अरस्तू (Aristotle) के राजनीतिक विचार: सम्पूर्ण नोट्स
| अरस्तू (Aristotle): राजनीतिक विचार एवं सम्पूर्ण नोट्स |
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| Study Material Overview: प्रस्तुत लेख में राजनीति विज्ञान के जनक 'अरस्तू' (Aristotle) के सम्पूर्ण राजनीतिक विचारों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें उनके जीवन परिचय, अध्ययन पद्धति (आगमन पद्धति), प्लेटो व अरस्तू के विचारों में तुलना, और उनके प्रमुख सिद्धान्तों— राज्य, परिवार, सम्पत्ति, दास प्रथा, नागरिकता, न्याय, संविधानों का वर्गीकरण तथा क्रांति का गहन विश्लेषण किया गया है। राजनीति विज्ञान की आगामी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह अत्यंत प्रामाणिक और उपयोगी संकलन है। |
- 1. अरस्तू (Aristotle): जीवन परिचय एवं प्रारंभिक शिक्षा
- 2. प्लेटो और अरस्तू में असमानता व समानता
- 3. अरस्तू का राज्य पर विचार (Views on State)
- 4. अरस्तू का परिवार पर विचार (Views on Family)
- 5. अरस्तू का निजी सम्पत्ति पर विचार (Views on Property)
- 6. अरस्तू का दास प्रथा पर विचार (Views on Slavery)
- 7. अरस्तू का नागरिकता पर विचार (Views on Citizenship)
- 8. अरस्तू का न्याय पर विचार (Views on Justice)
- 9. अरस्तू का राज्य / संविधान / सरकार का वर्गीकरण
- 10. अरस्तू का क्रांति पर विचार (Views on Revolution)
- 11. अरस्तू के आदर्श राज्य के तत्व (Elements of Ideal State)
- 12. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
✦ 1. अरस्तू (Aristotle): जीवन परिचय एवं प्रारंभिक शिक्षा
राजनीति विज्ञान के जनक, सिकंदर महान के शिक्षक तथा 'राजनीति' (Politics) शब्द का पहली बार प्रयोग करने वाले अरस्तू का जन्म 384 ई० पूर्व (384 BC) एथेंस से 200 मील दूर मकदूनिया के स्टैगिरा (Stagira) नामक प्रांत में हुआ था। स्टैगिरा यूनान का उपनिवेश था।
(दार्शनिक राजनीति के जनक)
(आदर्शवादी / आदर्श राज्य)
(यथार्थवादी / वैज्ञानिक राजनीति के जनक)
■ पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा
- अरस्तू के पिता निकोमेकस (Nicomachus) सिकंदर महान के दादा अमिन्तास द्वितीय के दरबार में राजवैद्य थे।
- अरस्तू का बचपन से ही झुकाव जीव विज्ञान (Biology) की तरफ था, अतः उसे जीव विज्ञान का जनक भी माना जाता है। अरस्तू प्रारम्भ से ही 'सावयवी सिद्धान्त' में विश्वास करते थे।
- अरस्तू बचपन से ही बड़े मेधावी थे, उन्हें 'ज्ञान का देवदूत' कहा जाता था।
- 18 वर्ष की अवस्था में वह प्लेटो की अकादमी में भर्ती हुए, जो कि यूरोप का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय माना जाता था। यद्यपि प्लेटो के अकादमी में मुख्य रूप से दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। मेधावी छात्र होने के नाते वह प्लेटो के काफी नजदीक आ गये और प्लेटो के परम शिष्य बन गये। प्लेटो अरस्तू को 'अकादमी का मस्तिष्क' (Mind of the Academy) कहता था।
■ प्लेटो से मतभेद और नई अकादमी की स्थापना
अरस्तू आगे चलकर इतिहास के प्रोफेसर बने। जिस समय प्लेटो अपनी अंतिम पुस्तक 'लॉज' (The Laws) लिख रहे थे, अरस्तू उनके काफी करीब थे, तो इसीलिए उस समय इस पुस्तक का सर्वाधिक प्रभाव अरस्तू पर पड़ा। अतः अरस्तू विधि का शासन, संविधानवाद और संवैधानिक सरकार के समर्थक बन गये।
आगे चलकर जब अरस्तू ने अपना यथार्थवादी विचार देना प्रारम्भ किया, तो प्लेटो के विचारों की धज्जियां उड़ने लगीं। एक दिन प्लेटो ने क्रोधित भरे शब्दों में कहा— "अरस्तू उस घोड़ी के बच्चे के समान है जो अपनी माँ का दूध पी लेने के बाद उसी को लात मार देता है।" इस मतभेद के कारण अरस्तू ने एक अलग अकादमी की स्थापना की जिसे 'लीसियम' (Lyceum) कहा गया।
■ अरस्तू की अध्ययन पद्धति
अरस्तू ने आगमन पद्धति (Inductive Method), ऐतिहासिक पद्धति, और प्रयोजनमूलक या स्वउद्देश्य मूलक (Teleological) पद्धति का प्रयोग किया। जहाँ प्लेटो ने राजनीतिशास्त्र और नीतिशास्त्र में कोई अंतर नहीं किया, वहीं अरस्तू पहला विचारक है जिसने राजनीतिशास्त्र को नीतिशास्त्र से पृथक् किया और राजनीतिशास्त्र का जनक बनने का श्रेय प्राप्त किया। अरस्तू की मृत्यु 62 वर्ष की अवस्था में 322 ई.पू. में हुई। ध्यान रहे कि प्लेटो ने राजनीति शास्त्र को नीति शास्त्र से अलग नहीं किया था, इसीलिए प्लेटो को आदर्शवादी दार्शनिक राजनीति का जनक माना जाता है।
✦ 2. प्लेटो और अरस्तू में असमानता व समानता
प्लेटो और अरस्तू दोनों एक ही नगर-राज्य के विचारक हैं और दोनों का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना है। लेकिन दोनों ने इसके लिए जो साधन और पद्धति अपनायी है, वह अलग-अलग है:
| प्लेटो (Plato) | अरस्तू (Aristotle) |
|---|---|
| आदर्श राज्य की स्थापना के लिए आदर्शवादी (Idealistic) तरीका अपनाया। | आदर्श राज्य की प्राप्ति के लिए यथार्थवादी (Realistic) तरीका अपनाया। |
| ये दार्शनिक राजनीति के जनक बने। | ये वैज्ञानिक राजनीति के जनक बने। |
| प्लेटो की पद्धति निगमनमूलक (Deductive) है। | अरस्तू की पद्धति आगमन (Inductive) और कुछ निगमन है। |
■ मुख्य समानताएँ (Similarities)
- दोनों राज्य को एक स्वाभाविक/प्राकृतिक संस्था (Natural Institution) मानते हैं।
- दोनों राज्य को पूर्ण एवं आत्मनिर्भर इकाई मानते हैं।
- दोनों राज्य एवं व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध (Organic Relationship) मानते हैं (अर्थात् राज्य सम्पूर्ण है, व्यक्ति उसका एक अंश)।
- दोनों कहते हैं कि व्यक्ति अपना सर्वोत्कृष्ट विकास केवल राज्य में ही प्राप्त कर सकता है।
- दोनों राज्य को 'साध्य' (End) और व्यक्ति को 'साधन' (Means) मानते हैं।
✦ 3. अरस्तू का राज्य पर विचार (Views on State)
अरस्तू ने राज्य के लिए ग्रीक भाषा के 'कायोनिया' (Koinonia) शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है पूर्ण एवं आत्मनिर्भर इकाई। प्लेटो और अरस्तू ने राज्य और समाज में कोई अंतर नहीं किया है। अरस्तू ने राज्य के वर्णन में स्व-उद्देश्य मूलक पद्धति का प्रयोग किया है।
अरस्तू राज्य और व्यक्ति के बीच सावयवी सम्बन्ध मानते हैं। वह राज्य को सम्पूर्ण (Whole) और व्यक्ति को एक अंश (Part) मानते हैं और कहते हैं कि सम्पूर्ण के बिना अंश का कोई महत्व नहीं है। यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो सम्पूर्ण पहले है और अंश बाद में, उसी प्रकार यद्यपि ऐतिहासिक रूप से व्यक्ति पहले आया, परन्तु तार्किक दृष्टि से राज्य पहले है और व्यक्ति बाद में।
अरस्तू का मानना है कि जिस प्रकार परमात्मा से अलग आत्मा की, वृक्ष से अलग बीज की, मुर्गी से अलग अण्डे की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार राज्य से अलग व्यक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।
— अरस्तू
— अरस्तू
अरस्तू मानते हैं कि राज्य अस्तित्व में इसलिए आया है क्योंकि वह लोगों को एक बेहतर जीवन प्रदान कर सके और अरस्तू कहते हैं कि राज्य एक प्राकृतिक संस्था है और मनुष्य जन्म से ही प्राकृतिक प्राणी है। चूंकि राज्य पहले से है, अतः मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह राज्य में आता है। फलस्वरूप राजनीति करता है। अतः मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है। अरस्तू ने राज्य और समाज में कोई अंतर नहीं माना, जैसा कि आपको पहले ही बताया गया है। तो इसलिए अतः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
✦ 4. अरस्तू का परिवार पर विचार (Views on Family)
जहाँ प्लेटो ने शासक और सैनिक वर्ग को परिवार रखने की इजाजत नहीं दी और स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर थे, वहीं अरस्तू परिवार के प्रबल समर्थक हैं और पुरुष सत्तात्मक समाज (Patriarchal Society) के समर्थक हैं।
- "परिवार वह होता है जहां रहकर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।"
- "व्यक्ति की चारित्रिक श्रेष्ठता ही श्रेष्ठ राज्य का आधार है।"
- अरस्तू के अनुसार एक परिवार वह होता है जिसमें पुरुष, स्त्री, बच्चे और दास होते हैं।
- यही बच्चे आगे चलकर एक नये परिवार को जन्म देते हैं, और कई परिवार आपस में मिलकर ग्राम का और कई ग्राम आपस में मिलकर राज्य का निर्माण करते हैं। अरस्तू का कथन है: "राज्य परिवारों और ग्रामों का समूह है।"
- अरस्तू ने परिवार को राज्य की इकाई माना और कहा कि एक आदर्श परिवार ही आदर्श राज्य का निर्माण कर सकता है।
- "स्त्रियों का स्थान घर के चारदीवारी में है।"
- "पुरुषों की शोभा आदेश देने में और स्त्रियों की शोभा आदेश ग्रहण करने में है।"
- "परिवार मानवता की प्रथम पाठशाला है।"
- "परिवार पींजरा नहीं वरन घोंसला है।"
✦ 5. अरस्तू का निजी सम्पत्ति पर विचार (Views on Property)
अरस्तू ने परिवार के साथ-साथ निजी सम्पत्ति (Private Property) के महत्व को भी समझा। उसने कहा कि सम्पत्ति के अभाव में व्यक्तित्व का विकास सम्भव नहीं है क्योंकि बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और राज्य की जिम्मेदारियों और अतिथियों के सत्कार के लिए निजी सम्पत्ति आवश्यक है।
■ सम्पत्ति के 2 रूप
- प्राकृतिक सम्पत्ति (सजीव): जिसके उत्पादन में प्रकृति का योगदान है (जैसे- खेती बाड़ी)। अरस्तू ने दासों को भी प्राकृतिक सम्पत्ति में रखा क्योंकि कृषि और दास यूनानी अर्थव्यवस्था का आधार थे। अरस्तू ने इसी प्राकृतिक संपत्ति को व्यक्तित्व के विकास में सहायक माना। लेकिन सम्पत्ति उतनी ही होनी चाहिए जिससे व्यक्तित्व का विकास हो सके। अरस्तू का कथन है: "विषमता क्रांति को जन्म देती है।"
- कृत्रिम सम्पत्ति (निर्जीव/विरोधी): यह वह सम्पत्ति है जिसमें व्यापार/सूदखोरी के द्वारा सम्पत्ति कमाई जाती है। अरस्तू इसके विरोधी हैं। उनका कथन है: "सूद लेना धनोपार्जन का सबसे घृणित उपाय है।"
■ सम्पत्ति स्वामित्व के 3 रूप
अरस्तू ने सम्पत्ति के स्वामित्व और उपयोग के आधार पर तीन रूप बताये:
- 1. सार्वजनिक स्वामित्व एवं सार्वजनिक उपयोग
- 2. सार्वजनिक स्वामित्व एवं वैयक्तिक उपयोग
- 3. वैयक्तिक स्वामित्व एवं सार्वजनिक उपयोग (अरस्तू ने इसे सर्वश्रेष्ठ माना है)।
अर्थात् सम्पत्ति पर निजी (वैयक्तिक) स्वामित्व हो, लेकिन उसका उपयोग सार्वजनिक भलाई के लिए होना चाहिए। यह विचार आधुनिक काल में महात्मा गाँधी के 'ट्रस्टीशिप' (न्यास) के सिद्धान्त से मेल खाता है।
✦ 6. अरस्तू का दास प्रथा पर विचार (Views on Slavery)
दास प्रथा यूनानी अर्थव्यवस्था का आधार थी। जहाँ प्लेटो ने इस पर मौन साध लिया, वहीं अरस्तू ने दास प्रथा पर खुलकर चर्चा की और इसे प्राकृतिक आधार पर उचित ठहराने का प्रयास किया। उसने इसके 3 आधार बताए:
- 1. दासता प्राकृतिक (स्वाभाविक) है: अरस्तू का मानना था कि कुछ लोग जन्म से बुद्धिमान व विवेकवान होते हैं (स्वामी बनने के लिए जन्म लेते हैं), और कुछ लोग जन्म से बुद्धिहीन व मूर्ख होते हैं (दास बनने के लिए)। इस प्रकार उसने इसे जन्मजात बताया।
- 2. दासता स्वामी और दास दोनों के हित में है: स्वामी शासक का कार्य करता है, दास के होने से उसे घरेलू काम-धंधों से मुक्ति मिल जाती है। तो इससे उसे चिंतन-मनन और शासन के लिए अवकाश (Leisure) मिल जाता है। अरस्तू का प्रसिद्ध तर्क: "जिस प्रकार वीणा आदि वाद्ययंत्रों के अभाव में उत्तम कोटि का संगीत उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार दासों के अभाव में स्वामी का पूर्ण विकास नहीं हो सकता।"
- अरस्तू कहते हैं कि दासता दास के हित में भी है क्योंकि यह मूर्ख दास बुद्धिमान स्वामी के संपर्क में रहेगा तो इनकी बुद्धि का विकास हो जाएगा और वे अपने कर्तव्यों का पालन करना सीख जाएंगे। अरस्तू का कथन है कि - "जिस प्रकार माता-पिता के अभाव में शिशुओं का विकास नहीं हो सकता, उसी प्रकार स्वामी के अभाव में दासों के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो सकता।"
- 3. दासता सामाजिक हित में है: जब स्वामी और दास दोनों अपने-अपने दायित्वों का पालन करेंगे, तो सम्पूर्ण समाज का हित होगा।
अरस्तू ने दासों का प्रयोग केवल घरेलू कामों के लिए बताया है। अतः दासों को किसी अन्य कामों में प्रयोग नहीं किया जाएगा। अरस्तू ने दासों के प्रति मानवीयता पूर्ण व्यवहार करने की हिदायत दी और कहा कि यदि दास बुद्धिमान हो जाए, तो उसे दासता से मुक्त कर देना चाहिए। लेकिन यद्यपि इस पर कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। यद्यपि अरस्तू का दृष्टिकोण वैज्ञानिक था, लेकिन उसने मानव-मानव में भेद किया, इसलिए उसके दास प्रथा के विचार की कड़ी आलोचना होती है।
✦ 7. अरस्तू का नागरिकता पर विचार (Views on Citizenship)
अरस्तू प्राचीन काल का पहला विचारक है जिसने नागरिकता (Citizenship) पर अपना स्पष्ट विचार दिया। उसका मानना था कि किसी राज्य में केवल जन्म लेने से या निवास कर लेने से कोई नागरिक नहीं बन जाता।
अरस्तू के अनुसार, नागरिक केवल वह है जो राजकीय (प्रशासनिक) और न्यायिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
अरस्तू के समय एथेंस में प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) था। उस समय केवल 10% लोग ही नागरिक माने जाते थे, जबकि 90% लोग गैर-नागरिक थे। अरस्तू के अनुसार महिलाएँ, बच्चे, दास और विदेशियों को नागरिकता प्राप्त नहीं थी, क्योंकि उनके पास शासन के कार्यों में भाग लेने के लिए आवश्यक अवकाश (समय) और बौद्धिक क्षमता नहीं मानी जाती थी।
✦ 8. अरस्तू का न्याय पर विचार (Views on Justice)
अरस्तू के अनुसार न्याय सदाचार की प्राप्ति है। चूँकि पूर्ण सदाचारी और नैतिक व्यक्ति का मिलना इस जगत में संभव नहीं है, इसलिए पूर्ण न्याय संभव नहीं है। अरस्तू ने अपने न्याय को विशेष न्याय या कानूनी न्याय की संज्ञा दी है।
अरस्तू का कथन है: "प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित भाग मिल जाना ही न्याय है।"
■ विशेष न्याय के दो प्रकार
अरस्तू ने विशेष न्याय को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा है:
-
[1] वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice): वितरणात्मक न्याय का प्रतिपादन सर्वप्रथम अरस्तू ने किया है। इसे आनुपातिक न्याय भी कहते हैं। इसका सम्बन्ध राज्य व व्यक्ति के बीच माना गया है। अरस्तू का मानना है कि व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार राज्य की सेवा करता है और क्षमता के अनुसार धन देता है (कर के रूप में)। बदले में राज्य उसे पद, पुरस्कार और सम्मान देता है।
(नोट: 20वीं शताब्दी में जॉन रॉल्स ने न्याय के क्षेत्र में वितरण न्याय को स्वीकृत किया है। अरस्तू वितरण न्याय का आधार 'योग्यता' को मानता है, जबकि आज इसका आधार 'आवश्यकता' है न कि योग्यता।) - [2] सुधारात्मक / प्रतिवर्ती न्याय (Corrective/Rectificatory Justice): इसका सम्बन्ध सामाजिक सुधार से है। यह व्यक्तियों के बीच पारस्परिक सम्बन्धों को व्यक्त करता है। इसमें कहा गया है कि जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ किये गये समझौते या संविदा को तोड़ता है, या उसके मान-सम्मान या सम्पत्ति पर आक्रमण करता है, तो राज्य उसे दण्ड देता है।
- प्लेटो का न्याय विशुद्ध नैतिक है, जबकि अरस्तू का न्याय कानूनी (कुछ नैतिक) है।
- प्लेटो का न्याय कर्तव्यमूलक है, जबकि अरस्तू का न्याय अधिकारमूलक है।
✦ 9. अरस्तू का राज्य / संविधान / सरकार का वर्गीकरण
अरस्तू पहला राजनीतिक विचारक है जिसने राज्य या शासन प्रणाली का प्रथम वैज्ञानिक वर्गीकरण किया। आधुनिक काल में यही कार्य मैकियावेली ने किया। अरस्तू के अनुसार राज्य का आधार संविधान है। अतः अरस्तू के अनुसार राज्य का वर्गीकरण ही संविधान का वर्गीकरण है और राज्य के पदों का वर्गीकरण भी संविधान में किया गया है।
अरस्तू ने 158 देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह देखा कि शासन प्रणाली के केवल तीन ही रूप होते हैं और यही क्रमानुसार बदलते रहते हैं। अरस्तू ने राज्य के वर्गीकरण में ऐतिहासिक पद्धति या तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग किया। अरस्तू ने शासन प्रणाली के वर्गीकरण के लिए उसने दो आधार तय किये: संख्या (एक व्यक्ति, कुछ व्यक्ति, बहुत व्यक्ति का शासन) और आधार/उद्देश्य। यदि शासन का आधार 'जनहित' है तो उसे 'उत्कृष्ट', और यदि शासन का आधार 'अपने हित में' है तो उसे 'निकृष्ट' कहा जायेगा।
| संख्या (Number of Rulers) | उत्कृष्ट रूप (Normal Form) - जनहित में | निकृष्ट रूप (Corrupt Form) - स्वार्थ में |
|---|---|---|
| एक व्यक्ति का शासन | राजतंत्र (Monarchy) | आततायी तंत्र / सम्प्रभुतंत्र / निरंकुश तंत्र (Tyranny) |
| कुछ व्यक्तियों का शासन | कुलीनतंत्र (Aristocracy) | गुटतंत्र / धनतंत्र / वर्ग (Oligarchy) |
| बहुत व्यक्तियों का शासन | मध्यवर्ग तंत्र / संवैधानिक तंत्र (Polity) | प्रजातंत्र / भीड़तंत्र (Democracy) |
अतः अरस्तू का मानना है कि कोई शासन प्रणाली स्थिर नहीं है, बल्कि एक प्रणाली की शासन प्रणाली दूसरे प्रकार की शासन प्रणाली में बदलती रहती है। इसे अरस्तू के शासन प्रणाली को चक्राकार शासन प्रणाली कहते हैं।
अरस्तू ने प्रजातंत्र (Democracy) को भीड़तंत्र के रूप में व्यक्त किया है। उसका मानना था कि शासन सत्ता न तो अमीरों के हाथ में हो (क्योंकि वे अत्याचारी होंगे) और न ही गरीबों के हाथ में हो (क्योंकि वे भ्रष्ट होंगे)। इसलिए शासन सत्ता ऐसे व्यक्तियों के हाथ में हो जो न अत्यधिक अमीर हों और न ही अत्यधिक गरीब। अरस्तू ने इसे 'मध्यवर्ग तंत्र' (Polity) कहा और इसे 'स्वर्णिम मध्यमान का सिद्धान्त' (Golden Mean) कहा है।
✦ 10. अरस्तू का क्रांति पर विचार (Views on Revolution)
आज क्रांति का शाब्दिक अर्थ 'आमूलचूल परिवर्तन' है। अर्थात्, जब एक प्रकार की व्यवस्था पूर्णतः दूसरे प्रकार की व्यवस्था में बदल जाती है, तो उसे क्रांति कहते हैं। क्रांति आधुनिक काल की देन है। इंग्लैंड की 1649 की 'खूनी क्रांति' को विश्व की पहली क्रांति माना जाता है। अरस्तू के समय इस प्रकार की क्रांति का बोलबाला नहीं था। आज हम अरस्तू की क्रांति को परंपरागत रूप में देखते हैं। अरस्तू ने क्रांति का अर्थ 'परिवर्तन' के रूप में देखा है। यहाँ तक कि चुनाव के बाद सरकार के बदल जाने को भी अरस्तू ने क्रांति की संज्ञा दी है।
— अरस्तू का प्रसिद्ध कथन
अरस्तू के समय एथेंस में सरकार के स्थायित्व को लेकर बड़ी चिंता व्याप्त थी। सरकारें अक्सर बनती-बिगड़ती रहती थीं। अतः अरस्तू ने सरकारों के गिरने के कारणों को ढूँढा और कहा कि प्रत्येक प्रकार की शासन प्रणाली में क्रांति के अलग-अलग कारण हैं, लेकिन कुछ ऐसे सामान्य कारण हैं जो सभी प्रकार की शासन व्यवस्था में पाए जाते हैं।
■ क्रांति के कारण
अरस्तू के अनुसार क्रांति के निम्नलिखित कारण हैं:
- 1. विषमता और अन्याय: अरस्तू का प्रसिद्ध कथन है— "विषमता क्रान्ति की जननी है।"
- 2. शासक का उद्दण्ड व अत्याचारी होना।
- 3. शासक का भ्रष्टाचारी होना।
- 4. शक्ति का दुरुपयोग।
- 5. विजातीय तत्व का होना: अर्थात् किसी राज्य में विदेशियों की संख्या पर्याप्त होना।
- 6. शासक की अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी होना।
- 7. निर्वाचन में बेईमानी।
अरस्तू का मानना था कि यदि इन कारणों का निवारण कर दिया जाय तो राज्य में क्रांति की सम्भावना कम हो जायेगी और राज्य में स्थिरता स्थापित हो जायेगी।
✦ 11. अरस्तू के आदर्श राज्य के तत्व (Elements of Ideal State)
अरस्तू का आदर्श राज्य प्लेटो के 'उपादर्श राज्य' या मिश्रित राज्य के समकक्ष है। अरस्तू का आदर्श राज्य ऐसा राज्य होगा जहाँ हर वर्ग के अलग-अलग कार्य नहीं होंगे बल्कि सभी मिलजुल कर कार्य करेंगे। इसके प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:
- जनसंख्या: अरस्तू का कथन है कि राज्य की जनसंख्या इतनी कम न हो कि अपनी सुरक्षा न कर सके और इतनी अधिक न हो कि वह आत्मनिर्भरता प्राप्त न कर सके। अरस्तू के आदर्श राज्य की जनसंख्या 1 लाख या 10 हजार नागरिक होगी। ध्यान रहे कि अरस्तू ने पर्याप्त जनसंख्या शब्द का प्रयोग किया है।
- क्षेत्रफल: अरस्तू के अनुसार राज्य की सीमाएं स्थलमंडल और जलमंडल दोनों से लगी होनी चाहिए। यदि किसी राज्य के निकट समुद्र है तो समुद्र से 3 मील या 12 मील की दूरी तक उस राज्य का अपना भू-क्षेत्र होता है। अर्थात व्यापार जलमार्ग व स्थल मार्ग दोनों से होनी चाहिए।
- परिवार एवं निजी सम्पत्ति: अरस्तू ने परिवार को राज्य की इकाई बताया और कहा कि एक आदर्श परिवार ही आदर्श राज्य का निर्माण करता है। अरस्तू ने निजी संपत्ति को भी व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक माना और अरस्तू का कथन है- "चारित्रिक श्रेष्ठता ही श्रेष्ठ राज्य का आधार है।"
- शिक्षा: अरस्तू भी प्लेटो की भांति सरकारी शिक्षा को अधिक महत्व देता है।
- नागरिकता पर विचार: अरस्तू केवल उसी को नागरिक मानता है जो राजकीय एवं न्यायिक कार्यों में भाग लेते हैं।
- संविधान का वर्गीकरण एवं क्रांति पर विचार (जैसा कि ऊपर वर्णित है)।
✍️ 12. सम्पूर्ण निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त सम्पूर्ण विश्लेषण (पार्ट 1 से 12 तक) से यह स्पष्ट होता है कि अरस्तू (Aristotle) न केवल यूनानी दर्शन के शिखर पुरुष थे, बल्कि वे सच्चे अर्थों में राजनीति विज्ञान के जनक (Father of Political Science) हैं। जहाँ उनके गुरु प्लेटो ने कल्पना और आदर्शवाद (Idealism) का सहारा लिया, वहीं अरस्तू ने यथार्थवादी (Realistic), आगमन (Inductive) और वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर राजनीति को नीतिशास्त्र से अलग किया।
अरस्तू का यह मानना कि "राज्य व्यक्ति से पूर्व है" और "मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है", राज्य की प्राकृतिक और सावयवी (Organic) प्रकृति को सिद्ध करता है। उन्होंने परिवार और निजी सम्पत्ति का समर्थन करते हुए व्यक्ति के विकास को महत्व दिया, यद्यपि उनके दास प्रथा और नागरिकता सम्बन्धी विचार आधुनिक युग के लिए संकीर्ण और रूढ़िवादी प्रतीत होते हैं, परन्तु वे तत्कालीन यूनानी परिस्थितियों के अनुकूल थे।
अंततः, न्याय (वितरणात्मक व सुधारात्मक), संविधानों का वैज्ञानिक वर्गीकरण, और अतिवाद से बचते हुए 'स्वर्णिम मध्यमान' (Golden Mean) के आधार पर पॉलिटी (Polity - मध्यवर्ग तंत्र) को सर्वश्रेष्ठ शासन मानना अरस्तू की अद्वितीय दूरदर्शिता को दर्शाता है। उनका दर्शन आज भी राजनीतिक विचारकों के लिए एक महान आधारस्तम्भ है।
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