संविधान, संवैधानिक सरकार, संविधानवाद और सरकार के प्रकार - सम्पूर्ण नोट्स
| संविधान, संवैधानिक सरकार, संविधानवाद और सरकार के प्रकार: सम्पूर्ण नोट्स |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में राजनीति विज्ञान के अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों— 'संविधान, संवैधानिक सरकार, संविधानवाद' तथा 'सरकार के प्रकार (एकात्मक एवं संघात्मक)' का समग्र एवं विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें संविधान का वर्गीकरण, संशोधन प्रक्रिया, संवैधानिक सरकार के 4 प्रमुख तत्व, संविधानवाद का ऐतिहासिक विकास (ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका का योगदान), और इसकी 3 प्रमुख अवधारणाओं (उदारवादी, साम्यवादी, विकासशील) को स्पष्ट किया गया है। इसके अतिरिक्त, एकात्मक व संघात्मक व्यवस्था का संरचनात्मक डायग्राम, गुण-दोष, और डायसी, जेलीनेक, गार्नर, सी.एफ. स्ट्राँग, फाइनर, डी टॉकविले जैसे प्रमुख विचारकों की परिभाषाओं तथा परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरों का एक ही स्थान पर सटीक संकलन किया गया है। |
- 1. संविधान का अर्थ एवं ब्रिटिश व अमेरिकी संविधान की पृष्ठभूमि
- 2. संविधान का वर्गीकरण (उत्पत्ति, लिखावट और परिवर्तनशीलता के आधार पर)
- 3. विकसित vs निर्मित संविधान एवं डी टॉकविले (De Tocqueville) का कथन
- 4. संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (लचीला और कठोर संविधान)
- 5. संविधान पर आधारित प्रमुख विचारकों के कथन (बोर्जियो, जेलीनेक, गार्नर)
- 6. संविधान पर अन्य महत्वपूर्ण परिभाषाएं (सी.एफ. स्ट्राँग, अरस्तू, डायसी, फाइनर)
- 7. मुनरो और लास्की के महत्वपूर्ण विचार
- 8. संवैधानिक सरकार का अर्थ एवं इसके 4 प्रमुख तत्व
- 9. संविधानवाद की पूर्वशर्त और इसके तीन मूल तत्व
- 10. संविधानवाद का ऐतिहासिक उदय और विकास
- 11. संविधान और संविधानवाद में अन्तर
- 12. संविधानवाद की तीन प्रमुख अवधारणाएं
- 13. संविधानवाद के तत्व और मुख्य विशेषताएं
- 14. संविधानवाद का विकास: प्रमुख देशों का योगदान
- 15. संविधानवाद की पाश्चात्य/उदारवादी अवधारणा (सीमित सरकार व उत्तरदायित्व)
- 16. विकासशील देशों में संविधानवाद की अवधारणा एवं 7 प्रमुख समस्याएं
- 17. विचारकों के मत (रिग्स व कार्ल लोवेन्स्टीन) और साम्यवादी अवधारणा
- 18. सरकार के प्रकार: एकात्मक एवं संघात्मक (संरचनात्मक स्वरूप)
- 19. एकात्मक एवं संघात्मक व्यवस्था का आधार (केन्द्रीकरण vs विकेन्द्रीकरण)
- 20. एकात्मक शासन की परिभाषाएं एवं 5 प्रमुख लक्षण
- 21. एकात्मक शासन व्यवस्था के गुण और दोष
- 22. एकात्मक व्यवस्था अपनाने वाले विश्व के प्रमुख देश
✦ 1. संविधान का अर्थ एवं ब्रिटिश व अमेरिकी संविधान की पृष्ठभूमि
■ संविधान का अर्थ (Meaning of Constitution)
संविधान किसी राज्य या सरकार के आचरण या क्रिया-कलाप को नियंत्रित करने वाला दस्तावेज है। इसी संविधान के कारण सरकार सीमित होती है। संविधान लिखित तथा अलिखित दोनों हो सकते हैं। ब्रिटेन विश्व का एकमात्र देश है जहां का संविधान अलिखित है। अतः संविधान को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है—
"संविधान लिखित व अलिखित नियमों का संग्रह है, जिसमें राज्य व व्यक्ति के बीच सम्बन्धों को तथा व्यक्ति व व्यक्ति के बीच सम्बन्धों को निश्चित किया जाता है तथा इन सबमें बढ़कर कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के बीच सम्बन्धों को सुनिश्चित किया जाता है।"
■ ब्रिटिश और अमेरिकी संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- विश्व में सर्वप्रथम संविधान की उत्पत्ति ब्रिटेन में हुयी। इसलिये ब्रिटिश संविधान को 'समस्त संविधानों की जननी' कहा जाता है, जबकि ब्रिटेन का संविधान अलिखित है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का संविधान लिखित बना, इसलिये विश्व का यह सबसे पहला लिखित तथा सबसे कठोर संविधान माना जाता है।
- जबकि भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान निर्मित हुआ।
✦ 2. संविधान का वर्गीकरण (Classification of Constitution)
यद्यपि संविधान दो प्रकार के होते हैं, लेकिन विभिन्न प्रकृति के आधार पर उसे विभिन्न रूपों में देखा जा सकता है:
| A. उत्पत्ति के आधार पर | B. लिखावट के आधार पर | C. परिवर्तनशीलता के आधार पर |
|---|---|---|
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✦ 3. विकसित vs निर्मित संविधान एवं डी टॉकविले का कथन
- विकसित संविधान, अलिखित संविधान और लचीला संविधान तीनों लगभग एक ही प्रकृति के हैं और केवल ये ब्रिटेन में पाये जाते हैं। और तीनों परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों पर आधारित हैं। इंग्लैण्ड में संसद शक्तिशाली है और समय-समय पर जो कानून बना देती है, वही संविधान में लिख उठता है, शेष अलिखित है। अतः इंग्लैण्ड में संसद संविधान को तय करती है।
- इंग्लैण्ड में सम्पूर्ण कानून साधारण बहुमत से ही बनाये जाते हैं। जैसा कि डी टॉकविले (De Tocqueville) ने कहा कि— "ब्रिटिश संविधान का कोई अस्तित्व नहीं है।"
डी लोल्मे (De Lolme) का प्रसिद्ध कथन:
डी लोल्मे ने लिखा कि— "ब्रिटिश संसद इतनी शक्तिशाली है कि वह स्त्री को पुरुष, पुरुष को स्त्री बनाने के सिवाय कोई भी कानून बना सकती है।"
✦ 4. संविधान में संशोधन की प्रक्रिया (लचीला और कठोर संविधान)
अमेरिका, फ्रांस, भारत का संविधान निर्मित, लिखित तथा कठोर संविधान का उदाहरण है। संविधान संशोधन की प्रक्रिया के आधार पर लचीला व कठोर संविधान में अन्तर किया जाता है।
- यदि किसी संविधान में संशोधन सामान्य बहुमत से हो, तो उसे लचीला (Flexible) संविधान कहते हैं।
- यदि संशोधन सामान्य बहुमत से न हो, तो उसे कठोर (Rigid) संविधान कहते हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। इसमें दो प्रकार की संशोधन प्रक्रिया है— साधारण बहुमत तथा विशेष बहुमत। अतः भारत का संविधान लचीला व कठोर का अद्भुत समन्वय है।
✦ 5. संविधान पर आधारित प्रमुख विचारकों के कथन (बोर्जियो, जेलीनेक, गार्नर)
बोर्जियो (Borgeaud) के अनुसार:
"बिना संविधान के राज्य अकल्पनीय है।"
जेलिनेक (Jellinek) के अनुसार:
"संविधान के बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती! संविधान के अभाव में राज्य, राज्य न होकर एक प्रकार की अराजकता होगी।"
गार्नर (Garner) के अनुसार:
"लिखित तथा अलिखित संविधान में केवल मात्रा का भेद है, प्रकार का नहीं।"
✦ 6. संविधान पर अन्य महत्वपूर्ण परिभाषाएं (सी.एफ. स्ट्राँग, अरस्तू, डायसी, फाइनर)
सी.एफ. स्ट्राँग (C.F. Strong) के अनुसार:
"संविधान उन सिद्धान्तों का संग्रह है जिसके द्वारा सरकार की शक्तियों, शासितों के अधिकार, तथा दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध नियमित होते हैं।"
अरस्तू (Aristotle) के अनुसार:
"संविधान उस पद्धति का प्रतीक होता है जो किसी राज्य द्वारा अपने लिये अपनाया जाता है।"
डायसी (Dicey) के अनुसार:
"संविधान उन समस्त नियमों का संग्रह है जिनका प्रभुत्व सत्ता के प्रयोग अथवा वितरण पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है।"
- फाइनर (Finer) ने संविधान को 'शक्ति सम्बन्धों की आत्मकथा' बताया।
- हेनरी मैन (Henry Maine) के अनुसार: "संविधान निर्मित नहीं होते बल्कि विकसित होते हैं।"
✦ 7. मुनरो और लास्की के महत्वपूर्ण विचार
मुनरो (Munro) के अनुसार:
"ब्रिटिश संविधान में जो कुछ दिखाई देता है, वह वास्तव में नहीं है और जो दिखाई नहीं पड़ता, वास्तव में है।"
लास्की (Laski) के अनुसार:
"राजतन्त्र ने अपने को जनता के हाथों में बेच दिया।" (लास्की का यह कथन ब्रिटिश संवैधानिक इतिहास के सन्दर्भ में है)।
उदारवाद की धारणा है कि संविधान का स्वरूप लोकतांत्रिक है।
✦ 8. संवैधानिक सरकार का अर्थ एवं इसके 4 प्रमुख तत्व
संवैधानिक सरकार से सीमित सरकार का बोध होता है। संवैधानिक सरकार वह सरकार होती है जो संविधान की व्यवस्था के अनुरूप संगठित, सीमित, नियंत्रित और संचालित हो तथा व्यक्ति केवल विधि के अनुरूप संचालित हो।
संवैधानिक सरकार से निम्न चार तत्वों का बोध होता है:
- सीमित सरकार
- संविधान के अनुरूप संचालित सरकार
- विधि का शासन
- नागरिक अधिकार
उपर्युक्त चारों में सीमित सरकार केन्द्रीय अवधारणा है। जहाँ संविधान हो, वहाँ संवैधानिक सरकार हो, यह आवश्यक नहीं है। जैसे कि हिटलर तथा मुसोलिनी व स्टालिन के समय संविधान तो था लेकिन वहाँ संवैधानिक सरकार नहीं थी।
✦ 9. संविधानवाद की पूर्वशर्त और इसके तीन मूल तत्व
(साधन)
(साध्य)
संविधान का उद्देश्य संविधानवाद को प्राप्त करना।
✦ 10. संविधानवाद का ऐतिहासिक उदय और विकास
यद्यपि संविधानवाद का उदय प्राचीन काल में ही हो गया था (अरस्तू को सर्वप्रथम इसके विकास करने का श्रेय दिया जाता है)। लेकिन जिस रूप में आज संविधानवाद का अध्ययन किया जाता है, वह आधुनिक काल की देन है।
इसके विकास में उदारवाद अवधारणा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में संविधानवाद का उदारवादी दृष्टिकोण सर्वाधिक मान्य है।
संविधानवाद 'संविधान' पर आधारित विचारधारा है जिसका अर्थ यह है कि शासन संविधान में लिखित नियमों व विधियों के अनुसार संचालित होती है, परन्तु केवल संविधान के नियमों के अनुसार शासन संचालन संविधानवाद नहीं है।
जैसा कि कोई तानाशाह भी अपनी मर्जी का कोई संविधान बना ले फिर उसी के अनुसार शासन का संचालन करने लगे। ऐसे संविधान में जनता के आदर्शों मूल्यों का समावेश नहीं होता, इसलिये संविधानवाद नहीं है।
✦ 11. संविधान और संविधानवाद में अन्तर
संविधान तथा संवैधानिक सरकार, संविधानवाद की पूर्व शर्त है। लेकिन जहाँ संविधान हो, वहाँ संवैधानिक सरकार तथा संविधानवाद हो ऐसा आवश्यक नहीं है। (इंग्लैण्ड में संविधान कम है लेकिन वहाँ पूर्णतः संविधानवाद है)।
निष्कर्ष: संक्षेप में हम कह सकते हैं कि संविधानवाद एक विचार (Idea) है जहाँ संविधान जनता के आदर्शों, मूल्यों व विचार द्वारा यह निर्धारित हो और व्यवहार में जैसा संविधान में लिखा गया है, वैसा परिलक्षित हो। इस प्रकार संविधान परिवर्तनशील तथा व्यवहारवाद दोनों की स्थिति एक हो।
किसी देश का संविधान अन्य देश के संविधान से भिन्न हो सकता है, लेकिन संविधानवाद एक हो सकता है। इसी आधार पर संविधानवाद की अवधारणा प्रचलित हुई। संविधानवाद एक व्यापक अवधारणा है।
✦ 12. संविधानवाद की तीन प्रमुख अवधारणाएं
संविधानवाद की 3 अवधारणाएं प्रचलित हैं:
- उदारवादी अवधारणा
- साम्यवादी अवधारणा
- विकासशील अवधारणा
■ विचारकों के मत
कार्ल जे. फ्रेडरिक (Carl J. Friedrich) के अनुसार:
"व्यवस्थित परिवर्तन की जटिल प्रक्रियात्मक व्यवस्था ही संविधानवाद है।"
सी. एफ. स्ट्राँग (C.F. Strong) के शब्दों में:
"संविधान तथा संविधानवाद में कोई अन्तर नहीं है।"
✦ 13. संविधानवाद के तत्व और मुख्य विशेषताएं
■ संविधानवाद के तत्व (Elements)
- संविधान राजनीतिक शक्ति का प्रतिबन्धक है।
- संविधान विकास का प्रतीक है।
- संविधान संस्थाओं की अभिव्यक्ति है।
- संविधान राजनीतिक तत्व का संगठन करता है।
■ संविधानवाद की मुख्य विशेषताएं (Characteristics)
- संविधानवाद मूल्य सम्बद्ध (Value-laden) अवधारणा है।
- संविधानवाद संस्कृति सम्बद्ध (Culture-bound) अवधारणा है।
- संविधानवाद संविधान जन्य (Constitution-generated) अवधारणा है।
- संविधानवाद प्रमुखतया साध्यमूलक (Goal-oriented) अवधारणा है।
- संविधानवाद एक गणात्मक (Quantitative) अवधारणा है।
- संविधानवाद एक सहभागी (Participatory) अवधारणा है।
✦ 14. संविधानवाद का विकास: प्रमुख देशों का योगदान
संविधानवाद के विकास में यूनान, रोम, ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का हाथ रहा। विश्व के अलग-अलग देशों ने संविधानवाद के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसे नीचे दी गई तालिका में समझा जा सकता है:
| देश / काल | संविधानवाद के विकास में योगदान |
|---|---|
| ब्रिटेन | ब्रिटेन से 'विधि का शासन' (Rule of Law) मिला। |
| फ्रांस | फ्रांस से 'स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता' की अवधारणा मिली। |
| अमेरिका | अमेरिका से लिखित संविधान और 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) का सिद्धान्त मिला। |
| प्रथम विश्व युद्ध के बाद | राष्ट्र संघ (League of Nations) के रूप में अंतरराष्ट्रीयवाद का विकास हुआ। |
| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद | इसे और अधिक सशक्त बनाने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का जन्म हुआ। |
✦ 15. संविधानवाद की पाश्चात्य/उदारवादी अवधारणा
संविधानवाद की पाश्चात्य या उदारवादी अवधारणा ने सीमित सरकार की परम्परा और राजनीतिक उत्तरदायित्व का सिद्धान्त दिया।
✦ 16. विकासशील देशों में संविधानवाद की अवधारणा एवं समस्याएं
विकासशील देशों में संविधानवाद अभी निश्चित नहीं हो पाया है क्योंकि इन देशों की समस्याएं भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् इन देशों में कहीं साम्यवादी व्यवस्था तो कहीं सैनिक शासन स्थापित है।
■ विकासशील देशों की कुछ सामान्य समस्याएं:
- राजनीतिक स्थायित्व की समस्या (Ex - पाकिस्तान, धर्म पर आधारित होने के कारण)
- आर्थिक विकास की समस्या
- सुरक्षा की समस्या
- राजनीतिक संरचना और विकल्पों की समस्या
- राजनीतिक सत्ता की वैधता की समस्या
- आधुनिकीकरण की समस्या (सामाजिक संस्कृति की समस्या)
- सामाजिक सांस्कृतिक साम्य की समस्या।
निष्कर्ष: विकासशील देशों का संविधानवाद निम्न लक्षणों की ओर संकेत करता है—
- संविधानवाद मिश्रित प्रकृति का है।
- यह संक्रमण कालीन स्थिति में है।
- यह निर्माण तथा प्रवाह के रूप में है (दिशा रहित है)।
✦ 17. विचारकों के मत (रिग्स व कार्ल लोवेन्स्टीन) और साम्यवादी अवधारणा
रिग्स (F.W. Riggs) के अनुसार:
"राज्य भले ही कागजी हों और राजनीतिक खेल के नियम प्रपत्र में हों, इसलिये संविधानवाद मृगतृष्णा (Mirage) हो सकता है।"
कार्ल लोवेन्स्टीन (Karl Loewenstein) के अनुसार:
"विकासशील देशों के संविधान नाममात्र के संविधान हैं।"
■ संविधानवाद की साम्यवादी अवधारणा (Communist Concept)
संविधानवाद की साम्यवादी अवधारणा मार्क्स तथा लेनिन की विचारधारा पर आधारित है। साम्यवादी व्यवस्था के अन्तर्गत आर्थिक शक्ति प्रधान और राजनीतिक शक्ति गौण है।
साम्यवादी विचारकों ने पाश्चात्य देशों में सरकार तथा संविधान को शोषण का यन्त्र माना है और साम्यवादी देशों में जो व्यवहार में देखने को मिलता है वह सिद्धान्त में नहीं लिखा होता है; अतः संविधान की साम्यवादी अवधारणा सम्भव नहीं है।
✦ 18. सरकार के प्रकार: एकात्मक एवं संघात्मक (संरचनात्मक स्वरूप)
सत्ता के वितरण और केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के आधार पर सरकार के प्रकार को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है:
- एकात्मक सरकार / व्यवस्था: इसका सबसे प्रमुख उदाहरण ग्रेट ब्रिटेन (Great Britain) है। इसमें प्रायः संसदीय शासन प्रणाली पाई जाती है, जिसमें मन्त्रिपरिषद् (प्रधानमंत्री) अधिक शक्तिशाली (पावरफुल) होते हैं।
- संघात्मक व्यवस्था: इसका सबसे प्रमुख उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) है। इसमें प्रायः अध्यक्षीय प्रणाली पाई जाती है, जिसमें राष्ट्रपति (President) अधिक शक्तिशाली (पावरफुल) होता है।
■ सत्ता के बँटवारे का संरचनात्मक डायग्राम
सरकार
(केन्द्रीकरण)
सत्ता के बँटवारे के आधार पर
सरकार
(विकेन्द्रीकरण)
डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार:
"सम्पूर्ण शक्ति का एक जगह केन्द्रित होना एकात्मक सरकार है।"
Note: यद्यपि एकात्मक व्यवस्था में प्रायः संसदीय और संघात्मक में अध्यक्षीय प्रणाली देखी जाती है, परन्तु यह एक सार्वभौमिक नियम नहीं है। उदाहरण के लिए, भारत एक संघात्मक देश होते हुए भी 'संसदीय शासन प्रणाली' का पालन करता है।
✦ 19. एकात्मक एवं संघात्मक व्यवस्था का आधार (केन्द्रीकरण vs विकेन्द्रीकरण)
सत्ता के बँटवारे के आधार पर एकात्मक व संघात्मक व्यवस्था में अन्तर किया जाता है:
- जहाँ एकात्मक व्यवस्था सत्ता के केन्द्रीकरण (Centralization) पर आधारित होती है।
- वहीं संघात्मक व्यवस्था सत्ता के विकेन्द्रीकरण (Decentralization) पर आधारित होती है।
एकात्मक व्यवस्था छोटे देशों के लिये उपयुक्त होती है, जबकि संघात्मक व्यवस्था बड़े देशों के लिये उपयुक्त होती है।
■ एकात्मक व्यवस्था (Unitary System) का अर्थ
एकात्मक व्यवस्था का जन्म इंग्लैण्ड (U.K.) में हुआ। इसलिये इंग्लैण्ड को एकात्मक व्यवस्था का आदर्श घर माना जाता है। एकात्मक व्यवस्था वह व्यवस्था होती है जिसमें संविधान के द्वारा सम्पूर्ण सत्ता एक केन्द्रीय सरकार को प्रदान कर दी जाती है, और प्रान्तीय सरकारें अपनी सत्ता उसी केन्द्रीय सरकार से प्राप्त करती हैं।
इस प्रकार की व्यवस्था में प्रान्तीय सरकारों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता है, वे पूर्णतया केन्द्र पर निर्भर रहती हैं अर्थात् एकात्मक शासन में केन्द्रीय सरकार ही सर्वोच्च शक्ति का प्रयोग करती है।
✦ 20. एकात्मक शासन की परिभाषाएं एवं 5 प्रमुख लक्षण
■ एकात्मक शासन की प्रमुख परिभाषाएं
फाइनर (Finer) के अनुसार:
"एकात्मक शासन वह शासन है जिसमें शासन सत्ता एवं शक्ति एक केन्द्र में निहित होती है तथा जिसकी इच्छा एवं अभिकर्त्ता सम्पूर्ण क्षेत्र में विधिवत् सर्वशक्तिमान होते हैं।"
गार्नर (Garner) के अनुसार:
"एकात्मक शासन वह शासन प्रणाली है जिसमें संविधान द्वारा शासन की सारी सत्ता एक केन्द्रीय सरकार को सौंप दी जाती है तथा प्रान्तीय सरकारें उसी से अपनी सत्ता प्राप्त करती हैं।"
■ एकात्मक शासन व्यवस्था के प्रमुख लक्षण
- इसमें संविधान द्वारा सम्पूर्ण सत्ता एक केन्द्रीय सरकार को प्रदान कर दिया जाता है।
- इसमें प्रान्तीय सरकारें अपनी सत्ता केन्द्रीय सरकार से ही प्राप्त करती हैं।
- प्रान्तीय सरकारों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता, उनका अस्तित्व पूर्णतया केन्द्र पर निर्भर होता है।
- इसमें इकहरा संविधान (Single Constitution) पाया जाता है।
- इसमें इकहरी नागरिकता (Single Citizenship) पाई जाती है।
✦ 21. एकात्मक शासन व्यवस्था के गुण और दोष
■ एकात्मक व्यवस्था के गुण (Merits)
- इसमें राष्ट्रीय एकता का होना इसका सबसे बड़ा गुण है।
- यह व्यवस्था संकट काल के लिये अत्यन्त उपयुक्त है।
- इसमें निर्णय लेने की सरलता होती है।
- प्रशासन में एकरूपता पायी जाती है।
- इसमें केन्द्र-राज्य संघर्ष का अभाव होता है।
■ एकात्मक व्यवस्था के दोष (Demerits)
- इसमें सरकार की निरंकुशता का भय बना रहता है।
- इसमें नौकरशाही का शासन (Bureaucracy) स्थापित हो जाता है।
- यह व्यवस्था कम लोकतान्त्रिक होती है।
- इसमें स्थानीय स्वशासन को कुचल दिया जाता है।
✦ 22. एकात्मक व्यवस्था अपनाने वाले विश्व के प्रमुख देश
विश्व के कई छोटे-बड़े देशों ने अपनी भौगोलिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary System) को अपनाया है। ऐसे कुछ प्रमुख देशों की सूची निम्नलिखित है:
एकात्मक शासन वाले प्रमुख देश
- ग्रेट ब्रिटेन
- बांग्लादेश
- भूटान
- कम्बोडिया
- चीन
- क्यूबा
- डेनमार्क
- मिस्र
- यूनान
- इण्डोनेशिया
- आयरलैण्ड
- जार्डन
- लाओस
- म्यांमार
- नीदरलैण्ड
- पुर्तगाल
- सिंगापुर
- दक्षिण कोरिया (S. Korea)
- स्पेन
- फ्रांस
- श्रीलंका आदि।
✍️ सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त समग्र विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि संविधान (Constitution) किसी भी राज्य की आधारशिला है, जबकि संविधानवाद (Constitutionalism) एक उच्च आदर्श और साध्य है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सरकार सीमित और उत्तरदायी हो। केवल लिखित नियमों का होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन नियमों में जनता की आस्था, मूल्य और संस्कृति का समावेश होना ही वास्तविक संविधानवाद है।
संविधानवाद के विकास में ब्रिटेन (विधि का शासन), फ्रांस (स्वतंत्रता, समानता) और अमेरिका (शक्तियों का पृथक्करण) का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विकासशील देशों में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के कारण यह अवधारणा अभी भी संक्रमण काल (Transition) से गुजर रही है। वहीं, साम्यवादी व्यवस्था में यह व्यवहारिक रूप से सम्भव नहीं है क्योंकि वहाँ सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण होता है।
सत्ता के वितरण के आधार पर देखा जाए तो एकात्मक व्यवस्था छोटे देशों में शक्ति और राष्ट्रीय एकता प्रदान करती है, जबकि संघात्मक व्यवस्था भारत और अमेरिका जैसे विशाल देशों में क्षेत्रीय स्वायत्तता और जन-सहभागिता (विकेन्द्रीकरण) को बढ़ावा देती है। अंततः, किसी भी शासन प्रणाली की सफलता उसकी परिस्थितियों और वहाँ के नागरिकों के लोकतांत्रिक मूल्यों पर निर्भर करती है।
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