार्टी का गठन किया।
- ये लोग चुनाव लड़े, जीते और संसद में जाकर ब्रिटिश नीतियों का डटकर विरोध किया। यह रणनीति सफल रही और गाँधी जी को भी यह अच्छा लगा। 1925 में सी.आर. दास की मृत्यु हो गयी, जिसके बाद स्वराज पार्टी कमजोर पड़कर समाप्त हो गयी और ये नेता पुनः कांग्रेस में वापस आ गये।
1924 में कर्नाटक के बेलगाँव अधिवेशन में केवल एक बार महात्मा गाँधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता की थी। इसी अधिवेशन में गाँधी जी ने कहा था: "स्वराज ब्रिटिश संसद द्वारा दिया गया उपहार न होकर भारतीयों की इच्छा से उत्पन्न होना चाहिए। भारतीय अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करेंगे।"
✦ 10. क्रान्तिकारी आन्दोलन: HRA, HSRA एवं काकोरी काण्ड
असहयोग आन्दोलन के अचानक वापस लिए जाने से देश के युवाओं में भारी निराशा उत्पन्न हुई, जिसने क्रान्तिकारी आन्दोलन को जन्म दिया। शचीन्द्र नाथ सान्याल की प्रसिद्ध पुस्तक 'बंदी जीवन' क्रान्तिकारियों के लिए पाठ्यपुस्तक का कार्य करती थी। (नोट: 1925 में सत्यभक्त ने कानपुर में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया था)।
Hindustan Republican Association
- अक्टूबर 1924 में कानपुर में शचीन्द्र नाथ सान्याल आदि द्वारा स्थापित।
- काकोरी काण्ड (9 अगस्त 1925): HRA के क्रान्तिकारियों द्वारा सरकारी खजाने को काकोरी में लूटा गया।
- भारी संख्या में युवा गिरफ्तार हुए। अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फाँसी दे दी गयी। 4 को आजीवन कारावास और 17 को लंबी सजाएँ मिलीं। चन्द्रशेखर आजाद फरार हो गये।
Hindustan Socialist Republican Association
- काकोरी काण्ड के बाद चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में HRA का नाम बदलकर HSRA कर दिया गया।
- प्रमुख सदस्य:
➔ उत्तर प्रदेश: विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर।
➔ पंजाब: भगत सिंह, सुखदेव, भगवती चरण बोहरा। - (नोट: भगत सिंह ने 1926 में नौजवान सभा का गठन किया था)।
✦ 11. भगत सिंह का बलिदान एवं 'सेण्ट्रल असेम्बली बम काण्ड'
ब्रिटिश सरकार ने मजदूरों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए दो क्रूर बिल— 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' पास करने की तैयारी की थी। इसके प्रति विरोध जताने के लिए तथा "बहरों को सुनाने के लिए" भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेण्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में खाली बेंचों पर बम फेंका।
- बम फेंकने से पूर्व भगत सिंह ने लाहौर में (दिसंबर 1928) सांडर्स की हत्या की थी, जो लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज का बदला था। इसने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह की चुनौती प्रथम बार दी।
- इन्होंने (भगत सिंह और दत्त) असेम्बली में बम फेंकने के बाद भागने से मना कर दिया और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।
- भगवती चरण बोहरा ने क्रान्तिकारियों का वैचारिक आधार स्पष्ट करने के लिए 'फिलॉसफी ऑफ बम' (Philosophy of Bomb) नामक प्रसिद्ध दस्तावेज़ लिखा।
लंबे मुक़दमे के बाद अंततः 23 मार्च 1931 को 23 वर्ष की आयु में भगत सिंह को उनके दो अन्य साथियों— राजगुरु और सुखदेव के साथ लाहौर जेल में फाँसी पर लटका दिया गया। सारे देश ने उनके सर्वोच्च बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया।
✦ 12. नेहरू रिपोर्ट (1928) एवं पूर्ण स्वराज्य की माँग (1929)
1922 में जब गाँधी जी ने कहा था कि भारतीय अपना संविधान स्वयं बनायेंगे, तो उस समय के भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड (Lord Birkenhead) ने भारतीयों को चुनौती दी थी कि "यदि भारतीयों में दम है तो तुम कोई ऐसा कानून (संविधान) बनाकर दिखा दो जिसे भारत की सम्पूर्ण जनता स्वीकार कर ले।"
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 1928 में कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू ने एक सर्वदलीय समिति की अध्यक्षता की और 'नेहरू रिपोर्ट' तैयार की। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से डोमिनियन स्टेट (अधिराज्य का दर्जा) और मौलिक अधिकारों की माँग विशेष रूप से की गयी थी।
■ नेहरू रिपोर्ट का विरोध
- जब नेहरू रिपोर्ट आई, तो इसके विरोध में मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना का 14 सूत्रीय कार्यक्रम आ गया।
- भारतीय पहले 'डोमिनियन स्टेट' मांगते थे, लेकिन अब युवा वर्ग पूरी आजादी (पूर्ण स्वराज्य) चाहता था। इसलिए भारतीय युवा भी नेहरू रिपोर्ट से असहमत थे।
- स्वयं मोतीलाल नेहरू के पुत्र जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चन्द्र बोस ने नेहरू रिपोर्ट (डोमिनियन दर्जे की माँग) का कड़ा विरोध किया। इन दोनों युवा नेताओं ने 'इन्डिपेन्डेन्स फॉर इण्डिया लीग' (कांग्रेस युवा पार्टी) बनाई और 1928 में दिल्ली में अपना सम्मेलन किया।
युवाओं के भारी दबाव और विरोध को देखते हुए 1929 के लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू की जगह उनके पुत्र जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। 31 दिसंबर 1929 को रावी नदी के तट पर अपने अध्यक्षीय भाषण में जे.एल. नेहरू ने 'पूर्ण स्वराज्य' (Complete Independence) की ऐतिहासिक माँग रखी। इसी क्रम में 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में पहला 'स्वतन्त्रता दिवस' (स्वाधीनता दिवस) मनाया गया।
✦ 13. सविनय अवज्ञा आन्दोलन एवं दाण्डी मार्च (1930)
1930 में गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख अपनी 11 सूत्रीय माँगें रखीं। जब उन्हें अनसुना कर दिया गया, तो गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन (Civil Disobedience Movement) प्रारम्भ किया। सविनय अवज्ञा का सिद्धान्त गाँधी जी ने अमेरिकी अराजकतावादी विचारक हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) के निबंध 'Civil Disobedience' से लिया था। इसे 'नाफरमानी आन्दोलन' भी कहा जाता है।
- दाण्डी मार्च (12 मार्च - 6 अप्रैल 1930): आन्दोलन की शुरुआत गाँधी जी ने दाण्डी यात्रा से की। गाँधी जी ने साबरमती आश्रम से अपने 78 अनुयायियों के साथ यात्रा प्रारंभ की और गुजरात के नवसारी जिले स्थित 'दाण्डी' नामक स्थान पर पहुँचकर समुद्र तट पर नमक कानून तोड़ा।
- इस आन्दोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और शराब व विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग (धरना) किया। दाण्डी यात्रा में महिलाओं का नेतृत्व सरोजिनी नायडू ने किया था (सरोजिनी नायडू की गाँधी जी से पहली मुलाकात दक्षिण अफ्रीका में हुई थी, वे भारत के किसी राज्य—उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल भी बनीं)।
वेब मिलर उसी समय भारत आये हुए थे। उन्होंने भारतीय जनमानस पर गाँधी के जबरदस्त प्रभाव और अंग्रेजों के अत्याचार के बारे में लिखा— "पता नहीं क्या आकर्षण था उस व्यक्ति (गाँधी) में, जिसके लिए लोग अपनी जान दे रहे थे। गाँधी जी के कहने पर अहिंसा की राह पर चलने वाले लोगों पर अंग्रेजों ने बेतहाशा जुल्म ढाये, पर गाँधी के दीवानों ने जान दे दी लेकिन हिंसा नहीं की... अंग्रेजों ने लोगों को इतना पीटा कि तमाम लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।"
✦ 14. गोलमेज सम्मेलन (1930-32) एवं कराची अधिवेशन
साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा करने और भारत के संवैधानिक भविष्य को तय करने के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) आयोजित किये गए। गोलमेज सम्मेलन समानता का प्रतीक है (मेज गोल होने के कारण कोई मुख्य या शीर्ष स्थान पर नहीं होता)।
| सम्मेलन | वर्ष | ब्रिटिश प्रधानमंत्री | तीनों में शामिल भारतीय नेता |
|---|---|---|---|
| प्रथम गोलमेज सम्मेलन | 1930 | रैम्जे मैकडोनाल्ड (Ramsay MacDonald) |
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर एवं मुहम्मद अली जिन्ना |
| द्वितीय गोलमेज सम्मेलन | 1931 | ||
| तृतीय गोलमेज सम्मेलन | 1932 |
■ गाँधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)
अंग्रेज सरकार को एहसास हो गया था कि कांग्रेस और गाँधी जी के बिना कोई भी सम्मेलन सफल नहीं हो सकता। अतः 1931 में वायसराय लॉर्ड इरविन और गाँधी जी के बीच 'गाँधी-इरविन समझौता' (दिल्ली पैक्ट) हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित कर गाँधी जी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए राजी करना था।
■ कराची अधिवेशन (मार्च 1931) व युवाओं का आक्रोश
गाँधी-इरविन समझौते के कुछ दिनों बाद ही 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। पूरे देश की जनता को उम्मीद थी कि गाँधी जी वायसराय इरविन से भगत सिंह की फाँसी माफ करा लेंगे, परन्तु गाँधी जी इसमें असफल रहे। इसी कारण मार्च 1931 के कराची अधिवेशन में (जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी) युवाओं ने गाँधी जी को काले झंडे दिखाए और उनके विरोध में नारे लगाए। वे भगत सिंह की फाँसी के लिए गाँधी जी को उत्तरदायी मानते थे। (यहीं पर गाँधी जी ने कहा था: "गाँधी मर सकता है, परन्तु गाँधीवाद नहीं")।
■ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में गाँधी जी की भागीदारी
- गाँधी जी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया। इसी में एनी बेसेंट ने शामिल होकर भारतीय महिलाओं का नेतृत्व किया।
- गाँधी जी एस.एस. राजपूताना (SS Rajputana) नामक समुद्री पोत (जहाज) से इंग्लैंड गए और लंदन के 'किंग्सले हॉल' (इंडिया हाउस) में रुके।
- इंग्लैंड के प्रधानमंत्री का आवास 10, डाउनिंग स्ट्रीट था। (भारत के प्रधानमंत्री का आवास वर्तमान में 7, लोक कल्याण मार्ग - पूर्व में 7, रेस कोर्स मार्ग, नई दिल्ली है)।
जब गाँधी जी सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे, तब विंस्टन चर्चिल ने उन पर तंज कसते हुए कहा— "यह कमबख्त 'अर्धनग्न फकीर' (Half-naked fakir) आज इंग्लैंड के प्रधानमंत्री से बात करने आया है!"
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर विवाद के कारण असफल रहा। गाँधी जी देश वापस लौट आए और बड़े जनमानस से कहा— "मित्रों, मैं खाली हाथ आया हूँ, आपके लिए कुछ नहीं लाया, लेकिन मैंने आपके शान (देश की इज्जत) को दांव पर नहीं लगने दिया।"
✦ 15. कम्युनल अवार्ड (1932) एवं पूना पैक्ट
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपनी 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत दलितों को हिन्दुओं से अलग करने की साजिश रची।
- कम्युनल अवार्ड (16 अगस्त 1932): इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 'साम्प्रदायिक पंचाट' (Communal Award) की घोषणा की, जिसके तहत दलितों को भी मुसलमानों और सिखों की तरह 'पृथक निर्वाचन मण्डल' देने की बात कही गई।
- गाँधी जी ने इस साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध यरवदा जेल (पुणे) में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया।
महामना मदन मोहन मालवीय जी के प्रयासों से गाँधी जी और डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के बीच ऐतिहासिक 'पूना समझौता' हुआ। डॉ. अम्बेडकर का इसी समय राष्ट्रीय राजनीति में पूर्ण प्रवेश हुआ था और वे शोषितों-दलितों की मुखर आवाज़ बन रहे थे। (नोट: गाँधी जी ने 'अखिल भारतीय हरिजन संघ' बनाया था, जबकि अम्बेडकर ने दलितों के उत्थान के लिए 'अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ' का निर्माण किया था)।
■ पूना पैक्ट के मुख्य प्रावधान
पूना समझौते में यह तय हुआ कि: हरिजनों (दलितों) के लिए 'पृथक निर्वाचन क्षेत्र' लागू नहीं होगा, बल्कि प्रांतीय विधानमंडलों में उनके लिए सुरक्षित (आरक्षित) सीटों की संख्या बढ़ा दी गई (71 से बढ़ाकर 147 कर दी गई)। इसी आधार पर जब देश आज़ाद हुआ, तो SC/ST को विधायिका और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दे दिया गया। (नोट: उस समय OBC के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था, यह बाद में मंडल कमीशन द्वारा हुआ)।
इन्हीं सब जद्दोजहद और संवैधानिक वार्ताओं के बीच अंततः ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के संवैधानिक इतिहास का सबसे बड़ा दस्तावेज़— भारत शासन अधिनियम 1935 पारित हुआ।
✦ 16. निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त ऐतिहासिक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारत शासन अधिनियम 1919 (मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) भारत के संवैधानिक विकास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। इस अधिनियम ने पहली बार केन्द्र में द्विसदनात्मक विधायिका और प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत कर भारत में संसदीय लोकतंत्र का खाका तैयार किया। यद्यपि प्रान्तों में लागू की गई द्वैध शासन प्रणाली (Dyarchy) भारतीयों को वास्तविक शक्ति देने में विफल रही और एक विवादित प्रयोग साबित हुई, फिर भी इसने भारतीयों को प्रशासन का अनुभव प्रदान किया।
इसी अधिनियम द्वारा लोक सेवा आयोग और महालेखा परीक्षक जैसी संस्थागत संरचनाओं की नींव रखी गई, जो आज भी स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक तंत्र का आधार हैं। दूसरी ओर, 1920 से 1935 के मध्य भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन अपने सर्वाधिक संघर्षपूर्ण और वैचारिक टकराव वाले दौर से गुजर रहा था। एक ओर जहाँ महात्मा गाँधी का सत्य, अहिंसा और सविनय अवज्ञा (दाण्डी मार्च) जनमानस को आंदोलित कर रहा था, वहीं दूसरी ओर भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और उनके युवा साथियों का क्रांतिकारी शौर्य ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला रहा था।
इसी दौर में नेहरू रिपोर्ट और लाहौर अधिवेशन (1929) के माध्यम से भारत ने 'पूर्ण स्वराज्य' का शंखनाद किया। अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की कुटिल चालों (कम्युनल अवार्ड) को पूना पैक्ट (1932) के माध्यम से विफल करने का प्रयास किया गया। इन्ही जन-आन्दोलनों, क्रान्तिकारी बलिदानों और गोलमेज सम्मेलनों की लंबी जद्दोजहद ने अंततः भारत शासन अधिनियम 1935 की पृष्ठभूमि तैयार की, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रमुख आधार बना।
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